पापी परिवार--19
दीप ने प्रथम झटके के उपरांत ही निम्मी की चूचियों पर अपने हाथो का क़ब्ज़ा जमाया और जिससे उनके बीच चल रहा चुंबन टूट गया "बेटी तकलीफ़ ज़्यादा हो, तो थोड़ी देर रुकु ?" उसने अगला धक्का मारने से पूर्व निम्मी की राय जान-नी चाही.
"डॅड !! मेरी पुसी की झिल्ली तो फॅट चुकी है फिर भी इतना दर्द क्यों हो रहा है ?" शरम-वश यह सवाल पुच्छने के पश्चात निम्मी का चेहरा वर्तमान से कहीं ज़्यादा लाल हो उठा. चूत की जगह पुसी शब्द का उच्चारण भी वह मुश्क़िल से कर पाई थी.
"तेरी पुसी को रेस्ट नही मिला तभी दर्द हो रहा होगा मगर तू फिकर ना कर, तेरे डॅडी के पास इस दर्द की बेहद सटीक दवा है" दीप की शैतानी मुस्कान जाग्रत हुई और अगले ही पल उसकी कमर ने दूसरा झटका खाया, जो पहले से कहीं ज़्यादा दर्दनाक और घातक था.
"आईईई मम्मी !! मर गयी" बेटी की चूत के साथ ही एक पिता ने उसके अनुमान की भी धज्जियाँ उड़ा दी और ताबड-तोड़ धक्को का सिलसिला चल निकला.
जल्द ही पिता का विशाल लंड बेटी की चूत के अंदर गहरा और गहरा जाने लगा. मोटे सुपाडे के कुच्छ जघन्य प्रहार तो सीधे निम्मी के गर्भाशय को छु रहे थे.
"अह्ह्ह्ह डॅडी !! अपनी बेटी पर कुच्छ तो रहम खाओ" निम्मी की सहेन-शक्ति जवाब देने लगी, रह-रह कर उसे लगता कहीं वह बेहोश ना हो जाए परंतु दीप तो जैसे वासना रूपी राक्षस बन चुका था.
वह पल भर को नही रुका, जवान चूत का सन्कीर्न मुख उसके लंड की चोटों से खुल चुका था. यौवन से भरपूर अपनी बेटी के गोल-मटोल मम्मे अपने कठोर हाथो में वह किसी गुब्बारे की तरह महसूस कर रहा था.
अत्यधिक पीड़ा व उत्तेजना में निम्मी अपना निचला होंठ दांतो में दबाए रीरियाती रही. उसकी चूत की कोमल फाँकें पिता के आक्रमणकारी लंड की मोटाई के कारण बुरी तारह फैल कर लंड को जकड़े हुए थी और जिस रफ़्तार से लॉडा उसकी चूत के अंदर-बाहर होता, उसे लग रहा था जैसे उसकी चूत का माँस भी लंड के साथ ही ताल से ताल मिला का खिंचता जा रहा हो.
लगातार होते घर्षण से जल्द ही चूत के अंदर रस की बहार उमड़ने लगी थी और जो अब कभी भी फूटने को तैयार थी, जैसे ही दीप ने अपना एक हाथ मम्मे से हटाकर उसका अंगूठा निम्मी के गुदा-द्वार के अंदर ठेलने का प्रयास किया, उसकी बेटी किसी भी अग्रिम-चेतावनिके झाड़ पड़ी.
"फाड़ दो !! और अंदर डॅडी और अंदर" रंडी में परिवर्तित दीप की बेटी के अंतिम लफ्ज़ यही थे.
निम्मी की चूत मन्त्रमुग्ध कर देने वाले स्खलन के सुखद एहसास मात्र से फॅट पड़ी और सुंकुचित हो कर इतना रस उगलती है, जिसे उसके पिता का विशाल लॉडा चूत के भीतर फसे होने के बावजूद भी बाहर निकलने से नही रोक पाता.
दीप के धक्को की रफ़्तार निरंतर जारी रही और वह कोशिश करता है कि इस बार अपनी बेटी को दो स्खलनो का सुख प्रदान कर सके. मन में ऐसा विचार आते ही उसके लंड की नसों में प्रचंड रक्त-स्ट्राव होने लगा और बेटी के चुचक की घुंडी मसलते हुए वह उसकी सोई कामवासना को दोबारा जगाने में जुट गया.
"ओह्ह्ह डॅड !! पूरे जानवर हो आप" निम्मी अपने पिता की चोदन क्षमता की कायल हो चुकी थी. कभी पिता का उसे लाड करना और फिर अचानक से दर्द देना. आज पहली बार उसने जाना था कि सेक्स में रिश्ते, मर्यादा, शरम इत्यादि का कोई महत्व नही. सर्वोपरि सिर्फ़ काम-वासना है.
"बड़ी जल्दी समझ गयी तू अपने डॅड को, खेर अभी हम दोनो ही जानवर हैं" दीप बोला. चूत के एक बार झाड़ जाने के उपरांत अन्द्रूनि मार्ग पर चिकनाई बढ़ गयी थी जिससे उसका लॉडा बिना किसी रोक-टोक के सीधे गहराई में चोट करने लगा था.
"हे हे !! मैं थोड़ी हू जानवर" निम्मी मुस्कुराइ, दीप को प्रसन्नता हुई बेटी की जघन्य पीड़ा ख़तम होने से.
"देख !! अभी तू आगे को झुकी हुई है और तेरे पिछे मैं तुझ पर झुका हुआ हूँ. हम दोनो ही चुदाई में मगन हैं, तो बता जानवर हुए या नही ?" दीप की बेशरम समीक्षा से हैरान निम्मी की आँखें बड़ी हो गयी "इसे डॉगी पोज़िशन कहते हैं !! भाओ-भाओ" वह हँसने लगा. यदि उसने खुद को कुत्ता कहा था तो निम्मी को भी कुतिया की उपाधि से नवाज़ा.
"जानवर के साथ पूरे पागल भी हो" उत्साह से परिपूर्ण निम्मी का मन और तंन खुशी से झूम रहा था, इतने आनंद की कल्पना उसने बीते जीवन में कभी नही की थी.
"हम ने अपना रिश्ता कलंकित किया है निम्मी मगर क्या तू इससे खुश है ?" दीप ने इस सवाल से अपनी बेटी के अंतर-मन की सोच जान-नी चाही और फॉरन निम्मी ने अपना सर हिला कर, हां में इसकी स्वीकृिती दे दी.
"डॅड !! मैं इस रिश्ते से बहुत खुश हूँ और आप फिकर ना करो, हम हमेशा दुनिया की नज़र में एक बाप-बेटी ही रहेंगे भले चाहे बंद कमरे में पति-पत्नी की तरह रहें" निम्मी ने ज़ाहिर किया कि वह अपने और अपने पिता के बीच चल रहे अनाचार को दुनिया की नज़र में कभी नही आने देगी और जब भी मौका मिलेगा दोनो खुल कर चुदाई किया करेंगे.
"बस मुझे तुझसे यही उम्मीद थी. हमे पूरा ख़याल रखना होगा, लोगो की नज़र में हमारा रिश्ता पाक-सॉफ ही बना रहे बाकी मैं तुझे एक पत्नी होने के सारे हक़ देता हूँ" दीप ने ऐलान किया.
चुदाई के बीच चल रहे इस कामुक वार्तालाप का यह नतीजा निकला कि दोनो बाप-बेटी अब सिर्फ़ काम-क्रीड़ा पर ही अपना ध्यान केंद्रित करने लगे.
पिच्छले आधे घंटे से दीप का मूसल लगातार बेटी की चूत के अंदर-बाहर हो रहा था और ज्यों ही पिता ने अपने धक्को की रफ़्तार में तेज़ी लाई, निम्मी की चूत का संवेदनशील भंगूर सूजने लगा.
"डॅड इस बार अंदर ही डिसचार्ज होना, मैं महसूस करना चाहती हू" अचानक से निम्मी के दिल में तमन्ना जागी.
"मगर क्या यह सेफ रहेगा ?" दीप खुद भी यही चाहता था मगर बेटी की पर्मिशन के बिना उसे ऐसा करने में दिक्कत थी और अगर वह निम्मी की चूत के अंदर अपना वीर्य-पात करता भी, तो भी थोड़ी देर पहले खिलाई गयी ई-पिल की गोली उसे अनचाहे गर्भ से मुक्त रखती.
"डॅड !! आप मुझे कभी हर्ट नही होने दोगे, मैं जानती हूँ. तो अंदर ही फिनिश कर दो" निम्मी की माँग के उपलक्ष में दीप ने इस खेल के अंतिम पड़ाव की तरफ प्रस्थान किया और गहरे धक्को के साथ जल्द ही बेटी को दोबारा चरम के शिखर पर पहुचाने का प्रयत्न करने लगा.
निम्मी की साँसें उसके कंट्रोल से बाहर होती हैं और गुदा-द्वार में उठती सिरहन के एहसास-मात्र से ही वह रस छोड़ना शुरू कर देती है "आह डॅड !! मैं गयी" वह चीखी और इस बार का ऑर्गॅज़म पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा आनंददाई था.
बेटी की चूत के गरम लावे ने दीप की टांगे कंप्वा दी और वह अपने सुपाडे को उसके गर्भाशय से सटाकर हौले-हौले वीर्य की दर्जनो धाराएँ अंदर उगलने लगा.
कुच्छ देर पश्चात बाथरूम में आया उत्तेजना का तूफान लगभग थम चुका था, दोनो बाप-बेटी के पापी मिलन का सबूत, निम्मी की जाँघो से बह कर नीचे फर्श से होते हुए, नाली के अंदर प्रवेश करने लगा.
दीप ने अपना लंड चूत से बाहर खींचा, अंदर तो जैसे रस का सैलाब भरा हुआ था. यक़ीनन दोनो ही पूर्ण-रूप से संतुष्ट हो चुके थे.
शवर का टॅप पकड़े झुकी निम्मी अब कहीं जा कर अपनी कमर सीधी कर पाई थी और जैसे ही वह खड़ी हुई, दीप ने फॉरन उसे पलटा कर अपने सीने से चिपका लिया.
"डॅड !! चाहो तो शवर बढ़ा दो" निम्मी ने अनुरोध किया. शवर के बढ़ते ही भर-भर करता पानी दोनो के तंन का मैल धोने में जुट गया मगर मन का क्या, अनाचार में लिप्त जो आज के बाद शायद कभी सॉफ नही हो पाना था.
निम्मी ने अपने पिता को नहलाया और दीप ने बेटी के अंग धोए और जल्द ही वे स्नान समाप्ति के पश्चात रेस्टरूम में दाखिल हो गये लेकिन अब भी कपड़ो के बंधन से आज़ाद थे.
दीप ने बिस्तर पर रखा अपना सेल उठाया, तो जाना उसके दोस्त जीत के 7 मिस कॉल्स थे और जिसे देखते ही उसकी सारी खुशी, मानो गम में तब्दील हो चुकी थी.
बेटी के साथ संपन्न हुई घमासान चुदाई की खुमारी छटने से पूर्व ही डीप का खुशनुमा चेहरा, गहेन चिंता में परिवर्तित होने लगा और वह सोच में पड़ा गया कि जीत को रिटर्न कॉल किया जाए या नही.
रह-रह के उसकी आँखों में दोस्त की बेटी तनवी की छिनाल मूरत उभरने लगती है और तत-पश्चात उसका ध्यान अपनी बेटी निम्मी के नग्न बदन में उलझ कर रह जाता है, जो वॉर्डरोब से अटॅच मिरर के सामने खड़ी, अपने गीले बाल सुलझा रही थी.
यह रमणीय दृश्य देख फॉरन दीप के मष्टिशक में तनवी जैसी औरत को लेकर कुच्छ विचार घर करने लगते हैं.
आख़िर क्यों उसे, उसके घर बहू बन कर नही आना चाहिए :-
यह रमणीय दृश्य देख फॉरन दीप के मष्टिशक में तनवी जैसी औरत को लेकर कुच्छ विचार घर करने लगते हैं.
आख़िर क्यों उसे, उसके घर बहू बन कर नही आना चाहिए :-
(1) उसकी पत्नी कम्मो बेहद सीधी एवं घरेलू महिला है व दिल की कमज़ोर भी और वह कभी नही चाहेगी, उसकी बहू उसका विश्वास तोड़े या परिवार की इज़्ज़त को सरे बाज़ार नीलाम करे.
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(2) बीमार रघु की देखभाल का जिम्मा भी तनवी को नही सौंपा जा सकता क्यों कि उसमें समर्पण की भावना नही है.
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(3) निकुंज के लिए लड़की उसके पिता ने ढूंढी है और यदि कल को कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो ज़िम्मेदार भी उसका पिता ही माना जाएगा.
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(4) बड़ी बेटी निक्की के भोलेपन और सभ्य विचार-धारा से तनवी का मेल खाना असंभव है.
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(5) शिवानी को दीप ने रघु के लिए पसंद किया क्यों कि वह उसे ठोक-बजा कर परख चुका था, उसके मन से भी और तंन से भी. भले शादी संपन्न होने के बाद वह तनवी की जेठानी कहलाती मगर इज़्ज़त उसे दो-कौड़ी की भी नसीब नही हो पानी थी.
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(6) 18 बरस की यौवन से भरपूर नारी उसकी छोटी बेटी निम्मी, किसी भी मर्द के होश उड़ा देने में सक्षम थी और सबसे बड़ी बात, स्वयं दीप का दिल भी उस पर पूर्ण-रूप से फिदा हो चुका था.
यक़ीनन निम्मी का चंचल स्वाभाव, शातिर तनवी से उसका मेल बढ़ने में मददगार साबित होता और इसके पश्चात तनवी, बाप-बेटी के बीच पनपे पापी प्यार को चुटकियों में समझ जाती या निम्मी को अपने सानिध्य में भी ले सकती है.
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(7) खुद दीप के उतावले-पन ने तनवी को उसके खुश-हाल घर का रास्ता दिखाया था और शायद वह उसे भविश्य में ब्लॅकमेल या सेक्स के लिए विवश भी कर सकती है.
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कुल मिला कर तनवी में उसे एक भी ऐसा पॉज़िटिव लक्षण नही दिखाई पड़ा जिससे वह उसे अपने घर की बहू बना सकता था और इन्ही विचारो के निष्कर्ष से दीप ने जीत को रिटर्न कॉल नही किया. मगर कभी ना कभी, कोई ना कोई एक्सक्यूस तो उसे देना ही पड़ेगा, जो बाद की बात थी.
"डॅड !! हम घर कब जाएँगे ?" बाल संवारने के पश्चात निम्मी ने अपने पिता को आवाज़ दी.
"क्यों !! घर पर कोई काम है क्या ?" दीप ने उल्टा उससे सवाल पुछा. नहाने के उपरांत उसकी बेटी की खूबसूरती में काफ़ी इज़ाफा हुआ था, घने काले बालो से अपनी दोनो चूचियाँ छुपाये वह बेहद कामुक नज़र आ रही थी.
"नही !! ऐसा तो कोई ख़ास काम नही" निम्मी ने लो वाय्स में जवाब दिया. इस वक़्त उसका पिता बिस्तर पर नंगा लेटा हुआ था नतिजन, वह खुद भी कपड़े पहनने में झिझक महसूस कर रही थी.
