रिश्तो पर कालिख Chapter 2

 




           रिश्तो पर कालिख  Chapter 2





में तुरंत उसे अपने सीने से लगा लेता हूँ तब जाकर वो रोना थोड़ा कम करती है.



नीरा--भैया अब में कभी आपको तंग नही करूँगी ....में आपसे बहुत प्यार करती हूँ आप मुझ से नाराज़ मत होना कभी भी.




में--नीरा में कभी तुझ से नाराज़ नही हो सकता लेकिन जिस तरह से आज तूने खुद को चोट पहुँचाई है.वो चोट सीधे मेरे दिल पर लगी है.




नीरा--सॉरी भैया आगे से में ऐसा कभी कुछ नही करूँगी. और मुझे कस कर गले से लगा लेती है .तभी मम्मी भी अंदर आजाती है.




मम्मी--में इसीलिए बाहर गयी थी ताकि तुम दोनो अपना मसला आपस में सुलझा लो फिर नीरा उठ कर मम्मी के गले से लग जाती है और हम तीनो वहाँ एक साथ सो जाते है.



उधर भाभी और रूही कॅंप में लेटे हुए थे तभी भाभी रूही से एक सवाल पूछ लेती है.



भाभी--रूही तुम लोगो ने कौनसा राज दबा रखा है अपने अंदर.


रूही ये बात सुनकर तुरंत चोंक जाती है और उठ के बैठ जाती है.




भाभी--क्या तुम लोग मुझे अपना नही समझते जो मुझे बता भी नही सकते.


रूही बस एक टक भाभी की तरफ़ देखे जा रही थी ...उसे उसके कानों पर भरोसा नही हो रहा था.



भाभी--रूही मैने मम्मी और तेरी बातें सुन ली थी....ऐसा कौनसा राज है जिस से इतना बड़ा तूफान आज़ाएगा.


रूही अब संभल चुकी थी.


रूही--भाभी आप अपने परिवार से कितना प्यार करती हो.



भाभी--में अपने परिवार के लिए कुछ भी कर सकती हूँ.



रूही --तो आपको उसी परिवार की कसम आप आज के बाद दुबारा ये सवाल नही पुछोगि...कुछ राज हमेशा राज ही रहने चाहिए जिस दिन वो बाहर आजाते है सब कुछ खाक हो जाता है. क्या आप अपने परिवार को बिखरता देख सकोगी..क्योकि अगर वो राज खुल गया तो ये परिवार पूरी तरह से बिखर जाएगा.



भाभी भी अब उठ कर बैठ चुकी थी ....उसके बाद उन्होने कोई सवाल नही किया और रूही को. रोता देख उसे गले से लगा लिया.



भाभी--मुझे पता नही था रूही के इस मुस्कुराते नन्हे से दिल पर एक राज का इतना भारी बोझ पड़ा है...तेरी कसम....में ये सवाल किसी से नही पुछुन्गि.तेरी कसम....रूही तेरी कसम...,,.


रूही और भाभी अपने आँसू पोछ कर सोने लगते है...इधर मम्मी की नींद उड़ी हुई थी.


वो लगातार पुरानी यादो में खोती चली जा रही थी ....



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20 साल पहले.... आगे की कहानी राज की ज़ुबानी

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उस समय संध्या(मम्मी) के दो बच्चे थे.

एक राज और एक रूही राज अभी राज ** साल का हो गया था और रूही ** साल की थी ...


संध्या के पति किशोर गुप्ता अपने बिज़्नेस को फैलने में दिन रात मेहनत कर रहे थे जबकि संध्या अपने द्वारा बनाए गये एक एनजीओ जो कि बेसहारा बच्चो को घर और अच्छी पढ़ाई और खाने का इंतज़ाम करवाता था.



उस दिन संध्या बहुत ज़्यादा थक गयी थी घर आते ही वो नहाना चाहती थी...


घर आकर संध्या ने अपने कपड़े उतारे और बाथरूम में घुस गयी , नहाने के बाद वो किचन में घुस गयी और खाना बनाने लग गयी ...तभी राज और रूही दोनो स्कूल से आगये...और आते ही मम्मी मम्मी करते हुए संध्या से लिपट गये.



राज--मम्मी आज क्या बना रही हो बहुत अच्छी खुश्बू आरहि है..



मम्मी--में तुम लोगो के लिए पालक के पकौड़े और आलू टमाटर की सब्जी बना रही हूँ...तुम लोगो को ये पसंद है ना..



रूही--हाँ मम्मी काफ़ी दिन हो गये पकोडे खाए हुए.



मम्मी--चलो अब जा कर चेंज कर लो और मुँह हाथ धो कर डाइनिंग टॅबेल पर आ जाओ..में तब तक खाना लगाती हूँ.



उसके बाद हम सभी डाइनिंग टॅबेल पर रेडी हो कर आ जाते है और मम्मी हम लोगो को खाना खिलाने लगती है...



राज--मम्मी आप खाना नही खा रही हो..



मम्मी--बेटा तुझे पता है ना में वो दवाई पीने के बाद ही खाना खाती हूँ.


फिर दोनो अच्छे से खाना खा कर मम्मी के बेडरूम में जाकर टीवी देखने लग जाते है...उधर मम्मी ने बाथरूम में जाकर एक सिल्क की नाइटी पहन ली थी जो कि एक शर्ट और एक पाजामे जैसी थी...


फिर मम्मी ने अपनी अलमारी में से एक बोतल निकाली जिसपर शिवास लिखा हुआ था.



वो आकर हमारे पास बैठ जाती है और एक गिलास में उस दवाई को डालकर पानी मिलाने लगती है...



फिर उसकी एक सीप लेने के बाद वो एक पकोड़ा अपने मुँह में डाल लेती है...और इस तरह करते करते वो 5 ग्लास दवाई के पी जाती है ..में कब से ये देखे जा रहा था... तभी मम्मी ने कहा ऐसे क्या देखे जा रहा है.



में(राज)--मम्मी आप तो हमे अगर दवाई देनी होती है तो एक चम्मच में भरकर एक छ्होटी सी बोतटेल में से देती हो ...ये आप कौनसी दवाई पीटी हो जो इतनी बड़ी बोतटेल लानी पदती है...और वो भी 5 ग्लास आप पी जाती हो.




मम्मी--ये बडो की दवाई है तू नही समझेगा चल अब थोड़ी देर मेरे पेर दबा दे काफ़ी दर्द कर रहे है.



फिर उसके बाद में मम्मी के पैर दबाने लगता हूँ और रूही मुझे देख कर उनके हाथ दबाने लगती है मम्मी अब पेट के बल लेट जाती है और में उनके पैर का पंजा अपनी गोद में रख कर दबाने लगता हूँ मम्मी का पंजा मेरे लिंग पर रगड़ खा रहा था जिस से मेरा लिंग अकड़ गया..


मम्मी को भी मेरे लिंग का कड़क होना महसूस हो गया और वो अपने पैर का अंगूठा मेरे लिंग पर रगड़ने लग जाती है.



मम्मी अंगूठा रगड़ रगड़ कर काफ़ी गरम हो जाती है और मुझे कहती है..



मम्मी-- थोड़ा उपर दबा यहाँ ज़्यादा दर्द हो रहा है ..


में मम्मी की जाँघो को दबाने लगता हूँ...लेकिन मम्मी मुझे और उपर दबाने के लिए कहती है...में अब उनके कूल्हे दबा रहा था...वो दबाते हुए मुझे काफ़ी मज़ा भी आ रहा था मेरे हाथ बार बार फिसल के उस दरार में जाने लगते है...



और मेरा लिंग अब पहले से भी ज़्यादा कड़क हो जाता है फिर मम्मी मुझे रुकने को कहती है और सीधी लेट जाती है अब मुझे वो अपने कंधे दबाने को कहती है.



में अब उनकी जाँघो पर बैठा था और उनके कंधे दबाए जा रहा था मम्मी के बूब्स की निपल मुझे नाइटी में से मुझे बिल्कुल कड़ी हुई नज़र आ रही थी रूही अभी भी मम्मी के हाथ दबाए जा रही थी.



में कंधे दबाने के लिए जैसे ज़ोर लगाता मम्मी की चूत और मेरा लिंग रगड़ जाता और हाथो पर उनके बूब्स.



फिर मम्मी ने मुझे खड़ा होने को कहा और ये बोला कि मेरे पेट पर क्या चुभ रहा है...



में--मम्मी मेरे पास तो चुभने जेसा कुछ भी नही है ..



मम्मी--तेरा निक्कर उतार ज़रूर कुछ ना कुछ तो है जो मुझे चुभ रहा है...


मेने अपना निक्कर तुरंत उतार दिया मेरा लिंग जो इस समय कड़क हो गया था जो कि लगभग 4 इंच से ज़्यादा का था....


मम्मी मेरे लिंग को हाथ में लेकर...




मम्मी--तेरा ये इतना बड़ा कैसे हो गया.



में --पता नही मम्मी मुझे भी समझ नही आया.



मम्मी--मेरे शरीर से रगड़ खाने की वजह से ये बड़ा हो गया है चल में इसे ठीक कर देती हूँ .



और फिर वो मुझे पूरा नंगा कर देती है और खुद अपनी शर्ट उतारकर रूही को बोबे से दूध पीने को बोलकर मेरा लिंग अपने मुँह में लेकर चूसने लग जाती है.



रूही मम्मी का बोबा चूस्ते चूस्ते बोलती है मम्मी इन में से दूध तो आ ही नही रहा..



मम्मी मेरा लिंग अपने मुँह से निकाल कर .


मम्मी--इनमें ऐसे दूध नही आएगा तू एक काम कर एक बोबा ज़ोर ज़ोर से चूस और दूसरा बोबा पूरी ताकत लगा कर दबा जितनी ज़्यादा ज़ोर से तू चुसेगी और दबाएगी उतनी ही जल्दी इन में से दूध निकलने लगेगा.उसके बाद रूही अपनी पूरी ताकत लगा कर उस काम में जुट जाती है..



और इधर मम्मी मेरे लिंग को फिर से मुँह में लेकर चूसने लग जाती है ...मुझे काफ़ी मज़ा आ रहा था तभी मेरा शरीर अकड़ने लगता है और में अपना पानी मम्मी के मुँह में ही छोड़ देता हूँ और मम्मी के चेहरे की तरफ़ देखने लगता हूँ...मम्मी का चेहरा इस समय पूरा लाल हो तखा था मेरा सारा पानी उनके मुँह मे छूट गया था लेकिन कुछ बूंदे उनके होंठो पर आ गयी थी उन्होने अच्छे से मेरे लिंग को अपनी जीभ से सॉफ किया और होंठो पर लगा मेरा पानी भी जीभ फेर कर सॉफ कर दिया..



में--मम्मी सॉरी पता नही ये सुसु आपके मुँह में कैसे निकल गया मुझे तो बड़ा मज़ा आरहा था.



मम्मी--कोई बात नही बेटा तू एक काम कर अब तू मेरे बोबो में से दूध निकाल ये रूही से ढंग से ताक़त नही लग रही.


फिर रूही को वो अपने बोबे से हटा देती है और अपने सारे कपड़े खोल कर मुझ अपनी टाँगो के बीच में ले लेती है और मेरा लिंग अपनी चूत में डालकर कहती है..अब तू यहाँ अपना लिंग ज़ोर ज़ोर से अंदर बाहर कर और दोनो हाथो से मेरे बोबे दबाता जा और बीच में रुकना मत...



उसके बाद में लगातार ज़ोर ज़ोर से अपना लिंग मम्मी की चूत में अंदर बाहर कर रहा था और अपने हाथो से उनके बोबे दबाए जा रहा था....और मम्मी ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थी और ज़ोर लगा बेटा और ज़ोर लगा...



मम्मी तीन बार झड चुकी थी लेकिन मेरा पानी छूट ही नही रहा था लेकिन में लगातार धक्के लगाए जा रहा था तभी मेरे शरीर में सिहरन आने लगी और मेरे लिंग से खूब सारा पानी मम्मी की चूत की गहराइयो में जाता चला गया......


हम ये खेल काफ़ी दिनो तक खेलते रहे...और उसके बाद एक दिन ऐसा हुआ जो किसी तूफान से कम नही था....संध्या के पीरियड्स आने बंद हो गये थे...



एक दिन.....



राज--रूही मम्मी जब तक बाहर से आती है तब तक हम दोनो वो खेल खेलते है बड़ा मज़ा आएगा..




रूही--हाँ भैया कल मम्मी आप पर कैसे उच्छल रही थी..



राज--चल तू अपने कपड़े उतार और वहाँ सोफे पर बैठ जा ..


राज भी अपने सारे कपड़े उतार के अपनी बहन के नंगे जिस्म पर हाथ घुमाए जा रहा था....



तभी अचानक घर का दरवाजा खुल जाता है...मम्मी बस हम दोनो को लगातार घुरे ही जेया रही थी...



राज--मम्मी जल्दी आओ हम दोनो वो खेल शुरू करने ही वाले थे..



लेकिन संध्या को होश नही रहा वो वही फर्श पर बैठ कर रोने लगी...



संध्या को रोता हुआ देख कर राज और रूही अपने कपड़े पहन कर संध्या के पास आ जाते है.



राज --क्या हुआ मम्मी आप रो क्यो रही हो....




संध्या--रोते हुए ...राज मेरी एक बात मानेगा.



