एक अनोखा बंधन----5
आदित्य मुझे भी ले चलो साथ मुंबई. मैं यहा अकेली नही रह पाउन्गि. तुम देख ही रहे हो कैसा माहॉल है यहा. घूर-घूर कर देखते हैं लोग मुझे. लगता है लोगो को शक हो गया है हमारे बारे में.”
“ज़रीना चिंता मत करो..मैं मुंबई जा रहा हूँ ना. सब ठीक करके आउन्गा और आते ही हम शादी कर लेंगे. ज़्यादा दिन नही सहना होगा तुम्हे ये सब. फिर देखता हूँ कि कौन घूर कर देखता है तुम्हे. आक्च्युयली मैं प्राब्लम ये है कि किसी को बर्दास्त नही हो रहा होगा कि एक मुस्लिम लड़की हिंदू के घर रह रही है.”
“हां यही मैं प्राब्लम है. पता नही जब हम शादी करके रहेंगे फिर किस तरह रिक्ट करेंगे ये लोग.”
“तब की तब देखेंगे. हमें जो करना है करना है.”
“आदित्य मुझे भी अपने साथ मुंबई ले चलो प्लीज़. मैं यहा अकेली क्या करूँगी.”
“चलना चाहती हो तुम?”
“हां…ले चलोगे ना?”
“तुम्हारे लिए कुछ भी करूँगा जान. चलो समान पॅक करलो, तुम्हे मुंबई घुमा कर लाता हूँ.” आदित्य ने कहा.
“बहुत खर्चा करवा रही हूँ तुम्हारा.”
“पागल हो क्या. सब तुम्हारा है. और फॅक्टरी ठीक चल रही है. और ध्यान दूँगा तो और ज़्यादा तरक्की करेंगे.”
“आदित्य तुम बहुत अच्छे हो” ज़रीना ने कहा और कह कर किचन की तरफ चल दी.
“रूको कहा जा रही हो?”
“खाना बनाना है…” ज़रीना हंसते हुवे बोली और किचन में आ गयी.
आदित्य भी उसके पीछे पीछे आ गया.
“आदित्य पता नही क्यों पर डर सा लग रहा है मुझे. पता नही ये समस्या कैसे और कब दूर होगी और कब मुझे तुम्हारी पत्नी कहलाने का हक़ मिलेगा.”
“वो हक़ तो तुम्हे कब से है. फिर भी एक काम और किए देता हूँ अगर कोई डाउट है तुम्हे तो” आदित्य ने चाकू उठाया और इस से पहले कि ज़रीना कुछ समझ पाती झट से अपने दायें हाथ का अंगूठा चीर दिया.
“ये क्या किया आदित्य…पागल हो गये हो क्या.”
आदित्य ने कुछ कहे बिना ज़रीना की माँग भर दी और बोला, “अब मत कहना कि तुम मेरी पत्नी नही हो. जब दिल से मान चुके हैं हम एक दूसरे को पति-पत्नी तो और क्या रह गया है.”
ज़रीना आदित्य के कदमो में बैठ गयी, “आदित्य मेरा वो मतलब नही था. हम दोनो तो ये जानते ही हैं. बात समाज की हो रही है.”
“छोड़ो ज़रीना हटो अब. हद होती है किसी बात की. बेकार के झंझट पाल रखें हैं तुमने अपने मन में. कितना सम्झाउ तुम्हे.” आदित्य ज़रीना को किचन में छ्चोड़ कर बाहर आ गया. ज़रीना वही बैठी हुई सुबक्ती रही.
ज़रीना खाना बना कर आदित्य के पास आई.
“खाना खा लो आदित्य.”
“नही मुझे भूक नही है. तुम खा लो.”
“अच्छा सॉरी बाबा…आगे से ऐसा नही कहूँगी…खाना खा लो प्लीज़…वरना मैं भी नही खाउन्गि. वैसे बहुत सुंदर लग रही है मेरी माँग भरी हुई.”
