जंगल में लाश
गर्मियों की अँधेरी रात थी। घण्टों करवटें बदलने के बाद कोतवाली इंचार्ज इन्स्पेक्टर सुधीर की बस आँख लगी ही थी कि एक सब-इन्स्पेक्टर ने आ कर उसे जगा दिया।
“क्या है भई, क्या आफ़त आ गयी?” वह झल्लाता हुआ बोला।
“क्या बताऊँ साहब, अजीब मुसीबत में जान है। शायद कोई क़त्ल हो गया है।" सब-इन्स्पेक्टर ने कहा।
“शायद क़त्ल हो गया है...? क्या मतलब...?"
“एक आदमी धर्मपुर के जंगलों में एक लाश देख कर ख़बर देने आया है।"
___“इतनी रात गये धर्मपुर के जंगलों में वह आदमी क्या कर रहा था?" इन्स्पेक्टर सुधीर ने बिस्तर से उतरते हुए कहा।
“मैंने उससे कोई सवाल नहीं किया। सीधा यहाँ चला आया।” सब-इन्स्पेक्टर ने जवाब दिया।
दोनों तेज़ क़दमों से चलते हुए दफ़्तर जा पहुँचे। इन्स्पेक्टर सुधीर ने ख़बर लाने वाले अजनबी को घूर कर देखा। वह एक नौजवान था। उसके चेहरे पर घबराहट नज़र आ रही थी। टाई की गाँठ ढीली हो कर कॉलर के नीचे लटक आयी थी। बालों पर जमी हुई धूल से ज़ाहिर हो रहा था कि वह बहुत दूर का सफ़र करके आ रहा है। उसकी साँस अभी तक फूल रही थी।
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"क्यों भई...क्या बात है?" सुधीर ने तेज़ आवाज़ में पूछा।
__“मैं अभी-अभी...धर्मपुर के जंगल में एक औरत की लाश देख कर आ रहा हूँ।” उसने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा।
"लेकिन आप इस वक़्त धर्मपुर के जंगल में क्या कर रहे थे?” सुधीर ने कहा।
“मैं दरअसल जलालपुर से वापस आ रहा था।"
“जलालपुर से...? जलालपुर यहाँ से लगभग बीस मील की दूरी पर है। आप किस सवारी पर आ रहे थे?"
“मोटर साइकिल पर...जब मैं जोज़फ़ रोड से पीटर रोड की तरफ़ मुड़ने लगा तो मैंने सड़क के किनारे एक औरत की लाश देखी। उसका ब्लाउज़ खून से तर था। उफ, मेरे ख़ुदा...कितना भयानक मंज़र था...मैं उसे ज़िन्दगी भर न भुला सकूँगा।"
“तो आप जलालपुर में रहते हैं?"
“जी नहीं...मैं यहीं इसी शहर में रहता हूँ। एक दोस्त से मिलने जलालपुर गया था।” ।
“तो इतनी रात गये वहाँ से वापसी की क्या ज़रूरत पड़ गयी थी?"
___ “सर, मैं यह क़त्ल खुद करके आपको ख़बर देने नहीं आया।" अजनबी ने झंझला कर कहा। “मैंने एक लाश देखी और एक शहरी होने की हैसियत से अपना फ़र्ज़ समझा कि पुलिस को इत्तला दे दूँ।"
“नाराज़ होने की ज़रूरत नहीं...!'' सुधीर ने संजीदगी से कहा। “मैं भी अपना फ़र्ज़ ही अदा कर रहा हूँ...आप का क्या नाम है?"
“मुझे रणधीर सिंह कहते हैं।"
“आप क्या काम करते हैं?"
“उफ मेरे खुदा! मैंने यहाँ आ कर ग़लती की। अजनबी ने परेशान होते हुए कहा।
“अरे साहब, मैं आपके साथ ही चलूँगा।"
__“चलना तो पड़ेगा ही... खैर, अच्छा , आप बहुत ज़्यादा थोड़ा परेशान मालूम होते हैं, फिर सही...दरोगा जी ज़रा जल्दी से तीन कॉन्स्टेबलों को तैयार कर लीजिए और इस वक़्त ड्यूटी पर जो ड्राइवर हो, उसे भी बुलवा लीजिए।
थोड़ी देर बाद पुलिस की लॉरी पीटर रोड पर धर्मपुर की तरफ़ जा रही थी। रात बहुत अँधेरी थी। सन्नाटे में लॉरी की आवाज़ दूर तक सुनायी दे रही थी। लॉरी की हेड लाइटों की रोशनी दूर तक सड़क पर फैल रही थी। सड़क के मोड़ से लगभग दो फ़रलाँग की दूरी पर एक बड़ा-सा पेड़ सड़क पर गिरा हुआ नज़र आया।
“अरे यह क्या...?” अजनबी चौंक कर बोला।
लॉरी पेड़ के पास आकर रुक गयी।
“मैं आपसे क़सम खा कर कहता हूँ कि अभी आध घण्टा पहले जब मैं इधर से गुज़रा तो यह पेड़ यहाँ नहीं था।” अजनबी ने परेशान होते हुए कहा।
सब लोग लॉरी से उतर आये।
“आप भी कमाल करते हैं! आपकी बात पर किसे यक़ीन आयेगा! ज़ाहिर है, आज आँधी भी नहीं आयी। यह भी साफ़ है कि पेड़ काटा गया है और आधे घण्टे में इतने मोटे तने वाले पेड़ को काट डालना आसान काम नहीं।
“अब मैं आपसे क्या कहूँ।" अजनबी ने अपने सूखे होंटों पर ज़बान फेरते हुए कहा।
_ “खैर, यह बाद में सोचा जायेगा।" कोतवाली इंचार्ज तेज़ आवाज़ में बोला। “अब वह जगह यहाँ से कितनी दूर है?"
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“ज़्यादा-से-ज्यादा दो, ढाई फ़रलाँग...!" अजनबी ने जवाब दिया।
लॉरी वहीं छोड़ कर यह पार्टी टॉर्च की रोशनी में आगे बढ़ी। सुनसान सड़क पुलिस वालों के भारी-भरकम जूतों की आवाज़ से गूंज रही थी।
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___“उफ मेरे खुदा...!'' अजनबी ने चलते-चलते रुक कर कहा।
“क्यों, क्या बात है?' कोतवाली इंचार्ज बोला।
“कहीं मैं पागल न हो जाऊँ।” अजनबी ने बेचैनी में अपनी नाक रगड़ते हुए कहा।
“ऐ मिस्टर! तुम्हारा मतलब क्या है?" कोतवाली इंचार्ज ने गरज कर कहा।
___“मैंने वह लाश यहीं देखी थी...मगर...मगर...!”
“मगर-मगर क्या कर रहे हो...यहाँ तो कुछ भी नहीं है।'
“यही तो हैरत है।"
“सरकार, यहाँ भूत-प्रेत भी ज़्यादा रहते हैं।" एक कॉन्स्टेबल ने मिनमिनाती हुई आवाज़ में कहा।
“बको मत!” कोतवाली इंचार्ज चीख़ कर बोला। वह गुस्से में तमतमा रहा था।
“मैं तो बड़ी मुश्किल में फँस गया।" अजनबी ने धीमी आवाज़ में कहा।
“अभी कहाँ...अब फँसेंगे आप मुश्किल में।" कोतवाली इंचार्ज ने कड़क आवाज़ में कहा। “ज़बर्दस्ती परेशान किया। क्या तुमने रुक कर क़रीब से लाश देखी थी?"
__“जी हाँ...उसके सीने से खून उछल रहा था।"
“अजीब लाश थी, कहीं ज़मीन पर खून का धब्बा तक दिखायी नहीं देता।" कोतवाली इंचार्ज ने झुक कर टॉर्च की रोशनी में ज़मीन को गौर से देखते हुए कहा।
“मैं क़सम खा कर...!"
“बस-बस...रहने दो। बेकार ही वक़्त बर्बाद कराया।" कोतवाली इंचार्ज ने उसकी बात काटते हुए कहा।
“मैं कहता हूँ सरकार, भूत...!”
