अगली शाम हरिया और रघुबर दोनों खुशी से झूमते-झामते
आए। उनकी चाल-ढाल ही बता रही थी कि खशी में मतवाले होकर उन्होंने वहां आने से पहबे ही कुछ चढ़ा ली थी।
गनीमत यही थी कि नसे में मदमस्त नहीं थे वे लोग।
'मोर्चा फतह कर लिया सस्ताद आपकी दुआ से।' रघुबर ने खशी से झूमते हुए कहा-'ऐसे-ऐसे बढ़िया फोटो खींचें हैं कि देखैते ही फड़क उठोगे। दिखाना हरिया गुरु जरा।'
हरिया ने जेब से एक गीला सा लिफाफा निकालकर कालिया की ओर बढ़ाते हुए कहा-फोटो बीच कर सीधे फोटोग्राफर की दुकान पर गए। हाथ के हाथ रील धुलवा कर प्रिंट निकलवाए। अभी थोड़े गीले हैं। तुम्हें दिखाने के लिए गीले ही
उठा लाया।
कालिया ने प्रिंट देखे।
साधना और जयतार के प्रेमालीन फोटो।
उतने उत्तेजक तो नहीं थे बितने भैरों के माध्यम से उसने साधना के फोटो अपने एक अन्य आदमी के साथ खिंचवा लिए थे। लेकिन फिर भी बदनाम करने के लिए अथवा उस
फारेस्ट आफिसर की नस दबाने के लिए काफी थे।
अब फारेस्ट आफिसर उसकी मुट्ठी में होगा।
एक नहीं दो अबग-अलग आदमियों के साथ लिपटा-चिपटी के फोटो। ऐसा कौन माई का लाल है जो इन्हें देखकर उसे बद- इच्छा हुई जगन सेठ को अपनी कामयायी की सुचना देने की। मगर रुक गया।
शाबासी देता हुआ बोला-'शाबास हरिया, अब यकीन हो गया कि तू मेरी जगह सम्हाल सकता है। अक्ल है तेरी खोपक में।
और रघुबर तू भी पास हो गया रे अपने इम्तहान में। आज से हमारे खास आदमियों में आ गया तू।'
'बहुत-बहुत मेहरबानी उस्ताद।'
रघुवर ने इस तरह झुककर कहा जैसे मन मांगी मुराद मिल गई हो उसे।
पांचवे दिन केसरी मेयर के घर से जीप में लौट रहा था
इन पांच दिनों में वह मेयर के काफी नजदीक आ चुका था। किन्तु फिर भी वहां से लौटते समय वह कोई खास प्रसन्न नहीं था। मेयर ने जो अखबारी युद्ध छेड़ा था वह अब उसी के लिए मुसीबत बन गया था। उसे मालूम हुत्रा कि कालिया का पृष्ठ पोसी जगन सेठ खुल कर सामने आ गया है। वह उसे और उसकी बहन को पूरी तरह टदनाम करने पर तुला हुआ है।
'मैंने तो आपसे पहले कहा था कि वे कमीने लोग उस बात
का नाजायज फायदा उठाएंगें।' उसने कहा था।
'उसके लिए तो मैं तैयार था।' मेयर परेशान से स्वर में बोला-'तुम्हारी सच्चाई पर और तुम्हारो बहन की नेकचलनी पर मुझे पूरा भरोसा है। इसीबिए मैंने सोचा था कि बदनाम करन के लिए वे जिस आदमी को भी सामने लाएंगें उसे मैं साबित कर दूंगा कि वह उनका ही आदमी है। लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि वे लोग मुझे ही सानने की कोशिश करेंगे।'
'तो क्या किया जाए?' 'कुछ समझे में नहीं आ रहा।'
'कोशिश करू दीदी को वापिस भेजने की। हालांकि वे तैयार नहीं होगी।'
'उससे तो उन लोगों के प्रचार को और बन मिल जाएगा। ऐसे मौके पर सामने से हट जाने का मतलब होना यह साबित करना कि उनकी ही बात सच है।'
काफी देर तक बात करता रहा था वह किन्तु कोई उत्साह-वर्धक नतीजा नहीं निकला।
लौटने के समय साधना के बारे में ही सोच रहा था वह। अगर उसकी बात मानकर वह भी सामाजों के यहां चली गई होती तो शायद इन बदमामों से लिपटने में कुछ सहूलियत होती।
लेकिन वह भी तो एक मम्बर की जिद्दी है।
बंगले पर रात को पुलिस का पहरा लग जाने की वजह से कुछ सुख-शान्ति थी। बदमाशों का उपद्रव शान्त हो गया था। लेकिन साधना में उसने कुछ परिवर्तन अवश्य लक्ष्य किया था।
पहले से भी ज्यादा गम्भीर हो गई थी वह। कारण पूछने का कोई मौका नही मिला था उसे। क्योंकि वह स्वयं इस अखबारो युद्ध और इसके सम्भावित परिणामों को सोचने मे उलझा हुआ था।
आज मेयर की बात सुनकर तो वह और भी अधिक हतोत्साहित सा महसूस कर रहा था।
आज साधना से बात करेगा।
लेकिन क्या बात करेगा।
मेयर ने सच कहा है कि ऐसे नाजुक मौके पर सामने से हटने
का मतलब होगा उन लोगों की और बन आना।
यही सब सोचते हुए उसने पेट्रोल डलवाने के लिए गाड़ी एक पैट्रोल पम्प में मोड़ दी।
रोकते रोकते यह देखकर चौंक पड़ा कि वहां कालिया एक आदमी के साय खड़ा पैट्रोल डलवा रहा था। उसे यह नहीं मालूम था फि वह आदमी उसका छोटा भाई हरिया है। वह अपनी ड्राईविंग सीट पर ही बैठा रहा था। लेकिन हरिया ने उसे देख लिया था और उसे देखकर जोर से गाना भी शुरू कर दिया था।
अरे मेरे जगतार यार तेरे गले में डालूं बांहों का हार
साधना पूरी कर दे रे..
साधना पूरी कर दे रे... कोई शक नहीं था कि यद् सब उसे उत्तेजित करने के लिए जान-बूझकर ऊंची आवाज में सुनाया जा रहा था। उसने अपने आपको समझाया कि उसे उत्तेजित नहीं होना है।
किन्तु हरिया की आवाज उत्तरोत्तर तीव्र ही नहीं होती जा रही थी बल्कि उसकी मुखमुद्रा अश्लीलता की सीमा का छूने लगी थी।
पैट्रोल डालने वाला भी उसकी ओर देखकर एक अवीब सी न समझ में आने वाली हंसी हंसा।
बस तमी उसके संयम का बांध टूट गया।
एक छलांग में वह बाहर कूद गया। हरिया के जबड़े पर जो चूंसा पड़ा तो वह घूमता हुआ जीप से टकराकर नीचे गिर पड़ा।
कालिया ने एकदम घूमकर उसे पकड़ा।
बिफरे हुए शेर की तरह उसने कालिया के पेट में घूसा मारा
और वह छिटक कर जमीन पर जा गिरा।
वह उस पर झपटने ही जा रहा था कि पैट्रोल डालने वाले ने उसे रोका-'क्या कर रहे हैं वाबू जी?'
वह शयद रुक भी जाता मगर तमी उसने कालिया को अपनी पिस्तौल निकालते हुए देख लिया। सो पैट्रोल डालने वाले को
तेजी से एक ओर को उछालकर उसने पैर की ठोकर कालिया के हाथ पर मारी।
एक ही झटके में पिस्तौल हाथ से निकल कर दूर जा गिरी। तब तक हरिया भी सम्हल कर फिर से उस पर झापड पड़ा था।
उसने थोड़ा सा झुकंकर जो धोबी पाट मारा तो हरिया हवा में बल खाता हुआ सौंधा कालिया पर जा गिरा।
पिस्तौल हाथ से निकलते ही कालिया की स्थिति उस नाग
जैसी हो गई थी जिसके जहरीले दांत तोड़ दिए गए हों। उसे यह भी अहसास हो गया था कि छोकरा उस समय उस पर भारी पड़ रहा है।
हरिया को अपने ऊपर से धकेलता हुआ बोला वह-'अबे यहां क्या अपनी मरदानगी दिखा रहा है। घर जाकर अपनी बहन को सम्हाल। जाकर देख वह अपनी जवानी का थाल किस कुत्ते को परोस कर खिला रही है।'
वह क्रुद्ध शेर सा फिर झपटने को उद्यत हुआ। लेकिन पैट्रोल पर उपस्थित अन्य लोगों ने थाम लिया।
बीच-बचाव हुआ।
लोगों ने दोनों भाईयों को जीप में बैठा कर विदा किया। पिस्तौल भी उठाकर कालिया को दे दी।
उनके जाने के बाद उसकी गाड़ी मे भी पैट्रोल डालकर उसे विदा किया।
अन्धाधुन्ध तेज गति से जीप चलाता हुआ वह सीधा बंगले पर पहुंचा। सारे रास्ते बस दो ही शबद उसके मस्तिष्क में गूंथते रहे थे।
साधना जगतार "जगतार साधना।
क्या हुआ दीदी को जो अगतार जैसे भद्दे और कुरूप व्यक्ति की ओर फिसल गई नहीं दीदी ऐसी नहीं है कालिया साला बदनाम करने के लिए झूठ बोल रहा है. मगर उसने भी पिछले दिनों दीदी में परिवर्तन तो लक्ष्य किया था तो क्या दीदी का संयम.. शंका के सर्प मस्तिष्क में फन उठाकर फनफनाने लगे। तो क्या अन्याय के सामने से हट जाने वाली बात सिर्फ एक दिखावा था एक धोखा था और असल में यह जगतार से मिलने के लिए यहां बने रहना चाहती थी। मगर एक
अजनबी व्यक्ति के प्रति इंतना झुकाव आखिर क्यों और कैसे?' कुछ समझ में नहीं आ रहा उसकी।
जितना भी सोचता मस्तिष्क उतना ही भ्रमित सा होता लग रहा था।
जीप रोकते ही उसने देखा कि बंगले का दरवाजा बन्द है। कुंडा लगा था मगर ताला नहीं।
तो दीदी कहीं गई है।
कहां?"जगतार से मिलने?
सोचते ही चेहरा सख्त हो गया। जबड़ा कस गया। आंखों में
खून सा उतर आया।
चारों ओर नजर दौड़ाई। साधना कहीं नजर न आई।
कहां जाकर पकड़े उन दोनों को? किस तरफ गई होगी।
फिर अचानक ही पूरी शक्ति से चिल्ला उठा वह-दीदी दीदी...।
हवाओं को चीरती हुई उसकी तेज आवाब जंगल में चारों ओर
को गूंजती चली गई।
कभी वह एक ओर को बढ़कर आवाज देता कभी दूसरी ओर
को। जैसे पगला-सा गया हो।
फिराक ओर की झाड़ियां तेजी से हिलती दिखाई दी। वह उसी ओर झपटा।
झाड़ियों से अस्त व्यस्त सी साधना निकल कर वाहर आई।
कहां गई थी?' वह एकदम गरजा।
उसे अपने ऊपर आश्चर्य हो रहा था। क्योंकि आज से पहले कभी भी साधना के आगे इतनी तेज आवाज में बोलने का साहस नहीं हुआ था उसे।
साधना के चेहरे का उड़ा हुआ रंग देखकर उसे अपना सन्देह पुष्ट होता नजर आया।
'कहां गई थी?' वह क्रोध से कांपता हुआ फिर गरजा। 'तुम इस वक्त आपे में नहीं हो केशो।' साधना ने कहा और उसके पास से गुजर जाना चाहा।
वह वास्तव में अपने आपे में नहीं था।
उसने हाथ बढ़ाकर साधना की बांह पकड़ ली और जोर से झिंझोड़ता हुआ बोला-बेहया-बेशम पहले ही क्या कम मुसीबतें थी जो तू इस रास्ते पर फिसल गई मालूम है सारे
शहर में थू थू हो रही है।'
'तुम हद से आगे बढ़ते जा रहे हो केशो।' निर्भीकता से कहा साधना ने और साथ ही झटके से अपनी बांह छुड़ा ली। 'मैं हद से आगे बढ़ता जा रहा हूं या त लाज शरम की सारी सीमाएं बांध गई बता, किससे मिलने गईाई थी उस कुत्ते जगतार से आज उसे भी जिन्दा नहीं छोडूंगा बता कहां है वह हरामजादा?'
