फोरेस्ट आफिसर
आखिर तुम्हारी समझ में इतनी-सी बात क्यों नहीं आ रही कि अगर तुमने उस फारेस्ट आफिसर के साथ कोई भी उल्टी-सीधी हरकत की तो हम सब बड़ी भारी मुसीबत में फंस जाएंगे।' जगन सेठ ने एकदम क्रोधित होकर कहा।
कालिया ने चौंककर उसकी ओर देखा।
अपनी आवाज को फिर से संयत करते हुए जगन सेठ ने कहा-'तुम्हें शायद इस बात का कोई अन्दाजा नहीं है कि तुम्हारे पिछले क्लेश को निबटाने के लिए मुझे और पुलिस कमिश्नर को क्या-क्या पापड़ बेसने पड़े हैं?' 'कौन से क्लेश की बात कर रहे हैं?'
'पिछले फारेस्ट आफिसर को जो बेमतलब मार डाला था तुमने?'
'बेमतलब मारा था मैने उसे?' कालिया एकदम तुनककर बोला-'अगर मैंने उसे टिकाने न लगाया होता जगन सेठ तो आज हालत यह होती कि बन्दर की तरह से हम सबकी नकेल उसके हाथ में होती। वह डुगडुगी बजाता और हम नाचते। वह हमारा मात्रिक होता और हम उसके नौकर।'
'ऐसी कोई लूट पड़ रही थी।'
'लूट?' आप नहीं जानते शायद कि उस हरामजादे ने धीरे-धीरे हम लोगों के ऐसे रहस्य एकत्रित कर लिए थे जिनके सहारे वह हमे जिन्दगी-भर ब्लैकमेल कर सकता था। अगर जरा भी उसकी मरजी के खिलाफ कोई बात करते हम लोग तो वर दम सबको जेल की हवा खिला सकता था।'
'और यह सब भी तुम्हारी थी गलतियों की वजह से हुआ था।'
'मेरी गलती?'
'बिल्कुल तुम्हारी गलती।' जगन सेठ ने आरोपपूर्ण मुद्रा में कहा-'तुम्हीं उसे चौबीस घण्टे अपने साथ-साथ लिए घूमते
थे। मैंने कितना समझाया था तुम्हें कि इतना मेल-जोल ठीक नहीं। लेकिन तुम नही माने। हर वक्त साथ लदे रहने की वजह से वह ऐसी बातें जान गया जो वह वैसे कभी भी नहीं जान सकता था।'
'यह तो पुराना रवैया है जगन सेठ कि मलती सारी कालिया की, अच्छाइयां सारी आप लोगों की।'
'मुंह बिसूरने की जरूरत नहीं है कालिया, बल्कि हालात को समझने की कोशिश करो। पिछला फारेस्ट आफिसर मारा गया है। अभी यही समझा जा रहा है कि किसी जंगली जानवर के हत्थे चढ़ गया होगा। लेकिन अगर इस दूसरे के साथ भी कुछ उल्टा-सीधा हो गया तो समझ लो कि छानबीन करने के लिए सेन्टर से अधिकारियों की फौज दौड़ पड़ेगी इधर को। उससे यहां पर क्या-क्या मुसीबतें उठ खड़ी होंगी। इसकी शायद तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। यह इलाका जिमकी तरफ अभी किसी का ध्यान भी नहीं गया दै, एकदम सबकी नजरों गे आ जाएगा। वे सब बातें तुम नहीं सोच सकते। तुम्हें सोचने की जरूरत भो नहीं हैं। मैं जो हूं ना।'
वाकई कालिया इन सारी बातों को नहीं समझ सकता था?'
जगन सेठ ने मुस्कराकर कहा-'अब गुस्सा थुको और ठण्डे दिमाग से काम लो। तुम्हारी बातों में खाने का वक्त भी निकल जया। अब किसी होटल-बोटल में क्या जाएंगे, थोड़ा-बहुत यहीं मंगवा लेते हैं। बोलो क्या खाओगे?'
'वह थप्पड़ खाने के बाद और कुछ खाने की गुन्जाइश ही कहां रह जाती है जगन सेठ।'
'फिर वही बात। मैंने कहा ना गुस्सा थूक दो। तुम्हारी खास पसन्द मंगवाता हूं-बटर चिकन।'
जगन सेठ ने होटल से खाना मंगवाया।
दोनों ने खाना खाया। नैपकिन से हाथ पौंछे।
नौकर ने प्लेटें हटाकर मेज साफ कर दी। कालिया माचिस की एक तीली निकालकर दांत कुरेदने लगा। 'अब समझ गए ना तुम्हें क्या करना है।' जगन सेठ ने कालिया को पूरी तरह शान्त करने की कोशिश में कहा-'फिलहाल उस फारेस्ट आफिसर को भूल जाओ। खुली छूट दे दो उसे। देखें क्या करता है।'
कालिया ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि फोन की घण्टी बज उठी।
हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया जगन सेठ ने।
कौन सेठी हैं. ओह अच्छा ठीक ठीक तो खेल शुरू कर दिया हूं"हूं.ठीक है तुम मामले पर नजर रखो और इसी तरह मुझे खबर देते रहना।' 'सेठी का फोन था क्या?' कालिया ने पूछा।
'हू।' रिसीवर रखने के बाद बड़ी गम्भीरता से हुंकारा भरा जगन सेठ ने। फिर कालिया की अस्त्रों में झांकते हुए बोला-'तुम्हारा कबूतर मेयर की छतरी पर जा बैठा है।'
'कौन?'
'वही फारेस्ट आफिसर।'
'मेयर के पास गया है फरियाद लेकर?'
'गया नही है मेयर ने खुद फोन करके बुलाया था उसे। शहर के कुछ पत्रकार भी इकट्ठे किए हैं। मेयर अखबारी लड़ाई शुरू करने जा रहा है शायद।'
'करने दो साले को शरू। नाकों चने ना चबवा दिए तो मेरा भी नाम कालिया नहीं। मै भी उन अखबार वालों को बुलवाता
'तुम अभी कुछ नहीं करोगे।'
'तुम देखो तो सही जगन सेठ कि मैं क्या करने वाला हूं। उस साले फारेस्ट आफिसर को तो इस शहर में मुंह छुपाने को । जगह नहीं। साले की बहन को चौराहे पर नंगी न नचवाया तो मेरा भी नाम कालिया नहीं।'
जगन सेठ ने अर्थ पूर्ण दृरिट से कालिया को देखा।
वह उत्साह में कहे जा रहा था-'उसका वह भाई जिसे उसने शहर वापिस भेज दिया है। वो साला ताड़ी पी-पीकर जगल में आदिवासी औरतों के साथ रंगरेलियां मनाता था। और उसकी वो बहन बड़े वाली। जंगल की झाड़ियों में क्या-क्या कुकर्म करती है, उस सबका कच्चा चिट्ठा है मेरे पास। मय फोटो के। पल के अखबार में ही निकलवा देता हूं यह सब।'
'तुम अभी ऐसा कुछ नही करोगे।' 'क्यों?'
