फोरेस्ट आफिसर 1



फोरेस्ट आफिसर 


जंगल के कच्चे किन्तु समतल रास्ते पर दौड़ती हुई जीप 
आखिर उस इमारत के आगे रुकी जिसे फारेस्ट अधिकारी का बगला कहा जाता था। 
सबसे पहले नये फारेस्ट आफिसर ही नीचे उतरा और चारों ओर छाई प्राकृतिक सुन्दरता को मुग्ध भाव से देखने लगा। 

'भैया तितली तितली।' 

जीप से कूद कर उतरी एक बारह-चौदह साल की लड़की एक ओर की सफेद फलों वाली झाड़ी के ऊपर पर फड़फड़ाती हुई चमकदार रंगों वाली तितलियों को देखती हुई बोली। तितलियां उसे अपनी ओर आते देखकर दूसरी झाड़ी पर जा मंडराने लगी। लड़की को अच्छा खेल मिल गया और वह ताली बजाती हुई तितलियों के पीछे दौड़ने लगी। 

'मुन्नी ज्यादा दूर मत जाना।' 

जीप से तीसेक रााल की भरे पूरे और आकर्षक शरीर को एक महिला नीचे उतरती हुई बोली। उसके साथ ही एक सोलह सत्रह वर्ष का किशोर भी नीचे उतरता हुआ वाला-'दीदी सामान उतार लूं में।' 

'हां किब्बू सामान उतार लो।' 

महिला ने कहा और फिर अपनी बड़ी-बड़ी हिरनी सरीखी बांखों से चारों ओर देखती हुई सुख सन्तोष की एक दीर्घ निःश्वास के साथ बोली-'कितनो शान्ति है यहां।' 

'हां दीदी।' फारेस्ट आफिसर ने तृप्त से स्वर में कहा, 'देखो ना प्रकृति कितनी सभ्यता से मुस्कराती हुई हम लोगों का स्वागत कह रही है।' 

किव्वू ड्राइवर के साथ मिलकर जीप के पीछे लगे ट्रेलर से सामान उतरवाने लगा। गृहस्थी का सभी आवश्यक सामान ले आए थे वे लोग अपने साथ। लोहे के फोल्डिंग पलंग इत्यादि भी। 

साधना-यही था उस महिला का नाम-नीचे उतरा सामान उठाने लगी तो युवक एकदम उसकी ओर बढ़ता हुआ बोला-'तुम रहने दो दीदी। मैं उठाता हूं।' 

'अरे हां मैं यह देखना तो भूल ही गई कि कमरे साफ भी हैं या नहीं।' साधना बगले के भीतर घुसती हुई बोली। 

'सब चकाचक साफ है बीबी जी।' ड्राइवर ट्रंक नीचे उतारता हुआ बोला-'आपको लेने जाने से पहले हमने हर कमरे की 
अच्छी तरह झाड़-पोंछ कर सफाई कर दी थी।' 

'अच्छी सफाई की है। मुझे तो बरामदे में ही कूड़ा नजर आ रहा है। ला बता झाडू कहां है?" 

महिला ने अपने आंचल का पल्लू कमर में खोंसा और झाडू उठा कर कूड़ा हटाने लगी। वैसे कमरे साफ थे इसलिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। उन लोगों द्वारा लाए गए सामान की वह कमरे में व्यवस्थित ढंग से लगाने लगी थी। 

इस बीच स्टोव जला कर चाय का पानी भी चढ़ा दिया था उसने। 

'ड्राइवर से लेकर चराती तक सब कुछ हम ही हैं। यहां पर पिछले अफसर साहब तो हम से बड़ा ही प्रम करते थे। 

महाराज-महाराज कहते मुंह नहीं थकता था उनका। अकेले ही रहते थे यहां इसलिए उनको रसोई भी हमी बनाते थे। बड़े सख्त अफसर थे पर हमारे से इतना प्रेम करते थे कि घर भी नहीं जाने देते थे। हम कहते थे कि हुजूर हुमारे बीवी बच्चे हैं। उनकी भी देख भाल करनी है तो बड़ा मन मार कर छुट्टी देते थे। सख्त तो थे पर बड़े दयालु आदमी थे वेचारे।' 