“ठाँय...!'' अचानक फ़ायर की आवाज़ ने सब को बौखला कर रख दिया। कोतवाली इंचार्ज का हाथ पिस्तौल के केस ही पर था कि दूसरा फ़ायर हुआ। फिर तीसरा...चौथा...अब ऐसा मालूम हो रहा था जैसे बहुत-से आदमी एक साथ बंदूने चला रहे हों। कोतवाली इंचार्ज और सब-इन्स्पेक्टर ने अपने पिस्तौल निकाल कर पेड़ों की आड़ ले ली। लेकिन उन्हें जल्द ही वहाँ से भागना पड़ा, क्योंकि उनके पीछे से भी फ़ायर होने शुरू हो गये थे। तभी एक चीख़ सुनायी दी...फिर दूसरी और एक सिपाही लड़खड़ा कर गिर पड़ा। फिर उठ कर भागा। ये लोग छुपते-छुपाते लॉरी तक पहुँच पाये। जिस वक़्त ड्राइवर लॉरी बैक कर रहा था, क़रीब ही से दोबारा फ़ायर होने शुरू हो गये।
लॉरी तेज़ रफ़्तार से शहर की तरफ जा रही थी। फ़ायर अब तक सनायी दे रहे थे। एक सिपाही के बाजू पर गोली लगी थी। वह कराह रहा था।
“लेकिन...वह...वह कहाँ गया?" सब-इन्स्पेक्टर ने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा।
“जहन्नुम में...!” कोतवाली इंचार्ज ने चीख़ते हुए कहा। मुझसे ज़्यादा बेवकूफ़ शायद दूसरा न मिले। आख़िर मैं अच्छी तरह इत्मीनान किये बगैर उसके साथ चला क्यों आया। कमबख़्त का पता भी तो मालूम न हो सका। हम लोगों की जान लेने की एक बेहतरीन साज़िश थी।"
“मगर साहब...वह किसी तरह भी झूठा नहीं मालूम होता था।” सब-इन्स्पेक्टर ने कहा।
“बाईस साल से इस महकमे में झक नहीं मार रहा, दरोगा जी।” कोतवाली इंचार्ज ने कहा। “अभी आपका तजरुबा ही कितना है। मैं एक मील से मुजरिम की बू सूंघ लेता हूँ। मुझे शुरू से ही उस पर शक था। आख़िर वही हुआ जिसका डर था। मगर यह किसी बहुत बड़े गिरोह का काम मालूम होता है।"
“अरे, इसका तो मुझे ख़याल ही न आया था।” सब-इन्स्पेक्टर जल्दी से बोला। “हम लोग बाल-बाल बच गये।"
“अलबत्ता, बेचारा किरन सिंह बुरी तरह ज़ख़्मी हो गया।" कोतवाली इंचार्ज ने कहा। “अब मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि “मैं सुप्रिन्टेण्डेंट साहब को अपनी इस बेवकूफ़ी का क्या जवाब दँगा।"
। थोड़ी देर बाद वह सब चुप हो गये। अलबत्ता, किरन सिंह की कराहें अब तक जारी थीं। ग़नीमत यह हुआ था कि गोली हड्डी को कोई नुक़सान पहुँचाये बगैर बाजू के गोश्त को भेदती हुई निकल गयी थी।
___"क्यों न हम लोग फिर वहीं चलें, इस तरह भाग निकलना तो ठीक नहीं।” सब-इन्स्पेक्टर ने कहा।
“पागल हो गये हो।' इंचार्ज बोला। "हमारे पास दो पिस्तौलों के अलावा और है ही क्या। उधर न जाने कितने हों। मेरा ख़याल है कि पन्द्रह-बीस से कम न होंगे।"
“अजीब बेवकूफ़ी हुई।'' सब-इन्स्पेक्टर धीरे से बोला।
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सड़क पर जूता
दूसरे दिन सुबह छै बजे धर्मपुरा का जंगल असलहों से लैस पुलिसवालों के जूतों की आवाज़ों से गूंज रहा था। आस-पास के देहातों से तक़रीबन तीन सौ आदमी शक में गिरफ़्तार किये गये, जिन पर कोतवाली में बेतहाशा लाठियाँ और जूते बरस रहे थे। इनमें से कई तो इतनी बुरी तरह पिटे थे कि बेहोश हो गये थे, लेकिन नतीजा कुछ न निकला...कोई सुराग़ न मिल सका।
आख़िर चार-पाँच घण्टों की लगातार उठा-पटक के बाद मामला जासूसी विभाग के सुपुर्द कर दिया गया।
राजरूप नगर केस के मशहर इन्स्पेक्टर फ़रीदी और सार्जेंट हमीद कोतवाली पहुँच चुके थे। सारे क़िस्से की जानकारी उन्हें पहले ही से थी, लेकिन उन्होंने कोतवाली इंचार्ज वगैरह के बयान दोबारा सुने और एक चक्कर धर्मपुरा के जंगलों का भी लगा आये। दिन भर की दौड़-धूप के बाद जब कोतवाली वापस आये तो कई चेहरे उन पर मुस्कुरा रहे थे। फ़रीदी तो इस तरह की बातों को हँस कर टाल देता था। लेकिन सार्जेंट हमीद ने नाक-भौं ज़रूर चढ़ा ली थी, लेकिन फिर जल्द ही किसी सोच में डूब गया। तभी सोचते-सोचते एकदम से उसकी आँखें चमक उठीं।
“इन्स्पेक्टर साहब...!” उसने फ़रीदी की तरफ़ देखते हुए कहा। "हम लोग भी कितने बुद्धू हैं।"
“क्या मतलब।” फ़रीदी ने उसे घूरते हुए कहा।
___“मतलब क्या? वही मिसाल है...बच्चा बग़ल में, ढिंढोरा शहर में। अरे...कहने का मतलब यह कि मुलज़िम का सुराग़ मिल गया।” हमीद ने चुटकी बजाते हुए कहा।
"क्या तुम्हें मुझ पर शक है।” फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा।
“खैर, वह तो पुरानी चीज़ है। मेरी पीठ ठोकिए...कहिए, तो बताऊँ।"
___ “मुझे अफ़सोस है कि इस वक़्त ठोंकने की कोई चीज़ मेरे हाथ में नहीं। खैर, तुम बताओ।"
“मोटर साइकिल...मुलज़िम ने अपनी मोटर साइकिल रात यहीं छोड़ी थी न।” हमीद ने कहा।
“बहुत देर में पहुँचे...मुझे सुबह ही ख़याल आया था, लेकिन उसकी मोटर साइकिल ऐसी नहीं हो सकती जो उसका पता-ठिकाना बता दे।” फ़रीदी ने सिगार सुलगाते हुए कहा।
__ “फिर भी देख लेने में क्या बुराई है।” हमीद ने उठते हुए कहा।
दोनों कोतवाली इंचार्ज के साथ वहाँ पहुँचे, जहाँ रात मुलज़िम ने अपनी मोटर साइकिल । छोड़ी थी। मोटर साइकिल अभी तक वहीं खड़ी थी।
“देखो...मैं न कहता था।" फ़रीदी ने कहा। "नम्बर-प्लेट निकाल ली गयी है।"
“लेकिन कम्पनी का नम्बर तो ज़रूर होगा।" हमीद ने झुक कर देखते हुए कहा।
“ओह यह भी रेत दिया गया है।” फ़रीदी ने क़हक़हा लगाया।
हमीद भी खिसियाना हो कर हँसने लगा।
“हम लोग निरे घामड़ नहीं हैं...फ़रीदी साहब!” कोतवाली इंचार्ज ने हँस कर कहा। “पहले ही देख कर इत्मीनान कर चुके हैं।"
“लेकिन ठहरिए...!” फ़रीदी ने ज़मीन पर कुछ देखते हुए कहा। “आपने एक बात न देखी होगी।”
“क्या...?"
“यही कि कम्पनी का नम्बर यहीं कोतवाली में इसी जगह आज ही किसी वक़्त साफ़ किया गया है।"
“जी...!'' कोतवाली इंचार्ज ने हैरत से दीदा फाड़ते हुए कहा।
“जी हाँ...यह देखिए। क्या आप ज़मीन पर लोहे के ज़र्रे नहीं देख रहे हैं?
“उफ ओह...बड़ी ग़लती हुई।" कोतवाली इंचार्ज ने हाथ मलते हुए कहा।
“इन्हीं बारीकियों के लिए तो हम दोनों को तकलीफ़ दी जाती है।” सार्जेंट हमीद ने तन कर सीने पर हाथ मारते हुए कहा।
___ “लेकिन इससे क्या...मुलज़िम बहरहाल अभी तक हमारी पहुँच से दूर ही है।'' कोतवाली इंचार्ज ने झुंझला कर कहा।
“जी नहीं, बस यह समझिए कि अब वह हमारी जेब में रखा हुआ है।" हमीद ने मुस्कुरा कर कहा।
“खैर, देखा जायेगा। न घोड़ा दूर, न मैदान।" कोतवाली इंचार्ज ने जाने के लिए मुड़ते हुए कहा।
सार्जेंट हमीद सीटी बजाने लगा।
कोतवाली में बैठे फ़रीदी का दिमाग़ इस गुत्थी को सुलझाने में लगा था। आख़िरकार वह कोतवाली इंचार्ज से बोला।
“दरोगा जी...अब यह बात तो अच्छी तरह साफ़ हो गयी कि मुलज़िम या मुलज़िमों का निशाना आप ही थे।"
“क्यों...मैं ही क्यों था?” कोतवाल चौंक कर बोला।
“आपके बयान के मुताबिक़ रात को पाँच सब-इन्स्पेक्टर और चालीस सिपाही ड्यूटी पर थे। उनमें से आप किसी को भी चुन सकते थे। इसलिए उनमें से किसी एक को मार डालने का सवाल ही नहीं पैदा होता और ज़ाहिर है कि धर्मपुर कोतवाली ही के क्षेत्र में है, इसलिए क़त्ल या और किसी वारदात के सिलसिले में मौक़ा-ए-वारदात पर आप ही को पहँचना होता है।"
“ओह...इसका तो मुझे ख़याल ही नहीं आया था।" कोतवाली इंचार्ज ने बेचैनी से कहा।
“अब आप यह बताइए कि आपका शक किस पर है?"
“भला मैं कैसे बताऊँ...शहर का हर बदमाश मेरा दुश्मन हो सकता है।" कोतवाली इंचार्ज ने कुछ सोचते हुए कहा।
“बहरहाल, आप हमें कोई मदद नहीं दे सकते।” हमीद ने हँस कर कहा।
“हमीद साहब, मैं आपसे माफ़ी माँगता हूँ...!”
“हमीद, तुम चुप रहो।” इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने हमीद को घूरते हुए कहा। "हाँ, दरोगा जी, क्या पीटर रोड के चौराहे के क़रीब कोई बस्ती भी है?"
“हाँ, एक छोटा-सा गाँव है, लक्ष्मनपुर। लेकिन उसकी दूरी यहाँ से लगभग चार फ़रलाँग होगी।'
“मेरा ख़याल है कि मैं इस वक़्त वहाँ जा कर तफ़तीश करूँ।” इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने कहा।
"लेकिन आपको वहाँ इस वक़्त सिर्फ औरतें और बच्चे मिलेंगे। वहाँ के सारे मर्द तो यहीं हवालात में हैं।"
"तब तो और भी अच्छा है।" हमीद ने अपने निचले होंट पर ज़बान फेरते हुए कहा। फ़रीदी ने उसे फिर घूर कर देखा और वह एक़दम संजीदा हो गया। लेकिन यह संजीदगी इतनी मज़ाक़िया थी कि झल्लाया हुआ कोतवाली इंचार्ज भी मुस्कुराये बगैर न रह सका। हमीद की बेवक़्त की बेतुकी हरकतें फ़रीदी को अकसर बुरी लग जाती थीं। उसकी इसी आदत के चलते फ़रीदी अकसर कहा करता था कि वह ज़िन्दगी भर एक अच्छा जासूस नहीं बन सकता।
फ़रीदी को उसकी उस वक़्त की बेतुकी बातों पर सख़्त गुस्सा आ रहा था। लेकिन थोड़ी देर बाद उसका ज़ेहन फिर अपने काम में लग गया।
लक्ष्मनपुर की तरफ़ रवाना होते वक़्त फ़रीदी ने उस इन्स्पेक्टर को भी साथ ले लिया जो रात वाले हादसे में कोतवाली इंचार्ज के साथ था। धीरे-धीरे अँधेरा बढ़ता ही जा रहा था। इन्स्पेक्टर फ़रीदी की कार सड़क छोड़ कच्चे रास्ते पर चली जा रही थी।
“इन्स्पेक्टर फ़रीदी साहब! एक बात मेरी समझ में नहीं आती।” सब-इन्स्पेक्टर बोला। "ख़ुद आप भी होते तो उसकी हालत देखते हुए उसके बयान की सच्चाई में शक न करते।"
“यह सब कुछ ठीक है।” फ़रीदी ने बुझा हआ सिगार सुलगाते हए कहा। "लेकिन मैं उसका सही पता-ठिकाना जाने बगैर हरगिज़ उसके साथ न जाता। हैरत तो इस बात पर है कि सुधीर साहब ने रवानगी लिखने की भी ज़हमत गवारा न की।"
“नहीं साहब...रवानगी तो लिखी गयी थी।" सब-इन्स्पेक्टर ने जल्दी से कहा।
“दरोगा जी, मैं कोई बच्चा तो हूँ नहीं। क्या मैं इतना भी नहीं समझ सकता कि रवानगी हादसे के बाद लिखी गयी है।” फ़रीदी ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा।
“खैर, यह कोई नयी बात नहीं। आप ही नहीं...आपका विभाग यूँ भी हम लोगों के लिए कोई अच्छी राय नहीं रखता, लेकिन यह आप किस तरह कह सकते हैं कि रवानगी हादसे के बाद लिखी गयी है और इसका क्या सुबूत है कि रोज़नामचे में इस नम्बर का कोई कमरा है ही नहीं। और सरताज होटल का एक-एक चप्पा पुलिस का देखा हुआ है। उस जैसे बदनाम होटल का नक्शा तो मेरे ख़याल से मामूली-से-मामूली कॉन्स्टेबल के ज़ेहन में भी होगा क्योंकि पुलिस कई बार उस पर छापा मार चुकी है।"
“असली वाक़या मुझसे सुनिए। आप लोग बगैर पूछताछ किये, मुलज़िम के साथ चल पड़े थे। बाद में सुधीर साहब को इस ग़लती का एहसास हुआ। वापसी पर जब वे रवानगी लिखने बैठे तो घबराहट में कमरे का नम्बर लिख गये। मैंने केस हाथ में लेने के बाद सबसे पहले रवानगी ही देखी थी। उस वक़्त सुधीर साहब भी मौजूद थे। शायद उसी वक़्त उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ। उसके बाद अभी थोड़ी देर पहले मुलज़िम के हुलिये के लिए मुझे दोबारा रवानगी देखनी पड़ी। आपको यह सुन कर हैरत होगी कि कमरे का पहला नम्बर ब्लेड से खुरच कर उसकी जगह दसरा नम्बर लिख दिया गया था। जिसकी स्याही काग़ज़ खुरदरा हो जाने की वजह से फैल गयी थी।” फ़रीदी ख़ामोश हो गया और हमीद हँसने लगा।
“साहब, यह बात मेरी समझ में तो आयी नहीं। वाक़ई आप लोग हम लोगों के बारे में बहुत बुरे ख़याल रखते हैं।”
सब-इन्स्पेक्टर ने झेंप मिटाने की कोशिश करते हुए कहा।
___हम लोग आप लोगों के बारे में बुरे ख़याल रखने पर मजबूर हैं। आख़िर कोई हद भी है।
कोतवाली में रखी हई मोटर साइकिल का नम्बर कोई रेत कर चला जाये और आप लोगों को ख़बर भी न हो।"
“वाक़ई इस पर तो ज़रूर हैरत है।" सब-इन्स्पेक्टर ने कहा।
__“मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि कोतवाली का कोई फ़र्द सुधीर साहब की जान का दुश्मन है या फिर उनके दुश्मनों से मिला है। कोई बाहर का आदमी इतनी हिम्मत नहीं कर सकता।” फ़रीदी ने कहा।
“आपका ख़याल ठीक है, लेकिन वह कौन हो सकता है?"