'यह क्यों भूल जाते हो कि वह फारेस्ट आफिसर अभी तक अकेला था। लेकिन अब मेयर भी उसके साथ मिल गया है। हमें बहुत सोच-समझकर कदम उठाना होगा। पहले देख ले कि दुश्मन हमारे खिलाफ किस तरह का मोर्चा खोलने जा रहा है। फिर जो-जो आवश्यक कदम होगे वे उठाए जाएंगे।
. अभी तुम अपने इन फोटो-वोटो को सम्हालकर रखो। किसी को हवा भी मत लगने देना।' 'तुम्हारी राजनीति मेरी तो समझ में नहीं आ रही जगन सेठ।'
'तुम्हें समझने की कोई जरूरत नहीं है। राजनीति करने के लिए मैं जो हूं। तुम सिर्फ वह करते रहो जो मैं तुम्हें करने के लिए कह रहा हू।'
कालिया करना तो वही चाहता था जो उससे जगन सेठ ने करने के लिए कहा था। लेकिन गाल पर पड़ा झापड़ रह-रहकर कलेजे को ऐसा कचोट रहा था कि बुरी तरह बेचैन हो उठता था वह।
गाल पर पड़ता हुआ वह झापड़ वहां खड़े मजदूरों ने देखा। उसके साथियों ने देखा जिन्हें शहर आते ही उसने जीप से उतार दिया था।
जगन सेठ से मिलने अकेला ही गया था वह।
अब जीप में वहां लौटते हुए उसे फिर वह घटना याद आ गई थी। याद करते ही कलेजा अंगारों पर लोटने लगा था। उसके साथी तो कह रहे थे कि अगर उमने रोक न लिया होता तो उन्होंने उस साले को वहीं चीर-फाड़कर फेंक दिया होता। बेवकूफ हैं साले। नहीं समझते कि जो काम रात के अंधेरे में आराम से किया जा सकता है उसे दिन के उजाले में करने की क्या जरूरत है।
जगन सेठ कह रहा है चुप बैठ जाओ। वह चुप बैठ सकता है। क्योंकि उसके गाल पर थप्पड़ थोड़ी पड़ा है। मगर कालिया कैसे चुप बैठ जाए जिसकी इज्जत इतने सारे आदमियों के सामने उस कल के छोकरे ने धूल में मिला दी।
धर पहुंचबे ही उसने फोन करके भैंरों को बुलाया।
'भैरों आव रात उस फारेस्ट आफिसर की खाल में मसाला भर देना है।'
'यानि।'
'नहीं यान से नहीं मारना है।'
'फिर?'
'बस हड्डियों की ऐसी पिसाई कर देनी है कि साना खटिया से न उठ सके।'
'ठीक है उस्ताद।'
'मगर एक बात का ध्यान रखियो।'
'क्या?'
'गलती से भी मरने न पाए हरामजादा।'
'अब उस्ताद यह तो जरा मुश्किल काम है। अब मारा-मारा में कैसी चोट कहां पड़ जाए कुछ पता है।' 'इसीलिए तो तुझे चेताया है कि हरामजादा गलती से भा न मरने पाए?'
'मगर उस पर इतनी दया किसलिए?'
'दया के काबिल तो वह हरामजादा अब रहा ही नहीं। मेरा बस चलता तो साले के शरीर का कीमा बना कर कव्वों को खिला देता।'
'तो फिर।'
'जगन सेठ का कहना है कि ऊपर-नीचे अगर दो-दो फारेस्ट फोरेस्ट आफिसर माफिसर मारे गए तो कहीं सेन्टर के कान न खड़े हो जाएं।' 'साला किस्म का धनी है।' भैरों कन्धे झटक कर वोला।'
'मेरा भी नाम कालिया है। ऐसी हालत कर दूंगा कि साले की जिन्दगी अपनी किस्मत पर हजार-हजार आसूं बहाएगी। तू तो समझ गया न क्या करना है।'
'समझ गया उस्ताद।' भैरों मुस्कराकर बोला-'अक्लमंद को इशारा ही काफी होवे है। साले की ऐसी हालत कर दूंगा कि न जिन्दों में होगा न मरों में।'
आधी रात के बाद का वक्त होगा जब अचानक ही उसकी आंख खुल गई। कारण जानने के लिए उसके कान सतर्क हो गए।
तभी झनाक की आबाज के साथ बंगले की किसी खिड़की का शीशा टूटा और वह एकदम झपट कर उठ बैठा। इसमें सन्देह की कोई गुंजाइश नहीं थी कि कोई पत्थर मार रहा था।
वह एकदम झपटकर उठ बैठा। तब तक कुछ पत्थरों के दीवार से टकराने और छत पर गिरने की आवाजें और आ गई। एक नहीं कई आदमी है।
उठकर बत्ती जलाई। बड़ी सी लम्बी टार्च उठाई। साथ ही अपनी रायफल भी ले ली जो कि फारेस्ट डिपार्टमेंट की सम्पत्ति थी।
दरवाजा खोलकर बाहर निकला। पत्यर आने एकदम बन्द हो गए। उपद्रवकारियों की तलाश में अपनी टार्च का तेब प्रकाश उसने इधर-उधर दौड़ाया। कहीं कोई नजर नहीं आया।
तभी कहीं से पत्थर आया जो सनसनाता हुआ उसके पास से गुजर गया। उसने टार्च का प्रकाश उस दिशा में फेंका। अन्धेरे में हिलती झाड़ियों के अतिरिक्त और कुछ नबर नहीं आया।
उसने रायफल से एक हवाई फायर किया। फिर चिल्लाया-'क्या कायरों की तरह छुपे बैठे हो कुत्तों, मां का दूध पिया है तो सामने आओ।'
जवाब में फिर एक पत्थर आया।
इस बार वह सीधा उसके माथे से टकराया। चिहुंककर एक दम सिर पकड़ लिया उसने। रायफल और टार्च दोनों ही उसके हाथ से निकलकार नीचे गिर गई।
उसके साथ ही न जाने कहां से निकलकर एक साथ ही कई आदमी उस पर टूट पड़े। बचने के लिए कसमसाया वह।
बंगले के बरामदे में खड़ी साधना ने उस दृश्य को देखा।
सुरक्षा के लिए घास काटने वाली तेज धार दरांती उसने पहले ही उठा ली थी।
भाई की सहायता के लिए एकदम दौड़ पड़ी वह। एक के कन्धे पर दरांती से बार किया। पीड़ा से बिल-बिलाते हुए उसने केसरी को छोड़ दिया और कन्धे से बहते खून को थामने लगा।
एक और की गरदन पर वार किया। लेकिन वह ऐन वक्त पर गरदन हटा जाने की वजह से बाल-बाल बच गया। तब तक केसरी भी उन लोगों के चंगुल से छूट कर और छिटक कर निकल चुका था। निकलते-निकलते एक के हाथ से लाठी भी छीन ली थी उसने।
एक व्यक्ति ने सम्हलकर अपनी लाठी का बार साधना पर किया। जिसे बड़ी सफाई से बचा कर उसने दरांती से वार किया।
तभी न जाने किसने उसकी चुटिया पकड़ कर जोर से झटका दिया। जबर्दस्त झटका खाकर चकरी सी घूम गई वह।
