पापी परिवार--18
नीमा द्वारा कहे शब्द कान में पड़ते ही निकुंज थोड़ा नर्वस हो गया लेकिन तभी उसे अपनी मा की आवाज़ भी सुनाई दी.
कम्मो :- "नीमा !! तू कहीं पागल तो नही हो गयी, वो क्या सोचेगा हमारे बारे में."
"मुझे तो लगा था ऑस्ट्रेलिया रहने से निकुंज ऐसे फॅशन को हम से कहीं ज़्यादा बेहतर समझता होगा, तभी मैने उससे पूछा !! खेर छोड़ो बेटा, कोई बात नही" एक तरह से नीमा निकुंज को लल्लू साबित करते हुए बोली और सुन कर निकुंज का चेहरा गंभीर होने लगा.
"नही आंटी ऐसी कोई बात नही है, ज़रा पास से देखने पर फॅब्रिक का सही अंदाज़ा लगा पाउन्गा" निकुंज उन दोनो के करीब आते हुए बोला.
"आंटी ड्रेस काफ़ी अच्छी और हॉट है" निकुंज ने हाथ की मुट्ठी में कपड़े को मरोड़ते हुए कहा, उसकी आँखें ठीक नीमा की आँखों से जुड़ी हुई थी. वहीं शरम-वश कम्मो की पलकें झुक चुकी थी.
"तो तेरा मतलब !! मैं खरीद लू इसे ?" नीमा ने नॉटी स्माइल देते हुए पुछा.
"अब ये तो आप पर डिपेंड करता है आंटी, अगर आप इसे पहेन-ने में कंफर्ट फील करें तो बेशक खरीद लें" निकुंज भी मुस्कुरा दिया.
"देखा कम्मो !! कहा था ना मैने, निकुंज को हम से बेहतर नालेज है इन सब चीज़ो का और तू खामो-ख़ाँ परेशान हो रही थी" नीमा की बात डमी के पास खड़ी सेल्स-विमन ने सुनी और फॉरन उसे उतार कर बिलिंग काउंटर पर पहुचा दिया.
"तू भी कुच्छ ले ले कम्मो, कुछ अट्रॅक्टिव सा. मैं तो स्नेहा और अपने लिए अंडरगार्मेंट्स भी लेना चाहती हूँ" नीमा ने कम्मो के कंधे को झकझोर कर कहा तो वह किसी सपने से बाहर आई.
"ना ना !! मुझे कुच्छ नही लेना, तू ही कर शॉपिंग" कम्मो हड़बड़ाई.
तीनो जल्द ही लाइनाये सेक्षन में पहुचे, निकुंज को दिखा-दिखा कर नीमा ने काफ़ी बोल्ड स्टफ खरीदा. नेट, कॉटन ब्रा-पॅंटीस का अच्छा ख़ासा कलेक्षन उसके हाथ लग चुका था.
"बेटा !! शायद तेरी मा तेरे साथ होने से कंफर्ट फील नही कर रही, तू बाहर वेट कर तो मैं इसके लिए भी कुच्छ खरीद लू. ये अकेले तो कभी यहाँ आ नही पाएगी" नीमा का इशारा समझ कर निकुंज ने कम्मो की तरफ नज़र डाली, साड़ी के छोर को उंगलियों में घुमाती वह वाकाई बेहद शरमा रही थी.
"जी ज़रूर आंटी" अपनी मा को घूरता निकुंज शॉप से बाहर चला गया लेकिन अब तक की शॉपिंग ने उसे नीमा का दीवाना बना दिया था. उसका मन ना माना और वह शॉप के बाहर लगे ट्रॅन्स्परेंट मिरर से अंदर के हालात देखने लगा.
नीमा के लाख समझाने पर भी कम्मो कुच्छ खरीदने को तैयार ना हुई तो वे दोनो भी बिलिंग करवा कर शॉप से बाहर निकल आए.
"चल कम्मो !! मैं चलती हूँ, और बेटा निकुंज कभी आंटी के ग़रीब-खाने में भी आना" जाते वक़्त भी नीमा ने उसे अपने सीने से चिपका लिया, फिर सुडोल चुचियों का घर्षण और निकुंज गरमाने लगा.
"कम्मो तेरी बहुत तारीफ कर रही थी और तू है भी इसी लायक, खेर अपनी मा का ख़याल रखा कर बेटा. कब तक वह ज़िम्मेदारियों के बंधन में बँधी रहेगी, मुझे देख अपनी लाइफ को फुल एंजाय कर रही हू और वो सिर्फ़ इस लिए क्यों कि मेरे बच्चो का साथ मेरे पास है" नीमा ने निकुंज को बाहों से आज़ाद कर कयि तरह की घुट्टियाँ पिलाई और आगे बढ़ गयी लेकिन अचानक से वह पलटी और निकुंज को अपने पास बुलाया.
निकुंज दौड़ा "जी आंटी"
"बेटा !! ये दो अंडरगार्मेंट्स के सेट मैने तेरी मा के लिए खरीदे हैं, वो मुझसे नही ले रही थी तो तू उसे दे देना" नीमा ने कुच्छ इस तरह से ब्रा-पॅंटीस निकुंज के हाथ में थमाई जिससे कम्मो को सिर्फ़ एहसास हुआ मगर नज़र ठीक से पकड़ नही पाई और निकुंज ने बात मानते हुए उन्हे अपनी जेब में ठूंस लिया.
"चल मैं जाती हूँ, बाइ" आँख मारती नीमा माल से बाहर निकल गयी और अब वहाँ सिर्फ़ मा-बेटे बचे थे.
"क्यों बुलाया था नीमा ने तुझे ?" कम्मो के चेहरे पर एक अजीब सी बैचैनि थी, उसे लगा कहीं नीमा ने निकुंज से डाइरेक्ट तो नही कह दिया "तेरी मा तुझसे चुदना चाहती है"
"कुच्छ ख़ास बात नही मोम पर नीमा आंटी काफ़ी ओपन माइंडेड हैं और आप को बहुत मानती हैं" निकुंज ने जवाब दिया.
"वो तेरे हाथ में कुच्छ दे रही थी, मैं देख तो नही पाई लेकिन मुझे ऐसा लगा" कम्मो ने पुछा.
"हां दिया तो है" निकुंज ने लो वाय्स में जवाब दिया "चलो ना मोम बाकी बात कार में कर लेंगे" वह वहाँ ओपन में कम्मो को लाइनाये नही दे सकता था.
"ठीक है चल" कम्मो भी असमंजस स्थिति में पार्किंग की तरफ बढ़ गयी.
"मोम !! आप ने कुच्छ नही खरीदा ?" ड्राइव के दौरान जाने -अंजाने निकुंज के मूँह से कैसे यह बात निकल गयी जिसे सुन कर कम्मो भी घबरा गयी.
"मैं .. मैं .. मुझे नही पसंद बेटा, नीमा ही पहने ऐसे कपड़े" कम्मो की ज़ुबान लड़खड़ाई.
"ऐसी बात नही है मोम, जहाँ तक मेरा मानना है. नीमा आंटी अपनी लाइफ से फुल सॅटिस्फाइड है और वो चाहती हैं !! आप भी आज के फॅशन को समझें और लाइफ खुल कर जिएं" निकुंज ने समझाया.
"वो ठीक है लेकिन उसने तुझे दिया क्या ?" कम्मो ने दोबारा प्रश्न किया.
निकुंज ने कुच्छ गहरी साँसें ली, वैसे अब वो ऐसे हलातो को काफ़ी हद तक फेस करना सीख गया था और अगले ही पल जेब से अंडरगार्मेंट्स निकाल कर उसने अपनी मा के हाथ में थमा दिए.
"ये .. ये क्या है ?" कम्मो को तेज़ झटका लगा, जैसे उसके शरीर में प्राण ही ना बचे हों.
"क्या हुआ मोम ? आंटी कितने प्यार से दे कर गयी हैं और आप फालतू परेशान हो रही हो" निकुंज ने बात करने के हिसाब से कार स्पीड को लिमिट में कर लिया.
"बेटा !! मुझे समझ नही आ रहा मैं इन्हे किस तरह आक्सेप्ट करू, नीमा और मुझ में काफ़ी फ़र्क़ है" कम्मो का शरम से बुरा हाल था.
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"कैसा फ़र्क़ ?" निकुंज ने पूछा. "उनकी भी फॅमिली है, उनके घर में भी बच्चे हैं. फिर भी देखो कितनी फ्री हैं, लाइफ एंजाय करना कोई बुरी बात तो नही मोम"
"बुरे या अच्छे की कोई बात नही निकुंज. नीमा नॉर्मल नही है, मैने तुझे पुणे जाने के दौरान भी बताया था और फिर मैं इन्हे कैसे पहनु ? कोई देखेगा तो क्या कहेगा ?" कम्मो ने तर्क़ दिए.
"कॉन देखेगा मोम ? और वैसे भी अंडरगार्मेंट्स कपड़ो के अंदर पहने जाते हैं, खाली इन्हे पहेन कर तो कोई भी औरत घर में नही घूमती होगी." निकुंज के इस नटखटी जवाब को सुन कर कम्मो की चूत कुलबुलाने लगी और उसने फॉरन चुप्पी साध ली.
"हां बताया तो था आप ने नीमा आंटी के बारे में लेकिन शायद हमारी बात अधूरी रह गयी थी" निकुंज ने बीते पलो को कुरेदा.
"छोड़ निकुंज !! कुच्छ बातें अधूरी रहें तो ज़्यादा अच्छा रहता है" कम्मो हौले से बुदबुदाई.
"लेकिन क्यों मों ? उस वक़्त तो चर्चा हम बच्चो को ले कर ही हो रही थी और आप बता रही थीं, माता-पिता को अपनी औलाद के खातिर काफ़ी हद तक समझौते करने पड़ते हैं" निकुंज ने टॉपिक आयेज बढ़ाया.
"हां ये सच है, समझौते करने पड़ते हैं मगर नीमा जो कर रही है उसे समझौता नही विवशता कहते हैं. हलातो से हारना कहते हैं" कम्मो ने समझाया, उसकी नज़र लगातार अपने हाथ पर जमी हुई थी जिसमे उसने बेहद एरॉटिक मल्टी-कलर्ड अंडरगार्मेंट्स पकड़े हुए थे.
"हालात से तो आप भी हारी थी मोम और उस रात विवश भी थी" निकुंज के लंड मे आते तनाव ने उसे अश्लीलता के चरम पर पहुचाना शुरू कर दिया.