"तो फिर क्या बात है, बता मुझे ?" दीप ने दोबारा सवाल किया और बेटी की आँखों के सामने ही उसके नंगे बदन का चक्षु-चोदन करने लगा.
कामवासना से बिल्कुल मुक्त हो चुकी निम्मी को दीप द्वारा खुद को यूँ बेशर्मी से घूर्ना अत्यधिक लज्जा से भरने लगा. वह अपनी पलकें झुकाए इंतज़ार कर रही थी, कब उसे पिता की आग्या मिले और वह अपनी नंगी काया पर शील धारण कर पाए.
"तू कुच्छ परेशान दिख रही है, कोई दिक्कत है क्या ?" दीप मन ही मन मुस्कुरकर बोला. बेटी की लाज भरी अवस्था देख, उसे अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी.
"ना .. नही तो डॅड" निम्मी के लफ़ज़ो में कंपन हुआ. दीप अब भी उसे देख रहा है या नही, चेक करने हेतु उसने अपनी पलकें ऊपर उठाई तो बुरी तरह शरमा गयी. उसका पिता एक-टक उसकी चूत की सुंदरता को निहार रहा था.
"डॅड !! प्लीज़ ऐसे मत देखो" आख़िर-कार निम्मी की ज़ुबान से निकल ही गया "मुझे शरम आ रही है" वह अपने होंठ चबाते हुए बोली.
माना सेक्स के दौरान वह पिता की नज़रो के सामने घंटो नग्न रही थी मगर इस वक़्त ना तो उनके बीच चुदाई चल रही थी और ना ही वह उत्तेजित थी. ऐसे में निम्मी का शर्मसार होना लाज़मी था.
"कैसी शरम बेटी ? मैं कुच्छ समझा नही" दीप ने बड़े भोलेपन से उत्तर दिया और अपनी आँखें बेटी के चेहरे से हटा कर, वापस उसके योनि प्रदेश पर गढ़ा दी.
निम्मी को काटो तो खून नही, वह प्रदर्शनी में रखे किसी पुल्टे के माफिक निष्प्राण होने की कगार पर थी जिसका मुआयना उसका दर्शक-रूपी पिता कर रहा था.
"बस करो डॅड !! मैं अब सह नही पाउन्गि" चूत में उठती सिरहन के वशीभूत निम्मी सिसक कर बोली "मैं कपड़े पहेन रही हूँ" इतना कह कर फॉरन उसने अपने वस्त्र समेटे और दौड़ती हुई बाथरूम में एंटर हो गयी.
"पागल" दीप के ठहाको से मानो पूरा रेस्टरूम गूँज उठा और साथ ही बाथरूम के दरवाज़े से सटी निम्मी भी खुद को मुस्कुराने से रोक ना पाई.
शाम के 5 बज चुके थे और दोनो बाप-बेटी समय के अंतराल से, अलग-अलग साधनो पर सवार हो कर घर के लिए प्रस्थान कर गये.
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निम्मी को टॅक्सी हाइयर करवा कर दीप ने उसे खुद से पहले घर के लिए रवाना कर दिया और अपनी कार शिवानी के गर्ल'स हॉस्टिल की तरफ मोड़ ली, काफ़ी दिन बीत चुके थे होने वाली बड़ी बहू का दीदार किए. हॉस्टिल से कुच्छ 50 मीटर दूर उसने अपनी कार पार्क की और कॉल के ज़रिए शिवानी को बाहर आने का निमंत्रण दिया.
लगभग 10 मिनिट उपरांत शिवानी हॉस्टिल से बाहर निकली और सीधे अपने ससुर की कार में तशरीफ़ रख ली, वह खुद बेचैन थी दीप से मिलने को.
"अब याद आई आप को मेरी" पिता तुल्य ससुर के चेहरे को देखे बिना ही शिवानी ने शिक़ायत की. इस वक़्त उसने नारंगी सलवार-कुरती पहेन रखी थी और दीप के सम्मान हेतु सफेद दुपट्टे से अपना शीश ढँक रखा था.
"शिवानी !! मैं ज़रूरी काम में व्यस्त था, तभी तुमसे मिलने नही नही आ सका" दीप ने नॉर्मल टोन में उत्तर दिया "अभी यहाँ से गुज़र रहा था, सोचा मिलता चलु" कह कर उसने शिवानी के मायूस चेहरे पर अपनी नज़र डाली.
"पिता जी !! बहुत सताते हो आप हमे" फॉरन वा भावुक हो उठी और दीप के गले में बाहें डाल कर उसकी चौड़ी छाती से लिपट गयी.
"मेरी बहू की आँखों में आँसू अच्छे नही लगते" दीप ने उसकी पीठ पर सांत्वना की थपकी देते हुए कहा. शिवानी की पलकों से झड़े मोती निरंतर उसके ससुर का कंधा भिगो रहे थे और हिचकियाँ धड़कन की रफ़्तार को गति प्रदान कर रही थी.
"चुप हो जाओ शिवानी, कैसे बच्चो जैसे रोती हो" दीप ने उसे अपनी बाहों से प्रथक किया और उसके सुर्ख लाल गालो को अपने हाथो के दरमियाँ रख कर उसे प्यार से पुच्कारा.
"मुझे लगा !! आप मुझे भूल गये" शिवानी सिसकी "शरम-वश आप को कॉल भी नही पाई" अपनी कर्ज़रारी आँखों के जाम पिलाते हुए उसने दीप को मंत्रमुग्ध कर दिया था.
वह तनवी से ज़्यादा सुंदर व गौर-वरण नही थी मगर उसकी सादगी, उसका निर्मल स्वाभाव, हृदयस्पर्शी भोलापन इत्यादि ऐसे अन्य दर्ज़नो गुण थे जो उसे तनवी से बिल्कुल जुदा करते और तभी दीप ने उसे अपने बेटे रघु के लिए चुना था.
"ह्म्म्म !! शायद मैं तुम्हे भूल गया था" दीप ने अचानक वज्रपात किया और शिवानी का मूँह हैरत से खुला रह गया. उसे आशा ना थी, दीप इस तरह के वाक्य का प्रयोग भी कभी करेगा.
"मुझे याद थी तो सिर्फ़ मेरी प्रेमिका और होने वाली बहू, बाकी मैं किसी और शिवानी को नही जानता" वह मुस्कुराया. यह तो सिर्फ़ एक ज़रिया मात्र था अपनी प्रेयसी के चेहरे को और भी ज़्यादा खूबसूरत बनाने का.
शिवानी के होंठ फड़फड़ा उठे और अत्यधिक प्रसन्नता से अभिभूत उसने दीप के होंठो का हल्का सा, एहसास से भरपूर चुंबन ले लिया और फिर फॉरन अपने उतावलेपन पर लजा गयी.
"मन नही भरा हो तो मेरे ऑफीस चले, वहाँ जी भर कर प्यार कर लेना" दीप ने उसे छेड़ा और डराने के उद्देश्य से कार का सेल्फ़ स्टार्ट कर दिया.
"आप के लिए तो मैं अपनी जान भी दे सकती हूँ पिता जी, फिर मेरा यह शरीर तो पहले से ही आप का गुलाम है. चलिए !! आप जहाँ ले जाना चाहें, मैं वहाँ चलने को तैयार हूँ" शिवानी के समर्पण को देख दीप गद-गद हो उठा, मन की आंतरिक खुशी ने उसे रघु के भविश्य की चिंता से मुक्त कर दिया था.
"गुलाम तुम मेरी नही बहू बल्कि मैं तुम्हारा हो गया हूँ. हमारा सौभाग्य है जो तुम जैसी मर्मस्पर्शी लड़की अपने सारे सुख छोड़, मेरे बीमार बेटे के दुख में शरीक होने उसकी पत्नी बन कर हमारे घर आ रही है" दीप के हर शब्द ने उसका दर्द बयान किया, हलाकि अब भी वह संतुष्ट नही था कि शिवानी रघु से शादी कर अपना भावी जीवन नष्ट कर ले, मगर कोई चारा भी तो नही था.
कुच्छ देर तक कार में सन्नाटे का आलम रहा और फिर शिवानी ने चुप्पी तोड़ी.
"नामिता से आप ने मेरे विषय में चर्चा की ?" शिवानी ने प्रश्न किया "और क्या मा जी लौट आई पुणे से ?" उसने पुछा.
"तुम्हारी सासू मा रघु को साथ ले कर कल ही लौटी हैं मगर नामिता से मैने तुम्हारे विषय में कोई बात नही की, पता नही उसे कैसे समझा पाउन्गा ?" मुद्दा अति-गंभीर था और दीप सोचने पर विवश, हलाकी वह कयि बार विचार-मग्न हुआ था किंतु अब तक किसी भी समाधान से पूर्ण वंचित.
"फिर कैसे होगा पिता जी ? मुझे भी कोई राह नज़र नही आ रही" शिवानी चिंतित लहजे में बोली "वह मेरी दोस्त है तो मुझे ऑर ज़्यादा घबराहट होती है" उसका धैर्य जवाब दे रहा था.
"नामिता के साथ मुझे तुम्हारे माता-पिता की फिकर भी सताती है बहू, बिना उनकी मर्ज़ी के शादी जैसा बड़ा फ़ैसला तुम अकेले कैसे ले सकती हो ?" दीप का मश्तिश्क उलझता जा रहा था.
"मेरे माता-पिता मुझसे नाराज़ हैं क्यों कि मैं उनसे लड़-झगड़ कर मुंबई आई थी और घर की दहलीज़ लाँघने से पूर्व उन्होने मुझे सूचित भी किया कि मेरा वापस वहाँ लौटना वर्जित होगा. अब तो उनसे बात हुए भी लंबा असरा बीत गया, शायद वे मुझे भूल चुके हैं" अतीत की यादें ताज़ा करते हुए शिवानी ने दीप की एक मुश्क़िल तो हल कर दी लेकिन उससे भी कहीं बड़ी समस्या निम्मी के रूप में उनके सामने डट कर खड़ी थी और जिसके पार निकलना वाकाई आसान नही था.
"परेशान ना हो बहू !! मैं जल्द ही कोई ना कोई रास्ता निकाल लूँगा, बस तुम अपना ख़याल रखना" आश्वासन दे कर दीप ने उसके माथे का गहरा चुंबन लिया और विदाई स्वरूप 10 हज़ार उसके हाथ में रख कर वहाँ से चला गया.
सड़क पर मूक खड़ी शिवानी कभी उसकी कार को देखती तो कभी हाथ में पकड़ी रकम को.
अपने कमरे के बिस्तर पर लेटी निक्की आज बहुत खुश है, एक हाथ से भाई द्वारा तोहफे में मिली कर्ध्नी पकड़े और दूसरे से अपनी कुँवारी चूत सहलाती वह किसी सपने को सच होने जैसा महसूस करती है.
अत्यधिक प्रसन्नता में उसने दोपहर का खाना तक नही खाया था और सही मायने में उसकी भूक पेट से नीचे खिसक कर, उसकी चूत के अंदर समा चुकी थी.
"भाई का पेनिस कितना बड़ा है ?" पिच्छले 3 घंटे से वह इसके अलावा कुच्छ और सोच सकने में असमर्थ थी और जब-जब उसकी आँखों के सामने मास्टरबेट करते निकुंज की छवि उभरती, उसकी कुँवारी चूत से रति-रस का अखंड सैलाब उमड़ कर बाहर छलकने लगता.
अपने भाई के गाढ़े वीर्य का स्वाद और उसके लंड की मर्दानी मादक सुगंध को भुला पाना अब उसके बस में नही था और शायद वह भूलना भी नही चाहती थी.
"बेटी निक्की !! आजा चाइ पी ले" अचानक से उसके उत्साह में खलल करती उसकी मा की आवाज़, उसके कानो में गूँजी और घबरा कर, जैसे उसकी चोरी पड़की गयी हो. वह फॉरन बिस्तर पर उठ कर बैठ गयी.
"आ .. आई मॉम" उसने लड़खड़ाते स्वर में जवाब दिया और इसे निक्की के दिल ओ दिमाग़ में उसके माता-पिता का ख़ौफ़ ही माना जाएगा, जो बंद कमरे में भी उसने झटके से अपने लोवर को, शीघ्रता से अपनी कमर पर चढ़ा लिया था.
"मोम कब आई ?" अपनी साँसों की बढ़ी रफ़्तार को संहालते हुए उसने खुद से सवाल पुछा और दीवार घड़ी पर नज़र पड़ते ही वह दोबारा चौंक गयी "ओ तेरी !! 6 बज गये. यानी मैं 1 बजे से अब तक ..." इसके आगे का कथन उसे अधूरा ही छोड़ना पड़ा और लाज से उसका चेहरा लाल हो उठा.
"निक्की !! चाइ ठंडी हो रही है बेटी ?" कम्मो ने इस बार पुकारने के साथ ही, उसके कमरे के दरवाज़े पर दस्तक भी दी "बस मोम 2 मिनिट" संक्षेप में उत्तर देने के पश्चात निक्की बिजली की गति से बेड से नीचे उतरी और कर्ध्नी छुपाने के लिए उसने वॉर्डरोब खोला.
"कपड़े बदलू या नही ?" सुबह की ड्रेस उसने अब तक चेंज नही की थी और अब वक़्त भी नही था, जो वो चेंज कर पाती मगर गीली कच्छि का कपड़ा बिल्कुल उसकी चूत के मुख से चिपका हुआ था और इससे उसे अजीब सी फीलिंग महसूस हो रही थी "चाइ पी कर चेंज कर लूँगी" वह दौड़ती हुई कमरे से बाहर निकल गयी.
हॉल में उसकी मा और भाई निकुंज पहले से मौजूद थे, निक्की ने बिना कोई बात-चीत किए टेबल से अपनी चाइ का कप उठाया और वहीं खड़ी हो कर पीने लगी.
सुबह की वेशभूषा, बिखरे बाल, कपड़ो की सिलवटें, चेहरे पर बेचैनी अन्य ऐसे काई बदलाव थे जो रोज़ की अपेक्षा उसकी मा को उसमें नज़र आ रहे थे और तभी निक्की की आँखें अपनी मा की आँखों से जा टकराई.
"ये क्या है निक्की ?" कम्मो ने पुछा. हलाकी उसकी टोन एक दम नॉर्मल थी मगर अंजाने डर से जैसे निक्की को साँप सूंघ गया था.
"जब इंसान के दिल में चोर हो तो घूर्ने वाला हर शक्स उसे पोलीस वाला नज़र आता है" डरपोक निक्की की हालत पहले से पतली थी, तो फॉरन दिमाग़ ने भी उट-पटांग कयास लगाने शुरू कर दिए.
"कहीं गीली पैंटी का असर मेरे लोवर पर तो नही हुआ, जो मोम ने देख लिया हो ?" इतना सोचते ही निम्मी की गान्ड फॅट गयी. उस वक़्त चेक करने के लिए वह नीचे तो नही झुक सकती थी मगर धड़कते दिल के साथ उसने अपनी मा को ज़रूर देखा.
"बोल ना" कम्मो ने दोबारा वही सवाल दोहराया तो निम्मी श्योर हो गयी, उसकी मा ने उसे रंगे हाथो पकड़ लिया है.
निकुंज जो खुद भी वहीं मौजूद था. निक्की के सबसे क्लोज़ होने के नाते वह समझ गया, उसकी बहेन बे-फालतू में हड़बड़ा रही है और कहीं बेवकूफी में कम्मो के सामने कुच्छ उल्टा-सीधा ना बक दे "बेटा !! अभी तू सो कर उठी है ना ?" वह बीच में बोल पड़ा.
