माँ का दुलारा

 मेरा नाम अनिल है. घर मे बस मैं और मेरी मोम रीमा है. मोम और डॅडी का बहुत पहले डाइवोर्स हो गया था. उसके बाद डॅडी से हमारा कोई संपर्क नही रहा है. डॅडी दुबाई मे जा बसे है, वाहा उन्होंने दूसरी शादी कर ली है. दाइवोर्स के बाद मैंने मोम के साथ रहने का फ़ैसला किया था. तब मैं सिर्फ़ आठ साल का था. दोनों मे बहुत झगड़ा होता था इसलिए एक तराहा से जब मोम अलग हुई तो मेरी जान मे जान आई. मैं मोम से बहुत प्यार करता था, उसके बिना रहने की कल्पना भी नही कर सकता था.

हमारा घर मुंबई मे है. मोम ने दाइवोर्स के बाद दिल्ली मे नौकरी पकड़. ली और मुझे पूना मे होस्टल मे रख दिया कि मेरी पढ़ाई मे खलल ना हो. मैं काफ़ी रोया चिल्लाया पर मोम के समझाने पर आख़िर मान गया. उसने मुझे बाँहों मे भर कर प्यार से समझाया कि उसे अब नौकरी करना पड़ेगी और एक होस्टल मे रहना होगा. इसलिए यही बेहतर था कि मैं होस्टल मे रहूं. तब हमारा खुद का घर भी नही था और मोम मुझे नानाजी के यहाँ नही रखना चाहती थी. बड़ी स्वाभिमानी है.

पिछले साल मोम ने नौकरी बदल कर यहाँ मुंबई मे नौकरी कर ली. यहाँ उसे अच्छी काफ़ी सैलरि वाली नौकरी मिल गयी. घर भी किराए पर ले लिया. मेरा भी एच.एस.सी पूरा हो गया था इसलिए मोम ने मुझे फिर यहाँ अपने पास बुला लिया की आगे की पढ़.आई यही करूँ.

अब तक मैं साल मे सिर्फ़ दो तीन बार मोम से मिलता था, गरमी और दीवाली की छुट्टी मे.वह सारा समय मज़ा करने मे जाता था. मोम भी नौकरी करती थी इसलिए साथ मे रहना कम ही होता था, बस रविवार को. पिछले एक दो सालों से, ख़ास कर जब से मैंने किशोरावस्था मे कदमा रखा, धीरे धीरे मोम के प्रति मेरा नज़रिया बदलने लगा था. अब मैं उसे एक नारी के रूप मे भी देखने लगा था. होस्टल मे रहकर लड़के बदमाश हो ही जाते हैं. तराहा तराहा की कहानियाँ पढ़ते है और पिक्चर देखते है. मेरे साथ भी यही हुआ. उन कहानियों मे कई मोम बेटे के कहानियाँ होती थीं. बाद.आ मज़ा आता था मैं ज़्यादातर राज शर्मा के ब्लॉग कामुक-कहानियाँ.ब्लॉगस्पोट.कॉम पर सेक्सी कहानियाँ पढ़ता था पर कभी कभी जब मैं मोम और मेरी उन कहानियों जैसी स्थिति मे होने की कल्पना करता था तो पहले तो सब अटपटा लगता था. मोम आख़िर मोम थी, मुझे प्यार करने वाली, मुझपर ममता की वर्षात करने वाली. बहुत अपराधिपन भी महसूस होता था पर मन को कौन पिंजरे मे डाल पाया है.

जब मैं एच.एस.सी के बाद घर रहने वापस आया तो मोम के साथ हरदम रहकर उसके प्रति मेरा आकर्षण चरमा सीमा पर पहुँच गया. मोम अब करीब सैंतीस साल की है. मोम का चेहरा बहुत सुंदर है, कम से कम मेरे लिए तो वा सबसे बड़ी ब्यूटी क्वीन है. शरीर थोड़ा मांसल और मोटा है, जैसा अक्सर इस उमर मे स्त्रियों का होता है, पर फिगर अब भी अच्छा है. मोम रहती एकदमा टिप टाप है. आख़िर एक बड़ी मलतिनेशनल मे आफिसर है. पहले वह ड्रेस और पैंट सूट भी पहनती थी, आजकल हमेशा साड़ी पहनती है. कहती है कि अब इस उमर मे और कुछ अच्छा नही लगता. पर साड़ियाँ एकदमा अच्छी चाइस की होती हैं. चेहरे पर सादा पर मोहक मेकअप करती है ज़रा सी गुलाबी लिपस्टिक भी लगा लेती है जिससे उसके रसीले होंठ गुलाब की कलियों से मोहक लगने लगते है.

जब मैं वापस मोम के साथ रहने आया तब अक्सर दिन भर अकेला रहता था. उसे इतना काम रहता था कि वह अक्सर रात को देर से आती थी. शनिवार को भी जाना पड़.आता था. बस रविवार हम साथ बिताते थे. तब मुझसे खूब गप्पे लगाती, मेरे लिए ख़ास चीज़े बनाती और शामा को मेरे साथ घूमने जाती.

पर अब मैं उससे बात करने मे थोड़ा झिझकने लगा था. मेरी नज़र बार बार उसके मांसल शरीर पर जाती. घर मे वह गाउन पहनती थी और इसलिए तब उसके स्तनों का उभार उस ढीले गाउन मे छिप जाता. पर जब्वह साड़ी पहने होती और उसका पल्लू कभी गिरता तो मेरी नज़र उसके वक्षास्तल के मुलायम उभार पर जाती. उसके ब्लओज़ थोड़ा लो कट है इसलिए स्तनों के बीच की खाई हमेशा दिखती थी. अगर वह झुकती तो मेरे सारे प्राण मेरी आँखों मे सिमट आते, उसके उरजों के बीच की वह गहरी वैली देखने को. वह अगर स्लीवलेस ब्लाउz पहनती तो उसकी गोरी गोरी बाँहे मुझे मंत्रमुग्धा कर देतीं. मोम की कांखे बिलकुल चिकनी थीं, वह उन्हे नियमित शेव करती थी. स्लीवलेस ब्लाउz पहनने के लिए यहा ज़रूरी था. पीछे से साड़ी और ब्लाउz के बीच दिखती उसकी गोरी कमर देखकर मैं दीवाना सा हो जाता. थोड़ा मुटापे के कारण उसकी कमर मे अक्सर हल्के टायर से बन जाते. और मोम की दमकती चिकनी गोरी पीठ, उसपरासे मेरी नज़र नही हटती थी! उसके लो कट के ब्लओज़ मे से उसकी करीब करीब पूरी पीठ दिखती. मोम की त्वचा बहुत अच्छी है, एकदम कोमल और निखरी हुई.

और उसके नितंबों का तो क्या कहना. पहले से ही उसके कूल्हे चौड़े हैं. मुझे याद है कि बहुत पहले जब उसका बदन छरहरा था, तब भी उसके कूल्हे ज़्यादा चौड़े दिखते थे. वह उसपर कई बार झल्लाति भी, क्योंकि उसे लगता कि वह बेडौल लगती है. पर उसे कौन बताए की उन चौड़े कुल्हों के कारण मेरी नज़रों मे वह कितनी सुंदर दिखती थी. ख़ासकर जब वह चलती तो उसे पीछे से देखने को मैं आतुर रहता था. मोटे मोटे तरबूजों जैसे नितंब और बड़े स्वाभाविक तरीके से लहराते हुए; मुझे लगता था कि वही मोम के पीछे बैठ जाउ और अपना चेहरा उनके बीच छुपा दूँ.

और मोम के पाँव. एकदम गोरे और नाज़ुक पाँव थे उसके. मोतिया रंग का नेल पेंट लगी वो पतली नाज़ुक उंगलियाँ और चिकनी मासल एडी. वह चप्पले और सैंडल भी बड़ी फैशनेबल पहनती थी जिससे वो और सुंदर लगते थे. इसलिए मोम के पैर छूने मे मुझे बहुत मज़ा आता था. और ख़ासकर पिछले एक साल से जब मैं होस्टल से आता या वापस जाता, ज़रूर झुककर दोनों हाथों से उसके पैर छूटा, अच्छे से और देर तक; उसे वह अच्छा नही लगता था.

"क्यों पैर छूता है रे मेरे, मैं क्या तेरे नानी हू. बंद कर दे." वह अक्सर झल्लाति पर मैं बाज नही आता था. मन मे कहता

"मॅमी, तू नाराज़ ना हो तो मैं तो तेरे पाँव चुम लूँ." एस डी बर्मन का एक गाना मुझे याद आता, मोम के चरणामृत के बारे मे "... ये चरण तेरे माँ, देवता प्याला लिए, तरसे खड़े माँ!" उस गाने मे मों के प्रति भक्ति है पर मेरे मन मे यहा गाना मीठे नाजायज़ ख़याल उभार देता.

कम से कम यह अच्छा था कि अब मोम मुझे प्यार से अपनी बाँहों मे नही भरती थी जैसा वह बचपन मे करती थी. मैं बड़ा हो गया था. यहा अच्छा ही था क्योंकि अब मोम को देखकर मैं उत्तेजित होने लगा था. जब वह घर का काम करती और उसका ध्यान मेरी ओर नही होता तब मैं उसे मन भर कर घुरता. मेरा लंड तन्नाकार खड़ा हो जाता था. कभी उसके सुंदर चेहरे और रसीले होंठों को देखता, कभी उसके नितंबों को और कभी उसकी पीठ और कमर पर नज़र गढ़ाए रहता. उसके सामने किसी तरह से मैं कंट्रोल कर लेता था पर मौका मिले तो ठीक से घूर कर मैं उसकी मादक सुंदरता का मन ही मन पान करते हुए अपने लंड पर हाथ रखकर सहलाने लगता.

कभी मोम सोफे पर बैठकर सामने की सेती पर पैर रख कर टीवी देखती या कुछ पढ़ती तो मेरा मन झुम उठता क्योंकि अक्सर उसका गाउन सरककर उपर हो जाता और उसके गोरे पैर और मांसल चिकनी पिंडलियाँ दिखाने लगती. मैं भी वही एक किताब लेकर बैठ जाता और उसके पीछे से उन्हे देखता रहता और एक हाथ से अपना लंड सहलाता.

अक्सर मोम पैर पर पैर रखकर एक पैर हिलाती, तो उसकी उंगलियों से लटकी चप्पल हिलने लगती. यहा देखकर तो मैं और मदहोश हो जाता. पहले ही मैं उसके पैरों और चप्पालों का दीवाना था, फिर वह पैर से लटककर नाचती रबर की मुलायम चप्पल देखकर मुझे लगता था कि अभी उसे हाथ मे ले लूँ और चुम लूँ, चबा चबा कर खा जाउ. एक बार मोम ने मुझे अपने पैर की ओर घुरते हुए देख लिया था, तुरंत पैर हिलाना बंद करके देखने लगी कि कुछ लगा है क्या, मैंने बात बना दी कि मोम शायद एक कीड़ा चढ़ा था, उसे देख रहा था.

मोम को पसीना भी ज़्यादा आता था. उसके ब्लओज़ की कांख भीगी रहती थी. वह नज़ारा भी मुझे बहुत उत्तेजित करता था. कई बार मैंने कोशिश की की कपड़े बदलते समय उसे देखु. पर वह हमेशा अपने बेडरूम मे दरवाजा लगाकर ही कपड़े बदलती. सोचती होगी क़ी अब बेटा बड़ा हो गया है.

मैं घर के काम करने मे उसकी खूब मदद करता, जो वह कहती तुरंत भाग कर करता. वह भी मुझ पर खुश थी. मैं परेशान था, आख़िर क्या करूँ, कुछ समझ नही पा रहा था. बीच बीच मे लगता कि मोम के बारे मे ऐसा सोचना पाप है पर उसके मादक आकर्षण के आगे मैं विवश हो गया था. मैं अक्सर यहा भी सोचता की मोम जैसी सुंदर नारी आख़िर अकेले कैसे रहती है, क्या उसे कभी सेक्स की चाहत नही होती? क्या उसका कोई अफेयर है? लगता तो नही था क्योंकि बेचारी आफ़िस से आती तो थॅकी हुई. उसे समय ही कहाँ था कुछ करने के लिए. और घर मे भी अब वह अकेली नही थी, मैं जो था.

रात को और दिन मे भी अकेले मे (कालेज खुलने मे अभी समय था, एडमिशन भी नही हुए थे) उसके रूप को आँखों के सामने को लाकर मैं हस्तमैथुन करता, कल्पना करता की मोम नग्नावस्था मे कैसी लगेगी. मन ही मन अपनी फ़ैंतसी मे उससे तरह तरह की रति करता. मोम को मैं अच्छा लगता हम और वह बड़े अधिकार से मुझसे मन चाहे संभोग करा रही है, यहा मेरी पेट फ़ैंतसी थी.

अब हौसला करके मैंने उसके अंतर्वस्त्रा चुराने शुरू कर दिए थे. उसकी ब्रा और पैंटी मैं चुपचाप उठा लाता और अकेले मे घर मे उनमे लंड लपेट कर मुत्ता मारता. मोम के पास बड़ा अच्छा कलेक्शन था. उनमे से एक लेस वाली सफेद ब्रा और एक नायलाँ की काली ब्रा मेरी ख़ास पसंद की थीं. उन्हे सूँघते हुए मुझे ऐसा लगता जैसे मई मों के आगोश मे उसकी छाती मे सिर छुपाए पद.आ हुआ हम. लंड पर उनका मुलायामा स्पर्श मुझे दीवाना कर देता.

एक दो बार मैं पकड़ा जाता पर बच गया. अक्सर मुत्ता मारने से मेरा वीर्या उनमे लग जाता. तब मैं धो कर दिन मे उन्हे सूखा कर वापस रख देता. एक दिन सुबह मोम परेशान लगी. मैंने पूछा तो बोली कि उसकी काली ब्रा नही मिल रही है. वह काली साड़ी पहन कर आफ़िस जाना चाहती थी. आख़िर झल्ला कर दूसरी साड़ी पहन कर चली गयी. ब्रा मिलती कैसे, रात को मुत्ता मार कर मैंने उस ब्रेसियार को अपने कमरे मे छुपा दिया था. मुझे क्या मालूमा कि आज वह उसे ही पहनेगी! मोम के जाने के बाद उसे धोकर सुखाकर मैंने मोम की अलमारी मे सेडियीओ के बीच छुपा दिया. बाल बाल बचा क्योंकि रात को वापस आकर मोम ने सारी अलमारी ढूँढना शुरू कर दी. जब ब्रा मिली तो वह निश्चिंत हुई. बोली

"अनिल, मैंने भी देखो कहाँ रख दी थी, इसीलिए नही मिल रही थी, मुझे लगा था कि गुम तो नही गयी या बाहर गैलरी से सुखाते समय गिर तो नही गयी."

उसके बाद मैंने उसकी अलमारी से ब्रा चुराना बंद कर दिया. मोम के जाने के बाद धोने को डाली उसकी ब्रा और पैंटी से काम चलाने लगा. यहा और भी मतवाला काम था. उनमे मोम के शरीर की और उसके पसीने की भीनी खुशबू छुपी होती. उसकी पैंटी के क्रेच मे से मोम की चूत की मतवाली महक आती. अब तो मैं मस्त होकर उन्हे मुँहा मे भर लेता और कस कर मूठ मारता. फिर कामवाली बाई आने के पहले उन्हे धोने को रख देता. मेरी दोपहर तो रंगीन हो गयी पर रात को परेशानी होनी लगी.

रात की परेशानी दूर करने के लिए मैंने मोम की चप्पलो का सहारा लेना शुरू कर दिया. जैसा मैंने बताया, मोम के पैर बड़े खूबसूरत हैं. उसके पास सात आठ जोड़ी चप्पले और सैंडल भी हैं, अधिकतर हाई हिल की. रात को मैं मोम के सो जाने के बाद बाहर के शू-रैक से चुपचाप एक जोड़ी उठा लाता. फिर उन्हे लंड से सहलाता, चूमता, चाटता और मूठ मारता. अगर विर्य सैंडल पर छलक जाता तो ठीक से पोंछ कर वापस रख देता. वैसे सबसे अच्छी मुझे मोम की रबर की बाथरुम स्लीपर लगती थी. नाज़ुक सी गुलाबी वा चप्पल जब मोम के पैरों मे देखता और चलते समय होने वाली सपाक सपाक की आवाज़ सुनता जो मोम के तलवं से चप्पल के टकराने से होती थी तो मैं अपना संयम खोने लगता था. दोपहर को वह चप्पल मैं ले आता था पर रात को मोम उसे पहने होती और सोने के बाद उसके बेडरूमा से उन्हे उठाने का मेरा साहस नही था.

इसी चक्कर मे एक दिन आख़िर मैं पकड़.आ गया. एक हिसाब से अच्छा ही हुआ क्योंकि उस घटना ने आख़िर मोम और मेरे बीच की सारी दीवारे हटा दी

उस शनिवार रात को मोम देरी से आई. थॅकी हुई थी इसलिए खाना खाकर तुरंत सो गयी. गर्मी के कारण उसके कपड़े गीले हो गये थे इसलिए उसने सारे कपड़े बदलकर बाथरुम मे डाल दिए. मेरी चाँदी हो गयी. मोम के सोने के बाद मैं उसका ब्लओज़, ब्रा और पैंटी उठा लाया. सारे पसीने से तर थे. साथ ही उसने उस दिन पहने हुए हाई हिल के सैंडल भी ले लिए. मोम गहरी नींद मे सोई थी इसलिए चुपचाप उसके बेडरूम से उसके स्लीपर भी उठा लाया. आज तो मानों मुझे खजाना मिल गया था.

उस रात मैंने इतनी मूठ मारी जितनी कभी नही मारी होगी. मोम के कपड़े सूँघे, उन्हे मुँह मे लेकर चूसा कि मोम के शरीर का कुछ तो रस मिल जाए. सैंडल छाती से पकड़े, उन्हे मुँह से लगाया और चूमा, लंड को स्लीपरों के मुलायम स्ट्राइप्स मे फंसाया, चप्पालों के नरम नरम तलवे पर रगड़ा और शुरू हो गया. तीन चार बार झाड़. कर मुझे शांति मिली.

पहले मेरा यहा प्लान था कि तुरंत मैं उठाकर सब चीज़े चुपचाप जगहा पर रख दूँगा. पर दो तीन घंटे के घमासान हस्तमैथुन के बाद उस तृप्ति की भावना के जादू ने मेरी आँखे लगा दीं. ऐसा गहरा सोया कि सुबहा देर से आँख खुली. हड़बड़ा कर उठा तो देखा पास के टेबल पर चाय रखी है. ये कहानी कामुक-कहानियाँडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम की है याने मोम मेरे कमरे मे आई थी! मैं मूरख जैसा रात को दरवाजा भी ठीक से लगा कर नही सोया था. और मेरे बिस्तर पर मोम के कपड़े और सैंडल पड़े थे. स्लीपर गायब थी. पाजामे मे से लंड भी निकल कर खड़ा था, जैसा सुबहा को होता है. मोम ने ज़रूर देख लिया होगा! अपनी स्लीपर भी उसने पहन ली होगी पर उसे कितना अटपटा लगा होगा कि उसका बेटा उसके कपड़ो और चप्पालों के साथ क्या कर रहा था!

मुझे समझ मे नही आ रहा था कि कैसे मोम को मुँह दिखाउ. आख़िर किसी तरह कमरे के बाहर आया. मोम किचन मे थी. बिना कुछ कहे उसने मुझे फिर चाय बना दी. उसका चेहरा गंभीर था.

मैं किसी तरह चाय पीकर भागा. नहाया और फिर कमरे मे एक किताब पढ़ने बैठ गया. मोम दिन भर कुछ नही बोली, दोपहर को बाहर निकल गयी. उसे ज़रूर बुरा लगा होगा. आख़िर मैं भी क्या कहता!

रात को खाने के बाद मोम ने आख़िर मुझे पूछा "ये क्या कर रहा था तू मेरे कपड़ो और चप्पालों के साथ?"

मैं चुप रहा, सिर्फ़ सिर झुका कर सॉरी बोला. मोम ने और कठोर स्वर मे पूछा. "ये तूहमेशा करता है लगता है! और उस दिन मेरी काली ब्रा नही मिल रही थी. तूने ही ली थी ना? और चंदा बाई भी कपड़े ठीक से नही धोती, मुझे अपनी ब्रा और पैंटी मे एक दो बार कुछ दाग से मिले थे. तूने लगाए क्या ये गंदी हरकते करते हुए?"