महाराज सिंह नामक वह व्यक्ति अपनी वाचाल प्रकति का प्रदर्शन करता हुआ कहे जा रहा था। 

'उन्हें तो किसी ने मार दिया था न?" केसरी ने पूछा। 

'हां हुजूर, एक दिन उनकी लाश जंगल में पड़ी पई गई।' 

'कुछ पता चला कि किसने मारा था।' 

'अब हुजूर कोई आदमी होता तो पता चलता कि किसने मारा है। पर वो तो लगता है कि किसी जानवर के इत्ये चढ़ गए थे। बाघ था शायद कोई। सारा शरीर खूनम खून था।


पंजों के निशान मैंने खुद अपनी आंखों से देखे थे। पेट फटा पड़ा था।' 

'आते ही कैमी बातें ले बैठे महाराज।' साधना ने अप्रसन्नता सी व्यक्त करते हुए कहा-'जरा ये गिलास धो लाओ।' महाराज गिलास धोकर आया तो सिव्वू ने उत्सुक से स्वर में पूछा-'इस जंगल में बाद चीते हैं महाराज?" 

'अरे खूब हैं भईया। बाघ, चीते क्या बब्बर शेर तक हैं।' 

'तुमने देखे हैं?" 

'अरे भईया हम तो रोज ही देखते हैं। अभी परसों ही बब्बर शेर मिल गया था। देखकर गुर्राने लगा था। हमने कहा जाओ महाराज को बेकार गुस्सा न दिलाओ, नहीं तो तुम्हारी दाढ़ी उखाड़कर तुम्हारे मुंह में दे देंगे।' 

'और वो चला गया?" 

'जानवर था ना। भला आदमियों की भाषा क्या समझे?' वो और दांत फाड़कर गुर्राया। हमने भी सोचा कि आदमी होकर जानवर के मुंह क्या लगें। मैं पास के पेड़ पर चढ़ गया। जब वह चला गया तो हम भी उतर कर अपने धर को लपक लिए।' 

साधना थोड़ा हंस कर बोली-'सद सुना रहे हो महाराज या गप्प?" 

'यह तो सच ही है बीबीजी। गप्प तो तब होती जब हम कहते कि हमने वाकई उसकी दाढ़ी उखाड़कर उसके मुंह में दे दी। वाह क्या चाय बनाई है बीबीजी। लुत्फ आ गया। आंते में आपने शहर तो देख ही लिया है। ज्यादा नहीं पांच-छ: कोस की दूरी पर होगा। कोई भी सौदा सुलफ शहर से मंगाना हो तो हम से कह देना हम ला देंगे।' 

'मुझे शेर दिखाओगे ना महाराज भईया।' सिव्वू चाय का गिलास हाथ में घुमाता हुआ वाला। 'अरे मईया जिसे कहो उसे शेर दिखा देंगे और फिर शेर ही क्यों जंगल के सारे जानवर देखना। शेर, चोते, लोमड़ी, भेड़िए, लकड़वग्घे सबके सब देखना आराम से।' 

'आराम से नहीं महाराज भईया जल्दी से जल्दी दिखाना। 

आराम से तो दीदी भईया देखते रहेंगे।' 

'तुम्हें किस बात की जल्दी है छोटे बाबू?" 'हम और मुन्नी तो यहां कुछ दिन के लिए ही हैं। बाद में तो शहर चले जाएंगे। कालिज और स्कूल खुल जाएगे ना।' 

सिव्वू की बात पूरी होते न होने बाहर से आती एक तेज पीख ने उन सब को बुरी तरह चौंका दिया। 

साधना के हाथ से चाय का गिलास निकाल गया। वह एक-दम उछलकर उठती हुई बोली-'मुन्नी "यह तो मुन्नी की चीख है।' 

