भैरों ने उसे फोन उठाकर दे दिया। गोद में रखकर कालिया ने रिसिवर सठाया और नम्बर डायल किया।
'जगन सेठ कालिया बोल रहा हूं. भैरों आ गया है। उसने मिठाई भी वापिस कर दी और रुपए भी खत भी लिख कर भेजा है कि मेरे सिर पर बंसरी बजाएगा."अरे नहीं सेठ नया-नया आया है तो कर्त्तव्य के सरकारी खूटों पर उछल रहा है तुम देखना कि हफ्ते भर में ही वह कुत्ते की तरह पूंछ न हिलाने लगे तो मेरा नाम भी कालिया नहीं, अरे नहो सेठ, कालिया का असूल तो तुम्हें मालूम है कि बैल को चलाना हो तो उसके सींग पकड़ कर खींचने की जरूरत नहीं है, बस सालों की पूंछ उमेठ कर कसियाते रहो, अपने आप आगे-आगे चलता रहेगा, नहीं ना सेठ पिछले वाले की और बात थी, वह तो साला छुट्टा सांड था, उसे रास्ते से हटाया तभी तो यह नए वाला आया है, अब देखना अपना धन्धा फिर पहले को तरह जोर-शोर से चलने लगेगा, फिकर मत करो कालिया है ना आपका गुलाम सब ठीक कर लेगा, और सुनाओ चुनाव की क्या गरमा-गरमी है, किसे खड़ा कर रहे हो इस बार, तय नहीं किया, लेकिन सेठ इस बार मेयर का पत्ता तो साफ करना ही पड़ेगा, साली हमारी बिल्ली और हमें ही म्याऊं करने लगी, मालूम है सेठ मालूम है, तुम्हीं उसे गुमनामी के अन्धेरों से निकाल कर रोशनी में लाए थे, उसे चुनाव जिताने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया था तुमने, हमने भी सेठ उसे बिताने के लिए रात-दिन एक कर दिए थे, लेकिन अहसान फरामोश निकला वह, कुर्सी पर बैठते ही आंखें बदल गया, सब कोटे परमिट खुद हजम कर गया, अपने भाई भतीजों को आगे ले आया और हमें दूध की मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका, चार दिन की चांदनी तो लूट ली उसने अब तो अधेरों रात ही आने वाली है, देखें चुनाव कैसे जीतता है, साले की जमानत जब्त करवा देनी इस बार, हां-हां मैं देख रहा हूं तुम बेफिकर रहो, यह तो तुम्हें पूरी खबर देना अपना फर्ज समझा मैंने वरना इस नये अफसर को तो अपनी जेव में समझो, नहीं-नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा, ज्यादा से ज्यादा हफ्ते दस दिन का टाइम और समझो, उसके बाद तो धन्धा इस जोर से चलेगा कि अगली पिछली सारी कसर पूरी हो जाएगी, समझो कि फिर से चांदी सोने की वारिश होने ही वाली है, अच्छा मैं फोन रख रहा हूं, कोई खास बात हो तो बताना, अच्छा सेठ जय हिन्द।'
रिसीवर रखकर उसने फोन भैरों के हाथों में थमा दिया और हुक्का गुड़गुड़ाने लगा।
'अच्छा तो मैं चलूं उस्ताद।' भैरों ने फोन यथास्थान रखने के बाद कहा।
'हां।' हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कालिया बोला-'अच्छी तरह समझ गया ना कि उसके छोटे भाई को किस लाइन पर लगाना है?'
'समझ गया उस्ताद।'
'अपने आदमियों में एक फोटोग्राफर भी शामिल कर लेना।'
'ठीक है उस्ताद।'
भैरों के जाने के बाद हुक्का गुड़गुड़ाते हुए वह पास पड़ा खत उठा कर फिर से देखले लगा। घनी मूंछों से ढके होंठों पर एक विद्रूप भरी मुस्कराहट फैल गई।
उपेक्षा पूर्ण स्वर के साथ अस्पष्ट से स्वर में बुदबुदाया-'पूरा नाम है कृष्णचन्द्र केसरी, बंसरी बजाएगा, ऊंह।'
उसने कागज चिलम में रख कर हुक्के के कश लेने शुरू किए। चिलम में रखे कागज ने आग पकड़ ली और कुछ ही क्षण में जलकर राख हो गया।
स्थिर दष्टि से खामोश बैठा कालिया उस सारी प्रक्रिया को किसी शिकारी बाज की तरह देखता रहा।
'शिव्वू कहां है?'