“यही तो देखना है।"
कार लक्ष्मनपुर में दाख़िल चुकी थी। वहाँ तक़रीबन दो घण्टे तक छान-बीन करने के बाद भी कोई सुराग़ न मिल सका। लेकिन इतना ज़रूर मालूम हुआ कि वहाँ के लोगों ने फ़ायरों की आवाजें सुनी थीं। लेकिन यह उनके लिए कोई नयी बात न थी, क्योंकि वहाँ आये दिन शिकारियों की बन्दूक़े चला ही करती थीं।
वापसी में सब-इन्स्पेक्टर ने फ़रीदी से कहा, "इन्स्पेक्टर साहब, क्या बताऊँ...वाक़ई हम लोगों ने सख़्त ग़लती की कि मुलज़िम का पता मालूम किये बगैर उसके साथ चले गये और यह भी सही है कि रवानगी हादसे से बाद लिखी गयी थी। लेकिन मुझे उम्मीद है कि आप लोग यह बात अपने ही तक रखेंगे।"
“मगर यह कैसे मुमकिन है।'' हमीद जल्दी से बोला।
फ़रीदी ख़ामोश था। उसकी निगाहें बाहर अँधेरे में भटक रही थीं। उँगलियों में दबा हुआ सिगार बुझ चुका था। दिन भर की दौड़-धूप के बावजूद कोई ख़ास नतीजा हाथ न लगा था। यह शायद पहला मौक़ा था कि तफ़तीश का एक दिन इस तरह बेकार हो रहा था।
“अगर मैंने इसकी कोई ख़ास ज़रूरत न समझी तो उसे पर्दे ही में रतूंगा।” फ़रीदी ने धीरे से कहा और सिगार सुलगाने लगा।
“शुक्रिया...!'' सब-इन्स्पेक्टर ने इत्मीनान की साँस ली।
फिर ख़ामोशी छा गयी।
कार की तेज़ रोशनी अँधेरे का सीना चीरती हुई तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। अचानक सड़क के बायें किनारे की झाड़ियों से तीन-चार गीदड़ निकल कर सड़क पार करते हुए दायें किनारे की झाड़ियों में घुस गये। इनमें से एक मुँह में दबी हुई कोई चीज़ सड़क पर गिर पड़ी। कार तेज़ी में उसे रौंदती हुई आगे निकली जा रही थी कि तभी फ़रीदी चीख़ा। "हमीद...रोको...गाड़ी रोको।"
कार एक झटके से रुक गयी।
“क्या बात है?” इन्स्पेक्टर हैरान होते हुए बोला।
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“आइए...आइए! हमीद, ज़रा मुझे टॉर्च देना।” फ़रीदी ने कार से उतरते हुए कहा। टॉर्च की रोशनी सड़क पर पड़े हुए जूते के चारों तरफ़ घेरा बना रही थी।
फ़रीदी ने जूते को उठा कर टॉर्च की रोशनी में देखना शुरू किया।
“जूता तो नया मालूम होता है, लेकिन यह यहाँ कैसे आया?” हमीद ने कहा।
“यह इन्हीं गीदड़ों में से एक के मुँह में दबा हुआ था।” फ़रीदी जूते पर नज़रें जमाये धीरे से बोला। टॉर्च की रोशनी में झाड़ियों से उलझता हुआ वह आगे बढ़ रहा था। हमीद और सब-इन्स्पेक्टर भी उसके पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्हें उसके इस रवैये पर सख़्त हैरत थी, लेकिन वे ख़ामोश थे।
अचानक फ़रीदी रुक गया। झाड़ियाँ हटा कर वह दूसरी तरफ़ कुछ देख रहा था। सब-इन्स्पेक्टर और हमीद भी रुक गये। थोड़ी देर बाद फ़रीदी मुड़ कर बोला। “दरोगा जी, आप भूतों पर यक़ीन रखते हैं या नहीं?"
___“मैं आपका मतलब नहीं समझा।" सब-इन्स्पेक्टर ने कहा। लेकिन न जाने क्यों वह काँपने लगा।
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“मतलब यह कि अगर आप इस वक़्त इस जंगल में किसी जगह एक आदमी की टाँग ज़मीन के अन्दर से निकली हुई देख लें तो आपका क्या हाल होगा?”
“मेरे ख़याल से इनकी रूह इनका जिस्म छोड़ कर निकल जायेगी।" हमीद हँस कर बोला।
“अच्छा , तो पहले तुम ही आओ...!'' फ़रीदी ने संजीदगी से कहा।
हमीद आगे बढ़ा। लेकिन दूसरे ही पल उसे ऐसा मालूम हुआ जैसे किसी ने उसे पीछे धकेल दिया हो। वह बुरी तरह कॉप रहा था।
“ज़ज...ज़रूर...भभू...त...!” हमीद हकलाने लगा।
“बस, निकल गयी सारी शरारत...!” फ़रीदी ने हँस कर कहा। “आइए दरोगा जी, आप भी देखिए।"
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“जी...जी...मैं...!” सब-इन्स्पेक्टर हमीद की हालत देख कर आगे बढ़ने की हिम्मत न कर सका।
"भई, कमाल कर दिया आप लोगों ने। आइए मेरे साथ।” कहते हुए फ़रीदी झाड़ियों में घुस गया। हमीद और सब-इन्स्पेक्टर को भी साथ देना ही पड़ा। एक जगह थोड़ी खुदी हुई ज़मीन से एक इन्सानी पैर बाहर निकला हुआ था। पतलून का पाँयचा कई जगह से फटा हुआ था और नंगे पाँव में लम्बी-लम्बी ख़राशें थीं।
“क्या समझे।'' फ़रीदी अपने दोनों डरे हुए साथियों की तरफ़ मुड़ कर बोला।
दोनों ख़ामोशी से उसका मुँह ताक रहे थे।
“यह जूता उसी पैर का है। गीदड़ों ने यहाँ की ज़मीन खोदी है। वे लाश की एक टाँग निकाल पाये थे कि मोटर के शोर की वजह से उन्हें भागना पड़ा। शायद वे उसकी टाँग खींच कर बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे। उसी जेद्दो-जेहद में उसका जूता उतर गया और एक गीदड़ ले भागा।” फ़रीदी बोला। फिर उसने आगे कहा, “अरे भई...यूँ खड़े मेरी सूरत क्या देख रहे हो।"
“जो बताइए, वह किया जाये।" सब-इन्स्पेक्टर अपने सूखे होंटों पर ज़बान फेरते हुए बोला।
“आओ, मिट्टी हटा कर इसे निकालें।" फ़रीदी ने बैठते हुए कहा। "हमीद, तुम टॉर्च दिखाओ।"
फ़रीदी और सब-इन्स्पेक्टर ने मिट्टी हटानी शुरू की। एक घण्टे की मेहनत के बाद वे लाश को निकालने में कामयाब हो गये।
“अरे...!'' सब-इन्स्पेक्टर चौंक कर पीछे हट गया।
“क्या बात है?" फ़रीदी ने पूछा।
“यह वही है, ख़ुदा की क़सम वही है।" सब-इन्स्पेक्टर ज़ोर से चीख़ उठा। “वही जो हमें कल रात यहाँ लाया था।"
“बहरहाल...!” फ़रीदी ने इत्मीनान की साँस ले कर कहा। "कभी-कभी मेरे हवाई क़िले भी सच्चे हो जाते हैं। मुझे शुरू ही से इसकी उम्मीद थी।"
"बड़ी अजीब घटना है। मेरी तो अक़्ल चक्कर खा रही है।'' सब-इन्स्पेक्टर परेशानी की सूरत में बोला। लगभग आधे घण्टे तक तीनों वहीं खड़े लाश के बारे में बात करते रहे।
“खैर, अब यहाँ इस तरह खड़े रहना ठीक नहीं है। आइए उसे उठा कर कार तक ले चलें।" फ़रीदी ने सिगार एक तरफ़ फेंकते हुए कहा।
…………………………………………………….
4."
