फोरेस्ट आफिसर 3

 उसने प्रश्नपूर्ण दष्टि से उसकी ओर देखा। साधना के अपमान से क्षुब्ध चेहरे पर उसे एक अलौकिक आशा की चमक, सी दिखाई दी। 


'हमें यहीं रहकर साहस के साथ अन्याय का मुकाबला करना होगा।' 


'अन्याय का मुकाबला जरूर कर लेता दीदी। लेकिन आज।' उसने वाक्य अधूरा छोड़कर निराशा से सिर हिलाया। जैसे-जैसे उस सवको दोहराने में भी वह लज्जा अनुभव कर रहा हो। 

फिर जैहे ही एरक विचार बिजली की तरह उसके मस्तिष्क में कौंर्धा, उसने झटके के साय सिर उठाकर साधना की ओर देखा और बोला-'तुम एक काम करो दीदी।' 


'क्या?' 


'तुम भी शहर चली जाओ। यही ठीक रहेगा। तुम्हारे जाने के बाद मैं इस कालिया के बच्चे से खुलकर निबट सकुँगा' 


'नहीं, मैं कही नहीं जाऊंगी।' 


'दादी तुम समझती क्यों नही?' 


'गलत बातें समझना मैंने सीखा नहीं है।' साधना दृढ़ स्वर में बोली-'मां-बाबूजी के बाद जब तुम छोटे-छोटे थे तो नाते-रिश्तेदारों ने मुझे समझाना चाहा था कि मैं शादी कर लूं। उम्र निकम जाएगी तो जिन्दगी-भर कुंआरी रहना पड़ेगा मुझे। 


लेकिन मैंने उनकी बातों से ज्यादा अपने कर्तव्य बोझ को समझा और वही किया जो मुझे करना चाहिए था।'


'उस बात का इससे क्या मेल?' 


'मेल है केशो।' साधना अपने शब्दों पर जोर देती हुई बोली-'हम दोनों के यहां से जाने का मतलब होगा उस आतताई की पूरी जीत। अगर मैं चली गई तो भी उसकी आधी जीत होगी। नहीं यह सुख मैं उसे महसूस नहीं होने दंगी। में यहीं तुम्हारे साथ रहकर उसके अन्याय का मुकाबला करूंगी।' 


'आज की घटना के बाद भी...।' 


'यह घटना दोबारा नहीं दोहरा सकेगा वह।' साधना दृढ स्वर में बोली-' आज तक मैं असावधान थी। लेकिन अब हर पल सावधान रहूंगी।' 


'मगर दीदी।' 


'नहीं केशो तुम्हारा कुछ भी कहना बेकार है। खतरों से मुंह चुराकर जीना नहीं सीखा है मैंने। में यहां से कहीं नहीं जाऊंगी और न तुम्हें ही जाने दूंगी। हम यहीं रहेंगे और उस कालिया का फन कुचलकर रहेंगे।' अब कुछ कहने सुनने की गुंजाइश नही रही थी। साधना के दृढ़ निश्चय से अच्छी तरह दावित था वह। एक बार जो बात उसने मन में ठान ली उसे बदलना तो फिर विधाता के भी बस के बाहर था। 


इच्छा न होने के बावजद भी साधना ने उसे जबर्दस्ती दूध पिला दिया था। अपने कमर: में आकर बत्ती बुझाने के बाद लेट गया था वह। लेकिन नींद नहीं आ रही थी। 


पिछली घटनाओं को याद करके अपमान दंश से डसित मन बुरी तरह बेचैन होकर तड़पने लगता था। लेटा न रह सका तो उठकर बैठ गया। फिर बेचैनी के साथ कमर पर हाथ बांधकर कमरे में इधर से उधर चहलकदमी करने लगा। 


साधना उसकी बात मानकर चली जाती तो अच्छा था। लेकिन वह उसके जिद्दी स्वभाव से भी परिचित था। उसे मालूम था कि उस बारे में अब कुछ भी सोचना समझना या कहना-सुनना बेकार है। सोचना तो यह है कि कालिया अब कौन-कौन-सी नीच हरकतों पर उतर सकता है और वह उनका क्या प्रतिकार कर सकता है। 


अजीब-अजीब आशंकाएं विषधर नागों की तरह अपने भयानक फन उठाए हुए उसे त्रस्त कर रहीं थीं। 


कुछ भी सही ढंग से मोच पाने में अपने-आपको असमर्थ महसूस कर रहा था। ऊपर से रात का खामोश वातावरण बेचैनी घटाने की जगह और बढ़ाए दे रहा था। 


जब कुछ नहीं सूझा तो उसने टेबिललैम्प जलाया और मन रमाने के लिए एक उपन्यास खोलकर पढ़ने बैठ गया। उपन्यास की घटनाओं में उसने अपने मस्तिष्क को उलझाने की बहुत कोशिश की। किन्तु असफल रहा। 


जब उसमें भी मन नहीं रमा तो उसने उपन्यास बन्द कर दिया और टेबिल लैम्प का मुंह दीवार की ओर घुमा दिया। 


निर्निमेष दृष्टि से दीवार को घूरता हुआ वह कालिया के बारे में ही सोच रहा था कि एक बार इस आदमी से रू-ब-रू होकर बात तो करनी ही होगी उसे। तभी दीवार पर लिखे कुछ अक्षरों ने उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। 


उत्सुकतावश आगे को झुककर देखे उसने वे अक्षर। पहले कभी उनकी ओर ध्यान ही नहीं गया था उसका। 

महीन-महीन अक्षरों में लिखा हुआ था-सांप की कोटर। 


किसने लिखें हैं यह शब्द?


शायद पिछले फारेस्ट आफिसर ने लिखे हों। उसे भी तो कालिया से उलझना पड़ा होगा। कितने सही शब्द लिखे थे-सांप की कोटर। 


वाकई वह अपने-आपको सांप की कोटर में फंसा हुआ महसूस कर रहा या और उसकी समझ में नही आ रहा था कि इस साप की कोटर से कैसे बाहर निकले अथवा इस कालिया रूपी सांप के जहरीले दांत कैसे तोड़े। 


पिछले फारेस्ट आफिसर ने भी शायद अपने को उसी की-सी असहाय स्थिति में महसूस किया होगा। तभी तो इतने सटीक शब्द लिखे-सांप की कोटर। 


कुर्सी पर बैठे-बैठौ ही वह कब मेज पर सिर रखकर सो गया इसका पता उसे भी न लग सका। 

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'यह कौन है?' 