“मैने अपने खून से माँग भर दी तुम्हारी फिर भी पता नही कौन सी दुविधा में हो. कोई मज़ाक नही किया था मैने. बहुत मान्यता है इस बात की हमारे लिए.”
“मैं जानती हूँ आदित्य. इसी देश में पली-बढ़ी हूँ मैं. अच्छा आगे से ऐसा कुछ नही कहूँगी जिस से तुम्हे दुख पहुँचे.”
आदित्य ज़रीना के करीब आया और ज़रीना के चेहरे पर हाथ रख कर बोला, “जान मैं तुम्हारी हर क्न्सर्न समझता हूँ. पर तुम्हे परेशान नही देख सकता.”
“सॉरी आगे से ऐसा नही होगा…चलो खाना खाते हैं.” ज़रीना मुश्कुरा कर बोली.
आदित्य और ज़रीना के लिए फिर से ये इम्तिहान का दौर था. पहले इम्तिहान में वो दोनो फैल हो गये थे मगर उसके बाद दोनो ने कुछ ऐसा सीखा था जो कि उन्हे जीवन भर काम आएगा. फेल्यूर कभी बेकार नही जाता. कुछ तो वो भी दे ही जाता है. ये अच्छी बात थी कि ऐसे मुश्किल दौर में दोनो एक साथ खड़े थे. यही प्यार की सबसे बड़ी डिमॅंड रहती है अगर आप प्यार के सफ़र पर चल रहे हैं तो.
दोनो ने शांति से खाना खाया. और खाना खाने के बाद आदित्य ने हंसते हुवे कहा, “अब एक स्वीट डिश हो जाए.”
“स्वीट डिश नही बनाई…अभी बना कर लाती हूँ कुछ.”
“नही…नही रूको मैं मज़ाक कर रहा था. वैसे कहते हैं कि चुंबन स्वीट होता है.”
“श्रीमान वो भी उपलब्ध नही है इस समय. थोड़ा वक्त लगेगा.” ज़रीना मुश्कुरा कर वापिस किचन की ओर चल दी.
“कितना वक्त लगेगा तैयार होने में.?” आदित्य ने पूछा.
“क्या स्वीट डिश या…” ज़रीना ने मूड कर पूछा.
“दोनो के बारे में बता दो.”
“स्वीट डिश अभी 10 मिनिट में बना देती हूँ. उसमे कितना टाइम लगेगा पता नही.” ज़रीना हंसते हुवे किचन में घुस गयी.
“ओह ज़रीना कितनी प्यारी हो तुम. ऐसी ही रहना हमेशा. मुझे चुंबन की जल्दी नही है जान. बस मज़ाक कर रहा हूँ तुमसे. तुम मेरी अपनी हो ना इतना मज़ाक तो कर ही सकता हूँ. बुरा मत मान-ना.” आदित्य ने मन ही मन कहा.
“आदित्य मुझे शरम आने लगी है अब तुम्हारे साथ. थोड़ा डर भी लगने लगा है तुमसे. पर सब कुछ अच्छा भी लग रहा है. तुम यू ही रहना हमेशा मेरे लिए. चुंबन अगर बहुत ज़रूरी है तो ले लो. पर नाराज़ मत होना मुझसे. जी नही पाउन्गि तुम्हारे बिना.” ज़रीना की आँखे नम हो गयी सोचते सोचते.
ये भी प्यार का अजीब सा रूप है. बिन कहे बहुत सारी बाते होती हैं और समझी भी जाती हैं. ज़रीना और आदित्य लगभग एक सी बाते सोच रहे थे. दिस ईज़ रियली ग्रेट.
अगले दिन आदित्य और ज़रीना मुंबई के लिए रवाना हो गये. दोपहर 3 बजे पहुँच गये वो मुंबई. कोलाबा में घर था आदित्य के चाचा जी का. इश्लीए वही एक होटेल में रुक गये आदित्य और ज़रीना. कुछ देर आराम करने के बाद आदित्य ने कहा, “जान मैं मिल आता हूँ सिमरन से. तुम यही रूको.”