शक का घेरा
इस नये खुलासे पर दूसरे दिन सारे शहर में हलचल मच गयी। अब यह मामला काफ़ी पेचीदा हो गया था। वह शख़्स जिसे लोग मुजरिम समझ रहे थे, खुद किसी का शिकार साबित हुआ।
लाश अभी तक कोतवाली ही में थी। फ़रीदी और कुछ दूसरे जासूस लाश का मुआयना कर रहे थे। मरने वाला एक खूबसूरत नौजवान था। लेकिन उसके पास से ऐसी कोई चीज़ बरामद न हुई जिससे उसकी शिनाख्त की जा सके। मोटर साइकिल का लाइसेंस नम्बर और कम्पनी का नम्बर...दोनों पहले ही ग़ायब हो चुके थे। फ़रीदी उलझन में पड़ गया था।
“क्यों भई हमीद, क्या ख़याल है।” फ़रीदी ने सार्जेंट हमीद से कहा।
___“अभी तक तो ख़याल का ख़याल भी नदारद है।" हमीद ने कहा। "लेकिन यह आप किस तरह समझे कि यह आदमी मुजरिमों का साथी नहीं था?"
"तुम्हारे इस सवाल से ज़ाहिर होता है कि तुम्हारा ज़ेहन किसी ख़ास लाइन पर काम कर रहा है।” फ़रीदी ने कहा।
“क्या यह नहीं हो सकता कि कोतवाली इंचार्ज के बच निकलने पर मुजरिमों ने अपने साथी को इसलिए मौत के घाट उतार दिया हो कि कहीं वह पुलिस के हत्थे चढ़ कर सारा राज़ न बता दे।” हमीद ने सिर खुजाते हुए कहा।
___“यह तो कोई बात न हुई।” फ़रीदी बोला। “अँधेरे में सही तौर पर भी गोली लग जाने का इमकान है। हाँ, यह भी हो सकता है, लेकिन यह क्यों मान लिया जाये कि यह आदमी मुजरिमों का साथी ही था। सिर्फ इसलिए कि ऐसी सूरत में उसे दफ़्न करने की ज़रूरत नहीं थी। अगर उन्हें इस बात का शक होता कि वे उसकी वजह से पहचान लिये जायेंगे तो वे उसे कभी कोतवाली न भेजते और अगर उन्हें इसका अन्देशा नहीं था तो फिर लाश को दफ़्न करने की वजह समझ में नहीं आ रही।" फिर फ़रीदी हमीद को समझाते हुए बोला, “देखो, किसी लाश को दफ़्न करना आसान काम नहीं। लाश दफ़्न करने के लिए कम-से-कम तीन घण्टे तो चाहिएँ। अगर वह उनका साथी था तो इसका मतलब यह हुआ कि वह ख़ुद भी अपनी जान देना चाहते थे। या बिलकुल ही बेवकूफ़ थे, क्योंकि उन्हें इसका भी ख़याल न आया कि इतनी देर में अगर पुलिस वाले क़रीब के किसी गाँव से कुछ आदमी ले कर वापस आ गये तो क्या होगा। लाश दफ़्न कर देना उनके लिए यक़ीनन बचाव की सूरत रखता था। तभी उन्होंने इतना बड़ा ख़तरा मोल लिया। जैसा कि तुम्हारा ख़याल है कि यह हरकत किसी बहुत बड़े गिरोह की है, तो यह अच्छी तरह समझ लो कि ऐसा गिरोह अपने किसी पुराने या आसानी से पहचान लिये जाने वाले आदमी को ऐसे कामों के लिए नहीं चुनता। इस के लिए वह हमेशा किसी नये आदमी को फाँसता है, ताकि अगर वह पकड़ लिया जाये तो किसी क़िस्म का कोई राज़ ज़ाहिर न हो सके।"
___ "चलिए, मैंने मान लिया।" हमीद ने कहा।
"लेकिन अब यह सवाल पैदा होता है कि अगर मुजरिमों को ख़ास तौर से उसी आदमी को क़त्ल करना था तो आख़िर इतना हंगामा करने की क्या ज़रूरत थी। इसका मतलब यह हुआ कि उन्होंने पुलिस को बाकायदा चैलेंज करके एक आदमी को क़त्ल किया। इस तरह तो उन्होंने अपने आप एक मसीबत मोल ले ली। अगर उसे मारना ही था तो यूं ही मार कर दफ़्न कर देते।
__ “तुम्हारी अक़्लमन्दी का क़ायल हूँ।'' फ़रीदी मुस्कुरा कर बोला। “क्या यह नहीं हो सकता कि इस तरह उन्होंने पुलिस को रास्ते पर लगाने की कोशिश की हो। मान लो कि मैं तुम्हारा क़त्ल करना चाहता हूँ। अगर मैंने तुम्हें क़त्ल करके दफ़्न कर भी दिया तो तुम्हारे गुम हो जाने के बाद लोग तुमको ढूँढेंगे और अगर उनको मुझ पर थोड़ा भी शक होगा कि मैं तुम्हें क़त्ल कर सकता हूँ तो यही चीज़ मेरे लिए मुसीबत बन जायेगी।
लेकिन अगर मैं थोड़ी होशियारी से तुमको ख़त्म करूँ तो उसके लिए मुझे तुम्हारा खुले आम क़त्ल करना होगा। अब इसका तरीक़ा सुनो। मान लो तुम दो बजे रात को धर्मपुर के जंगलों से गुजर रहे हो और मुझे मुर्दा समझ कर यक़ीनन पुलिस को इसकी ख़बर देने जाओगे और यह भी समझ रखो कि तुम्हारी क़ब्र भी मैं पहले ही तैयार कर रखंगा। जैसे ही तुम पुलिस को साथ ले कर आओगे, तुम लोगों पर गोलियों की बौछार शुरू हो जायेगी और दूसरों को बचाते हुए सिर्फ तुम निशाना बना दिये जाओगे। गोलियों की अन्धा-धुन्ध बौछार से घबरा कर दूसरे लोग भाग खड़े होंगे। इसके बाद मैं तुम्हारी लाश पहले से खुदे हुए गड्ढे में दफ़्न कर दूँगा। वापसी में जब पुलिस वाले तुम्हें साथ न पायेंगे तो तुम्हारे बारे में उनका शक यक़ीन में तब्दील हो जायेगा और वे तुम्हें मुजरिम समझ कर तुम्हारी तलाश शुरू कर देंगे। इस तरह एक तरफ़ तो मैं तुम्हें क़त्ल भी कर ट्रॅगा और तुम्हें ही मुजरिम भी बनवा दूँगा और ख़ुद आराम से मजे करूँगा। क्या समझे...! और फिर मैं तुम्हारी मोटर साइकिल के नम्बर भी ग़ायब कर दूँगा। वह भी बीच कोतवाली से...लेकिन अफ़सोस सद अफ़सोस कि मैं इन कमबख़्त गीदड़ों का कुछ न बिगाड़ सकूँगा और आख़िरकार उन्हीं की बदौलत मेरी गिरफ़्तारी भी हो जायेगी।"
___“मगर साहब! न जाने क्यों मेरा दिल कह रहा है कि यह शख़्स मुजरिमों का साथी है।" हमीद ने कहा।
“भई, यह है जासूसी का मामला...इश्क़ का मसला तो है नहीं कि दिल की आवाज़ पर काम किया जाये। यहाँ तो सिर्फ दिमाग़ की बातें ही मानी जाती हैं।' फ़रीदी ने बुझे हुए सिगार को सुलगाते हुए कहा।
“खैर, चलिए! अगर मैं इसे मान भी लूँ तो पेड़ वाला मामला समझ में नहीं आता। आधे घण्टे में इतने मोटे तने वाले पेड़ को काट गिराना नामुमकिन है।"
_ “तो मैं कब कहता हूँ कि यह मुमकिन है। हो सकता है, पेड़ के काटने का काम सुबह ही से शुरू कर दिया गया हो और उसका उतना हिस्सा काट कर छोड़ दिया गया हो कि बाक़ी का हिस्सा थोड़ी देर की मेहनत से काट कर पेड़ गिराया जा सके। तुमने शायद गौर नहीं किया...उसी लाइन के कई और पेड़ भी काटे गये हैं। शायद यह काम डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की तरफ़ से हो रहा है। हालाँकि मुझे इसमें शक है। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अलावा कोई और इन पेड़ों को क़ानूनन कटवा भी नहीं सकता और यह भी नहीं हो सकता कि कोई सरकारी दफ़्तर अपनी ज़िम्मेदारी पर इतने बड़े पेड़ को ऐसी ख़तरनाक हालत में छोड़ जाये जो आधे घण्टे की मेहनत से गिराया जा सके। क्योंकि इतना भारी-भरकम पेड़ ऐसी हालत में तेज़ हवा का एक झोंका भी बर्दाश्त नहीं कर सकता।"
“वाक़ई मानता हूँ।" हमीद ने हैरत से फ़रीदी को देखते हुए कहा। “वल्लाह आपको तो स्कॉटलैण्ड यार्ड में होना चाहिए था। यहाँ आपकी कोई क़द्र नहीं। अब इसी को देख लीजिए कि आप आज तक चीफ़ इन्स्पेक्टर न हो सके।"
“तो मैं चीफ़ इन्स्पेक्टर होना कब चाहता हूँ।” फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा। “चीफ़ इन्स्पेक्टर होने के बाद मेरी हैसियत एक कलर्क की-सी हो जायेगी और यह तो तुम जानते ही हो कि मैं इस लाइन में पैसा पैदा करने नहीं आया और न मझे ओहदों ही का लालच है। मेरे पास इतना पैसा मौजूद है कि बेकार रह कर भी शहज़ादों की-सी ज़िन्दगी गुज़ार सकता हूँ। अगर हिन्दुस्तान में प्राइवेट जासूसों के लिए क़ानूनन कोई जगह होती तो मझे इतना सरदर्द मोल लेने की कोई ज़रूरत न थी।"
“आप कहेंगे मैं चापलूसी कर रहा हूँ।" हमीद ने कहा, "लेकिन मैं कहे बगैर नहीं रह सकता कि आप जैसा आदमी आज तक मेरी नज़रों से नहीं गुज़रा। कभी-कभी तो मैं यह सोचने लगता हूँ कि शायद आप लोहे के बने हैं।"
“और बहुत-से लोग मुझे लोहे का चना भी समझते हैं।” फ़रीदी ने हँस कर कहा।
“लेकिन यह आज तक मेरी समझ में न आया कि आख़िर आप औरतों से क्यों दूर भागते हैं। शादी क्यों नहीं करते...”