मैं चुप रहा. मोम अब मुझे डाँटने लगी. काफ़ी गुस्से मे थी. बोली कि उसे उम्मीद नही थी कि मैं ऐसा करूँगा. ऐसी गंदी आदते मुझे कहाँ से लगीं? और वह भी अपनी मोम के कपड़ो और चप्पालों के साथ? अंत मे गुस्से मे आकर उसने मुझे एक तमाचा भी रसीद कर दिया और फिर मुझे झिंझोड़. कर बोली

"बोल, ऐसा क्यों किया?" मोम ने अब तक कभी मुझे पीटा नही था. मैं रुआंसा होकर आख़िर बोला

"सॉरी मॉम, अब नही करूँगा, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो इसलिए ऐसा किया" वह एक क्षण स्तब्ध रहा गयी. कुछ बोलना चाहती थी पर फिर चुप ही रही और अपने कमरे मे चली गयी.

उसके बाद के तीन चार दिन बड़े बुरे गुज़रे. मोम ने मुझसे बात करना ही छोड़. दिया था. ऑफीस से और देर से आती थी और जल्दी सुबह घर से निकल जाती थी. बेडरूम और अलमारी मे ताला लगा देती थी. कपड़े भी धोने को नही डालती थी बल्कि आकर खुद धोती. मेरा भी लंड खड़ा होना बंद हो गया, सारा हस्तमैथुन बंद हो गया. मैने एक दो बार और मोम को सॉरी कहा पर उसने जवाब नही दिया. हाँ उसका कड़ा रूख़ फिर थोड़ा नरम हो गया.

अगले शनिवार को मोम की छुट्टी थी. शुक्रवार को वह जल्दी घर आ गयी. मेरी पसंद का खाना बनाया. मुझसे ठीक से कुछ बाते भी कीं. मैंने चैन की साँस की ली और कान को हाथ लगाया कि अब ऐसा कुछ नही करूँगा. असल मे मैं मोम को बहुत प्यार करता था, एक नारी की तरह ही नही, एक बेटे के तरह भी और उसे खोना नही चाहता था.

रात को मैं अपने कमरे मे पढ़. रहा था तब मोम अंदर आई. उसने गाउन पहन रखा था. सारा मेकअप वग़ैरहा धो डाला था. चेहरा गंभीर था, एक टेंशन सा था उसके चेहरे पर जैसे कुछ फ़ैसला करना चाहती हो. आकर मेरे पास पलंग पर बैठ गयी. मैं थोड़ा घबरा गया, ना जाने क्या बाते करे, फिर डाँटने लगे.

"अनिल, तू बड़ा हो गया है, तेरी कोई गर्ल फ़्रेंड नही है?" उसने मेरे बालों मे हाथ चलाकर पूछा.

"नही माम, मुझे कोई लड़की अच्छी नही लगती आज कल" मैंने कहा.

"तो फिर क्या अच्छा लगता है?" उसने पूछा. ना जाने कैसे मेरे मुँह से निकल गया.

"तुम बहुत अच्छी लगती हो ममी, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हू" कहने के बाद फिर मैंने अपने आप को कोस डाला कि ऐसा क्यों कहा. मोम फिर नाराज़ हो गयी तो सब गड़बड़. हो जाएगा.

"अरे पर मैं तेरी मॉं हू. तू भी मुझे अच्छा लगता है पर एक बेटे की तरह. मोम के बारे मे ऐसा नही सोचते बेटे जैसा तू सोचता है" मोम ने मेरे चेहरे पर नज़र गढ़ाकर कहा. आज बात कुछ और थी. मोम शायद मुझसे सब कुछ डिस्कस करना चाहती थी. मैंने साहस करके कहा डाला.

"मैं क्या करूँ माँ, तुम बहुत सुंदर हो, मुझसे रहा नही जाता"

"अरे तूने ही कहा तेरी गर्ल फ़्रेंड नही हैं, तूने और किसी को देखा ही नही है. और मान भी ले कि मैं तुझे अच्छी लगती हू तो यहा तेरा वहम है. आख़िर मेरी उमर हो चली है, मोटी भी हो गयी हम. तेरे जैसे जवान लड़के को तो कमसिन युवतियाँ भानी चाहिए, मुझा जैसी अधेड़ औरते नहीं" मोम ने गंभीर स्वर मे कहा.

"नही माँ, मुझे उनमे कोई दिलचस्पी नही है. तुम नही जानती तुम कितनी खूबसूरत हो. पर मैं तेरा दिल नही दुखाना चाहता ममी, अब मैं कोई गंदी बात नही करूँगा, ठीक से रहूँगा." मैं अपनी बात पर अड़ा रहा. मोम झल्ला कर उठ कर खड़ी हो गयी. उसने एक निश्चय कर लिया था शायद.

"कैसा मूर्ख लड़का है, समझता ही नही मैं क्या कहा रही हू. तू नादान है, आज तुझे समझाना ही पड़ेगा. इस बात का निपटारा मैं आज ही करना चाहती हू कि तू कम से कम अपना यहा पागलपन तो बंद करे. तू फिर शुरू हो जाएगा मैं जानती हू, ऐसी चीज़ों की आदत जल्दी नही जाती. तू बस मेरा चेहरा देखता है और वो तुझे अच्छा लगता है. माना की मेरी सूरत अच्छी है पर शरीर तो बेडौल हो गया है. चल आज तुझे दिखाती हू, फिर शायद तेरा यहा वहम दूर हो जाए." उसने दरवाजा बंद किया और अपना गाउन उतारने लगी. मैं हक्का बक्का देखता ही रहा गया. मोम ने मेरे चेहरे से नज़र हटाकर दूसरी ओर देखते हुए गाउन उतार दिया और बोली

"देख, कैसी मोटी और बेढब हू. अब बोल कि तुझे अच्छी लगती हू" उसके चेहरे पर एक कठोरता सी आ गयी थी. मोम अब सिर्फ़ ब्रा और पैंटी मे मेरे सामने थी. आज उसने अपने अच्छे मादक अंतर्वस्त्रा नहीं, एक पुरानी काटन की ब्रा और बड़ी सी पुरानी सफेद पैंटी पहन रखी थी. शायद यहा सोच रही थी कि अगर मैं सादे पुराने अंतर्वस्त्रों मे लिपटे उसके मध्यमवाइन शरीर को देखूँगा तो मेरी चाहत अपने आप ठंडी हो जाएगी. ऐसा करने मे उसे कितनी मनोवयता हुई होगी, मैं कल्पना कर सकता था. आख़िर कौन औरत खुद ही किसी से अपने आप को बेढब कहलवाने की ज़िद करेगी.

पर हुआ उल्टा ही. मोम का अर्धनगञा शरीर मेरे मन मे ऐसी मतवाली हलचल पैदा कर गया कि इतने दिनों बाद मेरा लंड फिर सिर उठाने लगा. मोम नही जानती थी कि मैं अच्छी तरह से इस बात से वाकिफ़ था कि मोम का शरीर मांसल और भरा हुआ है. वह यह भी नही जानती थी कि उसका भरा पूरा मोटा सा शरीर उसका आकर्षण मेरे लिए और बढ़ा देता था.

मैं मन भर कर मोम के अर्धनगञा रुप को देखने लगा. उसकी जांघे अच्छी मोटी थी पर एकदमा चिकनी और गोरी. पैंटी बड़ी होने से और कुछ नही दिख रहा था पर चौड़े कूल्हे और भारी भरकम नितंबों का आकार उसमे से दिख रहा था. पेट भी थोड़ा थुलथुल था पर उस गोरी चिकनी त्वचा और कमर मे पड़ते मासल बलों से वह बाला की मादक लग रही थी. गोरे गोरे फूले हुए पेट मे गहरी नाभि उसके इस रूप को और मतवाला कर रही थी. पुरानी ढीली ढाली ब्रा मे उसके स्तन थोडे लटक आए थे पर उन माँस के मुलायामा गोलों को देखकर ऐसा लगता था कि अभी इन्हे चबा कर खा जाउ. लंबी गोरी बाँहे तो मैं कई बार देख चुका था पर इस अर्धनगञा अवस्था मे भी और सुंदर लग रही थीं. चिकने भरे हुए कंधे जिनपर ब्रा के स्ट्रैप लगे हुए थे! क्या नज़ारा था. मोम मूडी तो सिर्फ़ ब्रा के स्ट्रैप से धकि उसकी गोरी चिकनी पीठ भी मुझे दिखी. मोम बाजू मे नज़र करके एक बार पूरी घुमा कर मुझसे बोली.

"देख लिया अपनी अधेड़. मोम को? अब तो तसल्ली हुई कि मुझमे ऐसा कुछ नही है जो तुझे भाए. देख मैं कितनी मोटी हो गयी हू, नीचे का भाग देख, बिलकुल कितना चौड़ा और मोटा हो गया है" मैं कुछ ना बोला, बस उसे देखता रहा. मेरी चुप्पी पर झल्ला कर वह बोली

"अरे चुप क्यों है, कुछ बोल ना? वैसे इतना पटारे पाटर बोल रहा था, अब साँप सूंघ गया क्या"" कहकर उसने मेरी ओर देखा तो देखती रह गयी. मेरा लंड अब तन कर खड़ा था और इतना तना था कि पाजामे के ढीले बटन खोल कर बाहर आ गया था. उसकी नज़र लंड पर पड़ी और वह आश्चर्या से उसकी ओर देखने लगी. धीरे धीरे उसके चेहरे की कठोरता कम हुई और एक अजीब ममता और चाहत उसकी आँखों मे झलकने लगी. उसने मेरे चेहरे की ओर देखा. उसमे उसे ज़रूर तीव्र चाहत और प्यार दिखा होगा.

"लगता है कि सच मे मैं तुझे अच्छी लगती हू! मुझे लगा था कि ..." अपनी बात पूरी ना कर के मोम आकर मेरे पास बैठ गयी. उसकी आँखे मेरे लंड पर से हट ही नही रही थी. मैं भले ही यहा खुद कह रहा हू पर मेरा लंड काफ़ी सुंदर है, गोरा और कसा हुआ, भले ही बहुत बड़ा ना हो, फिर भी करीब करीब साढ़े पाँच- छः इंच का तो है ही.

मोम ने अचानक झुक कर मेरा गाल चूमा लिया. उसका चेहरा अब गुलाबी हो गया था, खिल कर उसकी सुंदरता मे और चार चाँद लगा रहा था. मेरे कुछ ना कहने पर भी उसने भाँप लिया था कि वह मुझे कितनी अच्छा लगती थी. और एक औरत के लिए इससे बड़े कामपलिमेंट और क्या हो सकता है, ख़ास कर जब वह खुद अपनी सुंदरता के प्रति आश्वस्त ना हो. मेरा लंड अब ऐसा थारतरा रहा था जैसे फट जाएगा. इतनी खुमारी मैंने जिंदगी मे कभी महसूस नही की थी.

"कितना प्यारा है! तू सच मे बड़ा हो गया है बेटे" मोम मेरे पास सरककर बोली. फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया और हिचकते हुए मेरा लंड मुठ्ठी मे पकड़. लिया. वह ऐसे डर रही थी जैसे काट खाएगा.

"कितना सूज गया है! तुझे तकलीफ़ होती है क्या?" उसकी हथेली के मुलायम स्पर्श से मैं ऐसा बहका कि अचानक एक सिसकी के साथ मैं स्खलित हो गया. वीर्य की फुहारे लंड मे से निकलने लगीं. मोम पहले चौंक गयी और अपना हाथ हटा लिया पर मैंने तड़प कर उससे लिपटाते हुए कहा."पकडो ना मम्मी, मत छोड़ो" उसने फिर मेरे लंड को पकड़. लिया और तब तक पकड़े रही जब तक पूरा झाड़. कर वह मुरझा नही गया. मोम ने फिर मुझे गाल पर चूमा

"बिलकुल पागला है तू अनिल, मुझे क्या मालूमा था कि मैं तुझे इस कदर अच्छी लगती हू. देख सब पाजामा गीला हो गया है, चादर भी खराब हो गयी है. चल उठ और निकाल दे. चादर भी डाल दे धोने को. मैं अभी आई. तेरी इस हालत का कोई इलाज करना पड़ेगा मुझे ही"

मुझे एक बार और चूमा कर वह वैसे ही गाउन लेकर कमरे से बाहर चली गयी. मैंने पाजामा निकाला और तावेल बाँध कर चादर बदल दी. मेरा दिल खुशी से धड़क रहा था कि कम से कम अब वह मुझसे नाराज़ तो नही थी, यह मेरे लिए बहुत था. पर मैं सोच रहा था कि आगे क्या होगा, मोम अब क्या करेगी.

इसका जवाब दस मिनिट बाद मिला जब मोम फिर मेरे कमरे मे आई. उसकी काया पलट गयी थी. वह काला स्लीवलेस ब्लाउz और काली शिफान की साड़ी पहने हुए थी. मेकअप भी कर लिया था. बालों का जुड़ा बाँध लिया था जैसे वह बाहर जाते समय करती थी. अंदर की ब्रा बदल ली थी क्योंकि पतले ब्लाउz मे से उसकी वही काली मेरी मनपसंद ब्रा अंदर दिख रही थी. मोम इतनी सुंदर दिख रही थी जैसे औरत नही साक्षात अप्सरा हो. मैंने चकराकर पूछा.

"ये क्या मोम, कही जाना है" मों मुझे बाहों मे लेते हुए बोली

"हाँ बेटे, मेरे कमरे मे जाना है, चल आज से तू वही सोएगा." मैंने मोम की आँखों मे देखा, उसमे अब प्यार, दुलार और एक चाहत की मिली जुली असिम भावना थी. इतने पास से मोम के रसीले लिपस्टिक से रंगे होंठ देखकर अब मुझसे नही रहा गया. धीरे से मैंने उसके होंठ चुम लिए. मोम ने मुझे आलिंगन मे लेकर मेरा गहरा चुंबन लिया. उनके फूल जैसे कोमल स्पर्श से और उसके मुँह की मिठास से मैं सिहर उठा.

अपना चुंबन तोड़. कर मोम ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने कमरे मे ले गयी. उसने टेबल लैंप जलाया और उपर की बत्ती बुझा दी. वापस आकर दरवाजा बंद किया और फिर चुपचाप मेरे कपड़े उतारने लगी. मेरा कुरता और बनियान उतारकर उसने मेरा तावेल भी निकाल दिया. नीचे मैंने कुछ नही पहना था इसलिए मैं थोड़ा शरमा रहा था.

"अब क्यों शरमाता है? नादान कही का. बचपन मे जैसे मों के सामने कभी नंगा हुआ ही नही था तू" मुझे नग्न करके वह दूर होकर मुझे निहारने लगी. अब तक मेरा लंड फिर से सिर उठाने लगा था.

"कितना हेंडसम और जवान हो गया है रे तू!" मों ने लाड़. से कहा.

"पर माँ, तुझसा नहीं, तुम तो रूप की परी हो" मैंने मोम से कहा.

"हाँ जानती हू की तुझे मैं कितनी अच्छी लगती हू. और तू भी मुझे बहुत अच्छा लगता है बेटे, तू नही जानता इस हफ्ते भर मेरी क्या हालत रही है" मोम ने कहा और और मुझे पलंग पर लिटा दिया. फिर वह मेरे उपर लेट गयी और मुझपर चुम्बनो की वर्षा करने लगी. उसकी साँसे तेज चल रही थी और अपने हाथों से वह मेरा पूरा शरीर सहला रही थी. मुझे बचपन की याद आ गयी. बहुत बार मुझे मोम गोद मे लेकर चूमती थी. पर तब उसमे सिर्फ़ वात्सल्या होता था, आज उसके साथ एक नारी की प्रखर कामना भी उसके स्पर्श और चुंबानों मे थी.

मैं पड़ा पड़ा मोम के प्यार का आनंद ले रहा था. लगता था कि स्वर्ग मे पहुँच गया हू. मोम ने फिर मेरे होंठों का गहरा चुंबन लिया, मैं भी उसके होंठ चूसने लगा. मोम के मधुर मुखरस का पान करके ऐसा लग रहा था जैसे मैं शहद चख रहा हम. मोम

 चुंबन तोड़कर अचानक उठा बैठी और नीचे खिसककर मेरा लंड हाथ मे लेकर उसे चूमने लगी.

"हाय, कितना प्यारा है! लगता है खा जाउ!" कहकर मोम उसे अपने गालों और होंठों पर रगाडकर फिर मेरे सुपाड़ा मुँह मे लेकर चूसने लगी. मैं स्तब्ध रहा गया. मोम की वासना इतनी प्रखर हो जाएगी यहा मैंने कभी सोचा नही था. मोम के मुँह का गीला तपता मुलायम स्पर्श इतना जानलेवा था कि मुझे लगा कि मैं फिर झाड़. जाउन्गा. लंड एक मिनिट मे फिर कस के खड़ा हो गया. पर मैं अभी झड़ना नही चाहता था. मोम के दमकते रूप को अब मैं ठीक से देखना चाहता था इसलिए मैंने मोम की साड़ी निकालना शुरू की.

"मम्मी, अब तुम भी कपड़े निकाल दो ना, प्लीज़!" मोम उठ बैठी. कामना और थोड़ी लजजासे उसका चेहरा लाल हो गया था.

"निकालती हू बेटे, तू लेटा रहा. मैंने गाउन निकालकर अपना मोटापा तुझे दिखाया था. अब ये कपड़े निकालकर मेरा कंचन सा बदन तुझे दिखाती हू, यह तेरे ही लिए है मेरे लाल" मोम ने उठकर साड़ी निकाली और फिर पेटीकोत खोल दिया. उसकी मदमस्त जांघे फिर से नग्न हो गयीं. पर अब फरक था. उस पुरानी पैंटी के बजाय एक सुंदर लेस वाली काली तंग पैंटी उसने पहनी थी. उसमे से उसके पेट के नीचे का मांसल उभार निखर कर दिख रहा था. पैंटी की पट्टी के सकरे होने के बावजूद आस पास बस मोम की गोरी त्वचा ही दिख रही थी.

"मोम क्या नीचे भी शेव करती है!" मेरे मन मे आया. तंग पैंटी के तलामा कपड़े मे से मोम की योनि के बीच की गहरी लकीर की भी झलक दिख रही थी.

अब तक मोम ने अपना ब्लओज़ भी निकाल दिया था. मेरी पहचान की उस काली ब्रा मे लिपटे मोम के गोरे बदन को देखकर मुझे रोमांच हो आया. कितनी ही बार मैंने उसमे मूठ मारी थी. मोम के मोटे मोटे स्तनों के उपरी भाग उसके कपड़ो मे से दिख रहे थे. ब्रा शायद पुश अप थी क्योंकि अब वह स्तनों को आधार दे कर उन्हे उठाए हुए थी, इसलिए मोम के स्तन और बड़े और फूले हुए लग रहे थे. बड़े गर्व से वो सीना तान कर खड़े थे मानों कहा रहे हों कि देखो, अपनी मोम की ममता की इस निशानी को देखो, एक बेटे के लिए अपनी मोम के सबसे खूबसूरत अंग को देखो. मुझे घुरता देखकर मोम ने हँस कर कहा.

"अरे कुछ बोल, तब तो खूब चहक रहा था, अब मोम सुंदर लग रही है या नहीं, इन्हे निकाल दूं कि रहने दूं?" मैं कुछ ना बोल पाया. मेरी वह हालत देख कर मोम प्यार से मुसकर्ाई और वैसे ही आकर पलंग पर मेरे पास लेट गयी और मैं उससे लिपट गया.

अगले कुछ मिनिट इस मदहोशी की अवस्था मे गुज़रे कि मैं कह भी नही सकता. सोच कर देखें, वह मोम जिससे आप इतना प्यार करते हैं, जिसके आगोश मे आप ने कितने दिन गुज़ारे हुए हैं, उसी मोम के आगोश मे आप फिर से हों, पर इस बार उसके नग्न शरीर का आभास आप को हो रहा हो और वह भी एक प्रेयसी की तरह आप पर प्रेम की वर्षा कर रही हो तो आपकी क्या हालत होगी!

मैं मोम से लिपटकर उसे चूमता हुआ उस पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था. उसके स्तनों को मैने ब्रसियार के उपर से ही हाथ मे भर लिया था. मुलायम स्पंज के गोलों जैसी उन गेंदों को दबाकर जब मुझे संतोष नही हुआ तो मैं हाथ उसकी पीठ के पीछे करके मोम की ब्रा के हुक खोलने की कोशिश करने लगा. मुझ अनाड़ी को वह कुछ जमा नही और दो मिनिट मेरी इस कोशिश का आनंद लेने के बाद प्यार से मोम ने कहा.

"चल दूर हो, अनाड़ी कही का, आज मैं निकाल देती हू. पर सीख ले अब, आगे से तू ही निकालना." मोम ने फिर अपने हाथों से अपनी ब्रा खोली और ब्रा के कप बाजू मे कर दिए. मैं मोम की घुंडी मुँह मे लेकर चूसने लगा. मुझे वह भूरी मोटी घुंडी जानी पहचानी सी लगी. निपल के आजू बाजू बड़ा सा भूरा गोला था, पुराने एक रुपये के सिक्के जैसा. मैं आँखे बंद करके मोम की चुचि चूसने लगा.