तब तक केसरी तीर की तेजी के साथ बंगले से बाहर निकल चुका था। बाहर निकल कर तेजी से इधर-उधर नजरें दौड़ाई बैसे दिशा निर्धारित कर रहा हो कि दौड़कर किस तरफ जाए।' 

तभी सतर्क कानों तक फिर एक चीख आई। कोई सन्देह नहीं था कि वह मुन्नी की ही चीख है। बदहवास में वह चीख को दिशा में दौड़ लिया। 

कुछ दूरी पर ही भय से पीली पड़ी, थरथर कांपती मुन्नी दिखाई दे गई। उसे देखते ही दौड़ कर उससे आ लिपटी और 
कांपती हुई सी आवाज में बोली-'रीछ"भईया रीछ।' 

'रीछ किधर?" 

उत्तर में कंपित उंगली से एक ओर इशारा किया मुन्नी ने। केसरी को वहां बनी झाड़ियों के अलावा और कुछ नजर न 
आया। 

तव तक बदहवास सी साधना भी सिव्वू और महाराज के साथ वहां पहुंच गई। मुन्नी को उठाकर छाती से चिपकाते हुए बोली-'मुन्नी, क्या हुआ था मेरी बच्ची?" 

त्रस्त सी मन्नी ने अटकते-अटकते बताया कि बह तितलियों को पकड़ने के लिए उनके पीछे इधर-उधर दौड़ रही थी कि अचानक न जाने कहां से एक रीछ ने आकर उसे दबोच लिया और उठाकर एक और ले जाने लगा। वह भय से चिल्लाई और छटपटाई तो रीछ उसे छोड़ कर झाड़ियों में घुस गया। 'तुम्हें अकेले इतनी देर बाहर रहने की क्या जरूरत थी?" सिव्वू ने डांटा मुन्नी को। 

'तुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है।' साधना ने प्यार तै मुन्नी को सहलाते हुए डांटा सिव्वू को-'हम लोगों ने भी तो ध्यान नहीं दिया कि मुन्नी कहां है। अब तुम याद रखो कि अकेले को। बाहर नहीं निकलेगा।' 

केसरी विचारपूर्ण मुद्रा में उस झाड़ी को घूरे जा रहा था जिसकी ओर मुन्नी ने रीछ के भाग कर जाने का संकेत किया था। 

'केशोरी, ले दूध पी ले।' 

कमरे में प्रविष्ट होते हुए साधना ने कहा। उसे देखते ही केसरी उठकर बैठ गया और दूध का गिलास लेकर पीने लगा।' 

'क्या सोच रहा है रे?' स्नेह से साधना उसके बालों में उंगलियां फिराते हुए बोली। 

'आज की घटना ही मन में खलबली सी मचाए हुए हैं दीदी।' 

'कौन सी? रीछ वाली?' 

'हां।' 

'उसमें इतना सोचने की क्या जरूरत है पगले। मुन्नी बच्ची है। सिव्वू भी। दोनों को समझा देंगे कि यह जंगल है थोड़ा सावधान होकर रहना होगा। बस, घटना घटी थी और विना कोई नुकसान हुए टल भी गई। मुन्नी सुरक्षित है और आराम से सो भी रही है। फिर तू क्यों उस शत को लेकर परेशान हो रहा है।' 

'वह बात ही मेरी समझ में नहीं आ रही दीदी कि रीछ ने मुन्नी को पकड़ा और उसके चीखने पर उसे छोड़ कर भाग गया।' 

'तू क्या कहना चाहता है, मुन्नी झठ बोल रही थी।' 'नहीं दीदी, मुन्नी भला झूठ क्यों बोलेगी।' 

'तो फिर?' 

'सोच रहा हूं कौन रीछ था वह जो चीख से डरकर भाग गया?' 