रात के खाने पर उसे गैरहाजिर देखकर पूछा केसरी ने। जंगल का दिन भर का काम निपटा कर वह रिपोर्ट लिखने में व्यस्त हो गया था कि दिन भर में कितने पेड़ कटे और उनके स्थान पर कितने नये पेड रोपे गए।
अनुपालनुसार नये पेड़ रोपना एक बहुत ही आवश्यक कार्य था। किसी भी कामिक अनुष्ठान की तरह। बढ़ती हुई आबादी के साथ ही जंगल कम होते जा रहे थे। आम आदमी को इसकी कोई बिन्ता नहीं है। लेकिन जंगल और जंगली प्राणियों की रक्षा करना उनके विभाग का पुनीत कर्त्तव्य है। ताकि कालांतर में प्राकृतिक वैलेंस न बिगड़ने पाए। ताधारण व्यक्ति नहीं जानता कि प्राकृतिक असुंतुलन होने की हालत में खुद उसके अपने अस्तित्व के लिए जितने बड़े खतरे पैदा हो जाएंगे। लेकिन उसे और उस जैसे अन्य फारेस्ट आफिसरों को इन खतरों के प्रति सजग होकर काम करना है।
यही उनका कर्तव्य है। लिखना खत्म किया ही था कि साधना ने खाने के लिए पुकारा। रसोईघर में पटटे पर वैठते हुए उसने शिव्वू को अनुपस्थित देखकर उपरोक्त प्रश्न किया।
'तीन दिन से तो जंगल का भूत सिर पर चढ़ा हुत्रा है।' साधना थालो में खाना डालती हुई बोली-'गया होगा कहीं महाराज के साथ।'
'लेकिन दीदी, अब तो रात होने आई। इतनी देर तक जंगल में बाहर रहना ठीक नहीं उसके लिए। वैसे भी महाराज तो यहां है ही नहीं।'
'क्यों कहां गया है?'
'दस दिन की छुट्टी लेकर कलकत्ते गया है।'
'तो हमें यहां आए देर नहीं हुई और वह छुट्टी लेकर भी चला गया।'
'हां बता रहा था कि कलकत्ते में उसकी बहन ब्याही है।
उसकी ननद की शादी, न जाने क्या-क्या, जाना जरूरी है, लेकिन मैं शिब्बू के बारे में कह रहा था। इतनी देर तक बाहर रहने के लिए तुम उसे मना क्यों नहीं करतीं।'
साधना कुछ कहती उससे पहले ही बाहर मे कुछ खट-पट की आवाजें सुनाई दी। साथ ही शिब्बू की लहराती हई सी । आवाज। जैसे कुछ गाने की कोशिश कर रहा हो। लेकिन जबान की लड़खड़ाहट के कारण सही ढंग से गा न पा रहा हो।
बाहर निकलकर देखा तो शिव्वू बरामदे में उठने का प्रयास कर रहा था। लेकिन हाथ-पैर काबू से बाहर थे। इसलिए फिर लड़खड़ा कर गिरा।
उसने सहारा देकर उठाया तो ताड़ी की गन्ध का तेज भभकारा उसके नथुनों में घुसा।
दिमाग को जबर्दस्त झटका सा लगा। शिव्वू को बुरी तरह झिंझोड़ता हुआ बोला वह-'तू ताड़ी पी के आया है रे।'
'क्या इसने ताड़ी पी है?'