'होश में आओ केशो।' साधना डपटकर बोली-'खबरदार जो उनके बारे में एक शब्द भी गलत निकाला।'
'चुप बेशर्म।'
और उसने साधना के मुंह पर एक तमाचा ही तो जड़ दिया।
'बस।' तभी एक कड़कदार आवाज गंजी।
उसने एकदम घूमकर देखा। झाड़ियों के पास जगतार खड़ा धा कूल्हों पर हाथ रखे हुए। सिर के बाल उनके बिखरे। कई दिनों की बड़ी हुई दाढ़ी। छाती के बटन खुने हुए भद्दा और कुरूप मा जगतार। लेकिन इसके बावजूद भी उनकी आकृति में उसके खड़े होने के स्टाईल में एक अजीब मव्यता और गरमा सी थी।
जैसे कोई जंगली शेर अपनै वीरोचित अभिमान के साथ अन्य सभी को अपनी तुच्छता का बोध करा रहा हो।
हां जंगली शेर सा ही लगा था वह उसे। क्योंकि इस तरह अचानक ही उसे अपने सामने पाकर न जाने क्यों उसका कलेजा धक्क से रह गया था।
वह डरा नहीं था उससे। शायद उस अजनबी को अपने सामने पाकर उसे अचानक ही कुछ दिन पहले की वह रात याद आ गई थी जब यह अचानक ही उस संकट की घड़ी में देवदूत की तरह सहायता करने के लिए पहुंच गया था।
तब का सहायक आज दुश्मन के रूप में सामने खड़ा था लेकिन सहायता का यह मतलब तो नही कि वह अपने उपकार का ब्वाज उसकी बहन को फुसलाकर वसूल करने
लगे।
जगतार कह रहा था उससे-'अब अगर अपनी बहन के हाथ लगाया तो यह हाथ तोड़कर रख दूंगा।'
जगतार के चुनौती भरे शब्द सुनते ही उसकी आंखों में फिर से खन उतर आया। उसका इतना साहस कि उसकी बहन पर उसके सामने इतना अधिकार दिखा रहा है।
'जा चला जा यहां से कुत्ते।' वह गर्राया-'अब अगर कभी इस जंगल में नजर आया तो टुकड़े करके फेंक दूंगा।'
'जा रहा हूं।' जगतार ने गुरू गम्भीर स्वर में कहा-'मगर इतना ध्यान रखना कि अगर अपनी बहन पर हाथ उठाया तो मुझे अपने सामने पाने में देर नहीं लगेगी।'
और फिर उसे जगतार पर झपटने में देर नहीं लगा। कुत्ता दुम दबा कर भागने की बजाए उसी पर गुर्राए जा रहा है।
पहले तो जगतार अपना बचाव करता रहा। लेकिन जब उसके आक्रमण की भीषणता बढ़ती ही गई तो उसने भी मुकावला करना शुरू किया।
तभी उसका जोरदार घंसा जगतार की नाक पर पड़ा। जगतार उसकी चोट से न सिर्फ लड़खड़ा गया बल्कि उसकी पक से खून भी छलक आया।
खून देखते ही जैसे जगतार भी सब कुछ भूल गया हो खाली शेर की तरह भीषण गर्जना करता हुआ वह उस पर झपटा। दो चार हाय पड़े तो सिर घूम गया।
उसे पता भी न चल सका कि कब जगतार ने उसे अपने हाथों में सिर से ऊपर उठा लिया।
'नही।'
उसके फेंकने से पहले ही साधना पूरी शक्ति के साथ चीखी।
जगतार एकदम रुक गया। उसने धीरे से उसे जमीन पर लिटाया और फिर छलांग लगाकर झाड़ियों के नीच गुम हो
गया।
वह हतप्रभ सा हिलती हुई झाड़ियों को देखता रहा।
इम तरह सरेआम बेइज्जती करने के बाद वो जिन्दा बच कर निकल जाए भईया तब तो फिर हो चुका हम लोगों का इस
शहर मे अब रहना।
जिस तरह घायल सांप इधर से उधर फन पटकता है उसी तरह कालिया भी फुफकारें सी मारता हुआ अपने घर के कमरे में इधर से उधर घूम रहा था। उसे मालम था कि हरिया झूठ नहों कह रहा। पैट्रोल पम्प की घटना की खबर सारे शहर में फैलते देर न लगेगी। लोग सामने नहीं पीठ पीछे हंसना शुरू कर देंगे। जीना हराम हो जाएगा इस शहर में।
अगर उसने ठोकर मारकर पिस्तौल हाथ से न निकाल दी होती तो आज साले को वहीं भून के रख दिया होता। लेकिन साले के बदन में क्या कड़क की ताकत थी। दोनों भाईयों को पीटकर चला गया।
सरेआम कालिया के सिर पर बंसरी बजा ही दी उसने।
अपमान की ज्वाला से सारा बदन जल रहा था कालिया का। छाती में प्रतिहिंसा की ज्वाला धधक रही थी। अब जब तक उस हरामजादे की लाश नहीं बिछा देगा तब तक चैन नहीं पड़ेगा उसे।
तभी फोन की घंटी बजी।
हरिया ने रिसीवर उठाया। फिर माऊथ पीस पर हाथ राखकर उसकी कोर वढ़ाता हुआ बोला-'जगन सेठ हैं।'
उसने रिसीवर ले लिया।
'यह पैट्रोल पम्प पर क्या हंगामा हो गया?' दूसरी ओर जगन
सेठ की आवाज आई।
'वही हो गया जो होना चाहिए था।' वह अपने स्वर यथा-सम्भव संयत रखता हुआ बोला। लेकिन साथ ही अपना आक्रोश छुपाने की भी कोई कोशिश नही की उसने-'हमारे हाथ तो आपके हुक्म से बंधे हुए थे जगन सेठ। सो उस हरामजादे की बन आई। भरे चौराहे पर इज्जत धूल में मिलाकर चला गया।' 'तुम्हारी सहनशीलता की तारीफ करने के लिए फोन किया है मैंने तुम्हें। अपने आप पर काबू रखकर जिस अक्लमंदी का सबूत दिया है तुमने वो वाकई काबिले तारीफ है।' 'वह साला मेरे सिर पर बंसरी बजाता रहेगा ओर तुम मेरी सहनशीलता की तारीफ करते रहना जगन सेठ।' कालिया ने तल्ख से स्वर में कहा। 'बस कुछ दिन तक अपने ऊपर काबू और रखो, फिर देखना कि यह फारेस्ट आफिसर तुम्हारे ही पैरों में अपनी नाक रगड़ता नजर आएगा।'
'हम तो तुम्हारे हुक्म के गुलाम हैं जगन सेठ। जब तक कहोगे तब तक सब्र किए बैठे रहेंगे। पर इतना समझ लो कि सब्र का प्याला लबालब भर चुका है। कभी भी छलक सकता है।'
'अब ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ेगा तुम्हें।' दूसरी ओर से जगन सेठ की आवाज आई-'तुम्हें मालूम है। अभी कुछ देर पहले मेयर का फोन आया था मेरे पास। साले की धोती ढीली हो गई। समझौता करना चाहता है अब।'
'अच्छा ।'
जगन सेठ दूसरी ओर से अपनी उपलब्धि का वखान करते रहे कि कैसे वह वर्तमान मेयर का ऐसा शिकंजा कसेंगे कि वह उनकी शर्तों पर नाक रगड़ कर समझौता करने के लिए तैयार होगा। उसके बाद उस फारेस्ट आफिसर को ऐसे शिकंजे में कसा आएगा कि साला हाथ जोड़कर जूतियां चाटने पर मजबूर हो जाएगा। 'बस तुम थोड़े दिन और सब करो।' जगन सेठ ने उससे हा।
'कहा ना जगन सेठ, हम तो तुम्हारे हुक्म के गुलाम हैं। अब तक कहोगे सब किए बैठे रहेंगे।'
लेकिन कालिया ने जो कुछ कहा था वह करने के लिए वह बिलकुल तैयार नहीं था। बपनी वास्तविक मनोभावनाएं जगन
सेठ पर व्यक्त करके वह बेकार की बहस में नहीं उलझना चाहता था। इसलिए फोन पर जो जगन संठ सुनना चाहता था दही सुनाता रहा।
लेकिन उसका वास्तविक इरादा उसके मस्तिष्क में पूरी तरह पुख्ता हो चुका था।
आज रात उस फारेस्ट आफिसर को निबटा देना है।
जगन सेठ बाद में बिगड़ेगा तो देख लिया जाएगा।
मार पीछे की पुकार किसने सुनी है।
लेकिन इस बारे में न भैरों से कोई बात करनी है न किस और से। काम होने से पहले अगर जगन सेठ तक खबर पहुंच गई तो गड़बड़ हो सकती है।
इसलिए जरूरी है कि कानों कान किसी को खबर न होने पाए। बस वह हरिया और रघुबीर। बस तीन आदमी।
लेकिन फारेस्ट आफिसर छोकरा है जरा कड़ा। उस पर और हरिया पर भारी रहा था वह। मगर तब और बात थी। इस बार जब कालिया उस पर झपटेगा तो साले को पलक झपकने का भरई मौका नहीं देगा।
उसे क्या करना है यह सब शीशे की तरह उसके दिमाग में साफ है।
'तू रघुबर को बुला कर ला।' उसने हरिया से कहा।
हरिया के जाने के बाद कालिया ने अलमारी खोलकर लोहे की बनी हुई एक अशुभ आकृति सी बाहर निकाली जिसमें एक दूसरे से जुड़े हुए चार लोहे के छल्ले से बने हुए थे। छल्ले एक ओर से सपाट थे लेकिन दूसरी ओर उन पर शेर के तेज नाखूलैं सरीखी लोहे की पैनी घुमावदार कीलें सी जुड़ी हुई थीं।
यह बधनया था।
कालिया का सबसे बड़ा खतरनाक हथियार। जिस पर उसका किसी पिस्तौल से भी ज्यादा भरोसा था।
इसे पहनकर अगर बन्द मुट्ठी से बार किया जाए तो कि भी
आदमी की गरदन की हड्डियां जबाड़े के पास के जोड़ टूटती चली जाएं। और अगर खुले पंजे से बार किया जाए आदमी की हड्डियों तक से मांस के लोथड़े नुचते चले जाएं।
हरिया और रघुबर के आने से पहले ही उसने उसे फिर से
अलमारी में रखते हुए कहा था-कुछ देर और आराम कर ले बेटे।
फिर हरिया और रघुबर को अपनी योजना समझाने लगा था वह।
उस घटना के बाद से दोनों भाई बहनों में से कोई भी एक दूसरे से नही बोला था। अपने-अपने कमरे में आकर पड़ गए
थे वे लोग।
बाहर उतरता हुआ रात का अन्धेरा बंगले में भी घिर आया था
पर किसी ने भी बत्ती जलाने की जरूरत नहीं समझी थी।
वह अपने पलंग पर चित्त पड़ा हुआ फटी-फटी आंखों से छत के अन्धेरों के घूरता हुआ सोच रहा था कि यह क्या हो गया। कैसी जगह आ गया वह जहां उसकी जिन्दगी में यह नर्क का अन्धेरा घुलता चला जा रहा है।
यहा आने से पहले कैसा था उनका छोटा सा परिवार। अभाव थे जिन्दगी की कशमकश थी लेकिन उसके बाद भी खुशियां थी उनके जीवन में।
लेकिन यहां आते ही उनकी खुशियां के फूल नियति के क्रूर हाथों द्वारा नोचकर मसल दिए गए।
अपनी दीदी की दिल से पूजा किया करता था वह। वह जानता था कि जमाने की कितनी सर्द-गर्म तेज हवाओं का सामना करके उसने उन लोगों को पाल पोस कर बड़ा किया है। अपने सभी अरमानों और खुशियों को कुर्बान करके उसे पड़ा लिखा कर शिक्षित किया ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
और आज अपने पैरों पर खड़े होते ही उसने अपनी दीदी की कुर्बानियों का बदला उसके मंह पर चौटा मार कर चुकाया।
लेकिन दीदीको भी यहां औते ही क्या हो गया?
लोग जिसके चरित्र खौर संयम की कसमें खाया करते थे, बह उस आवारा से जगतार पर छि:...|
'खाना बनाऊं?'
न जाने कब में साधना आ गई थी वहां। बचानक ही उसकी
आवाज सुनकर चौंक पड़ा था वह। फिर अनमाने स्वर में बोला-'नहीं।'
और कुछ नहीं कहा साधना ने। और दिनों की भांति यह नहीं पूछा कि क्यों नहीं खाएगा। बस खामोशी से मुड़ी और बाहर जाने को हुई।
'दीदी।' उसने पुकारकर रोका।
रुक गई साधना।
'बत्ती जला दो।'
स्विच दवा कर बत्ती जला दी साधना ने। उसने देखा कि
आंखें जरूर लाल-लाल और भारी थीं। लेकिन पश्चाताप का कहीं कोई निशान नहीं था। चेहरे पर पत्थर की सी खामोशी
और दृढ़ता थी जो उसने पहले भी कई ऐसे अवसरों पर देखीं थी जब वह दनिया भर के विरोधों का मुकाबला करने के लिए अपने आपको मानसिक रूप से दृढ़ प्रतिज्ञा कर लेती थी।
कांप गया था वह उस दृढता को देखकर।
'दीदी।' अजीब से कंपित स्वर में बोला वह-'आज जो कुछ
भी हुआ।'
'नहीं होना चाहिए था।'
.
.
.
'मैंने तुम पर हाथ उठाया?'
'उसका मुझे अफसोस है कि मैंने तुम्हें इतना दुख पहुंचाया जो तुम अपना आपा खो बैठे।' साधना ने सपाट से स्वर मे कहा।
'तुम्हें यह सब नहीं करना चाहिए था दीदी।'
'यह तो मैं नहीं जानती केशो कि मुझे यह सब करना चाहिए
था या नहीं। लेकिन इतना जरूर हूँ कि जिस रास्ते पर मैं आगे बढ़ चुकी हूं उससे अब वापिप्त नहीं लौटूंगी?'
'उस जगतार के लिए?'
'ही उसी के लिए।'
'कब से जानती हो उसे।'
'जिस रात बंगले पर हमला हुआ था तब पहली बार देखा था उसे।'
'ऐसा उस असभ्य लोफर में क्या दिख गया तुमको?'
'यह मैं भी नहीं जानती।'
'एक क्षण के लिए तुमने यह नहीं सोचा कि वह तुम्हें बोखा
भी दे सकता है।'
'शायद।'
'ओह।' उसने झुंझलाकर फोल्डिंग पलंग के लोहे बे पाईप पर हाथ मारा-'तुम इतनी समझदार होकर यह सब |
'मेरा ख्याल है कि इस विषय में अगर हम आगे बात न करे तो अच्छा है।'
'लेकिन दीदी उस आदमी के बारे में बिना कुछ जाने
समझे।'
'जितना कुछ मुझे जानना चाहिए वह मैं जान चुकी हूं।' 'क्या जान चुकी हो तुम?'
'वह चाहे एक अच्छा आदमी न हो लेकिन एक सच्चा आदमो जरूर है।'
उसने उलझनपूर्ण दृष्टि से साधना की ओर देखा।
'वह अपने बारे में सब कुछ बता चुका है।' साधना ने शून्यू में निगाहें जमाते हुए कहा-'जब अनजानी भावनाओं से बध मेरे कदम उसकी ओर बढ़े थे तभी उसने मुझे चेता दिया था कि मैं गलन दिशाओं में बढ़ रही हूं। वह एक पेशेवर अपराधी है। पुलिस उसके पीछे पड़ी है। उसी से बचने के लिए वह इन जंगलों में छुपने के लिए आया है।'
'इसके बावजूद भी तुम ।' 'हां, शायद यही मेरा भाग्य है या शायद एक और चुनौती कि मैं एक भटके हुए आदमी को सही रास्ते पर ला सकू।' 'कहीं ऐसा न हो दीदी कि तुम खुद जिन्दगी के रास्ते पर भटक जाओ।'
'कौन जानता है?' एक दीर्घ निःश्वास के साथ कहा साधना ने और फिर चुपचाप बाहर निकल गई।
दोबारा खाने के लिए नहीं पूछा उसने। पूछती भी तो उसका उत्तर इन्कार में ही होता।
जाने के बाद भी वह काफी देर तक सोचता रहा। जिन्दगी की धारा ने इस मोड़ पर आकर क्या अनोखी करवट ली है। तब जबकि वह सोच रहा षा कि यह नौकरी मिलने के बाद उनकी जिन्दगी में सुों की सरगम बजने लगेगी तब यह अचानक ही कौन से अशुभ दुखों की धुन बज उठी।
पेशेवर मुजरि पुलिस पीछे पड़ी है तो क्या पुलिस को खबर कर दे इसके बारे में पुलिस के दोनों पहरेदार भी आने बाले होगें पुलिस उसे पकड़कर ले जाएगी तो दीदी की जिन्दगी से निकल जाएगा यह मुजरिम ।
लेकिन फिर उसने एक लम्बी सांस के साथ निराशा से सिर हिलाया।
वह अपनी दीटी को जानता था। जगतार को जितना टससे दूर किया जाएगा दीदी की उसके प्रति निष्ठा और लगन उतनी ही मजबूत होती जाएगी।
पहरेदार लोग आ गये थे।
लेकिन आज उसकी इच्छा नहीं हुई उनसे बोलने और बतियाने की।
बंगले पर जिन सिपाहियों की ड्यूटी लगती थी उसका पता निकालकर रघुवर ने उन्हें अपने जल में उलझा भी लिया था।
एक काल्पनिक कहानी सुनाई थी उसने किसी बुढ़िया हारा अपने किराएदार के मकान से निकालने की कोशिश के बारे में। कहानी सनाते हए रघुबर बार-बार उनके सामने इस ढंग से झक रहा था कि जेब में रखा अंग्रेजी का पव्वा उन्हें बराबर नजर आता रहे।
'अंग्रेजी है।' एक सिपाही ने पूछा। 'अंग्रजी ही है चखोगे?' रघुबर ने पव्वे पर हाथ फेरते हुए
कहा।
'बस पव्वा लिए ही घूम रहे हो?'