"ह .. हां भाई !! जस्ट अभी" निम्मी बुदबुदाई "तो पागल !! मोम भी तो वही पुच्छ रही हैं, जवाब क्यों नही देती ?" भाई ने मुस्कुरा कर कहा तो बेहन को भी आत्मबल मिला.
"थकान के कारण नींद आ गयी थी मोम" यह जवाब निक्की ने अपनी मा की ओर देखते हुए दिया और फिर जहाँ पुष्टि खुद निकुंज ने कर दी हो, तो कम्मो के लिए उसे मान जाना ही सर्वोपरि था.
"जा !! चाइ पी कर नहा लेना. देख कैसी गंदी हालत बना रखी है" कम्मो ने अपनी फिकर जाहिर की, माना पहले उसे भाई-बहेन पर अनुमानित शक़ था मगर निकुंज के प्रेम में पड़ कर वह बीते सभी हादसे भूक चुकी थी.
तीनो शाम की चाइ का लुफ्ट उठा रहे थे और तभी निम्मी का आगमन हुआ. आते ही वह सोफे पर, अपनी मा के बगल में ढेर हो गयी.
लगातार दो बार पिता से चुदने के पश्चात उसकी चूत पूरी तरह खुल चुकी थी और चलने में भी उसे हल्की-हल्की पीड़ा का अनुभव हो रहा था मगर चेहरे पर वह ऐसे भाव ला रही थी जैसे आज कॉलेज में उसने बहुत पढ़ाई की हो, बेहद थक़ गयी हो.
"मोम" बाहें कम्मो के गले में डाल, उसने मा के गाल का रसीला चुंबन लिया "मेरी चाइ कहाँ है ?" कह कर उसके आँचल में ही सुस्ताने लगी.
"तू इतना कब से पढ़ने लगी, जो इस कदर थक़ गयी ?" मा का हृदय था, तो कैसे उसे अपनी पुत्री पर प्यार ना आता. बेटी के बालो को सहलाते हुए उसने पुछा.
"नही मोम !! अब से मन लगा कर पढ़ूंगी और जो सब्जेक्ट मैने आज से स्टार्ट किया है, श्योर हूँ उसमे तो मुझे 100 आउट ऑफ 100 ही मिलेंगे" निम्मी मन ही मन मुस्कुराने लगी.
शाम बीती, रात आई और दीप को छोड़ कर घर के सारे सदस्य अपने-अपने कामो में व्यस्त हो चुके थे.
"चावला निवास" के समानांतर "रॉय विला" वह दूसरा घर है, जहाँ बाप-बेटी मनमर्ज़ी से अपने पवित्र रिश्ते को दाग-दार करने से नही चूकते और अभी दोपहर के 1 बजे वहाँ ऐसा ही आलम था.
महज एक छोटी सी पैंटी पहने तनवी, किचन में आटा गूँथ रही थी और उसके ठीक पिछे खड़ा उसका नग्न पिता जीत, अपनी पुत्री के स्तनो का बुरी तरह मर्दन कर रहा था.
"आहह डॅडी" तनवी अपने मम्मे निचोड़े जाने की तकलीफ़ से त्रस्त हो कर सिसकी "क्या इस तरह सीखोगे आटा गूंदना ?" पिता के विशाल लंड को अपने चूतडो की दरार में रगड़ता महसूस कर उसने भी अपनी गान्ड पिछे धकेलते हुए पुछा.
"और नही तो क्या !! कल को तू ससुराल चली जाएगी, फिर तो मुझे खुद ही आता गूंदना पड़ेगा ना. इस लिए अभी से प्रेक्टिस कर रहा हूँ" जीत ने बेटी की गोल मटोल चूचियों पर अपने हाथ की ग्रिप कसते हुए कहा और साथ ही तनवी की सुराही-दार गर्दन पर स्माल-स्माल एरॉटिक किस्सेस करने लगा.
"मेरे बूब्स को आटे का नाम देते हुए आप को शरम नही आ रही डॅडी ?" अपना चेहरा पिछे घुमा कर पिता के होंठो को चूमते हुए तनवी ने सवाल किया. काफ़ी देर से चल रही इस छेड़-छाड़ के नतीजन वह अति-कामुत्तेजित चुकी थी.
"अपनी बीवी से कैसी शरम ? मैं तो अभी उसकी गान्ड मारने वाला हूँ" जीत ज़ोरो से हंसते हुए बोला. उसका सख़्त लंड पैंटी के ऊपर से निरंतर ठोकर देते हुए बेटी के चूतडो की गहरी दरार में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा था. जैसे कच्छि उतारने से पूर्व ही उसे फाड़ कर, गान्ड के छेद में घुस जाएगा.
"अच्छा जी !! तो जाओ अपनी बीवी की गान्ड मारो, हम आप की बीवी थोड़े ही हैं ?" तनवी ने भी शरारत से कहा, गान्ड के अंदर लंड का स्वाद चखे उसे काफ़ी दिन बीत चुके थे और अपने पिता के मूँह से यह खुश-खबरी सुनते ही उसके गुदा-द्वार में सनसनी मचना शुरू हो चुकी थी.
"बीवी नही तो क्या हुआ, बीवी की सौतन तो है और यह सौतन मुझे मेरी बीवी से कहीं ज़्यादा मज़े देती है. सौतन मेडम !! बोलो मरवाओगी अपनी गान्ड ?" बेटी के मम्मो की तने निपल उखाड़ देने वाले अंदाज़ में खीचते हुए जीत ने पुछा.
"आई डॅडी" तनवी चीख उठी. पिता के इसी निर्दयी स्वाभाव की वह कायल थी और बेटी की पीड़ा को उसकी अनुमति मान लेना जीत की पुरानी आदत.
"मगर आपकी सौतन की एक शर्त है और वादे के पश्चात ही वह आप को अपनी गान्ड मारने देगी, वरना लंड हिला कर काम चला लो" तनवी ने माँग रखी और जीत ने फॉरन हां में अपनी स्वीकृति दे दी "बोल क्या शर्त है ?" अक्सर बेटी की शर्तें पिता को सेक्स का अनोखा मज़ा प्रदान किया करती थी और तभी वह इनकार नही कर पाया.
"मेरी गान्ड मारने के दौरान आप मेरे होने वाले ससुर को कॉल करोगे और यह शादी जल्दी हो सके ऐसा प्रयास भी" तनवी ने आँख मारी तो जीत भी मुस्कुराने लगा.
"मतलब तू अपनी आहें ससुर साहेब को सुनवाना चाहती है ?" जीत को ज़्यादा हैरत नही हुई, बेटी तनवी और दोस्त दीप के बीच चले ब्लोवजोब का व्रतांत वह सुन चुका था "और अपनी दर्द भरी चीखें भी डॅडी" वह जवाब में बोली.
जीत बेडरूम से सेल लेकर वापस लौटा तो देखा तनवी अपनी कच्छि उतार चुकी है और पिता की खातिर अपने चूतड़ कुच्छ ज़्यादा ही उभार रखें हैं.
पिता ने एक पल का समय नष्ट नही होने दिया और बेटी के ठीक पीछे फर्श पर बैठ कर उसके गुदाज़ चूतड़ चाटने लगा "डॅडी !! छेद को चाटो, ज़ोर-ज़ोर से" तनवी की बेशर्म माँगे बढ़ती जा रही थी.
हाथो के ज़ोर से चूतड़ के पाट विपरीत दिशा में फैलाते ही जीत गुदा-द्वार के घेरे पर अपनी लंबी जीभ, गोल-गोल आकृति में घुमाने लगा और इस अदभुत आनंद के प्रभाव से मचल कर, कामलूलोप तनवी के आटे से सने हाथ भी स्वतः उसकी चूत के होंठ मरोड़ने नीचे पहुच गये.
"उम्म्म" बेटी ने कामुक अंगड़ाई ली "डॅडी !! होंठो से चूसो वहाँ, दांतो से हौले-हौले काटो ना" अपनी चूत का सूजा भंगूर मसलती तनवी बिन पानी की मछली की तरह तड़प रही थी.
जीत ने कोई 10 मिनिट तक बेटी के गुदा-द्वार को अपने मूँह की मदद से मुलायम बनाया और इसी दौरान तनवी एक बार झाड़ चुकी थी.
"काफ़ी चिकना है. रहने दे मत चूस " तनवी की चूत का झड़ना ठीक जीत के लंड पर हुआ था तो बेटी द्वारा लंड चूसने की अश्लील गुज़ारिश जीत ने ठुकरा दी.
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तत-पश्चात उसे फर्श पर घोड़ी बना कर जीत ने अपने दोस्त दीप को कॉल मिलाया और जैसे ही कॉल कनेक्ट हुआ "अहह" तनवी की चीख किचन में गूँज उठी. वजह, पिता ने पुरजोर ताक़त से एक ही झटके में अपना संपूर्ण लंड बेटी के गुदा-द्वार के अंदर पेल दिया था.
"उफ़फ्फ़ !! रुकना मत डॅडी, बस चोदो और सिर्फ़ चोदो" अत्यधिक पीड़ा महसूस करने के बावजूद तनवी ने ऐसा निवेदन किया और जीत ने ताबड़तोड़ झटको की झड़ी लगा दी.
यह चौथा कॉल था जो उसके दोस्त ने पिक नही किया और ऐसे ही सातवे ट्राइ के बाद जीत ने सेल छोड़ कर बेटी की गान्ड पर अपना ध्यान केंद्रित करने का फ़ैसला किया.
"ज़रूर तेरा ससुर भी कहीं चुदाई में व्यस्त होगा, फिकर ना कर मैं उससे बात कर लूँगा" हँसते हुए जीत ने बेटी के झूलते मम्मे पकड़ लिए और धक्को की रफ़्तार के साथ उन्हे दबाने लगा.
लंड की मोटाई सामान्य से अधिक होने के कारण तनवी की गान्ड का अन्द्रूनि माँस, बुरी तरह रगड़ खा रहा था और जिसके प्रभाव से कुच्छ ही क्षानो में जीत गुदा-द्वार के अंतिम छोर पर ही ढेर हो गया.
देर रात दीप घर पहुचने की जगह, वापस अपने ऑफीस लौट आया. प्रतिदिन की भाँति नशे में धुत्त परंतु आज तो उसके पाव कुच्छ ज़्यादा ही लड़खड़ा रहे हैं.
शायद तनवी रूपी टेन्षन से निजात पाने के लिए उसने जी भर कर शराब पी थी.
पूरे "चावला निवास" में अंधकार फैला हुआ है मगर कमरो में मौजूद हर शक्स नींद से कोसो दूर.
जहाँ कम्मो और निक्की, अपने बेटे व भाई के समक्ष जाने को मचल रहे थे वहीं बाथरूम में स्टूल पर बैठी निम्मी, अपनी फटी चूत के उपचार हेतु उसे गरम पानी से सेंक रही थी.
निकुंज ने शाम की चाइ के दौरान हुए तमाशे के मद्देनज़र, निक्की को फाइनल वॉर्निंग दी थी "अब से वह भूल कर भी उसके आस-पास नही मंडराएगी. घर में उन्हे खुद पर सैयम रखना होगा भले बाहर वे कुच्छ भी करें, कोई रोक-टोक नही रहेगी"
कम्मो अपने छोटे बेटे से मिलने को बहुत बेचैन थी लेकिन दीप अब तक घर लौट कर नही आया था. रिस्क लेना बेवकूफी होगी, यह सोच कर उसने अपनी इक्षा का त्याग किया और सोने की व्यर्थ कोशिशो में जुट गयी.
हलाकी वह रघु के बिल्कुल समीप लेटी थी मगर आत्म-ग्लानि के चलते उसने अपनी काम-अग्नि पर काबू कर रखा था.
निम्मी आज मस्त है, उसे ना तो अपने कमरे से बाहर जाना था ना ही किसी बात कर गम. वा अच्छे से जानती है, उसका चोदु पिता उस पर पूर्ण-रूप से लट्टू हो चुका है. देर-सवेर कैसे ना कैसे वा उसके विशाल लौडे का स्वाद चख़्ती ही रहेगी और फिर वर्तमान का कोटा तो पूरा हो ही चुका था.
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अगले दिन सुबह 5:30 बजे निकुंज के कमरे का गेट खुला और हाथ में एक पोलिबॅग थामे वह चुपके से घर के बाहर निकल गया.
उस वक़्त ना तो निक्की की आँख खुल पाई थी और ना ही कम्मो की.
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बीती रात डिन्नर के दौरान उसकी मा ने एलान किया था "कल सुबह से मैं भी तुम दोनो के साथ घूमने जाया करूँगी" मा की मौजूदगी में निकुंज अपनी बहेन के साथ ना तो प्यार भरी बातें कर पाता और ना कोई विशेष छेड़-छाड़, इस लिए वह अकेला ही निकल पड़ा था.
कार का सेल्फ़ स्टार्ट करते वक़्त वह विचार-मग्न था और जैसे ही उसने अपनी गहेन सोच पर विराम पाया, अपने आप उसके होंठो पर कुटिल मुस्कान तैरने लगी. तत-पश्चात गियर डालने के उपरांत उसकी कार तेज़ी से मंज़िल की ओर प्रस्थान कर गयी.
"बोरीवली का सेक्टर-19 तो यही है" कोई 30 मिनिट से वह ड्राइव कर रहा था "यहा से कहाँ लेना है ?" खुद से प्रश्न कर उसने अपनी आँखें मूंदी और जल्द ही उसे उसके प्रश्न का उत्तर मिल गया "दाएँ से तीसरी बिल्डिंग होनी चाहिए" वह उसी दिशा की ओर मूड गया.
"ह्म्म !! कुच्छ भी तो नही बदला यहाँ" कार से बाहर निकल कर उसने अतीत की बीती यादों पर गौर फ़रमाया और इसके फॉरन बाद उस मुल्टिस्टोरी बिल्डिंग के 5थ फ्लोर पर अपनी नज़र गढ़ा दी.
"नीमा आंटी !! आख़िर-कार आप का दीवाना आप से मिलने आ ही गया" कहते हुए वह लिफ्ट के ज़रिए फ्लॅट न. 503 के सामने पहुचा और बेल बजा दी.
नीमा के घर जाने का प्लान निकुंज ने बीती रात बनाया था. सुबह के वक़्त घूमने का बहाना उस पर किसी प्रकार का कोई भी शक़ पैदा नही करता.
आज-कल के बच्चों की दिन-चर्या के क्या कहने, खुद अपनी छोटी बहें निम्मी के बिगड़े शेड्यूल से वह पूरी तरह वाकिफ़ था. आंटी की चुदाई ना सही कम से कम उनकी नज़र में अच्छा बच्चा तो बना ही जा सकता है.
ऐसा प्लान कर वह सुबह की पहली किरण के साथ, नीमा के फ्लॅट के सामने खड़ा था.
"लगता है आंटी का शेड्यूल भी खराब है या कहीं मैं ज़्यादा जल्दी तो नही आ गया ?" घंटी बजाने के काफ़ी देर बाद जब गेट नही खुला तो निकुंज ने अपने सेल में टाइम देखा.
"यार !! 6:30 होने वाले हैं" उसके मूँह से यह शब्द फूटे ही थे और तभी नीमा ने अपनी उनीदी आँखों से गेट खोल दिया.