'रीछ भाग गया, मुन्नी सुरक्षित है अब बेकार की बातों में दिमाग उलझा कर परेशान होने से क्या फायदा, चल सो 
जा।' 

वह खामोशी से लेट गया।

कमरे से जाने के लिए मुड़ती हुई साधना ठिठकी और फिर उसे स्थिर दृष्टि से देखती हुइ बोली-'कहीं तू डर तो नहीं गया।' 

'क्या कह रही हो दीदी।' यह उसकी ओर करवट बदलकर हथेली पर सिर रखता हुआ बोला-'क्या तुमने मुझे डरने की शिक्षा दी हे कभी?" 

'नहीं, लेकिन फिर भी...!' 

'यह ख्याल तुम्हारे मन में कैसे आया?' 

'वह महाहाज से तू पिछले फारेस्ट अफिसर के बारे में बात कर रहा था ना?' 

'वह तो सिर्फ जानकारी के नाते पूछ-ताछ कर रहा था दीदी। आखिर जहां काम शुररू करना है वहां के बारे में कुछ जान लेने में कोई बुराई है क्या?' 'नही कोई बुराई नहीं है। लेकिन तुझे गम्भीर देखकर कुछ अजीब-सा लगने लगा था।' 

' यहाँ आओ दीदी।' 

साधना उसके निकट आ गई। 
'बैठो। 
वह पलंग के किनारे पर बैठ गई। 

केसरी उसके आंचल को अपनी उंगलियों में लपेटता हुआ वोला-'तुम जानती हो कि आज मेरी जिन्दगी का सवसे शभ दिन है। मां-बाबूजी के न रहने के वाद जिस तरह आपने सभी अरमानों का गला घोंट कर तुमने हम लोगों की जिम्मेदारी सम्हाली उसका ऋण तो शायद मैं जन्म-जन्मांतर भी न चका सकू। लेकिन तभी सोचा करता था कि जिस दिन मैं बड़ा होकर कमाने लगूंगा उस दिन अपनी दीदी ने कहूंगा कि दीदी अव बस, अब तुम्हें कुछ भी करने-धरने की जरूरत नही है। अब मेरे कन्धे इतने मजबूत है। गए हैं कि सारी जिम्मेदारी सम्भाल सकता हूं।' 


'यह बात तो तूने उसी दिन कह दी थी जब तुझे नौकरी का नियुक्ति पत्र मिला था। उसके बाद तो जबर्दस्ती मेरी भी 
नौकरी छुड़वा दी तूने।' 

'अब तुम्हें कुछ भी करने की जरूरत नहीं। जो कुछ भी करूंगा अब मैं करूंगा। मुन्नी सिव्वू की पढ़ाई-बढ़ाई सब कुछ। और तुम्हारी शादी भी।' 'चल पागल।' साधना उसके सिर पर चपत लगाती हुई वोली-'अब क्या शादी लायक उस रह गई है मेरी।' 

'क्यों-क्यों अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है।' 

'मेरी शादी को रहने दे अब अपनी शादी की सोच। किस सिब्बू और मन्नी की।' ‘

'नहीं दीदी शादी तो सबसे पहले तुम्हारी ही होगी। आज से नौकरी ज्यायन कर ली है मैंने। यानि पूर्ण रुपेण कर्म क्षेत्र में कूद पड़ा हू। अब अपनी दीदी के लिए ढूंढ कर लाऊंगा एक सुन्दर सा राजकुमार जो उड़ने वाले घोड़े पर बैठकर आएगा और हमारी दीदी को उड़ाफर ले जाएगा।' 

'चल बेशर्म।' 

साधना ने उसके हाथों से अपना आंचल खींचा और कमरे से बाहर चल ही। 
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अगली सुबह नाश्ता इत्यादि करके जंगल के दौरे पर जाने की तैयारी कर रहा था कि बंगले के बाहर किसी जीप के रुकने की आवाज सुनी। 

बाहर आकर देखा कि एक श्यामवर्ण एवं गठीले बदन का व्यक्ति जीप के पिछले हिस्से से एक टोकरी उतारते हुए दो 
आदमियों से कह रहा था-'अरे सम्हाल कर उठाओ मिठाई जरा सी भी दब गई तो मैं तुम्हारी खोपड़ियां दबा दूंगा।' 
आहट पर उसकी ओर घूमता हुआ हाथ जोड़ कर बोला-'सलाम हुजूर!' 