शुरुवती दौर में वह अपनी मा की तरफ कामोज्जित हुआ, फिर बहेन निक्की और अभी थोड़ी देर पहले आंटी नीमा ने भी सिर्फ़ उसे गरमाया ही था.
"विवशता और स्वेक्षा में भी काफ़ी अंतर है, उस वक़्त मैं मजबूर ज़रूर हुई थी लेकिन ग़लती भी तो मेरी ही थी. तो मैने जो किया उसे क़ुबूल करने में ज़रा भी जीझक नही मुझे" बोलते वक़्त कम्मो के लब थरथरा रहे थे, लग रहा था जैसे वह बुरी तरह नशे में चूर हो.
"वो एहसास तो मैं भी नही भूल सकता मोम, भले ग़लती आप अपनी मान रही हो लेकिन उस वक़्त जो कुच्छ मैने महसूस किया. वो मुझे स्वर्ग के द्वार तक ले गया था" आख़िर-कार निकुंज ने सच बोल दिया.
"तू जानता है निकुंज, उस रात मैं भी बहुत परेशान हुई थी. जो सुख आज तक मैने अपने पति को नही दिया, जिस कार्य को सोच कर ही मुझे घिन आती थी. मगर मैने खुद को तेरे लिए इतना विवश कर दिया कि स्वेक्षा से तेरा लिंग चूस्ति रही" कम्मो की आँखें मूंद गयी और हान्फते हुए उसने सीट पर अपना शीश टिका लिया.
कुच्छ देर का सन्नाटा दोनो को भारी पड़ने लगा था. निकुंज चाहता, उसकी मा बोले और कम्मो चाहती थी, उसका बेटा बोले. मगर दोनो ही चुप थे.
"तो क्या मोम आप ने पहली बार मेरे लिए वो सब किया ?" निकुंज ने फ़ैसला कर लिया कि आज वो घर पहुचने से पहले अपनी मा के अंदर उबल रहे सैलाब को हर तरह से जाँचेगा, परखेगा. क्या पता कम्मो उसे नीमा की विवशता भी बता दे.
ना चाहते हुए भी उसकी बात का जवाब देने के लिए कम्मो को अपनी बंद आँखें खोलनी पड़ी लेकिन सिर्फ़ हां में सर हिलाते हुए वह अपनी स्वीकृति दे पाई.
"यकीन नही होता मोम, आइ मीन फर्स्ट टाइम में इतना सटीक ब्लोवजोब" वह बोला.
"क्या करती मैं, तुझे परेशान कब तक देख पाती और सच कहु तो मुझे भी यकीन नही होता कि मैने ये सब कैसे कर दिया" कम्मो फुसफुसाई.
"मोम एक बात पुछु, अगर आप को बुरा ना लगे तो ?" निकुंज को दाव पर दाव खेलना अच्छा लगने लगा था.
"ह्म्म्म" कम्मो के जवाब में अब भी शांति थी बस हल्की सी घुटन का आभास हो रहा था.
"माना वह मेरी ट्रीटमेंट का ही एक पार्ट था मगर क्या आप ने भी उसे एंजाय किया था ? " निकुंज के इस सवाल ने जैसे कम्मो के गुदा द्वार में सनसनी मचा दी, उसके चूचक भी ब्लाउस फाड़ कर बाहर निकलने को आम्दा थे.
"बस कर निकुंज, एक मा और उसके बेटे के बीच इस तरह की बातें शोभा नही देती " सवाल के जवाब में कम्मो कहना तो सिर्फ़ हां चाहती थी मगर उसका व्यवहार कहीं मात्रत्व से रंडी-पने में परिवर्तित ना हो जाए, उसने खुद पर काबू किया.
"जो भी हो मोम !! मैं तो उस रात को कभी नही भूल पाउन्गा, वैसे क्या आप मुझे नीमा आंटी की विवशता का कारण बताएँगी ?" निकुंज के प्रश्न जारी रहे.
कम्मो :- "अभी मुझ में इतनी सहेन-शक्ति नही कि मैं तुझे उसके अब-नॉर्मल जीवन का राज़ बता सकु"
"चलिए फिर कभी सही लेकिन मोम आप खुद में बदलाव लाओगी तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा" कार को घर की पार्किंग में लगाते हुए निकुंज ने कहा.
"बदलाव ?" इस बार कम्मो प्रश्न कर बैठी.
"नीमा आंटी के बच्चे उन्हे सपोर्ट करते हैं, मैं खुद चाहता हू आप भी आज के परिवेश में रहना सीखें" निकुंज ने उन अंडरगार्मेंट्स पर नज़र डालते हुए कहा.
"बहुत बड़ा हो गया है तू, चल मैं कोशिश करूँगी" कम्मो मुस्कुरा उठी.
"थॅंक्स मॉम" निकुंज ने अचानक कम्मो का गाल चूमा और कार से उतर कर घर के अंदर जाने लगा, हैरान कम्मो भी उसके साथ थी.
वहीं शहेर के ही **** होटेल में :-
"मज़ाक ना कर दीदी !! उतार ना अपने कपड़े, देख मैं भी तो नंगा हूँ" लड़के ने बेड पर बैठी अपने बड़ी बहेन से विनती की लेकिन लड़की ने अब तक अपने छोटे भाई के मुताबिक़ कोई काम नही किया था.
"तू मादर्चोद तो बन गया, अब क्या बेहेन्चोद भी बनेगा ?" लड़की ने टॉंट मारा.
"हां बनूंगा !! फिर हम घर से मामा के घर जाने का झूट बोल कर यहाँ होटेल आए हैं. तो अब नाटक छोड़ और नंगी हो जा ना" लड़के ने दोबारा रिक्वेस्ट की.
"मान मेरी बात, ये ग़लत है छोटे" लड़की अपनी बात पर अड़ी रही, हलाकी होटेल में कमरा बुक करने का प्लान खुद उसी का था मगर वह अपने छोटे भाई की प्यास को और भी कहीं ज़्यादा बढ़ाना चाहती थी.
"कोई ग़लत नही दीदी, देख ना कैसे फड़फड़ा रहा है मेरा लॉडा" लड़का अपनी जगह से उठा और लड़की के सुंदर चेहरे पर अपना लंड रगड़ने लगा.
"ह्म्म्म" लड़की ने जोरदार अंगड़ाई ली "हटा इसे मेरी आँखों के सामने से" वह चिल्लाई.
"साली छिनाल, पहले मुझे गरम किया फिर इस होटेल में लाई और अब अपनी गान्ड मरा रही है. मैं जा रहा हू यहाँ से" लड़का बेड से नीचे उतरने लगा, उसकी आँखों में अंगार जल रहे थे.
"कहाँ जा रहा है भाई ?" लड़की ने हौले से पुछा.
"घर !! तेरी मा चोदने" लड़के ने गुस्से से जवाब दिया तो लड़की बेड पर लेट कर लॉट-पोट होने लगी.
लड़का थम गया, आशा के विपरीत की उसकी बहेन इस तरह उसका मज़ाक बनाएगी. क्रोध में भर-कर वह पुनः बिस्तर पर चढ़ा और लेटी सग़ी बड़ी बहेन के गले को अपने हाथ की मजबूती से जाकड़ लिया.
"चल अपना मूँह खोल और चूस मेरा लॉडा, बहुत नाटक कर लिया तूने. अब मैं तेरा रेप करने वाला हूँ" लड़की की गर्दन पर ज़रा सा प्रेशर पड़ने से खुद ब खुद उसका का मूँह खुल गया.
अब तक हुई अश्लील गर्माहट से लड़के का विशाल लंड पत्थर हो चुका था, लाल आलू बुखारे समान सुपाड़ा रस की गाढ़ी बूँदो से सराबोर, जिसे वह अपनी बहेन के खुल चुके गुलाबी होंठो पर फेरने लगा.
"तू भी मज़ा ले इस रस का, मम्मी तो दीवानी हैं मेरे लंड की और जल्द ही तेरी चूत भी इसके नाम की माला जपा करेगी" अट्टहास करते हुए जबरन लड़के ने आधा लंड किसी भाले की भाँति अपनी बहेन के मूँह में ठूँसा और लड़की घबरा कर अपना गला उसकी गिरफ़्त से छुड़ाने की कोशिश करने लगी.
"ना बहना !! अभी तो सज़ा मिलनी शुरू हुई है, बस तू देखती जा कैसे मैं तेरी चुदास मिटाता हू" एक करारी आह के साथ लड़के ने अपनी बहेन के मूँह में धक्के लगाने शुरू कर दिए, वह पूरी तरह जानवर बनता जा रहा था, जानता था उसकी बहेन पीड़ा से घुट रही है मगर लग रहा था जैसे वह उस पर कोई रहम नही करेगा.
"उउल्ल्लूउउउऊप" लड़की को उबकाइयाँ आने लगी, वजह लड़के का लंड उसके गले को चोट करने लगा था.
"आहह !! कितना टाइट जा रहा है. चूस बहना, किस्मत वाली है जो सगे भाई का लंड तेरे मूँह में है" इतना कह कर लड़के ने धक्के मारना बंद कर दिए, वह अपनी बहेन के मूँह से बाहर बहती उसकी लार और खुद के लंड से निकले रस के मिश्रण को गौर से देखने लगा.
"स्नेहा दीदी !! तू बहुत सुंदर है. मुझे नही पता था, मेरा लंड चूसने से मेरी बहेन को इतनी खुशी मिलेगी कि उसकी आँखें छलक उठेंगी. विक्की से पंगा ले रही थी ना, अब भुगत"
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ये दोनो नीमा के बच्चे हैं, एक रात पानी की प्यास ने स्नेहा को उसके कमरे से बाहर आने पर मजबूर किया. वह कमरे से बाहर निकली ही थी कि हॉल का नज़ारा देख उसकी प्यास गले से नीचे खिसक, उसकी कुँवारी चूत में उठने लगी.
हॉल की सारी लाइट्स ऑन थी और विक्की अपनी मम्मी को सोफे पर कुतिया बना कर चोद रहा था. स्नेहा को लगा कहीं ये सपना तो नही लेकिन उसकी मम्मी और छोटे भाई की सिसकारियों ने उसे हक़ीक़त का अंदाज़ा करवा दिया.
किसी कुँवारी लड़की के लिए चुदाई देखना बड़ी बात है मगर चुदाई उसकी मा और सगे भाई के बीच हो तो क्या कहने, स्नेहा उस रात तब तक झड़ती रही जब तक हॉल की रास-लीला समाप्त नही हो गयी.