“हां मिल आओ और शांति से काम लेना. उसकी कोई ग़लती नही है. कुछ भला बुरा मत बोल देना उसे. बहुत सेवा की है उसने तुम्हारी. अपना पत्नी धरम निभाया है. मुझे यकीन है कि तुम सब ठीक करके लोटोगे. काश मैं भी चल पाती तुम्हारे साथ.” ज़रीना ने कहा
“पहले माहॉल देख लूँ वाहा का. फिर तुम्हे भी ले चलूँगा. चाचा चाची से तो तुम्हे मिलवाना ही है.” आदित्य ने कहा.
आदित्य ज़रीना को होटेल में छ्चोड़ कर चाचा जी के घर की तरफ चल दिया. पैदल ही चल दिया वो. बस कोई 15 मिनिट की वॉकिंग डिस्टेन्स पर था उसके चाचा जी का घर. दिल में बहुत सारे सवाल घूम रहे थे. चेहरे पर शिकन सॉफ दीखाई दे रही थी. ज़रीना से ये सब छुपा रखा था उसने, क्योंकि उसे परेशान नही करना चाहता था. मगर अब उसके दिलो-दिमाग़ को चिंता और परेशानी ने घेर लिया था. उसे खुद नही पता था कि कैसे हॅंडल करना है सब कुछ, हां बस वो इतना जानता था की उसे हर हाल में इस समस्या का समाधान करना है.
आदित्य घर पहुँचा और बेल बजाई तो उसकी चाची ने दरवाजा खोला.
“नमस्ते चाची जी” आदित्य ने पाँव छूते हुवे कहा.
“नमस्ते तो ठीक…तुम ये बताओ समझते क्या हो तुम खुद को. बिना बताए भाग गये थे यहा से…कान खींचने पड़ेंगे तुम्हारे लगता है?” चाची बहुत गुस्से में दिख रही थी.
“चाची जी मुझे माफ़ कर दीजिए…मेरी कुछ मजबूरी थी.” आदित्य गिड़गिदाया.
“आओ अंदर..देखती हूँ क्या मजबूरी थी तुम्हारी.” चाची ने कहा.
आदित्य अंदर आ गया चुपचाप. चाची ने कुण्डी लगा कर आवाज़ दी, “अजी सुनते हो आदित्य आ गया है.”
उस वक्त सिमरन कमरे में सोई हुई थी. चाची की आवाज़ सुनते ही उठ गयी, “आप आ गये…”
सिमरन के साथ निशा भी थी कमरे में. सिमरन ने निशा को कंधे पर हाथ रख कर हिलाया, “उठो तुम्हारे भैया आ गये हैं.”
“आदित्य भैया आ गये?” निशा ने आँखे मलते हुवे कहा.
“हां आ गये हैं. जाओ मिल लो जाकर?” सिमरन ने कहा.
“अरे सबसे पहले आपको मिलना चाहिए…चलिए अभी मिल्वाति हूँ आप दोनो को. बल्कि आप यही रुकिये मैं भैया को खींच कर लाती हूँ यही.” निशा ने कहा.
“नही रूको मिल लेंगे…इतनी जल्दी क्या है?”
“कैसी बाते करती हो भाभी…ज़्यादा नाटक मत किया करो.” निशा कह कर कमरे से बाहर आ गयी.
आदित्य चुपचाप चाचा चाची के साथ सोफे पर बैठा था. चाची डाँट पे डाँट पीलाए जा रही थी उसे, घर से चले जाने की बात को लेकर.
“मम्मी क्यों डाँट रही हो भैया को…आओ भैया भाभी इंतेज़ार कर रही है तुम्हारा.” निशा ने कहा.
आदित्य से कुछ भी कहे नही बना. उसके तो जैसे पैरो के नीचे से ज़मीन निकल गयी ये सुन कर.
“निशा तुम जाओ. आदित्य अभी आएगा थोड़ी देर में” रघु नाथ ने गंभीर आवाज़ में कहा.