मजदूरों को बीच एक नए चेहरे को देखकर उसने सुपर-वाईजर से प्रश्न किया। 


वह एक भरे-पूरे बदन का आदमी था। आयु लगभग पैतीस-छत्तीस के आस-पास। सिर के बाल उलझे हुए। कई दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी। विवर्णा-सी नीली जीन की पतलून और उस पर चैक की एक पुरानी सी कमीज जिसके आगे के बटन खुले हुए थे। 


'नया मजदूर है सर।' अधेड़ सुपरवाईजर ने उसे पद की मर्यादा से सम्बोधित करते हुए कहा-'काम मांग रहा था। मैंने दिहाड़ी पर रख लिया। वैसे भी आज तीन-चार मजदूर नहीं आए सो आदमियों की जरूरत तो थी ही।' 


'यह आदमी आपको मजदूर जैसा लगता है क्या?' उसने उस व्यक्ति को घूरते हुए देखा जो कुल्हाड़ी के द्वारा एक पेड़ का तना काटने में लगा हुआ था। 


'लगता तो नही है। लेकिन वक्त ग्रादमी को जो कुछ न बना दे सो थोड़ा।' 


लेकिन वह सुपरवाईजर की बात नहीं सुन रहा था वह उस व्यक्ति को देख रहा था। साफ गुण्डों जैसा दिखाई दे रहा था। उसे इस बात में कोई शक नही था कि कालिया ने ही इस व्यक्ति को मजदूर के रूप में वहां भेजा होगा। उसे परेशान करने के लिए। 

वह उसके निकट पहुंचा। 


उस व्यक्नि ने भी उसकी उपस्थिति का आभास पाकर हाथ रोक लिया। हाथ माथे से छुआकर सलाम किया-'सलाम साहब।' 


'तुम्हें मजदूरी के लिए इस जंगल के अलावा और कोई जगह नहीं मिली?' वह तीक्ष्ण दृष्टि से उसका निरीक्षण करते हुए बोला। 


विचित्र ढंग से मुस्कराया वह व्यक्ति। 

फिर गरदन को अजीब ढंग से झटका देता हुआ बोला-'कौन कह सकता है कि इतनी बड़ी टुनिया में किसकी रोजी-रोटी कहां छुपी हुई है। किस्मत मुझे आपके इलाके में खींच लाई और मैं यहां काम करने लगा।' 


'किस्मत तुम्हें यहां खींच लाई या तम खुद-ब-खुद यहां आ गए, मुझे इससे कोई मतलब नही है।' उपेक्षित से स्वर में कहा उसने-'लेकिन तुम्हारे लिए यहां कोई काम नहीं है।'


'इतने नाराज क्यों हो रहे हैं आप मुझ पर। कोई चोरी-डकैती तो मैंने की नहीं है। मेहनत मजदूरी करके कुछ कमाने की कोशिश कर रहा हूं।' 


जितना भी वह उस व्यक्ति को देख रहा था उतना ही उसे उसकी मुजरिमों जैसी सूरत से घृणा-सी होती जा रही थी। यह विचार भी हृदय में बल पकड़ता जा रहा था कि इस आदमी को निश्चित रूप से कालिया ने ही भेजा है। कोई और घिनौनी चाल चलने के लिए। अपने इन भावों को छुपाने की कोई कोशिश भी नहीं की उसने। 


'मैं तुमसे बेकार की बहस तो करना नहीं चाहता।' वह तीव्र स्वर में बोला-'एक बार कह दिया कि यहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है तो समझ लो कि यहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है।' 


'बेभाव का ताव खाने की जरूरत नहीं है मिस्टर? तुम लोग अगर आदमियों को मजदूरी नहीं करने दोगे तो क्या वे चोरी-चकारी के लिए मजबूर नहीं हो जाएंगे।' 


'चोरी-चकारी करेंगे तो जेल में जाकर चक्की भी पीसेंगे।' 


उसे खद महसस हो रहा था कि वह जरूरत से ज्यादा ही उत्तेजित हो रहा है और वेमतलब की बात भी कर रहा है। लेकिन वह अपने आप पर काबू पाने में अपने-आपको असमर्थ पा रहा था। 


कल का दश्य यानि उसकी साधना दीदी का नंगा शरीर रह-रहकर उसके मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंध रहा था। 


न जाने क्यों उसे लग रहा था कि यही वह व्यक्ति है जिसने कल उसकी दीदी के साथ वह कुत्सित व्यवहार किया था। उसका शीलहरण करने की कोशिश की थी। 


'कुछ लोगों को दुनिया की किसी भी जेल की दीवारें रोक कर नही रख सकतीं समझे।' उस व्यक्ति ने बड़ी ही सख्त और खतरनाक-सी आवाज में कहा। 


फिर हाथ की कुल्हाड़ी झटके-से फेंककर वह वहां से चल दिया। 


'यह आपने अच्छा नहीं किया सर।' 


उसने चौंककर कहने वाले की ओर देखा। सुपरवाईजर था जो उस जाते हुए व्यक्ति को गम्भीर मुख मुद्रा के साथ देख रहा था। 


'क्या अच्छा नहीं किया।' वह उसी तरह तीव्र स्वर में बोला-'आपको वह मजदूर जैसा दिखाई देता है। कालिया का आदमी है वह कालिया का आदमी।' 


'मैंने इस आदमी को आज से पहले कभी नहीं देखा। लेकिन हो सकता है कि जो कुछ आप कह रहे है वह सब हो। उसे सच मानकर ही मैं एक बुजुर्ग और आपका हितैषी होने के नाते यह कह रहा हूं कि आपने अच्छा नहीं किया।' 


'क्या मतलब?' 


'पानी मे रहकर मगर से और जंगल में रहकर लकड़बग्घे से वैर पालना कोई अकलमन्दी नहीं है। आपको आश्चर्य होगा कि मैंने शेर की जगह लकड़बग्घा क्यों कहा?' क्योंकि कालिये को शेर कहना शेर का अपमान करना है। वह आदमी के रूप में लकड़- बग्घा ही है। उसी की तरह धूर्त और कुटिल। कभी शेर की तरह सामने नही आएगा। हमेशा छुपकर और पीछे से बार करेगा।'


कालिया का न'म सुनते ही उसके तन-बदन में आग-सी लग जाती थी। लेकिन फिर भी वह उस अधेड़ सुपरवाईजर की बात खामोशी से सुनता रहा। कालिया के बारे मे और अधिक जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से। 


'हां सर।' सुपरवाईजर कहे जा रहा था-'मैंने अपनी सारी जिन्दगी इसी जगल में नौकरी करते हुए गुजार दी और यह कहते हुए अफसोस ही हो रहा है कि मैंने जंगल के जानवरों को कहीं वेद्तर प्राणी पाया है। नहीं अपने-आपकों भी मैं आदमी कहने लायक आदमी नहीं पाता। 


एक दीर्व निःश्वास ली अधेड़ सुपरवाईजर ने। 


फिर बोला -'पिछले दिनों यहां जो कुछ भी घटा मुझे सब मालूम है। कल की उस घिनौनी घटना ने मुझे कितना बेचैन रखा यह मैं बयान नही कर सकता। आपको यकीन नहीं आएगा कि रात-भर सो नहीं सका था मैं। इसलिए नहीं कि कल की घटना कोई अजूबा थी मेरे लिए।' 