मों ने हाथ उपर करके अपनी ब्रा पूरी निकाल दी और फिर मुझे छाती से चिपटा कर मुझे अपनी गोद मे लेकर लेट गयी. मुझे स्तन पान कराती हुई भाव विभोर होकर बोली.

"अनिल, कितने दिन बाद तुझे निपल चुसवा रही हू बेटे, जानता है, तू तीन साल का होने तक मेरा दूध पीता था, छोड़ने को तैयार ही नही था, बड़ी मुश्किल से तेरी यह आदत मैंने छुडवाई थी. मुझे क्या पता था कि बड़ा होकर फिर यही करूँगी? पर अब ये मैं नही बंद होने दूँगी बेटा, तुझे जब चाहे जितना चाहे तू मेरे स्तन चूस सकता है मेरे राजा"

एक हाथ से मोम का उरोज दबाकर मैं उसे चूस रहा था और दूसरे से दूसरा स्तन दबा रहा था. बार बार स्तन बदल बदल कर मैं चूस रहा था. लंड अब तन कर मोम के पेट पर रगड़. रहा था और मैं आगे पीछे होकर उसे चोदने सी हरकत करता हुआ मोम के पेट पर रगड़. रहा था. एक हाथ मोम की पैंटी की इलास्टिक मे डाल कर मैं उसे उतारने की कोशिश करने लगा. मोम का भी हाल बहाल था. वह भी सिसकारियाँ भर भर कर अपनी जांघे रगड़ती हुई मुझे छाती से चिपटा कर पलंग पर लुढ़क रही थी. उसके स्तनों की घुंडियाँ अब कड़ी हो गयी थीं. उन चमदिली मूँगफलियों को चूसने और हल्के हल्के चबाने मे बड़ा आनंद आ रहा था. अगर उनमे दूध बस और होता तो मैं स्वर्ग पहुँच गया होता!

आख़िर उससे ही रहा नही गया. उसने अपनी पैंटी निकाली और टांगे फैलाकर मुझे अपने उपर लेकर लेट गयी. फिर अपने हाथ से मेरा लंड अपनी चूत पर सटाकर उसे अंदर डालने लगी.

लंड पर लगती मुलायम टच से ही मैं समझ गया की मोम ने नीचे शेव किया है. मेरी फॅंटेसी मे मैं हमेशा कल्पना करता था की मोम की चूत को पास से देख रहा हू, उसे चूम रहा हू, उसके रस को पी रहा हू और आज जब यह असल मे करने का मौका मिला तो यह सब करने के लिए अब हम दोनों मे सबर नही था. मैने एक हल्का धक्का दिया और मेरा लंड एक ही बार मे पूरा मोम की तपती गीली बुर मे समा गया. मोम की चूत ऐसी गीली थी जैसे अंदर क्रीम भर दी हो. मोम ने मुझे अपनी जांघों और बाँहों मे भर लिया और नीचे से ही धक्के दे देकर चुदवाने लगी.

मुझे इसका विश्वास ही नही हो रहा था कि आख़िर मैं अपनी मोम को चोद रहा हू. मेरा पहला संभोग, पहली बार किसी नारी से काम क्रीड़ा और वह भी मेरी जान से प्यारी ममी के साथ! मैं कुछ कहना चाहता था पर मोम ने अपनी चुचि मेरे मुँह मे ठूंस दी थी और छोड़. ही नही रही थी. मैंने तड़प कर मोम को अपनी बाहों मे कसा और उसे हचक हचक कर चोदने लगा.

हमारा यहा पहला संभोग बिलकुल जानवरों जैसा था. हमा इतने प्यासे थे कि एक दूसरे को बस पूरे ज़ोर से चोद रहे थे, बिना किसी की परवाह के. चार पाँच मिनिट की धुआँधार चुदाई के बाद जब मैं आख़िर झाड़ा तो जान सी निकल गयी. इतनी तृप्ति महसूस हो रही थी जैसी कभी नही हुई. लगता है कि मोम भी झाड़. चुकी थी क्योंकि मुझे बाँहों मे भरके मेरे बालों मे हाथ चलाती हुई बस यही कहा रही थी "मेरे बेटे, मेरे लाल, मेरे बच्चे"

मैंने मोम का निपल मुँह मे से निकाला और उसके स्तनों की खाई को चूमकर मोम से बोला

"सॉरी मम्मी, मैं अपने आप को रोक नही पाया, इसलिए इतनी जल्दी की" मोम ने प्यार से कहा

"जानती हू बेटे, बस कुछ मत बोल, ऐसे ही पड़ा रह. कुछ कहने की ज़रूरत नही है. मेरे दिल का हाल तू जानता है और तेरे दिल की बात मैं जानती हू." हम खामोश अपने स्खलित होने के आनंद मे भिगते पड़े रहे. मुझे विश्वास ही नही हो रहा था कि मैंने अपनी मोम से, अपनी जननी से अभी अभी संभोग किया है, वह भी उसकी इच्छानुसार और उसे वह बहुत अच्छा लगा है. मोम ने कुछ देर बाद कहा




"अनिल, पहले मुझे तुझ पर पहुत गुस्सा आया था, आख़िर मेरा प्यारा बेटा ऐसी गंदी हरकते कैसे कर सकता है पर फिर मेरी भी हालत बुरी हो गयी थी. लगता था कि तू यहा सब ऐसे ही तो नही करता? क्या सच मे मैं तुझे अच्छी लगती हू? तू भी इतना जवान और सुंदर है, मेरे मन मे भी कैसे कैसे विचार आने लगे थे. खुद पर ही गुस्सा आया जो तुझपर निकाला. तू नही समझ सकता, एक मॉं पर क्या गुजराती होगी, जो इतनी प्यासी है इतने सालों से और खुद उसका जवान लड़का उसे भाने लगे. बार बार मन मे लगता कि कैसी पाप की बाते सोच रही है. फिर सोचा कि आख़िर तुझसे दो टुक बाते करूँ. मुझे यही लगा था कि मेरे शरीर को देखकर तू आख़िर समझ जाएगा और मेरी परेशानी कम से कम एक तरफ से तो कम हो जाएगी" मैंने मोम से पूछा

"मामी, सच बताओ, अगर मैं भी कह देता कि हाँ, मैं अब कुछ नही करूँगा तो तुम क्या करती? तुम्हे अच्छा लगता?" मोम ने मुझे पास खींचते हुए बोला

"नही बेटे, सच बतओं तो इतना संतोष भर होता कि मैंने अपना कर्तव्य पूरा किया, तुझे सही रास्ते पर ले आई. पर अच्छा नही लगता. एक तो मुझपर पहाड़. टूट पड़ता कि मैं सच मे मोटी और बेडौल हू. दूसरे तुझे मैं बेटे के रूप मे फिर पा लेती पर तेरे जैसे सुंदर जवान से प्यार करने का मौका हमेशा के लिए खो देती." मैंने मोम की छाती मे सिर छिपा कर कहा

"माँ, तुम तो कितने साल से मुझे अच्छा लगती हो, जब से जवान हुआ हू, तभी से तुम्हारे सपने देख रहा हू. होस्टल मे भी तुम्हारे सपने देखा करता. पर आज मुझे गुस्सा आ रहा है, मैं पहले ही तुमसे कहा देता तो तुम्हे कब का पा चुका होता. वैसे मैंने आज बहुत जल्दी की माँ, पाँच मिनिट मे ख़तम हो गया, मुझे और सब्र करना चाहिए था" मों हँस कर बोली

"और क्या करना था अनिल? मन नही भरा"

"नही माँ, तुमने मुझे स्वर्ग मे पहुँचा दिया. माँ, तुम्हे अच्छा लगा? कि मैंने तुम्हे प्यासा छोड़. दिया?" मैंने पूछा.

"तू नही समझेगा मेरे लाल, मुझे कितना अच्छा लगा. तुझे और क्या करना था मेरे साथ, बता तो" मोम ने फिर पूछा. वह मंद मंद मुस्करा रही थी.

"मैं तुम्हारी शरीर को हर जगहा चूमना और उसका रस चूसना चाहता था. कब से इसका सपना है मेरे दिमाग़ में" मैंने आख़िर अपनी इच्छा कह डाली.

मोम मुझे चूमा कर बोली

"कल कर लेना बेटे, जो चाहे वह कर लेना, अब मैं कही भाग थोड़े ही रही हू? कल और परसों छुट्टी है, मैं अपने बेटे को बहुत सा प्यार दूँगी. चल अब सो जा"

मैं उठ बैठा

"इतनी जल्दी थोड़े छोड़ूँगा मोम मैं तुम्हें. इतनी मुश्किल से हाथ आई हो. आज रात भर प्यार करूँगा तुम्हें" अब हमारे बीच की झिझक पूरी समाप्त हो गयी थी. आग दोनों तरफ से लगी थी. अब मोम और मैं ऐसे बाते कर रहे थे जैसे दो प्रेमी करते हैं. मोम शैतानी के लहजे मे मेरी आँखों मे आँखे डाल कर बोली

"प्यार करेगा, याने क्या करेगा बेटे? चूमेगा? बोल ना?" मैं क्या कहता. मोम शरारत पर उतर आई थी. मेरी परीक्षा ले रही थी शायद. मैंने आख़िर कह ही डाला

"हाँ माँ, चुम्मा लूँगा, तुम्हारी जीभ चुसूँगा, तुम्हारे मुँह की इस चाशनी का स्वाद लूँगा और फिर माँ, मैं तुम्हे रात भर चोदुन्गा. इतना सब करने का मन होता है मेरा तुम्हारे साथ" मोम ने मुस्कराते हुए पूछा

"अब बोला ना सॉफ सॉफ, मैं यही सुनना चाहती थी. और क्या क्या मन होता है, मैं भी तो सुनूँ. आख़िर पता तो चले की मेरे इस पागल बेटे को अपनी मोम के साथ क्या क्या करना है" मैंने कहा

"तुम्हाई मम्मों को खूब दबाने और चूसने का मन होता है. उन्हे चबा चबा कर खा जाने का दिल करता है, उनके बीच की खाई मे अपना लंड डाल कर रगड़ने का मन होता है."

"और?" मैं अब मोम की जांघों के बीच मे नज़र लगाए बैठा था. मोम ने अब टांगे आपस मे सटा ली थी इसलिए उसकी चूत पूरी नही दिख रही थी. पर उस शेव की हुई बुर का मांसल उभार और उसके बीच की गहरी लकीर सॉफ दिख रही थी. मेरा वीर्य और मोम की चूत का पानी उसकी जांघों पर बह आया था. मोम की टांगे अलग करने की कोशिश करता हुआ मैं बोला

"तुम्हारी यह रसीली चूत चूसने का मन होता है. लगता है कि इसका चुंबन लूँ, इसमे जीभ डालूं और तुम्हारा सारा रस पी लूँ. ममी, प्लीज़, देखने दो ना" मैं मोम की बुर की गहरी लकीर मे उंगली चलाने लगा. मोम वैसे ही रही, अपनी टांगे और सिमटाकर बोली

अच्छा ये बता तूने इतनी सारी बाते कहाँ से सीखी

मैने कहा मोम नेट पर राज शर्मा का एक हिन्दी सेक्सी कहानियो का ब्लॉग है कामुक-कहानियाँडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम मैं उसी ब्लॉग मे सेक्सी कहानियाँ पढ़ता था वही से मुझे इन बातो का पता चला मोम उस ब्लॉग पर सेक्स से संबंधित सभी तरह की जानकारी है मैने मोम को बताया

मोम कहा अनिल मैं भी ओफिस मे नेट पर अक्सर कामुक-कहानियाँब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम पर राज शर्मा की कहानिया पढ़ती रहती हू सच मे उस ब्लॉग जितनी सेक्सी कहानिया मैने कही भी नही देखी

मोम एक बार और करने दो ना मैने मोम से कहा

मोम ने कहा बेटा "आज नहीं, सब एक दिन मे कर लेगा क्या? आगे बोल, और क्या करेगा मेरे साथ"

"माँ, तुम्हारे पैर इतने खूबसूरत हैं, उनकी पूजा करूँगा, खूब चुंबन लूँगा उनके, तुम्हारे तलवे चाटूंगा. तुम्हारा चरणामृत पियुंगा" मोम भाव विभोर हो गयी. मुझे पट से चुम लिया.

"मेरे पैर अच्छे लगते है तुझे? तभी बदमाश मेरी चप्पालों से खेलता था, और पिछले साल से बार बार मेरे पैर छूने की फिराक मे रहता था नालायक कही का! वैसे मेरे पैर सुंदर है ये मुझे मालुम है, मेरी सहेलियाँ भी मुझे बचपन मे कहती थी कि रीमा तुझे तो फैशन की सैंडालों का मेनमॉडल होना चाहिए. पर तेरे मुँह से ये सुनकर कितना अच्छा लगता है तू नही समझेगा. बचपन मे भी तुझे मेरी चप्पालों से खेलने का बहुत शौक था, रेंगते हुए पहुँच जाता था जहाँ भी रखी हों" मोम कुछ देर खामोश रही, बस मुझे चूमती रही और मेरी पीठ पर हाथ फेरती रही. फिर मेरे पीछे लग गयी.

"और क्या करेगा, बता ना" अब मैं क्या कहता. बची थी उसके उन भारी भरकामा नितंबों को प्यार करने की बात, पर आख़िर मेरी हिम्मत जवाब दे गयी. मैं कैसे पहली ही रात को कहता की मोम तुम्हारी गांद भी मारने का मन करता है

मेरे चेहरे पर के भावों से मोम शायद समझ गयी. मुझे चिढ़ाना छोड़. कर मुझे अपने उपर खींच कर फिर लेट गयी. मेरे लंड को पकड़.आकर हौले हौले मुठियाते हुए बोली

"और अनिल, मेरा क्या मन होता है मालुम है? मैं अपने बेटे को बाँहों मे भर लूँ, उसे खूब प्यार दूं, उससे खूब चुदवाउ, उसकी हर इच्छा पूरी करूँ अपने शरीर से, उसे अपना दूध पिलाउ और फिर उसके इस प्यारे शिश्न को चूस कर उसकी गाढ़ी मलाई पी लूँ. जब तू अपने कमरे मे अभी स्खलित हुआ था, मुझे ऐसा लगा था कि उसे मुँहा मे ले लूँ. कितनी मादक सुगंध आ रही थी उसमेंसे. चल, अब तो तू मेरा ही है, कहाँ जाएगा मोम को छोड़कर"

मैं और मोम फिर एक दूसरे को चूमने लगे. मैंने आख़िर अपनी एक इच्छा पूरी कर ही ली, उसकी लाल रसीली जीभ को खूब चूसा. मोम का शहद जैसा गाढ़ा मुखरस मुझे चाशनी की तरह मीठा लग रहा था. मेरा लंड फिर तन गया था. मोम भी बेचैन थी, अपनी जांघे आपस मे घिस रही थी. उन्हे फैलाकर मुझे बोली

"तू फिर तैयार हो गया मेरे राजा! तेरी जवानी को मेरी नज़र ना लग जाए, आ बेटे, आ जा मुझ में, समा जा मेरे शरीर में"

मोम की बुर अब खुल कर मेरे सामने थी. बाल ना होने से उसका हर भाग सॉफ दिख रहा था. उस मोटे भागोष्तों वाली लाल गीली चूत को देखकर पल भर को लगा कि मुँह मार दूं पर फिर सब्र कर लिया. अभी मेरा वीर्य उसमे लगा था, स्वाद नही आएगा ठीक से यहा सोच कर मैंने अपना लंड मोम की बुर पर रख कर पेल दिया. बुर इतनी गीली थी कि आराम से लंड जड़. तक समा गया. मैं मोम पर लेट गया और उसे चूमता हुआ उसे चोदने लगा. इस बार मैं आराम से धीरे धीरे मज़ा लेकर चोद रहा था.

मों ने भी मुझे बाँहों मे भर लिया. वह कभी मेरे होंठ चूमती और कभी गाल, कभी प्यार से मेरे बाल चूमा लेती और कभी मेरा कान मुँह मे लेकर हल्के हल्के काटने लगती. मैं मों के होंठ चूमता हुआ एक मस्त लय मे उसे चोद रहा था. इस बार मेरा काफ़ी कंट्रोल था, मैं यह चाहता था कि मोम को पूरा सुख दूं और फिर ही झाड़ू. धीरे धीरे हमारी चुदाई की रफ़्तार बढ़. गयी. मोम अब कराह करबोली

"अनिल, बहुत अच्छा लग रहा है बेटे, और ज़ोर से कर ना" कहती हुई नीचे से धक्के मार रही थी. मैंने पिछले मज़ाक का बदला लेते हुए चोदना बंद कर दिया और मोम से पूछा

"क्या करूँ माँ, ठीक से बताओ." मों बोली

"अरे वही जो कर रहा है" अब उससे रहा नही जा रहा था. मैं आड़. गया

"नही माँ, बताओ. क्या करूँ" मोम ने मेरी पीठ पर चपत लगाते हुए कहा.

"शैतान, अब तू मुझसे कहलावा रहा है. चल चोद मुझे, ज़ोर से चोदो मुझे अनिल बेटे" मों के मुँह से यहा सुनकर मुझे जो रोमांच हो आया उसका बयान करना मुश्किल है. अब मैं झाड़.आने को आ गया था. झुक कर मैंने मोम की चुचि मुँह मे ली और ज़ोर ज़ोर से उसे चोदने लगा. गीली बुर से अब फॅक फॅक फॅक आवाज़ आ रही थी. मोम ने मेरे सिर को अपने स्तनों पर दबा लिया और मेरे नितंब सहलाने लगी. अपनी जांघे भी उसने मेरी कमर के इर्द गिर्द जाकड़. ली थीं. नीचे से वह बराबर अपने नितंब उछाल कर मेरा पूरा लंड अपनी बुर मे लेते हुए मन लगाकर चुदवा रही थी. मैं बीच बीच मे मों के नितंबों को पकड़. लेता और उन्हे दबाने लगता.

दस एक मिनिट की चुदाई के बाद जब मैं झाड़ा तो मोम को झदाने के बाद. उसके स्खलन का पता मुझे तब चला जब अचानक उसका शरीर कड़ा हो गया और गहरी साँस भर कर उसने मुझे ज़ोर से जाकड़. लिया. लंड भी एकदमा और गीला हो गया, मोम की बुर ने ढेर सा पानी छोड़. दिया था.

अब मैं एकदमा त्रुप्त था. थक भी गया था. कुछ देर बाद मोम पर से अलग होकर उसके पास लुढ़क गया. मोम ने एक तावेल से अपनी चूत और मेरा लंड पोंचा और फिर टेबल लैंप बुझाकर मुझे बाँहों मे लेकर लेट गयी. मैं बहुत खुश था.

"माँ, आई लव यू. तुम दुनिया की सबसे अच्छा मोम हो, सबसे खूबसूरत और सेक्सी औरत हो" मोम के आगोश मे आते हुए मैं बोला.

"और तू सबसे अच्छा बेटा है. चल अब सो जा. कल छुट्टी है. आराम से उठना" मोम ने कहा. मुझे नींद लग गयी. इतनी गाढ़ी और मीठी नींद बहुत दिनों मे आई थी. सुबहा मेरी नींद देर से खुली. वो भी तब जब मुझे अपने उपर वजन का अहसास हुआ, साथ ही लंड मे बहुत मीठी अनुभूति हो रही थी. जब मैं ठीक से जागा तो देखा कि मोम मुझ पर लेट कर मुझे प्यार से चूमा रही थी. मेरे तने लंड को उसने अपनी चूत मे डाल लिया था और मुझे चूमते हुए वह धीरे धीरे मुझे चोद रही थी. उसकी आँखों मे कामना उमड़. आई थी. मुझे जगा देखकर बोली


"अरे तू जाग गया! मैं तुझे जगाना नही चाहती थी पर क्या करूँ बेटे, सुबहा जागी तो तेरा लंड इतना कस कर खड़ा था कि मुझसे रहा नही गया." मैंने मोम को बाँहों मे भरा और नीचे से ही धक्के मारने लगा. मोम पलट कर मुझे उपर लेने की कोशिश करने लगी तो मैंने कहा

"ममी, ऐसे ही चोद ना मुझ पर चढ़. कर, बहुत मज़ा आ रहा है" मोम मुझपर चढ़े चढ़े अब ज़ोर से मुझे चोदने लगी. मुझे चूमने के लिए उसे नीचे झुकना पड़. रहा था. उसके लटकते स्तन मेरी छाती पर अपनी घुंडियाँ चूबो रहे थे. मैंने मोम को पास खींचकर उसका निपल मुँह मे ले लिया और हल्के हल्के चबाते हुए चूसने लगा.

मोम ने मन भर कर मुझे चोदा और झाड़. कर लास्ट मुझपर पड़ी रही. मेरा ज़ोर से खड़ा लंड अब भी प्यासा था इसलिए मैंने अब उसे नीचे पटककर उसपर चढ़ कर. चोद डाला और झाड़. कर ही रुका.