"नमस्ते आंटी" फ्लॅट की मालकिन को चौंकाते हुए वह मुस्कुराया और नीमा हैरानी से उसे वहाँ खड़ा देख, अपने अध खुले नयन ज़ोर-ज़ोर से मलने लगी.
"मैने कहा जी !! नमस्ते" अपनी उपस्थिति का प्रमाण देते हुए निकुंज ने दोबारा उसे आवाज़ दी.
"ओह निकुंज !! आओ-आओ, अंदर आओ" कहती हुई वह दरवाज़े से पिछे हटी और निकुंज उसके फ्लॅट में प्रवेश कर गया.
"माफी चाहूँगा आंटी जी !! मैने खमोखा आप की और बच्चो की नींद खराब कर दी" फ्लॅट के अंदर अंधेरा कायम देख निकुंज बोला.
"नही-नही बेटा !! ऐसी कोई बात नही. मैं बस उठने ही वाली थी" आस पड़ोस के लोगो की नज़र निकुंज पर ना पड़ जाए इस लिए फॉरन नीमा ने मैन गेट की कड़ी लगा दी.
घर पर अकेली होने के कारण बीती रात वा नंगी सोई थी और जब घंटी की तेज़ ध्वनि ने उसे, उसकी नग्नता से परिचित करवाया तो जल्द बाज़ी में व/ओ अंडरगार्मेंट्स, एक नी लेंग्थ महरूण नाइटी पहेन कर वह दरवाज़ा खोलने चली आई थी.
प्रथम मुलाक़ात के अगले ही दिन निकुंज उसके घर पहुच जाएगा, यह नीमा की कल्पना से बिल्कुल परे था "कुच्छ तो गड़बड़ है" मन में ऐसे काई विचारों से उलझती वह निकुंज के समीप आ गयी.
"अरे बेटा खड़े क्यों हो, बैठो ना. मैं लाइट ऑन करती हूँ" वह सोफे की ओर इशारा कर बोली. हलाकी सूर्या-देव का आगमन काफ़ी देर पहले हो चुका था मगर खिड़कियों पर चढ़े, मोटे पर्दों की वजह से घर में पूर्ण अंधकार था.
"ओ भेन्चो" लाइट ऑन होते ही निकुंज के मूँह से निकलते-निकते बचा "कितना गदराया माल हैं, मेरी नीमा आंटी" महरूण नी लेंग्थ नाइटी पहने खड़ी नीमा का लुक बेहद एरॉटिक था.
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निकुंज की कमीनी आँखें चन्द सेकेंड्स का वर्ल्ड रेकॉर्ड बनाते हुए अपनी आंटी की छर्हरि काया का काफ़ी हद्द तक अनुमान लगा लेती हैं "इतमीनान रख, फ्यूचर में बहुत कुच्छ देखने मिलेगा" और अपने उतावले मन को सबर रखने की सलाह दे कर वह फॉरन दीवार पर चिपकी पैंटिंग निहारने लगता है.
लाइट ऑन करने के उपरांत नीमा भी अपनी तिर्छि निगाहो से निकुंज की ओर देखती है लेकिन वह उसकी नजरो को कमरे की सुंदरता में खोया पाती है "कम्मो ने ठीक कहा था, ये तो वाकाई बहुत सीधा है. वरना पराई औरत को ऐसे कपड़े में देख कर तो किसी भी मर्द का बुरा हाल हो जाए"
"बेटा !! मम्मी कैसी हैं ?" निकुंज का ध्यान अपनी ओर खीचने के उद्देश्य से नीमा ने सवाल किया और बड़ी मस्तानी चाल चलती हुई ठीक उसके सामने आ कर खड़ी हो जाती है.
"बस ऊपरवाले की कृपा है" निकुंज कम स्याना नही था, वह ऐसे रिक्ट करता है, जैसे नीमा के रूप-स्वरूप का तनिक भी जादू उस पर ना चल पाया हो.
"बच्चे सो रहे हैं क्या आंटी ?" निकुंज ने नॉर्मल टोन में पुछा. यह जानते हुए भी कि नीमा उसके बेहद समीप खड़ी है, उसकी आँखों ने ऊपर उठने की कोई कोशिश नही की.
काफ़ी दीनो से घटित हो रही घटनाओ के प्रभाव से निकुंज ने खुद पर सैयम की मजबूत पकड़ बना ली थी और अभी वह उसी का भरपूर उपयोग, नीमा जैसी सुंदरी को इग्नोर करने में कर रहा था.
"मैं भी कितनी पागल हूँ !! एक अरसे बाद घर आए हो और मैने पानी तक नही पुछा" बच्चो वाले सवाल को पेंडिंग रख नीमा फ्रिड्ज की दिशा में जाती हुई बोली.
"ऐसी कोई बात नही आंटी !! अकटुल्ली सेक्टर-16 में एक दोस्त के घर मिलने गया था और लौट-ते वक़्त याद आया सेक्टर-19 में आप रहती हो. बस आ गया सुबह-सुबह परेशान करने" अपने आगमन का झूठा व्रतांत सुनाते हुए वह नीमा के ह्रष्ट-पुष्ट चूतडो का लुफ्त उठाता है, जो इस वक़्त काफ़ी झुक कर फ्रिड्ज से बोतल निकाल रही थी.
"निकुंज !! ठंडा पानी नुकसान तो नही करेगा ना ?" बीते रोज जिस तरह नीमा की अचूक चाल का शिकार कम्मो हुई थी ठीक उसी प्रकार आज निकुंज भी हो गया.
जैसे ही नीमा अपनी गर्दन पिछे घुमा कर निकुंज से सवाल करती है, वह उसे, उसके चूतडो को घूरता नज़र आता है और यह देख फॉरन नीमा के होंठो पर मुस्कान फैल जाती है.
"न .. नही तो आंटी, ठंडा पानी चलेगा" पकड़े जाने के डर से निकुंज की आवाज़ हक़लाने लगी और उसे अपने चुतियापे पर अफ़सोस होता है. सीधेपन का जो खेल अब तक वह अपनी आंटी के साथ खेल रहा था, एक पल में उसकी कमान नीमा के हाथो में जा चुकी थी.
"लो बेटा पानी पियो" नीमा ने ग्लास उसकी की ओर बढ़ा कर कहा, निकुंज का शर्मसार चेहरा देखने में उसे बहुत मज़ा आ रहा था.
"निकुंज !! मैं फ्रेश हो कर आती हूँ, तुम चाहो तब तक फ्लॅट देख सकते हो, या जो तुम्हारा मन करे मगर प्लीज़ बाल्कनी की ओर मत जाना" इतना कह कर नीमा स्माइल देती हुई अपने बेडरूम की तरफ मूड जाती है.
"यह मैने क्या कर दिया" क्रोध में भर कर निकुंज अपने गाल पर चपत लगता है और यह नीमा बेडरूम के दरवाज़े के पिछे से छुप कर देख रही थी.
"बड़ा अक़ल्मंद बन रहा था. बच्चू !! आज मैं तुझे बताउन्गि, नीमा कितनी कुत्ति चीज़ है" मन में ऐसा प्रण कर वह बाथरूम के अंदर एंटर हो जाती है.
कुच्छ देर दिमागी घोड़े दौड़ाने के उपरांत निकुंज को राह नज़र आई "यदि बच्चे उठ जाएँ तो आंटी का सामना ज़्यादा ना करना पड़े" ऐसा संकेत प्राप्त होते ही वह तीव्र गति से कमरो की तलाशी लेने लगता है मगर हाए रे फूटी किस्मत, हर कमरा खाली था.
"कहीं आंटी के बेडरूम में तो नही सो रहे ?" निकुंज ने सोचा ज़रूर लेकिन उस कमरे की ओर जाने में उसके पाव काँप रहे थे.
दूर से देखने पर भी पता चल रहा था, बेडरूम का दरवाज़ा बोल्ट नही है "हिम्मत रख निकुंज, हिम्मत रख" खुद को दिलासा देते हुए वह हौले-हौले अपने कदम आगे बढ़ाने लगा और दरवाज़े के एक-दम करीब पहुच कर वह, झिरी से कमरे के अंदर का भूगोल देखने की कोशिश करता है.
"शिट मॅन" अचानक से उसका गला सूख गया और लोवर के अंदर क़ैद उसके सोए लौडे ने पल भर में दर्ज़नो ठुमके मार दिए. बेडरूम के अंदर का नज़ारा ही कुच्छ ऐसा था जो इतना भयभीत होने के बावजूद निकुंज वहाँ मक्खी की भाँति चिपक कर रह जाता है.
बिस्तर के ठीक बगल से अपनी एक टाँग पर खड़ी उसकी आंटी नीमा, बिल्कुल नंगी, हवा में विचरण करती अपनी दूसरी टाँग के अंतिम छोर से कोई कच्छि नुमा गुलाबी कपड़ा, ऊपर को चढ़ने के प्रयास में जुटी थी.
"उफ़फ्फ़ !! कितनी गोल मटोल गान्ड है" निकुंज ने दबे स्वर में आह ली "इसका मतलब बच्चे घर पर मौजूद नही है, वरना एक मा नंगी हो कर कमरे में यूँ बेशर्मी से ना घूमती" उसने तर्क दिया.
गुलाबी कपड़ा अपनी एक टाँग की मांसल जाँघ तक चढ़ने में सफल होते ही नीमा ने उसे दूसरी टाँग के छोर से अंदर डाला और जब कपड़ा उसकी दोनो जाँघो के समानांतर आ गया तब जा कर निकुंज को अंदाज़ा हुआ कि वह छोटा सा कपड़ा गुलाबी स्ट्रिचबल कॅप्री है.
"ऐसा लग रहा है जैसे अभी भी नंगी हो" स्किन टाइट कॅप्री चूतडो से बुरी तरह चिपक कर उनका क्लियर &; पर्फेक्ट शेप शो कर रही थी.
सॉफ्ट, कलर मॅचिंग टाइट टॉप पहेन कर नीमा अब फुल्ली रेडी थी.
थोड़ी देर पहले निकुंज की जिन आँखों में डर था अब उनमें उत्तेजना की ज्वाला जल रही थी.
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नीमा के आगमन से पूर्व निकुंज वापस ग्वेस्टर्म के सोफे पर आ कर बैठ गया, इस वक़्त उसके दिल ओ दिमाग़ में सिर्फ़ उसकी आंटी की नंगी काया भ्रमण कर रही है और जिसके प्रभाव से उसके पाजामे में क़ैद उसका लंड किसी चट्टान समान कड़क हो चुका था.
अंतिम क्षणो में नीमा ने मिरर में खुद को निहारा, वह हॉट से कहीं ज़्यादा हॉट दिख रही थी "मगर क्या यह सही रहेगा ?" उसने सोचा "वह मेरी दोस्त का बेटा है, कोई गड़बड़ हो गयी तो ?"
"ऐसे मौके दोबारा नही मिलते नीमा, जो होगा सो देखा जाएगा" उसने सहसा अपने ख़यालों से बाहर आते हुए, खुद से कहा "फिर निकुंज भी तो गुनेहगार बनेगा" और इस पक्के इरादे के साथ, कि आज वह अपनी सबसे अच्छी दोस्त के जवान बेटे संग मस्ती करने वाली है. सेक्स की प्यासी, उस दूसरी कुंठित मा ने अपनी चूत में सनसनी महसूस की.
"बेटा !! बोर हो गये होगे, है ना ?" नीमा ने अथितिकक्ष में अपने आने की उपस्थति दर्ज़ करवाते हुए पुछा.
"नही आंटी !! मैं तो ज़रा भी बोर नही हुआ" निकुंज जवाब देता है. अपनी आंटी के नंगे बदन का चक्षु-चोदन कर वह धन्य जो हो गया था.
"अच्छा तो तुमने फ्लॅट देखा ?" आख़िर वो क्षण भी आ गया, जब वह निकुंज के सोफे के विपरीत रखे सोफे पर निश्चिंत-ता पूर्वक बैठ जाती है और उसके प्रथम दीदार के उपरांत ही निकुंज के आकड़े लौडे का सूजा सुपाडा, गाढ़े रस की बूंदे उगलने लगता है.
अति-उत्तेजित अवस्था में भी निकुंज खुद पर सैयम बनाए रखने को पूरा प्रयास-रत था और फॉरन अपनी आँखों का जुड़ाव नीमा के कामुक यौवन से हटा कर, कमरे में स्थापित अन्य वस्तुओ से जोड़ देता है.
"पूरा फ्लॅट देख लिया ?" नीमा ने आश्चर्यचकित होने का भ्रम पैदा किया. निकुंज की नजरो से विमुख होने के परिणाम-स्वरूप वह खुल कर उसके पाजामे के ऊपर उभरे तंबू का अवलोकन करने में खो सी जाती है.
"हां बिल्कुल !! इस तरफ बच्चो का कमरा, उस तरफ स्टोर रूम, यहाँ किचन और वहाँ बाल्कनी की गॅलरी" निकुंज उसकी हैरानी को मिटाने का प्रयत्न करता है "वहाँ आप का बेडरूम, कुच्छ चेंजस ज़रूर हुए हैं मगर मुझे सब याद है आंटी" कहते हुए वह मुस्कुराता है.
"ओह निकुंज !! यह तुमने क्या किया. मेरे बेडरूम के अंदर तो मैं चेंज कर रही थी और तुमने" अचानक से नीमा ने विस्फोट किया और झुटि लज्जा का सच्चा प्रदर्शन करते हुए, अपने खुले मुख पर हाथ रख वह निकुंज का चेहरा घूर्ने लगती है.
"न .. नही आंटी !! ऐसा कुच्छ भी नही हुआ" वह घबराया. नीमा के काल्पनिक तुक्के द्वारा उसकी चोरी पकड़े जाने के भय से, उसकी ज़ुबान लड़खड़ा उठती है.
"कम से कम झूठ बोलना तो सीख लो निकुंज !! मैने तो यह सोच कर बेडरूम का गेट अंदर से लॉक नही किया था कि तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त के बेटे हो मगर तुमने तो मेरे विश्वास की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी निकुंज. अब मैं कम्मो को कैसे अपना मूँह दिखा सकूँगी" ड्रामा क्वीन नीमा सिसकी और अपनी दोनो अध-नंगी टाँगो को सोफे के ऊपर रख, घुटनो पर अपना सर झुका कर बैठ जाती है. उसकी नी'स तो आपस में जुड़ी हुई हैं मगर तलवे एक-दूसरे से काफ़ी दूर.
नीमा आंटी की यह नयी पोज़िशन देख, गान्ड फटने के बावजूद निकुंज को अपने लौडे में अविश्वसनीय कठोरता महसूस होती है. छोटी कच्छि नुमा गुलाबी कॅप्री उसकी आंटी के विशाल वा फैले हुए चूतडो की गहरी दरार में घुस कर, लगभग गायब सी हो गयी थी.
"आंटी को मनाना पड़ेगा, वरना बात मोम को पता चल जाएगी और फिर" निकुंज भविश्य के कयास लगाने लगता है "ग़लती क़ुबूल करने मैं ही भलाई है, हो सकता है आंटी मुझे माफ़ कर दें और फिर मैने जान-बुझ कर तो कुच्छ किया नही. वे भी तो इसमे बराबर की हिस्से-दार हैं" ऐसा सोच कर फॉरन निकुंज अपने सोफे से उठ खड़ा हुआ और नीमा के सोफे के ठीक सामने पहुच कर, नीचे फर्श पर बैठ जाता है.