इससे पहले कि वह सम्हल पाती दोई मजबूत बांहों ने उसे थाम लिया। चौंककर देखा उसने कि किसी अजनबी ने उसे अपनी छाती से जकड़ रखा था।
साधना ने मारने के लिए अपना दरांती वाला हाथ उठाया। लेकिन उस व्यक्ति ने उसे थाम लिया। साथ ही टसे चूमता हुए बोला-'वाकई बहुत बहादुर हो।'
उसके साथ ही उस व्यक्ति ने साधना को छोड़ दिया।
ठगी सी खड़ी साधना आश्चर्य के साथ देखती रह गई।
जैसे बिजली सी चमकी हो या फिर शोला सा लपका हो। बह अजनबी उसके भाई की सहायता के लिए दुश्मनों पर टूट पड़ा था। उसके पहुंचते ही दुश्मनों में एकदम खलबली सी मच गई हैं वह मंत्र-मुग्ध सी उस ाक्त के शौर्य प्रदर्शन को देखती रही।
केसरी भी बड़ी जीदारी से दुश्मनों के साथ लोहा ले रहा था। लेकिन सिर के घाव से बहता खून आंखों में घुसकर परेशान कर रहा था। जिस कारण जिस तीव्र और चौकन्नी दृष्टि की उसे उस समय आवश्यकता थी उसमे व्यवधान पड़ रहा था।
हाथ रोककर आंख साफ करने का मतलब था दुश्मनों को हाबी होने का मौका दे देना जो एक नहीं कई थे। फिर भी वह साहस और सूझ-बूझ के साथ लाठी चलाए जा रहा था। अपना बचाव करते हुए, दुश्मनों पर बार करता हुआ।
तभी कोई सहायता के लिए आ गया।
साधना या कोई और? यह जानने का कोई उपाय नहीं था। साधना के अलावा और कौन सहायता के लिए आ सकता है इस जंगल में।
दुश्मनों के दबाव में एकदम कमी सी आ गई थी जैसे काई-सी फटती चली गई हो। मौका मिला तो सबसे पहले उसने हाथ रोक कर आंखों में भरते खून को साफ किया।
तभी किसी काई लाठी का जोरदार वार उसकी कनपटी पर पड़ा और वह एकदम त्यौरा कर गिर पड़ा। कुछ होश नहीं रहा उसे।
साधना चीख कर उसकी ओर झपटी।
अकेला रह जाने पर तो अजनबी और भी जोर-शोर से लड़के लगा। भैरों और उसके साथी उस पर काबू पाने में अपने आपको बिलकुल असमर्थ पा रहे थे। कईयों की हड्डियां टूट चुकी थी।
कुछ के तो सिर भी फूट गए थे।
एक अकेले आदमी के सामने वे अपने आपको असहाय सा पा रहे थे। उसे रौद्र रूप ने उनके दिलों में दशहत सी फैला दी थी।
भैरों के साथी एक-एक करके पीछे हटने लगे और मौका देखते ही अपने को अंधेरे में छिपाते हुए वहां से भागने लगे।
कोई सीधा चलने की स्थिति में नही था। हड्डी टूट जाने की बजह से कोई लंगडा हो गया था और कोई लूला। मैरी ने अपने को अकेला पड़ता देखा तो उसकी भी हिम्मत टूट गई। उसे लगा कि कहीं इस आदमी के हत्थे चढ़ पया तो लाश बिछाए बिना नहीं मानेया। भाग बाने में ही उसने कुशलता समझी और वह भी मौका मिलते ही अपने साथियों के साथ भाग लिया।
मैदान साफ देखकर उस व्यक्ति ने अपने माथे का पसीना पोंछा और फिर साधना की ओर देखा जो अपने भाई को होश में लाने का प्रयत्न कर रही थी।
उसने आने बढ़कर बेहोश केसरी को उठा लिया और उमे बंगले की ओर ले जाता हुआ बोला-'टार्च और रायफल उठाती लाना?'
जब तक साधना टार्च और रायफल उठा कर भीतर पहुंची तब तक अजनबी ने केसरी को उसके बिस्तर पर लिटाकर उसका चाव देखना शुर कर दिया था।
साधना को देखकर बोला-'शुक्र है घाव ज्यादा गहरा नहीं है।
कनपटी पर सूजन है बो अभी और बढ़ेगी। कोई मल्हम-बल्लम है तुम्हारे पास।'
'नहीं।'
'कोई फटा पुराना रेशमी कपड़ा।'
साधना जल्दी से रेशम का एक पुराना ब्लाऊज निकाल लाई। 'एक गिलास पानी ले आओ। थोड़ी रुई और डिटोल हो तो थह भी।' अजनबी किसी दक्ष डाक्टर की तरह घाव को देखता हुआ बोला।
साधना ने फटाफट सारी चीजें ला दीं।
पानी में डिटोल डालकर रुई से घाव को साफ करता हुआ बोला वह-'जरा माचिस और ले आओ।'
साधना माचिस लेने चल दी।
घाव की सफाई के समय चेहरे पर पानी पड़ा तो केसरी को कुछ होश आ गया। आंख खुलने पर उस अजनबी को बेखा तो एकदम चिहुंककर बोला-'तुम?'
तभी शरीर में एक अजीब सी लहर सी उठी और वह कोई भी जवाब सुनने से पहले बेहोश हो चका था।
माचिस लेकर लौटी साधना तौँ धाव साफ कर चुका था
अजनबी। खामोशी से माचिस लेकर उसने रेशमी ब्लाऊज को जलाया। फिर उसकी राख ठंडी करके घावों में भर दी।
ऊपर से रुई रखकर हाथ झड़ता हुआ बोला-'किसी कपड़े से पट्टी बांध देना। अब जरा पीने के लिए पानी ले आओ।'
साधना पानी का गिलास लेकर आई।
'इससे क्या होगा मेरा। कोई बड़ा सा बौटा हो तो उसे भर कर लाओ।'
छक कर पानी पीने के बाद उसने अपने गीले होठों को आस्तीन से साफ किया और बोला-'इतनी खूदसूरती के साथ जंगल में इस तरह रहना ठीक नहीं। वह तो मैं था जो वक्त पर पहुंच गया। नही तो।'
बात अधूरी छोड़कर ही वह दरवाजे की ओर बढ़ गया।
'हमारे मददयार का नाम क्या है?' पूछा साधना ने।
'मेरा नाम अपने भाई से पूछना जिसने आज सुबह नौकरी से निकाला है मुझे।' कहने के साथ ही वह झटके से बाहर निकल गया।
असम्ब। कैसा अपराधियों जैसा रूप है। देख कर वितृष्णा सी होती है।
लेकिन कैसा मर्द लड़ाका है।
सामना को लया वैसे उसकी मजबूत बांहों ने अभी भी उसे आलिंगन-बद्ध किया हुआ दै। अधरों पर अभी भी उसके सक होंठों की छुअन महसूस कर रही थी वह।
अनजाने ही उसकी जीभ अपने अधरों पर रेंग गई।
'हलो केसरी?'
'कौन? मेयर साहब।'
'आज सुबह का अखबार देखा?'