“पापा बात क्या है…आप सब लोग गुमशुम क्यों हैं. भैया आपने मुझसे ठीक से बात भी नही की. सब ठीक तो है ना.”
“तुमसे कहा ना आदित्य आ रहा है. जाओ यहा से.” रघु नाथ ने निशा को डाँट दिया.
निशा मूह लटका कर वाहा से चली गयी.
निशा के जाने के बाद चाची ने कहा, “बेटा क्या ये सच है कि तुम गोना नही करना चाहते. सिमरन को छ्चोड़ देना चाहते हो.”
“चाची जी मैने चाचा जी को सब बता दिया है.”
“हां इन्होने बताया है मुझे…मगर मैं तुमसे सुन-ना चाहती हूँ.”
“हां ये सच है. मैं ये बाल-विवाह नही निभा सकता. मैने कभी इस शादी को शादी नही माना.”
“मतलब हम सब बडो की कोई परवाह नही तुम्हे. तुम्हारे मम्मी, पापा जींदा होते तो पता नही क्या हाल होता उनका ये सब सुन कर. क्या तुम्हे अंदाज़ा भी है कि क्या ठुकराने जा रहे हो तुम. अरे हीरा है सिमरन हीरा. लाखो में एक है वो.”
“मैं किसी और से प्यार करता हूँ और उसे अपनी पत्नी मानता हूँ. मैं ये गुड्डे-गुडियों का खेल नही निभा सकता.” आदित्य ने कहा.
“ये सुनते ही चाचा और चाची की आँखे फटी रह गयी.”
“मुझे तो पहले से ही शक था इस बात का. बहुत बढ़िया बेटा.” चाचा ने कहा.
“कौन है वो करम जली जो हमारी सिमरन का घर उजाड़ने पर तुली है.” चाची ने कहा.
चाची बहुत गुस्से में थी इश्लीए आदित्य ने चुप रहना ही सही समझा.
“मतलब की तुम्हारा फ़ैसला अटल है.” चाचा ने कहा.
“जी हां…मैं शादी करूँगा तो अपनी मर्ज़ी से और वो भी उस से जिसे मैं बहुत प्यार करता हूँ.इस बाल-विवाह को मैं नही मानता.” आदित्य ने कहा.
“जाओ बेटा ये सब खुद ही कहो सिमरन से जाकर. हम ये सब नही बोल पाएँगे.” रघु नाथ ने कहा और निशा को आवाज़ दी ज़ोर से “निशा!”
निशा मूह लटकाए वापिस आई वाहा और बोली, “जी पापा.”
“आदित्य को ले जाओ सिमरन के पास. ये कुछ ज़रूरी बात करना चाहता है उस से.”
“आओ भैया…” निशा ने कहा.
आदित्य चुपचाप उठ कर चल दिया वाहा से.
“भैया कौन सी ज़रूरी बात है?” निशा ने पूछा.
“छ्चोड़ वो सब…तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है.”
“अच्छी चल रही है. लीजिए आ गया भाभी का कमरा. आप दोनो बात करो मैं मम्मी, पापा के पास बैठती हूँ.” निशा कह कर चली गयी.
आदित्य कमरे में दबे पाँव दाखिल हुवा. उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था. सिमरन बेड के पास खड़ी थी नज़रे झुकाए. अंजाने में ही आदित्य की निगाह सिमरन के चेहरे पर पड़ी. वो देखता ही रह गया उसे. एक आकर्षक नयन नक्स पाया था सिमरन ने. चेहरे पर प्यारी सी मासूमियत थी.
आदित्य ने उसके कदमो की तरफ देखा और बोला, “कैसी हैं आप.”
“मैं ठीक हूँ. आप कैसे हैं.” सिमरन भी आदित्य के कदमो को ही देख रही थी.
“क्या खेल खेला ना किस्मत ने. कितनी जल्दी हम दोनो की शादी हो गयी थी. उस उमर में हमें शादी का मतलब भी नही पता था. बहुत रो रही थी आप, याद है मुझे. पता नही क्या ज़रूरत थी इतनी जल्दी ये सब करने की.” आदित्य ने अपनी बात कहने के लिए भूमिका तैयार की.