"आइ'आम सॉरी आंटी" वह लो वाय्स में बोला मगर नीमा कोई जवाब नही देती "आंटी !! सुनिए तो सही" उसने दोबारा कहा. फर्श पर बैठे होने के कारण उसका चेहरा आंटी के नग्न सम्तुल्य चूतडो के बेहद करीब था.
एक तरफ निकुंज उसे आवाज़ देता जाता है और दूसरी तरफ रोम-रहित उसकी लंबी मांसल टाँगो का बारीकी से मुआयना भी करता है. द्रश्य की मनमोहकता इतनी प्रबल थी कि उसके काँपते होंठ बरबस आंटी के अविस्मरणीय चूतडो के पाट का रसीला चुंबन लेने को तरस रहे थे.
"आंटी" वह तड़प कर बोला "हां मैने बेडरूम के अंदर झाँका !! मगर आप ही ने तो कहा था, मैं फ्लॅट देख सकता हूँ" शब्दो से सच बयान करने के पश्चात वह अपना हाथ नीमा के झुके दाहिने कंधे पर रख देता है.
"मत छुओ मुझे और मत कहो आंटी" नीमा ने कंधा उचकाया, जैसे वह बहुत क्रोध में हो "मैने फ्लॅट देखने को ज़रूर कहा था लेकिन तुम तो मुझे कपड़े बदलते हुए देखने लगे और अब बेशर्मी से बता भी रहे हो कि तुमने मुझे नेकेड देखा" वह अपना सर घुटनो से उपर उठा कर बोलती है और उसका नाटकीय चेहरा बेहद उदास था.
"आप को रूम का गेट लॉक करना चाहिए था आंटी वरना मुझे कैसे पता चलता, अंदर आप किन हलातो में हो" निकुंज लगातार दलीलें पेश करता जा रहा था मगर नीमा तो जैसे कुच्छ भी सुनने को तैयार नही थी.
"मुझे कामिनी को तुम्हारी जाहिल करतूत बतानी है" वह गर्जि "मैं अभी उसे कॉल करती हूँ" घबराकर निकुंज फॉरन उसके निच्छले नंगे धड़ से बुरी तरह लिपट जाता है.
सोफे से उठने की झुटि चेष्टा करती नीमा के प्रयास को पूर्ण रूप से विफल करते हुए निकुंज की मजबूत व वृहद बाहें, उसकी सुडोल जाँघो को अपनी जाकड़ में कस चुकी थी और उसकी पत्थर समान छाति आंटी के घुटनो से चिपक जाती है.
निकुंज की यह हरक़त देख एक पल को नीमा भी सकते में आ गयी मगर ज्यों ही उसे अहसास हुआ "जीत का पलड़ा तो मेरी तरफ है" बहरूपी छवि की उस्ताद वह शातिर नारी अपने यौवन से भरपूर अध-नंगे बदन में अविश्वसनीय कामुक लचक लाने लगती है.
"छोड़ो मुझे" वह दोबारा चीखी लेकिन मन ही मन नौजवान निकुंज के असीम बल का गुणगान किया. नीमा के लगातार हिलने-डुलने के प्रभाव से निकुंज के हाथ भी निरंतर उसकी गोरी बाल-रहित टाँगो पर फिसलते जा रहे थे.
"आंटी !! सुनिए तो सही" उसने कहा और साथ ही नीमा के मचलते शरीर में स्थिरता लाने हेतु, अपने हाथ के पंजे से उसकी बाईं जाँघ अत्यंत कठोरता से भींच लेता है, जिसमें कुदरत ने ठूंस-ठूंस कर माँस भरा था.
"आह" हल्की पीड़ा और पराए मर्द का ज़्यादती स्पर्श. इस मिले-जुले संगम से ओत्पोत नीमा को महसूस होता है, जैसे निकुंज ने जाँघ की जगह उसकी चूत को अपनी विशाल मुट्ही में कस लिया हो. जाँघ के जिस स्थान पर उस जवान मर्द के हाथ की मजबूत पकड़ थी, वा नीमा की अति-संवेदनशील योनि से महज 5 या 6 अंगुल नीचे होगा.
"मैं कहती हूँ छोड़ो मुझे, वरना अंजाम बुरा होगा" अपनी आंटी की झुटि धमकी को सच मान कर निकुंज ने फॉरन उसे अपनी बाहों की जकड़न से आज़ाद कर दिया मगर असलियत में वह नही चाहती थी निकुंज ऐसा करे और इसके पश्चात ही उसे अपनी ग़लती पर पछतावा होने लगता है.
"मुझे कुच्छ बोलने का मौका तो दीजिए" निकुंज ने अपना सर नीचे झुका कर मिन्नत की "बिल्कुल नही दूँगी !! बच्चू" शरारती मुस्कान बिखेरती नीमा मन ही मन खुद से कहती है और अब आगे उसे क्या करना है, यह प्लान भी उसके कमीने दिमाग़ में सेट चुका था.
"उफ़फ्फ़ !! तुमने तो मुझे नोच लिया" नीमा के नये ड्रामे का आगाज़ हुआ और उसके यह लफ्ज़ कान में सुनाई पड़ते ही निकुंज ने हड़बड़ा कर उसकी ओर देखा.
"ओह्ह्ह !! कहीं जानवर तो नही हो ना तुम ?" नाटकीय अंदाज़ में दर्द के अनेको भाव चेहरे पर इकट्ठे कर, अपनी जाँघ के उस हिस्से को जिसे थोड़ी देर पहले निकुंज के पंजे ने जकड़ा था, सहलाती हुई वह उससे शिक़ायत करती है.
"सॉरी आंटी !! लाइए दिखाइए ज़रा" माफी माँगते हुए निकुंज बोला और इस बार नीमा ने भी कोई विरोध नही जताया, बल्कि खुद अपनी बाईं टाँग आयेज बढ़ा कर उसके हाथो के सुपुर्द कर दी.
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सोफे की उँचाई पर बैठी नीमा की टाँग को सहारा देने के उद्देश्य से, फर्श की नीचाई पर बैठा निकुंज उसकी पिंडली थाम लेता है और इस वजह से उसकी आंटी की चोटिल जाँघ, उसकी आँखों के बेहद करीब आ जाती है. वाकाई जाँघ का वह हिस्सा लाल था जो शायद नीमा की गोरी रंगत और निकुंज की मर्दानी ताक़त का मिक्स नतीजा था.
"देखो ना निकुंज !! कितना रेड हो गया यहाँ" रुआसी आवाज़ में नीमा बोली. अपनी सबसे अच्छी दोस्त के जवान बेटे को, खुद के आध-नंगे यौवन का यूँ दीदार करते देख उसकी काम-उत्तेजना में तेज़ गति से वृद्धि होने लगती है.
"आंटी !! मैं अपनी ग़लती पर बहुत शर्मिंदा हूँ" निकुंज ने अफ़सोस जताया और बिना नीमा की आग्या के, उसकी जाँघ की चोटिल सतह पर अपने दूसरे खाली हाथ की उंगलियों का मुलायम घर्षण देना शुरू कर देता है.
चूँकि नीमा, निकुंज की अपेक्षा ज़्यादा समय से उसे फॅंटसाइज़ कर रही थी तो जल्द ही उसकी आँखें, निकुंज की लंबी उंगलियों की कोमल सहलाहट के एहसास मात्र से बंद होने के कगार पर पहुचने लगती हैं और तत-पश्चात पूर्ण रूप से मूंद जाती हैं.
वहीं निकुंज का ध्यान उसकी आंटी की जाँघ पर से तो कब का हट चुका था. उसकी बाज़ सी दृष्टि अब नीमा की गुलाबी कॅप्री में छुपि, उसकी फूली हुई चूत के उभार पर टिकी थी और कॅप्री के नीचे आंटी ने कच्छि नही पहनी है यह भी वह पहले से ही जानता था.
अचानक उसे नीमा की टाँग में कड़कपन आता महसूस हुआ, लगा जैसे उसका शरीर हल्का सा आकड़ा हो और इसके साथ ही निकुंज के दिल में जो ख़ौफ़ घर किए बैठा था, धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है.
"चान्स लेने में हर्ज़ नही और बच्चे भी बाहर हैं" उसकी सोच का घोड़ा लंबी छलान्ग मारते हुए दौड़ पड़ा और इसके उपरांत वह चोटिल जाँघ के उपचार रूपी नाज़ुक सहलाहट को सख़्त मालिश में तब्दील कर देता है.
नीमा के बंद नयन और चढ़ि साँसे यह स्पष्ट करने को काफ़ी थी कि वा कामुकता के शुरूवाती ज्वर में तपने लगी है और इसी चीज़ का फ़ायदा उठाते हुए जल्द ही निकुंज का हाथ उसकी जाँघ के चोटिल प्रदेश से ऊपर की दिशा की ओर फिसलता हुआ, उसकी अन्द्रूनि जाँघ की पूरी सतह को घेर चुका था.
"उम्म" इकायक नीमा की जीभ उसके लगातार सूखते जा रहे होंठो को गीला करने के उद्देश्य से बाहर निकल आती है और तब तक निकुंज भी अपनी उंगलियों की दस्तक उसकी कॅप्री के अंदर पहुचा देता था.
"ओह्ह कितना गरम लग रहा है यहाँ" निकुंज का अगला कदम बेहद घातक हुआ जिससे फॉरन नीमा की आँखें खुल जाती हैं.
"निकुंज" वह चिल्ला उठती है.
यह एक ऐसी सिचुयेशन थी जिसको शब्दो में बयान कर पाना बहुत कठिन हो जाता है.
निकुंज का हाथ उसकी नीमा आंटी की कॅप्री के भीतर, उसकी अंगार सी धधकति चूत के काफ़ी करीब है और हैरान नीमा उसके चेहरे को ऐसे देख रही है जैसे उसके सामने कोई भूत बैठा हो.
पूरे अथितिकक्ष में गहेन सन्नाटा परसा हुआ है. सिवाए उन दोनो के दिल की धड़कनो के कहीं से कोई शोर सुनाई नही पड़ रहा था.
"रुक क्यों गये ?" नीमा का अजीबो-ग़रीब सवाल उस शांति को भंग करता है "वह काम पूरा करो ना, जिसकी आशा लेकर तुम यहाँ आए थे" उल्टा चोर कोतवाल को डान्टे वाक़या का बलात्कार करती नीमा ने इस बार भी सारे आरोप निकुंज के मत्थे जड़ दिए.
वहीं निकुंज जो बचाव के लिए तैयार है, अपने मन में भय रूपी राक्षस का पुनः प्रवेश वह वर्जित कर चुका था.
"हर बार ग़लती आप की रही है आंटी" उसने नीमा को चौंकाया "पहले बेडरूम और अब इस बात के लिए भी आप मुझे ही दोष दे रही हो" कह कर वह अपना हाथ उसकी कॅप्री से बाहर खीचता है और अपनी वे उंगलियाँ, जिन पर नीमा की उत्तेजित चूत का गाढ़ा रस लगा हुआ था. सबूत के तौर पर पेश करते हुए उसके चेहरे के समीप ले जाता है.
"यह भी मेरी ग़लती है ना ?" बोलने के उपरांत ही वह अपनी उंगलियाँ, अपने मूँह में डाल, अपनी अधेड़ उमर की आंटी की जवानी का स्वाद चखने लगता है "ह्म्म !! आंटी आप बहुत स्वादिष्ट हो" मुस्कुरा कर निकुंज ने उसे आँख मारी.
अपनी दोस्त के बेटे की यह अश्लील हरक़त नीमा को सिर्फ़ शर्मसार ही नही करती बल्कि उसके तंन की आग को और भी कहीं ज़्यादा भड़का देती है. निकुंज की आँखों के सामने बैठे रहना उससे सहें नही हो पाता और वा सोफे से उठ कर खड़ी हो जाती है.
"बेटा !! यह ग़लत है" वह हौले से फुसफुसाई "क्या ग़लत है आंटी ?" प्रश्न पुछ्ते हुए निकुंज भी फर्श से उठ खड़ा हुआ.
"वही जो तुम सोच रहे हो, ऐसा कुच्छ भी नही है" कह कर नीमा अपने बेडरूम की ओर जाने की चेष्टा करती है मगर फॉरन निकुंज उसे पिछे से कस कर पकड़ लेता है.
"आंटी !! मैं कहाँ कुच्छ सोच रहा हूँ. सोच तो आप रही थी और तभी आप गीली हो गयी" एक हाथ नीमा के उभरे हुए पेट पर और दूसरे को उसके गले में डाल निकुंज उसके के पिच्छवाड़े से किसी जोंक की भाँति चिपक जाता है और साथ ही पाजामे में तना उसका विशाल लॉडा भी अपने आगमन की सूचना नीमा के मांसल चूतडो पर चुभ कर देने लगता है.
"उफ़फ्फ़ निकुंज !! छोड़ो मुझे, बेटा तुम यह ठीक नही कर रहे" नीमा मछली मगर उसकी पकड़ से छूटने का कोई अतिरिक्त प्रयास नही करती है. हलाकी उसके दिल में यह टीस ज़रूर उठी, वह कम्मो को धोखा दे रही है परंतु खुद उसके मुख से ही तो नीमा ने, उसके पुत्र के मर्दाने अंग की महिमा का बखान सुना था.
"ठीक से तो कर रहा हूँ आंटी. क्या आप को महसूस नही हो रहा ?" निकुंज ने अपने लंड का दबाव उसके चूतडो पर बढ़ाते हुए पुछा.
"ओह्ह्ह निकुंज !! तुम मेरी दोस्त के बेटे हो, अपनी आंटी का कुच्छ तो लिहाज करो" एहसास मात्र से नीमा की ज़ुबान लड़खड़ा उठी. गर्दन पर निकुंज की गरम सांसो के असन्ख्य झोंके उसे अति-प्रबलता से उन्मान्द भरी सिसकारियाँ लेने को मजबूर कर रहे थे.
"अब तक आप का लिहाज ही तो किया है और तभी आप की गीली चूत के इतने करीब पहुचने के बावजूद मैने उसे टच नही किया" निकुंज शरारत से बोला "आप बेडरूम में नंगी खड़ी थी मगर क्या मैने कोई छेड़-छाड़ की ?" यह सवाल पुच्छ तुरंत वह नीमा को अपनी पकड़ से मुक्त कर देता है.
अपनी निर्लज्जता के बारे में सुनने के पश्चात नीमा वहीं गढ़ कर रह जाती है जहाँ वह खड़ी थी. खुला निमंत्रण मिलने के उपरांत भी निकुंज ने अपनी आंटी का कोई ग़लत फ़ायदा नही उठाया था. उसके द्वारा कही गयी दोनो बातें 100% सत्य थी.
"आंटी" नीमा को यूँ शांत खड़ा देख निकुंज ने उसे पुकारा तो वह अपनी गर्दन हल्की सी पिछे घुमा कर, तिर्छि निगाहों से उसके चेहरे की ओर देखती है.