राज--हाँ मम्मी बोलो.



संध्या--हमने जो कुछ भी किया वो अब दुबारा इस घर में नही होगा..में तुझे कुछ सालो के लिए हॉस्टिल में डाल रही हूँ...क्योकि तू अब कुछ टाइम हम लोगो से दूर रहेगा.


जो ये खेल हम खेल रहे थे ये सब ग़लत है ये सब एक परिवार में नही होना चाहिए...आज के बाद तुम दोनो इस बारे में किसी से कोई भी बात नही करोगे.



राज--मम्मी हम अब दुबारा ऐसा कुछ नही करेंगे प्लीज़ मुझे हॉस्टिल मत भेजो..

और राज रोने लग जाता है.



संध्या राज को अपनी छाती से लगा लेती है और कहती है तुम्हे हॉस्टिल जाना ही होगा.इसी में तुम सब की भलाई है...उसके बाद वो अपने रूम में चली जाती है.



सिटी हॉस्पिटल.....



संध्या यहाँ अपना चेकप करवाने आई थी.


डॉक्टर.आएशा संध्या का चेकप करती है और संध्या को सोनोग्राफी करवाने को कहती है...सोनोग्राफी में पता चलता है संध्या गर्भ से है...


डॉक्टर--कंग्रॅजुलेशन्स मिसेज़.गुप्ता आप प्रेग्नेंट है.


संध्या--लेकिन में अभी बच्चा नही चाहती.


डॉक्टर--इम सॉरी मिसेज़ गुप्ता अब अबोर्शन नही किया जा सकता आपका गर्भाशय काफ़ी कमजोर है और अबोर्शन की वजह से आप दुबारा कभी माँ नही बन पाओगि.



संध्या--कोई तो रास्ता होगा जिस से ऐसा हो सके.


डॉक्टर--नही मिसेज़ गुप्ता कोई रास्ता नही है ....सिर्फ़ यही एक रास्ता है या तो आप इस बच्चे को जन्म दे या फिर दुबारा कभी माँ बनने के बारे में भूल जाए.


उसके बाद संध्या वहाँ से चली जाती है..घर पर किशोर भी आ चुका था संध्या उसे सारी बात बता देती है..किशोर पहले तो बहुत नाराज़ होता है लेकिन बाद में वो समझ जाता है कि अकेलेपन की वजह से संध्या से ये ग़लती हो गयी है...राज को बोर्डिंग में डाल दिया जाता है और कुछ सालो के लिए. और रूही को स्कूल से निकलवा दिया जाता है.



जय के बाद संध्या को एक बेटी होती है जिसका नाम वो नीरा रखते है और वो लड़की किशोर की संतान थी......





भाइयो में इस फ्लॅशबॅक को ज़्यादा खिचना नही चाहता इस लिए मैने इसको यही ख्तम करने का निश्चय किया है.


आगे की कहानी मेरे यानी जय की ज़ुबानी


प्रेज़ेंट डे.




यही बाते सोचते सोचते मम्मी को नींद आजाती है.


अगले दिन सुबह हम लोग फ्रेश हो जाते है और नाश्ता करने लगते है....रिजोर्ट की गाड़ी सुबह नाश्ता लेकर आई थी.


भाभी--जय आज कहाँ जाने का मूड है.


में--भाभी आज हम इस तरफ़ जंगल में चलेंगे देखते है वहाँ क्या है....




वहाँ थोड़ी दूर एक कॅंप और लगा हुआ था शायद वो कल शाम को ही आए थे वो बस तीन लोग थे एक लड़की जो तकरीबन 10 साल की थी और एक लड़का जो 6 साल के लगभग था उनके साथ में उनकी मम्मी भी आई थी.


मुझे उन तीनो को देख कर काफ़ी आश्चर्य हुआ क्योकि उनके साथ कोई आदमी नही था...



जब हम उनलोगो के कॅंप के सामने से निकल रहे थे तो वहाँ एक 32 साल की खूबसूरत लड़की खड़ी थी ..उसने हम लोगो को देख कर आवाज़ लगाई...और दौड़ कर हमारे पास आने लगी उसके इस तरह से दौड़ने से उसकी चुचियाँ ज़ोर ज़ोर से उछल रही थी...



वो हमारे पास आकर अपना नाम रिया बताती है.


रिया--आप लोग क्या जंगल में घूमने जा रहे है...??



मम्मी--हाँ आज जंगल में घूमने का प्लान बनाया है...आप यहाँ कब आए.



रिया--हम लोग कल रात को ही यहाँ आए है ...मेरे साथ मेरे दो बच्चे भी है....अगर आप बुरा ना माने तो क्या हम भी आप लोगो के साथ जंगल में घूमने आ सकते है.??




मम्मी--हाँ क्यो नही वैसे भी आपके साथ बच्चे है और बच्चो की चहलपहल से तो माहॉल वैसे भी खुशनुमा हो जाता है..आप चलिए हमारे साथ .


फिर रिया आवाज़ लगाती है और अपने बच्चो को बुला लेती है.



रिया--ये है मेरे दो बदमाश एक का नाम शीना है और ये निक्कू.



फिर वो हमारे साथ जंगल के अंदर चलने लग जाती है ..जंगल काफ़ी खूबसूरत था वहाँ काफ़ी बड़े बड़े पेड़ थे हम लोगो को वहाँ एक दो जगह हिरण भी दिख गये जो हम लोगो को देखते ही भाग गये....काफ़ी आगे जाने के बाद हम लोग एक झरने के पास पहुँच गये वो झरना ज़्यादा बड़ा तो नही था लेकिन उसमें से काफ़ी पानी आ रहा था झरने के आस पास काफ़ी सुंदर फूल भी खिले हुए थे झरना जहाँ गिर रहा था उसके नीचे एक चट्टान थी जो काफ़ी बड़ी और समतल थी झरने का पानी उस चट्टान से गिरकर एक कुंड में जमा हो रहा था और उस खुंद से पानी एक छोटी नदी के रूप में दूसरी तरफ़ बढ़ रहा था ये वो ही नदी थी जिसमें कल हम कल नहा रहे थे..



मम्मी--वाह मज़ा आ गया क्या जगह है...


रूही--हाँ मम्मी कितनी खूबसूरती फैली हुई है यहाँ



रिया के दोनो बच्चे भाग कर झरने के नीचे नाचने लगते है...



रिया--ये लो शुरू हो गयी इनकी बदमाशियाँ लेकिन हम साथ में कपड़े तो लाए ही नही...यहाँ से वापस पहनकर क्या जाएँगे.

में एक काम करती हूँ आप इन दोनो को संभाल लो और में इनके कपड़े लेकर आती हूँ...


इतना कह कर रिया वहाँ से जाने लगती है तभी मम्मी उनको रोकते हुए कहती है इतनी दूर अकेले कैसे जाओगी...आप साथ में जय को ले जाओ.



में वापस जाना तो नही चाहता था लेकिन मम्मी की बात तो माननी ही पड़ेगी....इसलिए में रिया को मन में कोस्ता हुआ वापस कॅंप में जाने लग जाता हूँ...


हम लोगो को कॅंप से झरने तक आने में ही 1 घंटा लग गया था मतल्ब अब दो घंटे लगातार चलने से में काफ़ी दुखी हो रहा था....



रिया--जय सॉरी मेरी वजह से तुम को इतनी दूर वापस आना पड़ रहा है.



में--कोई बात नही...आप लोग अकेले आए हो आपके साथ आपके हज़्बेंड नही आए..



रिया--उनको अपने बिज़्नेस से फ़ुर्सत नही है....पिच्छले 6 महीने से वो इंग्लेंड गये हुए है.



में--ओह्ह ये तो काफ़ी बुरी बात है आप लोग उनके साथ क्यो नही गये.



रिया--एक तो बच्चो की पढ़ाई खराब हो जाती है और दूसरा...वो इंग्लेंड में भी एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते है इसलिए उनके पीछे पीछे घूमने से बढ़िया हम अपने घर में ही रहें.



में--आप लोग कहाँ से है.



रिया--हमारा घर देल्ही में है आप लोग कहाँ से हो.



में--उदयपुर राजस्थान.



रिया--थ्ट्स नाइस काफ़ी पीस्फुल जगह है में एक बार वहाँ आई थी और वहाँ के महलो जंगलों और फ़ौर्ट्स को देखने के बाद जब सिटी में आए तो वो तो और भी खूबसूरत थी...कहीं पर भी गंदगी और पोल्यूशन नही था...काफ़ी मज़ा आया था हम सब को वहाँ .



ये बाते करते करते हम लोग कॅंप तक पहुँच गये और कपड़े लेकर वापस चलने लगे...हम झरने तक वापस पहुँचने ही वाले थे के सामने से सब लोग आते हुए दिखाई दे रहे थे..



मम्मी--इतनी देर से नहाते नहाते बोर हो गये थे और फिर बच्चो को भूख भी लगने लगी थी इसलिए हम सब ने वापस जाने का फ़ैसला किया.



रिया चलिए में भी चलती हूँ आप लोगो के साथ...



भाभी--अरे नही....नही...आप यहाँ थोड़ी देर झरने का मज़ा लेकर देखो बड़ा मज़ा आएगा हम लोग भी रुकते आप लोगो के साथ मगर बच्चो के साथ साथ हमारे भी पेट में चूहे कूदने लग गये थे...


उसके बाद रिया भाभी को बच्चो के कपड़े दे देती है फिर मम्मी और बाकी लोग कॅंप की तरफ़ चल देते है और हम लोग झरने की तरफ़ बढ़ जाते है.....

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दुबई


एक ऐसी जगह जहाँ नामुमकिन कुछ भी नही जो जाना जाता है बेशुमार दोलत के लिए...




राज--पापा मीटिंग काफ़ी बढ़िया रही हमारी एक ब्रांच और यहाँ खुल गयी है...और यहाँ बार बार आने से भी पीछा च्छुटा अब भारत से ही हम इस ब्रांच को चला पाएँगे.



पापा--बेटा मैने इसी तरह ही अपनी सारी ब्रांचो को सही हाथो में दे दिया है..अब हर महीने बॅलेन्स शीट उदयपूर ही आ जाएगी और पैसा बॅंक में. अब काफ़ी मेहनत कर ली....अब में घर बैठना चाहता हूँ...हर महीने इतना पैसा आज़ाएगा कि चाहो तो हर हफ्ते एक नयी कार ले सकते है हम..




राज--हाँ पापा आपने सही किया ....में भी अब सुकून से घर पर रह सकता हूँ...



पापा--देख हम यहाँ भटक रहे और वहाँ वो सब ऋषिकेश में मस्ती मार रहे होंगे.

चल होटेल चलते है. और उनको भी फोन करके यहाँ की खुश खबरी दे देते है और फिर भारत जा कर सीधा ऋषिकेश में ही चलते है...



होटेल में पहुँच कर पापा हमारे रिजोर्ट में फोन लगाते है.



उधर से आवाज़ आती है ...हेलो सर में लक्ष्मी निवास रिजोर्ट से सुहानी बात कर रही हूँ.... में आपके लिए क्या कर सकती हूँ.


पापा--हेलो में किशोर गुप्ता बात कर रहा हूँ मेरी फॅमिली आपके रिजोर्ट में रुकी हुई है, क्या में उन से बात कर सकता हूँ.,



सुहानी--सर क्या में आपके फॅमिली मेंबर्ज़ के नाम जान सकती हूँ.....




पापा--संध्या गुप्ता जय नीरा रूही और नेहा गुप्ता.




सुहानी--वेट आ मोमेंट सर....सर आपकी फॅमिली इस समय कॅंप में है और वहाँ हमने कोई फोन नही लगवा रखा क्योकि टूरिस्ट वहाँ पीस के लिए आते है और वहाँ मोबाइल नेटवर्क भी नही आता.



पापा--ठीक है आप उनको मेरा मेसेज दे दीजिए और कहिए कि वो वहाँ से ना जाए हम भी वही आ रहे है....



सुहानी--जी सर में आपका मेसेज जल्दी से जल्दी उन तक पहुँचा दूँगी और तकरीबन घंटे भर बाद उनसे आपकी बात भी करवा दूँगी...लक्ष्मी निवास रिजोर्ट में फोन करने का शुक्रिया.


इसके बाद फोन कट जाता है.


पापा-- राज चल बाहर घूमने चलते है कही...





राज--हाँ पापा वैसे भी हमको कहीं भी जाने का टाइम नही मिलता आज टाइम मिला है तो थोड़ी तफ़री मार ही लेते है....


होटेल से बाहर निकलते ही एक कार उनके सामने रुकती है और दो नक़ाबपोश उसमें से गन निकाल कर अँधा धुन्ध फाइरिंग करने लग जाते है...थोड़ी ही देर में वहाँ 8 लाषे पड़ी होती है जिनमें किशोर और राज भी होते है.......


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उधर जय और रिया झरने के पास पहुँच जाते है और झरने को देखने लगते है..तभी रिया कहती है..



रिया --जय में चेज कर के आती हूँ तब तक तुम भी चेंज कर लो.


उसके बाद वो वहाँ से अपना बेग लेकर झाड़ियो के पीछे चली जाती है..



उधर रास्ते में..



नेहा--मम्मी अगर आप इजाज़त दो तो में झरने की तरफ़ वापस जाना चाहती हूँ.