'अरे हवलदार तुम हुषम करो तो अभी पूरी बोतल आ जाए
पर वो काम"।'
'अभी बात करने का टाईम नहीं है। ड्यूटी पर जाना है।' 'रात की ड्यूटी है।' 'हां, फारेस्ट बंगले पर।'
'कहो तो बोतल लेकर वहीं आ जाऊं। बात की बात हो जाएगी और रात भी गुलजार हो जाएगी।'
'क्या कहते हो?' सिपाही ने अपने साथी की ओर अर्थपूर्ण
दृष्टि से देखते हुए पूछा।
दोनों को ही बिचार बुरा नहीं लगा कि रात की बोरियतच भरी ड्यूटी में अगर कुछ रंग पानी हो जाए, जंगल में मंगल हो जाएगा और किसी को पता भी न चलेगा। दोनों सिपाहियों ने आपस में तय करके रघुबर को बता दिया कि वह माल-पानी का इन्तजाम करके जंगल के बंगले पर पहुंच जाए। लेकिन दस बजे के बाद। तब तक बंगले के वाशिन्दे आराम की नीद सो चुके होंगे। वही वे आराम के साथ उसकी वात सनकर तय करेंगे कि उस बुढ़िया के किराएदार को किस तरकीब से गोल करके बाहर फेंका जाए।
ठीक दस ब्जे एक झोले में सब सामान लिए हुए रघुबर वहां हाजिर था। वैसे कोई खतरे की बात नहीं थी लेकिन फिर भी सिपाहियो ने उसे एक झाड़ी के पीछे बैठ जाने के लिए कहा।
रघुबर अपने साथ सब इन्तजाम करके ले गया था एक टोकरी मैं। गिलास, व्हिस्की और नमकीन ही नहीं बल्कि सोडे की बोतलें भी।
झाड़ी के पीछे रघुबर ने अपना मयखाना चालू कर दिया।
एक सिपाही झाड़ियों के पीछे आया, गिलास खाली किय
और नमकीन चबाता हुआ वापिस लौट गया।
उसके बाद दूसरा आया। फिर पहला।
फिर दूसरा।
पहरे का पहरा दिया जा रहा था और रंग-पानी का रंग पानी जम रहा था।
'बड़ा तेज माल है यार।' एक सिपाही गिलास उठाता हुह बोला-'दोतीन पैग में ही सिर घुमाना शुरू कर दिया इस तो।'
'असली अंग्रेजी है हवलदार, असली अंग्रेजी।' रघुबर बोला 'इसकी यही तारीफ है कि नशा पूरा दे और अगले सुबह कि
भी न पकडे।'
'तुम भी तो लो।'
'मैं तो ले ही रहा हूं।' रघुबर ने नशे में लड़खड़ाने अभिनय किया-'तुम पियो छक कर।' दोनों सिपाही पहरेदारों में से किसी को नहीं मालूम था जिस नशे के कारण उन्होंने लड़खड़ाना शुरू कर दिया था वह
खाली अंग्रेजी ह्विस्की का ही नशा नहीं था बल्कि उसमें बेहोशी की दवाई भी मिली हुई थी।
उसने अपना असर दखाया तो एक तो अपना गिलास हाथ में थामें-थामें ही लुढ़क गया।
कुछ देर बाद झूमता-झामता दूसरा आया तो अपने बेहोश साथी को देखकर बोला-'इसे क्या हुआ?'
'शायद ज्यादा चढ़ गई है।' 'बस मैं और नहीं लेता।'
'अरे लो ना हवलदार। तुम्हारा हाजमा इतना कमजोर थोड़े ही है। अभी एक बोतल और चढ़ा जाओ तो भी पता न चले कि तुमने पी है।' सिपाही गिलास तो खाली कर गया मगर उसके साथ ही गिलास समेत लुढ़क गया।
रघुबर ने जब अच्छी तरह देख लिया कि दोनों पूरी तरह होश हो गए हैं तो एक ओर की झाड़ियों की तरफ उन्मुख होकर बोला-'आ जाओ उस्ताद काम हो गया।'
दूसरी झाड़ियों में मौके की इन्तजार में छुपा हरिया आवाज शुनते ही वहां पहुंच गया। उसने भी उन दोनों सिपाहियों को अच्छी तरह उलट-पलट-कर देखा। बय अच्छी तरह सन्तुरष्ट हो गया तो बोला-'अब नके हाथ-पैर बांध दिए जाएं।'
'क्या जरूरत है यार।' रघुबर बोला-'दोनों की हालत स वक्त मुर्दो से भी बदतर है। सुबह से पहले होश नहीं।'
'फिर भी जैसा भईया ने कहा है वैसा ही करना है।'
रस्सी से उन दोनों बेहोश सिपाहियों के हाथ पैर-बांध दिए है। उस काम से निबटने के बाद दोनों ने अच्छी तरह काम बट जाने की निश्चिन्तता के साब अपने हाथ झाड़े।
फिर हरिया बोला-'अब मैं बंगले पर नजर रखता हूर और
जाकर भइया को खबर कर दे। इन्तजार कर रहे होंगे।
'अब उस्ताद को तकलीफ देने की स्पा जरूरत है। मैदान साफ है। उस साले फारेस्ट आफिसर को अभी बंगले से बाहर निकालकर रेत देते हैं।'
'खबरदार।' रघबर को धमकाया हरिया ने-'काम वैसे ही होगा जैसा भईया ने बताया है। अब फटाफट लपक ले तू यहां से।'
'ठीक है।'
कहकर रघुबर तीव्र गति से एक ओर को चल दिया।
जगतार एक पत्थर पर चित्त लेटा हुआ तारों भरे आसमान को शून्य दृष्टि से घूरता हुआ अपने बाएं कंधे को सहला रहा था जिसमें अचानक ही फिर दर्द की लहरें उभरने लगीं थीं।
जेल से भागते समय जल्दबाजी में एक अजीब-सा झटका लगा और बायां कन्धा उतर गया था। अपने आप ही सिंकाई और मालिश वगैरहा करके उसने उसे काफी हद तक ठीक कर लिया था। लेकिन आज जब उसने कोधावेश में झटके के साथ केसरी को सिर से ऊपर उठा लिया था तो फिर एक झटका सा लगा और दबा हुआ दर्द उभर आया।
'नहीं...।'
साधना की चीख अब भी उसके कानों में गूंज रही थी।
अगर समय रहते साधना ने चीखकर उसे न रोक लिया। होता तो उसने वाकई केसरी को इस जोर से पटक दिया होता कि उसकी हड्डी-पसली चूर-चूर हो जाती।
उसने कभी सोचा भीई नहीं था कि जिन्दगी में कभी कोई
औरत इस बुरी तरह उसके दिल और दिमाग पर छा जाएगी जिस तरह कि साधना इन कुछ ही दिनों में छा गई थी।
इस जंगल में आते ही उसे लगभग सारी बातों का पता लग चका था। केसरी की हिम्मत की दाद देने को मन हुआ था पर?' उससे हुई पहली मुलाकात कोई खुशगवार नहीं रही थी।
साधना के साथ कुछ लोगों ने बलात्कार करने की कोशिश की थी यह भी उसे मालूम हो चुका था। उसे चोरी छुपे उसने
देख भी लिया था। उसके गठे हुए शरीर और गम्भीर रूप में एक अद्भुत चुम्बकीय सी शक्ति का अहसास तो उसे हुआ था किन्तु उसने यह नहीं सोचा था कि वह शक्ति उस जैसे पत्थर दिल इन्सान के भीतर भी कोमल भावनाओं की कोपलें उगाने में समर्थ होगी।
उस रात उसने कुछ व्यक्तियों को चोरी छु' गए बंगले की ओर बढ़ते देख लिया था। वह उस समय भी उन्हे देख रहा था जब उन्होंने बंगले पर पत्थर फेंकने शुरू किए थे।
लेकिन कोई हरकत नहीं की।
चुपचाप देखता भर रहा था।
उस समय वह वाकई मोहित सा हो गया था जब साधना को दरांती के साथ दश्मनों की ओर झपटते देखा था। तभो उसे लगा था कि वह कोई साधारण औरत नहीं है।
सहायता के लिए आगे बढ़ा तो चक्कर खाती हुई साधना अपने आप ही उसकी बाहों में आ गई। उसे चूमने का लोभ संवरण न कर सका था वह। उस समय उसने सोचा भी नहीं था कि वह गम्भीर और दृढ़ निश्चयी युवती उसे तलाश करती हुई जंगल में आएगी। पहले दिन वह जान-बूझकर उसके सामने नहीं आया और झाड़ियों में छुपा हुआ उसकी बेचैन खोब का आनन्द लेता रहा था।
जब अगले दिन भी बह आई तो अपने को रोक न सका।
उस समय तो वह चकित ही रह गया जब उसने साधना को अपने जेल अपराधी होने के बारे में बताते हुए अपने से दूर
रहने के लिए कहा तो साधना ने दृढ़ स्वर में जवाब दिया
था-'तुम जो भी हो जैसे भी हो उसी रूप में चुना है मैंने। अगर आगे के रास्ते पर साथ ले चलने के लिए तुमने मेरा हाथ थाम लिया तो तुम्हें विश्वास दिलाती हूं कि हम लोग कल की सारी कालिमा को धोकर एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करेंगे।'
वह चकित सा उसके दीप्ति-युक्त मुख को देखता हुआ उसके शब्दों का सही-सही अर्थ समझने की कोशिश करता रहा था। लेकिन अनुराग के वे क्षण अस्थायी साबित हुए।
प्रेम-महल की भावमानी भित्तियों को केसरी की तेज आवाजों ने हिलाकर रख दिया था।
साधना बौखला कर भागी थी।
यह झाड़ियों में छुरा सब देख रहा था। भाई-बहन के बीच पड़ने का उसका कोई इरादा नहीं था।
लेकिन जब साधना के गाल पर घाटा पड़ा तो वह अपने पर काबू न रख सका।
दुखते हुए कन्धे को सहलाता हुआ बह उठकर पत्थर पर बैठ गया।
उसके बाद झाड़ियों में अपने को छुपाए हुए कई बार बगले का चक्कर लगा आया था। लेकिन उस घटना के बाद जो बंगले में सन्नाटा छाया तो अब तक न टूटा।
उसने आकाश की ओर नजरें दौड़ाकर देखा न जाने क्या टाईम हुआ होगा।
अब तो पहरेदार सिपाही भी आ चुके होंगे।
साधना सो गई होगी या शायद न सोई हो। क्या वह भी उसकी तरह उसके ख्यालों में उलझी हुई होगी?' उसे भी सो जाना चाहिए।
वह फिर लेट गया। कुछ देर काले आसमान में हीरों से जड़े सितारों को देखते रहने के बाद उसने सोने की कोशिश में
आंखें बन्द कर ली।
लेकिन नींद कहां थी?
लग रहा था जैसे साधना अपनी सांसों के साथ उसे पुकार रही है। उठकर बैठ गया। अपनी बेवकूफी पर अजीव ढंग से सिर हिलाता हुआ वह धीरे से हंसा।
कहीं इश्क का भूत उसके सिर चढ़कर तो नहीं बोलने लगा जो यह अजीब किस्म के खुराफाती विचार उसकी खोपड़ी में चक्कर लगाने लगे हैं। साधना भला उसे इस वक्त क्यों बुलाएगी? वह भो अपनी सांसों के द्वारा पुकार कर-क्या बकवास है।
अपनी असलियत को भूलकर किसी विरही प्रेमी की तरह क्या अंट-शंट सोचने लगा है वह। फिर भी वह बैठा न रह सका। उठकर खड़ा हो गया।
अनजाने हो उसके कदम बंगले की ओर बढ़ गए। यह उसकी समझ में भी नहीं आ रहा था कि इस वक्त बंगले पर जाकर वह क्या करेगा। साधना तो मिलने से रही। आराम से सो रही होगी।
सिपाही रोज की तरह पहरा दे रहे होंगे।
लेकिन फिर भी वह चला जा रहा था अरने को झाड़ियों में छुपाए हुए सावधानी के साथ बिना कोई आवाज किए हुए। ताकि पहरा देने वाले सिपाहियों को उसकी कोई भनक न मिलने पाए।
वह एक ऐसी जगह पहुंच गया जहां से बंगले को बाखूबी देख सकता था वह। पहरा देने वाले सिपाही भी उसे नजर आ गए। लेकिन और दिनों की तरह वे सतर्क और चौकन्ने नहीं
थे। बल्कि आज उनकी चाल में अजीब सी लड़खड़ाहट थी।
यहां का माहौल काफी बदला-बदला सा लगा जगतार को।
वह अपनी जगह बैठा चौकन्नी निगाहों से सब कुछ खामोशी के साथ देख रहा था।
एक सिपाही झाड़ी के पीछे जाता था और दूसरा आता था?
ऐसा क्या है झाड़ी के पीछे? लेकिन कुछ ही देर बाद जगतार को अनुमान लगाने में दिक्कत नहीं हुई कि दोनों सिपाही नशे में लड़खड़ा रहे हैं
और झाड़ी के पीछे जो आना-जाना लगा रखा है वहां चूंट मारने जाते हैं?
क्यों?
एक बड़ा-सा प्रश्न जगतार के दिमाग में उभर आया और साथ ही उसे खतरे का अहसास सा होने लगा।
फिर भी मामले को पूरी तरह समझने के लिए वह खामोश
बैठा देखता रहा। उसे कोई सन्देह नहीं रहा था कि आज फिर कोई गलत चक्कर चल रहा है यहां।
उसके देखते-देखते दोनों सिपाही झाड़ियों के पीछे ओझल हो गए और कुछ देर बाद दो व्यक्ति झाड़ियों के पीछे से निकलकर आए।
वे दोनों पहरेदार सिपाही नही थे। न ही वे नशे में थे। पहरेदार सिपाही झाड़ियों के पीछे ही थे। शायद नशे में बेहोश।
वह उन दोनों व्यक्तियों की बातें सुनकर मामले की असलियत जानने की कोशिश करता रहा।
फिर एक व्यक्ति वहीं बंगले के पास रह गया और दूसरा व्यक्ति एक ओर को चला गया।
जगतार क्षण भर के लिए दुविधा में फंस गया कि उस व्यक्ति का पीछा करे या इस बंगले वाले व्यक्ति को संभाले?