'इस जंगल में इतनी सुबह अखबार कहां?'
'कल की तुम्हारी प्रेस कांफ्रेस की रिपोर्ट छपी है। तो मुझे जरा कर्तव्य निष्ठ फारेस्ट आफिसर को निहित स्वार्थ सम्पन्न' लोगों द्वारा धमनियां, वन जनता की सम्पत्ति है और फारेस्ट आफिसर जनता की उस सम्पत्ति का रखवाला है, लेकिन शहर के कुछ प्रभावशाली लोग जो कि बास्तब में थमता की इस सम्पत्ति के लुटेरे हैं, इस कर्तव्यनिष्ठ फारेस्ट आफिसर को अपनी लूट चालू रखने के लिए तरह-तरह की धमकियां दे रहे हैं, लेकिन फारस्ट आफिसर उन लुटेरों के सामने झुकने के लिए कतई तैयार नहीं है त्रौर इस मामले में वह जनता के महयोग की प्रार्थना करना है। इसी सिलसिले में वह शहर की जनता वो प्रतिनिधि मेजर थी गिरीश चन्द्र शर्मा से भी मिला। श्री शर्मा ने फारेस्ट आफिसर को हर सम्भव सहायता देने का वचन दिया है कि उन लुटेरों के विरुद्ध शहर की जनता हर तरह का सहयोग देने के लिए तैयौर है। नवगठित वन रक्षा समिति ने आज शहर में एक व्यापक जलूस निकालने का निश्चय किया है। ताकि उन सफेद पोश लटेरो को शान्ति पूर्ण प्रदर्शन से समझाया जा सके कि अगर उन्होंने अपनी नीचतापूर्ण हरकतें बन्द नहीं की तो जनता उसे सबक सिखाने के लिए और कड़े कदम उठाने से नही हिचकेगी, कहो सब अभियान ठीक है ना?'
'लेकिन इसमें कालिया का तो कही कोई जिक्र नहीं है?'
'इतनी जल्दी नहीं। अभी देखते हैं कि इस सबका क्या असर पड़ता है और वह पलटकर क्या कार्यवाही करता है। उसके बाद धीरे-धीरे कालिया और उसके सहयोगियों का पर्दापाश किया जाएगा।'
'लेकिन वे अभी अपने हरकतों से बाज तो नहीं आ रहे। कल रात भी उसके आदमियों ने हमला किया था।'
'अच्छा कितने आदमी थे?'
'अन्धेरे में गिन तो नहीं सका लेकिन दस-बारह आदमी तो थे।'
'अरे रे रे 'जरा खुलकर बताओ क्या हुआ था।'
केसरी ने सारा किस्सा सुनाया। 'ज्यादा चोट तो नहीं आई?'
'जी नहीं। सिर में मामूली सा जख्म है और कनपटी पर थोड़ी सूजन।' 'खैर तुमने और तुम्हारे बहन ने काफी हिम्मत दिखाई।
शाबासी है तुम्हें। तुम्हें। लेकिन वह दूसरा आदमी कौन था?'
'मालूम नहीं सर।' वह बोला-'दरअसल सिर पर चोट लगने की वजह से मैं बेहोश हो गया था। हो सकता हैं कि जंगल का ही कोई मजदूर हो जो इतने आदमियों से अकेले लड़ते देख कर मदद के लिए आ गया हो।'
"उसका पता करो भाई। ऐसे बहादुर मजदूरों को तो तुम्हें अपने साथ रखना चाहिए। चार-रांच आदमी भी अगर ऐसे मिल गए तो कालिया की याधी हिम्मत तो वैसे ही टूट जाएगी। और हां इस घटना की रिपोर्ट पुलिस में जरूर कराना। या ठहरो मैं खुद ही पुलिस कमिश्नर से बात करके तुम्हारी सुरक्षा का प्रबन्ध करवाता हूं।'
फोन रखकर वह उठा। चोटें जरूर चसक रही थी। लेकिन वैसे वह अपने आपको स्वस्थ्य ही महसूस कर रहा था।
साधना से उस अजनबी के बारे में पूछा। उसने जो हुलिया वताया वह जगतार से मिलता था। निश्चित रूप से जगनार ही होगा। उसे ही तो उसने कल काम पर से हटाया था कालिया का आदमी समझ कर।
'अगर वह ऐन वक्त पर सहायता के लिए न आ जाता तो इतने बदमाशों को सम्हालना मुश्किल हो जाता हमारे लिए।'
'इसीलिए तो कह रहा हूं दीदी कि जब तक यह किस्सा न निबटे तुम शहर चली जाओगी।'
'नहीं।' हठपूर्वक बोली साधना।
'आखिर तुम समझती क्यों नहीं...'
'हर बात समझ सकती हूं लेकिन अन्याय के आगे मे हट जाना नहीं समझ सकती और आगे से यह मुझे सममाने की कोशिश भी मत करना।'
"लेकिन दीदी।'
'तुम जानते हो केशो कि मैं अन्याय का मुकाबला करते-करते मर जाना तो पसन्द करूंगी लेकिन उसके सामने सिर प्रका कर हट जाना नहीं।'
कहकर साधना रसोईघर में घुस गई। उसने असहाय भाव से आने कन्धों के। झटका दिया।
तैयार होकर काम पर जाने के लिए निकला ही था कि तभी अधेड़ सुपरवाईनर आ गया। हाथ में अखबार लिए हुए।
'आपने तो सर कमाल कर दिया। इस सारे मामले को अखबार में उछाल दिया।'
'हां मेयर साहब से मिला था। उनसे बातचीत करके इसी नतीजे पर पहुंचा कि कालिया जैसे लुटेरों का मुकाबला करने के लिए जनचेतना जगानी जरूरी है। आपका क्या ख्याल है कि इस सबका कुछ प्रभाव पड़ेगा जनता पर।'
'प्रभाव तो निश्चित रूप से पड़ेगा सर। अखवार में पढ़कर ही आज मेरे मुहल्ले के चार पांच आदमी मेरे पास आए और पूछने लगे कि जंगल में ऐसी कौन सी सम्पत्ति होती हुऐ जिसके लुटने का खतरा है। जब मैंने उन्हें बताया तो बोले कि उन्हें तो आज तक यह सब कुछ मालूम ही नहीं था। एक ने तो साफ मेरे मुंह पर कह दिया कि उसे यह तो मालूम था कि मैं जंगल विभाग में नौकरी करता हूं लेकिन वह अब तक यही समझता था कि सरसर ने फालतू का खर्चा पाल रखा है। यह तो उसे आज मालूम हुआ कि मेरा काम भी अन्य लोगो जैसा महत्व का काम है। सो यह तो जाहिर हो ही गया कि लोगों मे चेतना तो जाग रही है।'
इसका मतलब है जनचेतना जागनी तो शुरू हो गई। मेयर साहब ने जो लाईन बाफ एक्शन चुनी वह ठीक ही है। अब शहर जाकर कल रात की घटना की पुलिस मे रिपोर्ट लिखा आए। लेकिन मेयर साहब ने मना करा है। पहले पुलिस कमिश्नर से बात करेंगे। ठीक है माथे की पट्टी तो करवा आए।'
दरअसल वह शहर जाना चाहता था। सुपरवाईजर ने जो जनचेतना का संक्षिप्त रूप सुनाया वह काफी आकर्षक लगा था उसे। शहर जाकर उसका विस्तृत रूप अपनी आंखों से देख लेना चाहता था।
बोला-'मैं काम देखने ही जा रहा था। अब आप गए हे तौ देख लीजिएगा। में जरा शहर जाकर पट्टी करा आऊं।'
'अरे हां यह पूछना तो भूल ही गया। पता चला रात बहुत से आदमियों ने हमला किया था बंगले पर।'
'वह सब में आकर बताऊंगा। फिलहाल तो मैं डाक्टरी पट्टी करा आऊं और हां, अगर जगतार दिखाई दे तो उसे काम पर, लगा लीजिएगा।'
'आओ-आओ जगन सेठ।' कालिया बपनी कोठी के ड्राइंगरूम में जगन सेठ का स्वागत करता हुआ बोला-'सुबह-सुबह कैसे आने का कष्ट किया? मुझे हुक्म देकर बुलवा लिया होता।'
'आखिर तुम माने नहीं ना?'