तृप्त होकर मोम उठी और गाउन पहनकर घर का काम करने की तैयारी करने लगी. मुझे बोली की सोया रहूं, कोई जल्दी नही है. मैं फिर सो गया. नींद खुली तो दस बज गये थे.

उस सुबहा को सब कुछ बदला बदला लग रहा था. ऐसा लगता था कि स्वर्ग ज़मीन पर उतर आया है. मों भी बहुत खुश थी. बार बार मुझे चूमा लेती. वह नहा चुकी थी. मैं नहा कर वापस आया तो मेरे लिए मेरी पसंद की डिशस बना रही थी. पहले उसने मुझे ग्लास भर कर बदाम डला दूध दिया. मैंने उसे देखा तो थोड़ी शरमा गयी

"अब तुझे रोज दो ग्लास दूध पीना चाहिए बेटे." मैंने कहा

"मोम मैं तो चार ग्लास पी लूँ अगर तुम अपना दूध पिलाओ." और गाउन के उपर से ही उसके स्तनों को चूमने लगा.

"चल बदमाश, बचपन मे पिया वह काफ़ी नही था क्या!" मों ने कहा. मैं उससे लिपट गया. मुझे उससे दूर रहा ही नही जा रहा था, एक दीवानापन सा सवार हो गया था मुझपर.

"अभी नही बेटे, दिन मे ढेर से काम करने हैं. कोई कभी भी आ सकता है. अभी काम वाली बाई आती होगी. अब लाड. दुलार रात को. और ज़रा सब्र कर, तू आदमी है कि घोड़.आ, इतनी बार करके भी तेरा मन नही भरा" मोम ने मुझे दूर धकेलकर कहा.

"दोपहर को माँ?" मैंने बड़ी आशा से पूछा. मोम ने सिर हलाकर मना किया. हँस रही थी जैसे मुझे चिढ़ा रही हो. फिर भी मैं मोम के पीछे पीछे दुम हिलाता घूमता रहा. बार बार उससे पीछे से चिपक जाता. कल उसके नितंबों को देखा था पर मन भर कर उन्हे छू नही पाया था. इसलिए पीछे से छिपताकर उनपर मैं अपना खड़ा लंड रगड़.आता और मोम को पीछे से बाँहों मे भरकर उसकी चुचियाँ दबाने लगता. वह बार बार मुझे झिड़कती पर मैं फिर आकर चिपेट जाता.

उसे अच्छा लग रहा था पर दिन मे यहा करते हुए शायद वह सकुचा रही थी. अंत मे मेरे कान पकड़कर उसने मुझे अपने कमरे मे बंद कर दिया.

दोपहर को खाना खाने के बाद हमने कुछ देर टीवी देखा. मुझे नींद आ रही थी इसलिए मैं मोम की गोद मे सिर रखकर सो गया. बहुत सालों के बाद मैं यह कर रहा था. मोम भी प्यार से मेरे बालों मे उंगलियाँ चला रही थी.

पर मेरा लंड मुझे चुप रहने दे तब ना. मोम के बदन से आती खुशबू ने मुझे उत्तेजित कर दिया. मैंने पलट कर गाउन के उपर से ही अपना मुँह मोम की जांघों के बीच दबा दिया. मोम की सुगंध मुझे मस्त कर रही थे. ज़रूर उसकी बुर की खुशबू थी. मोम भी तो उत्तेजित थी. मैने अपना सिर और दबा कर मोम की गोद मे रगड़ने लगा. मोम को गुदगुदी हुई तो वह हँसने लगी.

"छोड़. अनिल, मैंने कहा ना अभी नहीं, कैसा उतावला लड़का है" बेल बजी तो मोम ने मुझे ज़बरदस्ती अलग किया. आँखे दिखाकर बोली

"अब जा और सो जा. शाम को घूमने जाएँगे" मैं कमरे मे गया पर सोया नहीं. लंड खड़ा था. मोम का इंतजार करता रहा. पर लंड को हाथ भी नही लगाया. अब मूठ मारना पाप था मेरे लिए, मेरी प्यारी मोम जो थी.

बाई जाने के बाद आधे घंटे बाद मोम आई. मेरी हालत देखकर मुझे डाँटने लगी. पर यहा झूठ मूठ का डांटना था. उसकी भी हालत वही थी जो मेरी थी. पर वह तैयार नही हो रही थी.

"अभी नही अनिल, कोई आ जाएगा तो? कपड़े पहनना मुश्किल हो जाएगा." मैंने कहा

"मामी, कपड़े मत उतारो, बस पैंटी उतार दो. मैं तुम्हारी चूत चुसूँगा. कल से तरस रहा हू." मोम ने कहा

"तू मानेगा नहीं, चल जल्दी से कर ले जो करना हो" और गाउन उपर करके अपनी पैंटी उतार दी. उतारते समय उसकी गोरी चिकनी बुर मुझे दिखी. मोम फिर पलंग पर मेरे साथ लेट गयी. मैंने उठ कर मोम का गाउन उपर किया और उसकी जांघे चूमने लगा. फिर उसकी टांगे अलग करा के पास से उसके बर को देखने लगा. मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था, अपनी जननी की चूत मैं पहली बार ठीक से देख रहा था.

मोम की बुर से पानी बहाना शुरू हो गया था. जांघे भी गीली थीं. मुझे इतनी देर से तरसा रही थी पर खुद भी मस्ती मे थी. मैंने मोम की बुर के पपोते अलग किए और अंदर की लाल रसती म्यान को देखा. मेरी उंगली गीली हो गयी थी. मैंने उसे चखा. उस चिपचिपे रस ने मुझ पर ऐसा जादू किया कि मैं मोम की टाँगों के बीच लेट कर उसकी बुर चाटने लगा. मोम सिसकने लगी

"बहुत अच्छा लगता है बेटे, और चाट ना, ज़रा उपर, दाने के पास" याने क्लिट पर जीभ चलाने को कह रही थी. मुझे क्लिट दिखा नही तो मैंने फिर मोम की बुर उंगलियों से खोली. उपर दो मांसल पपोतों के बीच छिपा ज़रा सा मकई का दाना मुझे दिखा. उसपर मैं जीभ चलाने लगा. एकदम हीरे जैसा कड़ा दाना था. मोम अब पैर फेंकने लगी.

"बहुत अच्छा कर रहा है रे मेरे लाल, और कर ना, खूब देर कर" मोम की बुर मैंने मन भर कर चॅटी, पूरी जीभ निकालकर उपर से नीचे तक . बीच बीच मे उसके क्लिट को चाटता और फिर उसके रस को चूसने लगता. बीच मे एक दो बार उसकी बुर मे अपनी जीभ डाल कर भी चोदा. मोम की बुर का कसैला खारा रस मेरे होशोहवास उड़ा रहा था. मैं बार बार सोचता

"यही है वह प्यारी गुफा जिससे मैं निकाला था" दस मिनिट मे मोम झाड़. गयी. मेरे मुँह मे उसने ऐसी रस की धार छोड़ी कि मज़ा आ गया. जब मैं उसकी चूत और जांघे अपनी जीभ से पूरी सॉफ करके उठा तो उसने मुझे अपनेसे चिपटा लिया. वह हांफ रही थी. फिर बोली

"अनिल, कैसा करता है बेटे, मुझे पागल कर देगा. तुझे अच्छा लगा बेटे? गंदा तो नही लगा?" मैंने कहा

"माँ, तुम्हारी चूत मे से तो अमृत निकलता है" मोम खुश हो गयी

"सच? या सिर्फ़ मेरा मन रखने को कह रहा है"

"सच माँ, अब मैं रोज कई बार ये रस पीने वाला हू. तुम ही देख लो कि मेरा क्या हाल है तुम्हारा शहद चाट कर" मोम ने टटोल कर मेरा लंड पकड़ा.

"अरे यह तो बेकाबू हो गया है. इस बेचारे का तो मैंने कुछ किया ही नही अनिल. चल तू उलटी ओर से आ जा. मेरा मन नही भरा अभी. तू मेरा रस पी, मैं इस मस्त बदमाश की मलाई निकालती हू. कल से तरस रही हू." मैं मा के पैरों की ओर मुँह करके लेट गया. मोम ने टांगे फैला दी कि मैं ठीक से उसे चाट सकूँ. मैं मों की जांघे पकड़कर उसकी बुर मे मुँह मारने लगा. मोम मेरे लंड से खेल रही थी. बार बार उसे चूमती, अपने गालों पर रगदती और कहती

"कितना जवान हो गया है रे तू, गन्ने जैसा रसीला है मेरे मुन्ने का मुन्ना, लगता है खा कर निगल जाउ" और मुँह मे पूरा भरकर चूसने लगी. मैं धक्के मारता हुआ मोम का मुँह चोदते हुए उसकी बुर चूसने लगा.

मोम बस मेरे लंड से खेलती रही, उसे तरह तरह से चुसती रही, उसपर अपनी जीभ रगड़ कर मुझे सताती रही. आख़िर जब वह दो बार झाड़. चुकी तब मोम ने मेरे लंड को ज़ोर से गन्ने की तरह चूस कर मुझे भी झाड़ा दिया. मुझे लगा था कि वह शायद मेरा लंड मुँह से निकाल दे पर उसने मेरे वीर्य की आखरी बूँद निचोड़. कर ही दम लिया.

मैं मोम से चिपेट कर लेट गया. वह कुछ बोली नही पर उसके चेहरे के भाव से सॉफ था कि वह बहुत खुश है. मुझे फिर झपकी लग गयी और शाम को ही खुली जब मोम ने मुझे हिलाकर जगाया. वह साज धज कर तैयार थी.

"चल उठ, बाहर नही जाना है क्या घूमने?" मैं अंगड़ाई लेकर बोला.

"माँ, बाहर जाकर क्या करेंगे? यही घर मे रहो ना, मेरा मन नही भरा अब तक" मोम बोली

"अरे कुछ तो सब्र कर. कल से लगा हुआ है. चल अब बाहर" उसने आज एक हल्की नीली साड़ी और मैचिंग हाफ़ स्लिव ब्लओज़ पहना था. बालों को जुड़े मे बाँध लिया था. बहुत खूबसूरत लग रही थी.

2

मैं तैयार हुआ. बाहर आया तो मोम सोफे पर बैठी पैर क्रास करके हिलाते हुए मेरा इंतजार कर रही थी. उसकी बाथरुम स्लीपर उसकी उंगलियों से लटक कर हिल रही थी. यहा देखकर मुझसे रहा नही गया. मों के पास मैं नीचे बैठ गया और उसका पैर हाथ मे भर लिया. फिर चूमने लगा. पैरों के साथ साथ मैंने उसकी चप्पल के भी चुममे ले लिए. उसके दोनों पाव मैंने छाती से लगा लिए.

"अरे यहा क्या कर रहे हो बेटे? छी, मैली है मेरी चप्पल, दो तीन दिन से धोयि भी नहीं." मुझे हटाने की कोशिश करते हुए वह बोली.

"करने दो माँ, अच्छा लगता है." कहकर मैं उसके पैर और चप्पल को चूमता ही रहा.

"चल दूर हट, कैसा पागल है रे तू, करना ही है तो बाद मे करना, ऐसी गंदी चप्पल के साथ नहीं" मोम ने मुझे खींच कर अलग कर ही दिया. वह मेरी ओर अजीब तरह से देख रही थी, जैसे उसे समझ मे ना आ रहा हो कि उसके इस आशिक बेटे के पागलपन का कहाँ ख़ात्मा होगा. वह बाहर जाने के सैंडल पहनने को उठाने लगी तो मैंने पूछा

"माँ, मैं पहना दूं?" वह मेरी ओर देखती रही फिर मुस्काराकर हाँ कर दी. मैं भाग कर उसकी काली हाई हिल सैंडल उठा लाया. मोम की स्लीपर निकालकर मैंने बड़े प्यार से उसे वो सैंडल पहनाए. मोम ने मुझे बाँहों मे भरकर चूमकर कहा


"तू सचमुच पागल है मेरी हर चीज़ के लिए. मुझे ही कुछ करना पड़ेगा" पर यह नही बोली कि क्या करेगी. हम घूमने गये. एक जगह जल्दी ही डिनर किया. लौटते हुए मलाड की बड़े शापिंग माल मे घूमने चले गये. मोम ने शायद कुछ निश्चय कर लिया था. सीधे मुझे लेकर एक फुटवियर स्टोर मे गयी.

वहाँ ढेर सी लेडीज़ चप्पले और सैंडले थीं. मोम ने मेरे कान मे धीरे से कहा

"पसंद कर ले अनिल बेटे, कौन सी लूँ? एक सैंडल लूँगी और एक स्लीपर" मैं उसकी ओर देखने लगा. मुस्काराकर वह फिर धीरे से बोली

"तेरा दीवानापन नही जाएगा. सोचती हू कि एक ख़ास तेरे लिए ले लूँ, तेरे खेलने के लिए. उन्हे सिर्फ़ बेडरूम मे पहनूँगी. कम से कम साफ तो रहेंगी, नही तो मेरी चप्पालों को चाटने के चक्कर मे तू बीमार पड़. जाएगा." मैं बहुत खुश हुआ. आँखों आँखों मे ममी को थैंक यू कहा. मेरी फेटिश की गहराई को समझ कर वह मुझे खुश करने के लिए यह कर रही थी याने उसने मेरी इस चाहत को ऐईक्सेपट कर लिया था.

मैंने खूब ढूँढ कर एक नाज़ुक सिल्वर कलर की हाई हिल सैंडल और हल्के क्रिम कलर की पतले पत्तों वाली एकदम पतली रबर की स्लीपर पसंद की. मोम ने पहन कर देखे. उसके पाँव मे वी बहुत फब रहे थे. दोनों महँगी थीं, मिलाकर हज़ार रुपये हो गये. मैं वापस रखने वाला था पर मोम ने मेरा हाथ पकड़. लिया.

"तुझे सुख मिलता है बेटे तो कोई कीमत मेरे लिए ज़्यादा नही है" वापस घर आने तक मेरी ऐसीहालत हो गयी थी. लंड ऐसा खड़ा था कि चलना मुश्किल हो रहा था. किसी तरह उसे पैंट की साइड मे छिपा कर मैं चल रहा था. एक तो मेरे हाथ मे वह चप्पालों वाला पैकेट, दूसरे मोम के ब्लओज़ की पसीने से भीगी कांख . मोम मेरी हालत देख कर बस मुस्करा रही थी.

घर आते ही जैसे ही मोम ने दरवाजा अंदर से बंद किया, मैं उससे लिपट गया और अपना चेहरा उसकी कांख मे छुपा कर ब्लओज़ को चाटने लगा. मोम के खारे पसीने के स्वाद ने मुझपर किसी अफ़रोदिज़ियाक जैसा काम किया. मोम सैंडल उतारते हुए मुझे कहती ही रह गयी कि अरे रुक, इतना दीवाना ना हो, अभी रात पड़ी है, पर मैं कहा मानने वाला था. वैसा ही मोम को धकेलकर सीधा बेडरूमा मे ले गया. उसे पलंग पर बिठा कर मैं उसके सामने बैठ गया और उसकी साड़ी उपर कर दी.

मों हँसते हुए विरोध कर रही थी, पर नाम मात्र क़ा, सिर्फ़ दिखाने के लिए. साड़ी उठाकर मैंने खींचकर उसकी पैंटी उतारी और उसकी जांघे फैलाकर उनमे मुँहा डालकर उसकी बुर चूसने मे लग गया. बुर चू रही थी, याने मोम जो मुझसे इतनी इतराकर सब्र करने को कह रही थी, खुद भी अच्छी ख़ासी गरमा हो गयी थी.

कुछ देर बाद मैं उठा और पैकेट खोल कर सैंडल निकाले. मोम अब झाड़. कर पलंग पर लेट गयी थी और लंबी लंबी साँसे ले रही थी. मैंने मोम को सैंडल पहनाए और उसके पैरों को चूमा. मोम उस हालत मे बहुत प्यारी लग रही थी, पूरे कपड़े और सैंडल पहने थी पर साड़ी कमर के उपर थी और उसकी मतवाली जांघे और चूत नंगी थी.

मुझे अपने कपड़े निकालने का धीरज नही था, मैंने अपना लंड पैंट की ज़िप से निकाला और मोम की बुर मे घुसेड. दिया. फिर उसपर चढ़. कर उसे चोद डाला. चोदते चोदते मैंने मोम के हाथ उपर करके उसकी कांखो को ब्लओज़ के उपर से ही चूस डाला. पाँच मिनिट मे चुदाई ख़तम हो गयी. जब मैं मोम के उपर पड़ा पड़ा सुस्ता रहा था तो मों ने मीठा उलाहना दिया

"हो गया तेरा? अब रात भर क्या करेगा? मैं कह रही थी तुझसे, अगर सच का मज़ा लेना हो तो सब्र करना सीख . ये क्वीकी बहुत मीठी थी बेटे पर मैं तुझसे बहुत देर प्यार करना चाहती हू" मैंने मोम की छाती मे मुँहा दबा कर कहा

"ये तो शुरूवात है माँ, पूरी रात पड़ी है" मों मेरी पीठ पर चपत मार कर बोली

"बड़ा आया पूरी रात वाला. कल से अब तक पाँच बार झाड़. चुका है, थक गया होगा अब तक! सो जा चुप चाप!"

"नही माँ, मैं सच कहा रहा हू. आज मुझे मत रोको प्लीज़."

"ठीक है, तू पड़ा रह, मैं काफ़ी बनाकर लाती हू" मोम ने उठकर साड़ी निकालना शुरू कर दी. मुझे लगा कि वह गाउन पहनेगी. पर उसने बस साड़ी, ब्लओज़ और पेटीकोत निकाले. पैंटी फिर पहन ली. उसके कमरे से जाने के पहले मैंने उसकी कांख मे मुँहा डाल कर उसका पसीना चाट लिया. पहले वह नाराज़ हुई और बोली

"हट क्या कर रहा है" कहने लगी पर फिर चुपचाप हाथ उठा कर खड़ी हो गयी. उसे गुदगुदी हो रही थी इसलिए वह हँस कर बार बार मुझे रोक देती. पर मैंने पूरा पसीना चाट कर ही उसे छोड़ा. वह अपने उतारे कपड़े बाथरुम मे ले जाने लगी तो मैंने उसके हाथ से ब्लओज़ छीन लिया.

"ये छोड़. दो मोम मेरे लिए. मीठी काफ़ी के पहले कुछ खारा मसालेदार स्वाद तो ले लूँ" मेरे मुँहा पर ब्लओज़ फैंक कर मोम झूठ मूठ का गुस्सा दिखाते हुए चली गयी.

"ना जाने तेरा पागलपन कब ख़तम होगा" मैं मोम का ब्लओज़ लेकर पलंग पर लेट गया और उसकी भीगी कांखे मुँहा मे लेकर चबाने और चूसने लगा.

इसी अर्धनग्न अवस्था मे जाकर वह काफ़ी बना लाई. मोम के उस रूप का मुझ पर प्रभाव होना ही था. अपनी सैंडले उसने अब भी पहन रखी थी. ब्रा और पैंटी मे उँची एडी की सैंडल पहनकर उसे इधर उधर चलते देखना ऐसा लगता रहा था जैसे किसी लिंगरी कंपनी की फैशन परेड हो रही हो. आधे घंटे के अंदर मैं फिर अपने काम मे जुट गया.

उस रात मैंने मोम को दो बार और चोदा. पहली बार पीछे से उसे घोड़ी बनाकर. सामने अलमारी के आईने मे मोम के लटककर डोलाते मम्मे और उसके चेहरे पर के कामना से भरे भाव दिख रहे थे. उसे बहुत मज़ा आ रहा था और बीच मे जब चुदासि असहनिय हो जाती तो उसकी मीठी छटपटाहट देखते ही बनती थी. उन लटकते मम्मों को मैं बीच बीच मे आगे झुक कर दबा देता.

दूसरी बार मैं नीचे लेटा रहा और मोम ने मुझपर चढ़कर मुझे चोदा क्योंकि मैं थक गया था पर लंड खड़ा था. आखरी चुदाई सबसे मीठी थी क्योंकि मेरा लंड काफ़ी देर खड़ा रहा और मोम ने भी मज़ा ले लेकर रुक रुक कर मुझे चोदा. बिलकुल चेहरे के सामने उसके उछलते स्तन मेरी मदहोशी को और गहरा कर देते. बीच मे ही मैं मोम की चुचियाँ दबाने लगता या उसे नीचे खींचकर उसकी घुंडियाँ चूसने लगता.