“हां हमारे अपनो ने बचपन में ही हमें इस रिश्ते में बाँध दिया.”
“आप ही बतायें बाल-विवाह कहा तक जायज़ है. गैर क़ानूनी है ये. फिर भी हम लोग नही मानते.”
“बाल-विवाह बिल्कुल जायज़ नही है.”
“तो आप मानती हैं कि हम लोगो के साथ ग़लत हुवा. देखिए अब हम बड़े हो चुके हैं. और हमें अपना जीवन साथी चुन-ने का हक़ होना चाहिए. मैं अब घुमा फिरा कर नही कहूँगा. मैं ये बाल-विवाह नही निभा सकता हूँ. आप भी इस बंधन से खुद को आज़ाद समझिए.”
ये सुनते ही सिमरन के पैरो के नीचे से जैसे ज़मीन निकल गयी. बहुत कुछ कहना चाहती थी वो मगर कुछ नही बोल पाई. होन्ट जैसे सिल गये थे उसके. आदित्य का दिल भी बहुत ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था. वो फ़ौरन वाहा से भाग जाना चाहता था.
“मुझसे कोई भूल हुई हो तो मुझे माफ़ कर दीजिएगा प्लीज़. चलता हूँ मैं.” आदित्य मूड कर जाने लगा
“सुनिए…” सिमरन ने हिम्मत करके आवाज़ दी.
आदित्य वापिस मुड़ा और बोला, “कहिए…मैं आपकी बात सुने बिना नही जाउन्गा यहा से.”
“बेशक बाल-विवाह ग़लत है और रहेगा. उस वक्त मैने भी वो खेल एंजाय नही किया. मगर मेरी परवरिश कुछ इस तरह की गयी कि आपको एक देवता बना कर मेरे दिल में बैठा दिया गया. बचपन से यही सिखाया गया कि पति परमेस्वर होता है इश्लीए आदित्य तुम्हारा परमेश्वर है. मैं सब कुछ स्वीकार करती गयी खुले मन से. कब आपसे प्यार हो गया…पता ही नही चला. और इतना प्यार कर बैठी आपसे कि अपने पेरेंट्स से लड़ बैठी आपके लिए. वो नही चाहते थे कि मैं आपके लिए मुंबई आउ. मगर मैं अपनी ज़िद पर आडी रही और उन्हे मुझे भेजना पड़ा आपके पास. मुझे एक मोका तो दे दीजिए प्लीज़. बाल-विवाह तो ग़लत है मगर मेरा प्यार ग़लत नही है. शादी चाहे जैसे भी हुई हो मगर मैं आपको तन,मन धन से अपना पति मानती हूँ.”
“ये सब कह कर तो गुनहगार बना दिया आपने मुझे. काश ये धरती फॅट जाए और मैं इसमें समा जाउ.” आदित्य सर पकड़ कर बैठ गया बिस्तर पर.
सिमरन तुरंत कदमो में बैठ गयी आदित्य के और बोली, “नही प्लीज़ ऐसा मत बोलिए. मैने कुछ ग़लत कहा तो उसके लिए माफी चाहती हूँ आपसे पर आप अपने लिए ये सब ना बोलिए.”
“सिमरन उठ जाओ प्लीज़. मेरे कदमो में बैठ कर और गुनहगार मत बनाओ मुझे. सारी ग़लती मेरी ही है. काश इस शादी को मैं भी आपकी तरह शादी स्वीकार कर लेता तो आज ये दिन नही देखना पड़ता.
बहुत सुंदर हो आप. उस से भी ज़्यादा सुंदर आपका व्यक्तित्व है. कोई भी इंसान आपके जैसे जीवन साथी को पाकर खुद को धन्य महसूस करेगा. मगर मैं आज ऐसी जगह खड़ा हूँ जहा मैं चाह कर भी आपको स्वीकार नही कर सकता.”