साधना को लगा कि अगर उसने दरवाजे का सहारा न ले लिया होता तो गिर ही पड़ती। अनहोनी थी उसके लिए। शहर में जिस शिब्बू ने पान तक नहीं खाया वह यहां आते ही ताड़ी पीने लगा।
'कहां पी ताड़ी तूने, कौन था तेरे साथ?" एक साथ कई चांटे शिब्बू के चेहरे पर बरसाते हुए उसने पूछा।
'मेरी बात तो सुनो भईया।' उसके थप्पडों से बचने की कोशिश करता हुआ शिब्बू लड़खड़ाती आवाज से चिल्लाया
'उन लोगों ने जबर्दस्ती पिलाई, मेरे ऊपर उड़ेल दी...।'
शिव्व ने धीरे-धीरे उसे सब कुछ बताया।
'तीन-चार आदमी थे। पता नहीं कौन। तीसरे पहर जंगल में ही मिल गए थे। जंगल दिखाने लगे थे। उसे कहीं झाड़ियों में ले गए। वही बोतलें छपा रखी थी। निकालकर पीने लगे। न जाने कहां से कोई औरत भी आ गई थी। आदिवासी औरत लगती थी। उससे भी पीने के लिए कहा। उसने मना किया तो उन लोगों ने जबर्दस्ती पिलाई। एक ने उसके मुंह में बोतल ठूस दी और वाकियों ने उसके हाथ-पैर कसकर पकड़ लिए फिर मुझे होश नहीं क्या हुआ।
जब होश आया तो अपने को बंगले से कुछ टूर झाड़ियों में पड़ा पाया और उठकर यहां तक चला आया।'
उसने शिब्बू को उठाकर अन्दर पलंग पर डाल दिया और उसके निकट खड़ा सोचता रहा कि किन लोगों ने शिव्यू के साथ जबर्दस्ती की? क्यों की? कहीं कालिया का कोई हाथ?
'केशो।' साधना के स्वर ने उसकी विचार शृंखला को झटका दिया। उसके निकट ही मुन्नी खड़ी थी सहमी सिकुड़ी सी। 'मैंने फैसला कर लिया है दीदी कि इन लोगों का यहां रहना ठीक नहीं।' उसने निर्णायक से स्वर में कहा-'मैं मामाजी को खबर भेजता हूं कि वे आकर इन दोनों को यहां से ले जाएंगे। चलो तुम खाना दो अब।'
तीसरे दिन मामाजी आये और उसी दिन शिब्बू तथा मुन्नी को अपने साथ लेकर चले गए। वह दोपहर बाद जोप में उन्है छोड़ने के लिए शहर गया था। शाम की गाड़ी पर उन्हें चढ़ाकर अच्छी तरह बैठाया। गाड़ी चल दी तो हाथ हिलाकर विदा किया।
जीप द्वारा सीधा बंगले पर पहुंचा। लेकिन यह देखकर चकित रह गया कि साधना बंगले में नहीं थी।
'दीदी दीयी...।'
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उसने इधर-उधर घूमकर आवाजें लगाई। कोई जवाब नहीं। बंगले के बाहर इधर-उधर घूमकर देखा। साधना का कही कोई पता नहीं था।
अनजानी आशंका से दिल धड़कने लगा था उसका।
'दीदी, दीदी।' कहकर और जोर से पुकारा।
उसकी पुकार सुन कर जंगल में काम करते कुछ मजदूर तो था गए लेकिन साधना का कहीं पता न चला। न ही प्रत्युत्तर में कोई जवाब मिला।
उसने उन मजदूरों से पूछा साधना के बारे में। किसी को उसके बारे में कुछ पता न था। वह बदहवाम सा इधर-उधर ढूंढने लगा। लेकिन यह समझ में नहीं आ रहा था कि जाए तो जाए किधर।
दिग्भ्रमित-सा कभी इस ओर की झाड़ियों में घुसता तो कभी उस ओर की झाड़ियों में।
उसकी सहायता के लिए मजदूर भी घनी झाड़ियों के पीछे घुस गए।
'अफसर बाबू, अफसर बाबू ।'
अचानक एक मजदूर की जोरदार आवाज सुनाई दी और वह उसी ओर दौड़ता चला गया।
'वो उस तरफ।'