देखने से ही पता चल रहा था कि उसकी मा और भाई काफ़ी लंबे अरसे से इस पाप में लिप्त होंगे, और अंत में जिस कामुकता से एक मा ने अपने बेटे का वीर्य चखा, स्नेहा बेहोश होते-होते बची.
रात भर चूत की आशाए जलन और मन में उठ रहे दर्ज़नो सवाल, स्नेहा सिर्फ़ करवटें बदलती रही.
रात बीती नयी सुबह आई मगर वह सो ना सकी, हलाकी उसके दिल ओ दिमाग़ में अपनी मा और भाई के लिए ज़रा भी नाराज़गी नही थी बल्कि रोमांच से उसकी चूत अब तक बहे जा रही थी.
छुट्टियों के दिन थे तो बच्चे और उनकी मा, मन चाहे समय तक नींद पूरी करते, उस दिन भी ठीक वैसा ही हुआ.
दोपहर 11:30 तक स्नेहा अपने बिस्तर पर रही. फिर जब उससे और ना लेटा गया तो वह किसी चोर के समान कमरे से बाहर आई.
किचन से आती हसी मज़ाक की आवाज़ो ने ज़ाहिर किया कि अंदर उसकी मा और भाई विक्की पहले से मौजूद हैं, वह दबे पाव किचन की तरफ बढ़ी और दरवाज़े से अंदर झाँका.
उसकी मा नीचे ज़मीन पर बैठी थी और विक्की खड़ा, मा को अपना लंड चुस्वा रहा था. नीमा की पीठ दरवाज़े की तरफ होने से वह स्नेहा को नही देख पाई लेकिन विक्की की आँखें अपनी बड़ी बहेन पर बाज़ की भाँति जमी रह गयी.
दोनो भाई-बहेन स्टॅच्यू बन चुके थे, ना तो स्नेहा द्वारा कोई हरक़त हुई और ना ही विक्की द्वारा और फिर अचानक से नीमा के मूँह की गर्मी विक्की बर्दाश्त नही कर पाया.
"आहह मोम" विक्क की आँखें बंद, बदन धनुषाकार हो गया और नीमा का सर पकड़ कर उसने अपना विशाल लंड, उसके कंठ तक ठेल दिया.
वहीं नीमा भी इस अप्रत्याशित हमले को सह नही पाई और हड़बड़ाहट में विक्की की जांघे नोचने लगी, उसे अचंभा हुआ कि अचानक से विक्की ने अपना पूरा लंड उसके गले में क्यों ठूंस दिया.
जब तक विक्की के टटटे खाली नही हुए उसने अपनी मा को नही छोड़ा और जब वीर्य-पात के पश्चात अपनी आँखें खोली तो देखा "स्नेहा किचन के दरवाज़े पर नही थी"
उसने फॉरन अपनी मा पर इस सच को ज़ाहिर करना चाहा मगर घबराहट में कुच्छ भी कह ना सका.
नीमा की हज़ार समझाशों के बावजूद भी वह अपनी मन-मर्ज़ी से सुबह के वक़्त, उसके मुख-चोदन का आनंद लेने को मचल रहा था और तभी उसने स्नेहा द्वारा पकड़े जाने वाली बात अपनी मा से छुपा ली.
उस दिन विक्की बहुत बेचैन रहा "कहीं स्नेहा भड़क ना उठे" मगर जब सांझ बीत जाने तक स्नेहा चुप रही तो उसका साहस बढ़ने लगा और उसी रात उसने अपनी मा को दोबारा चोदा लेकिन इस बार भी स्नेहा उसके द्वारा, उनकी चुदाई देखती पकड़ी गयी.
"लगता है दीदी की चूत भी जल्द ही चखने मिलेगी" सेक्स के दौरान विक्की ने सोचा और अपनी बड़ी बहेन के सामने जान-बूझ कर, मुस्कुराते हुए, अपनी मा को चोदता रहा. शायद अपने चुदाई कौशल का प्रदर्शन कर रहा था.
स्नेहा ने उस रात अपनी स्कर्ट के अंदर हाथ डाल, विक्की के सामने ही अपनी कुँवारी चूत मसली थी और ये वह संकेत था जो अगले ही दिन, आज वे इस होटेल के बंद कमरे में उस अधूरे महा-पापी कार्य को पूरा करने आए थे.
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"बहुत छुप-छुप कर अपनी मा को चुदते हुए देखने का मन होता है ना दीदी और तेरी चूत भी बहती है. चल आज मैं तेरा लीकेज फुल और; फाइनल ठीक कर देता हूँ" विक्की ने पुरजोर ताक़त से अपना लंड स्नेहा के मूँह में ठेलते हुए कहा और कुछ सेकेंड्स बाद बाहर खीच लिया.
"ओह" स्नेहा जोरो की साँस लेने लगी और विक्की के हाथ की गिरफ़्त ढीली पड़ते ही एक जोरदार मुक्का उसकी पीठ पर जड़ दिया.
"मादरचोद !! जान लेगा क्या मेरी ?" अपनी लार से सना विक्की का लंड हाथ में पकड़ कर स्नेहा उसे इस तरह मरोड़ने लगी जैसे उसे तोड़ ही डालेगी.
"उफफफफ्फ़ दीदी नही" अब तड़पने की बारी विक्की की थी, लेकिन वह ज़्यादा शोर मचाता इससे पहले ही स्नेहा ने अपना चेहरा लंड पर झुकाते हुए वापस उसे चूसना शुरू कर दिया.
"ह्म्म्म !! स्ट्रेंज सा टेस्ट है भाई, मगर मज़ा आ रहा है" स्नेहा ने आँख मारते हुए विक्की से कहा "कमिने !! मैं जान-बूझ कर तुझे उकसा रही थी तो क्या तू मुझे जान से ही मार डालता ?"
"कैसा फ़र्क़ ?" निकुंज ने पूछा. "उनकी भी फॅमिली है, उनके घर में भी बच्चे हैं. फिर भी देखो कितनी फ्री हैं, लाइफ एंजाय करना कोई बुरी बात तो नही मोम"
"बुरे या अच्छे की कोई बात नही निकुंज. नीमा नॉर्मल नही है, मैने तुझे पुणे जाने के दौरान भी बताया था और फिर मैं इन्हे कैसे पहनु ? कोई देखेगा तो क्या कहेगा ?" कम्मो ने तर्क़ दिए.
"कॉन देखेगा मोम ? और वैसे भी अंडरगार्मेंट्स कपड़ो के अंदर पहने जाते हैं, खाली इन्हे पहेन कर तो कोई भी औरत घर में नही घूमती होगी." निकुंज के इस नटखटी जवाब को सुन कर कम्मो की चूत कुलबुलाने लगी और उसने फॉरन चुप्पी साध ली.
"हां बताया तो था आप ने नीमा आंटी के बारे में लेकिन शायद हमारी बात अधूरी रह गयी थी" निकुंज ने बीते पलो को कुरेदा.
"छोड़ निकुंज !! कुच्छ बातें अधूरी रहें तो ज़्यादा अच्छा रहता है" कम्मो हौले से बुदबुदाई.
"लेकिन क्यों मों ? उस वक़्त तो चर्चा हम बच्चो को ले कर ही हो रही थी और आप बता रही थीं, माता-पिता को अपनी औलाद के खातिर काफ़ी हद तक समझौते करने पड़ते हैं" निकुंज ने टॉपिक आयेज बढ़ाया.
"हां ये सच है, समझौते करने पड़ते हैं मगर नीमा जो कर रही है उसे समझौता नही विवशता कहते हैं. हलातो से हारना कहते हैं" कम्मो ने समझाया, उसकी नज़र लगातार अपने हाथ पर जमी हुई थी जिसमे उसने बेहद एरॉटिक मल्टी-कलर्ड अंडरगार्मेंट्स पकड़े हुए थे.
"हालात से तो आप भी हारी थी मोम और उस रात विवश भी थी" निकुंज के लंड मे आते तनाव ने उसे अश्लीलता के चरम पर पहुचाना शुरू कर दिया.
शुरुवती दौर में वह अपनी मा की तरफ कामोज्जित हुआ, फिर बहेन निक्की और अभी थोड़ी देर पहले आंटी नीमा ने भी सिर्फ़ उसे गरमाया ही था.
"विवशता और स्वेक्षा में भी काफ़ी अंतर है, उस वक़्त मैं मजबूर ज़रूर हुई थी लेकिन ग़लती भी तो मेरी ही थी. तो मैने जो किया उसे क़ुबूल करने में ज़रा भी जीझक नही मुझे" बोलते वक़्त कम्मो के लब थरथरा रहे थे, लग रहा था जैसे वह बुरी तरह नशे में चूर हो.
"वो एहसास तो मैं भी नही भूल सकता मोम, भले ग़लती आप अपनी मान रही हो लेकिन उस वक़्त जो कुच्छ मैने महसूस किया. वो मुझे स्वर्ग के द्वार तक ले गया था" आख़िर-कार निकुंज ने सच बोल दिया.
"तू जानता है निकुंज, उस रात मैं भी बहुत परेशान हुई थी. जो सुख आज तक मैने अपने पति को नही दिया, जिस कार्य को सोच कर ही मुझे घिन आती थी. मगर मैने खुद को तेरे लिए इतना विवश कर दिया कि स्वेक्षा से तेरा लिंग चूस्ति रही" कम्मो की आँखें मूंद गयी और हान्फते हुए उसने सीट पर अपना शीश टिका लिया.
कुच्छ देर का सन्नाटा दोनो को भारी पड़ने लगा था. निकुंज चाहता, उसकी मा बोले और कम्मो चाहती थी, उसका बेटा बोले. मगर दोनो ही चुप थे.
"तो क्या मोम आप ने पहली बार मेरे लिए वो सब किया ?" निकुंज ने फ़ैसला कर लिया कि आज वो घर पहुचने से पहले अपनी मा के अंदर उबल रहे सैलाब को हर तरह से जाँचेगा, परखेगा. क्या पता कम्मो उसे नीमा की विवशता भी बता दे.
ना चाहते हुए भी उसकी बात का जवाब देने के लिए कम्मो को अपनी बंद आँखें खोलनी पड़ी लेकिन सिर्फ़ हां में सर हिलाते हुए वह अपनी स्वीकृति दे पाई.
"यकीन नही होता मोम, आइ मीन फर्स्ट टाइम में इतना सटीक ब्लोवजोब" वह बोला.
"क्या करती मैं, तुझे परेशान कब तक देख पाती और सच कहु तो मुझे भी यकीन नही होता कि मैने ये सब कैसे कर दिया" कम्मो फुसफुसाई.