“ऐसा क्यों है क्या बता सकते हैं मुझे.?” सिमरन ने पूछा.
“जिस तरह आपने मुझे अपने दिल में बैठा रखा है उसी तरह मैने अपने दिल में ज़रीना को बैठा रखा है…और मैं उसके बिना जी नही सकता. वो मेरी जींदगी है. अब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ. तुम्हार साथ बचपन में शादी हुई थी. ज़रीना के साथ प्यार ने शादी करवा दी मेरी. खून से माँग भरी है मैने उसकी. तुम मुझे अपना पति मानती हो. और मैं ज़रीना को पत्नी मानता हूँ. तुम ही बताओ अब क्या किया जाए.”
तभी अचानक आदित्य की चाची दाखिल हुई कमरे में. चाची को देख कर सिमरन फ़ौरन आदित्य के कदमो के पास से उठ कर खड़ी हो गयी.
“मैं बताती हूँ क्या करना है. चलो अभी वापिस गुजरात. मिलना चाहती हूँ मैं इस ज़रीना से. देखूं तो सही क्या बला है वो, जो कि किसी और का घर उजाड़ने पर तुली है.”
“उसकी कोई ग़लती नही है चाची. सारी ग़लती मेरी है. और वो मेरे साथ ही आई है मुंबई. ”
“तो लेकर आओ उसे. या फिर हम चलते हैं होटेल में.”
“उसका इस सब से कोई लेना देना नही है. उसकी कोई ग़लती नही है.”
“बेटा जिसे तुम पत्नी मानते हो और जिस से शादी करना चाहते हो क्या उसे हमसे नही मिलवाओगे.?”
सिमरन एक तरफ खड़ी चुपचाप सब सुन रही थी.
“मैं भी चाहता हूँ कि आप सब मिलें उस से. और हमारे प्यार को स्वीकार करें.” आदित्य ने कहा.
“तो जाओ बेटा उसे अभी इसी वक्त ले आओ. हम मिलना चाहते हैं उस से.” चाची ने कहा.
“हां भैया ले आओ उसे. देखें तो सही कौन है वो जो हमारी प्यारी भाभी की जगह लेना चाहती है.” निशा ने कहा.
“बाद में मिल लेना शांति से अभी नही.” आदित्य ने कहा.
“ले आईए उन्हे. मैं भी उनसे मिलना चाहती हूँ.” सिमरन ने कहा.
आदित्य ने सिमरन की आँखो में देखा और बोला, “क्या आप सच में मिलना चाहती हैं उस से.”
“हां..जिस से आप इतना प्यार करते हैं, उस से मिलना शोभाग्य होगा मेरे लिए.” सिमरन ने कहा.
“ठीक है मैं अभी उसे लेकर आता हूँ. आप सभी को मेरी ज़रीना से मिल कर ख़ुसी होगी.” आदित्य उठ कर चल दिया.
आदित्य के जाने के बाद चाची ने सिमरन को गले से लगा लिया और बोली, “बेटा तुम चिंता मत करो. आने दो इस करम जली को. अकल ठिकाने लगाउन्गि मैं उसकी. हमारे सीधे साधे आदित्य को फँसा लिया. सोचा होगा अच्छा पैसा है, फॅक्टरी है और क्या चाहिए. तू फिकर मत कर आदित्य तेरा ही रहेगा. नाम से तो कोई मुस्लिम लगती है. मुस्लिम लड़की को तो अब बनाएँगे हम अपने घर की बहू.”
“पर चाची क्या फ़ायडा इस सब का. वो उसे प्यार करते हैं मुझे नही”
“पागल मत बनो तुम पत्नी हो आदित्य की और तुम्हे अपने हक़ के लिए लड़ना होगा. केयी बार अपना हक़ लड़ कर ही मिलता है.” चाची ने कहा.