अगले ही क्षण उसने निर्णय ले लिया। उस निर्णय के साथ ही वह उस चीते की सी सावधानी और खामोशी के साथ उस व्यक्ति की ओर बढ़ा जो अपने शिकार पर झपटने ही वाला हो।
इससे पहले कि हरिया किसी तरह के खतरे का आभास पाकर सावधान हो पाता, जगतार ने छलांग मारकर उसे दबोच लिया।
उसका हाथ हरिया के मुंह पर था ताकि वह चीख न सके और गर्दन बाहों के बीच में ऐसी फंसी हुई थी कि वह जरा भी हिलने की कोशिश करता तो हड्डी चटक जाए।
'कौन है तू?' जगतार ने हरिया की गर्दन पर अपनी बाहों का
दबाव डालकर पूछा।
मुंह बन्द होने के कारण हरिया सिर्फ मिमयाकर रह गया। साथ ही उसने अपनी जेब से पिस्तौल निकालने की भी कोशिश की। जगतार ने उसकी इस हरकत को भांपा और उसे उठाकर जमीन पर पटक दिया।
गर्दन पर घुटना रखा और जेब से पिस्तौल निकालकर उसके माथे पर रखता हुआ बोला-'अब बोल।'
लेकिन न जाने क्या हुआ था हरिया को कि उसने एक झटके के साथ जगतार के बन्धनों से निकल जाना चाहा और जगतार ने उसे दबाए रखने के लिए अपने घुटने पर एकदम पूरा जोर डाल दिया।
कुछ देर बाद जब उसने हरिया को कोई हरकत करते न देखा तो चौंका। उसने हरिया को जांचा तो पाया कि वह मर चुका था। घुटने के अतिरिक्त दबाव ने हरिया की गर्दन तोड़कर रख दी थी।
अनजाने में ही वह सब हो गया था और जगतार जानता था कि उस पर खेद व्यक्त करने का कोई मौका नहीं है।
उसने पिस्तौल अपने कब्जे मे की और हरिया की लाश उठाकर एक ओर झाड़ियों में डाल दी।
फिर उन झाड़ियों को देखा जिनके पीछे दोनों सिपाही गायब हुए थे।
उन्हें बेहोश हालत में रस्सियों से बंधा पाया। होश में लाकर उनके बन्धन खोलने की उसने कोई कोशिश नहीं की।
वह झाड़ियों से बाहर आया बौर फिर तीब गति से उस ओर को चल दिया जिधर वह दूसरा आदमी गया था।
:: ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कालिया ने सिगरेट का कश लिया और अपनी रेडियम डायल की कलाई घड़ी की ओर देखा।
इतनी देर? आखिर कर क्या रहे हैं वे दोनों?
वह मन हो मन बुदबुदाय और फिर बेताबी के साथ अपना दायां हाथ जीप के बोनट पर फेरने लगा। हाथ में पहने हुए बघनखे के कारण धातु से धातु ने रगड़ खाई और एक अजीब
सी आवाज उत्पन्न हुई जिससे चौंककर उसने तुरन्त ही हाथ फेरना बन्द कर दिया।
वह बंगले से काफी दूर जंगल के एकान्त स्थल पर खड़ा सन्देश मिलने का इन्जरनार कर रहा था। क्योंकि इन्तजार कर रहा था इसीलिए ऐसा भी अनुभव कर रहा था कि हरिया
और रघुबर अपने काम में कुछ ज्यादा ही देर लगा रहे हैं। जब रघुबर आता दिखाई दिया तो उसकी बेचैनी फम हुई।
उसके निकट आने पर पूछा-'काम हो गया?'
'बिल्कुल उस्ताद।' रधुबर बोला-'दोनों के दोनों पूरी तरह चित्त हो चुके हैं। किसी भी हालत में सुबह से पहने होश में नहीं आ सकते। फिर भी सावधानी के नाते उन्हें अच्छी तरह से बांध भी दिया है रस्सियों से।'
'ठीक?' उसने सन्तोष के साथ सिर हिलाया-'हरिया वहीं है?'
'हां।' वैसे तो मैंने हरिया से कहा था कि आपको तकलीफ देने की कोई जरूरत नहीं है। मैदान बिल्कुल साफ पड़ा है। मैं ही उस फारेस्ट आफिसर के बच्चे को बाहर निकालकर ऊपर भेज देता।'
'नहीं, यह काम मैं ही करूंगा।'
कालिया ने सिगरेट का अन्तिम कश लेकर अपने जूते से कुचला और फिर बंगले की ओर बढ़ गया।
रघुबर उसके पीछे-पीछे था।
अभी उन्होंने बंगले तक का आधा रास्ता ही तय किया था कि तभी अपने पीछे कुछ अजीब सी आवाज सुनकर कालिया एकदम घूम गया। देखा कि रघुबर जमीन पर बेहोश पड़ा हुआ है और एक आदमी उसकी ओर पिस्तौल ताने हुए कह रहा था-'खबरदार, ज्यादा होशियार बनने की कोशिश की तो गोलियों से शरीर छलनी कर दूंगा।'
जगतार अभी आधे रास्ते में ही था कि तभी उसे खूछ आदमियों के आने की आहट सुनाई दी। वह तुरन्त ही पास के एक मोटे तने वाले पेड़ की आड़ में हो गया।
कुल दो व्यक्ति हैं-सोचा उसने? इन दो को सम्भालना तो कुछ ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। स्थिति कुछ ज्यादा विषम नहीं है।
वह बिल्ली की तरह दबे पांव आगे बढ़ा और कालिया के पीछे जाते हुए रघुबर के सिर पर पिस्तौल के दस्ते की ऐसी खतरनाक चोट जमाई कि वह तुरन्त ही कटे पेड़ की तरह गिर पड़ा। मुंह से कोई आवाज तक न निकाल सका वह।
उसके गिरते न गिरते ही कालिया एकदम पलटा मगर तब तक जगतार उसे अपनी पिस्तौल के निशाने पर ले चुका था।
खामोश निगाहों से कालिया ने उसका ऊपर से नीचे तक निरीक्षण किया और फिर अपनी आवाज को यथा-सम्भव स्थिर रखने की कोशिश करते हुए उसने पूछा
'कौन है तू?' 'तू इस बक्त सवाल पूछने की स्थिति में नहीं है।' जगतार उसे पिस्तौल। के निशाने पर रखता हुआ बोला-'सवाल मैं पूछंगा
और जवाब तू देगा। बता तू कौन है और यहां क्या कर रहा है?'
अंधेरे के बावजूद भी कालिया ने उसे पहचान ही सिया। साधना और जमतार की जो फोटो हरिया और रघुबर ने उसे दिखाई थी, उससे ही मिलता-जुलता हुलिया मजर आया था उसे।
बोला-'तू जगतार है ना?'
'ठीक पहचाना और तू?' शायद कालिया है?' 'पहचाना हे ना मुझे?' 'देखा पहली बार है लेकिन नाम इससे पहले सुन चुका हूं।' 'शायद इस इलाके में नया-नया आया है जो मुझे इससे पहले नहीं देखा।' कालिया उसे आंखों से तौलता हुआ बोला-'कहां से आया है?'
'जेल से।'
'ओह।' कालिया ने समझदारी के साथ गर्दन हिलाई-'छूटकर या भागकर?'
'फेर तो ठीक जगह आया है तू।' कालिया ने धीरे से हंसकर कहा। साथ ही अपने तने हुए शरीर को ढीला छोड़ता हुआ बोला-'अब फिकर मतकर। जब कालिया के इलाके में आ गया है तो उसका शरणागत है तू। अब कोई तेरा बाल बांका
भी नही कर सकता। अब जा यहां से। कल सुबह मुझे मिलिये। कोई-न-कोई इन्तजाम करवा देगा।'
'मगर तुम कहां चले कालिया सेठ।' 'अब फालतू बातें करके वक्त खराब मत कर। अभी मुझे जरूरी काम निपटाने दे।'
'हम भी तो सुने वह जरूरी काम क्या है?'
कालिया अप्रसन्नता सी व्यक्त करता हुआ बोला-'देख पिछली बार तूने इस फारेस्ट आफिसर वाले मामले में मेरे आदमियों पर हाथ उठा दिया था। जानता हूं ऐसा अनजाने में हुआ होगा। इसलिए वो कसूर तेरा माफ कर दिया मैंने। अब इस वक्त मेरे काम में टांग अड़ाई तो बहुत बुरा होगा तेरे लिए।' 'बुरा तो तुम्हारे लिए होगा कालिया सेठ, अगर तुम यहीं से
वापिस नहीं लौट गए तो।'
यह तू बोल रहा है या फारेस्ट आफिसर की बहन का इश्क?' कालिया ने क्रोध मे आकर कहा।
जगतार का इस तरह बीच में कूदकर टाईम खराब करना उसे उत्तेजित करने के लिए पर्याप्त था।
'जो कुछ भी बोल रहा है उसकी आवाज अच्छी तरह से सुन लो।' जगतार एक एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला-'तुमने या तुम्हारे आदमियों ने इस बंगले को तरफ आंख उठाकर देखने की कोशिश भी की तो मैं तुम्हारी ईट से ईट बजा दूंगा।' 'तुम मुझे धमकी दे रहे हो?'
'नहीं।' जगतार मुस्करा कर बोला-'दोस्ताना सलाह दे रहा हूं।'
'मैं तुम्हारे बारे में पुलिस को खबर कर दूंगा।'
'बड़े भोलो हो कालिया सेठ। पुलिस जब मुझे जेल में ही पकड़कर न रख सकी तो इस जंगल में तो क्या पकड़ पाएगी। तुम्हारी बेहतरी इसी में है कि जिस रास्ते से आए हो
चुपचाप उसी रास्ते से वापिस लौट जाओ।'
कालिया ने लाचारी से अपने कंधों को झटका दिया और फिर वापिस लौटता हुआ वह बोला-'मेरी दुश्मनी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी तुम्हें...।'
और जगतार के पास से गुजरते हुए अचानक ही...| उसका वांया हाथ जगतार के पिस्तौल वाले हाथ पर पड़ा
और बाएं हाथ का झपट्टा जगतार की दूसरी बांह पर पड़ा। खाल समेत नुचता चला गया और उसके साथ कमीज का वह हिस्सा भी फटकर खून के साथ भीगता हुआ अलग हो यया।
पिस्तौलै वाले हाथ पर हाथ मारने के बावजूद भी जगतार के हाथ से पिस्तौल न निकली थी।
कालिया के उस अप्रत्याशित आक्रमण से वह हतप्रभ-सा तो रह गया था किन्तु फिर भी उसने फायर किया। एड़ियों पर घूमता हुआ कालिया गोली को वचा गया। साथ ही उसने जगतार की गरदन पर झपट्टा मारा। जगतार को लगा जैसे किसी शिकारी जानवर का मजबूत पंजा उसकी गरदन पर पड़ा हो और गरदन से मांस नुचता चला गया।
इस बार भी पिस्तौल उसके हाथ से न निकल पाई।
फिर भी जगतार पीछे को हटा। खून उसके घावों से किसी तेजधार झरने की तरह उबलता हुआ-सा बहने लगा था। उसने फिर से पिस्तौल का निशाना लेना चाहा।
लेकिन तब तक कालिया फिर से उस पर झपट चुका था।
इस बार जगतार ने उसके दाएं हाथ को कलाई से पकड़ लिया। कालिया ने अपने दूसरे हाथ से उसके पिस्तौल बाले हाथ की कलाई थाम ली थी।
जगतार ने ट्रिगर दबाया। पिस्तौल का निशाना कहीं और था। इसलिए गोली कालिया को कोई नुकसान पहुंचाए बिना जंगल के अंधेरे में कहीं खो गई।
दोनों एक-दूसरे से क्रुद्ध सांडों की तरह जूझ रहे थे।
जगतार ने कालियों की टांगों के जोड़ पर अपने घुटने की चोट की। लेकिन उसने खुद महसूस किया कि उसकी चोट में कोई दम नहीं है। शायद निरन्तर बहते हुए खून के कारण यह अपने आपको कालिया के मुकाबले कुछ कमजोर-सा होता महसूस कर रहा था।
फिर भी वह अपनी समस्त शक्ति के साथ उसके दाएं हाथ की कलाई पकड़े हुए था। उसकी समझ में न आया था कि कालिया के हाथ में ऐसी क्या चीज है जिससे वह इतने खतरनाक बार करने में समर्थ हुआ था। लेकिन वह इतना जरूर जानता था कि वह बहुत ही खतरनाक चीज है जिसके ब्लेड जैसे तेज धार और पैने आघातों से कालिया उसे चीर-फाड़कर बराबर कर देगा।
इसलिए वह प्राणपण से उसके दाएं हाथ की कलाई को मजबूती से पकड़े हुए उसे अपने से दूर रखने की कोशिश कर रहा था।
आखिर कालिय ने उमे गिरा लिया।
दोनों में जबर्दस्त गुत्थम-गुत्था हो रही थी। कभी वह ऊपर कभी वह नीचे। दोनों ही अपने-अपने हथियारों से सम्पन्न हाथों को एक-दूसरे की पकड़ से छुड़ा लेना चाहते थे।
दो खतरनाक जानवर उस भयानक मृत्यु-संघर्ष में प्राणपण से जूझ रहे थे।
कालिया की मजबूत उंगलियां उसके पिस्तौल वाले हाथ की कलाई पर कसी हुई थीं। और जगतार अपनी समस्त शक्ति से कालिया के उस खतरनाक दाहिने हाथ को अपने से दूर रखने की चेष्टा में लया हुआ था।
लेकिन लगातार बहते हुए खून के कारन निरन्तर क्षीण होती हुई शक्ति जगतार को यह सोचने पर मजबूर कर रही थी कि आखिर वह कब तक कालिया के उस हाथ को रोके रहेगा। उसने कालिया के नीचे दबे-दबे ही अपने घुटनों की चोट उसकी टांगों के जोड़ पर मारनी शुरू की। लेकिन कालिया पर उसका कोई असर नहीं हो रहा था। जगतार को खुद महसूस हो रहा था कि उसकी चोटों में कोई जान नहीं है। वह निरन्तर कमजोर होता जा रहा था। इसके वावजुद भी वह सुनार की ठक-सी किए जा रहा था। हालांकि इस बारे में भी उस कोई शक नहीं था कि कई क्षण जा रहा है जब कालिया लुहार की एक पड़ेगी और फिर सबकुछ खत्म हो जाएगा।
वह नहीं जानता कि वह उसकी ठुक-ठुक का परिणाम था या कुछ और जगतार को अपनी कलाई पर कालिया की पसीने से भीगी हुई उंगलियां कुछ ढीली पड़ती-सी महसूस हुई। उसके साथ ही जगतार के भीतर विस्फोट-सा हुभा-उसके कमजोर होते हुए शरीर में शक्ति का अन्तिम विस्फोट।
वह झटके-से अपना पिस्तौल वाला हाथ कालिया के पेट के निकट ले आया और कमजोर पड़ती उंगलियों से ट्रिगर खीच दिया। और गले से अजीब-सी आगज निकालता हुआ
कालिया किसी आलू के बोरे की तरह उस पर से लुढ़क गया।
अपने ही खून से लथपथ जगतार एक झटके के साथ उठकर खड़ा हो गया। धुंधलाती हुई दृष्टि से उसने देखा कि कालिया दोनों हाथों से अपना पेट पकड़ हुए गुड-मुड-सा पड़ा है।
बंगले की ओर से आवाजें-सी आती सुनाई दी।
गरदन घुमाई। घुमाने में तकलीफ हुई। कुछ स्पष्ट नजर नहीं आया। रात का अंधेरा और भी अधिक काला होता जा रहा था। नजर धुंधलाए चली बा रही थी। फिर भीए उसने देखा दो जने थे। उनमें एक शायद औरत थी।
साधना?
तभी कालिया कुछ हरकत-सी करता हुआ लगा। उसने पिस्तौल का रुख तुरन्त सकी ओर कर दिया। मगर उंगलियों में अब उसे पकड़े रहने की ताकत नहीं बची थी। अपने आप ही स्तिः ऐल उसके हाथ से निकलकर जमीन पर गिर गई।
उसके साथ ही चकराकर वह भी गिर गया।
कुछ अस्पष्ट-सी आवायें सुनाई थी. एक घुटी-पूटी चीख-सी। फिर किसी की कोमल उंगलियों का स्पर्श।
कोमल उंगलियों ने उसका सिर उठाकर अपनी गोद में रख लिया।
'केशो, जल्दी से दौड़कर जीप तो ले आ भइया?'