“फिर वही औरत...!'' फ़रीदी ने हमीद को घूरते हुए कहा। “आख़िर तुम्हारे सिर पर औरत क्यों सवार है। कहीं से बात शुरू हो, तुम्हारी तान हमेशा औरत ही पर टूटती है। यह क्या बेवकूफ़ी है।"
“आप इसे बेवकूफ़ी कहते हैं।" हमीद ने संजीदगी से कहा।
“अच्छा, बको मत...अभी बहुत काम करना है। चलो डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के दफ़्तर चलें।"
डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के दफ़्तर में इन दोनों की आमद से भूचाल-सा आ गया। मामूली-से चपरासी से ले कर चेयरमैन तक ख़ुद को चोर महसूस करने लगे। लोकल सेल्फ़ गवर्नमेंट के किसी भी डिपार्टमेंट के दफ्तर में किसी जासूस के अचानक आ जाना वहाँ के पूरे स्टाफ़ के लिए झटके से कम नहीं होता। उनकी सारी पिछली धाँधलेबाज़ियाँ उनकी आँखों के सामने नाचने लगती हैं और हर शख्स को लगता है कि आज वह पकड़ लिया जायेगा। लेकिन यहाँ फ़रीदी अपने किसी दूसरे काम से आया था। दफ़्तर में जब यह मालूम हुआ कि वह उन मज़दूरों से मिलना चाहता है जो धर्मपुर के जंगलों में पेड़ काट रहे थे तो उनकी जान-में-जान आयी। धर्मपुर के जंगलों का हादसा काफ़ी मशहूर हो चुका था। इसलिए वे यही समझे कि ये लोग थोड़ी छानबीन के सिलसिले में आये हैं। वहाँ के मज़दूरों में से सिर्फ दो उस वक़्त मौजूद थे। फ़रीदी उन्हें अलग ले गया।
“तुम लोगों ने एक ख़तरनाक ग़लती की है।" फ़रीदी ने धीरे से कहा।
“दोनों के चेहरे फ़क हो गये और वे एक-दूसरे की तरफ़ अजीब तरह से देखने लगे।"
__“तुमने वह पेड़ सड़क की तरफ़ क्यों गिराया था...?"
"
“साहब! सड़क की तरफ़ तो हम लोगों ने कोई पेड़ नहीं गिराया।" उन में से एक बोला।
“याद करो वह पीपल का पेड़ जो चौराहे से कुछ दूर हट कर था।"
“नहीं साहब! हम ऐसी ग़लती नहीं कर सकते।"
“खैर, अगर तुमने गिराया नहीं था तो उसे ऐसी हालत में छोड़ दिया था कि पेड़ तेज़ हवा चलने पर अपने आप गिर जाये।"
“नहीं तो...मगर साहब।"
“साफ़-साफ़ बताओ।” फ़रीदी तेज़ आवाज़ में बोला।
___ “मुझसे सुनिए साहब...!” दूसरा बोला। “अब तो ग़लती हो ही गयी है और सज़ा भुगतनी ही होगी।"
“हाँ-हाँ, डरो नहीं...हम ग़रीबों का ख़ास तौर पर ख़याल रखते हैं। मगर सच्चाई शर्त है।” फ़रीदी उसका कन्धा थपथपाते हुए बोला।
“ख़ुदा आपको ख़ुश रखे...हम लोग बिलकुल बेक़सूर हैं। हमारी ग़लती बस...!"
"हाँ-हाँ, कहो।”
“साहब, हुआ यह कि हम चार आदमी उस पेड़ को काट रहे थे। शाम हो गयी थी और पेड़ इतना कट गया था कि उसकी डालों से रस्सी फँसा कर उसे आसानी से दूसरी तरफ़ गिराया जा सकता था। हम लोग सुस्ताने लगे थे और इरादा था कि अब उसे दूसरी तरफ़ गिरा दें कि अचानक किसी के चीख़ने की आवाज़ आयी। हम लोग चौंक पड़े। एक आदमी हमें अपनी तरफ़ दौड़ता हुआ दिखायी दिया। वह “हाय मार डाला...हाय लूट लिया" कहता हुआ हमारे क़रीब गिर पड़ा। हम लोगों के पूछने पर उसने बताया कि वह ज़िलेदार है, गाँव से रुपये वसूल करके ला रहा था कि अचानक दो आदमियों ने उसे मार-पीट कर रुपये छीन लिये। उसके बयान के मुताबिक़ हादसा क़रीब ही हुआ था, इसलिए हम चारों शोर मचाते हुए उसके बताये हुए रास्ते पर दौड़ने लगे। वह भी हमारे साथ था। एक जगह वह रुक गया और एक झाड़ी से एक थैली उठा कर हमें दिखायी और कहा कि इसी थैली में रुपये हैं। शायद घबराहट में यह उन बदमाशों के हाथ से गिर गयी। उसने वह थैली ज़मीन पर उलट दी और बैठ कर रुपये गिनने लगा। वाक़ई उस थैली में हज़ारो रुपये थे। उसने हम लोगों से कहा कि हम उसके साथ शहर चलें, क्योंकि वह पुलिस में रिपोर्ट करना चाहता था और उसे यह डर था कि कहीं राह में वे बदमाश फिर न मिल जायें। हम लोगों ने इनकार किया, लेकिन उसने हमें हज़ार रुपये देने का वादा करके राज़ी कर लिया। हम लौट आये और कुल्हाड़े वगैरह सँभाल कर शहर की तरफ़ चल पड़े। हज़ार रुपयों के लालच ने हमें यह भी न सोचने दिया कि पेड़ को ख़तरनाक हालत में छोड़ कर जा रहे हैं। शहर पहँच कर उसने कहा कि अब पलिस में रिपोर्ट करना बेकार ही है, क्योंकि रुपये तो मिल गये हैं। फिर वह हमें एक शराबख़ाने में ले गया। हम लोग कभी-कभी देसी शराब पी लेते हैं, वहाँ अंग्रेज़ी शराब देख कर हमारे मुँह में पानी भर आया। हम में से एक ऐसा भी था जो शराब नहीं पीता था, लेकिन और दूसरी खाने-पीने की अच्छी-अच्छी चीजें देख कर वह भी तैयार हो गया। हमें कुछ अच्छी तरह याद नहीं कि हमने कितनी पी। बहरहाल, जब हमें होश आया तो हमने ख़ुद को एक वीरान क़ब्रिस्तान में पाया। शायद उस वक़्त रात के तीन बज रहे होंगे। यह है सरकार हमारी राम कहानी। अब आप जो सज़ा चाहें दें।"
___“बहरहाल...!” फ़रीदी लम्बी साँस ले कर बोला। “मैं कोशिश तो करूँगा कि तुम लोगों पर कोई आँच न आने पाये। अच्छा, यह तो बताओ कि तुमने उस ज़िलेदार को उससे पहले भी कभी देखा था।"
“जी नहीं...हमने पहले उसे कभी नहीं देखा था।"
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“अगर तुम उसे देखो तो पहचान लोगे।"
“अच्छी तरह सरकार...अच्छी तरह।'' दोनों एक साथ बोले।
“अच्छा उसका हुलिया तो बताओ।"
“हुलिया क्या बताऊँ सरकार...अच्छा-ख़ासा, लम्बा-तडंगा आदमी था।" बड़ी-बड़ी काली मूंछे थीं। आँखों पर नीला चश्मा लगाये था। रंग गोरा था। अंग्रेज़ी कपड़े पहने हुए था। बात-बात पर बच्चों की तरह ठहाका मार कर हँसता था, मगर साहब उसके दाँत बड़े चमकीले थे। मुझे उसके दाँत बिलकुल भेड़िये के दाँतों की तरह मालूम हो रहे थे। हँसमुख आदमी ज़रूर था, लेकिन उन दाँतों की वजह से उसकी हँसी भी बड़ी भयानक मालूम होती थी।"
__ फ़रीदी ने दोबारा पूछा, “तुम उसे देख कर पहचान लोगे?"
“बराबर सरकार...!'' दोनों एक साथ फिर बोल उठे।
“अच्छा देखो...अभी तुमने जो कहानी मुझे सुनायी है, उसको किसी और को न सुनाना, वरना फिर मैं तुम्हें न बचा सकूँगा। अपने उन दोनों साथियों को भी समझा देना कि इस कहानी को वे भी किसी को न सुनायें।"
“मजाल है सरकार कि आपके हुक्म के ख़िलाफ़ हो जाये। हम लोग बिलकुल चुप रहेंगे।"
उसके बाद फ़रीदी और हमीद वहाँ से चले गये।
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“कहो भई, अब क्या ख़याल है?" फ़रीदी ने हमीद से कहा।
“भला आपसे ग़लती हो सकती है!" हमीद बोला। “लेकिन अब क्या करना चाहिए?"
"बस, देखते रहो...अब चुटकी बजाते मुजरिम हमारी गिरफ़्त में होंगे।” फ़रीदी ने सिगार केस से सिगार निकालते हुए कहा।
“मगर यह औरत की लाश वाला मामला अभी तक समझ में नहीं आया...!'' हमीद ने सिर खुजाते हुए कहा।
“यह कोई मुश्किल काम नहीं...एक औरत की लाश तुम बहुत आसानी से तैयार कर सकते हो। वह लाश यक़ीनन नक़ली होगी।” ।
__“मोटर साइकिल के नम्बर वाला मामला भी अजीब है। खैर, नम्बर-प्लेट निकाल लेना तो । मुश्किल काम नहीं। कम्पनी का नम्बर रेतने के लिए काफ़ी वक़्त दरकार होता है और हैरत तो इस पर है कि किसी ने रेती चलने की आवाज़ भी न सुनी।"
फ़रीदी कुछ सोचते-सोचते चौंक पड़ा।
“हमीद! मैं दरअसल इसीलिए तुम्हें अपने साथ रखता हूँ, तुम्हारे इस सवाल ने अचानक यह मामला भी हल कर दिया। लो सुनो, क्या तुम्हें याद नहीं कि सुपरिन्टेण्डेंट साहब की कार बिगड़ गयी थी और ड्राइवर बार-बार इंजन स्टार्ट कर रहा था। उस इंजन के शोर में भला रेती की आवाज़ कैसे सुनी जा सकती है। लगभग दो घण्टे के बाद कार बन सकी थी। अब मैं क़सम खा कर कह सकता हूँ कि मोटर साइकिल का नम्बर उसी बीच रेता गया था, लेकिन रेतने वाला कौन हो सकता है? किसी बाहरी आदमी की हिम्मत तो नहीं पड़ सकती।'
"तो फिर आपका शक किस पर है?"
“अभी फ़िलहाल यह बताना ज़रा मुश्किल है।” फ़रीदी ने सिगार मुँह से निकालते हुए कहा। "क्यों न हम लोग धर्मपुर के जंगल का एक चक्कर और लगा आयें। मुझसे एक ज़बर्दस्त ग़लती हुई है। मुझे उस गड्ढे का, जिससे लाश मिली थी, ठीक तरह जायज़ा लेना चाहिए था। हो सकता था कि कोई काम की बात मालूम हो जाती।"
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शराबी गीदड
लाश बरामद होने के बाद ही से धर्मपुर के जंगल में असलहे से लैस पुलिस के एक दस्ते ने अपना पड़ाव डाल दिया था। जिस वक़्त इन्स्पेक्टर फ़रीदी और सार्जेंट हमीद वहाँ पहुँचे, उन्होंने उन्हें जंगल में गश्त करते हुए पाया। एक ने उन्हें टोका भी, लेकिन दूसरा शायद उन दोनों को पहचानता था, उसने उन्हें सलाम किया।
“क्यों भई, कोई ख़ास बात...!'' फ़रीदी ने पूछा।
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__“नहीं हुजूर, अभी तक कोई ऐसी बात नहीं हुई।” कॉन्स्टेबल ने जवाब दिया।
“उस गड्ढे की तरफ़ कोई दिखायी तो नहीं दिया था?...”
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“गड्ढा तो कोई मिला ही नहीं।” कॉन्स्टेबल ने घबरा कर कहा।
"क्या मतलब...” फ़रीदी ने उसे कड़ी नज़रों से घूरते हुए कहा। “तुम्हें क्या ऑर्डर दिये गये थे?"