“हां भाभी मम्मी ठीक कह रही हैं. हमें पता है कि भैया सिर्फ़ आपके साथ खुश रहेंगे. ये लड़की ज़रूर कोई चालबाज़ है जो कि खाता पीता घर देख कर एक शादी शुदा लड़के के पीछे पड़ गयी और अपने प्रेम जाल में फँसा लिया. देखो बेसरमी की भी हद कर दी..भैया के साथ यहा चली आई. ज़रूर उसके परिवार वाले भी शामिल होंगे उसके साथ.” निशा ने कहा.
“मुझे कुछ समझ नही आ रहा…पता नही ऐसा मेरे साथ ही क्यों हो रहा है.”
“सब ठीक हो जाएगा बस हिम्मत मत हारना.” चाची ने कहा.
………………………………………………………………………………………………
ज़रीना बेसब्री से इंतेज़ार कर रही थी आदित्य के लौटने का. बार बार यही दुवा कर रही थी कि सब ठीक ठाक रहे. जब रूम की बेल बजी तो तुरंत भाग कर दरवाजा खोला उसने.
“आदित्य तुम आ गये…सब ठीक है ना.” ज़रीना ने एक साँस में पूछा.
“हां लग तो सब ठीक ही रहा है. चलो तुम्हे लेने आया हूँ मैं. सब तुमसे मिलना चाहते हैं.” आदित्य ने कहा.
ज़रीना थोड़ा परेशान सा हो गयी ये सुन कर. “मुझसे मिलना चाहते हैं…पर क्यों?”
“अरे मम्मी पापा के बाद अब चाचा, चाची ही मेरे सब कुछ हैं. उनसे तो मिलना ही पड़ेगा ना. हां थोड़ा गुस्से में हैं सभी. पर थोड़ा गुस्सा तो सहना ही पड़ेगा हमें. दिल के आछे हैं वैसे मेरे चाचा चाची. मुझे उम्मीद है कि वो हमारे प्यार को समझेंगे.” आदित्य ने कहा.
“आदित्य वो तो ठीक है…पर मुझे डर सा लग रहा है.”
“अरे डरने की क्या बात है, मैं हूँ ना. मेरे होते हुवे काहे का डर.”
“ठीक है मैं थोड़ा बाल-वाल संवार लू. तुम 5 मिनिट वेट करो.” ज़रीना ने कहा.
5 मिनिट बाद ज़रीना आदित्य के साथ उसकी चाची के घर की तरफ जा रही थी.
“तुमने क्या बताया मेरे बारे में उन्हे.” ज़रीना ने कहा.
“कुछ नही बस इतना ही के तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ. ज़्यादा कुछ बताने का वक्त ही नही मिला. चाचा चाची गुस्से में हैं. हो सकता है कुछ उल्टा सीधा बोल दे. तुम शांत रहना. चुपचाप सब सुन लेना. ज़्यादा देर गुस्सा नही रहेंगे वो.” आदित्य ने कहा.
“वैसे मुझे गुस्सा आ जाता है बहुत जल्दी अगर कोई मुझे कुछ कहे तो. पर तुम्हारे लिए और इस प्यार के लिए सब सह लूँगी.” ज़रीना ने कहा.
“दट’स लाइक माइ ज़रीना. देखो जान वक्त हमें बहुत बुरी तरह आजमा रहा हैं. लेकिन ये वक्त बेकार नही जाएगा. कहते हैं की शांत समुंदर में नाव चला कर कोई अच्छा नाविक नही बन सकता. अछा नाविक बन-ने के लिए अशांत समुंदर की ज़रूरत होती है. जोखिम रहता है मानता हूँ मगर जोखिम के बिना इंसान जीना नही सीख पाएगा. भगवान किश्मत वालो को ही आजमाते हैं."
“वो तो ठीक है…इतना भी ना आजमाया जाए हमें कि टूट कर बिखर जायें हम.”
बाते करते-करते जल्दी ही पहुँच गये दोनो घर. चाची ने ही दरवाजा खोला इस बार भी.
“ह्म्म…तो तुम हो ज़रीना. सुंदर हो. बल्कि बहुत सुंदर हो. लगता है अपने चेहरे को ही हथियार बनाया है तुमने हमारे आदित्य को जाल में फँसाने के लिए.” चाची ने कटाक्ष किया.