साधना का स्वर।
उसकी साधना का स्वर।
एक स्वर्गिक शान्ति का-सा अनुभव किया। खुरदरे होंठों पर सन्तोष की मुस्कान ने मचलने की एक असफल कोशिश की।
उसे लगा कि साधना का स्वर कहीं दूर बहुत दूर विलीन-सा होता जा रहा है और वह उसे पकड़ने के लिए उसे आवाजें देता हुआ दौड़ा चला जा रहा है-उसके पीछे।
अजीब-सी आवाजें जो मधु मक्खियों की भिनभिनाहट सरीखी लग रही थी। धीरे से आंखें खोलीं। एक धुंधलाए से बेचैन चेहरे को अपनी ओर ताकते पाया।
साधना?
हां, साधना ही थी वह।
दश्य कुछ और साफ हुआ। उसके निकट खड़ा केसरी भी दिखाई दिया। दो सफेद-सी वर्दियों भी। शायद डाक्टर और
नर्स थे। वही तो थे।
तो हास्पिटल में है वह।
'कैसा महमूस कर रहे हो?' उसके पट्टियों बंधे सरीर पर धीरे
से हाथ डुलाते हुए पूछा साधना ने। कितना सुखद और सन्तोषदायक था उसके हाथ का वह स्यर्श।
'ठीक हूं।'
'बोलने में दर्द हुआ था जैसे सारे गले की नसें सूज-सी गई हों। मगर फिर भी उसे इस बात का सन्तोष था कि वह बोल सकता था। उससे भी ज्यादा सन्तोष इस बात का था कि वह
जीवित है।
'रात को वह सब हंगामा अकेले ही कर बैठे?' केसरी आगे को झुकता हुआ बोला -'कम-से-कम मुझे ही जगा लिया होता?'
'इसका मौका न था।' वह अवीब-सी आवाज में बोला। फिर प्रश्न-सा किया-'कालिया?'
'वह भी बचा लिया गया है?' केसरी बोला-'गोलियों की
आवाजों ने हमें चौंका दिया था। बाहर निकलकर देखातो पहरेदार भी नहीं था। कुछ समझ में न आया। तभी गोली की आवाज फिर सुनाई दी। तुम्हारी तरफ दौड़कर पहुंचे। जब तक तुम्हारे निकट पहुंचते तब तक तुम चक्कर खाकर गिर पड़े थे। दीदी ने मुझे फौरन जीप लाने के लिए कहा। फटाफट तुम्हें और कालिया को जीप में डालकर यहां लाए। डाक्टरों ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया तुम लोगों को बचाने के लिए।'
'वह भी यहीं है?' पूछा जगतार ने।
'हां इसी मंजिल पर आखिरी वाला कमरा उसका है।' केसरी बोला-'लेकिन अब पुलिस के चंगुल से न बच सकेगा। खून से रंगा बघनखा उसके हाथ में था। साफ जाहिर है कि पिछले फारेस्ट आफिसर को भी किसी जानवर ने नहीं बल्कि इसी कालिया ने मारा था अपने इस बधनखे से, तुम्हें भी तो किसी जानवर की तरह ही नोंच डाला है उसने। शुक्र है कि चेहरा बच गया।'
लेकिन जगतार उसकी बात नहीं सुन रहा था। वह तो साधना के उदास चेहरे को देखे जा रहा था। न जाने क्यों उस चेहरे को देखकर एक अजीब सकून-सा मिल रहा था।
'लेकिन कालिया का भाई हरिया भी तो मारा गया है।'
'उसने केसरी को कहते सुना।
'उसे किसने मारा?'
'मैंने मारा है।'
'यह तुमने मलत किया?'
'मैंने उसे जानबूझकर नहीं मारा। न मेरा इरादा उसे मारने का
था। बस हाथापाई में मारा गया।'
तभी एक पुलिस अधिकारी ने वहां प्रवेश किया। उसके साथ दो सिपाही भी थे।
'यह भीड़ कैसी लगा रखी है आप लोगों ने?' वह आते ही बोला। फिर केसरी की ओर उन्मुख होकर उसने कहा-'चलीए
आप लोग बाहर चलिए।'
केसरी बाहर जाने को हुआ। लेकिन साधना वहीं बैठी रही तो पुलिस अधिकारी उससे भी बोला-'मेहरबानी करके आप भी बाहर चलिए।'
'इन्हें मेरे पास ही रहने दीजिए।' जगतार कमजोर-सी
आवाज में बोला।
'अभी नहीं बाद में।' पुलिस अधिकारी बोला-'पहले तुम्हारी
घेराबन्दी कर लें हम लोग।'
केसरी और साधना बाहर आ गए। भ्रमित-सी साधना दरवाजे के पास ही ठिठककर खड़ी हो गई।
'घर चलो दीदी।' केसरी बोला-'यहां रुकने से कोई फायदा नहीं। पुलिस अब हमें उसके पास नहीं जाने देगी।' 'मैं यहीं रहूंगी।' साधना ने कहा और दरवाजे के निकट ही दीवाल के साथ बनी एक बैंच पर बैठ गई।
'मृग तृष्णा के पीछे भागने से कोई फायदा नहीं है दीदी।' केसरी उसे समझाने के ढंग में बोला-मानता हूं जगतार के अहसान हैं हम पर। उसने मेरी जान बचाई है। मगर यह क्यों भूलती हो कि वह जेल से भागा हुआ कैदी है। फिर हरिया की भी हत्या कर दी है उसने। मौत के चंगुल से तो तुम्हारी प्रार्थनाएं उसे बचा लाई। लेकिन पुलिस के चंगुल से उसे कोई नहीं बचा सकेगा। तुम्हारी प्रार्थना भी नहीं।' 'मेरा भाग्य जैसा भी है उसे मैं स्वीकार कर चुक हू केशो।' साधना ने दढू और स्थिर स्वर में कहा-'यह भाग्य नहीं तो और क्या हैं कि हम लोगों की लड़ाई उनकी लड़ाई बन गई। हमारा नुकसान वो सह रहे हैं? आखिर क्यों?'
इसका कोई जवाब केसरी के पास नहीं था। होता भी तो देने का कोई फायदा नहीं था। क्योंकि वह जानता था कि उसकी दीदी के निश्चय को सारी दुनिया के जवाब भी मिलकर नहीं बदल सकते थे।
लाचारी के साथ हइ हास्पिटल के उस गलियारे में इधर से उधर नजरें दौड़ाने लगा।
तभी रधुबर वहा से गुजरा।
केसरी जानता था कि वह कालिया का आदमी है। उसे भी तो कल रात बेहोशी की हालत में जीप में डालकर हास्पिटल लाया था वह। लेकिन कोई ज्यादा चोट भी नहीं आई थी उसे। वस सिर में एक मामूली-सा जख्म आया था। इसलिए प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस उसे अपने साथ ले गई थी।
उसका बयान लेने के लिए। कालिया के कमरे की ओर जाते हुए रघुबर को देखते हुए केसरी सोचता रहा कि पुलिस ने छोड़ दिया इसे। तभी उसने किसी को कहते सुना-'रात जो कुछ घटा उसका मुझे बड़ा अफसोस है मिस्टर केसरी।'
उसने चौंककर सर घुमाया। मेयर खड़ा था उसके निकट।
'आखिर तुमने मेरी बात नहीं मानी।' हास्पिटल में कालिया के पलंग के पास बैठे हुए जगन सेठ ने कहा-'नतीजा देख लिया उसका? खुद भी मरते-मरते बचे और हम सबको भी मुसीबत में डाल दिया।'
'तुम्हीं कहा करते थे जगन सेठ कि आदमी को मुसीबत से नहीं घबराना चाहिए।' कालिया बोला-'सो कालिया न तो
आज तक कभी मुसीबतों से धबराया है और न आगे कभी धबराने वाला है। वैसे क्या मैं जान सकता हूं कि तुम्हें मैंने किस मुसीबत में डाल दिया है?'
जगन सेठ को कालिया का स्वर पसन्द नहीं आया था। फिर भी अपने आपको संयत रखते हुए कहा-'तुम्हें मालूम है कि वह बधनखा खून से लथपथ तुम्हारे हाथ में था। बघनखे ने पिछले फारेस्ट आफिसैर की मौत पर से परदा उठा दिया है। दोनों सिपाहियों का बयान है कि हरिया और रघुबर ने उन्हें शराब पिलाकर बेहोश किया था। बची हुई शराब की पुलिस ने जांच करके देख ली है। उसमें बेहोशी की दवा मिली हुई थी। चारों ओर से फंसे पड़े हो तुम?'
'मैं चारों ओर से फैमा पड़ा हूं।' कालिया जगन सेठ को घूरता हुआ बोला-'और तूम लोन साफ बचे हुए हो।'
'तुम्हारे साथ तो हम भी घिर रहे हैं।' जगन सेठ बोला- अब उस मेयर की बन आएगी। मैंने अच्छी भली उसकी नाक में नकेल डाल दी थी लेकिन तुम्हारी इस बेवकूफी की वजह से...।'
'देखो जगन सेठ यह बेकार की पालिटिक्स मुझसे तो चलो मत।' कालिया उसकी बात काटता हुआ बोला-अगर पुलिस इस सारे मामले को दबा नहीं सकती तो फिर उस पुलिस कमिश्नर को बराबर का हिस्सा देते रहने का हमे फायदा क्या है?'
'तुम क्या समझते हो कि पुलिस तुम्हारी इस तरह की
खुलेआम गुंडागर्दी को बर्दाश्त करती रहेगी?' 'मैं खुलेआम गुंडागर्दी कर रहा हूं? उस फारेस्ट आफिसर के बच्चे ने मेरे मुंह पर थप्पड़ मारा, तम्हारे कहने पर मैं चुप रहा। वह चौराहे पर मुझे मेरे भाई को पीट गया तुम्हारी वजह से मैं फिर भी चुप रहा और फिर भी तुम कह रहे हो कि मैं
खुलेआम गुंडागर्दी कर रहा हूं। कान लिकर सुन लो जगन सेठ कालिया बहुत बर्दाश्त कर चुका है। अब और बर्दाश्त नहीं करेगा।'
'ज्यादा जोर से मत बोलो।' जगन से ने उसे चेताया-'बरना पेट के जख्मों से खून बहने लगेगा।'
'अब खून बहने की चिन्ता नहीं है जगन सेठ, जितना चाहे मरजी खन वह जाए। लेकिन कालिया का कलेजा तब तक ठंडा नहीं होगा जब तक कि वह अपने भाई की मौत
का अपने अपमान का बदला नहीं ले लेगा।'
कालिया की बे-सिर पैर की ब'तों ने जगन सेठ को खिन्न कर दिया था। फिर भी वोला -'तुम्हारा दिमाग अभी ठिकाने नहीं है। फिलहाल आराम करो मैं फिर आऊंगा।'
'बैठ जाओ जगन सेठ।' कालिया अधिकारपूर्ण स्वर में बोला-'आब तक कालिया तुम्हारी सुनता रहा है आज तुम कालिया की सुनो।'
जगन सेठ ने चौंककर कालिया की ओर देखा। उसे उसकी आंखों मे एक यहशियाना सी चमक दिखाई दी। ऐसी चमक जो किसी पागल की ही आंखों में दिखाई दे सकती थी।
'सबसे पहले तो मुझे जगतार की मौत चाहिए।'
'पागल हो मए हो क्या?' जगन सेठ ने एकदम उछलकर कहा-'वैसे मी उसे मारने से फायदा क्या है। अधमरा वह वैसे ही है। जेल से भागा हुआ है वहां की पुलिस को खबर कर दी है। वह आ चुकी होगो या आने वाली होगी। अब उसकी सारी जिन्दगी जेल म चक्की पीसते हुए ही बीतेगी।'
'मुझे उससे चक्की नहीं पिसवानी है।' कालिया अपने एक एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला-'मुझे उसकी मौत
चाहिए।'
'होश की दवा करो कालिया।' जगन सेठ ने कड़े स्बर में
कहा-'जिस काम को करने से कोई फायदा नहीं उसे करने की क्या जरूरत है। जगतार खुद कानून की उलझनों में इतना उलझा पड़ा है कि अब वह जिन्दगी भर जेल के बाहर की दुनिया नहीं देख सकेगा। हो सका तो हरिया के कत्ल के जुर्म में उसे फांसी पर ही चढ़वा दूंगा मैं।' 'कह चुके या कुछ और भी कहना है?'
'देखो कालिया।' जगन सेठ ने उसे समझाने के से ढंग में कहा-'स्थिति इतनी बिगड़ चकी है कि में तुम्हें बता नहीं सकता। लेकिन मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूं कि मैं इसे सम्हाल लूंगा। तुम सिर्फ मेरी इतनी मदद करो कि यहां चुपचाप पड़े हुए तन्दुरुस्त होते रहो। बाकी सब मुझ पर छोड़ दो।'
'और कुछ?' 'बस फिलहाल के लिए इतना ही काफी है।'
'तो अब मेरी सुन लो।' कालिया बोला-'सारे मामले को जैसे तुम सम्हालना चाहो सम्हाल सकते हो। लेकिन रही जगतार की बात तो न मुझे उससे जेल में चक्की पिसवानी है न उसे फांसी के फंदे पर चढ़वाना है। उसने मेरे भाई को मारा है और अपने भाई की मौत का बदला लेना कालिया का धर्म है, कर्ज हैं। इसलिए मुझे जगतार की मौत चाहिए।'
जगन सेठ ने कालिया को घूरा।
'मुझे इतनी बात तुमसे कहने की जरूरत भी नहीं पड़ती
लेकिन भैरो इन दिनों तुम्हारे कहने में जरा ज्यादा चल रहा है
और मैं धायल होने की वजह से भैरों के बिना यह काम नहीं कर सकता। मुझे जगतार की मौत चाहिए जगन सेठ।
'तुम्हारा तो दिमाग मूम गया लगता है कालिया। जगन सेठ ने
शुष्क स्वर में कहा-'पहले तुम्हें उस फारेस्ट आफिसर का बुखार सा चढ़ा था, अब जगतार की गरदन पढ़ रहे हो। मेरी राय मानो और सब कुछ भूल-भाल कर कुछ दिन आराम करो।'
'मुझे बातों से बहलाने की कोशिश मत करो जगन सेठ। फारेस्ट आफिसर का तुम जो चाहे मरजी करो। लेकिन जगतार की मौत के बाद। वरना।'
'वरना क्या?'
'वरना मेरे सीने में जो बदले की आग धधक रही है उसमें मेरा क्या होगा इसकी मुझे अब कोई परवाह नहीं रही है। लेकिन अगर जगतार की मौत मुझे नहीं मिली तो उसमें तुम सब भी जलकर राख हो जाओगे।'
'मतलब?' तिरछी नजरों से देखा जगन सेठ ने।
'मतलब यही कि कालिया तुम्हारी और उस पलिस कमिश्नर की सबकी पोल खोल कर रख देगा।' कालिया बोला-'तुम्हीं कहा करते थे जगन सेठ कि इस दुनिया में हर चीज की कीमत होती है। आज कालिया अपनी दोस्ती की कीमत मांग रहा है। नुझे वह दे दो और कालिया हमेशा की तरह तुम्हारा गुलाम बना रहेगा।'
जगन सेठ को कोई शक नहीं रहा कि कालिया वाकई पागलसा हो गया है। फिर भी अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए उसने कहा-'तुम्हारी भावनाओं को मैं समझ रहा हूं कालिया। भाई की मौत में तुम्हें इतना दुखी कर दिया है कि फिलहाल तुम सही ढंग से सोच नहीं पा रहे। लेकिन तुम्हारी
दोस्ती मेरे लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज है। तुम कहते हो तो जगतार की मौत तुम्हें मिल जाएगी। लेकिन इसेके लिए कुछ दिन इन्तजार करना पड़ेगा तुम्हें।'
'कितने दिन?'