"मोम एक बात पुछु, अगर आप को बुरा ना लगे तो ?" निकुंज को दाव पर दाव खेलना अच्छा लगने लगा था.
"ह्म्म्म" कम्मो के जवाब में अब भी शांति थी बस हल्की सी घुटन का आभास हो रहा था.
"माना वह मेरी ट्रीटमेंट का ही एक पार्ट था मगर क्या आप ने भी उसे एंजाय किया था ? " निकुंज के इस सवाल ने जैसे कम्मो के गुदा द्वार में सनसनी मचा दी, उसके चूचक भी ब्लाउस फाड़ कर बाहर निकलने को आम्दा थे.
"बस कर निकुंज, एक मा और उसके बेटे के बीच इस तरह की बातें शोभा नही देती " सवाल के जवाब में कम्मो कहना तो सिर्फ़ हां चाहती थी मगर उसका व्यवहार कहीं मात्रत्व से रंडी-पने में परिवर्तित ना हो जाए, उसने खुद पर काबू किया.
"जो भी हो मोम !! मैं तो उस रात को कभी नही भूल पाउन्गा, वैसे क्या आप मुझे नीमा आंटी की विवशता का कारण बताएँगी ?" निकुंज के प्रश्न जारी रहे.
कम्मो :- "अभी मुझ में इतनी सहेन-शक्ति नही कि मैं तुझे उसके अब-नॉर्मल जीवन का राज़ बता सकु"
"चलिए फिर कभी सही लेकिन मोम आप खुद में बदलाव लाओगी तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा" कार को घर की पार्किंग में लगाते हुए निकुंज ने कहा.
"बदलाव ?" इस बार कम्मो प्रश्न कर बैठी.
"नीमा आंटी के बच्चे उन्हे सपोर्ट करते हैं, मैं खुद चाहता हू आप भी आज के परिवेश में रहना सीखें" निकुंज ने उन अंडरगार्मेंट्स पर नज़र डालते हुए कहा.
"बहुत बड़ा हो गया है तू, चल मैं कोशिश करूँगी" कम्मो मुस्कुरा उठी.
"थॅंक्स मॉम" निकुंज ने अचानक कम्मो का गाल चूमा और कार से उतर कर घर के अंदर जाने लगा, हैरान कम्मो भी उसके साथ थी.
वहीं शहेर के ही **** होटेल में :-
"मज़ाक ना कर दीदी !! उतार ना अपने कपड़े, देख मैं भी तो नंगा हूँ" लड़के ने बेड पर बैठी अपने बड़ी बहेन से विनती की लेकिन लड़की ने अब तक अपने छोटे भाई के मुताबिक़ कोई काम नही किया था.
"तू मादर्चोद तो बन गया, अब क्या बेहेन्चोद भी बनेगा ?" लड़की ने टॉंट मारा.
"हां बनूंगा !! फिर हम घर से मामा के घर जाने का झूट बोल कर यहाँ होटेल आए हैं. तो अब नाटक छोड़ और नंगी हो जा ना" लड़के ने दोबारा रिक्वेस्ट की.
"मान मेरी बात, ये ग़लत है छोटे" लड़की अपनी बात पर अड़ी रही, हलाकी होटेल में कमरा बुक करने का प्लान खुद उसी का था मगर वह अपने छोटे भाई की प्यास को और भी कहीं ज़्यादा बढ़ाना चाहती थी.
"कोई ग़लत नही दीदी, देख ना कैसे फड़फड़ा रहा है मेरा लॉडा" लड़का अपनी जगह से उठा और लड़की के सुंदर चेहरे पर अपना लंड रगड़ने लगा.
"ह्म्म्म" लड़की ने जोरदार अंगड़ाई ली "हटा इसे मेरी आँखों के सामने से" वह चिल्लाई.
"साली छिनाल, पहले मुझे गरम किया फिर इस होटेल में लाई और अब अपनी गान्ड मरा रही है. मैं जा रहा हू यहाँ से" लड़का बेड से नीचे उतरने लगा, उसकी आँखों में अंगार जल रहे थे.
"कहाँ जा रहा है भाई ?" लड़की ने हौले से पुछा.
"घर !! तेरी मा चोदने" लड़के ने गुस्से से जवाब दिया तो लड़की बेड पर लेट कर लॉट-पोट होने लगी.
लड़का थम गया, आशा के विपरीत की उसकी बहेन इस तरह उसका मज़ाक बनाएगी. क्रोध में भर-कर वह पुनः बिस्तर पर चढ़ा और लेटी सग़ी बड़ी बहेन के गले को अपने हाथ की मजबूती से जाकड़ लिया.
"चल अपना मूँह खोल और चूस मेरा लॉडा, बहुत नाटक कर लिया तूने. अब मैं तेरा रेप करने वाला हूँ" लड़की की गर्दन पर ज़रा सा प्रेशर पड़ने से खुद ब खुद उसका का मूँह खुल गया.
अब तक हुई अश्लील गर्माहट से लड़के का विशाल लंड पत्थर हो चुका था, लाल आलू बुखारे समान सुपाड़ा रस की गाढ़ी बूँदो से सराबोर, जिसे वह अपनी बहेन के खुल चुके गुलाबी होंठो पर फेरने लगा.
"तू भी मज़ा ले इस रस का, मम्मी तो दीवानी हैं मेरे लंड की और जल्द ही तेरी चूत भी इसके नाम की माला जपा करेगी" अट्टहास करते हुए जबरन लड़के ने आधा लंड किसी भाले की भाँति अपनी बहेन के मूँह में ठूँसा और लड़की घबरा कर अपना गला उसकी गिरफ़्त से छुड़ाने की कोशिश करने लगी.
"ना बहना !! अभी तो सज़ा मिलनी शुरू हुई है, बस तू देखती जा कैसे मैं तेरी चुदास मिटाता हू" एक करारी आह के साथ लड़के ने अपनी बहेन के मूँह में धक्के लगाने शुरू कर दिए, वह पूरी तरह जानवर बनता जा रहा था, जानता था उसकी बहेन पीड़ा से घुट रही है मगर लग रहा था जैसे वह उस पर कोई रहम नही करेगा.
"उउल्ल्लूउउउऊप" लड़की को उबकाइयाँ आने लगी, वजह लड़के का लंड उसके गले को चोट करने लगा था.
"आहह !! कितना टाइट जा रहा है. चूस बहना, किस्मत वाली है जो सगे भाई का लंड तेरे मूँह में है" इतना कह कर लड़के ने धक्के मारना बंद कर दिए, वह अपनी बहेन के मूँह से बाहर बहती उसकी लार और खुद के लंड से निकले रस के मिश्रण को गौर से देखने लगा.
"स्नेहा दीदी !! तू बहुत सुंदर है. मुझे नही पता था, मेरा लंड चूसने से मेरी बहेन को इतनी खुशी मिलेगी कि उसकी आँखें छलक उठेंगी. विक्की से पंगा ले रही थी ना, अब भुगत"
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ये दोनो नीमा के बच्चे हैं, एक रात पानी की प्यास ने स्नेहा को उसके कमरे से बाहर आने पर मजबूर किया. वह कमरे से बाहर निकली ही थी कि हॉल का नज़ारा देख उसकी प्यास गले से नीचे खिसक, उसकी कुँवारी चूत में उठने लगी.
हॉल की सारी लाइट्स ऑन थी और विक्की अपनी मम्मी को सोफे पर कुतिया बना कर चोद रहा था. स्नेहा को लगा कहीं ये सपना तो नही लेकिन उसकी मम्मी और छोटे भाई की सिसकारियों ने उसे हक़ीक़त का अंदाज़ा करवा दिया.
किसी कुँवारी लड़की के लिए चुदाई देखना बड़ी बात है मगर चुदाई उसकी मा और सगे भाई के बीच हो तो क्या कहने, स्नेहा उस रात तब तक झड़ती रही जब तक हॉल की रास-लीला समाप्त नही हो गयी.
देखने से ही पता चल रहा था कि उसकी मा और भाई काफ़ी लंबे अरसे से इस पाप में लिप्त होंगे, और अंत में जिस कामुकता से एक मा ने अपने बेटे का वीर्य चखा, स्नेहा बेहोश होते-होते बची.
रात भर चूत की आशाए जलन और मन में उठ रहे दर्ज़नो सवाल, स्नेहा सिर्फ़ करवटें बदलती रही.
रात बीती नयी सुबह आई मगर वह सो ना सकी, हलाकी उसके दिल ओ दिमाग़ में अपनी मा और भाई के लिए ज़रा भी नाराज़गी नही थी बल्कि रोमांच से उसकी चूत अब तक बहे जा रही थी.
छुट्टियों के दिन थे तो बच्चे और उनकी मा, मन चाहे समय तक नींद पूरी करते, उस दिन भी ठीक वैसा ही हुआ.
दोपहर 11:30 तक स्नेहा अपने बिस्तर पर रही. फिर जब उससे और ना लेटा गया तो वह किसी चोर के समान कमरे से बाहर आई.
किचन से आती हसी मज़ाक की आवाज़ो ने ज़ाहिर किया कि अंदर उसकी मा और भाई विक्की पहले से मौजूद हैं, वह दबे पाव किचन की तरफ बढ़ी और दरवाज़े से अंदर झाँका.
उसकी मा नीचे ज़मीन पर बैठी थी और विक्की खड़ा, मा को अपना लंड चुस्वा रहा था. नीमा की पीठ दरवाज़े की तरफ होने से वह स्नेहा को नही देख पाई लेकिन विक्की की आँखें अपनी बड़ी बहेन पर बाज़ की भाँति जमी रह गयी.
दोनो भाई-बहेन स्टॅच्यू बन चुके थे, ना तो स्नेहा द्वारा कोई हरक़त हुई और ना ही विक्की द्वारा और फिर अचानक से नीमा के मूँह की गर्मी विक्की बर्दाश्त नही कर पाया.
"आहह मोम" विक्क की आँखें बंद, बदन धनुषाकार हो गया और नीमा का सर पकड़ कर उसने अपना विशाल लंड, उसके कंठ तक ठेल दिया.
वहीं नीमा भी इस अप्रत्याशित हमले को सह नही पाई और हड़बड़ाहट में विक्की की जांघे नोचने लगी, उसे अचंभा हुआ कि अचानक से विक्की ने अपना पूरा लंड उसके गले में क्यों ठूंस दिया.