'क्या पहले भी ऐसा हो चुका है।' 


'कितनी ही बार।' एक बेचारी-सी हंसी हंसता हुधा बोला सुपरवाईजर -'कालिया के सारे हथकण्डों से परिचित हूं मैं। अपनी इस उम्र मैं न जाने कितने फारेस्ट आफिसरों का आना-जाना देखा है मैंने। आगे-पीछे हरेक को ही कालिया के आगे सिर झुकाना पड़ा है। पहले सीधी रिश्वत भेजता है वह। उसमें काम बन गया तो फिर तो कोई झगड़ा टन्टा ही नहीं । 


गन्दी-से-गन्दी चाल चलने में भी नही चूकता वह। और वो चालें वह तब तक चलता रहेगा जब तक कि उसका शिकार उसकी हवेली पर बैठकर चुग्गा नहीं चुगने लगेगा।' वह कालिया के बारे में और कुछ जान लेना चाहता था। जब यहां रहने का फैसला कर लिया हुऐ तो दुश्नन के वारे में ज्यादा-से-ज्यादा जानकारी अपनी रणनीति बनाने में सहायक हो सकती है।


'ओर मुझे और कुछ बता सकते हैं कालिया के बारे में?'


'बहुत कुछ बता सकता हूं सर।' सुपरवाईजर ने मजदूरों को सही ढग से काम करने के निर्देश दिए और फिर उसके साथ कलके कटे एक पेड़ के तने पर बैठकर उसने कहना शुरू किया 'गड़बड़ घोटला तो लगमग सभी जंगलों में चलता है। रात के अंधेरे में ट्रकों के ट्रक पेड़ उठा लिए जाते हैं। जानवर पकड़ लिए जाते ऐं।' 


'जानवर?' वह चौंक्कर बोला-'जानवर किसलिए?' 


'उनकी खाले बेचने के लिए। इस तरफ के जंगल में सांप बहुत तादाद में है। सांप का जहर और खाल दोनों की हो बेतहाशा मांग है बाजार में। मैने तो सुना है कि विदेशों में सांप की खाल सोने के भाव बिकती है। और भी अनेको प्रकार की वन-सम्पदा है जिसे कालिया जैसे लोग अवैध ढंग से बटोर-बेचकर बेतहाशा पैसा कमाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि और जगह यह सब काम चोरी-छुपे होता है जबकि यहां कालिया सबकुछ खुले- आम करता है।' 


'कोई रोकने-टोकने वाला नहीं।' 


सुपरवाईजर एक फीकी-सी हंसी के साथ बोला-'रोकने-टोकने वाला? जो रोकने-टोकने वाले हैं वो ही तो कालिया की पुश्त पर हैं और उसे यह सब करने के लिए शह देते रहते हैं। आखिर दें भी क्यों न, कमाई का बहुत मोटा हिस्सा उनकी जेबों भी तो जाता है।' 


'और फारेस्ट आफिसर?' 


'उसे भी अपने आंख-कान और जबान बन्द रखने के लिए हिस्सा दिया जाता है।' 


'किसी भी आफिसर ने इसका विरोध नहीं किया?' 


'कुछ ने करने की कोशिश की थी मगर बड़ी जल्दी सीधे हो गए। इन लोगों के आगे फारेस्ट आफिसर की बेचारे की बिसात ही क्या है? हाथी के आगे चीटी जैसी। जब चाहे मरजी जूने से मसलकर रख दे। इसीलिए मैं आपसे कह रहा हू कि पहाड़ को सिर की चोट से तोड़ने की कोशिश करने का मतलब है अपने सिर को फोड़ लेना। यहां वही कुछ होगा जो कालिया चाहेगा। आपके ऊपर पूरी गृहम्थी का भार हैं। एक लम्बी जिन्दगी पड़ी है जीने के लिए। इसलिए जो मौका मिला है उसका सदुपयोग कीजिए और कालिया के साथ मिलकर दोनों हाथों से पैसा बटोरिए।' 


'यह आप कह रहे हैं?' 


'जी हां।' सुपरवाईजर बोला-'वह भी सिर्फ इसलिए कि आपका हितैषी हूं। आपकी बड़ी बहन मेरी बेटी जैसी है। मैं नहीं चाहता कि कल का काण्ड फिर दुहराया जाए। इसीलिए खामोश रहने की जगह मैंने आपसे यह सब कहना बेहतर समझा। चाहता तो मैं भी महाराज सिंह की तरह हफ्ते दस दिन की छुट्टी लेकर घर बैठ जाता।' 


'क्या मतलब?' 


'जी हां। महाराज कहीं किसी शादी-वादी में कलकत्ते नहीं गया है बल्कि छुट्टी लेकर आराम से घर बैठा हुआ है।' 


'मगर क्यों? 


'हम लोग तनख्बाह तो जरूर सरकार से लेते हैं लेकिन असल में नौकरी कालिया की ही बजाते हैं। दिल से न चाहने के बावजूद भी। मजबूरी है, अगर ऐसा न करें तो कालिना का कोई भी गुण्डा आएगा और चौराहे पर हमारी इज्जत नीलाम करके चला जाएगा।' 


वह अविश्वास के साथ सुपरवाईजार की ओर देखता रहा।


'जब छोटी मुन्नी के साथ रीछ वाला काण्ड हुआ था तो हमने कोई खास ध्यान नहीं दिया था। क्योंकि यह नए आने वाले को अपना परिचय देने का बहुत पुराना तरीका है कालिया का।' 


'यानि वह रीछ ।' 


'रीछ नहीं था। बल्कि रीछ की खाल में कालिया का आदमी था। उस ढंग से उसने आपको यह बताने की कोशिश की थी कि आपकी और आपके परिवार की जिन्दगी उसके हाथ में है।' 


'हां।' 


'लेकिन जब अगले दिन आपने भैरोंसिंह को दुत्कार कर वापिस लौटा दिया।' 


'भैरोसिंह?' 


'वही जो कालिया की ओर से रिश्वत लाया था।' 


'अच्छा ।' 


'तभी महाराज मेरे पास आया था। बोला-गुरूजी जंगल में युद्ध के नगाडे बजने वाले हैं सो मैं तो जा रहा हूं हफ्ते दस रोज की छुट्टी। जब मामला शान्त हो जाएगा तब आऊंगा।' 'क्यों?' उसे क्या खतरा था?' 'मैंने बताया ना कि तनख्वाह हम लोग सरकार से लेते हैं लेकिन असली नौकर कालिया के हैं। जंगल की खबर कालिया को देने का काम महाराजसिंह के जिम्मे था। आपका भी कोई दुश्मन नहीं है वह। इसलिए जब तक मामला नहीं सुलझता उसने बीच में से हट जाना ही ठीक समझा।' 


'लेकिन आपने छुट्टी लेना ठीक नहीं समझा?" 