मम्मी--क्यो तेरा मन नही भरा क्या झरने में नहाने से...और तुझे तो भूक भी लग रही थी उसका क्या हुआ....



नेहा--वो क्या है ना मुझे भूक तो लग रही थी लेकिन बहता हुआ झरना मेरी आँखो के सामने घूम रहा है...में एक बार फिर से उसमें नहाना चाहती हूँ ...पता नही दुबारा कब ये मोका मिलेगा और फिर वहाँ रिया और जय भी है तो मुझे कोई डर भी नही है किसी का.




मम्मी--ठीक है अगर तेरा इतना ही मान कर रहा है तो जा ....लेकिन जल्दी आ जाना.




उधर झरने के पास.



रिया चेंज कर के आ गयी थी ....जब मैने उसे देखा तो मेरी सारी बत्तिया गुल हो गयी.


उसने एक रेड कलर की लेस वाली ब्रा और एक पैंटी पहन रखी थी ....उसकी ब्रा उसके बूब्स का बोझ नही संभाल पा रही थी और जब वो चलते हुए मेरे करीब आ रही थी तब उसके बूब्स की थिरकन मेरे होश उड़ा रही थी इतनी सुंदर इतनी सेक्सी लग ही नही रहा था कि ये दो बच्चो की माँ है.


वो मेरे पास आकर बोलती है...



रिया--क्या हुआ ऐसे क्या देख रहे हो कभी बिकिनी में किसी को देखा नही है क्या...चलो अब जल्दी तुम भी चेंज कर के आ जाओ.



मुझे चेज क्या करना था मैने फट से अपनी जीन्स और टी शर्ट खोल दी और उसके सामने अपनी वी शैयप अंडरवेर में आ गया..ये देख कर वो हँसने लगी..



में--क्या हुआ हंस क्यो रही हो क्या कभी अंडरवेर में किसी को देखा नही ...झरने में क्या में जीन्स पहन कर नहाऊ...



रिया--नही जय वो बात नही है दरअसल शायद मुझे देख कर तुम्हारी हालत खराब हो गयी है...जो कि तुम्हारी अंडरवेर तुम्हारी हालत को बयान कर रही है...


में तुरंत अपने लिंग की तरफ़ देखता हूँ वहाँ पूर टॅंट बना हुआ था..



में--झेप्ते हुए....दरअसल यहाँ का मोसम ही ऐसा है चलो अब नहाते है...



उसके बाद हम झरने के नीचे जाने लगे सब से पहले झरने के नीचे जा कर में खड़ा हो गया और पानी की ताक़त को महसूस करने लग गया...उसके बाद रिया भी झरने के नीचे आ गयी रिया बार बार नहाते हुए अपनी ब्रा संभाल रही थी उसके निप्पल एक दम कड़क होकर ब्रा में से दिखाई दे रहे थे फिर वो दूसरी तरफ घूम के अपनी ब्रा सही करने लगी...उसकी पैंटी भी पानी के प्रेशर से नीचे हो गयी थी उसकी गान्ड की लकीर मुझे दिखाई देने लगी...


उधर हम लोगो को इस तरह नहाता देख नेहा झाड़ियो के पिछे छुप गयी और हम दोनो को देखने लगी



रिया अपनी ब्रा को ठीक कर के अपनी गर्दन पीछे घुमाती है और मुझे इस तरह उसकी गान्ड को घूरते हुए देख कर वो अपनी गान्ड की तरफ़ देखती है और अपने एक हाथ से फट से अपनी पैंटी उपर कर लेती है...



रिया--क्या देख रहे थे अभी...



में--घबराते हुए....कुछ नही में क्या देखा रहा था ....मैने कुछ नही देखा...



रिया--हँसते हुए चलो अब नहाने पर ध्यान दो इधर उधर द्देखना बंद करो..




तभी अचानक वो हो जाता है जो ना रिया ने सोचा था और ना जय ने और ना ही शायद झाड़ियो के पिछे छुपि नेहा ने....


मेरी आँखे वो मंज़र देख कर फट सी गयी थी...रिया की ब्रा की लेस तेज पानी की वजह से टूट गयी थी और उसके मांसल बूब्स मेरी आँखों के सामने उछल कर आगये ....



रिया को पता ही नही चला कि वो उपर से पूरी नंगी है जब उसने मेरी तरफ़ देखा तो में बस उसकी चुचियों को ही देखे जा रहा था.



रिया--क्या हुआ तुम बार बार ऐसे क्यो देख रहे हो जो चाहते हो खुल कर बोलो...



में--अपनी उंगली का इशारा उसकी चुचियों की तरफ़ करता हूँ तो वो एक दम से नीचे देखती है...और घबराकर अपने दोनो हाथ अपनी चुचियों के सामने ले आती है.. और मेरी तरफ़ देखने लगती है




में--अब मुझे तुम ऐसे क्यों देख रही हो.,,,



रिया--आप मेरे बूब्स को कब से देख रहे थे.



में --जब आपकी ब्रा की डोरी टूटी थी तब से.



रिया--आपको पसंद आए?



में--बेहद...


अब रिया मेरे टेंट को देखने लग गयी थी.


रिया--आपका ये शैतान फिर से मुझे देख कर बेचैन हो गया है.



में--जब सामने इतनी खूबसूरत लड़की नज़ाकत के साथ खड़ी होगी तब तो ये शैतानी करेगा ही.


रिया--क्या में इतनी खूबसूरत हूँ...जो ये शैतान आपके काबू में नही रह पाता.



में--ये बात तो आप इस से खुद ही पूछ लो...



रिया--क्या ये मुझे जवाब देगा.



में--ये सिर्फ़ खूबसूरती को ही जवाब देता है.



रिया--कहीं ये मुझे रुसवा तो नही कर देगा अपना जवाब ना देकर.



में--इसको रुसवा करना नही आता....



रिया--तो फिर क्या आता है इस शैतान को....



में--ये जवाब तो आप इसी से पूछ लो कि क्या करना आता है....


रिया अपने घुटनो के बल वहाँ बैठ जाती है और मेरे लिंग के पास अपना मुँह लेकर जाती है वो मेरे लिंग को अंडर वेर के उपर से सूंघने लग जाती है लेकिन लिंग पर अपना चेहरा टच नही होने देती...


रिया ने अपने दोनो हाथ अभी भी अपने बूब्स पर रख रखे थे...

फिर वो अपना सिर उठती है और मुझ से कहती है,,,


रिया--ये शैतान नाराज़ हो रखा है...




में--तो इसे मनाओ.



रिया--लेकिन ये बोल रहा है तुम्हारी गंदी अंडरवेर में इसका दम घुट रहा है.,


में--तो फिर आज़ाद कर दो ना इसे....



फिर रिया मेरे अंडरवेर. की इलास्टिक्क मेरी कमर के यहाँ से पकड़ती है और एक झटके से उसे खेच के मेरे पैरों में पटक देती है..



मेरा साढ़े सात इंच लंबा लिंग उसकी आँखो के सामने लहराने लगता है...रिया ने अपने हाथ अपने बूब्स पर से हटा लिए थे...और वो बस मेरे झटके मारते लिंग को देखती ही जा रही थी...



में--क्या हुआ रिया इसने कुछ बोला नही क्या अभी तक...



रिया--मेरे लिंग को देख कर कहती है...ये अभी भी बहुत ज़्यादा गुस्सा है...ये कह रहा है तू मुझे हाथ तो लगा कर दिखा में तेरी जान निकाल दूँगा.



में--तो फिर हाथ मत लगाओ अपने होंठो से मनाओ.,


उसके बाद रिया थोड़ा सा और जय की टाँगो के पास चली जाती है और नीचे लटक रही गोलियो पर से अपना नाक रगड़ते हुए लिंग को अपने चेहरे पर रगड़ने लगती है.


रिया के ऐसा करते ही मेरे मूँह से सिसकारी निकल जाती है.. रिया ने मेरी गोलियों को अपने मुँह में भर लिया और उसको बड़े प्यार से चूसने लगती है ...उसके दोनो हाथ मेरी कमर पर थे और उसकी सांसो की गर्मी मेरे लिंग को और भड़काए जा रही थी......


उधर नेहा भाभी जय और रिया का खेल देखते देखते काफ़ी गरम हो गयी थी...


उसके हाथ अपने आप खुद के बूब्स पर पहुँच गये, वो एक हाथ से अपने बूब्स दबा रही थी और एक हाथ से खुद के पेट पर हाथ फेर रही थी..


नेहा ने एक एक करके सारे कपड़े खोल दिए और पूरी नंगी होकर उन दोनो का खेल देखते देखते अपनी एक निप्पल पर ज़ोर लगा दिया और एक सिसकी उसके मुँह से निकलते निकलते बची.




रिया ने अब जय का लिंग मुँह में ले लिया था और पर्फेक्षन के साथ वो उसको अंदर बाहर कर रही थी ...


जय को इतना मज़ा आरहा था क़ी वो रिया के मुँह में झड गया और ज़ोर ज़ोर से साँसे लेने लगा...रिया ने उठ कर झरने के पानी से खुद का मुँह सॉफ किया और जय से कहती है...


रिया--जय मैने तुम्हारे शैतान को मना लिया है अब मुझ से रहा नही जा रहा प्ल्ज़ मुझे ठंडा कर दो....




जय रिया को अपनी बाहो में भर कर वहाँ चट्टान पर बैठा देता है और सख्ती के साथ रिया के बूब्स मसल्ने लगता है..रिया दर्द और मज़े के बीच झूला झूल रही थी...उसकी सिसकियाँ झरने के शोर को भी दबा रही थी...रिया के बदन की गर्मी ने मेरे लिंग में फिर से तनाव ला दिया...


रिया--जय प्ल्ज़ फक मी .....फक मी हार्ड जय ....प्ल्ज़ फक मी....

तुम इतना तरसाओगे तो में मर ही जाउन्गि प्ल्ज़ अब समा जाओ मुझ में तुनहरा ये मोटा शैतान डाल दो मुझ में....



में चट्टान पर बैठ जाता हूँ और रिया को अपनी गोद में बैठने के लिए कहता हूँ..



रिया मेरे लिंग को पकड़ कर उसे उसकी चूत का रास्ता दिखाते हुए लिंग पर बैठने लगती है ...साढ़े साथ इंच लंबा लिंग उसकी चूत में बिल्कुल गायब हो जाता है...और फिर वो अपनी चूत लिंग पर रगड़ने लगती है ...ऐसा लग रहा था हम दोनो के बीच में कोई जंग छिड़ गयी है और किसी भी तरह से कोई हारना नही चाहता था...


लेकिन ये खेल ऐसा है यहाँ जीतने वाले को भी सुकून मिलता है और हारने वाले को भी दोनो अपने चरम पर आगये थे और एक साथ झड़ने लगे कुछ देर तक हम ऐसे ही एक दूसरे की बाहो में पड़े रहे फिर उसके बाद एक दूसरे को किस करने लग गये तभी एक हाथ मेरे कंधे पर थाप करता है...


में जैसे ही पलट कर देखता हूँ वहाँ भाभी खड़ी खड़ी मुस्कुरा रही थी....भाभी को देखते ही हम दोनो हड़बड़ा जाते है....रिया तो जैसे शर्म से गड़ ही गयी थी ज़मीन के अंदर...


में जैसे ही खड़ा होता हूँ..भाभी मुझे धक्का दे कर नीचे पानी के कुंड में गिरा देती है ....और ज़ोर ज़ोर से हँसने लगती है....



भाभी---ये उस दिन का बदला है जब तुमने बॅक व्यू मिर्रर में से मुझे देखा था...



में--भाभी ऐसे कोई करता है क्या...थोड़ी तो शरम करो.



भाभी--तूने शरम की थी जो में करूँ अब पड़ा रह इस पानी में तेरे कपड़े भी में ले जा रही हूँ.....रिया तुझे भी नंगी ही चलना है क्या कॅंप में..



रिया--नही भाभी में चेंज कर के आती हूँ...


और उसके बाद अपने कपड़े लेकर झाड़ियो के पीछे जाकर बदलने लगी..


( भाभी ने जब देखा कि हम लोग झड चुके है तब तक उनका भी पानी निकल चुका था ...फिर वो जल्दी से कपड़े पहन कर हम लोगो को चोकाने वहाँ आई थी.)



रिया अब कपड़े पहन कर आचुकी थी....और में पानी के अंदर अभी तक नंगा ही पड़ा था.



फिर भाभी और रिया दोनो जाने लगी...



में--भाभी मेरे कपड़े दे जाओ अब कभी वेसी ग़लती दुबारा नही करूँगा...



भाभी--रिया कपड़े दे दूं इसे ??तू बोलेगी तो ही दूँगी.



रिया--शरमाते हुए भाभी आपकी मर्ज़ी है में कौन होती हूँ आपके बीच में बोलने वाली ये तो बिना कपड़ो के भी अच्छे लग रहे है...



भाभी--बड़ा अच्छा लगने लगा है तुझे ये.


फिर भाभी मेरे कपड़े वहाँ एक चट्टान पर रख देती है और कहती है..


भाभी--अब जल्दी से आजा...हम आगे ही चल रहे है ज़्यादा देर लगाई ना तो देख लेना.



उसके बाद भाभी और रिया वहाँ से आगे निकल जाते है और में उस कुंड में से बाहर निकल कर कपड़े पहन कर उन लोगो के साथ कॅंप की तरफ़ बढ़ जाता हूँ...