“हुजूर! हमसे एक गड्ढे के बारे में कहा ज़रूर गया था, लेकिन यहाँ पहुँचने पर हमें कोई गड्ढा नहीं दिखायी दिया।"
फ़रीदी और हमीद तेज़ी से झाड़ियों की तरफ़ बढ़े। वाक़ई वहाँ गड्ढे का नामो-निशान तक न था। किसी ने गड्ढे को पाट कर ज़मीन बराबर कर दी थी।
“लीजिए...यह दूसरी रही।” फ़रीदी हाथ मलते हुए गुस्से में बोला। फिर वह दोनों कॉन्स्टेबलों की तरफ़ मुड़ कर बोला। ज़रा अपने इंचार्ज को तो बुलाओ।"
दोनों चले गये।
“मुजरिम ग़लती-पर-ग़लती करते चले जा रहे हैं।" हमीद ने कहा। “भला इसकी क्या ज़रूरत थी?"
“जी नहीं...वो हमारी ग़लतियों से फ़ायदा उठा रहे हैं। कल रात हम में से किसी एक को उस वक़्त तक यहाँ मौजूद रहना चाहिए था जब तक कि पुलिस यहाँ न पहुँच जाती।” फ़रीदी ने कहा। “जानते हो कि गड्ढा पाट देने का क्या मतलब है?"
हमीद ने “न” में सिर हिलाया।
“मुजरिम किसी ऐसे निशान को मिटा गये जिससे सुराग़ लग जाने का ख़तरा था।"
"तब तो बहुत बुरा हुआ।" हमीद ने कहा। थोड़ी देर के बाद पुलिस का इंचार्ज आ गया।
___ “क्यों साहब! आपको क्या ऑर्डर दिये गये थे।” फ़रीदी ने उसे घूरते हुए पूछा।
“सर! हम रात से उस गड्ढे को तलाश कर रहे हैं।''
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“चीज़ ही ऐसी है कि कोई भी धोखा खा जाय।” फ़रीदी ने हमीद की तरफ़ मुड़ते हुए कहा। "सरसरी तौर पर देखने से यही मालम होता है कि इससे पहले यहाँ कोई गड्ढा था ही नहीं। यहाँ पर सूखी घास इस तरह से बिछायी गयी है कि अच्छे-अच्छे धोखा खा जायें।"
“इस घास को फैलाते वक़्त वो यह भूल गये थे कि इस तरह तो उनकी उँगलियों के निशान हमें मिल जायेंगे।" हमीद ने कहा।
___ “हमीद साहब, इतनी जल्दी ख़ुश न हों।" फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा। "इस बार बहुत ही चालाक आदमियों से पाला पड़ा है। अरे मियाँ, ऐसे मौके पर सड़ा-से-सड़ा मुजरिम भी दस्ताने इस्तेमाल करता है।"
“बहरहाल, मुजरिम की यह दूसरी बेवकूफ़ी उसके सुराग़ के लिए काफ़ी होगी। अगर काफ़ी न भी हो तो भी कोई-न-कोई बात ज़रूर मालूम हो जायेगी।" हमीद ने झुक कर देखते हुए कहा।
“सबसे पहले यह सोचना चाहिए कि लाश का पता लग जाने के बाद गड्ढे को पाटने की क्या ज़रूरत हो सकती है।” फ़रीदी ने सिगार का धुआँ छल्लों की शक्ल में निकालते हुए कहा। “हो सकता है कि गड्ढे में कोई ऐसी चीज़ रह गयी हो जिससे मुजरिम का सुराग़ मिल जाये।"
__ “लेकिन ऐसी सूरत में भी गड्ढे को पाटने की ख़ास वजह समझ में नहीं आती। यह काम पुलिस के पहुँच जाने के बाद नामुमकिन हो जाता। मेरे ख़याल से हम लोगों के चले जाने के बाद ही यह हरकत की गयी है। अगर ऐसा है तो इसका मतलब है कि मुजरिम हमारी निगरानी कर रहे हैं।"
“जी हाँ! हम लोगों के आने से पहले ही यह सब कुछ किया गया। वरना हम लोग तो...!'
___“जी हाँ...वरना आप लोग तो काफ़ी मुस्तैद रहे।'' फ़रीदी ने इंचार्ज की बात काटते हुए तंज़िया लहजे में कहा। “अच्छा, अब उसे दोबारा खोदने का इन्तज़ाम करना चाहिए।"
इंचार्ज ने तीन-चार कॉन्स्टेबलों को बुला कर गड्ढा खोदने के लिए कहा, लेकिन इन लोगों के पास कोई ऐसी चीज़ न थी, जिससे ज़मीन खोदी जा सकती। आख़िरकार, यह तय हुआ कि लक्ष्मनपुर से कुछ मजदूर बुला लिये जायें।
“क्या उसे खोदने के लिए आप लोगों की संगीनें काफ़ी नहीं?" हमीद ने कहा।
___“कभी-कभी मामूली बातें भी देर में सूझती हैं।' इंचार्ज ने खिसियानी हँसी हँसते हुए कहा।
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कॉन्स्टेबलों ने अपनी संगीनों से ज़मीन खोदनी शुरू कर दी। थोड़ी देर बाद एक कॉन्स्टेबल की संगीन किसी चीज़ से टकरायी।
“ठहरो...ठहरो...!'' फ़रीदी झुकते हुए चीख़ा।
उसने दोनों हाथों से जल्दी-जल्दी मिट्टी हटानी शुरू कर दी।
“यह लीजिए...कोई और नयी मुसीबत...!" फ़रीदी ने गड्ढे में से एक भारी थैला बाहर खींचते हुए कहा।
“अरे, यह क्या...!'' सब ने एक साथ कहा।
___ फ़रीदी ने रस्सी से बँधा थैले का मुँह खोल कर उसे ज़मीन पर उलट दिया।
“अरे बाप रे...!” कहता हुआ हमीद उछल कर पीछे हट गया।
थैले में एक गीदड़ की लाश थी जिसके मुँह में तम्बाकू पीने का पाइप दबा हुआ था। उसके साथ शराब की दो ख़ाली बोतलें भी बरामद हुईं जिनमें से एक संगीन लगने से टूट गयी थी। गीदड़ के सीने से एक काग़ज़ बँधा हुआ था जिस पर ग़ालिब का एक शेर लिखा था : काबे किस मुंह से जाओगे ग़ालिब। शर्म तुमको मगर नहीं आती।।
___ फ़रीदी पर हँसी का दौरा पड़ गया। बाक़ी लोग हैरत से कभी उसे देखते और कभी गीदड़ की लाश को। फ़रीदी बराबर हँसे जा रहा था। धीरे-धीरे उसकी हँसी इतनी भयानक मालूम होने लगी कि कई कमज़ोर दिल वाले कॉन्स्टेबल वहाँ से चुपके से खिसक गये। फ़रीदी हँसे ही चला जा रहा था। वह इतना हँसा, इतना हँसा कि आख़िरकार चकरा कर गिर पड़ा।
हमीद और इंचार्ज दौड़ कर उसके क़रीब पहुँचे। वह बेहोश हो चुका था।
“अरे, यह क्या मामला है?' इंचार्ज ने घबराहट में कहा।
“न जाने क्या बात है। मैं ख़ुद चक्कर में हूँ।" हमीद ने फ़रीदी को झंझोड़ते हुए कहा। लेकिन फ़रीदी के चेहरे पर होश के कोई आसार पैदा न हुए।
“अब क्या किया जाये।" हमीद ने इंचार्ज की तरफ़ देख कर कहा।
“हमीद साहब! अब तो मेरा भी यही ख़याल है कि यह ज़रूर कोई शैतानी कारख़ाना है।" इंचार्ज ने काँपते हुए कहा। “गीदड़ की लाश का क्या मतलब और फिर उसके साथ शराब की बोतलें और मुँह में दबा हुआ पाइप और वह शेर...ऐसी अजीब बातें आज तक देखने में नहीं आयीं।"
“वह तो सब कुछ है, लेकिन यह बताओ कि इन्स्पेक्टर साहब को होश में किस तरह लाया जाये।” हमीद ने चारों तरफ़ देखते हुए कहा।
“सरकार, यह तो कोई झाड़-फूंक करने वाला ही कर सकता है।” एक कॉन्स्टेबल बोला।
“ग़लत...!'' हमीद ने मुँह बनाते हुए कहा। “अच्छा इंचार्ज साहब, आप दो आदमी मेरे साथ कर दीजिए। मैं इन्हें इसी हालत में शहर ले जाऊँगा।"
हमीद ने गीदड़ की लाश और चीजें वहीं पड़ी रहने दीं और बेहोश फ़रीदी को कार में डाल कर शहर की तरफ़ रवाना हो गया। वह ख़ुद कार ड्राइव कर रहा था। रास्ते में ही फ़रीदी को होश आ गया। वह पिछली सीट पर लेटे-ही-लेटे बोला। "हमीद, हम कहाँ जा रहे हैं?"