'कौन हो तुम?' 

'हुजर की रैयत हैं सरकार।' यह व्यक्ति दांत निपोरता हुआ बोली-'वैसे असूल तो कहता है कि हुजूर की खिदमत में कल ही सलाम बजाने के लिए हाजिर हो जाना चाहिए था लेकिन सोचा कि सफर से थके हारे आए हैं परेशान करना मुना-सिब नहीं। तो अब आ गए हैं हुजूर के दरबार में नजर हाजिर करने के लिए।' 

तब तक दोनों आदमियों ने टोकरी जीप से उतारकर बरामदे में रख दी थी। 

'यह क्या है?' 

'नजराना है हुजूर जिसे अंग्रेजों के जमाने में डाली कहा करते थे। वह व्यक्ति विनीत मुद्रा में हाथ जोड़े हुए ही बोला लेकिन चसकी आंखें कुछ दूसरे ही ढंग से केसरी का निरीक्षण कर रही थीं। 

'अंग्रेजों को इस मुल्क से गए जमाना हो गया। लेकिन उनका यह रिवाज नहीं गया अभी।' 

'अच्छे आदमी अगर चले भी जाते हैं तो भी उनकी अच्छी बातें यहीं रह जाती हैं।' 

'मतलव?' 

'अब देखिए ना गांधी जी बेचारे तो इस दुनिया को छोड़ कर स्वर्गलोक में चले गए। लेकिन अपनी अच्छी बातें यहीं छोड़ गए जैसे-आपस में प्रेम से भाई चारा रखे जियो और जीने दो मिल बांट कर खाओ वगैरहा बगैरहा। 

'देखो मिस्टर।' 

'जी गुलामों के इस गुलाम का नाम श्रीमान भैरोंसिंह है।' 

आप मुझे भैरों कह सकते हैं।' 

'खैर जो कोई भी नाम है तुम्हारा यहां से टोकरी को उठाओ और वापिस जीप में रख लो।' 

'गलत समझे हुजूर इस टोकरी में कोई खास चीज नहीं हैं। सिर्फ लैटर बाक्स माल है। ऊपर से डालो और नीचे से निकालो। असली चीज तो यह है।' 

और उसने अपनी जेब से एक भारी सा लिफाफा निकालकर दोनों हाथों द्वारा सम्मानपूर्ण ढंग से शीश झुकाते हुए उसकी ओर प्रस्तुत किया। 'क्या है यह?' केसरी ने उसकी ओर कड़ी नजरों से देखते हुए पूछा। 

'हुजूर खद ही देख लीजिए।' 

'मैं तुमसे पूछ रहा हूं।' 

'हुजूर डाकिए का काम तो डाक पहुंचाना होता है। उसे क्या मालूम कि पैकिट पार्सलों में क्या बन्द है।' 'इन पैकिट पार्सलों को यहां से उठाओ और जिसने भेजे हैं, उसके पास ही वापिस ले जाओ।' 

'ऐसा मत कहिए हजूर ।' 

'फालतू बात सुनने को आदत नहीं है मुझे।' 

कहकर केसरी जाने के लिए मुड़ा तो भैरों ने अपनी जेब से एक और लिफाफा निकालकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा-'हुजूर अगर यह चिट्ठी पढ़ लेते तो अच्छा था।' 

कुछ सोचकर केसरी ने लिफाफा ले लिया और चिट्ठी निकाल कर पढ़ने लगा। 

हुजूर के गुलाम का सलाम,सरकार की खिदमत में एक छोटी सी भेंट भेच रहा हूं। उम्मीद है कबूल करके अपने इस गुलाम को इज्जत बख्शेंगे। 