कॅंप मे मम्मी हम सभी लोगो का इंतजार कर रही थी...



मम्मी--कितनी देर लगा दी तुम लोगो ने समय की कोई चिंता है या नही...?



में--मम्मी समय का पता ही नही लगा मज़े करते करते...



भाभी--हाँ मम्मी आज इसने कुछ ज़्यादा ही मज़े कर लिए.


ये बात सुन कर रिया शर्म से अपना सिर झुका लेती है...और दोनो बच्चो को लेकर हम सब से फिर मिलने का बोलकर अपने कॅंप में चली जाती है.




मम्मी--तेरे पापा का फोन आया था दुबई से...वो कह रहे थे कि हम लोग यहाँ से जाए नही वो लोग भी यही आरहे है.



में--वाह क्या बात कही है अब तो और मज़ा आएगा...क्यो भाभी मज़ा आएगा ना भैया भी साथ होंगे आपके.



भाभी--तू फिर शुरू हो गया ....मार खानी है क्या.


मम्मी--तुम दोनो एक दूसरे की टाँग खिचना बंद करो और कुछ खा पी लो भूक लग गयी होगी.


तभी वहाँ रिजोर्ट की गाड़ी आजाती है और उसमें से एक आदमी आकर कहता है....


आदमी--माफ़ कीजिएगा सर इस समय आपको डिस्टर्ब किया ...आप को कुछ देर के लिए मेरे साथ रिजोर्ट चलना पड़ेगा कुछ ज़रूरी काम आन पड़ा है..



में--मम्मी से...मम्मी में जा कर आता हूँ आप जब तक भाभी को खाना खिला दो वरना ये मुझे खा जाएँगी.



मम्मी--ठीक है तू जाकर जल्दी आजा...पता नही इन होटल वालो को इस समय कौनसा काम आ गया .



में--कोई फ़ौरमलिटी बाकी रह गयी होगी शायद इसी वजह से बुलाया होगा...में अभी जा कर आता हूँ.



फिर में उस आदमी के साथ गाड़ी में बैठकर रिजोर्ट के लिए निकल गया......


रिजोर्ट पर पहुँच कर में सीधा रिसेप्षन पर पहुँच गया वहाँ एक लड़का बैठा हुआ था जिसकी शर्ट पर उसके नेम प्लाट पर उसका नाम अमित लिखा हुआ था... वहाँ पहुँचते ही मैं बोला..



में--कोई फ़ौरमलिटी अगर बाकी रह गयी थी तो कल सुबह भेज दिया होता इनको इस समय मुझे बुलाने का क्या मतलब है....



अमित--सर नाराज़ मत होइए आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी इसीलिए आप को बुलाया गया है.




में--किस बारे में बात....कौनसी बात??


तभी वहाँ एक और रिसेप्षनिस्ट आजाती है जिसका नाम सुहानी होता है...


तभी वहाँ एक और रिसेप्षनिस्ट आजाती है जिसका नाम सुहानी होता है...



सुहानी--सर क्या आप मुझे थोड़ा सा वक़्त दे सकते है अपना... मुझे आप से बहुत ज़रूरी बात करनी है...




में--हाँ बोलो क्या बात करनी है.



सुहानी--सर यहाँ नही अंदर रूम में.


बहनचोद मेरा दिमाग़ खराब होगया था इस सस्पेंस से आख़िर बात क्या करनी थी ये कहीं मुझ से चुदना तो नही चाहती....??यही सोचते सोचते में एक रूम में पहुँच जाता हूँ...वो मुझे पीने के लिए एक ग्लास में भरकर पानी देती है...और में सोचता हूँ ....ये क्या ये तो पानी पिला रही है....इसको तो वाइन का पेग बनाना चाहिए था...

में वो पानी बेमन से पी लेता हूँ.

उसके बाद ....



सुहानी--सर मिस्टर किशोर गुप्ता के बारे में आपसे बात करना चाहती हूँ क्या आप उन्हे जानते है...



में--ये कैसा सवाल है....वो मेरे पिता है...आप आख़िर बोलना क्या चाहती हो सॉफ सॉफ बोलो.



सुहानी--सर आज दिन में आपके पापा का फोन आया था उन से उस वक़्त बात करने वाली में ही थी...उनसे क्या बात हुई थी वो मसेज तो मैने आप तक पहुँचा दिया था लेकीन्न्णणन्.....



में--अब लेकिन क्या....



सुहानी--आपके पापा के फोन रखने के बाद उसी नंबर से वापस फोन आया था..और जो उसने कहा मुझे समझ नही आ रहा में कैसे आपसे वो बात कहूँ.



में--वापस फोन किस का आया था उसी नंबर से..



सुहानी--ये बात बोलते हुए वो रुआंसी सी हो गयी थी....उसी होटेल से जहाँ आपके पापा रुके हुए थे...



में--तो क्या कहा उन्होने??


मेरा दिमाग़ फटने लगा था और ये मेडम पहेलियो पर पहेलिया बुझाए जा रही थी...



में--तुम चुप क्यो हो....?? बताओ क्या बोला उस होटेल वालो ने.


सुहानी की आँखो में शायद आँसू भर आए थे ये बात बोलते हुए उसके होंठ काँपने लगे थे और वो लगातार अपने हथेलियो को मसले जा रही थी..


मैने उसका हाथ पकड़ लिया और उसकी आँखो में देखते हुए बोला....



में--क्या हुआ सुहानी तुम इतनी परेशान क्यो हो रही हो...क्या बोला मुझे बताओ...



सुहानी--जब आपके पापा होटेल से बाहर....बाहरर..निक्कले तो....एक गाड़ी में से कुछ आदमियो ने गोलियाँ चला दी....ये कहते कहते वो फफक फफक के रोने लगी....



और में बिल्कुल शांत होगया मुझे मेरी आँखो के आगे अंधेरा सा महसूस हो रहा था...मेरे दिल की धड़कन की आवाज़ मेरे कानों पर चोट पहुचाती हुई सी महसूस हो रही थी...सुहानी रोते रोते लगातार मुझे हिलाए जा रही थी लेकिन में अपनी सुध बुध खो चुका था मुझे कोई आवाज़ अब सुनाई नही दे रही थी बस पापा का चेहरा ही मेरी आँखो के सामने बार बार आरहा था...पता नही कब मेरी आँखो में से आँसुओ की धारा बहने लगी ....एक हाथ मेरे आँसू पोछ रहा था लेकिन मेरी आँखो में इतनी ताकत नही बची थी कि में नज़र उठा के उस शॅक्स को देख लूँ....सर ....सर....सर....हिम्मत....रखिए. आप ऐसे अपनी हिम्मत तोड़ोगे तो आपकी मम्मी और भाभी को कौन संभालेगा ....


मम्मी और भाभी का नाम सुनते ही मुझे झटका लगा मैने रोते हुए...




में--क्या भैया भी....



सुहानी--राज गुप्ता....भी नही रहे सर ...आप खुद को संभालिए क्योकि अब आपको ही आपके परिवार को संभालना होगा...जैसे एक माँ अपने रोते हुए बच्चे को बहला कर चुप करती है वैसे ही आपको भी एक माँ की तरह उन सभी को शांत करना होगा...,,संभालिए सर खुद को संभालिए.


ये लीजिए थोड़ा पानी और पी लीजिए थोड़ी ठंडक मिलेगी आपके दिल को.



में--सब कुछ लूट गया....मेरे पापा...मेरा भाई....सब लूट गया मेरा कैसे मेरे दिल को ठंडक पहुँचेगी...

कैसे ठंडक मिलेगी मेरी माँ के दिल को....कैसे ठंदक दे पाउन्गा में मेरी भाभी को बताओ सुहानी मुझे बताओ....कैसे बता पाउन्गा उनसब को में ये बात...


अब कौन मेरी हर ग़लती को माफ़ करके मुस्कुराएगा अब कौन मेरी हर मुराद पूरी करेगा....काश उन लोगो की जगह में मर जाता कम से कम ये दिन तो नही देखना पड़ता.... कैसे सामना करूँ में मेरे परिवार का. बताओ सुहानी बताओ मुझे....



सुहानी--सर आपको संभालना होगा...क्योकि में भी ये दिन देख चुकी हूँ मैने भी खुद को सभाला है तभी मेरा परिवार सम्भल पाया है...आप तो फिर भी एक मर्द हो.


लेकिन में तो तब एक छोटी बच्ची हे थी जब मेरे पिता मेरी आँखो के सामने आक्सिडेंट में चल बसे...सोचो कैसे उस बच्ची ने अपनी माँ को संभाला होगा...कैसे उसने अपने छोटे भाई को संभाला होगा....


आपको संभालना होगा सर.... यहाँ कोई भी आपका सामना करने को तैयार नही था सब ने मुझे ही आपको संभालने को कहा, क्योकि में पहले भी ऐसा कर चुकी हूँ...सर खुद को इस दुविधा से बाहर निकालिए और उस रास्ते पर चलना शुरू कीजिए जिस पर आपके पापा और आपके भाई चलते थे..



फिर सुहानी वहाँ के लॅंडलाइन से रिसेप्षन पर फोन करती है और एक ब्लॅक डॉग की बोतटेल और दो ग्लास मँगवाती है...



जब वेटर ड्रिंक दे जाता है तो सुहानी दो पेग उसमें से बनाती है और मुझे उसमें सिर्फ़ आइस डालकर पीने के लिए देती है .....में एक ही साँस में वो पूरा पेग पी जाता हूँ और बोतल हाथ में उठा लेता हूँ...सुहानी मेरे हाथ से वो बोतल छीन लेती है और कहती है .



सुहानी--सर ये शराब मैने आपको सोचने समझने की ताक़त देने के लिए मँगवाई है ताकि आप इस दर्द से लड़ सके....नाकी इस वजह से ताकि आप इसे पी कर सब भूल कर बेहोश हो जाओ...ये एक ज़हर है...लेकिन कभी कभी दर्द के ज़हर को मारने के लिए इस ज़हर को पी लेना चाहिए ...



उसके बाद सुहानी ने मेरे लिए एक ग्लास में और शराब भरी और मेरे हाथो में पकड़ा दी.



मेरा रोना बंद होगया था लेकिन आँसू अभी भी बहे जा रहे थे. मेरा दिमाग़ काम करने लग गया था लेकिन दिल अभी भी साथ नही दे रहा था...



में--मुझे एक काग़ज़ और कलम चाहिए.....


सुहानी ने लॅंडलाइन से फोन कर के एक पेन और नोटपेड लाने की कहा..और थोड़ी ही देर बाद नोटपेड और पेन रूम में आ गया था...


सुहानी ने वो दोनो चीज़े मेरे सामने रख दी और मेरे ग्लास में शराब और भरकर बोतल को अपने साथ ले जाते हुए कहने लगी...


इस ग्लास को धीरे धीरे पीना क्योकि इसके बाद आपको शराब नही मिलेगी...अब में बाहर जा रही हूँ थोड़ी देर में तुम्हे अकेला छोड़ना चाहती हूँ...में एक घंटे बाद वापस आउन्गि...



कैसे बताऊ में मम्मी को ....कैसे बताओ में भाभी को.....कैसे समझाऊ कि उन दोनो की दुनिया उजाड़ गयी है.

में तो अपने दिल पर पत्थर रख भी लूँगा लेकिन नीरा और रूही का तो कलेजा ही बाहर आज़ाएगा उनके सीने से...

ये बाते सोचते सोचते ना जाने मैने कितने ही कागज उस नोट बुक में से फाड़ कर फेक दिए....

मैने अपना शराब का ग्लास उठया और उसके दो घूंठ भरने के बाद वापस रख दिया.


मैने रिसेप्षन पर फोन कर के सुहानी को यहाँ भेजने के लिए कहा....उसे गये हुए अभी ज़्यादा वक़्त नही हुआ था लेकिन में कुछ समझ नही पा रहा था कि उन लोगो को कैसे बताऊ.


तभी सुहानी वापस रूम में आ गयी...



सुहानी--सर आपने बुलाया ?



में--हाँ सुहानी...में कुछ लिखना तो चाहता हूँ लेकिन लिख नही पा रहा हू मुझे समझ नही आ रहा इस वक़्त में क्या करूँ.



सुहानी--सब से पहले तो आप अपने परिवार को घर लेजाओ और दूसरा.....


तभी रूम के लॅंड लाइन पर कॉल आने लग जाता है.



जिसे सुहानी उठाती है वो किसी से लाइन कनेक्ट करने को बोलती है, और मुझे रिसीवर पकड़ा कर कहती है दुबई से फोन है पोलीस ऑफीसर अब्दुलह का.


में सुहानी से फोन ले लेता हूँ..


में--हेलो...


उधर से आवाज़ आती है.

अब्दुलह-- में दुबई से अब्दुलहा बात कर रहा हूँ , और यहाँ जो हत्याए हुई है उस केस को इन्वेस्टिगेट में ही कर रहा हूँ...

मैने आपको फोन इस लिए किया है ताकि आप अपने रिश्तेदारो की बॉडी यहाँ से ले जाए.


में--में कब आसाकता हूँ बॉडी क्लॅम करने.



अब्दुलह--आप कल सुबह ही यहाँ आजाए .



में--ठीक है अब्दुलहा साहब में कल सुबह पहुँच जाउन्गा.