'मुझे उम्मीद नही थी कि मामला इतना तूल पकड़ जाएगा। तुम्हें परिवार के साथ देखकर समझा था कि मामला जल्दी पट जाएगा।' सुपरवाईजर अधिक आत्मीयता के साथ बोला-'कल की घटना ने मुझे दहला दिया था। आज मैं खुद तमसे बात करनी चाहता था। ताकि समझा सकं कि जवानी के जोश में कितनी बड़ी गलती करने जा रहे हो तुम। क्योंकि अनुभव ने मुझे बताया है कि अकेला चना भाड नहीं फोड सकता। बड़े बुर्जुग भी यही कह गए हैं।' 


वह खामोशी के साथ कुछ सोचता-विचारता रहा। 


सुपरवाईजर कहे जा रहा था-'यहां आया तो जगतार को देखा।' 


'जगतार कौन?' 


'यही पैट पहने हुए गुण्डा-सा आदमी जिसे अभी-अभी आपने यहां से निकाला है।' 


'इसका नाम जगतार है?' 


'अपना नाम वही बताया था इसने। आज से पहले कभी इसकी शक्ल भी नहीं देखी थी मैंने। लेकिन शक मुझे भी हुआ था कि कालिया का ही आदमी होगा। सो बिना किसी हील हुज्जत के काम पर रख लिया।' 


'क्या कालिया की गुण्डागर्दी खत्म करने का कोई उपाय नहीं है?' 


'मेरे इतना समझाने पर भी आप अभी रेत से तेल निकालने को बात सोच रहे हैं। क्यों बेकार के चक्कर मे उलझ रहे हैं। आपके छोटे-छोटे भाई-बहन हैं। बड़ी बहन की शादी करनी है। सरन महतो वो वेल्कुल अकेला था। न आगे कोई न पीछे। किसी परिवार की कोई जिम्मेदारी नहीं।' 


'सरन मेहता?' 


उसने प्रश्नपूर्ण दृष्टि से सुपरवाइजर की ओर देखा। 


'अपना पिछला फारेस्ट आफिसर।' 


'उनकी तो लाश पाई गई थी ना जंगल में।' 


'जी हां, दिखावा तो यही गया है कि अकेले में किसी जंगली जानवर ने भंभोड़ डाला। लेकिन ।' 


'लेकिन क्या?' 


'लेकिन असलियत क्या है वो यहां का बच्चा-बच्चा जानता है। सबको मालूम है कि वह किसी जानवर का नहीं बल्कि कालिया का काम है।' 


'यानि कालिया ने उसकी हत्या की है?'


'की है या करवाई है। बात तो एक ही है।'


'तो क्या उसने कालिया से टक्कर लेने की कोशिश की थी?' '


अजी नहीं।' हिकारत-भरे स्वर के साथ सुपरवाईजर ने कहा-'उस सुसरे की छाती में इतना बड़ा कलेजा कहां था। वह तो आते ही कालिया का गुलाम बन गया था। हर वक्त कुत्ते की तरह दम हिलाए डोलता था कालिया के आगे पीछे। रोज शराबें उड़ती थीं। ऐथ्याशी की जाती थी। कालिया उसकी नकेल पकड़ कर नचाता था और वह बन्दर की तरह उसके इशारे पर नाचता रहता था।' 


'तो फिर कालिया ने उसकी हत्या क्यों की?' 


'अन्दरखाने की बात तो मुझे पता नहीं। लेकिन कहते हैं कि अपने हिस्से की रकम बढ़ाए जाने के लिए उसका मुंह सुरसा की तरह लगातार फैलता जा रहा था। कालिया भी उसके जमाने में चारों ओर से जंगल को लूट रहा था। सो उसका मुंह भी भरता रहता था। लेकिन आप जानो कि जब लालच बढ़ता ही चला जाए तो कहीं न कहीं बस तो होती ही है। मैंने तो सुना है कि महतो ने कालिया को धमकी दी थी कि अगर उसकी मांग न मानी गई तो वह उसका भंडा फोड़ कर रख देगा। उसे और उसके साथियों को जेल के अन्दर करवा देगा।' 



'उसके बाद...।' 


'बस उसके बाद क्या?' सुपरवाईजर अपनी नाक पर चश्मे को ठीक करता हुआ बोला-'धमकी देने के अगले रोज ही उसकी लाश पड़ी मिली जंगल में। रात ही रात में काम हो गया उसका।' 


वे लोग बातें कर ही रहे थे कि तभी एक जीप को आते देख कर चौंक पड़े। 


सूपरवाईजर नो आंखें संकुचित करके आती हुई जीप को देखा। फिर धीरे से फुसफुसाकर बोला-'कालिया की जीप है। शायद खुद ही आया है। मामले को उलझाईएगा नही। जैसे भी हो समझौता कर ही लीजिए। इसी में अक्लमदी है।'


जीप उनके सामने आकर रुकी और कालिया नीचे उतरा। बन्द गले का कोट और सफेद धोती। कन्धे पर भी बड़े करीने से तह की हुई सफेद चादर। उंगलियों में सिगरेट दवी हुई, जिसका नीचे उतरते ही मुट्ठी बन्द करके गहरा कश लिया उसने। फिर चुटकी बजाकर लापरवाही से राख जमीन पर झाड़ दी उसने। उसे देखते ही सुपरवाईजर बड़े अदब से उठकर खड़ा हो गया था। लेकिन केसरी खमोशी के साथ पेड़ के तने पर ही बैठा रहा था।

'ओह सुपरवाईजर बाबू, कहिए कैसे हैं?''यही है ना अपने नये मालिक, नमस्कार हुजूर नमस्कार ।' 

सभ्यतावश उसने कालिया के जुड़े हुए हाथों के बदले में अपने भी हाथ जोड़कर खोल दिए। फिर रुखे स्वर में पूछा-कहिए कैसे आना हुआ?" 

'एक दिन भैरों के हाथों हुजूर की खिदमत में कुछ पान-सुपारी भिजवाए थे। लेकिन आपने उन्हें वापिस करवा दिया। हम तभी समझ गए थे कि हुजूर को भरो की शक्ल पसन्द नहीं आई। सोच रहे थे कि किसी रोज खद हुजूर की सेवा में जाकर उपस्थित होगे और बन्दगी बजाएगें। लेकिन दुनिया के झमेलों से टाईम मिले तब ना?' 

वह कुछ बोला नहीं। बस खमोश स्थिर दृष्टि से उसे देखता रहा। 

'फिर कल पता चला कि यहां कुछ ऐसा घट गया है जो नहीं घटना चाहिए। किन्ही कुकर्मियों ने बड़ी बहन जी के साथ कुछ उलटा-सीधा करने की कोशिश की। यह भी पता लगा कि हुजूर को अपने इस गुलाम के बारे मे कुछ गलतफहमी हो रही है। सुन कर मैं तो ऊपर से नीचे तक कांप गया हुजूर। तुरन्त दौड़ा-दौड़ा हुजूर की खिदमत में चला आया ताकि गलतफहमी दूर कर सकू।' फिर वह सुपरवाईजर की ओर घूम कर बोला-'सुपरवाईजर बाबू कुछ पता चला कि कौन बदमाश थे वो लोग?' 