एक पेड़ के नीचे खड़ा मजदूर अपने पीछे की घनी झाड़ियों की ओर संकेत कर रहा था।
दीवानों की तरह झपट कर वह घनी झाड़ियों में घुसता चला गया। उनके पार पहुंचते ही जो दृश्य उसने देखा वह उसे कंपा देने के लिए पर्याप्त था।
उसकी रीढ़ की हड्डी में झुरझुरी सी दौड़ गई। झाड़ियों के बीच साधना अचेतावस्था में बिलकुल नग्न पड़ी हुई थी। आसपास की कुचली हुई झाड़ियां एक घिनौनी कहानी को उजागर कर रही थी। गोरे शरीर पर खरौंचों के निशान इस अश्लील कहानी की पुष्टि सी करते लग रहे थे।
होंठों पर लिपस्टिक फूहड़ ढंग से लिथड़ी हुई थी। लिपस्टिक से ही नंगे पेट पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था-मजा नहीं आया।
बड़ा ही कुत्सित एवं वीभत्स दृश्य था वह उसके लिए। एक विवशतापूर्ण क्रोध के कारण मुट्ठियां मिच गई और आंखें डब डरा आई।
रंगीन किनारे की सफेद धोती पास की ही झाड़ियों पर बड़ी लापरवाही से फेंकी पड़ी थी। उसे उतार कर साधना का नग्न शरीर ढंक दिया उसने।
मजदूरों की सहायता से उसने साधना को उठाया और बंगले में ले आया। उसे पलंग पर लिटाने के बाद उसने मबदूरों से पूछा 'क्या तुम्हें इस मामले के बारे कोई जानकारी है?'
क्या तुमने किसी अनजान आदमी को वहां देखा था?'
लेकिन मजदूरों से कोई भी खास जानकारी हासिल न कर सका वह।
मजदूरों को बाहर निकाल कर वह साधना को होश में लाया। मुंह पर पानी के छीटे मार कर।
होश आने पर साधना ने अपनी अस्त व्यस्त सी हालत देखी तो झपटकर उठ बैठी। यह समझने में उसे ज्यादा देर नहीं लगी कि धोती उसने पहन नहीं रखी बल्कि यूं ही ओढ़ी हुई सी है।
अपनी उधडती लाज को फिर से छुपाने की कोशिश करते हुए उसने पथराई हुई आंखों से उसकी ओर देखा। कुछ कहना चाहा। लेकिन गले स आवाज न निकली। होंठ बस कंपकंपा कर रह गए।
'केशो।'
किसी तरह प्रयास करके वह बस इतना भर कह पाई और फिर उसकी छाती में मुंह छिपाकर फफक पड़ी।
वह उसके सिर पर हाथ फिराता हुआ बोला-'धीरज रखो दीदी, सब ठीक हो जाएगा।'
लेकिन खुद उसकी ममझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या ठीक हो जाएगा। कैसे ठीक हो जाएगा।
साधना की रुलाई का आवेश कुछ कम हुआ तो वह उसका मिर सहलाता हुआ बोत्रा-'पहले तुम मुंह हाथ धोकर कपड़े बदल लो। फर बताना कि क्या हुआ था। तब तक मैं पुलिस स्टेशन फोन कर देता हूं।'
दूसरे कमरे में आकर उसने फोन उठाया और शहर के पुलिस स्टेशन का नम्बर डायल करने ही जा रहा था कि रुक गया। पुलिस अधिकारी ने अगर उससे पूछा कि क्या हुआ है तो क्या बताएगा वह?' अभी पूरा किस्सा तो खुद उसे भी नही मालूम। साधना से उसे जो कुछ मालूम हुआ वह भी कोई खास न था।
उसने बताया कि वह रोज की भांति शाम की पूजा के फूल चुनने के लिए झाड़ियों की ओर गई थी कि किसी ने एकदम पीछे से उसकी गरदन पकड़ ली। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती कि एक तीव्र गन्ध युक्त कपड़ा उसकी नाक पर मजबूती से आ टिका।
उसके बाद उसे कुछ होश नहीं कि क्या हुआ?'