उसके बाद अब्दुलहा अपना नंबर मुझे देता है में मेरा नंबर उसे. इसके बाद फोन कट जाता है.



में--सुहानी से....बॉडी क्लॅम करने के लिए मुझे दुबई बुलाया है.



सुहानी--आप एक काम करो एक लेटर लिखो जिसमें आपके परिवार को वापस घर जाने की बात बोल दो और उनसे ये कह दो के कोई अमरजेंसी आ गयी है इसलिए आप वहाँ जा रहे हो ...वैसे तो में ये बात यहाँ से वाइयर लेस भिजवा कर आपकी बात डाइरेक्ट करवा देती लेकिन आपका अभी उन लोगो से सामना यहाँ इस हाल में करना ठीक नही है..


उसके बाद में वो लेटर लिख देता हूँ...और तभी मुझे सुहानी एक लेटर और लिखने को कहती है जो सारा सच बयान करता हो....जिसमें सच्चाई लिखी होती है वो लेटर सुहानी अपने पास रख लेती है और जो झूठा लेटर था वो सुहानी किसी को बुलवा कर उसे दे देती है मेरे परिवार तक पहुचाने के लिए...


में--तुम इस लेटर का क्या करोगी.



सुहानी--में ये लेटर उस ड्राइवर को दूँगी जो तुम्हारी फॅमिली को घर छोड़ेगा...घर छोड़ने के बाद वो तुम्हारे घर वालो को वो लेटर दे देगा....इस से ये होगा तुम्हे सच बताने के लिए उनका सामना नही करना पड़ेगा.



में--लेकिन जब उन्हे सच पता चलेगा तब वो कितना टूट जाएँगे और उस समय एक में ही उन लोगो को संभाल सकता हूँ.



सुहानी--जब तुम वहाँ से बॉडी क्लॅम कर के घर पहुँचने वाले होगे तभी वो ड्राइवर तुम्हारे घर वालो को ये लेटर देगा. और वैसे भी. उनके घर पहुँचने से पहले तुम वापस आज़ाओगे तब तक ड्राइवर तुम्हारे घर के आस पास ही रहेगा.


में-- हाँ ये सही रहेगा इस से में उन लोगो के पास में भी रहूँगा.



सुहानी--अब आप जाओ क्योकि आपको एयिरपोर्ट पहुचने में भी टाइम लगेगा में कल सुबह आपकी फॅमिली को घर के लिए रवाना कर दूँगी और में फोन पर आपके साथ टच में रहूंगी.



में--सुहानी तुम ने मुझे पर बहुत बड़ा उपकार किया है वक़्त आने पर कभी भी मेरी ज़रूरत पड़े बस एक बार याद कर लेना तुम्हे इस बार परेशानी से निकालने की ज़िम्मेदारी मेरी होगी.


फिर में अपना ग्लास खाली करता हूँ और थोड़ी ही देर में वो ड्राइवर भी वापस आ जाता है वो अपने साथ मेरा पासपोर्ट और कुछ ज़रूरी सामान लेकर आ गया था......

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मम्मी और वो सब लोग अपना सामान पॅक कर के रिजोर्ट में ले आए थे ...होटेल मॅनेज्मेंट ने उन्हे कुछ भी नही बताया था ..

उनलोगो को जो सूयीट दिया था वो काफ़ी बड़ा था उसमें दो बेडरूम थे और दोनो बेडरूम हॉल में खुलते थे...उन सब ने खाना खा कर थोड़ी देर टीवी देखा और फिर नीरा और नेहा भाभी एक कमरे में और मम्मी और रूही दूसरे कमरे में सोने चले गये .



रात को तकरीबन 1 बजे नीरा की आँख खुल गयी...वो सोने की कोशिश कर रही थी लेकिन सो नही पा रही थी वो अंदर से बाहर हॉल में आ गई और टीवी ऑन करने ही वाली थी कि उसके कानो में मम्मी की हँसी की आवाज़ सुनाई दे जाती है...


वो रिमोट छोड़कर मम्मी के रूम की तरफ़ बढ़ जाती है...दरवाजा पूरी तरह से बंद नही था..दरवाजे को नीरा खोलने ही वाली थी कि एक बार फिर से उसके कानो में मम्मी की आवाज़ आ जाती है.



मम्मी--रूही ज़रा आराम से चूस ..लगता है तू इन में से दूध निकाल कर ही रहेगी.



रूही--क्या करूँ मम्मी बचपन से में आपके बूब्स के पीछे पागल हूँ...कितने सॉफ्ट बूब्स है आपके.



ये बात सुनते ही नीरा दरवाजे पर ही रुक जाती है और दरवाजे की झिर्री में से अंदर का हाल देखने लग जाती है.


अंदर बेड पर मम्मी पूरी नंगी अपने घुटनो के बल बिल्कुल सीधी बैठी हुई थी...और रूही अपने दोनो हाथो में उनका एक बूब पकड़कर बेदर्दी से चूसे जा रही थी...रूही अभी तक अपनी नाइटी में थी.



ये सीन देख कर नीरा की आँखे एक दम से नशीली होगयि उसने धीरे धीरे कपड़ो के उपर से ही अपने टाइट हो चुके बूब्स को सहलाने लगी...



रूही मम्मी के बूब्स चूसे जा रही थी और मम्मी उसके सिर पर धीरे धीरे हाथ फेरते हुए सिसक रही थी...


फिर मम्मी ने रूही की नाइटी उतार दी...और अपने हाथो की उंगलियो से रूही की पिंक निप्पल मसल्ने लगी...



रूही--मम्मी में आप से एक बात कहना चाहती हूँ अगर आप बुरा ना मानो तो..



मम्मी अभी भी अपने एक हाथ से रूही के बूब्स दबाती जा रही थी और उसकी चूत को अपनो मुट्ठी में भरकर कहने लगी ...



मम्मी--बोल रूही क्या बात है तेरी ऐसी कौनसी बात है जिसका बुरा मुझे लग सकता है...




रूही--मम्मी में जय भैया से शादी करना चाहती हूँ ....में उनसे हद से ज़्यादा प्यार करने लगी हूँ.



मम्मी--गुस्से से....रूही....ये फिर से इस घर में दोहराया नही जाएगा तू समझती क्यो नही है बेटा जय तेरा भाई है...


रूही--मम्मी समझो आप...मैने कह दिया मुझे जय चाहिए नही तो में सब को वो बात बता दूँगी...कि कैसे जय पैदा हुआ कैसे आपकी हवस ने मेरी और राज भैया की लाइफ लगभग खराब ही कर दी थी. में बता दूँगी आप राज भैया से चुदाती थी और उस पाप में आपने भी मुझे भागीदार बना लिया.. बता दूँगी जय आपके और राज भैया के मिलन की निशानी है...



मम्मी--रूही चुप कर दीवारो के भी कान होते है कहीं किसी ने सुन लिया तो सब कुछ तबाह हो जाएगा.



रूही--कोई सुनता है तो सुन ले ....अगर जय मेरा ना हो सका तो में उसे आप लोगो के साथ भी रहने नही दूँगी.



मम्मी--रूही तू पागल हो गयी है...जय कभी भी ऐसा कोई काम नही करेगा..



रूही--आप बस मेरा साथ दो मम्मी ...में जानती हूँ पापा ने सिर्फ़ आपको बच्चे दिए है लेकिन कभी आपकी खुशियो के बारे में नही सोचा..मेरा साथ देने में आपका भी भला है मम्मी.


मम्मी--तू ये कैसी बाते कर रही है....में तेरे पापा से प्यार करती हूँ उन्होने जो कुछ भी किया है वो हमारे लिए ही किया है...जय मेरी भूल का नतीजा है और ये भूल दुबारा इस घर में दोहराने नही दूँगी में..



रूही--ठीक है आप मेरा साथ दो या ना दो लेकिन मुझे अब रोकना मत.



मम्मी--रूही में अब झड़ने वाली हूँ तू ये फालतू बाते बंद कर और थोड़ी ज़ोर से मेरी चूत में अपनी उंगलिया चला...



रूही लगातार मम्मी की चूत में अपनी दो उंगलिया चलाते हुए कहती है..


रूही--ज़रा सोचो जब जय का लंड आपकी चूत को ठंडा करेगा ज़रा सोचो जब वो हम दोनो को बेड पर पटक पटक कर चोदेगा...कैसा मज़ा आज़ाएगा हमारे जीवन में .



मम्मी--जय .....जय चोद मुझे..आअहह... डाल दे अपना मोटा लंड सीहह भर दे तेरी माँ की चूत तेरे गर्म लावे से...ऊहहााअहह में गाइिईईईईई. और उसके बाद वो झटके खाती खाती झड़ने लग जाती है.



उधर दरवाजे पर खड़ी नीरा की चूत भी अपना पहला काम रस छोड़ देती है उसकी चूत का रस उसके शौरट्स की साइड में से होता हुआ उसकी जाँघो पर बहने लगता है ....वो मन ही मन एक कसम खा चुकी थी...


तेरी कसम जय में शादी अब तुझ से ही करूँगी...तेरी कसम मेरे जिस्म को रोन्दने वाला मेरी जिंदगी में पहला और आख़िरी मर्द तू ही होगा....तेरी कसम ....जय मेरी हर साँस अब तुझे ही पाने के लिए चलेंगी...तेरी कसम......तेरी कसम........


वहाँ रूही , मम्मी और नीरा तीनो ही जय को पाने की कामना कर रहे थे वही...नेहा इन सारी बातो से दूर अपने सपनो की दुनिया में मस्त हो रखी थी...शायद आने वाला समय उसके लिए ही सब से भारी होने वाला था....





में--एयिरपोर्ट पर पहुँच कर दुबई की एक फ्लाइट ले लेता हूँ जो बस थोड़ी देर में छूटने ही वाली है...में फ्लाइट में बैठा बैठा सारी बातो के बारे में सोचे जा रहा था...में इतनी गहराई से उन सोचो में डूब गया था कि मुझे कुछ सुनाई नही दे रहा था....



एक हाथ मेरे कंधे को लगातार हिलाए जा रहा था....सर ....सर...सर....सर आपको क्या हुआ है....आप जवाब क्यो नही दे रहे...



कंधे के हिलने से मेरी चेतना फिर से वापस आने लगी....में हड़बड़ा कर अपना सर उपेर कर के देखता हूँ... वहाँ एक सुंदर सी एर होस्टेस्स मेरी आँखो में झाँक रही थी..उसकी छाती पर जो नेम प्लेट लगी हुई थी उस से मुझे उसका नान पता चला...रीना नाम था उसका.




रीना--सर आप ठीक है...आपको क्या हुआ था सर में काफ़ी देर से आपको पुकारे जा रही थी..




में--कुछ नही बस ऐसे ही आँख लग गयी थी आप मुझे बताइए आप क्यो मुझे आवाज़ लगा रही थी.




रीना--सर आपने सीटबेल्ट्स नही बाँधी है प्लेन अब उड़ने वाला ही है...प्ल्ज़ आप अपनी बेल्ट बाँध लीजिए.



में अपनी बेल्ट बाँधने लग जाता हूँ फिर वो कहती है...



रीना--सर फ्लाइट के दौरान आप कुछ लेना चाहेंगे



में--मुझे एक ड्रिंक चाहिए लेकिन थोड़ा हार्ड...क्या आप मेरे लिए इतना कर सकती है..




रीना--ज़रूर सर...में थोड़ी ही देर में आपका ड्रिंक ले आउन्गि आप जब तक आराम कीजिए...



उसके बाद वो वहाँ से चली गयी और में अपने आस पास के लोगो को देखने लगा...थोड़ी ही देर बाद हमारा प्लेन आकाश की उँचाइयो में था...


तभी मुझे वो खूबसूरत एर होस्टेस्स मेरी तरफ़ आती नज़र आ गयी.



रीना --सर ये आपके लिए ड्रिंक...क्या आप इसके साथ खाने में कुछ लेना चाहेंगे....



में--नही मुझे और कुछ नही चाहिए लेकिन जब तक हम लोग दुबई नही पहुँच जाते आप मुझे ड्रिंक देती रहना.



रीना--जेसी आपकी मर्ज़ी सर...लेकिन इतनी ज़्यादा ड्रिंक आपके दिल को नुकसान पहुँचाएगी...



में--दिल तो वैसे भी टूट चुका है बस ये शराब ही है जो मेरे दिल को बिखरने से बचा रही है...


उसके बाद में वो ड्रिंक एक ही साँस में ख्तम कर देता हूँ...



रीना--सर हो सकता है शराब दर्द को कम कर देती हो लेकिन इसको ज़्यादा पीने से वो दर्द कम होने की बजाए और बढ़ जाता है...अगर जीवन मिला है तो अपनी परेशानियो का सामना करो ना कि परेशानियो से छिप्कर जीवन का कीमती समय खराब करो.



उसकी इस बात ने मुझे सुहानी की बात याद दिला दी...



में--सॉरी रीना में आज कुछ ज़्यादा परेशान हूँ इस लिए प्ल्ज़ मेरे लिए बस एक और ड्रिंक ला दो इसके बाद आप और ड्रिंक मत लाना..



ये सुनकर वो मुस्कुरा उठती है...



सर--आपने मेरी बात का मान रखा उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया...में आपका ड्रिंक लेकर आती हूँ....



और उसके बाद वो वहाँ से चली जाती है ...और जब वापस आती है तो वो ड्रिंक के साथ कुछ खाने को भी ले आती है..