हम सोए तो लास्ट हो गये थे. सोते समय मों ने मुझे बाँहों मे भरकर पूछा

"तेरे दिमाग़ मे ये सब आसन कहाँ से आए बेटे? ऐसा अनुभवी लगता है जैसे कोई मंजा खिलाड़ी हो" मैंने मोम को कहा कि मोम मैने आपको बताया तो था कि राज शर्मा के कामुक-कहानियाँडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम पर ये सब कुछ देखा था उसमे संभोग कैसे किया जाता है और सेक्स की सारी जानकारी है उसी मे मैने ये आसान देखे थे

"और माँ, सपने मे ये सब मैं तेरे साथ कितनी ही बार कर चुका हू, इसलिए आज पहली बार करते हुए भी कोई तकलीफ़ नही हुई मुझे" मेरी गोटियाँ अब दुख रही थीं. लंड भी एकदमा मुरझा गया था. मोम ने मुझे प्यार से डाँटते हुए कहा

"अब कल कुछ नहीं. तेरा कल का भी सारा कोटा पूरा हो गया. बीमार पड़ना है क्या? अब दो तीन दिन के लिए सब बंद." मैंने मोम से खूब मिन्नटे कीं, बोला कि जैसा वह कहेगी मैं करूँगा, बस कम से कम एक बार कल मुझे चोदने दे. पहले वह नही मान रही थी, मेरी हज़ार प्रार्थना के बाद मान गयी "ठीक है, कल रात को. पर दिन भर अब अच्छे बच्चे जैसे रहना. मुझे भी घर के बहुत काम करने हैं."

दूसरे दिन रविवार था. हम आरामा से उठे. मोम ने घर का काम निकाला. मुझे भी लगा दिया. मेरा कमरा और मोम के बेडरूम को जमाया, पुराना सामान निकालकर फेका. उसी समय मेरी अलमारी की तह मे रखी कुछ मेगेज़ीन उसे मिलीं. वह पन्ने पलटने लगी तो चहरा लाल हो गया. हर तरह के तस्वीरे उसमे थीं. स्त्री पुरुष, स्त्री स्त्री, पुरुष पुरुष, ग्रुप, बड़ी उम्र की औरते और जवान लड़के.

"छी कितनी गंदी किताबे हैं. शरम नही आती तुझे" एक गुदा संभोग का चित्र देखते हुए उसने मुझे पूछा. उसकी साँसे तेज हो गयी थी उस चित्र को वह बहुत देर देखती रही. मैंने उसके गले मे बाँहे डाल कर कहा

"हाँ माँ, पर है बहुत मजेदार. है ना?" मोम ने उन्हे अपने कमरे की अलमारी मे रख दिया.

"अब से ये देखना बंद. तभी दोपहर को तरह तरह की हरकते करता रहता था" मोम उन्हे देख कर उत्तेजित हो गयी थी. पर उसीने मुझे कहा था कि आज मुहब्बत बंद है इसलिए आगे कुछ ना बोली. बस मुझे ज़ोर से चूमा लिया.

दोपहर को खाने के बाद मोम बाजार चली गयी. मुझे सुला कर गयी कि आराम कर. जब मैं शाम को उठा तो देखा कि मोम वापस आ गयी है और मेरे बाजू मे सो रही है. मैं उसे चिपटना चाहता था पर फिर सोचा वह भी थक गयी होगी. चुपचाप उठाकर उसकी पुरानी स्लीपरे बाथरूम ले गया. उन्हे खूब धोया और सुखाने को रख दीं. तभी मोम आ गयी. आश्चर्य से बोली

"अरे ये क्या कर रहा है? मैंने ली तो है नयी वाली तेरी पसंद की" मैंने कहा

"वो तो नयी है माँ, अभी उनमे तुम्हारे पैरों की खुशबू कहाँ लगी है! उन्हे बाद मे पहनना पहले इन्हे पहन कर घिसो तब मुझे मज़ा आएगा. तब तक के लिए मैंने ये सॉफ कर ली हैं"

"क्या करेगा इनका" मोम की बात पर मैंने कहा

"माँ, आज रात इन्हे पहनना ना प्लीज़, बहुत मज़ा आएगा" मोम ने चाय बनाई. मेरी बात से वह भी उत्तेजित हो गयी थी. उसकी आँखों से ही मुझे उसकी हालत का पता चल गया था. मेरा भी लंड खड़ा था. पर मोम से मैंने वादा किया था कि आज रात सिर्फ़ एक बार चोदुन्गा. एक बात भी मेरे दिमाग़ मे भर गयी थी, उसके लिए मोम की सहमति ज़रूरी थी.

उस दिन हम बाहर नही गये, घर मे ही आराम किया. शाम को मोम जब टी वी देख रही थी तो आख़िर मुझसे नही रहा गया. मैं जाकर उसके सामने नीचे बैठ गया और उसकी साड़ी उपर कर दी.

"अरे क्या कर रहा है? याद है ना मैंने क्या कहा था?" मों मेरे हाथ पकड़कर बोली.

"माँ, मैं सच मे अभी कुछ नही करूँगा. रात को ही करूँगा. पर तुम क्यों परेशान हो रही हो? मुझे बस अपनी बुर चूसा दो"

"चल हट, बड़ा आया बुर चूसने वाला. और उसके बाद क्या करेगा यह भी मालूमा है" मोम ने मेरे कान पकड़कर कहा.

"नही माँ, प्रामिस, बस तुम्हारी बुर चुसूँगा घंटे भर. मुझे महक आ रही है, मुझे मालूमा है कि तुम्हारी क्या हालत है. और कुछ नही करूँगा माँ, बिलकुल सच्ची. रात तक ना चोदने की प्रामिस तो मेरी है, तुमने ने झदाने की कोई प्रामिस थोड़े की है" मैंने अपने बचपन के अंदाज मे कहा. मोम निरुत्तर हो गयी, मेरा हाथ छोड़ कर बोली

"कर क्या करना है, तू मानेगा थोड़े, पर देख हाँ, तूने प्रामिस किया है" मोम की पैंटी निकालकर मैं उसकी चूत की पूजा मे लग गया. मोम बिलकुल गरमाई हुई थी, पाँच मिनिट मे ढेर हो गयी. मेरा सिर पकड़कर अपनी चूत पर दबाते हुए बोली "मैं मर गयी अनिल बेटे, बहुत अच्छा लग रहा है, तेरी जीभ तो जादू कर देती है मुझपर" मैंने मोम की जांघों से सिर उठाकर पूछा

"माँ, सच बताओ, सुबहा से तुम्हे चुदासि लगी है ना?"

"हाँ बेटे, तूने तो जादू कर दिया है मुझ पर, तेरी इस जवानी से दूर नही रहा जाता मुझसे, पर क्या करूँ, तेरी तबीयत का भी देखना है" मोम अपनी जांघों मे मुझे क़ैद करते हुए बोली.

"माँ, तुम मज़ा लो, मैं बस तुम्हारी बुर का रस चुसूँगा. मैंने सुना है औरते चाहे जितनी बार झाड़. सकती हैं, तो मेरे कारण तुम क्यों प्यासी रहो, ठीक नही है ये" मैंने फिर मोम की चूत मे जीभ डालते हुए कहा. मोम भी अब मूड मे आ गयी थी. उसने अपनी साड़ी नीचे की और मुझे उसके अंदर छुपा लिया. फिर मेरा सिर पकड़कर अपनी बुर पर कस कर दबाया और जांघों मे मेरे सिर को कैंची जैसा पकड़कर टांगे हिला हिला कर मेरे मुँहा पर हस्तमैथुन करने लगी.

जब मैं आधे घंटे बाद उठा तो मन भर कर मोम की बुर का पानी पी चुका था. मोम एकदमा तृपता हो गयी थी, सोफे मे पीछे लुढ़क गयी थी. मुझे खींच कर पास बिठाते हुए मुझे आलिंगन मे लेकर बोली

"अनिल, तूने मुझे जो सुख दिया है, उसकी मैं कभी कल्पना भी नही कर सकती थी." मेरे तन्नाए लंड को पैंट के उपर से टटोल कर वह बोली "अरे, यहा बेचारा तडप रहा है. बेटे, अभी चोदेगा मुझे? तेरी यहा प्यास मुझसे देखी नही जाती"

"नही माँ, रात को आरामा से बुझावँगा" मैंने कहा. मोम बहुत खुश थी

"आज रात जैसे चाहेगा मैं वैसे तुझे खुश करूँगी मेरे लाल" मेरे दिमाग़ मे एक ही बात घुम रही थी. मोम की गोद मे सिर छपाकर मैंने कहा

"माँ, आज ..."

"बोल ना रुक क्यों गया?"

"माँ, आज ...." उसके नितंबों पर हाथ रखकर मैंने कहा "आज पीछे से करने दो ना प्लीज़"

"अरे कल तो किया था पीछे से मुझे घोड़ी बनाकर" मोम ने कहा.

"हाँ माँ, वैसे ही पर तुम्हारी चूत मे नहीं, यहाँ पर.." मैंने उसके नितंबों के बीच उंगली जमा कर कहा.

"बदमाश, सीधे कहा ना मेरी गांद मारना चाहता है. क्या लड़का है! अभी बित्ते भर का है, अभी अभी जवान हुआ है, दो दिन हुए अपनी मोम को चोद कर और अब चला है उसकी गांद मारने. मैं नही मारने दूँगी जा, मुझे दुखेगा" मोम आज कितने कामुक मूड मे थी यहा उसके इन शब्दों के प्रयोग से सॉफ था. उसने मना ज़रूर किया था पर उसके लहजे मे डाँट नहीं, एक खिलाड़ीपन की भावना थी. याने शायद मान जाए, मैंने यह समझ लिया.

मोम को मनाने मे घंटा लग गया. वह खाना बना रही थी तब भी मैं उससे लिपट कर बार बार उससे इसी बात की मिन्नत कर रहा था. वह बस मंद मंद मुस्करा रही थी. उसे मेरे मनाने मे बहुत मज़ा आ रहा था. आख़िर तक उसने हाँ नही बोला पर जिस तरह से वह मेरी ओर देख रही थी, मैं समझ गया की मैंने बाजी मार ली है.

रात को बेडरूम मे मोम के आने के पहले मैं कपड़े निकाल कर तैयार हो गया. पलंग पर नंगा पड़ा मोम का इंतजार करता रहा. वेसलिन की शीशी मैंने पहले ही पलंग के पास के टेबल पर रख दी थी.

जब घर के सब लाइट बुझा कर मोम आई तो एकदम नंगी थी. बाथरुम मे ही कपड़े उतार कर आई थी. पूरा नग्न चलते हुए मैंने उसे पहली बार देखा था. उसके गुदाज स्तन चलते समाया डोल रहे थे. वह दरवाजा लगाने को मूडी तो मैं उसके नितंबों को देखता रह गया. उनके भी ठीक से पूरे दर्शन मुझे आज ही हुए थे. एकदमा मोटे भारी भरकम थोड़े लटके नितंब थे उसके, गोरे गोरे, मैदे के दो विशाल गोलों के समान. आज मुझे उनमे जन्नत मिलने वाली थी.

मैं पूरा गरमा हो चुका था, मोम पर कब चॅढू ऐसा मुझे हो गया था. मोम आक़र मेरे पास बैठी. उसने नई स्लीपर पहनी हुई थीं. मेरा खड़ा लंड देखकर बोली

"एकदमा तैयार लगता है मेरा बेटा मेरी सेवा करने के लिए. चल, तू लेटा रहा, मैं तुझे चोदति हू" मैं घबराकर बोला

"माँ, ऐसा जुल्म ना करो, तुमने वायदा किया है कि आज मुझसे गांद मरवाओगि."

"मैंने कब ऐसा कहा" मोम मुझे चिढ़ाते हुए बोली. उसने झुक कर अपने पैरों मे की चप्पले निकाल लीं. फिर मेरे लंड को उनके दो नरम नरम पाटों मे रखकर बेलने लगी. मैं पागल सा हो गया. लगता था कि अभी झाड़. जवँगा. मेरी मोम खुद मुझे अपनी चप्पालों से रिझा रही थी.

"ममी, मई झाड़. जाउम्गा! प्लीज़ मत करो, आज एक ही बार झड़ना है मुझे, मुझे अपनी गांद मारने दो ना" मैं गिड-गिदाने लगा. मोम दुष्टता से बोली a

"अच्छा है झाड़. जाएगा. कम से कम मेरी गांद तो बच जाएगी. मैं नही मराती बाबा" मेरी हालत खराब थी. झाड़. ना जाउ इसलिए मैं पलंग से उठ कर भागा और दूर खड़ा हो गया. किसी तरह सनसनाते लंड पर काबू किया. मोम मेरा हाल देखकर पासीज गयी. पलंग पर लेटते हुए बोली "मैं मज़ाक कर रही थी मेरे लाल, देख रही थी कि चप्पालों का तुझ पर क्या असर होता है, तू सच मे इनका शौकीन है. आ कर ले तुझे जो करना है. तेरा यह मूसल मेरी फाड़. देगा शायद पर तेरी खुशी के लिए मैं यह दर्द भी सह लूँगी." मैंने मोम के पास जाकर उसकी बुर का चुंबन लेते हुए कहा.

"नही माँ, मैं कम से कम दर्द होने दूँगा तुझे. बहुत प्यार से लूँगा तेरी. अब पलट कर लेट जाओ" मोम पेट के बल लेट गयी.

"ले मार" उसके फूले विशाल नितंबों को हाथों से सहलाकार मैं बोला

"पहले इन्हे प्यार तो कर लेने दो माँ, कब से तरस रहा हू इनके लिए" और मैं मोम के नितंबों पर भूखे की तरह टूट पड़ा. अगले पाँच मिनिट मेरे लिए ऐसे थे जैसे भूखे के आगे दावत रख दी गयी हो. मैंने मोम के नितंब चाते, उन्हे खूब चूमा, हल्के हल्के दाँत से काटा और फिर उन्हे अलग करके देखने लगा. बीच का भूरा सकरा छेद मुझे आमंत्रित कर रहा था. मैंने उसे चूमना शुरू कर दिया. जीभ बाहर निकालकर उसे लगाई. मोम बिचक गयी.

"अरे क्या कर रहा है? पागल तो नही है, कहाँ मुँहा लगा रहा है." मैंने मोम का गुदा चूमते हुए कहा

"तुम नही समझोगी माँ, मेरे लिए यहा जन्नत का दरवाजा है" मोम भी अब गरमा गयी थी. नीचे से खुद ही अपनी उंगली से अपनी चूत को रगड़. रही थी.

"अनिल जल्दी कर ना, फिर मैं करती हू मुझे जो करना है"

"माँ, चलो घोड़ी बन जाओ कल जैसी, पर पलंग के छ्होर पर" मेरी बात मान कर मोम घोड़ी बन गयी. पीछे से अब उसकी चूत और गांद का छेद दोनों दिख रहे थे. चूत मे से पानी बह रहा था. पहले मैंने उसके नितंब पकड़.आकर उसकी बुर को चाटना शुरू कर दिया. जब वह और गरम हो गयी और अपने कूल्हे हिलाने लगी तब मैंने वेसलिन की शीशी उठाकर अपने लंड मे खूब सा वेसलिन चुपद. लिया. फिर उंगली पर थोड़ा लेकर मों के गुदा मे उंगली डाल दी. क्या कसा था मोम का छेद!

"उई मों , धीरे से रे" मोम बोली. मैं हँसने लगा

"माँ, अभी तो एक उंगली डाली है, फिर दो डालूँगा और फिर लंड दूँगा अंदर. तू सच मे टाइत है, कुँवारी कन्या जैसी"

"चल बाते ना बना, जल्दी कर" मोम ने परेशान होकर कहा. मैंने एक उंगली अंदर बाहर करके ठीक से अंदर तक वेसलिन चुपद. दिया. फिर दो उंगली मे लेकर वैसा ही किया. इस बार मोम को ज़्यादा दर्द हुआ पर वह बस सिसक कर फिर चुप हो गयी. इस बार मैंने खूब देर मोम की गांद मे दो उंगलियाँ की कि उसे आदत हो जाए.

आख़िर उंगलियाँ निकालकर मैं उसके पीछे खड़ा हो गया. उसके नितंब एक हाथ से पकड़कर दूसरे से सुपाड़ा उसके गुदा पर जमाया

"तैयार हो जा माँ, मैं अंदर आ रहा हम तेरे पीछे के दरवाजे से." मैंने लंड अंदर पेलना शुरू किया. मों ने गांद सिकोडी हुई थी इसलिए अंदर नही जा रहा था. "माँ, ज़रा ढीला छोड़ो ना, रिलैक्स करो"

"ठीक है अनिल, पर तेरी दो उंगली अंदर जाती है तो दर्द होता है, तेरा ये मूसल जाएगा तो क्या होगा" मोम ने चिंतित स्वर मे पूछा.

"मूसल कहाँ है माँ, बिलकुल छोटा है, लोगों के तो कितने बड़े होते हैं, दस दस इंच के" मैने मन ही मन खुश होते हुए कहा. मुझे हमेशा लगता था कि मेरा लंड और थोड़ा बड़ा होता तो मज़ा आता. पर मोम को मेरा लंड बड़ा लगता था यह सुनकर बहुत अच्छा लगा.

मों ने एक साँस ली और अपना गुदा थोड़ा ढीला किया. मैंने तुरंत सुपाड़ा मोम की गांद के छल्ले के अंदर कर दिया. मोम का शरीर कड़ा हो गया और उसके मुँहा से एक हल्की चीख निकल गयी. मैंने लंड पेलना बंद कर दिया. मोम को पूछा

"माँ, बहुत दुख रहा है क्या? निकाल लूँ बाहर"

"नही बेटे, अभी मैं ठीक हो जवँगी. बस एक मिनिट रुक जा" कुछ देर बाद मैंने महसूस किया कि मों के गुदा का छल्ला थोड़ा ढीला हो गया है. उसका शरीर जो तन सा गया था, थोड़ा रिलैक्स हो गया. मैंने फिर लंड पेलना शुरू किया. मोम बीच मे सीत्कार उठती "अनिल, बहुत दुखाता है रे" तब मैं रुक जाता. पर मोम ने मुझे यह नही कहा कि बेटे निकाल लो, मैं नही मरा सकती.

क्या आनंद था, क्या सुख था, मोम की मुलायामा गांद मे जैसे मेरा लंड अंदर धँसाता गया, मुझे ऐसे लगाने लगा कि घच्च से एक बार पेल दूं और ज़ोर से चोद डालूं. पर मैंने खुद पर पूरा नियंत्रणा रखा, आख़िर मेरी प्यारी मोम थी, कोई चुदैल रंडी नहीं. और मोम ने मेरी खुशी के लिए इस दर्द को भी हँसते हँसते स्वीकार कर लिया था तो मेरा भी फ़र्ज़ था कि मैं उसे तकलीफ़ ना होने दूं.

आख़िर मेरा लंड जड़. तक मोम के नितंबों के बीच समा गया और मेरा पेट उनसे सॅट गया. मैं एक मिनिट बस खड़ा रहा. अपने हाथों से मोम की पीठ और नितंब प्यार से सहलाता रहा. आख़िर मोम बोली

 

"अब ठीक है राजा. अब दर्द कम है. मुझे लग रहा था जैसे मेरी फट ही जाएगी."

"माँ, अब गांद मारूं?" मैंने उत्सुकता से पूछा.

"मार बेटे पर धीरे धीरे, आज पहली बार है, तू चोदते समाया जैसे धक्के लगाता है, वो मैं सहा नही पाउन्गि." मैंने मोम के कूल्हे पकड़कर धीरे धीरे उसकी गांद मारना शुरू कर दिया. मज़ा आ गया. उसकी मखमली म्यान मुझे ऐसे पकड़े थी जैसे किसीने मुठ्ठी मे मेरे लंड को पकड़. लिया हो. वेसेलीन के कारण लंड फिसल भी बहुत अच्छा रहा था. धीरे धीरे मेरी लय बँध गयी. आँखे बंद करके मैं इस स्वर्गिक सुख का आनंद लेने लगा पर ज़्यादा देर नहीं! तिलमिला के झाड़. गया. झदाने के बाद मोम बोली

"अच्छा लगा अनिल? मज़ा आया जैसा तू सोचता था?"

"माँ, तुमने तो मुझे अपना गुलामा बना लिया. बहुत मज़ा आया मामी, थैंक्स" हाफते हुए मैं बोला. जब झड़ना बंद हुआ तो मैं लंड बाहर निकालने लगा.

"अरे रहने दे ना, क्यों निकालता है, इतनी मुश्किल से डाला है, आ मेरे उपर लेट जा" कहकर मोम ओन्धे मुँहा बिस्तर पर लेट गयी. मैं भी उसके साथ सरकता हुआ उसके उपर लेट गया. मेरा झाड़ा लंड अब भी मोम की गांद मे फँसा था.

मैं मोम के बाल और गर्दन चूमता हुआ उसके मम्मे दबाने लगा. मोम के गुदाज शरीर पर लेटने का मज़ा ही अलग था.

"मोम मेरा फिर खड़ा हो जाएगा" मैंने उसे चेतावनी दी. "फिर निकालने मे मुश्किल होगी, सुपाड़ा फँसेगा अंदर"

"मैंने कब निकालने को कहा बेटे ऐसे में" मोम ने सिर घुमाकर मुझे चुम्मा देते हुए कहा. मैंने बड़ी आशा से पूछा

"याने माँ, मैं फिर से ..."