'जी नहीं अभी तो कुछ मालूम नहीं हो सका।' सुपरवाईजर ने बड़े अदब से जबाब दिया। 

'आसपास कोई गैर पहचाने हुए चेहरे तो नहीं दिखाई दिए थे आज या कल में?' 

'जी एक दिखाई दिया था आज?' 

'उससे पूछा नहीं कि कहां से आया है?' क्यों आता है यहां?' 

'काम मांग रहा था वह। मैंने तो उसे काम पर लगा दिया था। लेकिन आफिसर बाबू ने उसे डांट कर भगा दिया।' 

'ऐसे कैसे भगा दिया उसको आफिसर बाबू? पूछना था कि कहा से आया है? क्यों आया है यहां? पकड़कर पुलिस के हवाले कर देना था। ऐसे गुंडे बदमाश खुले घूमते रहेंगे तो शरीफ बहू-बेटियों का जीना हराम हो जाएगा।'

'मिस्टर कालिया?' आखिर वह बोल ही पड़ा। 

'हुजूर।' कालिया हाथ जोड़ता हुआ उसकी ओर उन्मूख हुआ।

'देख रहा हूं कि इस इलाके में आपका काफी रौब है।' 

'रौब तौब तो क्या है हुजूर बाकी इतना जरूर है कि इस इलाके में पर मारने से पहले परिन्दा भी कालिया से पूछ लेता है कि पर मारू या नहीं। इसलिए तो मुझे कल की उस दुर्घटना के बारे में जानकर हैरानी हुई कि किन हरामजादों के सिर पर मौत नाच रही है जो इतना बड़ा दुस्साहस कर बैठे। 

शायद उन्हें इस बात की खबर लग गई होगी कि हजुर ने कालिया की भेजी हुई पान-सुपारी वापिस कर दी हैं। सो उन्होंने सोचा होगा कि कालिया तो कुछ कहेगा नहीं।' 'सो खुलकर खेल लो।' 'यही तो चक्कर है हुजूर कि आदमी के दिल से डर खत्म हो जाए तो साला खुलकर खेलने लगता है।'

'और तुम भी शायद इसीलिए खुलकर खेल रहे हो क्योंकि तुम्हारे दिन से भी डर खत्म हो गया है।' 

'आ बड़ी जल्दी मतलब की बात पर आ गए।' कालिया ने कहा और फिर सुपरवाईजर की ओर हाथ बढ़ाकर चुटकी सी बजाई। 

सुपरवाईजर संकेत समझ गया और तुरन्त ही वहां से हट गया। 

कालिया के जो आदमी अभी तक जीप में ही बैठे हुए थे उनसे भी वह बोला-'अरे तुम लोग भी जरा जीप को पीछे ले जाओ प्राइवेट बात करनी है।' 

फिर उसकी ओर उन्मुख होता हुआ बोला-'हां तो आफिसर बाबू अब तक आपकी समझ में यह तो आ ही गया होगा कि कालिया के साथ मिलकर चलना होगा। कल जो कुछ भी हुआ बहुत बुरा हुआ। उसका मुझे तहे दिल से अफसोस है। लेकिन एक खशी भी है कि उतना बुरा नहीं हुआ जितना की हो सकता था। शीशे का बरतन पटक कर टूटा नहीं।' 

कालिया ने रुक कर उसकी आंखों में झांका। वह खामोश खड़ा देखता रहा और सुनता रहा। 

'हां आफिसर बाबू। औरत की इज्जत शीशे के बर्तन सरीखी ही तो होती है कि एक बार चटक कर टूटी तो फिर सब कुछ खत्म। कहो मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाती औरत। जिन्दगी खराब हो जाती है उसकी भी और उसके घरवालों की भी।' 

घनी मूंछों के नीचे उसके होंठ एक अजीब मुस्कराहट के साथ फैल गए। 

बोला-'लेकिन शुक्रू है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है तुम्हारे पास कि ऐसा फिर नहीं? होगा? सिर्फ एक गारन्टी है। कालिया की दोस्ती का हाथ, जो एक बार फिर तुम्हरी तरफ बढ़ा रहा हूं मैं। यह दोस्ती का हाथ गारन्टी है तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की रक्षा की। यह दोस्ती का हाथ गारन्टी लेता है तुम्हारे खुशहाल भविष्य की। इस दोस्ती के हाथ की थाम लो आफिसर बाबू।' 

'और तुम्हें खुली छूट दे दूं इस जंगल से टूक की ट्रक लकड़ियां उठाकर ले जाने की। जंगली जानवरों को मनमाने ढंग से पकड़ कर उनकी खातों की बिक्री से बेशुमार दौलत कमाने की।' 

'नही-नहीं आफिसर बाबू तुम्हें ऐसा कुछ नहीं करना होगा। तुम्हें तो सिर्फ अपने आंख, नाक, कान, बन्द करने होंगे। बाकी सब काम तो हम खुद कर लेंगे।' 

'तुम गलत दरवाजे पर दस्तक दे रहे हो कालिया।' बह सख्त स्वर मे बोला-'यहां से तुम्हारी मन मरजी की भीख मिलने बाली नहीं है।' 

'जवानी के जोश में अन्धे मत बनो बाबू।' कालिया का स्वर एकदम कड़ा हो गया-'वरना यह दो टके की अफसरी नाक के रास्ते निकल जाएगी।' 

उसका हाथ उठते-उठते रह गया।

कालिया अचानक ही अपनी आवाज फिर से नरम करता हुआ बोला-'प्रेम मुहब्बत से इस दुनिया में रहोगे तो सुख से रहोगे। कालिया का हमेशा एक असूल रहा है। जियो और जीने दो। खाओ और खाने दो। पिओ और पीने दो।'

'लेकिन तुम्हें शायद मेरे असूल के वारे में नहीं पता है?' 

'वो क्या है।' 

'अगर अपने फर्ज के लिए जान भी देनी पड़ जाए तो भी पीछे मत हटो।' 

'लगता हए तुम्हारी खोपड़ी में अक्ल नाम की कोई चीज नहीं है, कहीं ऐसा तो नहीं कि दो हजार की रकम थोड़ी लगी हो। 
अगर ऐसा है तो बोलो, रकम बढ़ भी सकती है, ढाई तीन चार कितनी चाहिए?' 