जब तक विक्की के टटटे खाली नही हुए उसने अपनी मा को नही छोड़ा और जब वीर्य-पात के पश्चात अपनी आँखें खोली तो देखा "स्नेहा किचन के दरवाज़े पर नही थी"
उसने फॉरन अपनी मा पर इस सच को ज़ाहिर करना चाहा मगर घबराहट में कुच्छ भी कह ना सका.
नीमा की हज़ार समझाशों के बावजूद भी वह अपनी मन-मर्ज़ी से सुबह के वक़्त, उसके मुख-चोदन का आनंद लेने को मचल रहा था और तभी उसने स्नेहा द्वारा पकड़े जाने वाली बात अपनी मा से छुपा ली.
उस दिन विक्की बहुत बेचैन रहा "कहीं स्नेहा भड़क ना उठे" मगर जब सांझ बीत जाने तक स्नेहा चुप रही तो उसका साहस बढ़ने लगा और उसी रात उसने अपनी मा को दोबारा चोदा लेकिन इस बार भी स्नेहा उसके द्वारा, उनकी चुदाई देखती पकड़ी गयी.
"लगता है दीदी की चूत भी जल्द ही चखने मिलेगी" सेक्स के दौरान विक्की ने सोचा और अपनी बड़ी बहेन के सामने जान-बूझ कर, मुस्कुराते हुए, अपनी मा को चोदता रहा. शायद अपने चुदाई कौशल का प्रदर्शन कर रहा था.
स्नेहा ने उस रात अपनी स्कर्ट के अंदर हाथ डाल, विक्की के सामने ही अपनी कुँवारी चूत मसली थी और ये वह संकेत था जो अगले ही दिन, आज वे इस होटेल के बंद कमरे में उस अधूरे महा-पापी कार्य को पूरा करने आए थे.
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"बहुत छुप-छुप कर अपनी मा को चुदते हुए देखने का मन होता है ना दीदी और तेरी चूत भी बहती है. चल आज मैं तेरा लीकेज फुल और; फाइनल ठीक कर देता हूँ" विक्की ने पुरजोर ताक़त से अपना लंड स्नेहा के मूँह में ठेलते हुए कहा और कुछ सेकेंड्स बाद बाहर खीच लिया.
"ओह" स्नेहा जोरो की साँस लेने लगी और विक्की के हाथ की गिरफ़्त ढीली पड़ते ही एक जोरदार मुक्का उसकी पीठ पर जड़ दिया.
"मादरचोद !! जान लेगा क्या मेरी ?" अपनी लार से सना विक्की का लंड हाथ में पकड़ कर स्नेहा उसे इस तरह मरोड़ने लगी जैसे उसे तोड़ ही डालेगी.
"उफफफफ्फ़ दीदी नही" अब तड़पने की बारी विक्की की थी, लेकिन वह ज़्यादा शोर मचाता इससे पहले ही स्नेहा ने अपना चेहरा लंड पर झुकाते हुए वापस उसे चूसना शुरू कर दिया.
"ह्म्म्म !! स्ट्रेंज सा टेस्ट है भाई, मगर मज़ा आ रहा है" स्नेहा ने आँख मारते हुए विक्की से कहा "कमिने !! मैं जान-बूझ कर तुझे उकसा रही थी तो क्या तू मुझे जान से ही मार डालता ?"
विक्की ने देखा दीदी तो लगातार उसका पोपट बनाती जा रही है "तुझे नही दीदी !! तेरी चूत मारूँगा" वह भी खिलखिला कर हँस पड़ा.
विक्की :- "दीदी एक बात पूच्छू ?"
स्नेहा उसका लंड चूसने में मगन थी तो सिर्फ़ अपनी पलकें उठाते हुए, हां में इशारा किया.
"तूने मोम और मुझे चुदाई करते देखा लेकिन नाराज़ नही हुई. क्यों ?" विक्की ने सवाल किया.
"पुचह " स्नेहा ने अपने गुलाबी होंठो की गिरफ़्त टाइट करते हुए लंड मूँह से बाहर खीचा "क्यों कि मैं मोम को शर्मसार होते नही देख पाती"
"मगर दीदी" विक्की कुच्छ कहता इससे पहले ही स्नेहा ने उसे टोक दिया.
"टॉपिक चेंज कर भाई, मुझे तेरे और मोम के बीच होते सेक्स से कोई प्राब्लम नही" वह लंड चूसने में आनंदित थी.
"दीदी मुझे तेरी चूत देखनी है !! अब तो नंगी हो जा" विक्की का कमीना-पन वापस जाग रहा था.
स्नेहा :- "मगर एक शर्त पर"
विक्की :- "क्या ?"
"आज हम सेक्स नही करेंगे" स्नेहा की बात सुन कर विक्की का मूँह लटक गया.
"अरे मेरा छोटा भाई तो उदास हो गया, हम चुदाई ज़रूर करेंगे लेकिन उस दिन, जब मोम खुद तेरा लंड अपने हाथ से मेरी चूत में डालेंगी" विक्की को चौकाते हुए स्नेहा मुस्कुराइ "और वो कैसे होगा, मैने सब प्लान कर लिया है"
"वाउ !! मतलब थ्रीसम दीदी" विक्की की बाछे खिल गयी और उसने स्नेहा के मूँह में ज़ोर से धक्के देने शुरू कर दिए.
कुच्छ देर यूँ ही लंड चुसाई का दौर चला, जहाँ स्नेहा ने पहली दफ़ा कोई लंड चूसा था वही विक्की भी फर्स्ट टाइम कोई कुँवारी चूत देखने के सपने संजोए बैठा था.
"दीदी अब ना तडपा !! नंगी हो जा फिर मैं तुझे बताउन्गा, किस तरह हम दोनो एक साथ, एक दूसरे को ओरल सॅटिस्फॅक्षन दे सकते हैं" विक्की से सबर ना होते देख स्नेहा ने उसका लंड अपने मूँह से बाहर निकाला और बेड पर खड़ी होने लगी.
"मुझे मत सिखा चूतिए, 69 पोज़िशन मुझे भी समझ आती है" स्नेहा की इतनी जानकारी को जान विक्की को लगा "कहीं दीदी खेली खिलाई तो नही"
स्नेहा ने खड़े-खड़े अपने दोनो हाथ स्कर्ट के अंदर डाले और पहनी हुई वाइट कॉटन पैंटी झटके से पैरो से बाहर निकाल दी.
"अब ठीक है" वह बड़े कामुक अंदाज़ में बोली मगर अपनी कुँवारी चूत का रत्ती भर दर्शन विक्की को नही होने दिया.
"दीदी तेरी कछि तो पूरी गीली है, वाउ !! क्या खुश्बू है तेरी चूत की" विक्क चील की तरह अपनी बहेन की पैंटी पर झपटा और उसे सूंघते हुए अपना लंड हिलाने लगा.
"मतलब इतने में तेरा काम हो जाएगा" स्नेहा बेड से नीचे उतरने को हुई "तो फिर जल्दी फिनिश कर और फिर हमे मामा के घर भी जाना है" एक और बार उसने विक्की की झन्ड कर दी थी.
"मगर ना तो मैने तेरी चूत देखी ना चूसी, फिर ?" विक्की मायूसी से बोला.
"तो फिर अपना लंड छोड़ और दीदी को पकड़" पकडम-पकड़ाई खेल शुरू हो चुका था.
स्नेहा ने विक्की को अपनी कामुक अदाओ से ललचाना शुरू किया और कमरे में दौड़ लगाने लगी. दौड़ते वक़्त उसकी सुडोल चूचियों का तेज़ी से ऊपर-नीचे होना और साथ ही चूतडो का आपस में घिसना, मटकना. विक्की के सख़्त लंड में दर्द की असीम पीड़ा उत्पन्न कर रहा था.
"दीदी रुक जा !! अगर पकड़ में आई ना तो तेरी खेर नही" विक्की निरंतर इस प्रयास में लगा रहा कि जल्द से जल्द अपनी बहेन को नग्न अवस्था में देख सके.
"दम हो तो पकड़ ले" स्नेहा ने उसे जीभ चिढ़ा कर कहा. जब विक्की बेड के नज़दीक होता, वह सोफे के पिछे चली जाती और जब विक्की सोफे के नज़दीक आता तो वह बेड के चक्कर काटने लगती.
"उफफफ्फ़ !! मैं तो थक गया" जब विक्की थक़ान से चूर हो गया तब हार-कर सोफे पर निढाल होते हुए बोला.
"बस इतने में ही. अरे मुझे तो लगा, कि तू खुद अपने हाथो से मेरे कपड़े उतारेगा" स्नेहा अपनी जीत पर इतराई.
"ना ना !! अब और ताक़त नही मुझ में. तरस खा ना दीदी अपने छोटे भाई पर" विक्की का चेहरा मायूसी से लटक गया.
वहीं स्नेहा का दिल भी पसीजा "चल ठीक है, मैं उतारती हूँ" वह अपने चूतडो को विक्की की दिशा में घुमाते हुए बोली.
स्कर्ट के अंतिम छोर को हाथ में पकड़ कर स्नेहा ने उसे हौले-हौले अपनी मोटी-मोटी जाँघो तक ऊपर उठा लिया.
"यस दीदी !! बिल्कुल सही जा रही हो" विक्की के लौडे की अकड़न भविश्य की कल्पना से और भी ज़्यादा बढ़ने लगी "काश मैं ये नज़ारा करीब से देख पाता" वह अपने लंड को हिलाते हुए बोला.
"मगर तू मुझे च्छुएगा ?" जांघे बे-परदा करने के बाद स्नेहा ने अपने भाई की डिमॅंड पर गौर किया.
विक्की :- "पास आजा दीदी !! प्रॉमिस तुझे टच नही करूँगा"
"सोच ले तूने वादा किया है विक्की !! मेरे बदन को हाथ नही लगाएगा" स्नेहा ने री-कन्फर्म किया.
"पक्का !! हाथ नही लगाउन्गा" विक्क की आँखें चमक उठी.
स्नेहा ने सेम पोज़िशन में अपने कदम विक्की की दिशा में बढ़ा दिए और सोफे पर बैठे अपने छोटे भाई के बेहद करीब आ कर खड़ी हो गयी.
"ओह दीदी !! कितनी चिकनी जांघे हैं तेरी" विक्की सिसका, उसकी बहेन की टाँगो पर बाल रूपी एक भी रेशा नही था "हां अब ठीक है !! उठा स्कर्ट अपनी" वह सब्र करने की सिचुयेशन से कोसो दूर था.
वहीं उससे कहीं ज़्यादा खराब हालत स्नेहा की थी, आज वह अपने सगे छोटे भाई के सामने नग्न होने जा रही थी. अपने गुप्ताँग जो हर जवान लड़की सिर्फ़ अपने भावी पति को सौंपती है, स्नेहा अपने भाई के सुपुर्द कर रही थी.