"मैने अपना लोवर उतार दिया है, बहुत परेशानी हो रही थी मुझे" विस्फोट करते हुए निकुंज बोला और फॉरन नीमा के कानो में उसकी दोस्त कम्मो के यह लफ्ज़ गूँज उठे "मेरे बेटे का लंड बहुत बड़ा है"
नीमा का धैर्य जवाब देने लगता है "क्या कम्मो सच कह रही थी ?" सहसा उसके गोल मटोल मम्मो के चुचक बेहद तन कर खड़े हो गये और वह उसी स्थिति में निकुंज की टाँगो की जड़ से अपनी आँखें जोड़ने से, खुद को रोक नही पाती है. निकुंज लाइट ग्रीन पोलो टी-शर्ट और वाइट फ्रेंची पहने उसके ठीक पिछे खड़ा था.
"आहह" नीमा सीत्कार कर उठी "ये .. ये तुमने क्या किया, वापस पहनो अपना लोवर" फ्रॅंची में बने तंबू को घूरते हुए उस सेक्स की प्यासी, अति-उत्तेजित दूसरी मा के शब्दो और उसकी ज़ुबान का कहीं से कहीं तक कोई मेल नही बैठ पा रहा था. वह खुल्लम-खुल्ला लंड की आकृति को ऐसे निहार रही थी जैसे उसके काम-रोग का बस वही एक इलाज हो.
"आप को पसंद आया, जान कर खुशी हुई" बेशरम निकुंज मुस्कुराया "चाहो तो छु कर भी देख सकती हो" नीमा को चकित करते हुए वह उसका दाहिना हाथ पकड़ कर अपनी फ्रांचिए के फ्रंट उभरे पार्ट पर रख, ताक़त से दबा देता है.
"ओह्ह आंटी !! आप के हाथ का स्पर्श कितना मजेदार है " अति-आनंद की वजह से निकुंज काँप उठा और नीमा की चूत में सिरहन दौड़ जाती है. दोनो के झुलसे बदन की जायज़ माँग अपना सर ऊपर उठा चुकी थी.
नीमा अपना हाथ निकुंज के लंड से हटाने के भरकस प्रयास में जुटी हुई है मगर निकुंज उसे ऐसा करने नही देता "बेटा !! यह ग़लत है, मैं कामिनी को धोखा नही दे सकती" वह बोली मगर निकुंज ने उसके कथन को अनसुना कर, अपना दूसरा हाथ फॉरन उसके गाल पर फेरना शुरू कर दिया.
"धोखे वाली तो कोई बात है ही नही आंटी" उसने प्यार से नीमा की सुर्ख लाल आँखों में झाँका "हम कुच्छ ग़लत नही कर रहे, बस आप के कोमल हाथ की सहलाहट से मेरे लंड को राहत मिल जाएगी. प्लीज़ मना मत कीजिए" लंड शब्द का स्पष्ट उच्चारण निकुंज बिना किसी अतिरिक्त झेप के कर बैठता है और जिसे सुनकर नीमा की लज्जातरुण पलकें दोबारा बंद होने के कगार पर पहुचने लगती हैं.
"यह संभव नही निकुंज !! मानो मेरी बात, मैं दो जवान बच्चो की मा हूँ" नीमा की सोच दो भागो में बँट चुकी थी. एक तरफ वह अपने उत्तेजित बंदन की ज़रूरत को नज़र-अंदाज़ नही कर पा रही थी और दूसरी तरफ मान मर्यादा, संकोच, बदनामी, स्त्री धर्म उसे प्रेरित कर रहा था कि वह अपने बहेकते कदम अत्यंत-तुरंत पिछे खीच ले.
इसका मुख्य कारण था निकुंज का पराया होना. अपने पुत्र विक्की के साथ अनाचार स्थापित करने में सफल होने वाली नारी नीमा ने सारे प्रयोग स्वयं किए थे. विक्की तो मात्र उसके हाथो की कठपुतली था और जो पाप उनके दरमियाँ पिच्छले एक वर्ष से लगातार चल रहा है, वह भी घर की चार-दीवारी के भीतर तक ही सीमित था.
"फिकर ना करिए आंटी !! मैं हद पार नही करूँगा" वह आश्वासन देता है और नीमा के हाथ पर दबाव डाल अपना कड़क लॉडा पंप करने लगा. हैरत से नीमा का मूँह खुल गया, उसे महसूस हुआ जैसे उसने कोई ट्यूब-लाइट बराबर मोटी वास्तु पकड़ ली हो, आज पहली बार वह लंड की अद्भुत सख़्त-ता से परिचित हो रही थी.
"निकुंज !! मुझे शर्म आ रही है बेटा" वह अपने गाल और गर्दन पर रेंगती निकुंज की उंगलियों की गुदगुदाहट से त्रस्त हो कर बोली.
"तो क्यों ना इस शर्म को मिटा दिया जाए" निकुंज तो जैसे मन बना चुका था की आज वह नीमा को चोद कर ही वहाँ से जाएगा. उसने फॉरन फ्रॅंची के कोने से अपने लंड का सूजा सुपाडा बाहर निकाल दिया "आंटी !! अब आप दोनो आपस में दोस्ती कर सकते हो" नीमा के हाथ को अपने नंगे लंड पर फेरते हुए वह बोला.
"मुझे .. मुझे नही करनी कोई दोस्ती-वोस्ती" अचानक हुए हमले से नीमा की आवाज़ में कंपन आ जाता है. लंड की गर्माहट का कोई अंत ना था.
"उफ़फ्फ़ !! तुम समझते क्यों नही" वह अपना पहला हाथ छुड़ाने के उद्देश्य से अपना दूसरा हाथ तेज़ गति से लंड की दिशा में नीचे की ओर लाती है और तभी निकुंज भी अपना दूसरा हाथ जो नीमा की गर्दन पर था, धमकी स्वरूप अपनी आंटी के दाहिने माममे को पकड़ने के लिए उसकी गर्दन से नीचे खिसकाने लगता है.
"बहसरम !! हाथ हटाओ अपना" क्रोध-वश नीमा के शब्द फूटे "मैने तो कुच्छ नही प्कड़ा, लंड तो आप के हाथ में है आंटी" चतुर निकुंज ने शरारत से कहा और नीमा अपने ही कथन पर शर्मसार हो गयी.
"वैसे पुच्छना तो नही चाहता मगर पुच्छे बिना रहा भी नही जाता" निकुंज ने नीमा का ध्यान अपनी ओर केंद्रित किया "ना तो आप ने कॅप्री के अंदर कच्छि पहनी है और ना ही टॉप के भीतर ब्रा. क्या मैं इसकी वजह जान सकता हूँ?" निकुंज द्वारा अश्लील बातों का सिलसिला ज़ारी रहा.
"मेरे मर्ज़ी, मेरा घर. मैं चाहे नंगी घूमू, तुम्हे क्या आपत्ति है ?" नीमा चिल्लाई. वह क्या कह रही है, जैसे उसे इसकी कोई प्रवाह ही नही थी.
"आंटी !! कितना झूठ बोलोगि, मान क्यों नही लेती कि आप मुझसे चुदने के लिए तड़प रही हो" निकुंज हंसा "मेरी और आप की मंज़िल एक ही है, आप इसे स्वीकार कर लो" इतना कह कर निकुंज ने बलपूर्वक नीमा की ठोडि को पकड़ा और अपना चेहरा उसके सुंदर एवं प्रभाव-शाली मुखड़े के बेहद समीप ले जाता है.
निकुंज की मंशा समझ खुद ब खुद नीमा की जीभ उसके सूखे होंठो को तर करती है और इसके पश्चात ही निकुंज अपने काँपते होंठो का मिलन चन्द लम्हे के लिए उसके गीले होंठो से करवा कर वापस उन्हे पिछे खीच लेता है.
"उम्म्म" नीमा ने मस्ती में भर कर अंगड़ाई ली, उसके चंचल नयन अब पूर्ण-रूप से बंद हैं और इसके नतीजन कब वह अपनी मन-मर्ज़ी से निकुंज का लंड हिलाने लगती है, उसे पता भी चलता.
निकुंज दोबारा अपने होंठ आगे बढ़ा कर उसके होंठो को कोमलता से चूस्ता है और कुच्छ सेकेंड्स के उपरांत फॉरन पिछे हटा लेता है. इस विचित्र क्रिया का दर्ज़नो बार उपयोग कर उसे अपनी आंटी की अधीरता की परीक्षा लेने में बहुत आनंद मिल रहा था.
"मैं आप के यह खूबसूरत होंठ अपने लंड पर महसूस करना चाहता हू" अपनी लालसा का ज़िक्र करते हुए उसने अगला चुंबन नीमा के बाएँ कान के ठीक नीचे किया और जिसके प्रभाव से तत्काल नीमा की बंद पलकें खुल गयी "बोलो ना आंटी !! मेरा लंड चुसोगी ?" पुनः उसने स्पष्ट रूप से पुछा.
नीमा गहेन कामुकता के शिखर पर पहुच चुकी थी, उसकी सकुचाती चूत से अनियंत्रित रस रिस कर, उसकी गुलाबी कॅप्री को भिगो रहा था. उसके दिल की धड़कन तेज़ी से बहुत तेज़ होती जा रही थीं और अखंड बेचैनी से उसका बदन तप रहा था.
अत्यंत निराशा, क्रोध और काम तीनो का मिश्रण एक साथ वह सह नही पाती "उफ़फ्फ़ निकुंज !! मुझे सब मंज़ूर है. मैं चुसुन्गि, ज़रूर चुसुन्गि" नीमा रुआसी हो कर निकुंज के चौड़े सीने से लिपट जाती है.
मानसिक एवं शारीरिक समर्पण कर चुकी नीमा, निकुंज की मजबूत छाति में अपना शर्म से सराबोर लाल मुखड़ा छुपाये ज़ोर-ज़ोर से हाँफ रही थी. उसके गोल मटोल मम्मो का आकार निरंतर उसकी फूलती सांसो के उतार चढ़ाव से घट-ता बढ़ता जा रहा था और उसके टॉप के अंदर ब्रा का कोई आधार मौजूद ना होने से उसके तने चुचको के भेदन की असहनीय वेदना से निकुंज के लंड में अकल्पनीय विकरलता आने लगी थी.
"आंटी !! कब से मेरा लंड आप के कोमल होंठो के अंदर प्रवेश करने की राह देख रहा था" निकुंज उसकी ठोड्डी को अपने हाथ की प्रथम उंगली से ऊपर उठाते हुए, अपने चेहरे के सम्तुल्य ला कर कहता है "उसे आप के मूँह से एक बेहतरीन चुसाई की उम्मीद है" वह उसकी कजरारी आँखों में झाँक कर बोला.
"निकुंज !! तुम बेहद घटिया और गंदे किसम के लड़के हो" नीमा ने उसकी छाति में मुक्का जड़ा "अपनी मा की उमर की औरत से ऐसी अश्लील बातें करने में तुम्हे शरम आनी चाहिए" वह जान-बूझ कर अपने कथन में मा शब्द का उच्चारण करती है और झूठे क्रोध का नाटक करती हुई, लजा भी जाती है.
"उफ़फ्फ़ आंटी !! जल्दी मेरा लंड चूस कर मुझे इस भयानक दर्द से निजात दिलवाए" नीमा जो चाहती थी वही हुआ. खुद की मा का जीकर सुनते ही निकुंज के टट्टो में अचानक से अविश्वसनीय उबाल आ जाता है और उसके लंड का मोटा सुपाडा अत्यधिक फूल कर, गाढ़ा रस उगलने लगता है.
लंड की संपूर्ण विशालता को देखने के लिए तो नीमा भी कब से तड़प रही थी. अपनी चूत में मचती कुलबुलाहट के और अधिक आघात से पाना अब उसके बस में नही था. उसने एक अंतिम नज़र निकुंज के धैर्य खोते चेहरे पर डाली और इसके पश्चाताप ही वह उसके लंड पर स्वेक्षा से अपने हाथ का एकाधिकार कर लेती है.
"आह" दोनो कराह कर उठे. फॉरन नीमा ने निकुंज के भारी-भरकम शरीर को उसके लंड की पकड़ से खीचना शुरू किया और जिस सोफे पर वह पूर्व में बैठा हुआ था, बड़े कामुक अंदाज़ में धकेल कर उसे नीचे गिरा देती है.
"निकुंज" वह उसकी टाँगो के बीचो-बीच अपने घुटनो पर बैठ कर बोली "बेटा !! मैं तुम्हारी मा कामिनी की सबसे अच्छी दोस्त हूँ और क्या यह जानते हुए भी तुम अपना लंड, अपनी नीमा आंटी से चुसवाना चाहोगे ?" विस्फोटक प्रश्न पुछ्ते हुए वह अपने दोनो हाथो की उंगलियाँ निकुंज की फ्रेंची उतारने के उद्देश्य से उसकी एलास्टिक के इर्द-गिर्द फसा देती है.
नीमा का विध्वंशक सवाल और लंड शब्द के स्पष्ट उच्चारण को सुन कर फॉरन निकुंज अतीत की एक सुनहरी याद में खो जाता है. कुच्छ ऐसा ही द्रश्य उसकी आँखों के सामने नृत्य करने लगता है, जब उसकी सग़ी मा उसके सोए लंड को खड़ा करने के उपचार हेतु, उसे अपने मूँह में लेकर चूसने को विवश हो गयी थी.
"अगर तुम सच में ऐसा चाहते हो कि मैं तुम्हारा लंड चुसू तो उसके लिए तुम्हे अपनी फ्रेंची उतारने में मेरी मदद करनी होगी" निकुंज को उस रंगीन सपने से बाहर ला कर नीमा बोली. उसका आशय समझते ही खुद ब खुद निकुंज की गान्ड हवा में ऊपर उठ जाती है और क्षण मात्र का समय व्यर्थ किए बगैर नीमा के अनुभवी हाथ फ्रेंची को उसके शरीर से अलग कर देते हैं.
"उफफफफ्फ़" निकुंज की टाँगो के मध्य में बैठी नीमा के सुंदर नयन और उसका मूँह, दोनो हैरत से फॅट पड़ते हैं जब वह उसके विशाल एवं तने लौडे को ठीक उसके पेट से चिपका पाती है. लंड की अत्यंत गोरी सतह पर स्पष्ट रूप से दिखाई देती नीली नसों के तनाव से वह बुरी तरह झटके खा रहा था और नीमा के आंकलन के मुताबिक उसकी मोटाई, स्वयं उसके हाथ की कलाई बराबर जान पड़ रही थी.
नीमा के चेहरे पर उभरे विचित्र भाव को देख कर निकुंज मंन ही मंन अपने लंड की विशेषता पर गर्व करता है. सग़ी मा कम्मो द्वारा तारीफ़ में मिले वे शब्द "इसकी लंबाई बहुत अच्छी है निकुंज, काफ़ी कम मर्दो के पास इतना विकराल लिंग होता है" उसके कानो में रस घोलने लगते हैं.
"मैं कितना लकी हूँ जो मुझे आप जैसी ब्यूटिफुल एंड सेक्सी औरत का प्यार मिल रहा है" निकुंज की आवाज़ नीमा को गहरी नींद से वापस वर्तमान में खीच लाती है. खुशामद तो महज एक बहाना था, उसे तो अपनी आंटी को उनका लक्ष्य याद दिलाना था.
"निकुंज !! वाकाई तुम बहुत बेशरम लड़के हो और जाने क्यों मैं भी तुम्हारे साथ इस बेशर्मी की हिस्सेदार बनने जा रही हूँ" नीमा ने नखरीले अंदाज़ में कहा और कहने के उपरांत ही वह उस कठोर लंड को अपनी छोटी सी दाईं मुट्ठी में समाने का असफल प्रयास करती है.