"हाँ. एक बार और मार ले मेरी. तुझे इतना अच्छा लगता है, अभी जल्दी मे ठीक से कर भी नही पाया मेरे लाल. अभी मुझे भी ठीक लग रहा है, दर्द नही है" मैं खुशी से मोम के बाल और पीठ चूमने लगा. उसके निपल कड़े थे, वह मस्ती मे थी. खुद ही अपनी एक हाथ अपनी जांघों के बीच चला रही थी. मेरा लंड अब फिर सिर उठाने लगा था और धीरे धीरे मोम के चुतदो की गहराई मे उतार रहा था.

"मोम अब इस बार घंटे भर तक तेरी मारूँगा" मेरी इस बात पर मोम बोली

"मार, दो घंटे मार, पर फिर मेरी बारी है, तुझसे पूरा हिसाब लूँगी" उसके स्वर मे गजब की खुमारी थी.

"तुम कुछ भी करवा लो माँ, मैं तैयार हू" कहकर मैंने मोम की गांद मारना शुरू कर दी. उसके स्तन पकड़े हुए उन्हे दबाते हुए, मोम की पीठ चूमते हुए, बीच मे उसके मुँह को अपनी ओर मोड़. कर उसके चुममे लेते हुए मैंने मज़े ले ले कर मोम की गांद मारी. अब वह मेरे लंड की आदि हो गयी थी इसलिए मस्त लंड फिसल रहा था. हाँ मोम बीच बीच मे मुझे तड़पाने को अपनी गांद सिकोड. लेती तो मेरी स्पीड कुछ कम हो जाती. मैं अब भी पूरे धक्के नही लगा रहा था, आज पहली बार मोम को इतनी तकलीफ़ देना ठीक नही था. हाँ मन ही मन सोच रहा था कि अगली बार से मोम की गांद ऐसे हचक हचक के चोदुन्गा की वह भी क्या याद करेगी. पूरा लंड बाहर निकाल निकाल कर अंदर तक पेलुँगा.

इस बार मुझे पूरा मज़ा मिला, मन भर कर मोम की मखमली नली को मैंने चोदा. मोम गरम होकर अपनी चूत मे खुद उंगली कर रही थी

"अनिल राजा, कितना पानी बह रहा है देख, जब तेरा हो जाएगा तो तुझे पिलावँगी. घंटे भर चुसववँगी तुझसे, बहुत नोचा है तूने मुझे आज" मोम की इस बात पर मैंने उत्तेजित होकर फिर सात आठ धक्के लगाए और झाड़. गया. मोम के उपर से उतर कर मैं बाजू मे हुआ. मोम की गांद का छेद अब खुल सा गया था, अंदर की गुलाबी नली दिख रही थी. मोम तुरंत पलट कर उठ बैठी और मुझे नीचे सुला कर मेरी छाती के दोनों ओर घुटने जमा कर तैयार हो गयी.

"दो तकिये ले ले और नीचे सरक" उसने आदेश दिया. फिर आगे सरक कर अपनी बुर मेरे मुँह पर रखकर बैठ गयी. उसकी बुर से ढेर सारा पानी बह रहा था. मैंने चुपचाप उसे चाटना शुरू कर दिया. मोम मेरा सिर पकड़कर अपनी बुर पर दबाते हुए मुझपर चढ़. बैठी और अपनी जांघों मे मेरे सिर को जकाड़कर हचक हचक कर मेरा मुँह चोदने लगी.

मोम ने उस रात सच मे घंटे भर मुझसे बुर चुसवाई. उसकी वासना शांत ही नही होती थी. जब मेरे मुँहा को चोदते हुए थक गयी तो बिस्तर पर अपनी बगल पर लेट गयी और मेरा सिर अपनी जांघों मे भर कर धक्के मारने लगी. मेरे सिर को वह ऐसे कस कर अपनी जांघों मे पकड़े थी जैसे उसे कुचल देना चाहती हो. मुझे कुछ दुख भी पर उन मदमाती जांघों मे गिरफ्तारी का मज़ा उस दर्द से ज़्यादा था. जब हम सोए तो बिलकुल निढाल हो गये थे. मोम ने सोने के पहले मुझे कहा

"रोज ज़िद मत करना अनिल बेटे, हफ्ते मे एक बार ठीक है तेरा यह गांद मारना, उससे ज़्यादा नही मारने दूँगी" मैं असल मे रोज मारने के ख्वाब देख रहा था पर जब उसने कहा कि काफ़ी दुखाता है तो मैं चुप रहा. मेरे लिए यही बहुत था किवाह बीच बीच मे गांद मरवाने को तैयार थी.

अगले दिन से मोम का ऑफीस शुरू हो गया. दो दिन की धुआँधार चुदाइ के बाद मेरा और मोम का संभोग अब एक अधिक संयम रूप मे चलने लगा. मोम जल्दी वापस आने की कोशिश करती थी पर अक्सर लेट हो जाती थी. थक भी जाती थी इसलिए रोज मैं उसे बस एक बार चोदता. अगर एकाध दिन्वह जल्दी वापस आती तोवह कुछ देर सो लेती थी और फिर रात को उसकी वासना ऐसी निखरती कि उसे शांत करने को मुझे अपना पूरा ज़ोर लगाना पड़ता था. अब मैने दोपहर के अपने खेल भी बंद कर दिए थे. मेरा सारा जोश अब मोम के लिए मैं बचा कर रखता था. मोम के घर आते ही पहला काम मैं यह करता कि जब तकवह कपड़े बदलती, मैं उसकी कांखे चाट लेता. उसे चूम कर उसके गाल और माथे पर आए पसीने को सॉफ कर देता.

रविवार को हमारी रति पूरे ज़ोर मे चलती. हफ्ते भर का संयम उस दिन हम ताक पर रख देते. हम साथ साथ नहाते और तभी से शुरू हो जाते. दोपहर को भी रति पूरे निखार मे होती. एक बार वायदे के अनुसार रविवार रात मोम मुझे अपनी गांद मारने देती. उस मौके की मैं हफ्ते भर राह देखता था. रविवार शाम को हम घूमने जाते थे, शॉपिंग करते थे. मोम ने एक दिन कुछ और ब्रा और पॅंटी भी खरीदी. मुझेवह साथ ले गयी और मेरी पसंद की ली. मुझे थोड़ी शरम लग रही थी, वाहा की सेल्स गर्ल के साथ तरह तरह की ब्रा देखने मे बड़ा अटपटा लग रहा था. दुकान मे बस औरते ही थी. पर मोम ने कोई परवाह नही की, मुझे दिखाकर मेरी पसंद पूछकर दो ब्रा और पॅंटी ली. मैं बाहर आकर बोला तो हँसने लगी.

"यहा कौन हमे पहचानता है!" मोम मे जो बदलाव आया था उसकी मैं पहले कभी कल्पना भी नही कर सकता था. अपने जवान किशोर बेटे के साथ संभोग ने उसकी वासना को निखार दिया था. इतने सालों की भुख्वह मानो एक दिन मे बुझा लेना चाहती थी. मुझपर तो अब्वह इतना प्यार करती कि हद नही. एक मोम की तरह मेरे खाने पीने कपड़ों और सेहत का ख़याल करती, सुबह जल्दी उठाकर खाना बना कर जाती कि मुझे बाहर ना खाना पड़े. फिर प्रेयसी के रूप मे मुझसे इतना अभिसार करती जैसी कोई नववधू भी अपने पति के साथ नही करती होगी.

मोम ने मेरी हर कमज़ोरी अच्छी तरह से भाँप ली थी और वह बड़ी चालाकी से उनका उपयोग करने लगी थी. मुझे उत्तेजित करती और अपना काम निकाल लेती. उदाहरण एक रात वह ज़रा ज़्यादा ही गरमा गयी थी. मैंने उसके चूत चॅटी और फिर दो बार उसे कस कर चोदा. फिर भी उसका मन नही भरा था.

मैं पलंग पर लास्ट पड़ा था. लंड फिर से खड़ा होने का कोई चांस नही था. मोम मेरे पास लेटकर मुझे चूमते हुए, मेरे मुँह मे अपनी चुचि देते हुए उसे हाथ से मसलकर अपनी भरसक कोशिश कर रही थी. मैंने भी कहा

"ममी सॉरी, अब मुझसे नही होगा" वह हँस कर बोली

"ठीक है, ना सही. चल एक खेल खेलते है. तेरा चप्पल वाला खेल नही देखा बहुत दिन से. आज ज़रा करके बता" मेरी इच्छा नुसार्वह हमेशा अपनी सैंडल या रबर की स्लिपर पहने रहती, चुदाइ के समय भी. उसने अपनी एक स्लीपर उतारी और मेरा सिर अपनी गोद मे लेकर पलंग के छोर से टिक कर बैठ गयी. अपना दूसरा पैर बढ़ा कर उसने मेरे मुरझाए लंड को अपने पैर के तलवे और चप्पल के बीच पकड़ लिया. फिर धीरे धीरे उसे रगड़ने लगी. मोम के कोमल तलवे और चप्पल के मुलायम रबर की फाइलिंग, मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. फिर उसने कहा

"मूह खोल ना अनिल"

"क्यों मोम ?" मैने कहा. अपने हाथ की स्लीपर मेरे होंठों पर हौले हौले रगड़ते हुएवह बोली

"चाट ना मेरी चप्पल. आज बहुत देर पहनी है. तुझे मज़ा आएगा" मैने उसकी आँखों मे देखा.वह मज़ाक नही कर रही थी. मोम की आँखे कामना की खुमारी से भरी थी. मैने जीभ निकालकर उसे चाटना शुरू कर दिया. बहुत उत्तेजना हुई. मोम अब खुद मेरी फेटिश को बढ़ावा दे रही थी. उसने भी खिलखिलाते हुए मुझे सताना शुरू कर दिया. कुछ देर चाटने देती, फिर अचानक उसे मुहासे दूर कर देती. कभी चप्पल का छोर मेरे मूह मे डाल देती और कहती

"ज़रा चूस कर देख ना, मोम का भक्त है ना तू, मोम के चरणों का पुजारी! ले आज करके बता अपनी पूजा ठीक से" दस मिनिट मे मेरा लंड खड़ा हो गया. ऐसा तन्नाया जैसे झाड़ा ही ना हो. मैं अब अपनी कमर हिला हिला कर मोम के तलवे को चोदने की कोशिश कर रहा था. उसने तब तक यहा खिलवाड़. जारी रखा जब तक मेरा कस कर खड़ा नही हो गया. फिर तुरंत मुझे पलंग पर लिटा कर मुझपर चढ़. गयी और मुझे चोदने लगी. अपनी चप्पले उतार कर उसने मेरे मुँह पर रख दीं.

"ले बेटे, तेरे खिलौने. तू इनसे खेल, मैं अपने खिलौने से खेलती हू" मैंने मोम की चप्पले गालों से सटा ली और उन्हे बेतहाशा चाटने और चूसने लगा जैसा पहले मूठ मारते समय करता था. बस वह मेरी ओर देखकर हँसती जाती और मुझे चोदति जाती. उसकी उछलती छातियों और मुँहा पर पड़ी चप्पालों ने मुझपर ऐसा जादू किया कि मैं झदाने को आ गया.

मोम ने तुरंत चोदना बंद कर दिया. चप्पले भी मुझसे छीन ली. तब तक बैठी रही जब तक मेरा ज़ोर कम नही हो गया. फिर मुझे चोदने लगी. उस रात उसने पंद्रहा बीस मिनिट मुझे तड़पा तड़पा कर चोदा. जब खुद पूरी तृपता हो गयी तब मुझे झड़ाया. मैं इतना थक गया था कि बेहोश सा हो गया, लॅंड और गोटियाँ भी दुख रहे थे. मोम ने बत्ती बुझाकर मुझे बाँहों मे लिया और चुम कर सॉरी बोली

"अब सो जा बेटे, क्या करू, आज तू इतना नमकीन लग रहा था कि मेरा मन ही नही भर रहा था. पर सच बता, मेरी चप्पालों को चाटने मे मज़ा आया ना?" मोम की पसंद के दो काम थे. एक मुझसे बुर चुसवाना और मुझे उपर से चोदना. मुझे भिवह उसपर चढ़कर चोदने देती थी पर मुझे नीचे सुलाकर चोदना उसे ज़्यादा अच्छा लगता था. डॉमिनेंट पार्ट्नर बनाने का कोई मौका वा नही छोड़ती थी. उसके पीरियड के दिनों मे ज़रूर परेशानी होती थी. मेरा भी उपवास हो जाता था, दोनों तरह का, चोदने भी नही मिलता था और मोम की बुर का रस भी बंद हो जाता था. मोम से मैने कहा तो बोलती कि अच्छा है, तीन चार दिन तुझे भी आराम मिलना ज़रूरी है. और इससे तू ज़रा संयम रखना भी सीख जाएगा, तेरी सेहत के लिए भी अच्छा है. उसके स्तनों से खेलना मुझे बहुत अच्छा लगता. कई बार मैं उन्हे चुसते हुए कहता

"मोम दूध पीला ना बचपन जैसा" तो कहती

"अब इनमे दूध कैसे आएगा बेटे, तुझे रुकना पड़ेगा अपनी शादी होने तक, अपनी दुल्हनिया का दूध पीना" मैं कहता

"मैं शादी वादी नही करूँगा. मेरे पास तुम जो हो" मोम कहती

"तो मैं बुद्दी हो जाउन्गि तो क्या करेगा?" मैं कहता

"तुम और खूबसूरत लगोगी, फिर तुझमे ज़्यादा दम भी नही रहेगा. तब मैं ज़बरदस्ती तुझे पटक पटक कर चोदा करूँगा" वाह हँसने लगती. एक बार मैंने मोम से कहा

"माँ, मुझसे शादी कर लो" उसने मेरी ओर देखा तो मैं बोला "सच कहा रहा हू. चार साल बाद मैं इंजीनियर हो जाउम्गा, हम दूसरे शहर जाकर रहेंगे मिया बीवी बनकर. फिर तुम गर्भवती होना और मुझे दूध पिलाना"

आधी हँसी और आधी सिरियसनेस मे कही मेरी बात तो उसने नही मानी, हाँ एक रविवार के दिन हमने झूठ मूठ की शादी की. बहुत मज़ा आया. मैंने फिर कहा कि माँ, मुझसे शादी कर लो तो मोम बोली ठीक है. हम जब घूमने गये तो मोम ने एक मंगलसूत्रा खरीद लिया, मेरी पसंद का, काले मनियों वाला क्योंकि मैं जानता था कि उसके गोरे गले और छाती पर वह बहुत सुंदर लगेगा. वापस आते समय हमने दो हार ले लिए. मोम ने सिंदूर की एक डिब्बी ले ली. मैंने बेड को सजाने के लिए ढेर से फूल ले लिए. वही एक पिक्चर की दुकान मे कामदेव और रति के न्रुत्य का एक रंगीन फोटो था. मोम ने उसे भी खरीद लिया. मैंने पूछा तो थोड़ी शरारत से बोली कि भगवान के आगे शादी करना है तो इनसे अच्छे कौन भगवान हो सकते है हमारे लिए.

घर आकर मैंने बेदरुम को फूलों से सजाया, बिस्तर पर फूल बिखरा लिए. फिर कुरता पाजामा पहन कर तैयार हुआ. मोम ने अपनी एक सिल्क की साड़ी निकाली. खूब बनथन कर तैयार हुई. गहने पहने. जुड़े मे मोगरे की वेणी लगाई. उसे खूब हँसी आ रही थी, सारा एक मजेदार खेल था.

फिर कामदेव और रति के उस पिक्चर के आगे हमा दोनों ने एक दूसरे को माला पहनाई. मैंने मोम को मंगलसूत्र बाँधा. फिर उसकी माँग मे सिंदूर भरा. वह मुस्काराकर मेरी ओर देख रही थी. मैंने झुक कर मोम के पाँव छुए और फिर लेटकर उसके पाँव चूमने लगा. वह हँस कर बोली

"ये क्या कर रहा है, तू अब मेरा पातिदेव हुआ ना? तो मुझे तेरे पाँव छूने चाहिए" मैंने कानों को हाथ लगाकर कहा

"क्यों मुझे पाप लगाती हो माँ? मैं तो वो जोरू का गुलामा वाला पति हू तुम्हारा" फिर हमने "किसिंग दा ब्राइड" वाला किस किया. मोम बोली

"मालुम है आज के दिन पति पत्नी को उठा कर बेडरूमा मे ले जाता है" मैंने तुरंत उसे बाहों मे उठा लिया. काफ़ी भारी थी, मुझसे सम्हल नही रही थी. मोम भी घबरा कर बोली

"अरे धीरे, उतार दे मुझे, गिरा देगा" पर मैं उसे उठा कर किसी तरह ले गया. मोम ने मेरे गले मे बाँहे डाल दीं. उसे अंत तक लग रहा था कि मैं उसे पटक दूँगा पर किसी तरह मैं उसे पलंग तक ले ही गया. मोम पलंग पर लेटटी हुई मुझे बोली

"आइए प्राणनाथ, आपकी प्रियतमा आपके लिए तैयार है" और फिर मुँहा दबा कर हँसने लगी. उस रात हमने संभोग करते हुए ऐसी ही भाषा का प्रयोग किया. मोम नववधू की ऐकटिंग करती और मैं दूल्हे की. यहा बात अलग है कि बार बार मुझे और मोम को हँसी आ जाती. उस रात मैंने मोम को बहुत प्यार से चोदा. उसके नग्न गोरे स्तनों के बीच झूलता काला मनियों वाला मगलसूत्र बहुत सुंदर लग रहा था. ख़ास कर जब मोम ने मुझपर चढ़. कर मुझे चोदा तो उसकी उछलती डोलाती छातियों के बीच हिलता मंगलसूत्र मेरी मस्ती को बढ़ा रहा था.

मेरा एडमिशन इंजीनियरिंग मे हो गया. उसके बाद मोम ने मुझपर थोड़ा अंकुश लगा दिया. पढ़ाई करना भी ज़रूरी था. रोज वह देखती की मैंने पढ़ाई की या नहीं. नही तो वह मुझे अपने पास नही सोने देती थी. इसलिए मैंने भी पढ़ाई का नुकसान नही होने दिया. मोम बेचारी रात को थॅकी होने के बावजूद एक बजे तक जागती जब तक मेरी पढ़ाई पूरी नही हो जाती. फिर मुझे चोदने देती थी.

जब मिडसेमिस्टर मे मैं पास हुआ तो मोम की जान मे जान आई.

"ऐसे ही पढ़ाई किया कर बेटे, तू जो कहेगा तुझे मैं वह दूँगी"

"हाँ माँ, बस मुझसे सच्ची की शादी कर ले, मुझसे गर्भवती हो और मुझे अपना दूध पीला, मुझे और कुछ नही चाहिए" मैं हमेशा उस से कहता.

बीच बीच मे हमा एक दूसरे के शरीरों को भोगने के नये नये तरीके ढूंढते रहते. एक रविवार को मैं जब सो कर उठा तो मोम किचन मे खाना बना रही थी. मैं मुँह धो कर उसके पास गया और पीछे से उसे बाँहों मे भर लिया. मेरी फरमाइश के अनुसार मोम अब घर मे गाउन के बजाय बस एक सादी और एक स्लिवल्स ब्लाउz पहनती थी, और कुछ नहीं. इससे मुझे उसके मम्मे चूसने या चूत चाटने मे बहुत आसानी होती थी. अब भी मोम ने बस एक पतली साड़ी और ब्लओज़ पहना था. खाना बनाने से उसको पसीना आ रहा था.

मैंने उसके कंधों और गर्दन का चुंबन लिया. पसीने के खारे स्वाद से मेरा लंड कस कर खड़ा हो गया. उसे मोम के चूतड़ के बीच की खाई मे सटाकर रगड़ता हुआ मैं मोम के गाल और माथा चूमने लगा जहाँ उसे पसीना छलक आया था. वह झूठ मूठ मुझे डाँतति हुई

"अरे परेशान मत कर, नही तो आज खाने को नही मिलेगा" मुझे दूर करने की कोशिश कर रही थी पर उसमे कोई दम नही था. उसे भी मेरा यहा चिपटना अच्छा लग रहा था. मैंने उसके हाथ पकड़कर उपर कर दिए और झुक कर उसके बगले चाटने लगा.

"अरे क्या कर रहा है, छोड़." वह बोली पर मैं चाटता रहा. उसने परेशान होकर गैस बंद कर दिया और हाथ उठाकर खड़ी हो गयी.