'क्यों क्ने क्या किया है।'
'मेरे मना करने के बावजूद भी तुमने रात अपने षादमी भेज दिए उस फारेस्ट आफिसर के बंगले पर।' जगन सेठ ने सोफे
पर बैठते हुए कहा।
'आपसे किसने कहा?'
'तुम क्या समझते हो कालिया कि तुम वहीं बताओगे तो मुझे तुम्हारी कार्यवाही पता नहीं चलेगा।' जगन सेठ ने जेब से कीमती सियरेट केस और लाईटर निकालते हुए कहा। 'यह कौन कहता है जगन सेठ? क्या मैं वानता नहीं कि आप के हुक्म के बिना पत्ता तक नहीं हिल सकता। फिर कालिया की बिसात कि बापकी मरजी से बाहर निकल आए।'
'देखो कालिया, मुझसे उड़ने की कोशिश करोगे तो घाटे में ही रहोगे। हम दोनों का ही?' नुकसान है इसमें।'
'आप तो मुझ पर बेकार ही खफा हो रहे हैं अमन सेठ। मैंने किसी को कहीं नहीं भेजा। वह तो जब लौंडों को मालूम हुआ मेरे अपमान के बारे में तो अपने आप पर काबू नहीं रख सके
और उस आफिसर के बच्चों को सबक सिखाने लिए पहुंच गए।'
'सिखा दिया सबक उन्होंने?'
जगन सेठ के इस सवाल पर कालिया बगलें झांकने लगा।
रात अब भैरों ने उसे लौटकर फोन द्वारा बपनी मोर अपने आदमियों की असफलता की खबर दी थी सभी से उसके दर्प का आहत नाग बड़ी बेचैनी से कुंडलियां ले-लेकर खेल रहा था।
लेकिन जगन सेठ के सामने उन भावों को छुपाए रखने के लिए उसे काफी मेहनत करनी पड़ रही थी। जगन सेठ ने सिगरेट केस खोलकर उसकी ओर बढ़ाया। उसने एक सिगरेट निकाल ली। जगन सेठ ने भी एक सिगरेट निकाल कर होंठों में दबा ली और फिर लाईटर जलाकर दोनों सिगरेट सुलगाई। लेकिन लाईटर बुझाया नहीं।
उसकी लौ को देखते हुए कहा-'इस आग को देख रहै हो ना कालिया। दुनिया की सबसे बड़ी विनाशक शक्ति है यह। फायदे से पकड़े रहो तो हमारे हाथों में कितनी बेबस है यह। जब चाहे मरजी बुझा दो जव चाहे मरजी जलाओ।'
जगन सेठ ने दो-तीन बार लाईटर जलाया-बुझाया।
'हमारी सिगरेट भी जलाएगी, खाना भी पकाएगी। हमारी मरजी के मुताबिक हमारे सुख के सब काम करेगी यह। लेकिन सिर्फ तब तक जब तक कि यह हमारे काबू में रहेगी। काबू से बाहर इसकी जरा-सी भी चिंगारी सब कुछ जलाकर राख कर देगी।'
रुककर जगन सेठ ने कालिया की आंखों में झांका और फिर कहा-'हां कालिया, यहा फारेस्ट आफिसर बो चिंगारी है जो अभी हमारे काबू से बाहर है। हमारे दश्मन इस चिंगारी को हवा देने में लगे हुए हैं। अभी हालत ऐसे हे कि इस चिंगारी को
अगर हमने पकड़ने की कोशिश की तो हमारे हाय जल जाएगे। आज का अलगर तो देख लिया होगा तुमने।'
'अभी कहा? रात देर से सोया था सो देर से आंख खुली।
कोई खास खबर है क्या?'
'मेयर ने अपनी चाल चलनी शुरू कर दी। जंगल की तरफ आम जनता का ध्यान खींच दिया हैं। हम लोगों का नाम लिए बिना बहुत कुछ कह दिया गया है। कोई वन रक्षा समिति भी पठित हो गई है जो आज जलूस निकाल रही है।'
'मेयर के चमचे होगे। कहो तो आज उस जलूस का ही जलूस निकलवा दूं।' 'अभी तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं है। जब जरूरत होगी मैं तुम्हें खुद कह दूंगा। मेयर उस फारेस्ट आफिसर की आड़ में जो गढ़ा हम लोगों के लिए खोद रहा है मैं उसे ही उसकी कब्र बना दूंगा बशर्ते कि तुम जरा अपने आप पर काबू रखो।'
'मेरी तरफ से निशा खातिर रहिए आप। अब तक जो हो गया सो हो गया। अब आपसे पुछे बिना एक इंच भी नहीं हिलूंगा।'
'तो वायदा रहा कि जब तक मैं न कहूं तब तक तुम उस
फारेस्ट आफिसर की तरफ औख उठाकर मी नहीं देखोगे।'
'पक्का वायदा रहा।' कालिया बोला-'लेकिन एक वायदा
आपको भी करना होगा।'
'वो क्या?'
फोरेस्ट आफिसर
'यह फारेस्ट आफिसर मेरा शिकार है। जब भी मौका आएगा इसका शिकार करूगा मैं ही।'
'और उसकी बहन?'