आंख खुली तो अपने को बंगले में पाया।
'बस इसके अलावा तुम कुछ नहीं जानती?' वह असहाय क्रोध के साथ अपने दाएं हाथ का वसा बाएं हाथ पर मारता हआ बोला-'वह अकेला आदमी था या उसके साथ कुछ और लोग भी थे। वह आदमी अगर दोबारा तुम्हारे सामने लाया जाए तो तुम उसे पहचान लोगी या नहीं?'
लेकिन साधना कोई भी जवाब देने में असमर्थ थी?' उसे नहीं मालूम कि बलात्कारी अकेला था या उसके साथ कुछ और लोग भी थे। उसे उसकी शक्ल तक देखने का मौका नही मिला।
असमंजस की सी स्थिति में वह कमर पर हाथ बांधे इधर से उधर टहल रहा।
कोई शक नहीं था उसे कि यह कालिया की ही शरारत है। लेकिन साबित कैसे करे वह?'
लेकिन इस घटना की रिपोर्ट तो पुलिस में करनी होगी।
फोन की ओर बढ़ता लेकिन निकट पहुंचकर रुक जाता।
वह निश्चित नही कर पा रहा था कि पुलिस को फोन द्वारा इस घटना की सूचना दुए या वहीं जाकर रिपोर्ट लिखाए।
कुछ देर के दुविधापूर्ण सोच-विचार के बाद आखिर उसने निर्णय ले ही लिया।
बोला-'दीदी तुम फौरन तैयार हो जाओ। हमें अभी शहर जाना है।'
'मैंने अच्छी तरह जांच-पड़ताल कर ली है।' लेडी डाक्टर ने जांच कक्ष से बाहर आकर उसे बताया-'शरीर पर बलात्कार के निशान तो हैं लेकिन शीन भंग नहीं हुआ है। लगता है अपने उद्देश्य में कामयाब होने से पहले ही बलात्कारी किसी डर की वजह से भाग खड़े हुए।' शील भंग नहीं हुआ है-इन शब्दों ने जैसे उसकी छाती पर से कोई बहुत भारी बोझ हटा दिया था।
शहर में पुलिस स्टेशन की ओर जाते समय उसकी नजर अचानक ही एक नर्सिंग होम के बड़े से बोर्ड पर पड़ी और उसने साधना की डाक्टरी जांच करवाने के लिए गाड़ी वहीं रोक दी।
परिणाम सुनकर उसे लगा कि उसने ठीक ही किया, शंका की नागफनी तो दिल से निकल गई।
लेकिन बलात्कारी किसी डर की वजह से भाग गए? लेकिन कैसा डर? किसी के आ बाने का? किसके आ जाने का? कहीं बह स्वयं ही तो वक्त पर नहीं पहुंच गया था वहां?