"ले कर क्या करना है, तू मानेगा थोड़े" मोम के स्तन दबाते हुए मैंने उसकी कांखे छाती, उसके अमृत से पसीने का स्वाद लिया. मेरा लंड फनफना रहा था. मोम के भी निपल कड़े होकर उभर आए थे. वह भी मस्ती मे आ गयी थी. मेरा लंड अब उसके मांसल नितंबों के बीच फँसा था. मुझसे नही रहा गया. मैं उसके पीछे नीचे बैठ गया और उसकी साड़ी उपर करके उसकी गांद चूसने लगा. मोम के चूतड़. फैला कर उनके बीच के उस मुलायम टाइत छेद मे अपनी जीभ डालकर अंदर बाहर करने लगा. बीच मे उसमे नाक डालकर सूंघने लगता. मोम बस कहती रही

"अरे ये क्या शैतानी है, अभी रात नही हुई है, और मैंने नहाया भी नही है बेटे, चल छोड़." पर मैंने उसकी नही मानी. आख़िर मेरी वासना अनावर हो गयी


"माँ, प्लीज़ मुझे तुम्हारी गांद मारने दो ना" मोम मना कर रही थी पर फिर मेरे लंड की सख्ती से मेरी हालत का अंदाज़ा लगाकर मान गयी

"आज बहुत मस्त है तू, अच्छा चल मार ले, पर अगर अभी मारी तो रात को नही मारने दूँगी. अब चल बेडरूम में"

"नही माँ, यही मारूँगा, खड़े खड़े, किचन के प्लेटफार्म से तुझे सटाकर, खाना बनाते हुए" मोम निरुत्तर हो गयी. उसे समझ मे नही आया कि क्या कहे. मैंने उठाकर रोटी मे लगाने के लिए रखा घी उंगली पर लिया और उसकी गांद मे और अपने लौदे पर चुपद. लिया. फिर मोम के चूतड़. फैला कर उसे अंदर पेल दिया. आज मेरा लोहे के रोड जैसा खड़ा था इसलिए सत्त से आधा अंदर चला गया. अब तक मरा मरा कर मोम की गांद भी कुछ खुल गयी थी और उसे आदत होने से वह भी बिना गांद सिकोडे मेरा अंदर ले लेती थी.

"ओहा ओहा ज़रा धीरे राजा, दुखता है ना, ऐसा वहशी जैसा क्या कर रहा है आज" मोम ने दर्द से सिसककर कहा. पर मुझपर आज एक अलग नशा सा चढ़. गया था. उसकी सिसकारी की परवाह ना करके एक और धक्के के साथ मैंने लंड पूरा अंदर उतार दिया और फिर उसके ब्लओज़ के अंदर हाथ डालकर उसकी चुचियाँ मसलता हुआ कस के उसकी गांद मारने लगा. आसन अच्छा था क्योंकि किचन प्लैटफार्म ठीक मोम के पेट पर होने से उसका सपोर्ट अच्छा मिल रहा था. मेरे हर धक्के से उसका पेट ग्रेनाइट पर दब जाता और उसके मुँहा से आह निकल आती.

मैं आज मोम का स्तनमर्दन बड़ी बेरहमी से कर रहा था. नही तो उसके उन प्यारे उरजों का मैं बहुत ध्यान रखता था. पर आज इस तरह उसे दबोच कर उसकी गांद मारने मे मुझे अजीब सुख मिल रहा था, बलात्कार जैसा वर्ज्य सुख. मोम को भी दर्द हो रहा था क्योंकि वह सिसक रही थी

"उई माँ, मर जाउम्गि बेटे, ज़रा धीरे, उ& उ& ओह ओह अरे कितनी ज़ोर से मसल रहा है मेरी छाती!" कहती कराह रही थी. अंत मे मैंने इतने ज़ोर से धक्के लगाए कि मोम के मुँहा से एक हल्की सी चीख निकल पड़ी. जब मैं झाड़ा तब मेरा नशा उतरा. लंड बाहर निकालकर मैंने मोम से माफी माँगी.

"मोम, बुरा मत मानो प्लीज़, मुझसे आज रहा नही गया. अब ऐसा नही करूँगा"

"अरे पर आज तुझे हुआ क्या? इतने दिन हो गये मुझे चोदते हुए, गांद भी मार चुका है दर्जनों बार, फिर भी ऐसा कर रहा था जैसे पहली बार औरत को देखा हो" मोम ने कपड़े ठीक करते हुए कहा. वह टटोल कर अपने गुदा को देख रही थी, लग रहा था कि काफ़ी दुखा होगा.

"मेरी ये छातियाँ देख, कैसी मसल दी है तूने, लाल हो गयी हैं" मोम ने मुझे उलाहना देते हुए कहा. मैं क्या कहता. असल मे मोम का पसीना, उसकी वह पीछे से दिखती मादक काया, पतली साड़ी के अंदर से झलकते मोटे चूतड़., कुछ समा ही ऐसा बँध गया था. मोम ने मेरी इस हरकत पर और कुछ नही कहा. हाँ दिन भर मुझे पास नही आने दिया. मैं सोच रहा था कि गया कॅयामा से. पर उस रात वह बहुत गरम थी. खुद ही मुझे खाना खाने के बाद पकड़कर बेडरूम मे ले गयी. दो तीन घंटे की तरह तरह की रति क्रीड.आओं के के बाद वह शांत हुई. मोम से मैंने फिर सुबह के बारे मे पूछा तो बोली

"अब जाने दे, कभी कभी चल जाता है! मुझे दुखा तो बहुत पर सच बतओं मेरे राजा, तेरी उस वहशी जैसी हरकत से मुझे मज़ा भी आया. मैं सोच रही थी कि आख़िर ऐसा क्या है मुझमे जो मेरा लाल इतना मतवाला हो जाता है मुझे देख कर! पर हमेशा नही करना ऐसे! मुझे बहुत तकलीफ़ होती है."

मोम ने मदर्स डे के दिन मुझे बहुत मीठा बनाया. यहा पहला मदर्स डे था जो हम साथ बिता रहे थे. मैंने मोम से सुबह पूछा कि क्या उपहार दूं तो बोली

"मेरा सबसे बड़ा उपहार तो है मेरे पास बेटे, तू, इतना जवान खूबसूरत नौजवान, मोम की हर इच्छा और कामना पूरी करने वाला" मैंने फिर पूछा तो बोली.

"ठीक है, तू आज मुझे खुद को दे दे, पूरी तरह, मुझे मनमानी करने के लिए तेरे साथ. मैं शामा को जल्दी आ जाउम्गि. बाहर से ही खाना ले आउम्गि. मैं जो कहूँगी वह करना फिर"

मैं दिन भर कालेज मे सोच रहा था कि मोम क्या करेगी. उसकी आँखों मे झलक आई कामुकता से मैंने अंदाज़ा लगा लिया था कि आज रात को स्पेशल फरमाइश होगी. मैं भी आखरी पीरियड बंक करके जल्दी भाग आया. नहा धो कर मोम का इंतजार करने लगा. मोम वापस आई तो हाथ मे एक दो पैकेट थे.

हमने खाना खाया. फिर मोम ने मुझे कहा कि बेडरूम मे मेरा इंतजार करो. मैं नंगा होकर अपना लंड सहलाता हुआ मोम की राह देखने लगा.


मोम बेडरूम मे आई तो मैं देखता रह गया. उसने अपने बदन पर बस एक काली बिकिनी पहन रखी थी. एकदम तंग और छोटी जैसी स्वी सूट की माडल पहनती हैं. ब्रा के स्ट्रैप नूडाल स्ट्रैप थे, एकदमा पतले, डॉरो जैसे. कप भी ज़रा ज़रा से थे, बस उसके निपालों को धक रहे थे, उसके बाकी गुदाज स्तन खुले हुए थे. नीचे पैंटी भी एकदमा तंग थी. उसके आगे का भाग बस रीबन जैसा था, मोम की बुर की लकीर को भर धक रहा था. मोम अपने काले सैंडल पहने थी.

मैंने अपने लंड को पकड़कर कहा.

"ममी, ये तो मेरे लिए उपहार हो गया, तुम्हारे लिए नहीं" मोम शैतानी से बोली

"अभी रुक तो, कुछ देर मे देख कैसे अपना उपहार वसूल करती हू, अब चुपचाप लेट जा सीधा, बहुत आदत है तेरी अपने लंड से खेलने की, आज उसीकि खबर लेती हू, ये सब आज ही खरीदा है मैंने"

मोम ने शाम को लाए पैकेट मे से लाल मखमल की छः इंच चौड़ी वेलकरो लगी पत्तियाँ निकालीं. फिर मुझे बाँधने लगी. एक पट्टी मेरे टखानों के चारों ओर लपेट कर कस दीं. फिर दूसरी मेरी जांघों के चारों ओर कसी. एक पट्टी उसने मेरी कमर और हाथों को मिलाकर बाँधी और एक छाती के चारों ओर बाँहों समेत बाँधी.

मैं अब हिल दुल भी नही सकता था. मुश्के बँधा एक गुड्डे की तरह असहाय पड़ा था. बस मेरा लंड मस्त खड़ा था और हिल रहा था. मोम ने उठा कर मुझे ऐसी नज़रों से देखा की खा जाएगी.

"अब लग रहा है किसी उपहार की तरह लाल रीबानों से बँधा हुआ. छोटी बच्चियाँ छोटे गुड्ड़ों से खेलती हैं. मेरे लिए तू बड़ा गुड्डा है खेलने के लिए. अब इस उपहार को मैं कैसे इस्तेमाल करूँ यह मेरी इच्छा पर है, है ना अनिल बेटे?"

मैं कामना से काँप रहा था. आज मैं पूरा मोम के चंगुल मे था. एक खुशी और मीठे डर की लहर मेरे दिल मे दौड़. गयी. मैं समझ गया की मोम आज मुझे बहुत तड़पाएगी.

उस रात मोम ने मेरा जो हाल किया वह मैं ही जानता हू. इतना मीठा टारचर था क़ि मैं कई बार रो कर मोम से गिडगीदाया पर आज वह इसी मूड मे थी. मुझे उसने चूमा, अपने बिकिनी मे कसे स्तनों से मेरे लंड को और शरीर को सहलाया, फिर बिकिनी आधी निकालकर मेरे लंड को अपने मम्मों के बीच की खाई मे सटाकर मुझसे अपने स्तन चुदवाये, फिर बिकिनी के कप से निकालकर मेरे मुँह मे अपनी चुचियाँ तूँसकर चुसवाई. अपनी चूत मेरे मुँह के पास लाकर बिकिनी की पट्टी थोड़ी बाजू मे करके चटवाई, मुझपर चढ़. कर मुझे चोदा, बिना मुझे झड़ाए, मेरा लंड चूसा, उससे तरह तरह से खेली, बीच मे ही मुझे एक कामुक डांस करके दिखाया, मेरे मुँह पर बैठकर उसे चोदकर मुझे अपना रस पिलाया, बस झदने नही देती थी.

अंत मे उसने मेरे सामने मेरी छाती पर बैठकर अपनी उंगलियाँ चूत मे डाल कर हस्तमैथुन किया. मुझे पास से उसकी रसीली लाल बुर मे चलती लाल नेल पेंट मे रंगी उसकी उंगलियाँ दिख रही थीं, बहता शहद सा गाढ़ा सफेद पानी दिख रहा था, पर मैं कुछ नही कर सकता था. मोम की आत्मरती मैं पहली बार देख रहा था और वह मुझे पागल कर रही थी. मोम ने झदने के बाद अपनी उंगलियाँ चटाते हुए कहा भी कि

अनिल बेटे, तू पूछता था ना कि इतने दिन मैं कैसी अकेली रही, तो यह देख कैसे मैं खुद को ठंडा करती थी" उस रात मैं बस दो बार झाड़ा पर ऐसा की जान निकल गयी. पहली बार तब जब एक घंटे मुझसे खेलने के बाद उसने मेरे लंड को चूसा. मन लगाकर मेरे गाढ़े वीर्य का मज़ा लिया. मुझे फिर जल्दी उत्तेजित करने को उसने अपनी सैंडालों और चप्पालों का सहारा लिया. अपनी सारी चप्पले ले आई और मेरे नीचे तकिया बना कर रख दिया. अपने सैंडल पहने पाँव वह मेरे मुँहा पर और गाल पर रगड़ने लगी. उनकी मादक सुगंध ने मुझे जल्द ही तैयार कर दिया. जब मैं उससे बार बार चोदने को कहने लगा तो रबर की चप्पल का पँजा मेरे मुँहे मे ठूंस कर मेरी बोलती बंद कर दी.

आख़िर जब उसने मुझे चोद कर आखरी बार झड़ाया तो रात का एक बज गया था. उसके बाद उसने मुझे खोल दिया. मैं बस लास्ट सा पड़ा था. सोते समय मोम ने मुझे पूछा

"कैसा है मेरा खिलौना? पसंद आया मामी का मदर्स डे गिफ्ट बनना?" मैंने मीठी शिकायत की कि मोम तुमने कितना तरसाया आज. मुझे पागल करने मे कोई कसर नही छोड़ी. मोम बोली

"मुझे तो बहुत मज़ा आया. अब तो तुझे ऐसा हमेशा बाँधूंगी. बोल है तैयार? हफ्ते मे एक बार? तू मेरी गांद मारता है ना, बस अब गांद मराने की कीमत ऐसा गुड्डा बनाना मेरा!" मैं बिना कुछ कहे उसके आगोश मे सिमटकर सो गया. ऐसा मीठा अत्याचार मोम रोज करती तो भी मैं उसे सहना करता!

बस इसी तराहा हमारा अच्छा ख़ासा जीवन चल रहा था, एक सुंदर सपने की तरह, एक दूसरे को भोगने के नित नये तरीके खोजते हुए.

 

मेरा और मा का संभोग शुरू होकर एक साल होने को आ गया था. एस.एस.सी की

फाइनल परीक्षा चल रही थी इसलिए चुदाई भी मा ने कम कर दी थी कि मेरी

पढ़ाई मे खलल न पड़े. बस रात को एक बार वह मुझे चोदने देती. मेरे

करियर के बारे मे वह बहुत सावधानी बरतती थी और मैं भी उसकी बात

मान कर पढ़ाई करता था. मा अब मेरी सब कुछ थी, मेरी मा, मेरी प्रेमिका,

मेरी देवी, मेरी मालकिन और मैं उसका पुत्र, गुलाम, पुजारी और प्रेमी था.

मेरी फरमाइश पर आज कल मा ने झान्टो को शेव करना बंद कर दिया था.

मुझे उसकी चिकनी बुर भी अच्छी लगती थी. पर मन होता था कि उसकी घनी

झान्टो मे मूह छुपा कर मा की बुर चूसने का मज़ा भी लेलू. मा ने झान्टे

काटना बंद कर दिया और एक महीने मे उसकी इतनी घनी झाँटे हो गयी जैसी

इंटरनेट पर 'हेरी' साइट मे दिखाते है. मैं तो नहाते समय वो गीली झाँटे मूह

मे लेकर उनसे टपकता पानी चुसता था. मूह मे भरकर चबा डालता था.

ऐसा करने मे मा की बुर का एकाध बाल मूह मे आ जाता था, वह भी मुझे

अच्छा लगता था.

कुछ दिनों से मा थोड़ी परेशान लगती थी. रात को भी अक्सर देर से आती थी.

मैने पूछा तो कुछ बोली नही, बस कह दिया कि काम ज़्यादा हो गया है. मा को

कंपनी के मॅनेजिंग डाइरेक्टर के स्टाफ मे ट्रांसफर कर दिया गया था. उसके

कारण काम का बोझ ज़्यादा हो गया था.

एक दिन मा ज़्यादा ही परेशान लग रही थी. रात को जब मैने उसे चोदा तो रोज की

तरह मस्त होकर नही चुदवा रही थी, बस मुझे खुश करने को आह आह कर

रही थी. उसकी आँखे खोई खोई थी जैसे कुछ और सोच रही हो. मैने झड़ने

के बाद उसे चूम कर कहा "मा, कुछ तो बात है, तुम परेशान हो, मुझे

बताओ मेरी कसम"

मा बोली "अब क्या बताउ बेटे और कैसे बताउ, तू समझ ही गया है तो बताना

पड़ेगा, वैसे बात बड़ी अजीब सी है, मुझे भी समझ मे नही आता क्या करू.

सोच रही हू कि नौकरी छोड़ कर और कोई पकड़ लू"

"क्यों मा, इतनी अच्छी नौकरी है तुम्हारी" मैने पूछा.

"हां पर वो मेरे नये बॉस है ना, मिसटर अशोक माथुर, वो ..." मा चुप हो

गयी. मैं समझ गया. मन मे अजीब सा लगा. मैं कब से सोच रहा था कि शायद

मा को अब एक और पुरुष की ज़रूरत लग रही होगी. क्या मा ने भी इस बारे मे

सोचना शुरू कर दिया था! मा खूबसूरत और सेक्सी थी और ऐसा कुछ होगा

इसका अंदेशा मुझे पहले ही हो गया था. पर मेरे अलावा मा को कोई इस तरह

से देखे यह भी मुझे गवारा नही हो रहा था "क्यों उन्होने कोई हरकत की

क्या मा?"

मा हंस पड़ी "अरे वैसी कोई बात नही है. वे तो काफ़ी सीधे सादे इंसान है.

उनकी बेटी शशिकला भी वही है ऑफीस मे. सारा प्राब्लम उसी की वजह से है"

मैने मा से पूछा तो धीरे धीरे उसने सारी बात बताई. बड़ी अजीब सी पर

मजेदार बात थी. कंपनी के मॅनेजिंग डाइरेक्टर अशोक माथुर करीब सैंतीस

साल के थे. उनकी सौतेली बेटी शशिकला करीब पच्चीस साल की थी और वही

ऑफीस मे मनेजर थी. उसकी शादी नही हुई थी. मा की बॉस वही थी.

"अशोक माथुर की इतनी बड़ी सौतेली बेटी, बाप बेटी की उमर मे सिर्फ़ बारह साल का

अंतर?" मैने अस्चर्य से पूछा. मा ने बताया कि अशोक माथुर ने शशिकला

की मा ललिता से पंद्रह साल पहले प्रेमविवाह किया था. ललिता कंपनी की

मालकिन थी और अशोक माथुर से दस साल बड़ी थी. अशोक माथुर ललिता की

कंपनी मे मॅनेजर थे. उनका अफेर एक दो साल चला और उसके बाद ललिता ने

बिना किसी की परवाह किए उनसे शादी कर ली. उस समय ललिता की तेरह साल की बेटी

थी, शशिकला.

दो साल पहले ललिता की एक दुर्घटना मे मृत्यु हो गयी थी, मा की नौकरी

लगने के कुछ दिन पहले. सही मायने मे शशिकला कंपनी की मालकिन थी

पर शशिकला ने मॅनेजिंग डाइरेक्टर बनने से इनकार कर दिया था और अपने

सौतेले डॅडी को वह पद दे दिया था. बाप बेटी मे काफ़ी प्यार था, सौतेले होने

के बावजूद. वैसे असली पावर सब शशिकला के ही हाथ मे थी. उससे पूछे बिना

अशोक माथुर कुछ नही करते थे.

मा ने ये सब बताया पर मुझे अब भी समझ मे नही आ रहा था. मैने फिर

पूछा कि शशिकला का क्या प्राब्लम है? मा ने आख़िर असली बात बताई. वह अब

शरमा भी गयी थी.

"अरे वो लड़की शशिकला मेरे पीछे पड़ी है एक महीने से" मा ने कहा "अब

तक मैं दूसरे डिविषन मे थी इसलिए मेरा उससे लेना देना नही था. पर अब तो

वह मेरी बॉस है. वह पिछले एक महीने से अजीब अजीब हरकते करती है मेरे

साथ."

"याने क्या करती है मा" अब मुझे भी उत्सुकता होने लगी थी. मैं कुछ समझ

भी रहा था और मेरा लंड यह सोच कर ही कुलबुलाने लगा था.

"मुझे लगता है कि वह लेस्बियान है. पहले तो बस मुझे घुरति थी, मेरी

नज़र बचा कर. अब सीधे मेरी ओर टक लगाकर देखती है. मुझे बार बार अपने

कमरे मे बुलाती है काम से. मैं पास खड़ी होती हू तो मेरे बदन को अनजाने

मे छू लेने का नाटक करती है. पिछले हफ्ते तो उसने एक बार बात बात मे मेरे

स्तन को छू लिया था. मैं पीछे हट गयी तो लगता है उसे गुस्सा आ गया. एक दो

दिन रूठी सी रही फिर मुझे जान बुझ कर ज़्यादा काम देने लगी कि मुझे रात को

रुकना पड़े"

मैने कहा "मा, लगता है तुम्हारी सुंदरता का जादू सिर्फ़ मर्दों पर ही नही,

औरतों पर भी होने लगा है. हो ही तुम इतनी सेक्सी. पर इसमे नौकरी छोड़ने

की क्या बात है?"