"ओह्ह्ह यस आंटी !! मैने पहले भी कहा था, आप के हाथ का स्पर्श कितना मजेदार है" निकुंज आनंद स्वरूप सोफे पर उच्छल पड़ता है. वहीं नीमा की हालत भी कुच्छ कम खराब नही है, अत्यधिक कामोत्तजना मैं उसकी चूत कामरस से भीग कर उसकी गुलाबी कॅप्री में काँप रही थी.
"बदतमीज़ कहीं का" ताना मारती नीमा उसका लंड सहलाना शुरू कर देती है. लंड की अति-मुलायम चमडी पर उसका कोमल हाथ बड़ी आसानी से फिसल रहा था और उसकी अखंड गर्माहट से वह अचंभित होने लगी थी. जल्द ही लंड अपनी संपूर्ण विशालता को प्राप्त कर जाता है.
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निकुंज बड़े गौर से अपनी आंटी के सुंदर चेहरे को देखने में मग्न है. नीमा अनेको प्रकार के मूँह बनाकर अपना हाथ उसके विकराल लंड पर जितनी तेज़ी से वह कर सकती थी, ऊपर-नीचे कर रही थी. सहसा दोनो की आँखें मिल जाती हैं, निकुंज फॉरन शरारत भरी मुस्कान बिखेर देता है और नीमा के गाल शर्म से लाल हो उठते हैं.
"लगता है काफ़ी गहरी दोस्ती हो गयी है आप दोनो में" निकुंज का इशारा अपने खड़े लंड की ओर था और यह बात वह ठीक अपनी आंटी की आँखों में झाँक कर कहता है, जिसे सुनकर नीमा भी खुद को मुस्कुराने से नही रोक पाती. अब उनके दरमियाँ काफ़ी खुला पन आ चुका था.
"तुमने ही मुझे ऐसा करने पर मजबूर किया है निकुंज" नीमा ने अपनी उंगलियाँ उस झटके खा रहे लंड की गोलाई पर कठोरता से कसते हुए कहा और अपनी कलाई उसकी जड़ तक ले गयी. फिर कुच्छ लम्हो के लिए वह अत्यंत कामुकता से उस फूले हुए सुपाडे को निहारती है, जो तरल चिपचिपे पदार्थ से भीगा हुआ था. उत्तेजना के ज्वर से सुपाडे की रंगत हल्के बेन्गनि रंग की हो गयी थी और वह किसी छोटे आलू-बुखारे समान नज़र आ रहा था.
नीमा की चंचल आँखों में कयि इक्षाएँ जन्म ले चुकी थी और फिर वह काम-लूलोप, अनियंत्रित नारी अपने सर को नीचे की ओर लाती है और अपने होंठ उसके सुपाडे से चिपका देती है.
"उफ़फ्फ़" निकुंज तड़प उठता और उसकी आह के साथ ही नीमा ने अपनी लंबी जीभ बाहर निकालते हुए, अत्यधिक सिहरन से काँप रहे लौडे के सुपाडे पर उसे गोल-गोल घुमाने लगी. मर्दाने अंग की मादक सुगंध से नीमा के गुदा द्वार में कपकपि दौड़ गयी थी.
"बहुत, बहुत, बहुत मज़ा आ रहा है आंटी" निकुंज ने अपनी टी-शर्ट को उतार कर दूर उछाल्ते हुए कहा और फिर अपने दोनो हाथो से नीमा के खुले बालो का जूड़ा बना कर, उसके सर को अपने कंट्रोल में ले लेता है.
अपने शर्मनाक कार्य की इतनी मनमोहक प्रतिक्रिया से अभिभूत नीमा की जिह्वा बड़े उत्साह से, लंड की पूरी लंबाई को चाट रही थी और जल्द ही सुपाडे से लेकर टट्टो तक वह उसे अपनी थूक और लार से नहला देती है.
"क्या तुम्हे अच्छा लग रहा है निकुंज ?" लंड हिलाने की रफ़्तार को कायम रखते हुए नीमा ने पुछा. यही तो स्त्री गुण की प्रथम विशेषता है कि सब कुच्छ आँखों के सामने घटित होता देख कर भी उन्हे अपनी प्रशन्शा सुनने की तीव्र लालसा होती है "क्या तुम चाहोगे कि अब मैं तुम्हारे लंड को अपने मूँह के अंदर कर लूँ ?" वह अश्लीलता-पूर्वक प्रश्न करती है.
"हां हां आंटी !! मैं तो कब से यही चाहता हूँ" निकुंज उसके घने बालो से खेलते हुए चहका, उसके उन्माद की सीमा का तो कोई अंत ही ना था "मुझे बहुत खुशी होगी" वह धैर्य खोता जा रहा था.
नीमा ने अपनी कजरारी आँखों का जुड़ाव उसकी आँखों से जोड़ा और तत-पश्चात अपने होंठो को फाड़ते हुए स्वयं की थूक और कामरस के लेप से मिश्रित सुपाडा उन होंठो के भीतर प्रवेश करवा लिया. नीमा का दूसरा हाथ निकुंज के बड़े-बड़े टट्टो और उसकी काली घुंघराली झाटों को लगातार सहला भी रहा था.
इंच-इंच नीचे की ओर फिसलते नीमा के कोमल होंठ, सुड़कते हुए उस विकराल लंड को अपने छोटे से मूँह के अंदर समाने का प्रयत्न कर रहे थे. उसने कोशिश की, कि उसके दाँत लंड की मोटाई के आड़े आ कर उसकी मुलायम त्वचा पर रगड़ ना खाएँ और कुच्छ ही क्षण बाद उसे अपना मूँह उस अकडे लौडे से पूरा भरता हुआ महसूस होता है.
अपने सगे पुत्र विक्की का समूर्ण लंड अपने मूँह में समा लेने वाली उसकी पापिन मा नीमा, अभी अपनी दोस्त के बेटे का एक-चौथाई लंड भी बड़ी कठिनाई से अपने मूँह में निगल पाई थी "जाने कम्मो ने इसे कैसे चूसा होगा, वह भी अपनी पहली बार में" नीमा हैरत में भर कर सोचती है.
"ओह्ह्ह्ह आंटी !! चूसो, ज़ोर से चूसो और अंदर लो" निकुंज बुदबुदाता है और नीमा का सर शक्ति-पूर्वक अपने हाथो में जकड लेता है. उसकी इस हरक़त से कमोज्जित वह औरत उसके फड़फड़ा रहे विशाल लंड को बेहद कड़ाई से चूसना आरंभ कर देती है. अपनी खुली आँखो के सम्मोहन से वह निकुंज को अधिक और अधिक आनंद का एहसास करवा रही थी.
"स्लूरप्प्प स्लूरप्प्प" अपने होंठो के बल-स्वरूप नीमा अपना मूँह बड़ी तेज़ी से लंड पर पटक रही थी और जब वह उतनी ही रफ़्तार से वापस अपना मूँह ऊपर लाती तो उसके मूँह से संतुष्टि-पूरक सुड़कने की कामुक आवाज़ें भी उँची हो कर कमरे में गूंजने लगती.
"उफफफ्फ़ !! मैं .. मैं पागल हो जाउन्गा" अकल्पनीय सुख की प्राप्ति होने से निकुंज की आवाज़ में कंपन आने लगा "बस इसी तरह चूसो !! रुकना .. रुकना नही आंटी. आप बहुत अच्छे से लंड चूस्ति हो" वह चीख उठता है.
निकुंज द्वारा अपनी अश्लील, घ्रानित प्रशन्शा सुन कर नीमा की उंगलियाँ चुटकियों में उसके आकड़े लौडे की जड़ पर कस जाती हैं और फिर वह बड़ी प्रचंडता के साथ उसका सुपाडा चूस्ते हुए, लंड को मुठियाने लगती है. नीमा की पारंगत खुरदूरी जीभ भी अपने अनुभव का बखूबी इस्तेमाल कर रही थी और जो उसके मूँह के अंदर सुपाडे की नज़ाक सतह को बुरी तरह खरॉच रही थी, छील रही थी.
"ह्म्म्म !! स्लूरप्प्प .. स्लूरप्प्प !! " नीमा पुरज़ोर शक्ति लगाते हुए उस लंड को चूस रही है, अपने मुख की गति पर वह स्वयं हैरान है, अचंभित है " क्यों उसके मूँह से लंड सुड़कने की मादक आवाज़ें इतनी उँची और तेज़-तेज़ आ रही हैं, क्यों उसके मूँह के अंदर लार बनने की मात्रा में निरंतर वृद्धि होती जा रही है, क्यों वह इतनी तत्परता से लंड चूसने में मगन है. आख़िर क्यों ?" कुच्छ देर सोचने-विचारने के उपरांत उसे निकुंज का पराया होना ही इसका एक मात्रा उत्तर समझ आता है और वह अपने होंठो को और भी ज़यादा सख़्त बनाते हुए उन्हे लंड की अविश्वसनीय मोटाई पर कसने लगती है, तत-पश्चात फॉरन अपना मूँह लंड की जड़ तक पहुचने के असफल प्रयास में जुट जाती है.
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"उवाककककक !! " नीमा बुरी तरह चॉक हो गयी मगर उसने अपने मूँह से निकुंज के लंड को छोड़ना नही छोड़ा. वह पूरे आत्मबल से संपूर्ण विकराल लंड को एक ही बार में निगलने की व्यथा कोशिशें लगातार करती रही और उसके चॉक होने का सिलसिला भी ज़ारी रहता है.
"इश्ह्ह्ह आंटी !! रुकिये वरना मैं झाड़ जाउन्गा" निकुंज सिसकता है. अपनी आंटी के लाल गालो को शीघ्रता से फूलता व पिचकता देख वह सहन नही कर पाता और उसके मूँह की गर्मी से पिघलने लगता है. नीमा बड़ी तरलता से लंड को चूस रही थी और उसके होंठो की किनोर से रिस कर गाढ़ा लिसलिसा पदार्थ निकुंज के टट्टो को भिगो रहा था.
"उफफफ्फ़" अचानक निकुंज ने उसके सर को बेहद ताक़त से अपने लंड के ऊपर दबा दिया और नीचे से अपनी गान्ड उच्छालते हुए वह उसका मूँह बेरहमी से चोदने लगता है. जहाँ नीमा की हालत तो पहले से ही खराब थी, वहीं निकुंज के इस अप्रत्याशित हमले से उसकी साँसे पूरी तरह अवरुद्ध हो जाती हैं.
"एम्म एम्म !! उवाककककक !! एम्म" घुटि-घुटि ध्वनियों से नीमा ने निकुंज को अपनी परेशानी से अवगत करवाना चाहा मगर अपने मूँह का बचाव ना कर सकी. लंड का मोटा एवं सूजा सुपाडा उसके कंठ में फस गया था और उसकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं. वह बार-बस निकुंज की जाँघ पर अपने नुकीले नाखूनो से चींटी काट-ती रही लेकिन निकुंज पर तो जैसे उसका कोई असर ही नही पड़ता है.
"अहह आंटी" आख़िरकार निकुंज चीखते हुए नीमा की थोड़ी अपने टट्टो से चिपकाने में सफल हो ही जाता है और कुच्छ क्षण तक उस अकल्पनीय आनंद को महसूस करने के बाद, झटके से उसका सर अपने लंड से ऊपर उठा लेता है.
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"ओह .. ओह !! " पीड़ा मुक्त हो कर नीमा ज़ोर-ज़ोर से हाँफ रही है. उसका सर अब भी निकुंज के हाथो में है और वह अपनी आंटी की बंद पलकों से बहते आँसुओ को बड़े गौर से देख रहा था. नीमा के होंठो से लेकर उसकी थोड़ी, स्वयं की थूक और निकुंज के लंड के उत्तेजित सुपाडे द्वारा उगले रस से पूरी भीगी हुई थी.
"आंटी !! आप ठीक तो हो ?" बेवकूफी भरा प्रश्न पुछ्ते हुए निकुंज ने उसे झक-झोरा. चेहरे पर थाप देते हुए वह नीमा को वर्तमान में लाने की कोशिश करता है और कुच्छ लम्हे बाद उसकी आंटी अपनी बंद आँखें खोल लेती हैं.
"तुम .. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ?" होश समहालते ही नीमा क्रोध में भर कर निकुंज को डाँट-ती है "मैने पहले भी कहा था कि तुम एक घटिया और बेशरम किसम के लड़के हो" बोल कर वह उसके चेहरे को घूर्ने लगी.
हलाकी ग़लती निकुंज की थी और नही भी थी. नीमा जिस कामुक अंदाज़ में उसका लंड चूस रही थी, किसी भी मर्द का खुद पर से सैयम खो देना लाज़मी था मगर निकुंज को उस पर अपना बल प्रयोग नही करना चाहिए था क्यों कि वह तो स्वयं ही अपने पूरे जतन से निकुंज को सुख के शिखर पर पहुचने के भरकर प्रयास में जुटी रही थी.
"पूरे जानवर हो तुम" निकुंज का शर्मसार चेहरा देखते हुए उसने कहा "मगर .. मगर मुझे पसंद आए" यह विस्फोट करने के उपरांत ही नीमा खिलखिला कर उसकी गोद में बैठ जाती है.
"पल में तोला पल में माशा" सच-मच स्त्री के मन को कोई नही पढ़ सकता और उसमें भी मर्द ज़ात तो कभी नही. निकुंज जब से नीमा से मिला था तब से लेकर अब तक वह उसके दर्ज़नो रूप देख चुका था.
"क्यों बच्चू !! कहाँ खो गये ?" निकुंज को विश्वास दिलाते हुए की थोड़ी देर पहले उसने जो कुच्छ सुना वा 100% सत्य है, नीमा मुस्कुराइ "आंटी !! मैं क्या जवाब दूँ, मुझे कुच्छ समझ नही आ रहा" निकुंज अपने सर के बाल खुजाते हुए कहता है.
"तुम्हे कुच्छ कहने की ज़रूरत नही, जो कहना था तुम्हारे इस दानव ने कह दिया" वह अपने चूतडो को निकुंज के खड़े लंड पर रगड़ते हुए बोलती है.
"ऐसा क्या कह दिया इस दानव ने आप से ?" कह कर निकुंज हँसने लगता है. आज की सुबह इतनी रंगीन होगी, उसने कतयि ऐसी कल्पना नही की थी.
"उसने मुझसे कहा कि मैं उसे अपनी शरण में ले लूँ. तो शुरूवात मैने कर दी, अंत कैसे होगा यह दानव खुद जाने" कह कर नीमा चुप हो गयी. उसका इशारा स्पष्ट था कि अब वह चुदाई की तलबगार हो चुकी है. अपनी तरफ से पहले करते हुए उसने निकुंज के लंड को चूस कर, उसे इस लायक बना दिया है कि अब वह उसकी चूत की धज्जियाँ उड़ा कर कामसूत्र के अंतिम अध्याय को पूरा कर सके.
"आंटी !! मेरा लंड चूसने में आप को मज़ा आया ना ?" निकुंज ने उसकी आँखों में झाँकते हुए पुछा.
"उफ़फ्फ़ निकुंज !! अब और कुच्छ नही. बस जल्दी से मेरी चूत की आग को बुझा दो, जो खुद तुम ने लगाई है" इतना कह कह नीमा उसकी नंगी छाति से लिपट जाती है.