'काम तो पहले ही हो जाएगा। लेकिन फिर भी दो-तीन दिन
का वक्त तो तुम्हें देना ही पड़ेगा।' 'मंजूर है।' तभी रघुवर ने वहां प्रवेश किया।
उसे इधकके ही जैसे जनन सेठ को कुछ याद आया।'
बोला-'और हां, वह उस फारेस्ट आफिसर की बहन से फोटोग्राफ थे तुम्हारे पास।'
'हां।'
'उन्हें जरा मेरे पास भिजवा दो फौरन।' जगन सेठ बोला-'शायद वे ही इस मुसीवत से निकलने में हमारी कुछ मदद कर सके। मैं यहां से सीधा अपने आफिस ही जा रहा
जगन सेठ के जाने के बाद कालिया ने रघुबर को बुलाया और अलमारी की चाबी देता हुआ बोला-'अलमारी में से वे फोटो निकाल कर जगन सेठ के आफिस में दे देना।'
'हर बुराई में कोई न कोई अच्छाई होती है मिस्टर केसरी।'। मेयर कह रहा था उससे-'रात जो कुछ भी घटा उसे किसी भी रूप में सही तो नहीं कहा जा सकता। लेकिन मुझे यह लगता है कि दुश्मन की यह बेककूफी हमारे लिए फायदेमंद ही साबित होगी। लोगों को इस घटना का पता तो लग गया है लेकिन अखबारों में कोई खबर इसके बारे में न होने के कारण कोई खास सनसनाती सी नहीं फैली है। मैं आज शाम को ही एक प्रेस कांफ्रेस बुला रहा हूं। उसमें आप अपना बयान दीजिए। फिर देखिए कल क्या हंगामा मचता है।' वे लोग गलियारे की एक दीवार के साथ खड़े हुए बातचीत कर रहे थे। मेयर उसे समझा रहा था कि किस तरह कालिया के इस शर्मनाक हमले का प्रसारण अखबारों के माध्यम से जनता तक पहुंचाया जाए कि वह कालिया और उसके साथियों के अत्याचारों के प्रति उत्तेजित हो उठे।
केसरी अनमने ढंग से ही उसकी बात सुन रहा था। अब उसे मेयर और उसकी जनता की शक्ति में कोई खास विश्वास नहीं रह गया था। लेकिन बह यह भी जानता था कि इस अनजान शहर में केवल वही एक उसका हितचिंतक था। इसलिए स्पष्ट उपेक्षा भी नहीं दिखा सकता था।
वे लोग बात कर रहे कि तभी केसरी ने एक स्थूलकाय व्यक्ति को कालिया के कक्ष से बाहर निकलते देखा। केसरी उसे पहचानता नहीं था। लेकिन कालिया के किसी भी परिचित के लिए उसके दिल में कोई अच्छी भावना उदय होने की सम्भावना नहीं थी।
उस व्यक्ति ने उन दोनों को देखा और फिर निकट गुजरते हुए थोड़ा रुककर बोला-'कहिए शर्माजी क्या हाल है अगर मैं गलती नहीं कर रहा तो आप नये फारेस्ट आफिसर मिस्टर केसरी हैं?'
'सही पहचाना है आपने।'
'मुझे जगन सेठ कहते हैं।' अपना कार्ड निकालकर उसे देते हुए जगन सेठ ने कहा-'अगर आज मौका निकालकर मुझसे मेरे आफिस में मिल लेगे तो मुझे बड़ी खुशी होगी।'
जगन सेठ के जाने के बाद मेयर ने उससे कहा-'जरूर मिल लेना इससे। पता तो चले कि क्या कहना चाहता है।'
'कमिश्नर साहब, नमस्कार जगन सेठ बोल रहा हूं।'
अपने आफिस में पहुंचते ही जगन सेठ ने पुलिस कमिश्नर को फोन किया-'अभी-अभी कालिया से मिलकर आ रहा हूं।' 'क्या हाल हैं उसके।' दूसरी ओर से पुलिस कमिश्नर की
आवाज आई-'आपने कहा नहीं कि यह क्या बेवकूफियां करता फिर रहा है वह।'
'बहुत कुछ कहा है उसे और उसने भी वह कुछ कह दिया जो
उसे नहीं कहना चाहिए था।'
'मैं कुछ समझा नही।' 'फोन पर सारी बातें नहीं की जा सकतीं। अगर आप मेरे
आफिस में आ जाएं तो बड़ी मेहरबानी होगी।'
'अभी?'
'जी हां।' जगन सेठ ने गम्भीर स्वर में कहा-'क्योंकि इसे आवश्यक से भी अत्यधिक आवश्यक काम समझिए।'
पुलिस कमिश्नर ने वहां पहुंचने में देर न लगाई।
'कालिया क्या पागल हो गया हैं।' सारी बात सुनने के बाद
पुलिस कमिश्नर ने कहा।
'बस ऐसा ही समझिए।'
'जगतार के साथ कुछ भी करना असम्भव है जगन सेठ। पुलिस कमिश्नर ने कहा-'बह इस वक्त बाहर की पुलिस कं
निगरानी में है। मैंने रात ही खबर भिजवा दी थी कि जेल से फरा धह कैदी यहां हास्पिटल में मौजूद है। वे लोग आ गए हैं
और उन्होंने उसके कमरे के गिर्द अपना पहरा लगा दिया है। यह न भी होता तो भी भ्या उसे मार देना आसान था। अगर स्वस्थ होता तब तो चलो यह कहकर मरवा दिया जाता कि भागने की कोशिश कर रहा था या मुठभेड़ में मारा गया। मगर ऐसी हालत में असम्भव उसके हाथ भी लगाया तो लेने के देने पड़ जाएंगें। आप समम रहे हैं ना मेरी बात को।' 'मैं तो समझ रहा हूं। लेकिन कालिया समझे तब ना?'
'उसे आपको समझाना पड़ेगा कि वह जो कुछ कह रहा है, सब पागलपन की बातें हैं।'
'वह समझने समझाने की स्थिति से बहुत दूर निकल चुका है।' जगन सेठ ने मेज पर रखा पेपरवेट घुमाते हुए कहा-'अब तो उसका सिर्फ एक ही इलाज बाकी रह गया है।'
पुलिस कमिश्नर ने प्रश्नपूर्ण दृष्टि से जगन सेठ की ओर देखा।
'वही इलाज जो पागल कुत्तों के साथ किया जाता है।'
'यानि?'
'कालिया को खत्म करना होगा।' जगन सेठ ने निर्णायक स्वर में कहा।
पुलिस कमिश्नर ने फिर अपनी सवालिया नजरें ऊंची की।
'इस परिस्थिति से निकलने का और कोई चारा नही है।'
जगन सेठ ने कहा-'कालिया अब जरूरत से ज्यादा ही अपनी मनमानी करने लगा है। इसलिए वह हम लोगों का सहायक बनने की बजाए अब जिम्मेदारी बन गया है। और अब जबकि उसने खुलेआम ब्लैकमेल करने की धमकी दी है तो उसकी उपयोगिता हमारे लिए बिलकुल ही खत्म हो जाती है। अगर इस मौके पर चूक गए तो कल को वह फिर हमारी नकेल अपने हाथों में थामने की कोशिश करेगा।'
'तो क्या सोचा है?'
'बता चुका हूं तुम्हें अपना निर्णय।' जगन सेठ ने कहा-'उसे खत्म करना ही होगा।'
'कहीं बाद में उसके आदमी कोई गुलगपाड़ा करने की न कोशिश करें।'
'इसकी अब कोई गुंजाईश नहीं रही है।' जगन सेठ ने मेंज पर शीशे के पेपरवेट को घुमाते हुए कहा-'उसका भाई हरिया मारा ही गया है और मैरी मेरे कब्जे में है। फिर गुलगपाड़ा मचाने वाला रह ही कौन जाता है। कोई इक्का-दुक्का होगा भी तो उसे सम्हाल ही लेंगे। बस आपको एक काम करना होगा।'
'मुझे तो फिलहाल इस मामले से दूर रखें तो ज्यादा अच्छा हैं।' पुलिस कमिश्नर ने कहा-'इस समय उस जगतार के चक्कर में बाहर से पुलिस के अधिकारी आए हुए हैं। इस सारे मामले को आप ही निबटा लें तो ज्यादा अच्छा है। वे लोग यहां से जगतार को लेकर चले बाएं तो देखा जाएगा। मेरा ख्याल है कि उन लोगों के जाने तक आप भी खामोश रहें तो ज्यादा अच्छा दै।'
'नहीं। वे लोग जगतार को यहां से नहीं ले जाने पाएंगें।'
'क्या मतलब?'
'बताता हूं। बस यह समझ लीजिए कि आपको सिर्फ एक
काम करना है। बाकी सब मैं सम्हाल लूंगा।'
'और वह काम क्या है?'
'जगतार तक किसी तरह यह खबर पहुंचानी है कि अगर वह भागना चाहता है तो इन्तजाम किया जा सकता है।'
तभी चपरासी ने रघुबर के आने की सूचना दी।
जगन सेठ ने उसे अन्दर भेजने के लिए कहा।
रघुबर ने भीतर आकर दोनों को सलाम किया और फिर एक बड़ा सा लिफाफा उसकी ओर बढ़ाता हुझ। बोला-'उस्ताद ने यह भिजवाया है।'
जगन सेठ ने लिफाफा खोला और उसके भीतर रखे सामान
को एक झलक देखने के बाद उसे मेंब की दराज में रखते हुए कहा-'ठीक हे। तुम जाओ।'
रघुबर के जाने के बाद कमिश्नर ने पूछा-'यह क्या है।' 'यह उस फारेस्ट आफिसर के नाक की नकेल है।' जगन सेठ ने कहा-'आपको इतने से काम के लिए भी नहीं कहता। लेकिन जैसा कि आपने बताया कि जंगल के इर्द-गिर्द बाहर की पुलिस ने पहरा लगा रखा है। इसलिए इस काम के लिए आपको तकलीफ दे रहा हूं।'
'लेकिन जगतार को भगाने से क्या फायदा?'
'उससे यह सारी मुसीबत चुटकियों में निबट जाएगी और हम लोगों की तरफ किसी का ध्यान भी नहीं जाएगा।'
'जगतार भागने के लिए तैयार हो जाएगा तो हम उसकी
भागने में मदद करेंगे। हुआ तो उसे छुपाने के लिए जगह भी दे देंगे। जिस रात जगतार भागेगा उसी रात कालिया का काम करवा दिया जाएगा। लोग यही समझेंगे कि जगतार ने अपना अधूरा काम पूरा किया और भाग निकला।'
'लेकिन जगतार क्या भागने के लिए तैयार हो जाएगा?'
'क्यों उसे क्या परेशानी होगी। जो आदमी जेल तोड़कर भाग सकता है वह यहां पुलिस के कब्जे से नहीं भागना चाहेगा?' 'लेकिन बाद में अगर जगतार ने हमारे लिए सिरदर्द बनने की कोशिश की।'
'अगर ऐसा हुआ तो आपका नाम अखबारों में छप जाएगा कि आपने जगतार को घेरने की कोशिश की। उसने मुकाबला किया और मारा गया।'
पुलिस कमिश्नर और भी देर तक जगन सेठ से बात करता रहा, जब उठा तो पूर्ण प्रसन्न था।
मुस्कराकर हाथ मिलाता हुआ बोला-'आपकी अक्ल का भी जवाब नहीं जगन सेठ। हारी हुइ बाजी को जीतना कोई
आपसे सीखे। अच्छा अब चलता हूं।
जिस समय केसरी जगन सेठ के यहां पहुंचा उस समय पुलिस कमिश्नर जयकर जगन सेठ के केबिन से बाहर निकल रहा था। अपनी वर्दी में न होने के कारण केसरी जान न पाया कि वह' कोई पुलिस कमिश्नर है। लेकिन उसके बहुमूल्य कपड़ों से और उसके बाहर निकलने पर चपरासी ने उठकर जिस जोरदार ढंग से सलाम ठोंका उससे उसने यह अवश्य अनुमान लगा लिया कि यह कोई बहुत ही प्रभावशाली व्यक्ति है।
उस्के गुजर जाने के बाद उसने यूं ही सहब उत्सुकतावश चपरासी से पूछ लिया-'यह कौन थे?'
'आप नहीं जानते।' चपरासी ने आश्चयं से उसे देखते हुए
कहा-'पुलिस कमिश्नर साहब थे।' केसरी की समझ में नहीं आया कि पुलिस कमिश्नर यही क्या कर रहा था।
फिर भी उसने और कोई सवाल किए बिना चपरासी से
पूछा-'जगन सेठ है भीतर?'
'आप कौन?'
'उनसे कहो क्र फारेस्ट आफिसर केसरी मिलने के लिए आया है।'
चपरासी अन्दर गया और थोड़ी देर बाद ही बाहर लौटकर बोला-'जाइए।'
केसरी अन्दर प्रविष्ट हुआ।
बिना किली औपचारिकता का प्रदर्शन किए बिना जगन सेठ ने उसे अपने सामने की कुर्सी पर बैठने का संकेत किया और फिर बोला-मुझे खुशी है कि तुमने यहां आने का फैसला करके अपनी अक्लमंदी का सबूत दिया है। जाहिर है कि हम लोग दोस्ताना बातचीत के जरिये किसी अच्छे नतीजे पर पहुंचने की कोशिश हर सकते हैं। बैसे तुम यहां भेरे बुलाने पर अपनी मरजी से आए हो या उस मेयर शर्मा ने सलाह देकर भेजा है तुम्हें?'
'आपने मुझे किसलिए बुलाया है।' उसके सवालों को नजर
अन्दाज करते हुए उसने पूछा।
'तुम्हारे यहां आने के बाद बहुत कुछ ऐसा हो गया जो नहीं होना चाहिए था।' जगन सेठ ने अपनी कीमती कुर्सी की पुश्त से पीठ टिकाते हुए दोनों हाथों की उंगलियां एक-दूसरे में फंसाकर कहा-'वह क्यों हुआ? किसकी गलती से हुआ? इस
बहस में पड़कर मैं मामले को और नही उलझाना चाहता। मैंने तुम्हें यहां इसलिए बुलाया है कि यह जो विकट स्थिति पैदा हो गई है. पहले तो तुम मुझे यह बताओ कि वर्तमान स्थिति को तुम विकट स्थिति समझते भी हो या नहीं?'
उसकी समझ में न आया कि क्या जवाब दे। इसलिए खामोश बैठा हुआ जगन सेठ के चेहरे की ओर देखता रहा।
'तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया?' जगन सेठ ने उसकी
आंखों में झांकते हुए पूछा। 'जवाब तो तब दूं जब आपका सवाल मेरी समझ में आए।' 'हूं, और यह सवाल तुम्हारी समस में कैसे आएगा?'
'जब आप मुझे यह बताएंगे कि कालिया से बापके क्या सम्बन्ध हैं।'
'अगर मैं कहूं कि अच्छे सम्बन्ध नहीं हैं तो?' 'तो मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि कालिया की और मेरी लड़ाई झूठ और सच की लड़ाई है। एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आपका फर्ज बन जाता है कि इस लड़ाई में आप मुझे सहयोग दें।'
'यानि तुम्हारा यह दावा है कि तुम सब की राह पर हो?'