"ओह...आप होश में आ गये।" हमीद ने जल्दी से कार रोकते हुए मुड़ कर कहा।
____ फ़रीदी उठ कर बैठ गया और लम्बी अंगड़ाई लेते हुए बोला। “बड़ा भयानक प्लॉट था...वह गीदड़ और बोतलें कहाँ हैं?'
“वह सब तो मैं वहीं छोड़ आया।"
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“अरे...!” फ़रीदी सीट पर उछलते हुए बोला। “बड़े बेवकूफ़ हो तुम। चलो, फ़ौरन कार वापस ले चलो, जल्दी करो।"
कार दोबारा वापस जा रही थी।
“कहो भई, कुछ इसका मतलब समझ में आया?” फ़रीदी ने कहा।
“समझ में सब कुछ आ गया, लेकिन अगर कहँगा तो बेकार ही मुझे बेवकूफ़ बनना पड़ेगा।"
“आख़िर कुछ तो कहो।"
“मेरा ख़याल है कि यह जगह ज़रूर भूतों से भरी पड़ी है।”
“फिर वही बेवकूफ़ी की बात।"
“मैंने पहले ही कह दिया था।"
“तुम्हारा क़सूर नहीं, हर शख़्स यही समझेगा। मुजरिम ने अपने जुर्म पर पर्दा डालने के लिए यह दूसरी चाल चली थी। मगर अफ़सोस कि वह अपने मक़सद में नाकाम रहा।"
“मैं आपका मतलब नहीं समझा।"
“अपनी इस हरकत से वह यह ज़ाहिर करना चाहता था कि असलियत में यह क़त्ल भूतों ने किया था।"
“लेकिन आपके इस तरह ज़ोरों की हँसी हँस कर बेहोश हो जाने का क्या मतलब था।"
“इसी चीज़ ने तो मुझे इस नतीजे पर पहुँचने में मदद दी है। तुम्हें याद होगा कि जब संगीन बोतल से टकरायी थी, उस वक़्त सबसे पहले मैं ही उसे देखने के लिए झुका था। जैसे ही मैं झुका, एक तेज़ बू ने मेरा दिमाग़ ख़राब कर दिया। लेकिन उस वक़्त मैंने उसे कोई अहमियत न दी। लेकिन उसका असर धीरे-धीरे मेरे दिमाग़ पर हो रहा था। जैसे ही गीदड़ की लाश बरामद हुई, मैं उसको देख कर हँसने लगा। मुझे हैरत हो रही थी कि आख़िर मैं हँसी क्यों नहीं रोक पा रहा था। जबकि और लोग ख़ामोश थे। थोड़ी देर के बाद मैं अपने आपको बिलकुल बेबस महसूस करने लगा। काफ़ी कोशिश के बावजूद भी मेरी हँसी न रुक सकी। और उसके बाद जो कुछ हुआ, वह तुम जानते ही हो। तो कहने का मतलब यह है कि इन बोतलों में एक किस्म की गैस थी जिसके असर से मेरी यह हालत हुई। मुझे अच्छी तरह याद है कि दूसरी बोतल के मुंह पर एक मज़बूत कार्क लगा हुआ था। ख़ुदा करे कि उन बेवकूफ़ों ने उसे खोला न हो। वरना एक बहुत ख़ास चीज़ बेकार हो जायेगी।"
“उफ, मेरे ख़ुदा।'' हमीद ने हैरत से कहा।
“और अब मुझे पूरा यक़ीन हो गया है कि बदमाशों का अड्डा यहीं कहीं क़रीब ही है, वरना जल्दी इतना बड़ा प्लान बना लेना आसान काम नहीं। भई, ज़रा कार की रफ़्तार और तेज़ करो। कहीं इन लोगों में कोई उस बोतल को खोल न डाले।"
हमीद ने कार की रफ़्तार और तेज़ कर दी।
लेकिन वही हुआ जिसका डर था। इन दोनों के जाने के बाद ही एक कॉन्स्टेबल ने ख़ाली बोतल उठा ली और उसका कॉर्क निकाल कर सूंघने लगा। अचानक उस पर भी हँसी का दौरा पड़ा और थोड़ी देर बाद वह भी बेहोश हो कर गिर पड़ा। फ़रीदी और हमीद उस वक़्त वहाँ पहुँचे जब दूसरे कॉन्स्टेबल उसे होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। वह सब बुरी तरह डरे हुए थे। इन दोनों को देखते ही उन्होंने एक साथ जल्दी-जल्दी सारी कहानी बताना शुरू कर दी। कई ने तो यहाँ तक कह दिया कि चाहे नौकरी रहे, चाहे जाये...वे अब किसी कीमत पर वहाँ न ठहरेंगे।
“तुम लोग डरो नहीं।” फ़रीदी ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा। “अगर यह बोतल न खोलता तो कभी इस हाल को न पहुँचता। अब तुममें से कोई बेहोश न होगा। लेकिन इसका अफ़सोस है कि उसने अपनी बेवकूफ़ी से मेरा बहुत नुक़सान कर दिया।
“मैं कुछ समझा नहीं।” इंचार्ज ने हैरत से आँखें फाड़ते हुए कहा।
___ “इन बोतलों में कोई हँसाने वाली गैस बन्द थी।” फ़रीदी ने सीरियसली कहा।
___ "हँसाने वाली गैस...” इंचार्ज ने कहा। “रुलाने वाली गैस तो मैंने देखी है, लेकिन हँसाने वाली गैस का आज तक नाम भी नहीं सुना।"
“अगर रुलाने वाली गैस बन सकती है तो हँसाने वाली गैस बनाने में क्या परेशानी हो सकती है। यह और बात है कि मुजरिम के अलावा और किसी ने अब तक इस तरफ़ ध्यान न दिया हो।”
___ “मगर साहब, आपकी यह बात मेरी समझ में नहीं आयी।" इंचार्ज ने कहा।
__“अफ़सोस तो इस बात का है कि वह चीज़ बेकार ही हो गयी, वरना मैं समझा देता।"
गीदड़ की लाश अब तक उसी हाल में पड़ी हुई थी। फ़रीदी ने लेंस निकाल कर बोतल का जायज़ा लेना शुरू किया।
___“अफ़सोस कि इस कॉन्स्टेबल की उँगलियों के निशान के अलावा कोई और निशान इस बोतल पर नहीं और ये टूटी हुई बोतल के टुकड़े...उन पर भी कुछ नहीं...!"
“मगर वह शेर...!" हमीद जल्दी से बोला। “कम-से-कम मुजरिम के हाथ की लिखावट तो हमारे हाथ आ गयी।"
“बहुत अच्छे,” फ़रीदी उसकी तरफ़ तारीफ़ी नज़रों से देखते हुए बोला। “मगर हैरत है कि मुजरिम इतना होशियार होने के बावजूद यहाँ कैसे चूक गया। ज़रा जल्दी से वह काग़ज़ खोलो।"
__गीदड़ की लाश से वह काग़ज़ खोल कर जब हमीद पलटा तो उसका मुँह बुरी तरह लटका हुआ था।
“इस पर तो मैंने ध्यान ही नहीं दिया।” उसने कहा।
“क्या..."
“यह शेर किसी किताब से काट कर इस काग़ज़ पर चिपका दिया गया है।"
“यही तो मैंने कहा कि इतने चालाक आदमी ने भला ऐसी बेवकूफ़ी कैसे की।” फ़रीदी ने कहा। "हमीद साहब, इस बार एक अच्छा केस हाथ आया है।"
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अजीबो-गरीब चिड़िया
फ़रीदी रूमाल बिछा कर ज़मीन पर बैठ गया। वह सिगार के लम्बे-लम्बे कश ले रहा था। उसकी आँखें एकटक गीदड की लाश पर जमी हुई थीं। कॉन्स्टेबल आपस में खुसर-फुसर कर रहे थे। हमीद गड्ढे से मिट्टी निकाल-निकाल कर एक तरफ़ ढेर कर रहा था। उसे अब भी उम्मीद थी कि जल्द ही कोई चीज़ मिल जायेगी जिससे सुराग़ लगाने में आसानी होगी। थोड़ी देर बाद वह थक कर माथे से पसीना पोंछने लगा। फ़रीदी की निगाहें अब इर्द-गिर्द ज़मीन का चक्कर लगा रही थीं।
67%17:13a.m. जंगल में लाश अचानक वह चौंक पड़ा और उसकी आँखें चमकने लगीं। वह उठ कर गड्ढे के पास गया और फिर वहाँ झुक कर कुछ देखते हुए पश्चिम की तरफ़ बढ़ने लगा। कुछ दूर जा कर वह सीधा खड़ा हो गया और तेज़ आवाज़ में बोला। "हमीद...हमीद, यहाँ आओ। तुम्हें एक दिलचस्प चीज़ दिखाऊँ।"
___ हमीद हाथ की मिट्टी झाड़ता हुआ उसकी तरफ़ लपका।
“यह देखो...!'' फ़रीदी ने ज़मीन की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
“क्या...? मुझे तो कुछ भी नज़र नहीं आता।"
“अरे भई।” फ़रीदी ने ज़मीन पर बैठते हुए किसी चीज़ की तरफ़ इशारा किया।
“जी हाँ, यह किसी चिड़िया के पंजों के निशान हैं।"
"तो क्या यह अजीब बात नहीं।"
“अजीब बात।" हमीद ज़ोर से हँसते हुए बोला। “मुझे तो इसमें कोई अजीब बात नज़र नहीं आती। भला किसी चिड़िया के पंजों के निशान में क्या अजीब बात हो सकती है?"
“भई, मान गया।” फ़रीदी हँसते हुए बोला।
“क्या..."
“यही कि तुम ज़िन्दगी भर एक कामयाब जासूस नहीं हो सकते।”
__"चलिए, माने लेता हूँ। लेकिन आख़िर यह तो बताइए कि इस निशान में अजीब बात कौन-सी है?"
“ज़मीन देख रहे हो कितनी सख़्त है।" फ़रीदी मुस्कुरा कर बोला। “अभी तक बारिश भी नहीं हुई। ऐसी सूरत में किसी मामूली चिड़िया के पंजे इतने गहरे निशान नहीं बना सकते। तो फिर इसका मतलब यह हुआ कि इसका वज़न ढाई-तीन मन से किसी तरह कम न होगा और इतने वज़न की चिड़िया के इतने छोटे-छोटे पंजों का ख़याल हैरत में डालता है। फ़ौरन सोचो तो बिलकल ऐसा ही लगता है न जैसे किसी ऊँट को गौरैया के पंजे दे दिये गये हों? और दूसरी बात देखो, यहाँ चार निशानों के बीच का फ़ासला चार-चार अंगुल है। इसका मतलब यह हुआ कि इस जगह चिड़िया के दो क़दम पूरे हुए। पहली चीज़ यह कि इतनी वज़नदार चिड़िया इतने छोटे पैर रखती है कि वह चार अंगुल से ज़्यादा नहीं फैल सकते। ये चारों निशान यहाँ ख़त्म हो गये। इसके बाद तक़रीबन डेढ़ फुट के फ़ासले पर फिर वैसे ही चार निशान मिलते हैं; इसलिए दूसरी हैरत की बात यह हुई कि यह चिड़िया हर दो क़दम चलने के बाद डेढ़ फुट कूदती है। मेरे पीछे चले आओ।” फ़रीदी ने आगे बढ़ते हुए कहा, "यह देखो, कहीं भी इसकी चाल में फ़र्क नहीं आया। दो क़दम चलने के बाद उसके लिए डेढ़ फुट उछलना ज़रूरी है। कहो, कभी ऐसी चिड़िया ख्वाब में भी देखी थी। अब बताओ, कैसी रही।"
“फ़रीदी साहब, मैं फिर कहता हूँ कि यह भूत...!"
“ओफ़ ओ...!” फ़रीदी हमीद की बात काटते हुए बोला। “वही चुग़दपने की बातें।"
“तो फिर और क्या किया जाय?" __“अभी कुछ किया ही क्यों जाये।” फ़रीदी ने कहा। "और दूसरी बात यह देखो कि यह चिड़िया उस तरफ़ से आयी, गड्ढे तक गयी और फिर उसी तरफ़ वापस चली गयी।"
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“वाक़ई बड़ी अजीब बात है।'' हमीद ने फ़रीदी की आँखों में देखते हुए कहा।
“और दिलचस्प भी।” फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा। “ऐसी अजीबो-गरीब चिड़िया का शिकार भी दिलचस्प होगा। क्या तुम अपना पिस्तौल साथ लाये हो।"
“पिस्तौल तो है मेरे पास...मगर...मगर...!''
“घबराओ नहीं...मेरी मौजूदगी में यहाँ के भूत तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। आओ, मेरे साथ चलो।” फ़रीदी ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा।
“क्या उन लोगों को साथ ले चलिएगा।" हमीद ने कॉन्स्टेबलों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
“अजीब डरपोक आदमी हो...इतने आदमी देख कर अगर चिड़िया उड़ गयी तो...तुम्हें तो कोई कहानियाँ सुनाने वाली दादी अम्मा होना चाहिए था। मर्द बनो बरखुरदार...!