मा बोली "बेटे, मैने कभी उसे एंकरेज नही किया फिर भी वह मेरे पीछे पड़ी

है. मुझसे मीठा मीठा बोलती है, कभी मुझे अकेले मे दीदी कहती है, नज़र

गढ़ाकर मुझे अकेले मे देखती है जब मैं उसके सामने होती हू, मेरी छाती

और पेट को घुरति रहती है. अपना आकर्षण अब मुझसे छुपाने की भी

कोशिश नही करती. आज बोली कि बहुत काम है, इस शनिवार और रविवार को भी

करना पड़ेगा. फिर साजेस्ट करने लगी कि मैं शनिवार को सुबह उसके घर पर

आ जाउ और रविवार तक वही रहू. मैने पूछा कि अशोक माथुर भी होंगे तो

बोली कि वे महीने भर को अमेरिका जा रहे है. फिर उसने अचानक खेल खेल मे

मेरे गाल को छुआ और फिर अपने मूह को, मानो मुझे फ्लाइयिंग किस कर रही हो.

जब मैं चुपचाप खड़ी रही तो बदमाश ने मेरे गाल को चूम लिया और

हँसते हुए मीटिंग मे चली गयी"

कुछ देर चुप रह कर मा बोली "मुझे उसकी नियत ठीक नही लगती. मुझे

मालूम है कि वह वीकेंड मे क्या काम करना चाहती है, अब नौकरी

छोड़ने के अलावा मैं क्या कर सकती हू, आख़िर कंपनी उसी की है और वो बड़ी

जिद्दी किस्म की लड़की है, एक बार सोच ले तो ठान लेती है. और उसे भी न जाने क्या

पड़ी है कि ऑफीस की बाकी सब सुंदर जवान लड़कियों को छोड़कर मेरे पीछे

पड़ी है, सब एक से एक चालू लड़कियाँ है, उनमे से कई तैयार हो जाएँगी उसके

साथ मज़ा करने को"

मा की परेशानी को मैं समझ सकता था. पर मुझे एक अजीब सी गुदगुदी भी

होने लगी थी. मा और एक जवान युवती आपस मे लिपटे है, उन किताबों के

चित्रों जैसे, यह कल्पना ही इतनी मादक थी कि अभी अभी चोदने के बावजूद

मेरा खड़ा हो गया. मा को लिपट कर मैने कहा "मा, नौकरी छोड़ना है तो

छोड़ दो पर एक बात सच बताओ, मेरी कसम, शशिकला दिखने मे कैसी है?"

मा बोली "अच्छी स्मार्ट है, मिस वर्ल्ड भले ना हो पर एकदम अट्रॅक्टिव है. पर

उससे क्या फरक पड़ता है, क्यों पूछ रहा है?" मा का चेहरा अब लाल हो

गया था.

"मा, सच बताओ, तुझे वो अच्छी लगती है क्या, अगर उसने सच मे तेरे साथ

ऐसा किया तो तुझे बुरा लगेगा क्या?" मैने मा के स्तन दबाते हुए पूछा. मा

चुप रही, हा उसकी आँखों मे एक खुमारी सी भर आई थी.

मैं समझ गया. मा को भी वह भा गयी थी. पिछले दो तीन हफ्ते मे मैने

देखा था कि जब हम कभी वे सेक्सी किताबे देखते तो उसका ध्यान लेस्बियन

चित्रों पर ज़्यादा होता था. वैसे आज कल चुदवाने के बजाय अब वह चूत

चुसवाना ज़्यादा पसंद करती थी, आँखे बंद करके सिसकिया भरती रहती,

शायद एक स्त्री से बुर चुसवाने की कल्पना करती हो. शायद मैं क्या कहुगा इस

डर से वह मन की बात नही कह पा रही थी. मैं मा की हालत समझ गया था.

मेरे साथ, अपने सगे जवान बेटे के साथ चुदाई शुरू होने के बाद मा की

वासनाए जो अब तक दबी थी, भड़क उठी थी. मैं चाहता था कि मा मन भर

कर अपनी इच्छाए पूरी कर ले. अगर कोई गैर पुरुष होता तो मैं ज़रूर फिर से

सोचता. वैसे मुझे अब तक यही लग रहा था कि मा का ध्यान अगर बाहर कही

जाएगा तो वो किसी हॅंडसम नौजवान पर. पर यहाँ तो एक जवान सेक्सी और

खानदानी औरत की बात थी. और शायद मा का भी झुकाव था उस तरफ.



मैने मा की बुर मे उंगली डाली और अंदर बाहर करने लगा "मा, तू सोच कि

शशिकला ऐसे तेरे सामने बैठी है और तेरी चूत चूस रही है, अपनी जीभ

तुम्हारी इस रसीली बुर मे डाल डाल कर तुम्हारे अमृत का पान कर रही है और तू

झाड़ झाड़ कर सेक्स की भूखी उस युवती को अपनी बुर का शहद चटा रही है,

मज़ा आता है की नही इस ख़याल से? और रही बात जवान लड़कियों को छोड़कर

तुम्हारे पीछे पड़ने की, मैं समझ सकता हू, मा तुझे मालूम नही है कि

तुझमे कितनी सेक्स अपील है और उस अपील मे तुम्हारी इस गदराई उम्र और मासल

शरीर का भी एक बड़ा हिसा है! कई लेस्बियन लड़कियों को अपनी उम्र से बहुत

बड़ी औरतों से सेक्स मे बहुत मज़ा आता है. अब सच बोलो मम्मी, शशिकला

के साथ सेक्स के ख़याल से मज़ा आता है कि नही?"

मा सिसक उठी. अपनी टाँगे सटा कर मेरी उंगली को बुर मे क़ैद करके बोली

"बहुत मज़ा आता है बेटे. न जाने मुझे क्या हो गया है, मेरे बदन की आग अब

शांत ही नही होती, तूने तो मेरी बुर की वासना के जिन्न को जैसे अपने लंड की चाबी

से आज़ाद कर दिया है. मालूम है, जब शशिकला ने मुझे किस किया था तो मुझे

बड़ा मीठा लगा था वह किस. सच बेटे, अगर तुझे कोई आपत्ति नही है तो मैं इस

कन्या के साथ अपने मन की मुरादे पूरी करना चाहती हू, बहुत प्यारी लड़की

है, उसे देखकर ममता और प्यार भी आता है और एक अजीब सी भूख भी लग आती

है, उसे भोगने की भूख"

मैने मा को विश्वास दिलाया कि मुझे खुशी होगी अगर मा को चुदाई का हर

तरह का सुख मिले. मेरे मन मे यह भी छुपी इच्छा थी कि शायद इस चक्कर

मे मुझे भी कुछ करने का मौका मिल जाए. मा तो अप्सरा थी पर अब मेरी

वासना भी ऐसी धधकती थी की खूब चुदाई करने का मन होता था, अगर और

कोई भी मिल जाए तो क्या बात थी, हा मा की पसंद से, उसकी अनुमति के बिना

नही.

"मा, मेरे एग्ज़ाम तो कल ख़तम हो जाएँगे. तुम चली जाओ शनिवार रविवार के

लिए. पर मुझे दिखाओ तो कि मेरी मा की वह पुजारन कैसी दिखती है" मैने

मा से प्रार्थना की. 

मा अब बहुत खुश थी. उसके मन का बोझ उतर गया था.

"देखो बेटे, इस ऑफीस की मॅगज़ीन मे है उसका फोटो फ्रंट पेज पर. मेरे लाल,

तूने मेरे मन का बोझ हल्का कर दिया. मुझे सिखा दिया है कि सेक्स से बढ़ कर

कोई सुख नही है, यहा एक ही जीवन मिलता है और उसमे सब को अपनी हर इच्छा

पूरी कर लेना चाहिए. तेरा भी कही मन लगा हो तो मुझे बता, मैं भी यही

चाहती हू कि तू खूब सुख पाए, सिर्फ़ अपनी इस मा के आँचल से न चिपका रहे,

तेरी तो उमर है मज़ा लेने की"

मैने मा को विश्वास दिलाया कि अभी तक तो कोई ऐसा नही था जो उसके सामने

मुझे सेक्सी लगे. मा ने लाई मॅगज़ीन मे मैं देखने लगा. अशोक माथुर और

उसके साथ शशिकला का एक चित्र था. अशोक माथुर एक काफ़ी हॅंडसम आदमी

थे, तीस बत्तीस के आस पास के ही लगते थे. शशिकला को देख कर मेरा भी खड़ा

होने लगा. उसने स्लीवलेस ब्लॉज़ और नभिदर्शना साड़ी पहन रखी थी.

एकदम गोरी चित्ति थी. बाल छोटे बाब कट थे. सामने पारदर्शक पल्लू मे से

उसके उरोजो का उभार दिख रहा था. है हिल की स्टिलेटो सॅंडल पहने थी जिसमे

उसके गोरे पाव खूब फॅब रहे थे. चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास था, आख़िर

करोड़ों की मालकिन थी.

"माल है मा, तू फालतू परेशन होती है. चल कल ही उसे बता दे कि तू

शुक्रवार रात को ही आ जाएगी, आख़िर काम ख़तम करना ज़रूरी है." मैने

कहा. अब तक मा की चूत फिर से इतनी गीली हो गयी थी कि उसे कुछ और नही सूझ

रहा था. मैने तुरंत मा के प्रति बेटे का कर्तव्य निभाया, पहले उसकी बुर

चूस कर उसका सारा पानी निकाल लिया और फिर उसे इतनी देर और इतने ज़ोर से चोदा कि

वह सुख से बेहोश सी हो गयी.

सुबह मा तैयार हो रही थी तो मैने कहा "मा, तू बदल बदल कर सलवार

कमीज़, पॅंट सूट और साड़ी पहनती है. शशिकला को क्या अच्छा लगता है कुछ

अंदाज़ा है"

मा हंस कर बोली "अरे यह तो मुझे कब का मालूम है. जब भी मैं स्लीवलेस

ब्लॉज़ और साड़ी पहनती हू, उसकी आँखे चमक उठती है. मेरा पेट, पीठ,

कमर, बाहे उसमे से साफ दिखते है ना! जब सलवार कमीज़ या पॅंट सूट

पहनती हू तो उसकी नाक चढ़ जाती है"

"बस मा, अब इन बचे दो दिनों मे तुम एक से एक साड़ियाँ पहनो. देखो कैसे

परेशान हो जाएगी शशिकला."

दूसरे दिन मेरा आखरी पेपर था. मैं दोपहर को पेपर देकर आया और सो गया.

आज शाम मेरे लिए मुरदों की शाम थी. बहुत दिनों के बाद मा के साथ रात

भर रति करने वाला था, पिछले एक महीने से एग्ज़ाम के कारण बस रात मे एक

बार का राशन था.

मा आज जल्दी आ गयी. बहुत खुश लग रही थी. मैं चिपट गया. उसे ठीक से

कपड़े भी नही बदलने दिए, वैसे ही धक्के देकर अंदर ले गया और उसकी

साड़ी मे घुस गया. मा की चूत के रस को मन भर पीने को मैं तरस रहा

था.

"अरे रुक तो, सुन ना आज क्या हुआ" वह कहती रह गयी पर मैने उसे पलंग पर

पटका, उसकी साड़ी उपर की और जुट गया. चूत को चूस कर कई घुट बुर का रस

निकालकर ही दम लिया. फिर मा पर चढ़ कर कस के चोद डाला, तब शांति मिली.

मेरी हालत देखकर मा भी पड़ी रही और मुझे मनमानी करने दी.

जब लस्त होकर मा पर गिर पड़ा तब मा ने मेरे बालों मे उंगलिया चलाते हुए कहा

"इतना दीवाना है मा का मेरे लाल? तेरा यह हाल है तो इस शनिवार रविवार क्या

करेगा? मैं तो नही रहूगी"

"तो मा पक्का हो गया क्या? शशिकला ने क्या कहा? आज तेरी यह गुलाबी साड़ी

उसे कैसी लगी?" मैने उत्सुकता से पूछा.

मा ने हँसते हुए कहा "अरे आज तो वह पागल सी हो गयी. आज मैने उसे खूब

सताया. पहले तो मेरी यह साड़ी और लो काट ब्लॉज़ देखकर ही वह मचल उठी

थी पर कुछ कह भी नही सकती थी क्योंकि उसके केबिन मे काम चल रहा है

इसलिए वह भी बाहर बैठी थी. मैं उसके सामने से गुजरती तो अपना पल्लू

ठीक करने के बहाने से उसे मेरे स्तनों की वैली दिखा देती. एक बार तो मैने

झुक कर नीचे से कागज उठाए, तब जान बुझ कर आँचल गिरा दिया, उसे मेरे

स्तनों का पूरा दर्शन हो गया होगा. बेचारी की आँखे पथरा गयी. आख़िर जब

एक मीटिंग के बाद हम कन्फरेन्स रूम मे अकेले थे तब वह बोली "रीमा दीदी, आज

तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो, ज़रा हम भी तो साड़ी देखें" कहकर मेरे

पल्लू पर का डिज़ाइन देखने के बहाने उसने मेरे स्तनों को छू लिया और मेरे

ब्लॉज़ मे भी तान्क झाक कर ली."

"मा, उसकी बुर बहने लगी होगी तेरा रूप देखकर, तुम्हारी ये मासल

छातियाँ देखकर कोई भी पागल हो जाएगा, उस लड़की की तो हालत खराब हो

गयी होगी" मैने मा के स्तनों मे मूह घुसकर कहा.

"और क्या, है ही तेरी मा इतनी मादक की उसका सगा बेटा उसपर मर मिटा है"

मा ने गर्व से कहा. "आगे तो सुन, मैने आज मुस्काराकर उससे कहा कि मैंडम,

इस वीकेंड को काम का आप बोल रही थी तो मैं ऐसा सोच रही हू कि शुक्रवार

रात को ही आपके घर आ जाती हू. उसे विश्वास ही नही हुआ, एकदम चुप हो गयी.

फिर किसी तरह बोली कि हां यही ठीक रहेगा, सोमवार को सुबह घर चली जाना, उस

दिन ऑफ भी ले लेना. फिर बड़ी सीरियस होकर बोली कि रीमा दीदी, तुम मुझ से इतनी

बड़ी हो, मुझे मैंडम न कहो, कम से कम अकेले मे तो शशिकला कहो. मैं

बस मुस्कराती हुई उसकी ओर देखती रही तो उसने मुझे किस कर लिया. आज जम के

मेरे होंठों पर मूह लगा कर किस किया उसने."

"मीठा लगा मम्मी?"

"हाँ बेटे, बहुत मीठा था, वह वो इंपोर्टेड स्ट्राबेरी के स्वाद का लिपस्टिक लगाती

है, बहुत मज़ा आया. उसकी हालत खराब थी, मुझे तो लगा कि वह शायद वही

मुझसे लिपट जाएगी पर किसी तरह उसने अपनी वासना को लगाम दी, उसे एक

मीटिंग मे भी जाना था. मैने कहा कि मैं घर जा रही हू जल्दी तो उसने तपाक

से हाँ कह दी. बोली आराम करो, वीकेंड मे बहुत काम करना है. मुझपर

बहुत मेहरबान है"

"मा, अब तुझे बस काम वाला काम करना पड़ेगा, ऑफीस का काम नही" मैने

मा की चुटकी ली. मा बहुत खुश थी, आज उसकी बुर ऐसी रिस रही थी कि जैसे

बहुत दिनों की भूखी हो. उस रात मैने और मा ने इतनी चुदाई की कि जैसे

महने भर की कसर पूरी हो गयी.

दूसरे ही दिन शुक्रवार था. मा को सुबह ही शशिकला का फ़ोन आया. वह अभी

अभी नहा कर आई थी और नंगी मेरे सामने खड़ी होकर कपड़े पहन रही

थी. फ़ोन पर बाते करते करते मा का चेहरा खिल उठा. एक दो बार वह बोली

"यस मैंडम-- मैं ओवरनाट बैग ले आउन्गि -- अच्छा ठीक है" फिर हँसकर बोली

"सॉरी शशिकला, अब मैंडम नही कहुगी" मैं मा से चिपट कर उसके नंगे

नितंबों पर अपना लंड घिस रहा था. सुबह सुबह नहाने के पहले मैने

मा को बाथरूम मे चोदा था पर अब फिर से लंड खड़ा हो गया था.

फ़ोन रखकर मा बोली "वह कह रही थी कि ऑफीस से ही सीधे घर चलते है,

घर पर ही डिनर करेंगे. मैं बोली कि मैं कपड़े ले आती हू तो शैतानी से बोली

कि वैसे ज़रूरत नही पड़ेगी-बोली वही दे देगी चेंज करने को कपड़े. और फिर

डाँट रही थी कि मैं उसे मैंडम क्यों कहती हू"

मैं मा को लिपटाकर बोला "मा, तुझे वह कपड़े पहनने ही नही देगी

देखना दो दिन"

मा ने अचानक पूछा "अनिल बेटे, इन बालों का क्या करूँ? काट लू क्या? तुझे

बहुत अच्छे लगते है मुझे मालूम है, पर उस लड़की को .... मालूम नही क्या

सोचेगी!" मा का हाथ अपनी घनी झान्टो मे उलझा था, वह उन बालों के

बारे मे कह रही थी.

मैने मना कर दिया "मा, ऐसी ही झान्टे लेकर जाओ उसके पास. और 

वो इनपर मर मिटे तो कहना. तुम्हारी झान्टे असल मे इतनी काली, घनी, घूंघराली और

रेशमी है कि इनमे मूह छुपाने मे किसी सुंदरी की ज़ुल्फों मे मूह छुपाने

से ज़्यादा मज़ा आता है!"

"चल शैतान, पर यह बता बेटे तू क्या करेगा, मुझे ज़रा बुरा लग रहा है

तुझे अकेले छोड़ कर जाने को. सच बता तुझे कोई आपत्ति तो नही है मेरे लाल?"

"मा, मेरी चिंता मत करो, तुम मज़ा करो. तुम इतनी सेक्सी हो, इतने साल तुमने

अपनी यह जवानी वेस्ट की है, अब अपने मन की हर मुराद पूरी कर लो, यही मैं

चाहता हू. मैं दोस्तो के साथ दो दिन मथेरन हो आता हू, यहाँ रहुगा तो

मूठ मार मार कर परेशान हो जाउन्गा यह कल्पना कर के कि तुम और

शशिकला क्या कर रहे हो. हाँ फ़ोन करना मा ज़रूर मेरे सेल पर, मैं सोमवार

सुबह आ जाउन्गा घर."

मा को चूम कर मैने बिदा किया. मा बहुत सुंदर लग रही थी उस काली साड़ी

मे. आख़िर वह एक अभिसारिका बन कर निकली थी नये सुख को भोगने.

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मैं दोस्तो के साथ मथेरन गया, खूब घुमा. बार बार मन होता था कि मा

को सेल पर फ़ोन लगाऊ, पर फिर सब्र कर लिया, सोचा उन दोनों नारियों को ऐसे मे

डिस्टर्ब करना ठीक नही है. न जाने क्या कर रही होंगी.

आख़िर मेरा मन नही माना और रविवार दोपहर को मैने मा के सेल पर फ़ोन

किया. मा ने फ़ोन उठाने मे दो मिनिट लग गये. मेरी आवाज़ सुनकर खुश

होकर बोली "कैसा है बेटे?"

मैने कहा "मा मैं मज़ा कर रहा हू यार दोस्तो के साथ. तुम कैसी हो?" असल

मे पूछना चाहता था कि मा, तेरी वह रसीली चूत, मेरा खजाना, कैसी है

पर सोचा कि शायद शशिकला पास ही हो. 

मा बोली "एकदम ठीक हू बेटे, बहुत काम चल रहा है, सोने को नही मिला ज़्यादा."

वह रुक रुक कर बोल रही थी जैसे कोई काम कर रही हो, पर उसके स्वर मे

शैतानी भरी थी. मैं समझ गया. मा की आवाज़ कांप भी रही थी. बाते करते करते

"अया अया ओह्ह्ह" की आवाज़ आई.

मैने पूछा "मा क्या हुआ? ऐसे कर क्यों रही हो?"

मा बोली "कुछ नही बेटे, इतना अच्छा लग रहा है कि रहा नही जा रहा. वह

यहाँ एक बिल्ली है, बार बार मेरे पैरों को चाटती है, बड़ी गुदगुदी होती है,

बहुत अच्छा लगता है"

फ़ोन पर मुझे दबी आवाज़ मे एक मीठी हँसी की आवाज़ आई. शायद शशिकला थी.

"अरे ज़रा रुक ना, क्यों तंग कर रही है. छोड़ती ही नही है, ओह ओह ओह आहह ओइइ

मा" मा फिर सिसक कर बोली.

मुझे कुछ समझ मे नही आया. "क्या हुआ मा, ऐसे क्यों बार बार कर रही

हो?"

मा फिर बोली "तू चिंता ना कर मेरे लाल, मैं ठीक हू, यह बिल्ली मानती ही नही है,

अब मुझपर चढ़ने की कोशिश कर रही है, कैसा जादू है इसकी जीभ मे, इसे

भगाना पड़ेगा नही तो बहुत तंग करेगी. तू ठीक है ना मेरे लाल? अपना

ख़याल रखना - हाँ & य & अरे रुक ना & अब देख तेरा क्या हाल करती हू"

कहकर मा ने फ़ोन बंद कर दिया."


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