'अब तुम्हारे यहां से चले जाने में ही भलाई है' 

'लगता है कुत्ते की दुम आसानी से सीधी नहीं होगी।' एक दीर्घ निःश्वास के साथ कालिया ने कहा-'मेरा जितना फर्ज था मैंने पूरा कर दिया। आगे तुम जानो और तुम्हारा नसीब। खैर आया हूं तो कुछ न कुछ तो देकर जाऊंगा दी।' कालिया ने अपनी जेब में हाथ डालकर एक सस्ते किस्म की लिपस्टिक सी निकाली और उसकी ओर बढ़ाते हुए बोला-'दोस्ती की खातिर उन बदमाशों का पता लगाकर मैंने यह लिपस्टिक उनसे छीन लो थी। इस बार तो मैं छीन लाया। दूसरी बार कौन छीन कर लाएगा।' 

लिपस्टिक को देखते ही वह अपने आप पर काबू न रख सका। कालिया के कुकर्म का सबूत उमकी हथेली पर रखा हुआ था। 

हाथ उठा और एक जन्नाटेदार झापड़ उसने कालिया के गाल पर रसीद करते हुए कहा-आदमी की औलाद होगा तो इतने से ही समझ जाएगा। दूसरी बार आंखों के सामने पड़ा तो जिन्दा जमीन में गाड़ दूंगा।' 

झापड़ पड़ते ही हतप्रभ रह गया कालिया। जीप में बैठे उसके साथी एकदम उछल कर बाहर कूदे। केसरी ने झपटकर पास पड़ी हुई कुल्हाड़ी उठा लो। 

कालिया ने हाथ उठाकर अपने आदमियों को रोका, फिर अपने गाल को सहनाता हुपा बोला-'यह झापड़ तुम्हें बहुत महंगा पड़ेगा छोकरे।' 

अपने आदमियों के साथ जीप में बैठ कर चला गया कालिया। 

अधेड़ सुपरवाईजर ने बड़े ही निराशाजनक ढंग से सिर हिला कर ऊपर आसमान की आर देखा। 

'मेरा नाम के. सी. केसरी है। फारेस्ट आफिसर।' 
घंटी बजने के बाद जैसे ही दरवाजा खुला तो उसने अपना परिचय दिया। 

'आइए अन्दर आईए। मेयर साहब आपका ही इन्तजार कर हे हैं।' दरवाजा खोलने वाले व्यक्ति ने एक ओर हटते हुए कहा-'आप बैठिए, मैं साहब को आपके आने की खबर देता हूं।' 

वह एक काफी लम्बा चौड़ा ड्राईग रूम था। बहुमुल्य बस्तुओं और फर्नीचर से सुसज्जित। वह एक सोफे पर बैठा तो लगा जैसे गुदगुदाहट के समुन्दर मे फसता ही चला जाएगा। दरवाजा खालने वाला एक अन्य दरवाजे मे घुस कर आंखों से ओझल हो गया। 

वह वहां बैठा हुआ चारों ओर बिखरे सम्पत्ति सौन्दर्य को निहारने लगा। 

दोपहर को खाना खाने के लिए बंगले पर लौटा था सो साधना ने बताया-'गिरीश जी का फोन आया था।' 

'कौन गिरीश जी?' 

'शहर के मेयर हैं। तुम्हें बुलाया है मिलने के लिए। 

कैसा सुख सा तो महसूस किया था उसने यह सुनकर। अगर शहर का मेयर उसका साथ देने के लिए तैयार हो जाए तो फिर कालिया से निपटना उसके लिए ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। 

उसने उसी समय साधना द्वारा लिखे-नम्बर पर फोन किया था। मेयर ने कहा था कि वह वह खाना खाकर आ जाए। अपनी कोठी पर ही वह उसका इन्तजार करेगा। 

लेकिन चलने से पहले उसने साधना को अपनी कालिया से हुई मुलाकात के बारे में बता दिया था। 

'सम्हल कर रहना दीदी।' उसने चलते हुए कहा था-'कालिया के गंडे जंगल में घूम रहे हैं मजदूरों के वेष में।' 'तू मेरी फिक्र मत कर।' साधना ने जवाब दिया-'अब मैं पहले की तरह असावधान नहीं रहूंगी। दिन में दो-चार आदिवासी औरतें आई थीं घास काटने के लिए। मैंने उनसे दोस्ती गांठ ली है। एक दो जनी हर वक्त बंगले के आसपास रहा करेंगीं।' 

निकलते समय उसने देखा था उन आदिवासी औरतों को बंगले के पास घास काटते हुए। वह देखकर उसे सुरक्षा का साहस ही मिला था। 

वह उन्हीं विचारोंमें लीन था कि जगमग सफेद कुर्ता-पाजामा पहने मेयर गिरीश चन्द्र शर्मा ने अन्दर प्रवेश किया। उनके पीछे पीछे उनका निजी सचिव था जयराम सेठी। 
उसने उठकर नमस्कार किया। 

'बैठो-बैठो भई।' मेयर ने हाथ के इशारे से उसे बैठने के लिए कहा, फिर स्वयं भी उसके सामने की कुर्सी पर बैठते हुए कहा-तो तुम्ही हो नए फारेस्ट आफिसर।' 

'जी हां।' 

'थोड़ा-बहुत सुना है मैंने तुम्हारे बारे में कि कालिया की भेजी हुई रिश्वत को ठकरा दिया है तुमने।' मेयर ने कहा-'चलो कोई फारेस्ट आफिसर तो आया जो सच्चाई की राह में छाती ठोंककर खड़े होने की हिम्मत रखता है। एक वह पिछले वाला था क्या नाम था सेठी उसका?' 

'जी महतो सरन महतो।' 

'हां सरन महतो। कालिया का कुत्ता ही बन गया था वह तो।' मेयर ने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा। जैसे उस बात का जिक्र करना भी उसे पसन्द न हो। फिर धीरे से मुस्कराते हुए बोला-'लेकिन मुझे खुशी है कि तुमने कालिया का प्रस्ताव ठुकराने की हिम्मत तो दिखाई।' 

'लेकिन उस हिम्मत की बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है सर, मुझे।' 

'जानता हूं जानता हूं।' मेयर ने सिर हिलाते हुए कहा-'कल के उस घिनौने काण्ड के बारे में सुन चका हूं मैं। सच पूछो तो उसी बारे में बातचीत करने के लिए मेंने तुम्हें यहां बुलाया है। सेठी तुम जरा उन लोगों को फोन करके कहो तो सही कि मिस्टर केसरी आ गए हैं यहां।' 

सेठी फोन की ओर बढ़ गया।

केसरी की समझ में नहीं आया कि मेयर ने किन लोगों को फोन करके बुलाया है। लेकिन मेयर के सहयोग पूर्ण रुख से वह उत्साहित अवश्य हुआ था। उसी उत्साह में उसने कालिया से आज हुई मुलाकात के बारे में भी बता दिया। 

'झापड़ मार दिया तुमने उसके। बहु आदमी है भी इसी लायक। लेकिन फिर भी मैं समझता हूं नौजवान कि तुम अगर अपनी भावनाओं पर काबू रखते तो ज्यादा बेहतर होता।' 

'आप शायद ठीक कह रहे हैं। लेकिन सर, जिस नीचतापूर्ण प्रदर्शन पर वह उतर आया था उसमें अपने-आपको रोक पाना असम्भव था मेरे।' 

'मैं जानता हूं कि कालिया कितना नीच आदमी है। फिर भी खैर जो हो गया सो हो गया। यह बताओ कि कल की घटना की रिपोर्ट लिखाई तुमने पुलिस में?' 'जी लिखानी तो चाहता था। लेकिन बाद में इरादा बदल दिया।' 

'क्यों?' 