ज़रीना ने आदित्य की तरफ देखा. आदित्य ने ज़रीना को पाँव छूने का इशारा किया.
ज़रीना पाँव छूने के लिए झुकी ही थी कि चाची दो कदम पीछे हट गयी और बोली, “बस-बस नाटक मत करो … आओ अंदर.”
ज़रीना अंदर आ गयी चुपचाप आदित्य के साथ. आदित्य के चाचा सोफे पर बैठे थे.
“ज़रीना ये हैं मेरे चाचा जी” आदित्य ने चाचा की तरफ हाथ से इशारा करके कहा.
ज़रीना उनके पाँव छूने के लिए उनकी तरफ बढ़ी पर उन्होने उसे हाथ का इशारा करके पीछे ही रोक दिया, “इसकी कोई ज़रूरत नही है.”
“चाचा जी ऐसा क्यों कह रहे हैं?” आदित्य ने मायूसी भरे भाव में कहा.
“आदित्य तुम अपने चाचा जी के पास बैठो हमे ज़रीना से अकेले में कुछ बात करनी है.” चाची ने कहा.
“चाची जी जो बात करनी है मेरे सामने कीजिए. ये कही नही जाएगी. मैं यहा ज़रीना को आप लोगो से मिलवाने लाया हूँ पर ये देख कर दुख हो रहा है कि आप लोग अपमान कर रहे हैं मेरे प्यार का. मेरे सामने ही इतना कुछ हो रहा है तो अकेले में तो सितम ढा देंगे आप लोग. चलो ज़रीना वापिस चलते हैं. किसी से कोई बात करने की ज़रूरत नही है.” आदित्य ने कहा.
“भैया हमें बात तो करने दीजिए. हम कोई राक्षस नही हैं जो कि खा जाएँगे इन्हे. यू गुस्सा होने से बात नही बनेगी. किसी समस्या का हाल बात चीत से ही निकलता है.” निशा ने कहा.
“तो बात चीत मेरे सामने कीजिए ना. अकेले में क्या कोई सीक्रेट बात करनी है.” आदित्य ने कहा.
“भैया हम सब आपका भला चाहते हैं. प्लीज़ हमें बात करने दीजिए इनसे. और इनका और सिमरन का मिलना ज़रूरी है. ये दोनो मिल कर इस बात का हल निकाले तो ज़्यादा अछा रहेगा.” निशा ने कहा.
“हां आदित्य आओ तुम यहा बैठो मेरे पास. ये लोग इस से कुछ बात करना चाहते हैं तो तुम्हे क्या दिक्कत है. ऐसे बच्चो की तरह बिहेव नही किया करते.” रघु नाथ ने कहा.
“ठीक है कर लो बात चीत. मगर मेरे प्यार का अपमान मत करना. मेरी जींदगी है ये और अगर इश्कि आँखो में आँसू आए तो मेरा दम निकल जाएगा.” आदित्य ने कहा.
ज़रीना के चेहरे पर अजीब कसम्कश थी. आदित्य उसकी ओर देख कर उसकी हालत समझ गया और उसके चेहरे पर हाथ रख कर बोला, “सुन लो क्या कहते हैं ये लोग. हम हर हाल में एक हैं और एक रहेंगे.किसी बात की चिंता मत करना.”
ज़रीना, निशा और चाची के साथ उस कमरे में आ गयी जिस मे सिमरन थी. सिमरन बिस्तर पर टांगे सिकोड कर घुटनो पर सर रख कर बैठी थी जब वो लोग अंदर आए.
“ये है सिमरन, मेरी प्यारी भाभी. भाभी ये है ज़रीना.” निशा ने दोनो को इंट्रोड्यूस करवाया.
ज़रीना और सिमरन ने एक दूसरे को देखा मगर कुछ बोले नही. निशा ने एक कुर्सी दे दी ज़रीना को बैठने के लिए.
0 टिप्पणियाँ