'वह तो सांझे का माल है। लेकिन बड़े होने के नाते पहला देग
आप ही लगाएंगें।'
'लाओ तो फिर इसी खशी में चाय पिलबाओ।'
वे लोग चाय पी रहे थे कि भैरों आ गया। हाथ में पट्टी बंधी हुई थी।
'आ गए सूरमा पिट-पिटाकर?' कालिया उसे देखते ही बोला। 'इसकी तारीफ तो नहीं कर रहे उस्ताद कि कितनी बहादुरी से अपनी खोपड़ी सलामत रख सका। जब बिलकुल अकेला रह गया तभी मजबूरी में मोरचा छोड़ कर हटा हूं। बाकी सबके सब तो पहले ही भाग लिए और उनमें से कोई खटिया से नहीं उठ सकता। और ऊपर से तुम सुझे ताने दे रहे हो।'
'ताने “अबे शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब कर नहीं मर जया कि इतने सारे लोग एक छोकरे से पिट कर आ गए।'
'अकेला कहां दो-दो बने थे।'
'दूसरी उसकी बहन ही तो थी औरत जात।' 'नहीं उस्ताद एक और भी था।'
'और कौन था?' इस बार जगन सेठ ने भी एकदम चौंककर पूछा।
'यह देखने का मौका ही कहां मिना सरकार।' भैरों बोला-'उस छोकरे को हमने कब्जा लिया था लेकिन तभी वो न जाने कहां से छलावे भूत की तरह आ टपका और आते ही उसने क्या गदर मचाया है"तौबा तौबा कहते हुए शर्म तो
आती है सरकार मगर सच्चाई यही है कि अगर वहां से मैदान छोडकर भाग न लिए हाते तो हम सबकी लाशें उठा कर लानी पड़ती सरकार।'
'यह दूसरा कौन आ गया?' जगन सेठ ने विचारपूर्ण मुद्रा में कहा।
'यह तो पता लमाना पड़ेगा कि यह दूसरा कौन आ गया साला। भैरों उस दूसरे का पता तो लगा बेटा।'
'उस तरफ याने की अब कोई जरूरत नहीं है।' जगन सेठ ने एकदम दृढ़ स्वर में मना करते हुए कहा। 'लेकिन यह पता तो लगाना ही पड़ेगा कि यह दूसरा कौन है।'
'उसका भी पता लग जाएगा। लेकिन तुम फिलहाल जंगल से
दूर ही रहना।' जगन सेठ ने कहा-'तुम्हें पता नहीं है कि अभी-अभी मेयर ने पुलिस कमिश्नर से बात की है और उस फारेस्ट आफिसर के थमने की सुरक्षा के लिए कहा है।'
'लेकिन पुलिस कमिश्नर साहब तो अपने ही आदमी ई।'
'यह पुलिस वाते भी कभी किसी के हुए हैं। हमारा पब्बा भारी
है तो वह हमारे साथ है। कल को मेयर का पव्वा भारी होगा तो वह उसके साथ हो जाएगा।'
'पर वो तो हमारे सारे कामों में बराबर के हिस्सेदार है।'
'तू बड़ा भोला है रे कालिया। इन सब बातों को नहीं समझेगा, यह राबनीति है राजनीति। इसे मेरे लिए ही रहने वे तू सिर्फ वह करता रह जो मैं कहता रहूं।'
बड़े ही अपनत्व भरे शब्दों में कहा जगन सेठ ने।
फिर कालिया के कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा-'तुम फिलहाल इतना समझ लो कि पुलिस कमिश्नर ने फारेस्ट
आफिसर के बंगले की सुरक्षा का आश्वासन दे दिया है मेयर को। इसीलिए तुम्हें सलाह दे रहा हूं कि कुछ दिन जंगल की तरफ पैर करके भी मत सोना। समझे। और भैरो।'
'जी सरकार?'
'तुम्हारा उस्ताद तुम्हें जो हुक्म दे उसे आंख बन्द करके मानो। लेकिन अगर जंगल के बारे में यह कोई हुक्म दे तो उसे तामील करने से पहले जरा मुझसे पूछ लेना।'
'जी सरकार।'
कालिया को जगन सेठ की यह बात कतई पसन्द नहीं आई कि उसके ही सामने उसके आदमी को उसका हुक्म न मानने के लिए कहा जाए। लेकिन वह चुप रहा। जगन सेठ के जाने के बाद उसने भैरों को भी टरका दिया। क्योंकि वह जानता था कि जगन सेठ ने मौका दिया है तो भैरों अब उसकी नाक का बाल बनने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। जंगल से सम्बन्धित तो क्या अब वह उससे सम्बन्धित हर छोटी-बड़ी खबर जगन सेठ तक पहुंचा दे तो कोई ताज्जुब नहीं।
लेकिन उस दूसरे के बारे में तो पता करना ही पड़ेगा। जगन सेठ की जानकारी के बिना।
यह जाने बिना उसे चैन नहीं पड़ेगा कि आखिर वह दूसरा था कौन जो ऐन वक्त पर फारेस्ट आफिसर की मदद के लिए पहुंच गया। लेकिन इस काम पर समाए किसे। भैरों को लगाना ठीक नहीं। वह तो सीधा जगन सेठ को खबर कर देगा।
किसे लगाए?
सोचते-सोचते उसे अपने छोटे भाई हरिया के दोस्त रघुबर का ध्यान आया। साथ ही घनी मूंछों से नीचे होंठों पर एक गहरी मुस्कराहट फैल गाई-जगन सेठ को अभी मालूम नहीं कि
कालिया के पास काम करने के कितने रास्ते हैं।
साधना की समझ में नहीं आ रहा था कि यह उसे क्या होता
जा रहा है। उसका विवेक उससे कह रहा था कि जो कुछ भी वह कर रही है गलत कर रही है। लेकिन मन अवश होता था रहा था।
उस अजनबी के भद्दे रूप रंग में ऐसा कुछ भी तो नहीं था जो उसे आकर्षित कर सके। लेकिन फिर भी म जाने क्या था जो उसे बरवस अपनी ओर खींच रहा था।
चौड़ी छाती और मजबूत बांहों का वह क्षणिक आलिंगन अथवा प्रथम भेंट का वह अनचाहा चुम्बन।
या फिर उसकी वह चमत्कारिक मर्दानगी जो बिजली की तरह कड़कती हुई उनके दुश्मनों पर टूट पड़ी थी।
या फिर उसका वह अक्खड़पन"सबकुछ चलचित्र की तरह धूम गया था साधना की आंखों के आगे। उसके बेहोश भाई को चाकर लिटानाषाव में रेशमी राज भरना पानी पीकर आस्तीन से गीले होंठों को पोंछना और उसके नाम पूछने पर मेरा नाम अपने भाई से पूछना जिसने आज सुबह नौकरी से निकाला है मुझे झटके के साथ बाहर निफल जाना। केसरी से पूछ न पाई वह कि उसे क्यों नौकरी से निकाल था। काफी देर तक वह बैठी हुई उस अजनबी के बारे में ही सोचती रही। अपने आपसे पूछती भी रही कि आखिर क्यों सोच रही है वह उसके बारे में?'
इस बात का कोई जबाब नहीं था उसके पास?'
जब मन न माना तो दरांती कमर मे खोंस कर बंगले से बाहर निकल आई वह। उसने उस अजनबी को खोजने का निश्चय किया था। लेकिन समझ में नहीं आया कि कहां खोजे उसे।
कल रात तो तुरन्त ही सहायता के लिए आ गया था। इसलिए ज्यादा दूर तो नहीं होना चाहिए उसे।
काफी देर तक वह उसे इधर-से-उधर तलाश करती रही मगर वह नहीं मिला।
उसके न मिलने से साधना को और भी गहरी सोच में डाल दिया। उसी से सम्बन्धित विचार उसके मन-मस्तिष्क को
घेरने लगे।
शाम को खाना बाले हुए केसरी ने भी साधना के उन्मन चेहरे की ओर लक्ष्य किया। बोला-'तुम्हारी तबियत तो ठीक है दीदी?'