“चलिए साहब।" हमीद मुर्दा-सी आवाज़ में बोला।
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दोनों उन अजीबो-गरीब निशानों को देख कर आगे बढ़ने लगे। आगे चल कर फिर झाड़ियों का सिलसिला शुरू हो गया। झाड़ियों के बीच बल खाती हुई एक पगडण्डी दूर तक चली गयी थी।
__“देखो मियाँ हमीद, यह चिड़िया हम लोगों की तरह अक्लमन्द मालूम होती है कि झाड़ियों में घुसने की बजाय पगडण्डियों ही पर चलती है। बहुत मुमकिन है कि यह काफ़ी पढ़ी-लिखी भी हो...क्या ख़याल है..."
__“मैं क्या बताऊँ...आप भूत-भूतनियों को तो मानते नहीं। खैर, कभी-न-कभी तो मानना पड़ेगा। हो सकता है कि इसी केस के सिलसिले में आपको अपने ख़याल बदलने पड़ें।"
“भई, तुम्हें जासूसी करने के लिए किसने कहा था। मैं तुम्हें तुम्हारे साथियों में सबसे ज़्यादा होशियार समझता था। लेकिन तुम निकले निरे गँवार।"
“आप जो चाहें कहें, मगर मुझे पूरा यक़ीन है कि यह सब किसी इन्सान का काम नहीं।'
“अच्छा चलो, वह भूत ही सही। लेकिन साफ़ रहे कि मैं अपने इलाके में भूत का वजूद भी बर्दाश्त नहीं कर सकता।"
“देखिए, ऐसा न कहिए...!” हमीद जल्दी से बोला।
“क्यों...क्या भूत तुम्हारे कोई रिश्तेदार हैं। अगर ऐसा है तो मैं अपने अल्फ़ाज़ वापस लेता
.
“आप तो समझते नहीं।" हमीद बुरा मान कर बोला।
“क्या नहीं समझता...”
“खैर, होगा...हटाइए...मुझे क्या।"
“आख़िर कुछ कहो भी तो।”
“अब ज़्यादा बेवकूफ़ बनना नहीं चाहता।"
“क्या तुम बुरा मान गये। अरे भाई, रास्ता कटने के लिए भी तो कुछ होना चाहिए। मालूम नहीं, अभी और कितनी दूर चलना होगा।"
“मेरा ख़याल है कि क्यों न इस केस को मामूली छानबीन के बाद टाल ही दिया जाये। मैं आपको यक़ीन दिलाता हूँ कि यह किसी इन्सान का काम नहीं।" हमीद ने संजीदगी से कहा।
__“भई, बहुत अच्छे! क्या बात कही आपने।" फ़रीदी ने हमीद की पीठ ठोंकते हुए कहा।
“लेकिन हमीद साहब, यह पहला केस है जिसमें मुझे सही मानी में मज़ा आ रहा है।"
वे दोनों चिडिया के पंजों के निशान पर चलते हुए अब लगभग एक मील निकल आये थे। यहाँ आ कर वह पगडण्डी एक कच्ची सड़क से मिल गयी थी। सड़क के उस पार फिर घनी झाड़ियों का सिलसिला शुरू हो गया था। यहाँ वे निशान भी मिट गये थे। सड़क के दूसरी तरफ़ भी निशानात न मिले। फ़रीदी कुछ देर तक खड़ा सोचता रहा फिर चुटकी बजा कर बोला।
“तो हमीद साहब, वह चिड़िया यहाँ तक पैदल आयी। उसके बाद फिर मोटर पर बैठ कर उत्तर की तरफ़ रवाना हो गयी।"
हमीद यह सुन हँसने लगा।
"इस वक़्त मुझे अपना बचपन याद आ रहा है।" हमीद हँसी रोकते हुए बोला।
"तुम शायद मज़ाक़ समझ रहे हो।” फ़रीदी ने संजीदगी से कहा। “यह देखो, मोटर के पहियों के निशान दक्खिन की तरफ़ कहीं नज़र नहीं आ रहे। कोई मोटर यहाँ तक ले आया। उसके बाद फिर दक्खिन की तरफ़ से उत्तर की तरफ़ घमाया गया। यहीं से चिड़िया के पंजों के निशान भी ग़ायब हैं।
“हो सकता है कि चिड़िया मोटर की आवाज़ सुन कर उड़ गयी हो।" हमीद बोला।
__ “फिर वही बचपने की बातें। अरे मियाँ, अगर वह ढाई-तीन मन की चिड़िया उड़ सकती होती तो इतनी दूर पैदल क्यों आती?"
“यह रही बेपर की।" हमीद ज़ोर से हँस कर बोला।
“खैर, खुदा का शुक्र है कि तुम हँसे तो।" फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा। “अच्छा आओ...अब इस मोटर के पीछे चलें।" ___
"तो आप साँप निकल जाने के बाद लकीर पीटने वाली मिसाल पर काम करेंगे।" हमीद ज़मीन पर बैठते हुए बोला। “अब तो चला नहीं जाता। पहले आप यह तो बताइए कि आप किस प्लान पर काम कर रहे हैं। तभी चल सकूँगा।"
बच्चे मत बनो...चलो उठो...गर्मी के मारे बुरा हाल हो रहा है। खैरियत यही है कि आज लू नहीं चल रही।"
__“तो क्यों न हम लोग अपनी कार यहाँ ले आयें...और फिर...!"
“अच्छा बको मत, हमें पैदल ही चलना है।" फ़रीदी ने सख़्त लहजे में कहा।
“तो मैं कब कहता हूँ कि पैदल न चलूँगा।" हमीद ने ऐसे बचकाना अन्दाज़ में कहा कि फ़रीदी को हँसी आ गयी।
दोनों फिर मोटर के पहियों के निशान देखते हए उत्तर की तरफ रवाना हो गये। आगे चल कर झाड़ियाँ कम हो गयीं। वहाँ से कुछ दूर चलने के बाद एक छोटा-सा गाँव दिखायी दिया। कच्ची सड़क इस गाँव के बाहर से होती हुई आगे बढ़ रही थी। दोनों चलते रहे। एक पक्की और नये । स्टाइल की इमारत दूर से ही दिखायी दे रही थी।
“यह शायद इस गाँव के ज़मींदार का मकान मालूम होता है।” फ़रीदी ने कहा।
दोनों इमारत के क़रीब पहुँच चुके थे। यह नये स्टाइल की एक बड़ी इमारत थी जिसके आगे चारदीवारी में घिरा हुआ बाग़ था।
___“देखिए, ये मोटर के पहियों के निशान कहाँ ले जाते हैं?"
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“ठहरो...!” फ़रीदी हमीद की बात काटता हुआ ज़मीन पर झुक गया।
हमीद बुरा-सा मुँह बनाये हुए दूसरी तरफ़ देखने लगा।
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“यह देखो...शायद वह चिड़िया यहीं पर मोटर से उतरी है।'' फ़रीदी ने चिड़िया के पंजों के निशान की तरफ़ इशारा करते हुए कहा जो कहीं-कहीं नज़र आ रहे थे, फ़रीदी निशान को देखता हुआ बाग़ के फाटक की तरफ़ बढ़ रहा
था। दोनों बाग़ में घुस गये।
__ अचानक एक बड़ा कुत्ता गुर्राता हुआ उनकी तरफ़ झपटा।
“जैक...जैक...!'' एक औरत जैसी आवाज़ आयी और कुत्ता दुम हिलाता हुआ लौट गया।
“आप लोग कौन हैं और यहाँ क्या कर रहे हैं?” औरत क़रीब आ कर तेज़ आवाज़ में बोली।
वह खूबसूरत जवान औरत थी। कपड़ों और बातचीत के अन्दाज़ से यह मालूम हो रहा था कि वह इस घर की मालकिन है। उसने प्याज़ी रंग की जॉर्जेट की साड़ी पहन रखी थी। बाल पीठ पर बिखरे हुए थे। आँखों में एक अजीब क़िस्म की कशिश थी। सार्जेंट हमीद एक खूबसूरत और जवान औरत को अपने क़रीब देख कर कुछ बौखला-सा गया। लेकिन फ़रीदी के अन्दाज़ में कोई बदलाव न आया। वह आराम से बोला, “मोहतरमा! हम लोग डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन से आये हैं।"
“खैर, ख़ुदा का शुक्र है कि आप लोग चौंके तो।" उसने मज़ाक़िया अन्दाज़ में कहा।
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“मैं आपका मतलब नहीं समझा।” फ़रीदी ने हैरान हो कर कहा।
“बहुत खूब...तो आप लोग इस बाग़ में सैर करने के लिए आये हैं?"
“जी नहीं...हम लोग तो...!'
“खैर, छोड़िए, इन बातों को...कुछ सुराग़ मिला...मैं बहुत परेशान हूँ।” वह बोली।
फ़रीदी और हमीद हैरत से एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे।
“मोहतरमा! मैं कुछ समझ नहीं सका।" फ़रीदी ने कहा।
__“तो...आप लोग यहाँ क्या करने आये हैं?" वह गुस्से से बोली।
“देखिए, साफ़-साफ़ बात कीजिए। हम लोग एक क़त्ल की छान-बीन कर रहे हैं।” फ़रीदी ने कहा।
“क़त्ल...!” वह चौंक कर एक क़दम पीछे हटते हुए बोली। “किसका क़त्ल...!"
“एक गुमनाम आदमी का।"
“देखिए साहब, बेकार वक़्त ख़राब न कीजिए। आपको एक औरत से मज़ाक़ करने की अच्छी ख़ासी सज़ा मिल सकती है।"
“लीजिए, देख लीजिए।'' फ़रीदी ने अपना विज़िटिंग कार्ड देते हुए कहा।
“इन्स्पेक्टर ए० के० फ़रीदी।” औरत ने धीरे से कहा। “फ़रीदी साहब! माफ़ कीजिएगा, मैं बहुत परेशान हूँ। परसों रात से मेरी सहेली विमला ग़ायब है। वह दो महीने के लिए यहाँ आयी थी। मेरी समझ में नहीं आता कि मैं उसके माँ-बाप को क्या जवाब देंगी। मैंने पलिस में रिपोर्ट दर्ज करायी थी। इस वक़्त समझी कि शायद आप लोग उसी के सिलसिले में कोई ख़बर देने आये हैं।"
___ “मोहतरमा, हमें इसका कोई इल्म नहीं। हम तो इस वक़्त एक अजीबो-गरीब चिड़िया का पीछा करते हुए यहाँ आये हैं।' फ़रीदी ने कहा। "हमें आपकी सहेली की कोई ख़बर नहीं।"
“मुझे सख़्त अफ़सोस है...अगर शाम को यहाँ की पुलिस ने कोई ख़बर न दी तो मैं यक़ीनन इस मामले को आगे बढ़ा दूंगी।"
“अगर आप मुझे उस चिड़िया की तलाश में मदद दे सकें तो शुक्रगुज़ार होऊँगा। आप इत्मीनान रखिए। मैं आपकी सहेली का पता लगाने की कोशिश करूँगा। मैं वादा करता हूँ।"
“भला मैं क्या बता सकती हूँ। इस बाग़ में दिन भर अनगिनत परिन्दे आते होंगे।" वह मुस्कुरा कर बोली।
“नहीं, यह परिन्दा अपनी तरह का एक ही मालूम होता है।” फ़रीदी ने कहा।
“मैं आपका मतलब नहीं समझी।"
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