रीना--सर आपको मेरी एक बात और माननी पड़ेगी आपको ड्रिंक के साथ ये पनीर पकोडे भी खाने होंगे..क्योकि आप को देख कर ऐसा लग रहा है जैसे आपने सुबह से कुछ नही खाया...



मैने उसकी बात मानते हुए खाने के लिए हाँ कह दी फिर वो चली गयी....

एक एर होस्टेस्स मुझे जिंदगी की एक और सीख दे गयी....अपनी परेशानियो से घबराने की बजाए उनका सामना करना ही असली जिंदगी जीना होता है.....



राजस्थान का एक और रंग....जैसलमेंर...यहाँ का रंग बड़ा निराला है यहाँ के मर्द अपने सिर पर साफ़ा बाँधते है...और औरते अपनी छाति तक का घूँघट रखती है...



दूर ....दूर तक फैला रेत का समंदर दिन में आग को तरह जलता है और सूरज ढलते ही यही रेत किसी माँ के आँचल की तरह शीतलता प्रदान करती है...ये मशहूर है अपनी परंपराओं के लिए सजे धजे ऊँट ( कॅमल) के लिए...



जैसलमेर का ही एक गाँव लक्ष्मण गढ़ यहाँ आज भी किशोर गुप्ता के पुरखे रहा करते थे...किशोर ने बचपन में ही अपना गाँव छोड़ दिया था और चला आया था मुंबई.



मुंबई से अपने बिज़्नेस की शुरूवात करी फिर किसी काम के सिलसिले में उदयपूर आया यहाँ उसकी मुलाकात संध्या से हुई...दोनो ने शादी करली और उदयपूर में ही घर बसा लिया....



किशोर के माता पिता इस दुनिया में नही है...अगर कोई उसका सगा है तो वो है उसका छोटा भाई रजत गुप्ता...रजत के 2 बच्चे है और दोनो ही लड़किया है एक 18 की और एक 20 साल की किशोर की पत्नी गाँव की नही है इसी वजह से उसकी दोनो लड़किया आच्छे से पढ़ लिख पा रही थी...


रजनी--रजत की पत्नी


दीक्षा--रजत की बड़ी बेटी


कोमल--रजत की छोटी बेटी.



रजत का वैसे तो कोई ख़ास कारोबार नही है लेकिन खेतीबाड़ी अच्छी जमी हुई है...वो ब्याज पर भी अपने पैसो को चलाया करता था...इसलिए उनकी जिंदगी में किसी प्रकार की कोई कमी नही थी...



उनका एक बड़ा सा घर गाव के बीचो बीच बना हुआ था सभी रजत की दिल से इज़्ज़त किया करते थे ...क्योकि ज़रूरत के टाइम रजत ही पूरे गाव के काम आता था...



रजनी--कोमल से...कहाँ डोलती रहती है सारा दिन ये घर आने का वक़्त है क्या तेरा.



कोमल--माँ अब में बकरिया तो चराती हूँ नही जो में आपको ये बोलू...अपनी सहेली के यहाँ गयी थी उसकी दादी से मिलने.

आप तो ज़रा सी देर क्या हुई पूरा गाँव सिर पर उठा लेती हो.



रजनी--अरे छोरी अपनी जीभ को काबू में रखा कर ...कल को जब दूसरे घर जाएगी तब वहाँ से शिकायत बर्दाश्त ना होगी मुझ से..



कोमल--माँ म्हारे से पहले तो जीजी का ब्याह करना पड़ेगा....कभी जीजी से भी पूछ लिया करो कि कठे डोलती फिरे है....



और वो हँसती हुई अपने कमरे में भाग जाती है.



रजनी--अब या दीक्षा कठे रह गी...कोमल में राधा काकी के घर जा रही हूँ...दीक्षा और तू दोनो मिलकर खाना बना लेना ...तेरे बापू आते ही होंगे खेतो से.....


कोमल और दीक्षा इस घर की जान थी उनके हँसते मुस्कुराते चेहरे से घर हमेशा ख़ुसनूमा बना रहता था...


किशोर के घर छोड़ने के बाद कभी वो पलट कर वापस अपने गाव नही गया...बस किशोर ने अपनी शादी के समय रजत को ज़रूर बुलाया था,बस उस समय ही रजत मिल पाया था किशोर से...उसके बाद दोनो ही अपनी अपनी दुनिया में सुख से जीवन बिता रहे थे...किशोर के हिस्से की ज़मीन रजत ने संभाल कर रखी थी...ये वो ज़मीन थी जिसका बटवारा किशोर के पिता ने जीते जी कर दिया था...रजत ने कभी किशोर की अमानत पर बुरी नज़र नही डाली....हमेशा उसे संभाल कर ही रखा.



दीक्षा घर के अंदर आ गयी थी...



कोमल--जीजी इतनी देर कहाँ घूम रही थी आप...



दीक्षा--कहीं नही कोमल सहेलियों के साथ कुए पर बैठी थी...



कोमल--माँ कह कर गयी है खाना बनाने के लिए ...चलो आजाओ आटा मैने लगा दिया है आप सब्जी बना लो.



दीक्षा--हाँ रुक आई एक मिनट में....




तभी एक आवाज़ गूँजती है घर के अंदर ये आवाज़ रजत की थी...



रजत--दीक्षा , कोमल कहाँ हो तुम दोनो...




कोमल--हाँ पापा क्या हुआ... और अपने साथ लाया हुआ पानी का ग्लास रजत को पकड़ा देती है...



रजत--दीक्षा और तेरी माँ कहा है...



कोमल--दीक्षा दीदी अंदर रसोई में सब्जी काट रही है और माँ राधा काकी के यहाँ गयी है...



रजत--अच्छा ठीक है जा और तेरी माँ को वहाँ से बुला कर ले आ ...



कोमल--ठीक है पापा में अभी गयी और अभी आई....



थोड़ी देर बाद रजनी भी वहाँ आजाती है...



रजनी--क्या हुआ दीक्षा के बापू...ये कोमल बता रही थी कि आपको ज़रूरी बात करनी है...




रजत--वैसे इस शैतान को मैने ऐसा कुछ कहा तो नही था लेकिन जिस लिए तुझे बुलाया वो बात है तो ज़रूरी...




रजनी--ऐसी क्या बात है दीक्षा के बापू...




रजत--कल दिन भर से मेरा मन बड़ा अजीब सा हो रहा है मुझे कल से किशोर भाई साहब से मिलने का मन हो रहा है...



रजनी --तो फिर मिल आओ ना आप वहाँ जा कर ये भी कोई सोचने की बात है क्या...




रजत--इसबार में सोच रहा हूँ हम सभी लोग वहाँ चले किशोर इन दोनो को देख कर बड़ा खुश हो जाएगा.



रजनी--ठीक है दीक्षा के बापू हम सभी चलेंगे वैसे भी खेत अभी खाली किए ही है और इन दोनो के स्कूल और कॉलेज का भी बंदोबस्त वापस आकर कर लेंगे.



रजत--ठीक है रजनी हम कल सुबह ही निकल चलेंगे तुम चलने की तैयारी करो.......


में दुबई पहुँच चुका था...ऑफीसर अब्दुलह के साथ में मॉर्ग के लिए निकल गया ...


वहाँ पहुँच कर बड़ी मुश्किल से में पापा और भाई की बॉडी को देख पाया मेरे आँसू रुकना भूल गये थे ....बिल्कुल अकेला पड़ गया था में...काश इस वक़्त कोई मेरे साथ होता जिसके कंधे पर सिर रख के में रो सकता...



कुछ ज़रूरी फ़ौरमलिटी के बाद अब्दुलह ने कहा..



अब्दुलह--मिस्टर जय आप अब ये बॉडी वापस ले जा सकते है मुझे बड़ा अफ़सोस है आपके साथ जो हुआ उसका..अभी थोड़ी देर में ही एक फ्लाइट जाने वाली है आपको टिकिट और बॉडीस को भेजने का प्रबंध मैने उसी में कर दिया है....

मुझे जैसे ही कुछ पता चलेगा हत्यारो के बारे में आपको इनफॉर्म कर दूँगा.



में--ठीक है ऑफीसर अब मुझे चलना चाहिए वैसे भी अब कुछ बचा नही है यहाँ पर.



उसके बाद एक आंब्युलेन्स में बैठ कर मैं एयिरपोर्ट की तरफ निकल जाता हूँ...आंब्युलेन्स में मेरे सामने दो ताबूतो में दोनो की बॉडी पड़ी हुई थी....में उस तरफ़ देखने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था....एयिरपोर्ट आने पर वहाँ के स्टाफ ने ताबूतो को आंब्युलेन्स से निकाला और अपने साथ ले गये.



में जा कर अपनी सीट पर बैठ गया और अपनी सीट बेल्ट लगाने के बाद में अपनी आँखे बंद करके सोचने लग जाता हूँ....प्लेन अब आसमान में उड़ने लग गया था और में अपनी सोच के अंधेरे में अंधेरों से गिरता जा रहा था...

तभी एक आवाज़ मुझे उस भंवर में से निकाल देती है ...वहाँ रीना मेरे सामने खड़ी थी... और उसके हाथ में मेरे लिए एक ड्रिंक था...


में--आप इस फ्लाइट में भी...




रीना--सर ये वही प्लेन है जिसमें आप कुछ घंटो पहले आए थे...

अब ये प्लेन वापस भारत जा रहा है तो में भी तो इसी में मिलूंगी ना...ये लीजिए आपका ड्रिंक...क्या में जान सकती हूँ आप इतने परेशान क्यो है...



में--आपके प्लेन में मेरे पापा और भाई भी सफ़र कर रहे है....



रीना--ओह्ह थ्ट्स नाइस अगर आप बोले तो में आप लोगो की सीट्स एक साथ करवा दूं...



में--रीना तुम समझी नही वो उन दो ताबूतो में हैं वो अब मेरे पास नही बैठ सकते...




रीना--ओह्ह्ह माइ गॉड एक्सट्रीम्ली वेरी सॉरी सर...शायद मैने आपकी चोट को और कुरेद दिया..मुझे माफ़ कर देना.




में--आपको सॉरी बोलने की कोई ज़रूरत नही है...क्या आप मेरा एक काम कर सकती है...



रीना --बोलिए सर कौनसा काम करना है...



में--जहाँ वो बॉक्स रखे हुए है में वहाँ जाना चाहता हूँ थोड़ी देर में मेरे भाई और पापा के साथ रहना चाहता हूँ...



रीना--सर में कॅप्टन से पर्मिशन लेने की कोशिश करती हूँ शायद वो मान जाए..



में--ठीक है वैसे कोशिश अक्सर कामयाब हो जाती है आप जाइए.



उसके बाद रीना कॉकपिट में घुस गयी और थोड़ी देर बाद फिर से मेरे पास आई.



रीना--सर कॅप्टन मान गये है बस उन्होने ये कहा है बाकी पॅसेंजर्स को परेशानी नही होनी चाहिए....



में--रीना में किसी को भी परेशान नही करूँगा बस मुझे वहाँ छोड़कर तुम वापस अपना काम संभाल लेना.



रीना-- ठीक है सर आप चलिए मेरे साथ...


उधर उदयपूर में एक बोलेरो किशोर गुप्ता के बंगले के सामने रुकती है....और वॉचमन दरवाजा खोल देता है..गाड़ी अंदर लेजाने के बाद रजत और उसकी फॅमिली बंगले की तरफ बढ़ जाते है....







रजत घर की बेल बजाता है और अंदर से नीरा दरवाजा खोल कर बाहर आजाती है




नीरा--जी बोलिए किस से मिलना है आपको.




रजत--बेटी हम किशोर भाई साहब से मिलने आए है....




नीरा--माफ़ करना अंकल आपको पहचाना नही मैने और पापा तो दुबई गये है....



रजत--क्या तुम उनकी बेटी हो...



नीरा--जी अंकल



रजत---बेटा में तुम्हारे पापा का छोटा भाई हूँ तुम्हारा रजत चाचा....




नीरा--चाचा....लेकिन पापा ने तो कभी कुछ बताया नही...एक मिनट आप अंदर आइए फिर बैठ कर बात करते है...



कोमल अपने पिता को इस तरह फँसता देख मुस्कुराने लग गयी थी...



नीरा--अंकल आप यहाँ बैठिए में मम्मी को बुलाकर लाती हूँ...


नीरा भागकर मम्मी के रूम की तरफ़ चली जाती है...



नीरा--मम्मी कोई अंकल आए है अपनी वाइफ और दो लड़कियो को लेकर और वो अपने आप को मेरा चाचा बता रहे है...



मम्मी--चाचा...


और फिर मम्मी लगभग भागते हुए हॉल में बैठे हुए रजत की तरफ़ बढ़ जाती है....




रजत--संध्या भाभी धोक देता हूँ...



मम्मी गौर से रजत के चेहरे को देखने लगती है...



मम्मी--आप रजत भैया है ना.



रजत--जी भाभी में आपका एक्लोता देवर और ये आपकी देवरानी रजनी और ये दोनो शैतान आप ही की है...



मम्मी रजत भैया से मिलकर बहुत खुश हो जाती है वो रजनी से गले मिलती है और कोमल और दीक्षा को आशीर्वाद भी देती है....