अत्यधिक हन्फायि से नीमा की चूचियाँ अपना आकार तेज़ी से बदल रही हैं. अपनी सबसे अच्छी दोस्त के जवान नंगे बेटे की गोद में किसी गुड़िया की तरह बैठी वा, उसे खुद को चोदने की मिन्नत करने के उपरांत बेहद लज्जा का अनुभव कर रही है.
मात्र कुच्छ क्षण बाद ही उसे महसूस होता है निकुंज के दोनो हाथो की उंगलियाँ उसकी कमर पर, उसके टॉप के अंतिम छोर को पकड़ चुकी हैं और उसने टॉप नीमा के सर की दिशा में उठाना शुरू कर दिया है. खुद ब खुद नीमा के हाथ इस नीच कार्य में निकुंज के हाथो का साथ देने लगते हैं और गदराए बदन की मालकिन वह कामुक नारी अपने ऊपरी धड़ से पूरी तरह नंगी हो जाती है.
"वाउ आंटी !! कितनी .. कितनी बड़ी चूचियाँ हैं आप की" निकुंज के मूँह से शब्द फूटे "और बेहद कड़क भी" वह फॉरन अपने हाथ के कठोर पंजे से नीमा के दाहिने मम्मे को शक्ति-पूर्वक दबा कर कहता है.
"उम्म्म निकुंज !! सब कुच्छ तुम्हारे लिए है बेटे" वह काँपते हुए बोली. एक स्त्री को अपनी चूचियों पर जितना गुमान होता है उतना ही नीमा को भी था. अपने बाएँ मुममे का चुचक स्वयं उमेठ कर वह उसकी अत्यधिक कडकता का एहसास कर रही थी.
"इन्हे चूसो निकुंज !! जैसे बचपन में तुमने अपनी मा के चूसे होंगे, ठीक वैसे ही अभी जवानी में अपनी आंटी के चूसो" कमोत्त्ज्जित नीमा हाहाकार कर उठी. उसके चुतडो के नीचे खड़ा निकुंज का विशाल लंड उसे झटका खाता महसूस होता है. यक़ीनन अपनी सग़ी मा के ज़िक्र से वह उत्साहित हुआ था.
"आंटी !! आप अपने हाथो से पकड़ कर चुस्वाओगि तो ज़रूर चूसूंगा" ऐसा कह कर निकुंज अपना चेहरा नीमा के मन के बेहद समीप ले जाता है और उसकी इस शर्मनाक, घटिया इक्षा का सम्मान करती नीमा, उसके खुले होंठो के भीतर अपना बायां चुचक ठूंस देती है.
"आहान .. आहान !! सब कुच्छ इतनी आसानी से थोड़ी मिल जाता है" बेशरमी से वह निकुंज को छेड़ती है. कभी अपने गोल मटोल, गद्देदार मम्मो को स्वयं के हाथों में कामुकता-पूर्वक गूँध कर तो कभी अपने तने चुचको को उसके मूँह से बाहर खीच, उसे ललचा कर. कभी-कभी तो वह अपनी पतली बलखाई कमर को इतनी तेज़ गति से हिलाती है कि उसके विशाल मम्मे पल भर में निकुंज के गालो पर दर्ज़नो थप्पड़ जड़ उठते हैं.
अपनी आंटी की इस मनमोहक अदा का निकुंज पूरी तरह से फॅन हो चला था और वह भी प्रयास करता है कि जब-जब उसके कड़क होंठ नीमा के तने चुचक को बल-पूर्वक सुड़ाक कर चूसें या जब-जब वे मम्मे उसके कठोर हाथो के पंजो से दबें. उसकी आंटी की मादक सिसकारी पूरे कमरे में गूँजनी चाहिए.
"उफफफ्फ़ जानवर कहीं के !! देखो तुमने इनकी क्या हालत कर दी है" जब काफ़ी देर तक उनके दरमियाँ माममे चुस्वाई का खेल चलता रहा तब नीमा ने ही पहल करते हुए उस खेल को समाप्त किया. उसके स्तन निकुंज द्वारा संतुष्टि-पूर्वक भींचे, गूँधे, खीचे व चूसे जाने से सुर्ख लाल रंग की रंगत में बदल चुके थे. ऐसा नही था कि वह उस खेल से ऊब गयी हो, नीमा से अपनी चढ़ि साँसें समहाली नही जा रही थी और अपनी धड़कनो की धड़कती ध्वनि को वह अपने दिल से कहीं ज़यादा अपनी कमोज्जित चूत के भीतर सुन पा रही थी.
"क्या करूँ आंटी !! आप के कातिल हुस्न ने मुझ जैसे नाचीज़ को आप का दीवाना बना दिया है" यह कहते हुए निकुंज अपने हाथ की उंगलियों को नीमा की पिंक कॅप्री के बटन पर रख देता है "अब मैं इस दीवानगी को गहराई तक महसूस करना चाहता हूँ" और ज़ोर लगाते हुए वह कॅप्री का बटन खोलने में सफल भी हो जाता है.
"निकुंज !! हम दोनो एक-दूसरे के दीवाने हैं" कह कर नीमा ने उसके होंठो का एक रसीला चुंबन लिया और उसकी गोद से उतर कर फर्श पर खड़ी हो जाती है "बेटा अपनी आँखें खुली रखना वरना बाद में कहो कि तुम्हारी आंटी ने तुम्हारा दिल ठीक से नही बहलाया" बड़े ही कामुक अंदाज़ में ऐसा बोल कर नीमा पलट गयी और अपने गुदाज़ चुतडो पर कसी स्ट्रिचबल कॅप्री की स्ट्रीप में अपने दोनो हाथो के अंगूठे फसा लेती है.
"आंटी !! आप के न्यूड बदन का दीदार करने को तो हमेशा मेरी आँखें खुली ही रहेंगी" निकुंज का अश्लील कथन इशारा करता है कि अब वह अपनी आंटी को बिल्कुल नंगी देखना चाहता है और निर्लज्ज नीमा उसकी घिनोनी इक्षा को मान कर अपनी कॅप्री, अपने चिकने चुतडो से नीचे की ओर सरकाने लगती है.
"उफफफ्फ़" निकुंज की साँसे थम गयी, आखें फॅट पड़ी और उसके चेहरे पर खून उतर आता है जब वह नीमा के अत्यधिक गोरे, सुडोल व ह्रष्ट-पुष्ट चुतडो को वस्त्र-विहीन देखता है. अपनी कॅप्री को पूर्ण-रूप से अपनी लंबी टाँगो से बाहर निकाल देने के उद्देश्य से वह काफ़ी हद्द तक आगे को झुकी खड़ी थी.
अचानक उसी स्थिति में नीमा ने अपनी गर्दन पिछे मोड़ कर निकुंज के चेहरे को देखा जो अपलक उसके नंगे पिच्छवाड़े को निहार रहा था. फॉरन नीमा को उसकी हालत पर हँसी आ गयी और वह ज़ोर-ज़ोर से अपनी गोल मटोल गान्ड हिलाने लगती है.
"फॅट-फॅट !! फॅट-फॅट" नीमा के गद्देदार चूतड़ के दोनो पाट जब तीव्र गति से आपस में टकराए तब हाथो से बजने वाली ताली की उँची आवाज़ को भी मात कर देते हैं और उस मधुर संगीत की थाप को सुन कर निकुंज का विशाल लंड बिना कुच्छ किए, अकारण ही झड़ने लगता है
"आहह आंटी" उसके लंड के फूले सुपाडे से बाहर निकलती वीर्य की लंबी-लंबी बौच्चरें नीमा के चूतड़ भिगो देती हैं.
जवान निकुंज के गाढ़े, लिसलिसे व गरम वीर्य को अपने चुतडो पर गिरता महसूस कर नीमा का दिल खुशी से झूम उठता है. हलाकी अपनी मांसल गान्ड के दोनो पाट तेज़ी से हिलाते हुए, उन्हें आपस में टकराते वक़्त नीमा की आँखें बड़े गौर से निकुंज के काँपते बदन पर होते आघात देख रही थी और उसकी वह बेचैन हालत देखते ही नीमा को पूर्वानुमान हो जाता है कि उसकी इस कामुक हरक़त ने निकुंज का सैयम पूरी तरह तोड़ दिया है. अंत में हुआ भी ठीक वही. वह अनायास ही झाड़ जाता है.
वहीं निकुंज हतप्रभ, निराश, और बेहद अचंभित हुआ. उसकी आशा के विरुद्ध उसका इस तरह झाड़ जाना, उसके चेहरे को गंभीर कर देता है. एक मर्द होने के नाते उसका मन कुंठा से भर उठता है कि वह अपने काम-कौशल में पूर्ण-रूप से विफल साबित हो गया.
झड़ने के उपरांत उसका शर्मसार चेहरा देख नीमा अपना अधूरा कार्य, अपनी कॅप्री को अपनी एडियों से बाहर निकाल कर उसे दूर फेंक देती है "कोई ना मेरे शेर !! कभी-कभी ऐसा हो जाता है" सांत्वना देती वह फॉरन निकुंज की ओर पलट जाती है.
"पता नही आंटी !! यह कैसे हो गया" निकुंज हौले से फुसफुसाया. उसकी हताशा इतनी तीव्र व गहरी होती है कि नीमा की बाल-रहित, अत्यंत गोरी, स्पन्दन्शील चूत देखने का कोई उत्साह उसके चेहरे पर ना आ सका था.
"मैने कहा ना फिकर मत करो !! देखो तुम्हारी आंटी की चूत की हालत भी कुच्छ कम खराब नही. अक्सर आती-उत्तेजनावश मनुष्य खुद पर काबू नही रख पाता और यह एक दम नॉर्मल है बेटा" नीमा ने उसके करीब आते हुए कहा और सोफे की पुष्ट पर अपनी बाईं टाँग को स्थापित कर, उसे अपनी मलाईदार कामपति चूत का अद्वतीय दर्शन करवाती है.
"तुम चाहो तो अपनी उंगलियों से इसकी परतें अलग-थल्ग कर अंदाज़ा लगा सकते हो कि क्यों तुम्हारी आंटी इतना तड़प रही है ?" निर्लज्ज भाव से ऐसा बोल कर वह स्वयं निकुंज का हाथ ऊपर उठाते हुए अपनी धधकति चूत के अंगार रूपी मुहाने पर रख देती है "उफ़फ्फ़ निकुंज !! इसकी असहनीय पीड़ा से अब तुम्हारी आंटी भी मुक्त होना चाहती है" नीमा ने अपना सर नीचे झुका कर निकुंज की आँखों में झाँकते हुए कहा.
जवान मर्दों की मुख्य विशेषता होती है कि उनका मन भले ही कितना भी बोझिल क्यों ना हो जाए मगर उनके लंड पर उसका कोई अतिरिक्त प्रभाव नही पड़ता और यह कल्मा सीधा करते हुए निकुंज के लंड में दोबारा हलचल होनी शुरू हो गयी. उसका हाथ नीमा की अत्यधिक फूली, पाव रोटी समान चूत पर रेंगने जो लगा था.
"हां .. हां निकुंज !! तुम बहुत अच्छे से कर रहे हो. बेटा अब तुम भी पक्की दोस्ती कर लो अपनी आंटी की चूत से" नीमा सिहरन से भर उठती है. उसकी टाँगो में होते अकल्पनीय कंपन से उसकी चूत की गहराई में छुप कर बैठा, उसका कामरस फॉरन पिघल कर निकुंज के हाथ की उंगलियों को भिगोने लगता है.
"बिल्कुल आंटी !! जन्मो-जन्मो का साथ निभाने वाली दोस्ती करूँगा अपनी आंटी की सुंदर चूत से" यह कहते हुए वह सोफे से उठ गया और बड़े प्यार से नीमा को अपनी जगह बिठा कर उसकी लंबी टाँगो के दरमियाँ पसरने लगता है. अपने मजबूत हाथो के विशाल पंजो के बल प्रयोग से वह नीमा के, स्वयं के वीर्य से तार चूतडो के दोनो पाट भींचता है और उन्हे खीचते हुए अपने मूँह के बेहद समीप ले आता है.
"बेटा निकुंज !! अब तुम क्या करने वाले हो ?" सब कुच्छ जानते हुए भी शरारत वश नीमा उसे छेड़ती है "मैं अपनी मा की सबसे अच्छी दोस्त, मेरी नीमा आंटी की चूत को चाटने वाला हूँ" निकुंज भी नहले पर दहला मार कर कहता है और जिसे सुनते ही नीमा स्तब्ध रह गयी मगर खुद को मुस्कुराने से रोक ना सकी.
इसके पश्चात वह नीमा की आँखों में देख, उसकी मांसल व कोमल दोनो जाँघो को बारी-बारी से चूमता है और हौले-हौले ऊपर की दिशा में बढ़ते हुए अपने शुरूवाती मुलायम होंठ उसकी चूत की नर्म फांको के बीचो-बीच चिपका देता है.
"अह्ह्ह्ह निकुंज" एहसास मात्र से नीमा की सिसकारी छूट गयी और स्वतः ही उसके हाथ निकुंज के सर को जाकड़ कर शक्ति-पूर्वक उसे अपनी चूत के मुख पर दबा देते हैं.
कुच्छ समय पूर्व निकुंज ने अत्यधिक उन्माद से अभिभूत हो कर नीमा के सर को अपने विशाल लंड पर दबाया था और ठीक वही गतिविधि अभी नीमा की रही. लिखने का तात्पर्य बस इतना है कि "काम" से बड़ा रोग इस दुनिया मैं कोई नही और इसका उपचार तो स्वयं कुदरत को भी नही मालूम.
निकुंज के होंठ खुलते हैं और उसकी लंबी जीभ बाहर निकाल कर चूत की सूजी फांको से निरंतर बह रही गाढ़ी मलाई को शीघ्रता से चाटना शुरू कर देती है. नीमा के जिस्म की खुश्बू की तरह ही उसके कामरस की सुगंध भी निकुंज को मंत्रमुग्ध करने में सफल रही थी.
"आंटी !! आप की चूत के रस से तो सेंट बन सकता है, बहुत बिकेगा मार्केट में" कह कर वह हँसने लगता है और नीमा फॉरन झेप जाती है. इसके बाद निकुंज की जीभ चूत की कोमल फांको को चीरते हुए, उसके अन्द्रूनि संकुचित मार्ग में प्रवेश करने का प्रयत्न करती है मगर ज़्यादा अंदर नही जा पाती तो वा अपनी दो उंगलियाँ सीधी कर, बल-पूर्वक चूत के भीतर गहराई तक ठूंस देता है.
"उफफफ्फ़" नीमा का संपूर्ण जिस्म थर्रा उठता है.
नीमा को यूँ सीत्कार करते सुन निकुंज अपनी उंगलियाँ "V" की आकृति में ढाल कर उसकी चूत का चिपका चीरा, काफ़ी हद तक फैला देता है और इसके उपरांत ही उसे चूत के भीतर की बेहद गुलाबी सतह स्पष्ट रूप से नज़र आने लगी. नीमा की लगातार हमपाई से उसने चूत की अन्द्रूनि दीवारों में भयानक कंपन होता महसूस किया. निकुंज के मुलायम होंठ इस मनभावन द्रश्य से कड़क हो उठते हैं और वह अपने होंठो की कठोरता से फॉरन चूत के अंदर छुपा कामरस रूपी खजाना, बल-पूर्वक सडॅक कर उसे अपने मूँह में भरने लगता है.
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