केसरी ने उसे जो खूछ पुलिस स्टेशन इंचार्ज गजराजसिंह ने बताया था वह सबकुछ कह सुनाया। सिर्फ गजराजसिंह का नाम नहीं लिया। 

'यह अच्छा नहीं किया तुमने।' मेयर बोला-'रिपोर्ट तो लिखा ही देनी चाहिए थी।' 

'उसमें बदनामी तो अपनी ही होती।' 

'तुम्हारी मजबूरी भी समझ रहा हूं मैं।' मेयर बोला-'खैर इस कालिया को इस बार सबक तो सिखाना ही होगा। इतना तुम समझ लो नौजवान कि अपनी इस लड़ाई में तुम अकेले नहीं हो। में तुम्हारे साथ हूं।' 'जी धन्यवाद।' इतने प्रभावशाली सहयोगी को पाकर उसने वाकई बहुत बड़ी राहत की सांस ली थी। फिर भी वह बोला-'लेकिन सर यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि आप जैसे व्यक्तियों के होते हुए यह कालिया जैसा आदमी यहां पनप कैसे गया।' 

'राजनीति नौजवान, राजनीति। इस देश का बेड़ा गर्क कर दिया है यहां की गन्दी राजनीति ने। तुम क्या समझते हो 
कालिया जो कुछ भी कर रहा है अपने दम खम पर कर रहा है। नही उसकी पुश्त पर बड़े-बड़े लोग हैं जिनकी बहुत ऊंची-ऊंची पहुंच है।' 'पहुंच तो आपकी भी बहुत ऊंची होगी सर।' 

'है।' मेयर बोला-'लेकिन तुम शायद एक बात नहीं जानते गलत, आदमियों के रसूख ज्यादा पक्के और मजबूत होते हैं। मेरी ही मिमाल लो मैंने जब जनता द्वारा चुने जाने पर यह मेयर का पद सम्हाला तो न जाते कहां-कहां से लोग अपने उल्टे-सीधे काम कराने के लिए मेरे पास आने लगे। जब मैंने उन निहित स्वार्थियों को अपने उद्देश्य में कामयाब नहीं होने दिया तो वे मेरे विरुद्ध हो गए। इस कालिया को भी मैंने ठीक करने की सोची थी। पिछले फारेस्ट आफिसर को बुलाकर मैंने पूछा था उमसे कालिया की गैर कानूनी गतिविधियों के बारे में। जानते हो उसने मुझे क्या जवाब दिया था।' 

केसरी ने प्रश्नपूर्ण दृष्टि से मेयर की ओर देखा। 

'उसने मुझसे कहा था कि मुझे गलत जानकारी मिली है।' मेयर बोला-'उसका कहना था कि कालिया का उससे कोई सम्बन्ध ही नही है। बाद में मुझे मालूम हुआ कि वह कालिया के आगे-पीछे चौबीसों घण्टे कुत्ते की तरह दुम हिलाता घूमता था। बताओ ऐसी हालत में मैं क्या कर सकता हूं। अगर उस आदमी ने मुझे सही बात बता दी होती। कुछ ठोस सबूत मुहैया कर दिए होते तो मैंने अब तक उसे ठीक कर दिया होता।' 

'सुना है उसे कालिया ने ही मार डाला।' 

'कहा तो यह जाता है कि किसी जंगली जानवर ने उसे मार डाला लेकिन बात तुम्हारी ही ठीक है। सब लोग जानते हैं कि उसकी हत्या की गई है और उसका जिम्मेदार कालिया है।' 'फिर भी कानून ने कालिया को नही पकड़ा?' 

'कानून सबूत के विना कुछ नहीं कर सकता नौजवान। तुम कालिया के खिलाफ सबूत लाओ इस बारे में। फिर देखो अगर मैं कालिया को फांसी पर न चढ़वा दूं तो फिर कहना।' 

बहू कुछ सोच में पड़ गया। 

'लेकिन तुम घग्राओ नहीं।' मेयर बोला-'अगर तुम कालिया का मुकाबला करने के लिए तैयार हो तो मैं तुम्हारे साथ हूं।' 

'मुकाबला करने को तो मैं तैयार हूं। लेकिन कालिया की वे घिनौनी हरकतें...।' 

'उनका भी इन्तजाम हो जाएगा। अगर तुमने कल की घटना की रिपोर्ट लिखा दी होती तो हमारे हाथ और मजबूत होते। लेकिन अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। मैंने यहां शहर के कुछ प्रतिष्ठित पत्रकारों को बुलाया है। तुम उन्हें अपनी सारी कहानी बताना।' 

'उससे क्या होगा?' 

'तुम्हारी कहानी उन लोगों के माध्यम से अखबारों में छपवाएगे, जनता उसे पढ़ेगी। उसमें चेतना आयेयी। हां, कालिया और उसके पृष्ठ पोषकों के खिलाफ जन चेतना को जगाना होगा। तभी बात बनेगी।'

'लेकिन अगर कालिया ने पलटकर दीदी को बददाम करना शुरू कर दिया तो?' 

'वह जरूर कुछ तकलीफदेह बात होगी।' कहते हुए मेयर कुछ सोच में पड़ गया फिर जैसे कोई अनहोनी-सी बात सूझ गई हो उसे। वह एकदम अपनी जांघ पर जोर से हाथ मारता हुआ बोला-'तब हम अपनी उस गलती का फायदा उठा लेंगे।' 

'मैं कुछ समझा नहीं।' 

फोरेस्ट आफिसर 'मैं रिपोर्ट न लिखाने की गलती की बात कर रहा हूं। हम डंके की चोट कहेंगे कि कालिया झूठ बोल रहा है। अगर ऐसा कुछ हुआ होता तो क्या हमने पुलिस में रिपोर्ट न लिखाई होती। 

लेकिन अगर कालिया यह बात कह रहा है तो साफ जाहिर है कि वह ऐसे गन्दे इरादे रखता है। कल को बगर यह ऐसी गन्दी हरकत कर जाए तो कोई ताज्जुब नही। तुम फिक्र मत करो। कालिया या उसके साथी जो भी चाल चलेंगे मैं उनकी ऐसी काट करूगा कि उन्हें अपनी जान बचानी मुश्किल हो जाएयी। ऐसे हालात पैदा कर दूंगा कि खुद जनता कालिया का घिराव करके उसके कुकर्मों की सजा उसे देगी।' 

'क्या ऐसा सम्भव है?' 