और फिर वो सब को आवाज़ लगा लगा कर बोलाने लगती है नेहा....रूही...नीरा जल्दी यहाँ आओ देखो कौन आया है...



नेहा --कौन आया है मम्मी...



मम्मी--कौन क्या आया है ये तुम्हारे चाचा जी... हैं चल पैर छु इनके...


रजत भैया ये राज की पत्नी नेहा है रजनी नेहा भाभी को अपने गले से लगा लेती है...तभी रूही और नीरा भी वहाँ आ जाती है वो दोनो भी सब से बड़े प्यार से मिलती है उसके बाद नेहा और रूही किचन में घुस जाती है...इतने में रजनी भी उठकर उनलोगो की मदद करने के लिए किचन की तरफ जाने लगती है तो मम्मी उनका हाथ पकड़कर उन्हे वही रोक लेती है...



रजनी--भाभी घर का ही तो काम है और हम कौन्से. यहाँ मेहमान बनकर आए है..



मम्मी--नही रजनी तुम यहीं बैठो वो दोनो काम कर लेंगी..



रजनी--कोमल..दीक्षा जाओ अंदर रसोई में भाभी और दीदी की मदद करो ...



मम्मी--रहने दे ना रजनी क्यो बच्चो को परेशान कर रही है



रजनी--नही भाभी जी आप इनको जाने से मत रोको वरना मुझे बुरा लगेगा...



मम्मी--ठीक है नीरा तुम अपनी बहनो को लेकर भाभी के पास ले जाओ अगर ये आराम करना चाहे तो अपने साथ रूम में ले जाना.




नीरा--मेरे पास पहले तंग करने के लिए बस एक बड़ी बहन ही थी अब तो मेरे पास 2 बड़ी बहन है तंग करने के लिए और एक छोटी बहन भी आ गयी.... और फिर वो दोनो का हाथ पकड़कर किचन के अंदर ले जाती है..



मम्मी--बताइए रजत भैया गाँव के हाल कैसे है में तो कभी आ नही पाई गाव आप लोगो को यहाँ देख कर सच में दिल खुश होगया..



रजत--भाभी गाव में सब बढ़िया है मुझे दो दिन से भाई साहब की बहुत याद आरहि थी इसीलिए मैने आज यहाँ आ गया और इन लोगो को भी यहाँ ले आया ...



मम्मी--अब आप यहाँ आगये होंठो अब कुछ दिन जाने का नाम मत लेना मुझे थोड़ी तो सेवा करवाने दो अपनी देवरानी से...आपने तो कभी भाभी का ध्यान रखा नही ...



रजत--नही नही भाभी आप सब तो हम लोगों के दिल में हमेशा रहते हो.....


घर में बड़ी खुशी फैली हुई थी....मम्मी अपनी देवरानी से मिलकर फूली नही समा रही थी...


मम्मी नीरा के बर्तडे का फोटो आल्बम उन्हे दिखाते हुए सब के बारे में बता रही थी....


एक चेहरे पर रजनी की नज़र टिक गयी....




रजनी--भाभी ये लड़का कौन है....ये आपकी लगभग सभी तस्वीरों में है...




मम्मी--ओहूऊ में भी कितनी पागल हूँ....ये जय है मेरा बेटा और आपका भतीजा...



रजनी--ये कहाँ है अभी ....बाहर रहता है क्या.



मम्मी--नही बाहर नही उसके किसी दोस्त का आक्सिडेंट हो गया है तो वो वहाँ गया हुआ है...



रजनी--ओह्ह्ह कब तक आएगा मेरा बड़ा मन कर रहा है अपने भतीजे को गले से लगाने का..



तभी....घर की बेल बजती है..


मम्मी उठ कर दरवाजा खोलने के लिए जाती है जैसे ही सामने देखती है...


वहाँ वही ड्राइवर खड़ा होता है जो उन्हे और उनकी गाड़ी को घर तक छोड़ने आता है...



मम्मी--अरे ड्राइवर साहब आप....आप अभी तक उदयपूर में ही हो????आप गये नही वापस..कोई परेशानी है क्या.??



ड्राइवर--मेडम ये चिट्ठी देनी थी आपको इसीलिए यही रुका हुआ था...




मम्मी--कैसी चिट्ठी....?? किसकी है ये चिट्ठि...??



ड्राइवर-- ये मुझे रिजोर्ट वालो ने दी थी आपको देने के लिए....अब में चलता हूँ मेरी ज़िम्मेदारी अब ख्तम हो गयी है...


उसके बाद वो ड्राइवर वहाँ से चला जाता है..


और मम्मी दरवाजा बंद करके जैसे ही उस लेटर को पढ़ने लगती है...उनकी आँखो से आँसुओ की धारा निकलने लगती है जैसे जैसे वो उस लेटर में आगे पढ़ती जाती है...वैसे वैसे उनकी आँखे बस फैलती ही चली जाती है.



तभी अचानक मम्मी लहरा कर ज़मीन पर गिर जाती है...उनको गिरता देखा रजनी और रजत भाग कर उनको संभाल ने पहुँच जाते है




रजनी--भाभी क्या हुआ आँखे खोलो अपनी...नेहा....रूहीी....नीराअ...वो ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगती है सभी वहाँ भागकर पहुँच जाते है सभी लोग मम्मी को घेर कर खड़े होते है....नीरा मम्मी के हाथ में से वो लेटर निकाल कर उसे पढ़ने लगती है....



और ज़ोर ज़ोर से रोते हुए सब को उस लेटर की सच्चाई बता देती है...



नेहा ज़ोर ज़ोर से चीखने लग जाती है वो नीरा से वो लेटर छीन कर नीरा को एक थप्पड़ तक मार देती है...और नीरा नेहा से चिपक्कर रोने रोने लग जाती है...



नेहा को तो जैसे कोई होश ही नही रहता वो एक पत्थर की तरह हो जाती है उस लेटर को पढ़ने के बाद...



तभी...................................


तभी घर के बाहर आंब्युलेन्स की आवाज़ गूंजने लग जाती है और चाचा जी और नीरा और रूही भाग कर घर का दरवाजा खोल कर बाहर आजाते है ...उस आंब्युलेन्स में से जय को निकलता देख सब की रुलाई फूट जाती है...



में अपने आँसू किसी तरह संभाले हुए वो दोनो ताबूत घर के अंदर रखवा देता हूँ...उसके बाद नीरा मेरे सीने से लग कर रोने लग जाती है....और अपने हाथो से मेरे सीने पर मारने लग जाती है....




नीरा--ये क्या हो गया भैया....सब कुछ ख्तम हो गया भैया....अब कैसे जियेंगे हम सभी...और बेसूध होकर मेरी बाहो में झूल जाती है ....


अंदर भाभी अभी भी वैसे ही खड़ी थी...उनके हाथो ने अभी भी मेरा लिखा हुआ लेटर पकड़ रखा था...उधर रूही उन दोनो ताबूतो को खोल चुकी थी और वो कभी भैया से कभी पापा की बॉडी से लिपट लिपट के रोने लग गयी थी...



एक औरत रोते रोते अभी माँ को संभालने की कोशिश कर रही थी.


और वहाँ खड़ा एक आदमी रूही को उन ताबूतो से दूर हटाने की कोशिश करते करते खुद भी रोने लग गया था......


घर का महॉल पूरी तरह से बदल चुका था...जहाँ थोड़ी देर पहले पूरा घर खुशियो से भरा हुआ था....वहाँ अब मातम का सन्नाटा छाया हुआ था....कोई किसी से कुछ नही कह पा रहा था...कोई किसी के आँसू पोछ नही पा रहा था....ये कैसी मनहूसियत सी छाइ है मेरे घर के उपर...कैसे में सब का दर्द बाटू...कैसे में संभालू अपने आप को....कैसे सम्भालू...अपने परिवार को...



वो आदमी मेरे पास आकर बोलता है.



रजत--जय बेटा में तेरा चाचा हूँ...देख ना किसकी नज़र लग गयी मेरे भाई को ...और राज तो अभी बच्चा था....कैसे जिएगी नेहा उसके बिना...



उनके मुँह से चाचा शब्द सुनते ही में उनके गले लग कर रोने लगता हूँ अपने सारे बाँध में उनसे गले लगने के बाद तोड़ देता हूँ...वो खुद भी मेरे साथ रोए जा रहे थे...और कहे जा रहे थे...



चाचा--बेटा अपनी माँ और भाभी को संभाल...उनको दूसरे कमरे में लेकर जा और होश में लाने की कोशिश कर ...जब तक में इन दोनो की अंतिम यात्रा की तैयारी करता हूँ...


में--चाचा जी कुछ देर मुझे अपने सीने से लग कर रोने दो इन दो दिनो में दिल खोल कर रोना चाहता था लेकिन मुझे सहारा देने वाला कोई कंधा मुझे नही मिला जहाँ में सिर रख के रो सकूँ...



चाचा--बेटा हम मर्द है...और हम लोगो की ये बदक़िस्मती है कि हम अपनो के जाने पर रो भी नही सकते...क्योकि पूरे परिवार का ध्यान हमे ही रखना होता है...कुदरत ने इसीलिए आदमी का दिल सख़्त बनाया है और औरत का दिल इतना नाज़ुक क्योकि वो औरत भी हमारे दिल के आँसू अपनी आँखो से बहा देती है...



में--पर चाचा में कैसे संभालू इन सब को कैसे दे पाउन्गा में इन लोगो को वो खुशिया जो सिर्फ़ पापा और भैया ही दे सकते थे.



चाचा--बेटा अब तुम घर के सब से बड़े मर्द हो यानी इस परिवार के मुखिया...और परिवार के मुखिया का बस एक ही फ़र्ज़ होता है...अपने परिवार को हमेशा हँसता खेलता वो रख पाए...अब अपने आँसू पोछो और सम्भालो उन सभी को जिन्हे तुम्हारे पापा और भाई तुम्हारे भरोसे छोड़ कर गये है...



इतना कह कर वो घर से बाहर अपनी गाड़ी लेकर निकल जाते है...अब कुछ पड़ोसी भी हमारे घर में आ चुके थे जो मम्मी भाभी और रूही को संभाल रहे थे....तभी अचानक....नीराअ कहाँ गयी...


ये सोचते ही मेरा कलेजा धाड़ धाड़ बजने लगता है...में पूरे घर में बदहवासों की तरह उसे भागते हुए ढूँढने लग जाता हूँ..किसी को उसके बारे में कुछ पता नही होता.....



में बाहर गार्डन में आजाता हूँ लेकिन नीरा यहाँ भी नज़र नही आती...तभी मेरी नज़र गार्डन के एक पेड़ पर बने ट्री हाउस पर पड़ती है...नीरा जब भी बिना बताए गायब होती थी तब वो हम लोगो को इसी ट्री हाउस में मिलती थी...

मुझे लगा शायड होश में आने के बाद वो उस ट्री हाउस में चली गयी हो....



में तुरंत उस ट्री हाउस पर चढ़ जाता हूँ और अंदर जाकर देखता हू वहाँ नीरा अपना सिर अपने घुटनो पर रख कर लगातार रोए जा रही थी.....उसको इस तरह से रोता देख....मुझे अपनी खाई हुई वो कसम याद आ गई.... तेरी कसम... में तेरे सारे दर्द अपने उपर ले लूँगा...........,


में नीरा के पास जाकर बैठ गया और उसको अपनी बाहो में भर लिया...वो मुझ से किसी लता की तरह बिल्कुल चिपक गयी और उसके रोने की रफ़्तार लगातार बढ़ती ही जा रही थी में प्यार से उसको चुप करने की कोशिश करने लग गया...लेकिन वो तो बस रोए ही जा रही थी.


रोते रोते उसकी साँस भी उखड़ने लग गयी थी...उसको हिचकिया भी आने लग गयी थी रोते रोते...


मुझे समझ में नही आया कैसे में नीरा को चुप कराऊ....तभी मुझे याद आ गया भाभी ने मुझे किस तरह नदी के पास चुप करवाया था...



मैने अपने होंठ नीरा के होंठो से जोड़ दिए और उसे कस कर अपनी बाहो में भर कर उसके होंठ चूसने लगा .....नीरा मेरे इस तरह से करने से एक दम से हड़बड़ा जाती है और मुझ से दूर हट जाती है..




नीरा--भैया ये क्या कर रहे हो आप...




में--तू रोना बंद नही कर रही थी तो मुझे ऐसा करना पड़ गया...मुझे माफ़ कर देना नीरा.



नीरा--नही भैया आप माफी मत माँगो...में ही रोते रोते कैसे यहाँ पहुँच गयी मुझे खुद भी परा नही चला...आपने बल्कि अच्छा किया जो मुझे उस अंधेरे से निकाल दिया...


और उसके बाद वो मेरे सीने से लग कर सूबकने लगती है...



नीरा--भैया अब क्या होगा??कैसे इस परिवार में फिर से खुशिया वापस आएँगी...



में--तू चिंता मत कर तेरा भाई अभी ज़िंदा है में अपने परिवार की खुशी के लिए कुछ भी कर जाउन्गा...चल अब घर में चल और सबको संभालने में मेरी मदद कर....



नीरा--भैया मुझे यहीं रहने दो में वहाँ किसी का सामना नही कर पाउन्गि ....कैसे देखूँगी में माँ की आँखो में आँसू और भाभी तो बस पत्थर की तरह हो गयी है...कैसे संभालूगी में उन सब को....कैसे???