शायद।
लेकिन बलात्कारी अगर डरकर भाग गए थे तो फिर के कुत्सित और अश्लील शब्द कैसे लिख गए-मजा नहीं आया।
सिर की सारी शिराएं झनझनाने लगी थीं। कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
उस पुलिस स्टेशन इंचार्ज की समझ में भी कुछ नहीं आया जिसे उसने सारा किस्सा बताया था। जो कुछ भी उसने बताया स्टेशन इंचार्ज ध्यानपूर्वक उसे सुन रहा था।
'बड़ी अजीब सी बात लगती है मिस्टर केसरी।' स्टेशन इंचार्ज बोला-'एक ओर तो बलात्कारी वे गन्दे से शब्द लिख कर जाते हैं-मजा नहीं आया। अगर देखा जाए तो तृप्ति सूचक हैं यह शब्द। दूसरी ओर जो आप डाक्टरी जांच की रिपोर्ट दे रहे हैं वह इससे मेल नहीं खाते। उसमें साफ लिखा है कि शील भंग नहीं हुआ है।'
'लेकिन घटना तो घटी है सर।' उत्तेजित केसरी ने स्टेशन इंचार्ज की बुजुर्गी का ख्याल करते हुए सम्मानसूचक शब्द का प्रयोग किया।
'घटना क्यों दुर्घटना कहो इसे।' स्टेशन इंचार्ज मेज पर रखे पैन से खेलता हुआ बोला-'यह सौभाग्य ही है कि वह भयानक घटना नहीं घट पाई जो किसी भी भारतीय नारी का जीवन लांछित कर देती। साफ जाहिर है कि तुम पर किसी किस्म का दबाव डालने की कोशिश की जा रही है।
'आपने मामले की असलियत को बड़ी खूबसूरती के साथ पकड़ लिया है सर।' केसरी मेज पर आगे की ओर झुकता हुआ उत्साहित से स्वर में बोला-'वाकई मुझ पर दबाव डालने की कोशिश की जा रही है।'
'और यह भी तुम जानते हो कि कौन दबाव डाल रहा है?'
'जी हां।'
'कौन है?"
'कोई कालिया नाम का आदमी है सर।'
नाम सुनकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ स्टेशन इंचार्ज को। उसने इस ढंग से सिर हिलाया जैसे यही नाम सुनने की आशा थी उसे।
केसरी को उसका इस तरह सिर हिलाना पसन्द नहीं आया और उस समय तो वह बुरी तरह उबल पड़ा जव उसने स्टेशन-इंचार्ज को कहते सुना-'कहो तो रिपोर्ट लिखू।'
'कहूं तो रिपोर्ट लिखू का क्या मतलब होता है?' वह एकदम बिफर कर बोला-'रिपोर्ट तो आपको लिखनी ही पड़ेगी।'
स्टेशन इंचार्ज ने सतर्क निगाहों से इधर-उधर देखा।
आस-पास कोई नहीं था। साधना भी बाहर वैठी थी।
धीमे स्वर में समझाते हुए बोला स्टेशन इंचार्ज-'देखो बेटे मुझे रिपोर्ट लिखने मे कोई एतराज नहीं है। लेकिन तुम्हारे भले के लिए ही कह रहा हूं रिपोर्ट न लिखवाओ तो अच्छा है।'
स्टेशन इंचार्ज के स्वर में सहानुमूति का पुट महसूस किया था केसरी ने अपने लिए।
भ्रमित से स्वर में बोला-'मैं कुछ समझा नहीं सर।'
'तुम नये-नये आए हो यहां इसलिए कालिया को नहीं जानते। उन लोगों को भला क्या जानोगे तुम वो कालिया जैसे लोगों को पीछे से ताकत देते रहते हैं। बड़ा गहरा गोरखधन्धा है यह। वह तुम इतना समझ लो कि जो रिपोर्ट तुम लिखाओगे उसे कालिया तुम्हारे ही खिलाफ एक जोरदार हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगा। तुम्हारी बहन की आबरू को चौराहे पर उछलवा देगा। यह जो सीधी सच्ची डाक्टरी रिपोर्ट तुमने हासिल की है ना। यह भी कालिया की मदद करे। इसी की मदद से तुम्हारी सच्ची कहानी को झूठी बना देगा वो। बलात्कार किया शील भंग नहीं हुआ मजा आ गया लिखवा दिया वह लिखने का वक्त था असली काम का नहीं जरा मेरी बातों पर खुद ही ठंडे दिल से विचार करके देखो कि जो कुछ भी मैं तुमसे कह रहा हूं वह मलत कह रहा हूं क्या?'
जब वह स्टेशन इंचार्ज के कमरे से बाहर निकला तो उसकी हालत उस पिचके हुए टायर जैसी थी जिसकी सारी हवा निकाल दी गई हो। स्टेशन इंचार्ज से उसे कोई शिकायत नहीं थी। उसे वह अपना हितैपों ही लगा था।
उसके जाने के बाद स्टेशन इंचार्ज भी खाली दरवाजे को काफी देर तक अपलक देखता रहा था।
फिर एक दीर्घ निःश्वास के साथ उसने फोन का रिसीवर उठाकर एक नम्बर डायल किया।
'कालिया साहब मैं स्टेशन इंचार्न गजराज वोल रहा हूं।
अभी-अभी केसरी गया हुँ मेरे पास से?'