'तुम जनता की शक्ति को नहीं जानते नौजवान। इसीलिए जायद इतने भ्रमित हो रहे हो। लेकिन मैं जनता की शक्ति को जानता भी हूं और पहचानता भी हूं। मुझे देखो। मेयर की जिस सीट पर मैं बैठा हूं वह क्या अपन बुद्धि बल के भरोसे। 

अगर ऐसा समझते हो ता दस-प्रतिशत सही समझते हो। नब्बे प्रतिशत यहां बैठाया है मुझे जनता की शक्ति ने। यह जन-शक्ति ही है जिसने नुझे यहां बैठाया है या मुझे यहां से हटा देगी।' 

'मेरी बुद्धि इतनी बड़ी-बड़ी बातें समझने में असमर्थ है।' 

'कोई बात नहीं धीरे-धीरे समझ में आ जाएंगी। लेकिन मैं तुम्हारे भरोसे पर ओखली में सिर देने जा रहा हूं। कहीं ऐसा न हो कि ऐन वक्त पर तुम पीछे हट जाओ।' 

'जो?' 

'यही कि मैं कालिया के खिलाफ जन-आन्दोलन छेड़ दूं और तुम किसी वजह से घदराकर कालिया के साथ मिल जाओ तो जन-शक्ति मुझे कभी माफ नहीं करेगी।' 

ऐमा कमी नदी होगा सर।' वह दृढ़ स्वर में बोला। 'तो समझो ग्के आज से धर्म-युद्ध छिड़ गया। विजय निश्चित रूप से हमारी द्री होगी।' 

कुछ देर बाद ही पांचा-छ: पत्रकार आ गए और वह उन्हें यहां आने के बाद आ घटनाओं का विवरण देने लगा। जैसा कि तय था बलात्कार की कोशिग वाला किस्सा उसने नहीं बताया। 

'इस छोकरे को तो मैं अब जिन्दा नहीं छोड़ेगा। साले ने इतने आदमियों के बीच मेरे मुंह पर थप्पड़ मार दिया?' 

'समझदारी से काम लो कालिया?' 

'समझदारी काम न लेता जगन सेठ तो यूं थप्पड़ खाकर चुपचाप न चला आता। साले को वहीं चीरकर फेंक देता।' 

जंगल से सीधा जगन सेठ के दफ्तर में आया था कालिया। अपना यह निर्णय सुनाने के लिए कि यह नए फारेस्ट आफिसर मामूली तरीकों से काबू में आने वाला नहीं है और अब इसे काबू में करने की कोई जरूरत भी नहीं है। पिछले फारेस्ट आफिसर की तरह इसे भी ठिकाने लगाना होगा। कालिया पर हाथ उठाने वाला जिन्दा नहीं बच सकता। 

सारी बात सुनने के बाद जगन सेठ ने उसे समझाने के से ढंग से कहा-'उत्तेजना में कभी भी कोई ढंग की बात नहीं सोचो जा सकती। पहले तो तुम अपना गुस्सा ठण्डा करो।' 

'यह गुस्सा जगन सेठ पानी से नहीं अब उसका लहू पीकर ही ठण्डा होगा।' 

'बच्चों जैसी बातें करने से कोई फायदा नहीं है। सारी गलती तुम्हारी है। मुझे लगता है कि ज्यों-ज्यों तुम्हारी उम्र बढ़ती जा रही हए त्यों-त्यौं तुम्हारी अक्ल सठियाती जा रही है।' 

'तुम मेरी गलती बता रहे हो जगन सेठ।' कालिया ने आश्चर्य मिश्रित क्रोध के साथ कहा-'मैंने तो उसके आते ही भैरों को भेंट पूजा के साथ भेज दिया था। बड़ी प्यारी और खुशामद-भरी चिट्ठी लिखी थी। जिसका जवाव उमने दिया कि मेरे सिर पर खड़ा होकर बंसरी बजाएगा। दो टके के फोरेस्ट आफिसर सरकारी नौकर की हिम्मत देखी।' 

'गलती तुम्हारी ही है। उसने अभी यहां आकर सामान भी नही रखा था कि तुम शुरू हो गए।' 'कोई नई बात तो की नहीं थी मैंने। हमेशा ही ऐसा करता आया हूं और काम कर रहा हू। अपने इन्हीं तरीकों से अब तक जितने भी फारेस्ट आफिसर आए सबको अपनी जेब में लिए घूमता था।' 

'जरूरी नहीं कि जो तरीका अब तक कामयाब रहा है वह हमेशा ही कामयाब रहेगा। मौका माहौल देखकर तरीके वदलने भी पड़ते हैं।' 

'तरीका तो बदलूंगा ही जगन सेठ। अच्छी तरह देख लिया है कि सीधी उंगलियों से धी नहीं निकलेगा। अब तो टेढ़ी उंगलियों से ही घी निकालना पड़ेगा।' 

'अब तक जो हुआ सो हुआ। अब यह टेढ़ी-सीधी उंगलियों की बात छोड़ो और जैसा मैं कहता हूं वैसा करो।' 

कालिया ने प्रश्नपूर्ण दृष्टि से जगन सेठ की ओर देखा। 

जगन सेठ ने मेज पर से पेपरवेट उठाया और उसे हाथों में घुमाते हुए बोला-'कुछ दिन उस फारेस्ट आफिसर की ओर ध्यान मन दो। जो वो करता है उसे करने दो।' 

'फिर?' 

'फिर जैसा मोका होगा देखा जाएगा। मैं आज कल में ही कमिश्नर से बात करता हूं। उसे ऐसे कानूनी चक्कर में फंसाऊंगा कि फिरकनी बनकर घूम जाएगा।' 'तुम उस तरकीबई के चक्कर मे हो जगन सेठ कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।' 'यही तो दुनिया की सबसे बढिया तरकीब मानी गई है।' 

'तब तक ही जब तक मुंह पर झापड़ नहीं पड़ता। मेरे मुंह पर झापड़ पड़ा है जगन सेठ। इस सांप को तो मैं मालूगा ही और यह बताकर मारूंगा कि यह लाठी मेरी है।' 'बेवकूफी की बातें मत करो।' 

'यह वेवकूफी की बात नहीं है जगन सेठ। झापड़ मेरे मुंह पर पड़ा है अरि इसका जवाब भी मुझे ही देना होगा। अगर जवाब नहीं दिया तो शहर की सारी जनता थूकेगी मुझ पर। कहेगी कालिया साला नपुंसक हो गया है।' 

'कालिया।' 'नहीं जगन सेठ तुम खतरे को नहीं पहचान रहे हो। आज तो एक ही झापड़ पड़ा है ना, अगर वक्त रहते इसका जोरदार जवाब नही दिया तो इस शहर में झापड़ मारने वाले न जाने कितने हाथ उठ खड़े होंगे। 

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