हुजूर नए-नए आए हैं इसलिए आगाह करना अपना फर्ज समझता हूं कि यहां के जंगल में खूखार किस्म के जानवर बहुत हैं। रीछ, शेर, बघेरे वगैरह। बच्चे तो क्या आदमी को भी उठाकर ले जाएं। 

पिछले फारेस्ट आफिसर साहब ने मेरी बात का यकीन नहीं किया। कहते हैं ना कि विनाश काल में बुद्धि भी विपरीत हो जाती हैं। 

लेकिन मुझे यकीन है कि हुजूर यहां के जंगलों के बारे में अपने इस गुलाम की जानकारी का पूरा-पूरा फायदा उठाएंगे और अपने इस गुलाम पर कृपा भाव बनाए रखेंगे। जिसमें आप भी खुश हम भी खुश। दुनिया भी खुश। 
खुशियां हो खुशियां बिखेरकर खुश होने वाला कालिया 
निरुट के खाली स्थान पर एक कुंडली मारे हुए नाप की फुफकारती हुई सो आकृति बनी हुई थी। पढ़ने के बाद केसरी ने भैरोसिंह को ओर देखा। पूछा-'यह कालिया कौन है?'

'हुजूर इस इलाके में नए-नए आए हैं। शायद इसलिए नहीं जानते कि इस इलाके में कानून का दूसरा नाम कालिया है। जानेंगे भो कैसे भला जान-पहचान तो अभी अच्छी तरह से हुई ही नहीं है। उसी के लिए तो मैं कालिया की ओर से हाजिर हुआ था, सरकार यह नजराना लेकर। बस यह समझ लीबिए हुजूर कि कालिया नाम भगवान शेष नाग का ही अवतार है इस कलयग में। जिसके-सिर पर अपने फन की छाया कर दी वह इस भय सावर में आराम से सुख की नींद सोए। लक्ष्मी उसफी दासी बनी पैर दबाती रहेगी। लेकिन अगर कहीं बह नाराज हो गया हुजूर तो समझ लो कि हजारों मंह उसे डसने को दौड़ पड़ेंगे। पाताल में भी जगह नहीं मिलेगी उसे बचने के लिए।' 

केसरी ने भैरों की बात का कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि जेब से पैन निकाल कर उसी कागज को दरवाजे के साथ टिका कर उसकी पुश्त पर लिखने लगा 
गुलामों के गुलाम कालिया को फारेस्ट आफिसर का पैगाम, 
मेरा नाम केसरी है। पूरा नाम के. सी. केसरी जो पूरी तरह खुलकर बनता एफ कृष्ण चन्द्र केसरी। यह उसी का नाम है जिसने आज से हजारों साल पहले एक कालिया नाम का दर्प-दलन करके उसके शीश पर खड़े होकर अपनी बंशी बजाई थी। उसी दिन से हर कालिया का यह कर्त्तव्य बन जाता है कि वह इस नाम के आगे नत-मस्तक हो जाए और अपनी टेढ़ी-मेढ़ी कुचालें छोड़ दे। 
द्वारा 
के. सी. केसरी फारेस्ट आफिसर 

झटके से कागज भैरोंसिंह की ओर बढ़ाते हुए केसरी ने कहा-'यह चिट्ठी ले जाकर अपने उस कालिया को दे देना और साथ ही यह भी कहना कि आगे से वह या उसका कोई आदमी बिना इजाजत जंगल की जमीन पर पैर रखने की कोशिश न करे।' 

'हुजूर हम तो डाकिए हैं जो उधर से दिया गया था वह आप तक ले आए। जो आग दे रहे हैं वह वहा पहुंचा देंगे। वैसे इस लिफाफे में पूरे दो हजार रुपए थे।' 

'दफा हो जाओ यहां से।'

'हो जाते हैं, हुजूर हो जाते हैं। चलो रे टोकरी जीप में रखो।' 

केसरी भीतर आया तो साधना ने पूछा-'कौन था केशो?' 