"भाई" वह लो वाय्स में बोली "मुझे शरम आ रही है"
विक्की :- "मैं जानता हूँ दीदी !! मेरे साथ भी कुच्छ ऐसा ही हुआ था जब पहली बार मोम ने मेरा लंड अपने हाथो में पकड़ा, फिर बात लंड चूसने पर पहुचि और आज हम दोनो सेक्स को खूब एंजाय करते हैं. खेर शरम का भी अपना एक अलग ही मज़ा है.
"हम दोनो भाई-बहेन हैं विक्की और आज से पहले मेरे मन में तेरे लिए कोई ग़लत ख़यालात नही आए. क्या तू फिर भी अपनी सग़ी बड़ी बहेन को नंगी देखना चाहता है" अत्यधिक रोमांच से कामुक होती स्नेहा का कथन सुन कर विक्की भी हैरत में पड़ गया.
"तो फिर क्या करें दीदी ?" विक्की कोई भी निर्णए लेने में असमर्थ दिखा "मामा के घर चलें ?"
"मगर तेरी इक्षा का क्या भाई ? क्या तू ऐसा मोका छोड़ सकता है जब कोई लड़की तेरे सामने अपना सब कुच्छ न्योछावर करने को तैयार हो ?" स्नेहा ने विक्की का आंतरिक मन जान-ना चाहा.
"दीदी !! यदि वो लड़की कोई और होती, तो मैं कभी ना रुकता मगर तू मेरी बहेन है, मुझसे बड़ी है और हमारा खून का रिश्ता है. अब अगर तू नही चाहती तो मैं तुझे फोर्स नही करूँगा" विक्की ने समझदारी का परिचय दिया तो स्नेहा के मन में भी उसके लिए प्रेम उमड़ पड़ा.
"तभी तो मेरा दिल मेरे छोटे भाई पर आया है" इतना कह कर स्नेहा ने अपनी आँखें बंद कर ली और स्कर्ट को जाँघो से ऊपर खीचती हुई, अपनी चूतडो की दरार के स्टार्टिंग पॉइंट तक ले आई.
विक्की तो जैसे शून्य में परिवर्तित हो चला था, स्नेहा ने एक गहरी साँस ली और इसके फॉरन बाद स्कर्ट को पूरी तरह से अपनी कमर के ऊपर चढ़ा लिया.
"देख ले भाई तेरी बहेन की कातिल जवानी" स्नेहा आगे को झुकती चली गयी और अगले ही पल विक्की की पथराई आँखों के सामने उसकी सग़ी बड़ी बहेन की चिकनी कुँवारी चूत और गान्ड का अन्छुआ भूरा छेद अवतरित हो गया.
स्नेहा की पलकें मुंदी थी, वह अपने दिल में उठ रही हर उस आवाज़ को बंद कर देना चाहती थी जो चीख-चीख कर उससे कह रही थी "विक्की तेरा भाई है, तुझे 5 साल छोटा. मत कर ये पाप और छुपा ले अपनी शरमगाह"
कमरे में पसरा सन्नाटा ज़्यादा देर टिक नही पाया और विक्की ने अपनी मंत्रमुग्ध अवस्था का त्याग कर, नीचे झुकाते हुए, स्नेहा की रस से सराबोर चूत पर अपने सुस्क होंठ चिपका दिए.
"उफफफफफफफफ्फ़ भाई" स्नेहा की सिसकी से बंद कमरा गूँज उठा. उसके अनुमान की धज्जियाँ उड़ाते हुए, उसके छोटे भाई ने उसकी कुँवारी चूत पर हमला बोल दिया था.
विक्की की नाक स्नेहा के नर्म गुदा द्वार से पूरी तरह सटी और सूखे होंठ खुद ब खुद गीले हो कर बहेन की कुँवारी चूत से बहते गाढ़े रस का, रस-पान करने लगे थे.
"बेड पर चल भाई !! मैं ज़्यादा देर इस तरह खड़ी नही रह पाउन्गि" टाँगो में होते कंपन ने ज़ाहिर कर दिया, कि अब स्नेहा भी खुल कर इस खेल का आनंद लेना चाहती है.
विक्की ने अपनी बड़ी बहेन की बात का समर्थन करते हुए उसकी चूत से अपना मूँह हटा लिया और वे दोनो जल्द ही बेड पर एक-दूसरे के समानांतर लेट चुके थे.
स्नेहा की अनियंत्रित चढ़ि साँसें और उसकी खूबसूरती से हैरत में पड़ा उसका छोटा भाई मानो किसी गरम रेत के रेगिस्तान में भटक रहा था, जिसे अब जल्द ही किसी शीतल झरने को पाने की आस थी.
"ऐसे क्या देख रहा है भाई ?" स्नेहा उसकी एक-टक नज़र को ज़यादा देर सह नही पाई और उससे पुच्छ बैठी.
विक्की भी सपने से बाहर आया "दीदी तेरी आँखें कितनी प्यारी है, होंठ जैसे गुलाब की पंखुड़ी, सुराही दार गर्दन. खेर बाकी तो मैने कुच्छ नही देखा लेकिन तेरी चूत वाकाई लाजवाब है" वह शायराना अंदाज़ मे बोला.
"अच्छा भाई !! कहीं तेरा दिल मोम से हट कर अपनी बहेन पर तो नही आ गया ?" स्नेहा ने दोबारा सवाल किया.
"ऐसा नही है दीदी !! मोम और तुझ में ज़मीन-आसमान का अंतर है" कहते हुए विक्की उठा और अपनी बहेन की टाँगो के दरम्यान बैठने लगा.
"वो क्यों भला ?" स्नेहा समझ गयी विक्की दोबारा उसकी चूत को बे-परदा करेगा लेकिन जानते हुए भी उसने कोई आपत्ति नही जताई, बल्कि अपनी टाँगो की जड़ को विपरीत दिशा में फैलाने लगी.
"मोम तुझसे काफ़ी बड़ी हैं, और उनका बदन भी तुझसे ज़्यादा गदराया हुआ है" विक्की ने स्नेहा की स्कर्ट को उसके सपाट पेट पर पलट-ते हुए कहा, खुद उसकी बहेन ने इस कार्य में अपनी गान्ड बेड से ऊपर उठाते हुए उसकी मदद की.
"हां मोम का शरीर थोड़ा हेवी है और वेट भी मुझसे ज़्यादा है लेकिन तू कह रहा है ज़मीन-आसमान का अंतर है. क्यों ?" स्नेहा की चूत से बहते रस का कोई अंत नही था और विक्की का हाथ हल्के-हल्के उसकी मोटी जाँघो को सहला रहा था.
"ह्म्म तू सही है दीदी मगर सबसे बड़ा अंतर क्या है, बताउ ?" विक्की के सवाल के जवाब में बेड पर लेटी स्नेहा ने अपना सर हां के इशारे में हिलाया.
"तेरी ये कुँवारी चूत काफ़ी टाइट, चिपकी हुई और छोटी है वहीं मोम की चूत के होंठ पूरी तरह खुले, इतनी टाइट नही और बहुत बड़ी भी है" विक्की ने बेहद अश्लीलता से अपनी मा और बहेन की योनि का अंतर समझाया.
"भाई !! एक तो उन्होने डॅड के साथ आधी उमर तक सेक्स किया, फिर अब तेरे साथ कर रही हैं और तू ये कैसे भूल गया कि हम दोनो भाई-बहेन भी तो उसी चूत से बाहर निकल कर इस दुनिया में आए हैं. अब हमेशा तो औरत की चूत किसी कुँवारी लड़की जैसी नही रहेगी ना" स्नेहा ने सच बयान किया.
"ओ तेरी !! मैं तो भूल ही गया था, खेर दीदी तेरी तो अब तक झान्टे भी नही उगी हैं" विक्की ने अपने दाएँ हाथ की मद्धिम उंगली चूत की नर्म व सूजी फाँक पर फेरते हुए कहा.
"आहह भाई !! वो मेरे मेन्स्ट्रवुशन कल से स्टार्ट हैं तो मैने क्रीम से सारे बाल सॉफ कर लिए" स्नेहा तड़प्ते हुए बोली, ये पहला मौका था जब किसी मर्द का हाथ उसकी चूत के इतना करीब था.
"चल ठीक है दीदी !! अब तो मुझसे रहा नही जाता. तेरी चूत चाटने से खुद को रोक नही पा रहा हू" कहते हुए विक्की ने खुद को अपनी बहेन की टाँगो के बीच स्थापित किया और उसकी दोनो खुली जाँघो और ऊपर उठाते हुए अपने चेहरे को उनकी जड़ की दिशा में तब तक नीचे झुकता गया, जब तक उसके होंठो का क़ब्ज़ा स्नेहा की कुँवारी चूत से ना हो गया हो.
"उफफफफफ्फ़ भाई !! चाट ले, प्यार कर अपनी बहेन को भी, जैसे तू मोम के साथ करता है" स्नेहा की उबल्ति चूत में सैकड़ों चीटियों द्वारा काटे जाने समान दर्द उठने लगा और अपने भाई के सर को वह कठोरता से अपनी घायल होती जा रही चूत के मुख पर दबाने लगी.
"ह्म्म्म !! लव मी भाई, लव मी" वह घुर्राई बदले में विक्की ने अपनी वही उंगली जिसे कुच्छ देर पहले वह चूत की चिपकी फांको पर फेर रहा था, झटके से चूत की सन्करि घाटी में पूरी ताक़त से उतार दी.
"खचह" कुछ ऐसी ही आवाज़ दोनो भाई-बहेन के कानो को भेद गयी.
"आहह !! भेन्चोद निकाल अपनी उंगली बाहर, मैने आज तक कुच्छ भी अंदर नही डाला है" स्नेहा ने विक्की के सर के बालो को नोंछते हुए कहा "भाई सिर्फ़ चूस या चाट मगर अंदर कुच्छ ना डाल, मैं प्यार करने को थोड़ी मना कर नही रही हूँ"
विक्की ने अपनी बहेन की आग्या का पालन करते हुए अपनी उंगली को हौले-हौले बाहर निकाला तो उंगली के साथ ही जैसे रस की, मोटी धार भी बाहर खीची चली आई.
"एम्म्म एम्म्म" धरती पर अपनी बड़ी बहेन को स्वर्ग का दीदार करवाते हुए विक्की सारी गाढ़ी मलाई, होंठो के ज़ोर से मूँह के अंदर सुड़कने लगा, खीचने लगा.