'हां हां ठीक है।' वह एकदम चौंककर बोली थी-क्यो-'क्यो हआ है मेरी तबियत को।'
'पता नहीं।' वह मिर झटककर बोला-'अजीब गुमसुम-सी
बैठी हो।'
'अगर सोच रही हो कि आज फिर कोई हंगामा होगा तो
बेफिक्र रहो। आज कोई हगामा नहीं होगा। आराम से सोना तुम।'
'क्यों आज कोई खास बात है क्या?'
'पुलिस कमिश्नर ने दो हथियारबन्द सिपाही नियुक्त क दिए हैं जो रात-भर बंगले पर पहरा देगे। रात आठ बजे सुबह चार बजे तक। अब तुम रात भर बाराम से खर्राटे अरना।'
'चलो अच्छा हुआ। उस आदमी को काम पर लगा दिया था?'
'किसे?'
'अरे वही जिसने रात हमारी मदद की थी।'
'मैन मुपरवाइजर साहब से कह तो दिया था किन्तु शाम को पता चला कि वह काम पर आया ही नहीं था।'
'आया ही नहीं, क्यों?'
'मुझे क्या पता। दिहाड़ी का मजदूर था कहीं और निकल गया होगा। शक्ल से ही आवारा लगता था। ऐसे लोग एक जगह टिककर काम करने में विश्वास नहीं रखते दीदी। खैर तुम शहर की सुनो। सुबह की खबर ने हलचल मचा दी वहां। एक जलूस भी निकला था।' केसरी कहे जा रहा था लेकिन वह सुन नहीं रही थी।
कहां निकल गया होगा ऐसे आवारा लोग एक जगह टिक कर काम करने में विश्वास नहीं रखते विचार बापस में गड्ड मड्ड से हुए जा रहे थे।
दोनो सिपाही आ गए थे। उन्हें चाय बनाकर दी। केसरी कुछ देर उनसे बतियाने बैठ गया था। उसने दूध का गिलास कमरे में रचने के बाद वह अपने पलंग पर आकर बेट गई थी।
न चाहते हुए भी फिर उन्हीं विचारों ने आवर घेर लिया उसे बला गया होगा कैसे? लेटे लेटे वह अपने आपसे पूछ रही थी कि आखिर वह क्यों सोच रही है उसके बारे मे जो चला गया होगा।
क्यों उस क्षणिक छाया के पीछे पगलाई हुई है जिसका अस्तित्व एक जुगनू की चमक से ज्यादा कुछ भी नहीं।
लेकिन वह उन बांहों का क्या करे जो अपनी अदश्य उंगलियों से उसकी मन-वीणा के तारों को निरन्तर झंकृत किए जा रहे हैं। उन होंठों का क्या करे जो उसके अधसें पर एक अतृप्त प्यास की रागिनी गुनगुनाए जा रहे हैं।
अपने अब तक के जीवन मे कभी ऐसा अनुभव नहीं किया था साधना ने जब उसका विवेक उसकी भावनाओ के आगे बेबस-सा होकर रह जाए।
अगली सुबह केसरी के जाने के बाद वह फिर उसकी तलाश में बंगले से बाहर निकल आई।
जंगल के नए पुराने सब खतटों को भूल गई थी वह। एक लगन थी तो उस अनजाने को। ढूंढ़ निकालने की।
आदत-दर्ज की तड़प भी थी उसके मन के भीतर। क्या उसके रूप में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी को बांधकर रख सके।
और फिर न जाने कहाँ से वह अचानक ही निकलकर उसके सामने आ गया।
ठगी-भी देखती रही वह उसके बेढब अनगढ़ रूप को- उलझे बिखरे बाल कई रोज की बढ़ी हुई दाढ़ी, चैकदार कमीज के
बटन छाती पर खूले हुए।
'मुझे ढूंढ़ रही हो?' सीधा सवाल किया था उसने।
सकपका नई साधना!
'कल से ढूंढ़ रही हो?'
'तुम्हें मालूम है?'
'झाड़ियों में से छुपकर देख रहा था तुम्हें?'
'तो फिर सामने आए क्यों नहीं?' ।
'यकीन नहीं आ रहा था कि तुम मुझे ही ढूंढ रही हो।'
'बर तो यकीन आ गया?'
'कुछ-कुछ।'
और उसने अपनी बांहें फैला दीं। साधना दौड़कर उनमें समा गई।
तीसरे दिन जगन सेठ ने मेयर के अखबारी अभियान के जवाब में एक बड़ा जोरदार बयान अखबारों में प्रकाशित करवाया। वह बयान लिखा तो किसी और ने था लेकिन अखबारों में वह मेयर पद के नए उम्मीदवार सम्पतराय मुनीम के नाम से छपा था।
अपनी डूबती हुई नैया को बचाने के लिए वर्तमान मेयर द्वारा एक हास्यास्पद चुनावी हथकण्डा।
शहर की जागरुक जनता को बन सुरक्षा के नाम पर मूर्ख बनाने की एक बचकानी कोशिश।
एक फारेस्ट आफिसर की आड़ में जिसे आए अभी एस महीना भी नहीं हुआ वर्तमान मेयर श्री गिरीसचन्द्र शर्मा अपनी राजनीतिक नैया को असफलताओं के भवर से निकालने के लिए एक प्राणघाती कोशिश कर रहे हैं। जिस
फारेस्ट आफिसर को अपना पद सम्हाले हुए अभी जुम्मा-जुम्मा आठ रोज भी नहीं हुए हैं वह श्री शर्मा की नजरों में कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार और न जाने क्या-क्या बन गया। क्या इससे यह अनुमान लगाया जाए कि इससे पहले नितने फारेस्ट आफिसर आए वे सब श्री शर्मा की नजरों में चोर और हरामखोर थे।
पिछले फारेस्ट आफिसर श्री सरन महतो की लाश जंगल में संदिग्ध अवस्था में पाई गई थी। उसके निए तो श्री शर्मा के दिल में कभी कोई दर्द नहीं उमड़ा। उसके बारे में उन्होंने
अखबार में कभी एक शब्द नहीं कहा। फिर इस नए फारेस्ट
आफिसर से इतनी हमदर्दी क्यों?'
क्या उसकी कथित कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी म्ए कारण ही अथवा कोई अन्य ऐसा कारण है विस पर श्री शर्मा की पारखी नजर गड़ी हुई है और उद हासिल करने के लिए नए फारेस्ट आफिसर को यह सब उपाधियां अन्धा बांटे रेवड़ी की तरह खैरात में दी जा रही हैं।
बहरहाल सच्चाई छुप नहीं सकती कभी झूठे असूलों से बौर खुशबू आ नहीं सकती कमी कागज के फूलों से। श्री शर्मा को मालूम होना चाहिए कि वे थमाने गए जब झूठ की सीढ़ी लगाकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा जा सकता था। अब जनता जागरूक हो गई है। उसमें सच और झूठ पहचानने की अक्ल है।
उसी रोज मेयर का फोन जगन सेठ के पास पहुंचा। 'तो युद्ध का ऐलान कर दिया जगन सेठ?'