'किसी कालिया का आदमी था।' 

'क्या कह रहा था?' 

'रिश्वत लेकर आया था।' 

'यह रिश्वत शहरों में तो थी ही, इस जंगल को भी नहीं छोड़ा इसने। वापिस कर दी ना तूने।' 

'तो और क्या?' अच्छा दीदी मैं जंगल का दौरा करके आता हूं। मुन्नी शिब्बू का ध्यान रखना। जंगल में ज्यादा दूर न जाने पाएं।' 

'यह छोकरा तो लोहे की बोली बोल रहा है भैरों।' 

पत्र पढ़ने के बाद कालिया ने धीरे से गरदन हिलाई और हुक्के की नली मुंह से लगाकर गुड़गुड़ाया। 

अंगूठे और तर्जनी उंगली की सहायता से अपनी मूंछों के किनारे को बल देता हुआ बोला-'कालिया के सिर पर बंशी बजाएगा कृष्ण भगवान की तरह हूं कृष्ण चन्द्र केसरी तो वो रीछ वाली बात अभी उसकी खोपड़ी में अच्छी तरह से आई नही है।' ‘

'वो तो खूछ ज्यादा ही फुनकुना रहा था उस्ताद।' भैरों ने अपने कन्धे उचकाते हुए कहा-,एक बार तो जी में आई थी कि साने की सारी फुनफुनाएनट निकाल दूं।' 'अभी तो आया है फुनफुनाहट भी निकल जाएगी।' 

'मेरी तो कुछ समझ मे नहीं आ रहा उस्ताद कि यह पिछली बार मे चक्कर क्या हो रहा है?' भैरों अपनी गुइँ खुजाता हुआ बोला-'इसके पहले तो सब ठीक-ठाक चल रहा था। एक बार जिस अफसर के सिर पर तुमने हाथ फेर दिया वही साला कुत्ते की तरह कुंकू करता हुत्रा तुम्हारे कदमों में लेट कर दुम हिलाने लगा था। लेकिन वह पीछे वाला छाती तान कर सामने अड़ा रहा। तुम्हारे काबू में आया ही नहीं आखिर तक।' 

'तभी तो वक्त से पहले मर गया।' 

'तो क्या इसे भी उस्ताद...?" 

'अरे नहीं रे' कालिया लापरवाही से गरदन झटक कर बोला-'वह पीछे वाला तो साला छुट्टा सांड था। न आगे नाथ न पीछे पगा। पर इस साले को नाक में तो पहले से ही नकेल डली हुई है।' 

'मैं कुछ समझा नहीं उस्ताद।' 

'अबे देख के भी नहीं समझा?' दो-दो बहने हैं छोटा भाई है। जिस रस्सी को भी पकड़कर खींचेंगे उसी पर नाचने लगेगा साला।' 

'तो उस्ताद वो रीछ वाला नाटक दोबारा किया जाए क्या?' 

'नहीं अभी तो जरा उसके छोटे भाई को देख।' कालिया कुछ सोचता हुआ बोला-'नया-नया जवान हो रहा है ना?' 

भरों कुछ बोला नहीं, प्रश्नपूर्ण दृष्टि से कालिया की ओर देखता रहा। 

'महाराज ने खबर दी है कि वह जंगल के जानवर को देखना चाहता ई। शेर, चीते, भालू बगैरह।' 

'तो क्या उस्ताद उसे..?" 

'अरे नहीं अभी इसकी जरूरत नहीं है। फारेस्ट आफिसर को अपना दुश्मन नहीं दोस्त बनाना है। एक-दो आदमी उसके छोटे भाई के पीछे लगा दो। उसे जंगल के जानवर ही नहीं उस जन्नत की भी सैर करा दो जो उसने अभी शहर में भी नहीं देखी होगी।' 

'समझ गया उस्ताद।' 

'और देख तू बिलकुल सामने मत पड़ियो।' कालिया बोला-'अब जरा वह टेईलीफोन उठा के दे।'

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