उसकी जीभ निरंतर चूत की जुड़ी फांको को लंड की तरह चोद रही थी और बारी-बारी उसने दोनो फाको को होंठो के दरमियाँ कठोरता से भींच, दबा-दबा कर चूसा जिसके प्रभाव से जल्द ही चूत का भज्नासा भी अपना सर उठाए उसके होंठो से द्वंद करने की अभिलाषा लिए प्रकट हो गया.
स्नेहा की चूत मे ऐंठन शुरू हुई, संकुचन बढ़ गया, लगा जैसे अन्द्रूनि संकरे मार्ग से कोई बलिष्ठ वास्तु अत्यधिक कोशिशो के बावजूद भी बाहर नही निकल पर रही हो "भाई ज़ोर लगा और खा जा मेरी चूत को" वह बल खाई नागिन की तरह मचल उठी.
दर्ज़नो बार अपनी मा के साथ पापी संबंध बनाने के तजुर्बे ने जल्द ही विक्की की जीब और होंठो का रुख़ चूत के सूजे भग्नासे की तरफ केंद्रित कर दिया और इतनी प्रवीनता से उसने उसे चूसा, जैसे आज के बाद वह मोटा दाना कभी अपना सर नही उठा सकेगा.
"ओह्ह ह्म्म" स्नेहा के आनंद की ये पराकाष्ठा थी.
"ले मसल इन्हे भी" कामन्ध स्नेहा ने अपनी चूचियों की तरफ इशारा किया तो विक्की के दोनो हाथ एक-साथ उन्हें दबाने के उद्देश्य से उन पर टूट पड़े.
बड़ी बहेन के तने चुचकों की घुंडी ना भीच पाने का गम विक्की ने उन्हे अति-कठोरता से मसल्ने में पूरा किया, हलाकी स्नेहा की चूचियाँ आकार में नीमा से कुच्छ कम थी मगर उनका माँस बेहद टाइट था. विक्की के हाथो की उंगलियाँ तेज़ी से उन्हे पंप करने लगी थी.
नीचे कुँवारी चूत पर भाई के होंठो का कसाव और अन्छुइ चूचियों पर उसके हाथो के दबाव ने स्नेहा को अपने चूतड़ उच्छालने पर मजबूर कर दिया, लगा जैसे वह खुद अपने भाई के मूँह को चोद रही हो.
"भाई" स्नेहा पुरजोर ताक़त से चीखी, अपनी चूत के अन्द्रूनि मार्ग में उसे रस उमड़ता महसूस हुआ "मर गयी" इतना कहते ही जो अवरुद्ध वास्तु उसकी चूत से बहार आने को लालायित थी, किसी फुहार की भाँति सैलाब बन कर निकल पड़ी.
"आहह" स्नेहा के गुदा-द्वार में अजीब सी सिरहन और चूचक जैसे भाले की नोक बन गये. पहली बार जब कोई कुँवारी स्त्री अपने ऑर्गॅज़म को प्राप्त करती है, उस आनंद की कल्पना शब्दो में लिख पाना महज एक चूतियापा ही होगा.
विक्की की सफलता का प्रमाण उसकी आँखों के सामने था, रस की काई मोटी-मोटी धारे वह सीधे अपने गले में उतारने लगा. उसके होंठ बेहद कड़कता से बहेन की जवानी चूसने में मगन थे और जीभ शीघ्र अति-शीघ्र चूत-मुख को रगड़ कर छील्ति जा रही थी.
लगभग पूरे एक मिनिट तक स्नेहा अपनी कमर उठाए झड़ती रही, उसके रति-रस का त्याग होता रहा. सगा भाई भी प्रेम-पूर्वक उसकी चूत सहलाता रहा, चूस्ता रहा, चाट-ता रहा, चुंबनो की झड़ी लगाता रहा और अंत में स्नेहा ने अपनी उखड़ी सांसो को समहालते हुए विक्की को अपने बदन के ऊपर खीच लिया.
"भाई" इससे ज़्यादा वह कुछ ना कह सकी और विक्की के चेहरे को गौर से देखा, जो पूरा स्वयं उसके काम रस से तर था, भीगा था.
"दीदी तू खुश है ना ?" विक्की की छाति के ठीक नीचे उसकी बहेन के स्तन थे, जिनकी कठोरता वह सॉफ महसूस करने लगा. बहेन की चूचियाँ किसी धुकनी के समान धड़क रही थी और वह खुद भी तेज़-तेज़ हंपायी ले रहा था.
"बहुत खुश मेरे भाई" स्नेहा ने अपने होंठ विक्की के होंठो से जोड़ कर उसकी मेहनत का पुरूस्कार उसे प्रदान किया, हलाकी चूत रस के स्वाद से वह वाकिफ़ थी मगर भाई के होंठो से लग कर जैसे उस रस का स्वाद अत्यधिक स्वादिष्ट हो गया था.
"अच्छा भाई !! तुझे कैसा लगा मेरी चूत चाटना ?" स्नेहा ने चुंबन तोड़ा और विक्की के चेहरे को अपने हाथो में थाम कर पुछा.
"मुझसे मत पुच्छ दीदी, मेरे लंड से पुच्छ. देख ना, कैसे दर्द के मारे मेरी जान निकल रही है" विक्की ने कहने के साथ ही अपने कड़क लंड को, स्नेहा की झाड़ चुकी चूत से रगड़ना शुरू किया तो जैसे दोनो ही पिघल कर रह गये.
"ना भाई !! ऐसा ग़ज़ब ना करना. रुक मैं कुच्छ करती हूँ" उत्तेजना-वश विक्की कहीं उसकी कुँवारी चूत के अंदर अपना विशाल लॉडा ना ठूंस दे, घबरा कर स्नेहा ने उसे अपने ऊपर से हटने का इशारा किया और खुद भी बेड पर उठ कर बैठ गयी.
"तूने मेरा दर्द मिटाया भाई, ला मैं तेरा मिटाती हूँ" स्नेहा का आशय समझ कर विक्की के चेहरे पर मुस्कान फैल गयी "लेट कर चूस दीदी, साथ में मैं भी तेरी चूत से खेलूँगा" वह बोला.
स्नेहा :- "और अभी जो इतनी देर तक मेरी चूत से चिपका पड़ा था, मन नही भरा क्या तेरा ?"
"कभी भरेगा भी नही दीदी. फिकर ना कर, मैं उंगली अंदर नही डालूँगा बस ऊपर-ऊपर से थोड़ी देर सहलाउन्गा" विकी की बात से सुंतुष्ट हो कर स्नेहा ने हामी भर दी और पुनः लेट कर अपने भाई के गर्माते लौडे को अपने कोमल हाथ से हिलाने लगी.
विक्की के लिए उसने अपनी टाँगो की जड़ काफ़ी हद्द तक खोल रखी थी और जल्द ही दोनो अपने कार्य में जुट गये.
लंड को जड़ से पकड़ कर स्नेहा ने रस उगलते सुपाडे पर अपनी खुरदूरी जीभ से चाटना शुरू किया तो सिसक कर विक्की ने भी उसकी चूत को अपनी मुठ्ठी में भींचा.
कुच्छ देर अपनी जीभ को गोलाकार आक्रति में सुपाडे पर घुमाने के पश्चात स्नेहा ने लंड को मुठियाना शुरू किया और सुपाडा समेत आधा लंड अपने मूँह में प्रवेश करवा लिया. बिना किसी जानकारी के भी वह लंड की सतह पर अपना मूँह तेज़ी से ऊपर-नीचे कर रही थी.
"तेरी चूत तो टाइट है ही दीदी, तेरा मूँह भी बेहद गरम है. लग रहा है जैसे चूत की फांकों के भीतर हो" विक्की ने अपनी बहेन की हौसला-अफ़ज़ाइ की तो स्नेहा ने कठोरता से लॉडा चूसना आरंभ कर दिया.
लंड की जड़ मुठियाने से लगातार सुपाडा खाल के अंदर-बाहर होने लगा था और स्नेहा मूँह के भीतर कभी उस पर अपनी जीभ घुमाने लगती तो कभी कड़क होंठो से बलपूर्वक चूसना शुरू कर देती, विक्की को दोहरे आनंद की प्राप्ति हो रही थी.
स्नेहा की चूत के दाने ने संवेदनशील हो कर वापस अपना सर ऊपर उठाया और इस बार विक्की के अंगूठे और प्रथम उंगली के बीच फस कर दम तोड़ने लगा.
"दीदी मैं करीब हू" जाने कब से विक्की खुद पर नियंत्रण रखे था लेकिन आगे कब तक रख पाता, ज्यों ही स्नेहा के मूँह का कसाव प्रचंड हुआ, वह झाड़ पड़ा और साथ ही भाई के वीर्य का स्वाद मूँह में आते ही, स्नेहा ने भी दोबारा पानी छोड़ दिया.
अनेक प्रकार की कामुक चीखों ने कमरा दहला दिया और शुरुआत हुई उस पाप की, जो इंसानी समझ में सिवाए कलंक के, कुच्छ और ना था.
ऑफीस के बाथरूम में दीप अपनी छोटी बेटी निम्मी के साथ नहाने में व्यस्त था और तभी रेस्टरूम में रखा उसका सेल बजने लगा.
दोनो शवर के नीचे नग्न खड़े एक दूसरे के होंठो का रस्पान कर रहे थे, निम्मी तो पूर्ण-रूप से मदहोशी का शिकार थी मगर दीप ने अपने सेल की धुन पहचान ली.
"बेटा !! अंदर मेरा सेल बज रहा है, मैं एक मिनिट में आया" दीप ने उस गहरे चुंबन को तोड़ा और रेस्टरूम में जाने लगा.
"डॅड !! प्लीज़ जल्दी आना" निम्मी ने कदम बढ़ाते दीप का हाथ थाम कर कहा. पिता ने देखा, उसकी बेटी को उस अखंड चुंबन के टूटने का बेहद अफ़सोस है.
दीप दोगुनी तेज़ी से पलट कर निम्मी के करीब आया "बजने दे, बाद में बात कर लूँगा" उसने अपनी वृहद बाहें फैलाई और अत्यंत खुशी से अभिभूत, उसकी बेटी उनमें समा कर क़ैद हो गयी.
"ओह्ह्ह्ह निम्मी !! जाने क्यों मैं पल भर के लिए भी तुझसे अलग नही रह पाता" दीप ने बलपूर्वक उसे दबोचा, उसके दोनो हाथ बेटी के मांसल व गीले चूतड़ पर कस चुके थे.