'पहले तो आपने ही की है शर्माजी।'
'लेकिन हमने किसी का नाम नहीं लिया था।'
'परदे के पीछे बैठकर तो औरतें गालियां देती हैं शर्माजी। मर्द
तो सीधे मैदान में आकर ताल ठोंकते हैं।'
'अब बेकार हंसी तो दिलात्रो मत जगन सेठ। अच्छी तरह मालूम है कि परदे के पीछे कौन बैठा है और आगे कौन शिखण्डी नाच रहा है।'
'इस बार वह शिखण्डी ही आपकी गद्दी हथियाने वाला है।' 'यह सपना तो खैर कभी पूरा होने वाला नहीं। लेकिन आपसे मुझ यह उम्मीद न थी कि आप इस तरह मेरे ऊपर कीचड़ उछालें। भला बताइए तो कहां गड़ी हुई है मेरी नजर?'
'पुरानी कहावत है शर्माजी कि शीशे के घर में बैठने वालों को दूसरी के घरों में पत्थर नहीं फेंकने चाहिएं।'
'खैर हम भी जब मैदान में आ ही गए है तो पीछे हटने वाले नहीं हैं। एक बात याद रखिएगा कि जीत हमेशा सच को होनी है।'
कुछ देर बाद ही जगन सेठ का फोन पहुंचा कालिया के पास।
'आव का अखवार पढ़ा।'
'बिल्कुल पढ़ा जगन सेठ। मेयर भी पढ़कर पटबीजने की तरह उछल गया होगा।'
'सच कह रहे हो। अभी-अभी उसका फोन आया था।'
'अच्छा क्या कह रहा था?'
'कहता क्या? अभी तो एक ही खुराक दी है कि पेट में दर्द
शुरू हो गया। मुझसे पूछ रहा था कि बताइए जरा मेरी नजर कहां गढ़। हैं।'
'सब्र करने दो बेटा को जरा अभी। वक्त आएगा तो वो भी बता देंगे।'
'वह तो जब बताएंगे तब बताएंगे। फिलहाल तो हमें उस बात
का फायदा उठा लेना चाहिए जिसकी तरफ मेरा भी ध्यान नही गया था और वह अपनी बेवकूफी से मुझे बता गया।'
'कौन सी बात।'
'अपने सारे आदमियों को एक-एक अखबार लेकर पूरे शहर में धूम जाने के लिए कहो।' जगन सेठ ने कहा-'वे शहर के हर आदमी को अखबार दिखाकर पूछेगे कि साहब यह मेयर की नजर कहा गड़ी हुई हो सकती है।'
'उससे क्या होगा?'
'सारा पहर आपस में यह सवाल करने लग जायेगा कि यह
मेयर की नजर कहां गड़ी हुई हो सकती हैं।'
'तब हम बताएंगे कि मेयर की नजर कहां पड़ी हुई हैं।'
'नहीं हमें कुछ भी बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी। शहर की
जनता बब सवाल करने लगेगी तो जबाब ही खुद-ब-खुद ढूंढ़ निकालेगी। हम तुम्हें कहने की कुछ भी जरूरत नहीं पड़ेगी।'
'मान गए जगन सेठ तुम्हारी अक्ल को।'
'उस मेयर के बच्चे ने तो शायद रसगुल्ला समझकर यह अखबारी लड़ाई छेड़ी होगी। लेकिन मैं उसे लोहे के चने चबवा दूंगा। तुम देबते जाओ जरा।'
'अब एक खबर हमसे भी सुन लो।'
'क्या?'
'उस फारेस्ट आफिसर के दूसरे साथी का पता लग गया है।'
तुमने मेरे मना करने के बावजूद फिर जंगल का रूख किया?'
कालिया को तुरन्त अपनी भूब का अहसास हुआ कि यह बात जगन सेठ से कहनी नहीं थी।
एकदम संभलकर बोला-'जब तुमने मना कर दिया तो फिर भला मेरा जंगल से क्या बास्ता। वो तो यूं ही सुपरवाईजर की भेजी हुई खबर पहुंच गई थी मेरे पास।'
'तब ठीक है।' जगन सेठ का शान्त स्वर सुनाई दिया-'कौन है दो आदमी।'
'जगतार है उसका नाम। अभी इससे ज्यादा उसके बारे में
और कुछ नहीं मालूम हुआ। हुक्म हो तो पता करवाऊं।' 'अभी तुम उस बारे में कुछ करो। जंगन के बारे में एकदम से
भूल जाओ फिलहाल। वह अखबार बाला काम जो तुम्हें बताया है उसे करो।'
कालिया ने भैरों को फोम करके वह अखबार वाला काम-बता दिया उसे। लेकिन वह जंगल और उसके फारेस्ट आफिसर को भूला नहीं।
शाम को हरिया और रघुबर ने आकर खबर दी। 'साधना रोज दिन में जगतार से मिलने जाती है छुपकर।'
'अच्छा तो वह आदमी हमारे फारेस्ट आफिसर की बहन क यार है।' कालिया गर्दन हिसाता हुआ बोला-'उसके पीछे-पीधं शहर से यहां तक पहुंच गया।'
'कुछ चक्कर समझ में नहीं आ रहा भईया।' हरिया बोला, 'अपना फारेस्ट आफिसर जगतार को पहचानता तो है नहीं। सुपरवाईजर ने जो उनकी पहले दिन की मुलाकात देखी उससे तो उसे यही लगता है।' 'इसका मतलब है कि फारेस्ट आफिसर को उन दोनों के मिलने का भी पता नहीं होगा।'
'नहीं, जद वो बाहर चला धाता हं तब वह निकलती है उससे मिलने के लिए।
हरिया की बात में लुकमा लगाया रघुबर ने-'और उसके लौट के आने से पहले ही वापिस आ जाती है बंगले में।'
'अच्छा?' गम्भीरता से सिर हिलाया कालिया ने-'और अपने यार फारेस्ट आफिसर को पता ही नहीं कि उसकी सती साध्वी बहन क्या गुल खिना रही है। बेचारा।'
कहकर सबने नान मुर से बगाई और हुक्का गुड़युड़ाया। 'कहो तो उस्ताद हम बता दें?' रघुबर बोला।
'नहीं।' कालिया ने एकदम डपटकर कहा-'किसी को कुछ बताने पी जरूरत नहीं है। यहां तक कि अपने आदमियों से भी इसका कोई जिक्र नहीं करना है। यह बिलकुल सीक्रेट मामला सौंपा है मेंने तुम दोनों को।' वे दोनों चुप रह गये।
'कल तुम दोनों एक काम करना।' कुछ सोचकर बोला
कालिया।
'क्या?'
'गोदाम मैं से जानवरों की खाल ले लेना और कैमरा भी।' उसके साथ ही कालिया ने उन्हें अच्छी तरह से समझाया कि क्या करदा है।
सममाने के बाद बोला-'बहुत होशियारी से काम करना है।
और उस आदमी को जरा भी भनक न पड़ने पाए तुम लोगों की। समझ गए ना?'
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