'वह फारेस्ट आफिसर?' तुम्हारे पास आया था। क्या करने?'
'आपके खिलाफ रिपोर्ट लिखाने आया था।'
'मेरे खिलाफ?' मैंने क्या किया है भाई?"
गजराजसिंह ने उसे बताया और फिर बोला-'लेकिन मैंने उसे अच्छी तरह समझाकर भेज दिया है।'
'रिपोर्ट नहीं लिखी उसकी?'
'आपके हुक्म के बिना लिखी जा सकती थी क्या?'
'अच्छा-अच्छा। भई आप जैसे दोस्तों से हमें यही उम्मीद है। वैसे है कुछ नही यह नया फारेस्ट आफिसर बिचारा मेरे बारे में कुछ गलतफहमी का शिकार हो गया है। जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा।'
'वो कालिया साहव एक काम बताया था मैंने आपको।'
'कौन सा?'
'मैंने अपने लड़के की नौकरी के बारे में बात की थी ना आप से?' परसों बैंक में इन्टरव्यू है।'
'अच्छा वो समझो हो ही गया। मैं अभी जगन सेठ को फोन करता हूं।'
'जी बड़ी मेहरबानी।'
रिसीवर रख दिया उसने। फिर अपना मुंह दोनों हाथों में छुपाकर अपने को ही गाली देता हुआ बड़बड़ाया-'सैला, सुबिधा भावी, बूढ़ा, खूसट...।'
टेबिल लैम्प की रोशनी सीधी दीवार पर पड़ रही थी और वह कुर्सी पर खामोश बैठा हुआ निर्मिमेष दृष्टि से खाली दीवार को घूरे जा रहा था।
खाना दोनों में से किसी ने भी नहीं खाया था। साधना ने बनाने के लिए कहा था लेकिन उसने मना कर दिया था। बंगले पर लौटने के बाद उसने निर्णायक से स्वर में कहा-'अब हम यहां नहीं रहेगे दीदी। कल ही यहां से चले जाएंगे।'
'क्यों?'
'इतना सबकुछ होने के बावजूद भी तुम पूछ रही हो क्यों? बर्दाश्त से बाहर है यह सबकुछ। बह बदमाश इतनी नीच हरकतो पर उतर आया और मैं कुछ नहीं कर सकता। पुलिस में भी रिपोर्ट नहीं लिखा सकता क्योंकि उसका प्रयोग भी वह हमारे विरुद्ध कर सकता है।'
नपुसक क्रोध मे उफनता हुआ बोला था वह।
'तो क्या कायरों की तरह पीठ दिखाकर भाग जाओगे?' साधना ने उसे स्थिर दृष्टि से देखते हुए कहा था।
'कायर नहीं हूं मैं। अगर वह मरदों की तरह आमने-सामने आकर बात करे तो मैं देखू कि वह क्या चीज है। लेकिन इस नौकरी के लिए तुम्हारी इज्जत दांव पर नहीं लगा सकता मैं। सिर्फ दो ही रास्ते हैं मेरे सामने या तो उस कमीने के सामने सिर झुकाकर में उसकी बात मान लूं। जो कि मेरे लिए मुश्किल है। अपनी आत्मा को कुचलकर जिन्दा रहा असम्भव है मेरे लिए। रह जाता है दूसरा रास्ता कि यहां से चले जाएं हम लोग। यही मुझे ठीक भी लगता है।'
'तीसरा रास्ता नहीं है?'
'नहीं तीसरा कोई रास्ता नहीं है।'
'तीसरा रास्ता है केशो और वह तीसरा रास्ता ही हमें चुनना होगा।' साधना दृढ़ स्वर में बोली।
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