"उफफफफ्फ़ !! मैं भी डॅड" अपने पिता के हाथो की वास्तविक स्थिति महसूस कर निम्मी सिसक उठी, वह खुद अपनी चूत का मुलायम घर्षण पिता के अध्खडे लंड को, पुनः जाग्रत करने के उद्देश्य में भिड़ चुकी थी.
दीप अत्यधिक कठोरता से चुतडो के दोनो पाट भींचता और नियमित अंतराल से अपना हाथ उनकी गहरी घाटी में घुसाने लगता, नतिजन उसकी उंगलियाँ यादा-कदा बेटी के अती-संवेदनशील अन्छुए गुदा-द्वार से टकरा जाती और दोनो के नंगे बदन बुरी तरह काँप उठते.
जीभ का जीभ से जुड़ाव, छातियों का आपसी टकराव, चूत पर लंड का लिसलिसा घर्षण और गुदा-द्वार में उंगलियों का भेदन. जल्द ही दोनो असहनीय कामवासना के शिखर की तरफ प्रस्थान करने लगे थे.
दीप ने दोबारा चुंबन तोड़ा "निम्मी" वह अपनी बेटी का नाम पुकारने लगा जो उस वक़्त अपनी आँखें बंद किए, उत्तेजना के भंवर में अनगिनत गोते खा रही थी.
"ह्म्म्म" निम्मी ने बंद पलके खोली और काफ़ी लो वाय्स में जवाब दिया.
"और चुदेगि ?" डीप ने अपनी आँखों का कॉंटॅक्ट बेटी की आँखों से जोड़ कर पुछा और अपनी मिड्ल लोंग फिंगर को निम्मी की गंद के छेद के अंदर ठेलने की कोशिश की.
"औछ्ह डॅड !! दुख़्ता है" शरम और पीड़ा के एहसास मात्र से निम्मी दोहरी हो गयी, खुद ब खुद उसके बदन का सारा भार एडियों से हटा कर, पंजो के बल ऊपर उठने लगा.
"बोल ना बेटी, लेगी क्या डॅडी का लंड फिर से अपनी चूत में ?" निम्मी की आशय स्थिति का पूर्ण आनंद लेते हुए दीप ने अपना अश्लील सवाल दोहराया.
निम्मी का चेहरा सुर्ख लाल था, वासना और लाज का मिश्रण उसे और भी ज़्यादा खूबसूरत बनाता जा रहा था. हलाकी दोनो बाप-बेटी अब काफ़ी खुल चुके थे मगर निम्मी से कुच्छ बोलते नही बन पाया और स्वतः ही उसकी पलकें झुकती चली गयी.
"क्या तुझे मज़ा नही आ रहा ?" दीप ने अपनी लंबी जिह्वा का इस्तेमाल करते हुए उसका दाहिना गाल चाटा, वह खुद बेहद उत्तेजित हो चुका था और इसका प्रमाण उसका विशाल लॉडा बेटी की रस छोड़ती चूत पर लगातार ठोकर मारते हुए दर्शा रहा था.
"डॅड" अचानक निम्मी के बंद होंठ फड़फडाए "जैसा आप को उचित लगे" गुदा के कुंवारे छेद पर अपने पिता की मोटी उंगली के असन्ख्य प्रहार ने उसे बोलने पर मजबूर कर दिया था.
"मेरा तो बहुत मन है मगर मैं तेरे मूँह से सुनना चाहता हूँ, बोल क्या दोबारा चुदेगि अपने बाप से ?" इस बार दीप की कोशिश रंग लाई और उसकी उंगली लगभग 2 इंच तक बेटी के नर्म गुदा-द्वार में घुस गयी.
"आहह डॅड !! बोला तो मैने जो आप चाहते हो कर लो" निम्मी ने अपनी सहमति जताई, उसके लिए अब एक भी क्षण रुक पाना नामुमकिन था.
"तू बोलेगी तो चोदुन्गा वरना नही" दीप ने नटखते अंदाज़ में कहा, अब वह भी कहाँ रुक सकता था.
निम्मी समझ गयी "उसका पिता उसके मूँह से क्या सुनना चाहता है ?" उसने पुरजोर सह से अपनी शरम का त्याग किया, पिता की आँखों से अपनी रक्त-रंजीत आँखें जोड़ी और टूट कर बिखर गयी.
"हां डॅडी !! छोड़ो मुझे, किसी रंडी की तरह मसल डालो" वह चीखी और इसके फॉरन बाद दीप ने अपनी उंगली को उसके गुदा-द्वार से बाहर खीच लिया.
"रंडी की तरह नही निम्मी, अपनी बीवी की सौतन की तरह" मुस्कुरकर उसने बेटी के होंठो को कठोरता चूसा और तत्पश्चात उसे पलटा कर बाथरूम की दीवार से चिपका दिया.
"शवर का टॅप पकड़ ले, वरना गिर जाएगी" दीप ने समझाया और ज्यों ही निम्मी ने झुक कर टॅप को अपने हाथो से पकड़ा, उसके चूतड़ अनुमान से कहीं ज़्यादा ऊपर उठ कर दीप के लौडे को अपनी तरफ आकर्षित करने लगे.
यह नज़ारा देख दीप के लंड ने ठुमकीयाँ लेनी शुरू कर दी, कुच्छ क्षण तक वह अपनी बेटी के मांसल चूतड़ निहारता रहा और फिर नीचे ज़मीन पर बैठ गया.
निम्मी को अपने चुतडो पर पिता के कठोर हाथ महसूस हुए तो उसने अपना सर घुमा कर नीचे देखा "उफफफ्फ़" वह तड़प उठी.
दीप ने उसके चुतडो के पट खोल कर अपनी जीभ दरार के अंदर फेरनी शुरू कर दी थी और जल्द ही वह उसकी गान्ड के छेद से लेकर, उसकी चूत के दाने तक, पूरी लंबाई में अपनी जिह्वा घुमाने लगा.
निम्मी के अत्यधिक गरम होने का संकेत उसे बेटी की जाँघो पर बहते, उसके रति-रस को देख कर हुआ परंतु जाने क्यो वह अब तक उसकी योनि चाटने में मगन था. शायद काम सुख का सही अर्थ ही यही होगा होता.
"आईईई डॅडी !! अब बस भी करो, मैं मर जाउन्गि" हार-कर निम्मी पुनः चीख उठी.
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निम्मी के इतनी ज़ोर से चीखने का दीप पर लेश मात्र भी असर नही पड़ा और वह अपने कार्य में पूरी निपुणता, ईमानदारी से जुटा रहा. उसकी बेटी के चूतड़ बुरी तरह हिल रहे थे जैसे उसके बदन में बिजली के करारे झटके लग रहे हों.
"ओह्ह्ह डॅडी !! प्लीज़ मान जाओ" असह्नीय तकलीफ़ से निम्मी बिलख उठी. हलाकी उसे पता था, उसका पिता सनकी है मगर महा-ठरकी भी होगा, ऐसी आशा उसे कतयि ना थी. उसका रोम-रोम इस गहेन पीड़ा के अनुभव से सिहरता जा रहा था.
अनगिनत रंडियों के साथ सोने के बावजूद दीप ने उनमें से किसी की भी चूत पर अपना मूँह नही लगाया था और वाइल्ड सेक्स की, उसकी चाहत आज उसकी सग़ी छोटी बेटी के साथ पूरी हो रही थी. वह निम्मी की चीखों की परवाह किए बगैर उसकी जवानी को तब तक चूस्ता रहा, निचोड़ता रहा जब तक उसकी बेटी अपने चरम के बिल्कुल नज़दीक नही पहुच गयी.
"बस अब ठीक है" निम्मी को उसके ऑर्गॅज़म के बेहद करीब पहुचने के पश्चात अचानक दीप ने उसकी चूत से अपना मूँह हटाया और ज़मीन से उठ कर खड़ा हो गया.
निम्मी जो किसी भी वक़्त झाड़ सकती थी, दीप के उसे बीच मजधार में यूँ तड़प्ता छोड़ देने से से, उसकी आँखों में क्रोध की ज्वाला जल उठी और फॉरन पलट कर उसने अपने पिता के निचले होंठ पर अपने नुकीले दाँत बेरहमी से गढ़ा दिए.
"हमेशा सताते हो !! इतना भी नही समझते, मुझे तकलीफ़ होती होगी" निम्मी ने उसके होंठ पर ज़ुल्म करने के बाद कहा, दांतो के प्रहार से पिता का निचला होंठ काफ़ी ज़ख़्मी हो गया था.
"इसी तकलीफ़ के बाद तो असली आनंद मिलता है निम्मी !! देख तूने मुझे कितनी ज़ोर से काटा लेकिन मैने कोई शिक़ायत नही की. अरे चुदाई का असली मज़ा तो दर्द सहने में है" दीप मुस्कुराते हुए बोला और निम्मी का गुस्सा शांत होते ही उसे अपनी ग़लती पर अफ़सोस होने लगा.
"आइ आम सॉरी डॅडी !! मुझे इतनी ज़ोर से काटना नही चाहिए था" कहते हुए निम्मी ने माफी स्वरूप बड़े प्यार से पिता के चोटिल होंठ को चूसना शुरू किया तो दीप का अंतर-मॅन भी गद-गद हो उठा.
कितना आनंद-तिरेक नज़ारा था, एक पिता की बाहों में क़ैद उसकी जवान बेटी, दोनो पूर्ण नग्न, पानी की हल्की-हल्की फुहारें और होंठो का अकल्प्नीय चुंबन, वाकाई कल्पना से परे द्रश्य.
बुझते अंगारों में वापस चिंगारी भड़क उठी थी और अब ना तो चैन निम्मी को था और ना ही दीप को.
पिता ने पुत्री के होंठ चूस्ते हुए अपना विशाल लॉडा हाथ से पकड़ा और सूजा सुपाडा उसकी गीली चूत की फांकों पर रगड़ने लगा. फिर अगले ही क्षण एक हाथ से बेटी की कमर को जाकड़ कर उसने अचूक निशाना साध दिया.
एक झटके में लंड का आधा हिस्सा किसी मिज़ाइल की तरह चूत की संकरी दीवारें चीरता हुआ अंदर जा घुसा और निम्मी के साथ-साथ दीप की आह भी बाथरूम में गूँज उठी.
"उफफफफफफ्फ़" दोनो कराहे. जहाँ निम्मी अपना कुँवारा-पन खोने के बावजूद पीड़ा का अनुभव करने लगी वहीं दीप को अपनी बेटी की चूत की कसावट बेहद आनंद-दायक लगी.
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