'जी हां।'
'लेकिन सिर्फ तुम्हारे कहने मात्र से कैसे मान लूं कि तुम सच
पर हो।' जगन सेठ ने कहा-'क्या जेलसे भागेहुए कैदी को इस जंगल में पनाह देना जिसके कि तुम आफिसर हो तुम्हारे सच के असूलों का ही एक अंग है?'
'लेकिन मैंने उसे पनाह नहीं दी।' उसने विरोध किया-'मैं तो
उसे जानता तक भी नहीं था कि वह कौन है?'
'लेकिन यह सिर्फ तुम कह रहे हो जबकि घटनाएं और हालात कुछ ओर ही कहानी बताते हैं।' जगन सेठ ने कछ-'क्या यह सच नहीं है कि कालिया के दस-बारह
आदमियों ने एक रात तुम्हारे बंगले पर हमला किया था?'
'बिलकुल सच है।' वह मेज पर आगे को झुकता हुत्रा उत्साहित स्त्रर में बोला-'यही मैं आपको।' 'क्या यह सच नहीं है कि जेल से भागा हुआ कैदी तुम्हारी मदद के लिए एकदम वहां पहुंच गया?' जगन सेठ ने उनकी बात काट कर कहा।
'यह भी सच है मगर ।'
'क्या यह सर नहीं है कि कालिया कल रात कोई षड्यंत्र रच कर जंगल तें पहुंचा था और उसके साथियों ने तुम्हारी सुरक्षा के लिए तैनात पहरेदारों को शराब पिला कर बेहोश कर दिया ला।'
'सच है।'
'क्या यह सच नहीं है कि जगतार फिर बीच में कूद पड़ा और वे दोनों इस बक्त धायलावस्था में हास्पिटल में पड़े हुए हैं?'
'यह भी सच है।'
'क्या रिश्ता है तुम्हारा उस मुजरिम कैदी से जो अपनी जान
जोखिम में डालकर हर वक्त तुम्हें बचाने की कोशिश में लगा हुआ है।'
'मेरा उससे कोई रिश्ता नहीं है। यहां आने से पहले मैं उसे
जानता तक नहीं था।'
'मैं अगर तुम्हारी बात पर यकीन कर भी लूं तो क्या तुम समझते हो कि और लोग तुम्हारी बात पर यकीन कर लेगई?'
'सांच को आंच नहीं होती जगन सेठ। मैं आपको पूरा किस्सा बताता हूं।'
'किस-किस को पूरा किस्सा बताते फिरोगे आफिसर। कोई तुम्हारी बात पर यकीन नहीं करेगा और एक दिन आएगा जब तुम्हारा वह सच या तो तुम्हें पागल कर देगा या फिर आत्महत्या करने पर मजबूर।'
वह जगन सेठ की ओर देखता रह गया।
जगन सेठ अपने शब्दों पर जोर देता हुआ कहे जा रहा था-'अपनी बात साबित करने के लिए तुम्हारे पास कुछ नहीं है। जबकि तुम्हारी हर बात को गलत सावित करने के लिए सबूत मौजूद हैं।' 'कैसे सबूत?'
जगन सेठ ने दराज से लिफाफा निकाला और फिर मेज की सतह से नीचे रखकर उसने उसमें से एक फोटो निकालकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा-'एक सबूत तो यही देख लो।'
केसरी ने देखा और उसका सारा शरीर शर्म और अपमान से झनझना उठा। वह जगतार और साधना की फोटो थी। साधना उसकी छाती पर सर रखे हए आसमान की ओर देखती हुई खिलखिलाकर हंस रही थी।
'यह एक तस्वीर जब लोगों की नजरों के सामने पहुंचेगी तो तुम्हारा सारा सच तुम्हारी सारी दलीलें आसमान में धुआं बनकर उड़ जाएंगी। ऐसी और भी तस्वीरें मेरे पास हैं। लेकिन उस जेल से भागे हुए कैदी जगतार से तुम्हारे कोई सम्बन्ध हैं या नहीं? इसका जवाब देने के लिए यह एक ही तस्वीर काफी है।'
केसरी के मुंह से कोई बोल न फूटा। तस्वीर उसने उल्टी रख दी-साधना की जरा-सी नादानी की वजह से उसकी लड़ाई
कितनी कमजोर हो गई इसे वह महसूस कर रहा था। जगन सेठ गलत नहीं कह रहा था-उसने महसूस किया-यह तस्वीर लोगों के सामने पहुंची नहीं कि लोग उसकी किसी बात पर यकीन नहीं करेंगे।
'हो सकता है कि इस तस्वीर का तुम्हारे पास कोई जवाब हो।' जगन सेठ कहे जा रहा था-'मैं और लोगों की तरह बन्द दिमाग का आदमी नहीं हूं। हर बात को खुले दिमाग से सोचने का आदी हूं। माने लेता हूँ कि तुम्हें अपनी बड़ी बहन के इस गुप्त प्रेम व्यापार के बारे में कुछ भी मालूम न हो। मैं यह भी मान लेता हू कि इन दोनों के प्यार मे कोई अश्लीलता अथवा वासनात्मक सम्बन्ध की बात नहीं होगी। हालांकि एक जेल से भागे हुए कैदी के दिल में इस तरह की पवित्र भावनाओं की उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन फिर भी मैं माने लेता हूं कि इन दोनों का यह प्यार प्रेम का दिव्य रूप है। लेकिन
क्या इसे देख लेने के बाद कोई भी समझदार आदमी अपने इन विचारों पर टिका रह सकेगा क्या?'
और जगन सेठ ने लिफाफे की तस्वीरों में से छांटकर एक और तस्वीर केसरी की ओर बढ़ाई।
यह तस्वीर भी साधना की ही थी लेकिन जगतार के साथ नहीं। इसमें साधना बिल्कुल नग्न थी और आंखें बन्द किए हुए किसी अन्य पुरुष की बांहों में जकड़ी हुई थी। उसे याद आ
गया झाड़ियों वाला वह किस्सा जब उसने साधना को नग्नावस्था में बेहोश पाया था।
'यह एक षड्यन्त्र है।' 'माने लेता हूं तुम्हारी बात को कि यह एक षड्यन्त्र है।' जगन सेठ ने कहा-'लेकिन दुनिया में किस-किस को बताते फिरोगे यह। और कौन यकीन कर लेगा तुम्हारी इस बात पर। इन तस्वीरों को एक साथ अखबारों में छपी देखने के बाद लोगों को कुछ समझाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वे अपने आप ही अनुमान लगा लेंगे कि इस उन्मत्त ढंग से विभिन्न व्यक्तियों के साथ प्रेम सागर में किल्लोल करने वाली युवती को क्या समझा जाए? साध्वी या वेश्या?'
उसके कसते चेहरे और भिंचते जबड़े को देखकर जगन सेठ ने कहा-'बेकार उत्तेजित होने से कोई फायदा नहीं होगा। ठण्डे दिमाग से उन हालात की गम्भीरता को समझने की कोधिश करो जिनमें कि तुम फंस गए हो। मैं अपनी बात आगे कहूं उससे पहले लो यह एक फोटो और देख लो।'
जगन सेठ ने एक फोटो और छांटकर उसकी ओर बढ़ाई।
वह उसके छोटे भाई शिबू की फोटो थी। आदिवासी लड़कियों के साथ अश्लील मुद्राओं में रंगरेलियां मनाते हुए।
'यह सब फोटुएं जव अखबारों में छपेंगी तो तुम्हारे खानदान
के बारे में जो राय कायम होनी वह ऐसी होगी कि लोग तुम्हारे सच को दुनिया का सबसे बड़ा झूठ समझेगे। तम्हारा सव अपनी जिन्दगी यर लाख-लाख आंसू बहाएगा क्योंकि अपने-आपको साबित करने के लिए उसके पास कोई सबूत नहीं है। जबकि झूठ उछल-उछलकर खुशी के गीत गाएगा। क्योंकि सच को सरेआम बदनाम करने के लिए उसके पास भरपूर सबूत हैं।'
उसे लगा कि जगन सेठ सच कह रहा है। इन सारे सबूतों के आगे वह कितना निस्सहाय-सा हो गया था। साधना दीदी उसकी सबसे बड़ी ताकत थी। लेकिन वह ताकत ही उस फरार मुजरिम जगतार के कारण इस नाजक वक्त में उसकी
सबसे बड़ी कमजोरी बन गई।
'अब बताओ कि अब भी मेरा सवाल तुम्हारी समझ में आया
या नहीं?' जगन सेठ उससे पूछ रहा था।
अच्छी तरह समझ चुका था वह कि वाकई एक विकट परिस्थिति में फस गया है वह। जिससे निकलने का कोई रास्ता उसे नजर नल आ रहा था। चारों ओर बस । मधेरा-ही-अंबेरा थाम। अंधेरे के सिवा और कुछ भी नहीं।
'इससे कैसे निकला जा सकता है?' पूछ बैठा वह।
जगन सेठ मुस्कराया धीरे से। जैसे यही सुनने की आशा करता था वह।
बोला-'मैं निकाल सकता हूं तुम्हें। लेकिन इसके लिए सबसे पहले तो तुम्हें उस मेयर का साथ छोड़ना होगा।'
जगन सेठ को बात खत्म हुई ही थी कि तमी फोन की घंटी वज उठी। उसने रिसीवर उठाया और कुछ देर बात करने के बाद रख दिया।
फिर केसरी की ओर देखकर बोला-'बोलो तैयार हो?'
'इस शहर मे वे ही तो अकेले एक हित-चिंतक हैं मेरे।'
'बकवास।' जगन सेठ ने जोर से हवा में हाथ हिलाकर कहा-'वह आदमी अपना हित नहीं देख सकता तो तुम्हारा हित कहां से देख लेगा। क्या तुमने देखा नहीं कि जो अखबारी लड़ाइ उसने शरू की थी उसमें वह कैसे खुद-ब-खुद मुंह की खा गया है। उसेको नाव डूबने वाली है। अगर तुम भी उसके साथ डूबना चाहते हो तो फिर मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना।'
'अगर मैं उनका साथ छोड़ दूं तो सब किस्से खत्म हो जाएंगे?'
'खत्म कुछ नहीं होगा।' जगन सेठ ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा-'लेकिन सबकुछ दब जाएगा और तब तक दबा रहेगा जर तक तुम मेरे कहने पर चलते रहोगे।'
'ओह।' दीर्घ निश्वास के साथ वह बोला।
'अगर परिस्थितियों का मुकाबला न किया जा सके उनके
अनुकूल ढल जाने में ही अक्लमन्दी है।' जगन सेठ ने कहा 'अगर तुम मेरे अनुकूल चलने को तैयार हो तो मैं वायदा
करता हूं कि कालिया फिर तुम्हें कभी तंग नहीं कर पाएगा। अगर तुम चाहोगे तो जगतार भी तुम्हारी और तुम्हारी बहन की जिन्दगी से बहुत दूर भेज दिया जाएया।'
ऐसा हो जाए तो कैसा सुख मिलेगा उसे। एक फरार मुजरिम कैदी के साथ उसकी साधना दीदी के सम्बन्ध हों यह वह सहन नहीं कर पा रहा था। जगतार उन लोगों की जिन्दगी से निकल जाएगा तो शायद साधना के सिर से उसका भूत उतर
जाए।
'और यह तस्वीरें?'
'इन्हें मैं नष्ट कर दूंगा। लेकिन यह मत भूलना कि इनके नैगेटिव हमेशा मेरे कब्जे में रहेंगे।'
उसने धीरे-से गरदन हिलाई।
कुछ देर के लिए वहां एक अजीब सन्नाटा-सा छाया रहा।
फिर जयन सेठ ने ही उस सन्नाटे को तोड़ते हुए पूछा-'तो क्या मैं समझू कि तुम मेचे कहे अनुसार चलने को तैयार हो?'
'और कोई चारा भी तो नहीं है।'
.
'मुझे तुमसे इसी अक्लमन्दी की उम्मीद थी।' जगन सेठ बोला-'अब सुनो तुम्हें क्या करना है। आज शाम को मेयर जो प्रेस कांफ्रेंस बुलाने वाला हैं।' 'आपको कसे मालूम?' उसने एकदम चौंककर पूछा।
क्योंकि यह बात मेयर और उसके बीच हास्पिटल में बात करते हुए ही तय हुई थी। कोई तीसरा वहां मौजूद नहीं था। उसकी समझ में नहीं आया कि उन दोनों के बीच की वह गोपनीय वार्तालाप की खबर इतनी जल्दी जगन सेठ तक
कैसे पहुंच गई।
'इस शहर में और इसके आसपास जो कुछ होता है वह मुझे मालूम रहता है।' जगन सेठ ने धीरे से मुस्कराते हुए कहा 'उस प्रैस कांफरेंस में जाओ ही नहीं और अगर जाओ तो फिर वहां जो बयान देना है वह मुझसे सुन लो।'
जगन सेठ ने उसे जो कुछ कहने के लिए कहा उसे सुनने के बाद उसने यही बेहतर समझा कि वह मेयर द्वारा बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में न ही जाए तो अच्छा है। वैसे भी अब उसे जनन सेठ के कारण मेयर से अपने सम्बन्ध तो खत्म करने ही पड़ेंगे।
दफ्तर से बाहर निकलते हुए उसके कानों में जगन सेठ के
कहे शब्द गूंज रहै थे-अगर परिस्थितियों को अपने अनुकूल न बनाया जा सके तो अक्लमन्दी परिस्थितियों के अनुकूल ढल जाने में ही है।
जगन सेठ के अनुकूल चलने के अलावा और कोई चारा नहीं था उसके पास।
::
कोई चमत्कार ही उसे बचा सकता था और यह जानता था कि आजकल के वैज्ञानिक युग में चमत्कारों की कहीं कोई गुंजाईश नहीं है।
उसने बड़ी ही कमजोर सी आवाज में अपने सेक्रेटी से कहा-'वह प्रेस कांफ्रेंस कैंसिल कर दो सेठी। वजह कोई भी बता देना।'
जेल से भागे एक अपराधी द्वारा चंगल के खामोश अंधेरों में
खेला गया रूह को कंप-कंपा देने वाला खूनी खेल।
अखवार की इन सुर्खियों के नीचे छोटे अक्षरों में पूरी खबर इस प्रकार छपी थी-पिछले दिनों जेल से भागकर जगतार नामक एक खतरनाक खुजरिम जंगल में आ छपा। कहा जाता है कि इस मुजरिम की सहायक न केवल कुछ देवी शक्तियां हैं बल्कि इसन एक वशीकरण मंत्र भी सद्ध कया हुआ। यह अजीबो गरीब रक्तरंजित कहानी उसके इस वशीकरण मंत्र से ही सम्बन्धित है।
पिछले दिनों जंगल में एक नए फारेस्ट आफिसर श्री के. सी. केसरी की नियुक्ति हुई। श्री केसरी न केवल एक ईमानदार
और मेहनती अफसर हैं बल्कि एक ऐसे परिवार से सम्बन्धित हैं जिसकी रगों में साहस और तपस्या कूट-कूटकर भरी हुई है। जिसका जीता जागता उदाहरण है उनकी बड़ी बहन कुमारी साधना। त्याग और तपस्या की इस देवी ने बचपन में ही मां बाप के मर जाने के कारण अनाथ हो गए अपने भाई-बहनों की जिम्मेदारी जिस साहस के साथ सम्भाल कर उन्हें पढ़ा लिखा कर शिक्षित किया इसकी मिसाल कहा और मिलनी मुश्किल है।
उस देवी की सुशीलता और सच्चरित्रता की कसमें खाई जाती
था।
किन्तु यहां आते ही अनहोनी हो गई। उस देवी की सुन्दरता पर जगतार की कुटिल दृष्टि पड़ी और उसने कुमारी साधना के धवल यश रूपी चन्द्रमा को राहु की तरह ग्रस लिया।
अपने सिद्ध वशीकरण मंत्र का प्रयोग करके उसने उस देवी की ऐसी बुद्धि हरी कि वह दीन दुनिया भूलकर उसी की दीवानी हो गई। यह बात जब फारेस्ट आफिसर केसरी को मालूम हुई तो एक भाई होने के नाते अपनीवहन की वह हालात देखकर चिन्तित हुए। जो कि स्वाभाविक भी था। बहन को समझाने की कोतिश की लेकिन बेसुद। क्योंकि वह बेचारी तो वशीकरण मंत्र के प्रभाव में होने के कारण कुछ भी सोचने समझने से लाचार थी।
श्री केसरी पुलिस में भी इस रिपोर्ट को दर्ज नहीं कराना चाहते थे। क्योंकि इसमें बदनामी का डर था और एक शरीफ भाई भला अपनी बहन की बदनामी कैसे बर्दाश्त कर सकता था।
आखिर उन्होंने अपने मित्र कालिया से जो कि जंगल के ठेकेदार भी हैं, अपनी परेशानी का जिक्र किया।श्री कालिया ने बातचीत द्वारा मामले को सुलझाने के उद्देश्य से जगतार से मिलने का निश्चय किया।
चूंकि जगतार एक फरार मुजरिम था इलिए वह दिन में मिलने का खतरा तो मोल नही बे सकता था। इसलिए रात में मिलना निश्चित हुआ। निश्चित समय पर थी कालिया अपने छोटे भाई हरिया के साथ जगतार से मिलने के लिए जंगल में गए। उन्होंने जगतार
को प्रेमपूर्वक समझाने की कोशिश की कि वह उस देवी का पीछा छोड़ दे और उसे अपने वशीकरण मंत्र से मुक्त कर दें। बदले में जितना भी धन वह चाहता है वे देने के लिए तयार
लेकिन उस काम लोलुप कुटिल कामी जगतार के कानों पर जूं तक न रेंगी।
जब श्री कालिया ने उस पर किसी भी तरह की बातचीत और अनुनय-विनय का असर होते न देरवा तो उसे डराने के लिए धमकी दी कि अगर वह जंगल छोड़कर नहीं गया तो वे उसके बारे में पुलिस को सूचना दे देंगे। बस इतना सुनते ही वह नरपिशाच इतना उत्तेजित हुआ कि उसने वही श्री कालिया के छोटे भाई हरिया की हत्या कर दी
और श्री कालिया को भी बुरी तरह घायल कर दिया। श्री केसरी ने बीच बचाव किया जिसमें जगतार भी कुछ घायल हुआ।
दोनों का इलाज शहर के अस्पताल में हो रहा है जहां श्री
कालिया की जिन्दगी और मौत के बीच एक गहरी कशमकश चख रही है।
हम अधिकारियों से पूछना चाहते हैं कि जगतार जैसा
भयानक कैदी जेल से आखिर भागा कैसे? उसे फांसी पर क्यों नहीं चढ़ा दिया गया।
हरिया का पिछले ही साल विवाह हुआ था। उसकी विधवा पत्नी अपनी सूनी मांग और उजड़े सुहाग के साथ यह जानना चाहती है कि आखिर कब तक जगतार जैसा क्रूर कर्मी अपराधी उस जैसी सुहागनों के सुहाग को छीनता रहेगा। उसकी छ: माह की अनाथ हो गई अबोध बच्ची अपनी आंसू भरी आंखों के साथ अपने उस बाप को ढूढ़ रही है जो उसे अब कभी नहीं मिलेगा।
आखिर कब तक जगतार जैसा खतरनाक अपराधी लोगों का सुख-चैन छीनता रहेगा। उनकी खूबसूरत जिन्दगियों को रौंदकर मौत के घाट उतारता रहेगा?'
आखिर कब तक?
केसरी ने पूरा अखबार पढ़ा और जगत सेठ की ताकत को मन-ही-मन माना कि स्याह को सफेद और सफेद को स्याह कर देना उस आदमी के बाएं हाथ का खेल है।
अभी साधना को साफ बचा ले गया है वह। लेकिन अगर उसने उसके चंगुल से निकलने की कोशिश की तो तस्वीर के दूसरे पहलू का प्रचार करने में भी वह देर नही लगायेगा।
सुपरवाईजर ही उसे अखवार देकर गया है। अखबार देने के साथ वह उसके बारे में कुछ चर्चा भी करना चाहता था। लेकिन उसे टालकर भेज दिया था।
वह खबर पढ़ने बैठ गया था।
साधना हास्पिटल जाने की तैयारी कर रही थी। वह तो रात
को भी वहीं रुकना चाहती थी लेकिन पुलिस वालों ने रुकने नहीं दिया।
दोनों भाई-बहनों में बातचीत लगभग बन्द-सी ही थी। फिर भी अखबार लेकर वह उसके पास गया।
'अगर हास्पिटल न जाओ तो बेहतर है।' केसरी ने उसकी
ओर अखबार बढ़ाते हुए कहा-'अखबारों तक में चर्चे होने लगे हैं।'
'बदनामी से सिर्फ वे ही लोग डरते हैं जिनके दिल में पाप होता है।' साधना ने अखबार को बिना पड़े ही एक ओर रखते हुए कहा।
'नही।' वह दोषपूर्ण स्वर में बोला-'बदनामी से वो लोग डरते हैं जिनमें थोड़ा भला-बुरा सोचने-समझने की बुद्धि होती है।'
लेकिन साधना ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह जाने के लिए उद्यत थी। लेकिन फिर भी न जा सकी। क्योंकि तभी एक जीप वहां आकर रुकी और उसमें से वही पुलिस अधिकारी नीचे उतरा जिसने कल हास्पिटल में साधना को समझाने की कोशिश की थी।
'लगता है मैं सही वक्त पर आया हूं।' साधना को तैयार देखकर वह बोला-'कल ही तुम्हारी बातों से मैंने अन्दावा लगा लिया था कि तुम काफी जिद्दी किस्म की लड़की हो आर
शायद अखबार पढ़ने के बाद भी रुषेगी नहीं। मेरा अनुमान ठीक ही निकला। मैं वैसे इन मंत्र-वंत्र की बातों में विश्वास नहीं रखता। लेकिन तुम्हारी हालत देखकर मुझे भी यकीन होने लगा है कि वाकई उसने तुम पर किसी वशीकरण मंत्र का प्रयोग किया हुआ है। बहरहाल मुझे इन बातों से क्या लेना-देना। लेकिन तुम अब हास्पिटल न जा सकोगी क्योंकि अखबारों में यह सब छपने के बाद खतरा है कि लोग तुम्हें देखने के लिए हास्पिटल के बाहर जमा होना न शुरू हो जाए। पहले ही हमारी दिक्कतें बहुत बढ़ी हुई हैं। अब उन्हें और बढ़ाने की जरूरत नहीं।'
पुलिस के आगे साधना भी मजबूर थी और उसे विवश होकर रुकना ही पड़ा।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
सांप की कोटर।
वह सुबह के इस वक्त जबकि सूरज आसमान पर काफी ऊंचा उठ आया था दीगर के ऊपर लिखे हुए शब्दों को नहीं देख रहा था। बल्कि बरामदे के बाहर खड़ा सामने के पेड़ की एक कोटर को देख रहा था जिसमें से एक काला सांप अपनी चिरी हुई जोमों को लपलपाता हुमा धीरे-धीरे रेंगकर गहर निकल रहा था।
कालिया नाग-पहले यही शब्द उसके मस्तिष्क में उभरे। फिर वह गर्दन को झटका देता हुत्रा मन-ही-मन बोला कालिया नहीं जगन सेठ। नहीं यह नाग जगन सेठ भी नहीं हो सकता। क्योंकि जगन सेठ तौ आदमी के वेष में इससे भी अधिक खतरनाक और जहरीला नाग है। जिसका काटा पानी भी न मांगे।
नाग कोटर से निकनकर पेड़ की डाल पर बन खाता इमा सरककर आंखों से ओझल हो गया। लेकिन यह फिर मी बपने असम्बद्ध विचारों में उलझा रहा।
तभी सुपरवाईजर की आवाज सुनकर चौंका। देखा कि बहु हाथ में अबजार लिए हुए तेजी से उसी की ओर लपका चला रहा था-'कुछ सुना आपने सर? कमाल हो गया। कल रात जगतार हास्पिटल से कालिया की हत्या करके
भाग गया।'
'क्या कहते हो?' वह एकदम चौंककर आश्चर्य मिश्रित स्वर में बोला।
'अखबार देखिए सर, आज की सबसे बड़ी सनसनीखेब
खबर तो यही है।' उसने झपटकर सुपरवाईजर से अखबार ले लिया और पढ़ने लगा। मुख पृष्ठ पर ही छपी थी वह खबर-खतरानक कैदी जगतार पुलिस निगरानी के बावजूद हास्पिटल से भागने में कामयाब।
भागते समय भी वह अपना बदला लेना नहीं चूका। जाते-जाते कालिया की हत्या करता गया।
कल रात लगभग दस बजे अचानक ही हास्पिटल की लाईट चली गई और चारों ओर घष्य अंधेरा छा गया। उस अंधेरे का लाभ उठाकर पुलिस निगरानी से भागने में कामयाब हो गया। जब बत्ती आई जोकि जगतार के ही किसी सहयोगी द्वारा मेन- स्विच बन्द कर दिए जाने के कारण चली गई थी, तो एक नर्स ठेकेदार कालिया के कक्ष में प्रविष्ट हुई और यह देखकर वह चीख पड़ी कि ठेकेदार कालिया की लाश फटी-फटी आंखों से उप घूर रही थी। ठेकेदार के मफलर से हा गला घोंट कर उनकी हत्या कर दी गई थी। इन पंक्तियों के प्रेस में जाने तक कोई विशेष विवरण प्राप्त नहीं हो सका लेकिन पुलिस का अनुमान है कि यह जगतार का ही काम है।
पाठकों को याद होगा कि इस संवाददाता ने कल ही
अधिकारियों को जगतार के बारे में सावधान |
लेकिन उसने अन्तिम लाईनों को पूरा पढ़ना जरूरी नहीं समझा। वह अखबार लेकर भीतर गया जहां साधना अपनी पूत्रा की तैयारी कर रही थी।
'लो देख लो अपने उस जगतार का नया करिश्मा।' यह
अखबार उसकी ओर बढ़ाता हुआ बोला-'अब वह कालिया की हत्या भी करके भाग गया।'
साधना ने अखबार लेकर एक सरसरी सी नजर सुर्खियों पर डाली और उपेक्षा से उसे एक ओर रख दिया।
'क्यों पूरी खबर पड़ने के की हिम्मत नहीं।' बह बोला-'अब तो आंखें खोलो दीदी और समझो कि उस खूनी और बहशी के लिए आदमी की जान की कोई कीमत नही, वह तुम्हारी पवित्र भावनाओं को क्या कभी समझ पाएगा।'
'मुझे कितनी बार कहना होगा केशो कि मैं उनके बारे में एक
शब्द भी गलत नहीं सुन सकती।'
उसक चेहरा फिर कस गया। पुछ क्षण तक अपलक देखता रहा। फिर बोला
'आखिर तुम्हें क्या हो गया है दीदी?' वह अजीब बिबशता
भरे स्वर में बोला-'एक खतरनाक अपराधी के पीछे तुम अपनी अच्छी-भली जिन्दगी खराब करने पर तुली हुई हो। अब तो मुझे भी इस बात का यकीन हो गया है कि उसने तुम पर किसी वशीकरण मन्त्र का ही प्रयोग किया है। कहो तो किसी ओझा को।'
'हां हां वशीकरण मन्त्र का प्रयोग दिया है उन्होंने मुझ पर।' साधना मानो फ्ट-सी पड़ी-'जानते हो बह वशीकरण मन्त्र है उनका उस रात अपनी जान पर खेल जाना जब कालियाने अपने गुण्डे हम लोगों को मारने केलिए भेजे थे। वह वशीकरण मन्त्र है उनका दो रात पहले उस कालिया से उलझ जाना जो रात के अंधेरे में हमें मारने के लिए खुद आया था। उस दरिन्दे से जूझते हुए वे खद मौत के मुंह में पहुंच गए लेकिन हम लोगों पर कोई आंच नहीं आने दी। वेह वशीकरण मन्त्र उस पापी कालिया को उसके किए की सजा देना जिसने हमारी जिन्दगी हराम कर दी थी। नही तो मुझे बताओ कि उनकी कालिया से अपनी क्या दुश्मनी थी?'
इस बात का कोई जवाब नहीं था उसके पास। उसने नजरें घुमाकर देखा तो सुपरवाइजर के बातें सुनता पाया। उसे अपनी ओर देखता पाकर सुपरवाइजर नाक का चश्मा ठीक करके वहां से सरकता हुआ बोला-अच्छा तो मैं जाकर मजदूरों को देखता हूं सर।'
सुपरवाइजर के पीछे-पीछे वह भी बाहर निकल आया।
दीदी से बहस करने का कोई लाभ नही था।
अचानक उसकी नबर पेड़ के उस कोटर की ओर उठ गई जिसमें से उसने नाग को निकलते हुए देखा था।
पहले रेंगकर नजरों से ओझल हो गया हुआ नाग इस बीच लौट आया था और कोटर के किनारे पर बड़े मजे से फन उठाए धूप सेक रहा था।
उसे लगा जैसे वह नाग नहीं बल्कि खुद जगन सेठ बैठा हुआ उसका मुंह चिढ़ा रहा है। इच्छा हुई कि अभी जाकर इस नाग
का फन कुचलकर मार डाले।
फिर उसने अपने-आपको समझाया कि ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें
सोचने से क्या फायदा? इस नाग को मारने से कोई जगन सेठ थोड़े ही मर जाएगा।
एक दीर्घ निःश्वास के साथ वह धीरे से बड़बड़ाया-'तुम क्या जानो दीदी कि सिर्फ कालिया को मार देने भर से कुछ नहीं होने वाला। और भी न जाने कितने बड़े-बड़े नाग हैं जिन्होंने जिन्दगी में जहर घोल दिया है। तुम्हारा जगतार कितनों को मारेगा?'
सोचते-सोचते उसे लगा कि उसकी आंखें सजल हो आई हैं।
आस्तीन से उन्हें पोंछते हुए उसने महसूस किया कि कितना कमजोर और बेबस हो गया है वह।
जगतार ने अपने भागने का समाचार अखबार में पढ़ा और फिर उसे एक ओर रखते हुए उसने जगन सेठ की ओर
देखकर कहा-'लेकिन यह कालिया बाला किस्सा क्या हुआ? मैंने तो उसे मारा नहीं है।'
0 टिप्पणियाँ