में--यही सवाल मेरे मन मे भी था जब में दुबई गया था, पापा और भैया को लेकर आने के लिए....अब तू खुद को मजबूत कर और चल मेरे साथ हम दोनो को मिलकर इस घर की खुशिया वापस लानी है...



नीरा--ठीक है भैया अब में नही रोउंगी ....




उसके बाद हम दोनो वहाँ से उतर कर घर के अंदर आ जाते है...माँ होश में आ चुकी थी और आस पास की औरतों के साथ वही बैठ कर रोने लग गयी थी...


उसके बाद हम दोनो वहाँ से उतर कर घर के अंदर आ जाते है...माँ होश में आ चुकी थी और आस पास की औरतों के साथ वही बैठ कर रोने लग गयी थी...


वो मुझे देखते ही उठ के मेरे पास आकर खड़ी हो जाती है और एक टक मुझे बस घुरे ही जा रही थी...और तभी वो मेरे सीने पर मुक्के बरसाते हुए रोने लग जाती और मेरे सीने से लगते हुए कहने लगती है...



मम्मी--तूने खुद को कैसे अकेला कर लिया इस दर्द में....कैसे सह गया तू अपने आँसू क्यो नही बताया हम लोगो को....क्यो बिना बताए चला गया हम लोगो को वहाँ हँसता बोलता हुआ छोड़कर....कैसे सांभाला तूने अपने पापा और भाई की जुदाई का दर्द...



में--मम्मी में कैसे सामना करता आप सभी का....कैसे. में अपने हँसते खेलते परिवार में खुद ही दुख की आग लगा देता ...और में भी अब रोने लगता हूँ...


हम दोनो माँ बेटे एक दूसरे के सीने से ऐसे ही काफ़ी देर तक रोते रहे तभी वहाँ किसी औरत ने मम्मी से कहा...



रजनी--भाभी....नेहा के आँसू नही निकल रहे...उसका रोना बहुत ज़रूरी है वो इस दर्द को अपने दिल से बाहर नही आने दे रही...



मम्मी मुझे छोड़ कर तेज़ी से भाभी के रूम की तरफ़ बढ़ जाती है और भाभी को इस हालत से निकालने की कोशिश करने लगती है ...



भाभी की आँखे बिल्कुल पथरा गयी थी वो बिल्कुल उस समय एक ज़िंदा लाश की तरह उस कुर्सी पर बैठी थी और एक टक दरवाजे को घुरे जा रही थी....



मम्मी से उनकी ये हालत बर्दास्त नाही हुई और वो उनके गालो पर चान्टे मारने लग जाती है लेकिन शायद चान्टो का दर्द कुछ भी नही था उनके दिल में दबे उस दर्द के आगे...



में मम्मी को इस तरह से मारता देख भाभी से लिपट जाता हूँ...और मम्मी को उन्हे मारने से मना करता हूँ.



मम्मी--जय तू हट जा यहाँ से...इसका रोना बहुत ज़रूरी है वरना ये ऐसे ही पागल हो जाएगी...



में--मम्मी आप लोग यहाँ से जाओ में भाभी को होश में लाने की कोशिश करता हूँ...आप मुझ पर भरोसा रखो में इन्हे किसी भी कीमत पर होश में ले आउन्गा...



मम्मी--बेटा अब तू ही कुछ कर इसका होश में आना बहुत ज़रूरी है...



उसके बाद वो लोग वहाँ से चले जाते है...



में भाभी से कहता हूँ..



में--भाभी आपको याद है उस दिन जब आपने मुझे नदी पर किस किया था तो उसके बाद आपने क्या कहा था....


आपने कहा था में तेरे भैया से अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करती हूँ...

आपका वो प्यार मर गया है उठो और होश में आओ ....

मर चुका है आपका वो प्यार जो आपको आपको जान से भी प्यारा था....

मर चुका है आपकी माँग का सिंदूर....

तोड़ डालो अपने हाथ की ये चूड़िया...(मैने भाभी की चूड़िया अपने हाथो से दबाकर तोड़ दी)


तोड़ डालो ये मंगलसूत्र जिसकी याद में आपने पहन रखा है...


मैने जैसे ही भाभी के मंगलसूत्र की तरफ़ अपना हाथ बढ़ाया .....टदाअक्कक ......एक ज़ोर दार थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ गया...



भाभी--हा .....हा....हा..... मर चुका है मेरा प्यार मर चुका है मेरी माँग का सिंदूर....लेकिन मेरे मंगलसूत्र को हाथ मत लगाना कभी भी वारना में जान ले लूँगी तेरी...


और इसी के साथ वो फूट फूट कर रोने लगती है उनका रोने की आवाज़ इतनी तेज थी कि घर की दीवारे भी थर्रा उठी थी उनको रोता हुआ देख कर मैने उनको अपनी बाहो में भर लिया...तब तक मम्मी भी भाभी के रोने की आवाज़ सुनकर रूम में आ चुकी थी......


भाभी को मम्मी के साथ छोड़कर में रूम से बाहर निकल जाता हूँ...



बाहर नीरा और उसके साथ 2 और लड़किया खड़ी थी ...नीरा मुझे देखते ही मेरे गले से लिपट गयी...



नीरा--भैया अगर आज आप ना होते तो पता नही भाभी कैसे अपने दर्द से बाहर आती ....



में--नीरा रूही कहाँ है...और ये दोनो लड़किया कौन है जो तेरे साथ खड़ी है...




नीरा--भैया ये चाचा जी की लड़कियाँ है हमारी बहने है. बड़ी वाली दीदी दीक्षा और छोटी का नाम कोमल है....और जो वहाँ ब्लू साड़ी में आंटी बैठी है वो हमारी सग़ी चाची है....आपके यहाँ आने से थोड़ी ही देर पहले ये सब यहाँ आए थे...और रूही दीदी शायद किचन में है.....



में --अच्छा तू इन सब का ख्याल रख में रूही से मिलकर आता हूँ .,,,




में किचन में पहुँच कर देखता हूँ रूही खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश का रही थी....पता नही कैसे वो अपनी आँखो से आँसू बहने से रोक पा रही थी...में लगातार उसको वहाँ काम करते हुए देख रहा था....लेकिन उसने मुझे देख कर भी अनदेखा कर दिया....



लेकिन जब में काफ़ी देर तक ऐसे ही उसे देखता रहा तो वो सारे काम छोड़कर भागती हुई मेरे गले से लग गयी और रोना शुरू कर दिया....


रूही--भैया ये कैसी विपदा आ गयी इस घर पर...क्या हो गया ये सब...और आप भी अकेले ही इस तूफान का सामना करने निकल पड़े...कम से कम मुझे तो बता देते भैया.....




में--रूही अपने आप को संभाल सब ठीक हो जाएगा...अब हम लोगो को ही इस घर को फिर से हँसता खेलता घर बनाना है...



उसके बाद में रूही के आँसू पोछ कर उसके माथे पर एक किस कर देता हूँ तभी वहाँ कोमल और दीक्षा भी आजाती है और एक तरफ खड़ी हो जाती है हम दोनो का एक दूसरे के प्रति प्यार देख कर उनकी रुलाई फूट जाती है...में उन दोनो की तरफ़ अपनी बाहे फैला देता हूँ और वो दोनो किसी मासूम बच्ची की तरह मुझ से लिपट जाती है...



दीक्षा--भैया हम दोनो बहने हमेशा एक भाई के प्यार के लिए तरसती रही...हमे तो ये पता ही नही था कि हमारा कोई भाई भी है...और में अपने भाई से मिली भी तो ऐसे समय जब वो खुद टूटा हुआ है...



में--मेरी बहना अगर मुझे पता होता कि मेरी और भी कोई बहन है तो में कब का तुम लोगो से मिल चुका होता....तुम लोगो ने कुछ खाया या अभी तक बिना खाए पिए ही हो...



कोमल--भैया हम लोगो को अभी भूक नही लगी है लेकिन आपको देख कर लगता है आपने काफ़ी दिनो से कुछ नही खाया है...




में--नही कोमल मुझे भी भूक नही है...अब में थोड़ा काम कर लेता हूँ चाचा जी अकेले कितना काम संभालेंगे.

और ये कह कर में वहाँ से बाहर निकल जाता हूँ....बाहर मुझे चाचा जी भी मिल जाते है




चाचा--बेटा अब हम लोगो को थोड़ा जल्दी करना पड़ेगा पंडित जी भी आ गये है और अंतिम यात्रा के लिए अर्थी भी तैयार हो चुकी है...अब तुम ही इस घर के बड़े बेटे हो इसलिए तुम्हे ही इजाज़त देनी होगी किशोर और राज की अंतिम यात्रा के लिए...



में--चाचा जी इस घर के बड़े आप है में तो आपके नाख़ून के बराबर भी नही हूँ...आप जैसा उचित समझे वेसा करे...मुझे आप बस ये बता दीजिए कि मुझे क्या करना है...



चाचा--बेटा तुम्हारी माँ और भाभी के पास भी जाकर इस अंतिम यात्रा के लिए इजाज़त ले लो...



में--चाचा में कैसे सामना कर पाउन्गा उन दोनो का ....कैसे मुझे वो इजाज़त दे देंगी .



चाचा--वो दोनो समझदार है उन्हे इस बात की पूरी समझ है...बस तू वहाँ जा और उनसे बात कर...




में फिर भाभी के रूम की तरफ़ चल देता हूँ और वहाँ मम्मी के सामने बैठ जाता हूँ...अपना सिर नीचे झुकाए हुए ...



में---मम्मी में आपसे और भाभी से ...पापा और भैया की अंतिम यात्रा की इजाज़त माँगने आया हूँ...



भाभी--लेजाओ राज को में नही रोकूंगी तुझे...मुझे मेरा राज हँसता बोलता हुआ पसंद था...मम्मी देखो ना कैसे रूठ गये है अब मुझ से बात भी नही कर रहे....कैसे जियूंगी में इनके बिना इन्होने ज़रा भी फिकर नही करी मेरी....सब कुछ ख्तम हो गया लेजा जय इस लाश को मेरी आँखो के सामने से...



मम्मी--जय बेटा जो होना था वो हो गया अब हम तेरे पापा और भाई की अंतिम यात्रा में बाधक बनके उनकी आत्मा को शांति नही दे सकते...इसीलिए जैसा परंपरा कहती है सारे काम वैसे ही होंगे...ले जा तू में इजाज़त देती हूँ...




उसके बाद मैने बाहर आकर चाचा जी को इजाज़त दे दी...चाचा जी और कॉलोनी के कुछ अनुभवी लोगो ने आर्थिया पहले ही बाँध दी थी फिर ...पूरे विधि विधान के हिसाब से अंतिम यात्रा शुरू हो गयी....उस समय घर में एक कोलाहल मच चुका था माँ और भाभी किसी के संभाले नही सम्भल रही थी और में अपने दोनो कंधो पर अपने भाई और अपने पापा की आर्थियो को ढो रहा था.....


हम वापस घर आ गये थे अंतिम संस्कार करके.

में अब एकांत चाहता था...मैने चाचा से बात करी.



में--चाचा जी में थोड़ी देर बाहर जाना चाहता हूँ ...क्या अभी मेरी कोई ज़रूरत है यहाँ.



चाचा--बेटा वैसे तो कोई काम नही है लेकिन पहले कुछ खा ले फिर चले जाना .



में--चाचा जी भूक नही है मुझे...में वापस आकर कुछ खा लूँगा.



उसके बाद मैने अपनी कार बाहर निकाली और आगे बढ़ गया....में लगातार कार चलाए जा रहा था..तभी मुझे एक दुकान दिखी जिस पर लिखा था इंग्लीश वाइन शॉप...


मैने अपनी कार वहाँ रोकी और शॉप की तरफ़ आगे बढ़ गया ...मुझे नही पता था कौनसी शराब कैसी होती है ....मैने बस इन दो तीन दिनो में ही पी थी आज तक उस से पहले कभी नही...हाँ पापा को ज़रूर पीते हुए देखा था एक दो बार....पापा कौनसी शराब पीते थे ये मुझे याद नही आ रहा था...बस उसका कलर याद था कुछ रेड रेड सा...और बोतल का डिज़ाइन याद था...



दुकान पर जाकर....



में--भैया शराब की बोतल चाहिए...



दुकानदार--कौनसी बोतल चाहिए सर आपको...




में--भैया वो जिस में रेड कलर की शराब आती है और जिसकी बीटल थोड़ी मोटी और चौकोर होती है...



दुकानदार--सर आपको उसका नाम नही पता है क्या...



में--नही भैया बस इतना ही पता है .....और हाँ उसकी बोतल पर एक खुरदूरी सी उभरी हुई डिज़ाइन बनी होती है जैसे कोई पत्थर की दीवार हो...





तभी उसका एक साथी दुकान दार बोल पड़ता है....ये ओल्ड मॉंक की बोतल माँग रहा है इसको वो दे दे...

लेकिन वो दुकानदार दूसरे वाले को बोलता है ये बीएमडब्ल्यू कार लेकर आया है ये ओल्ड मॉंक कैसे झेलेगा...


दूसरा दुकानदार--तू इसको एक बार ओल्ड मॉंक की बोतल निकाल कर तो दिखा हो सकता है ये उसे पहचान जाए.



वो दोनो आपस में जिस भाषा में बात कर रहे थे वो एक आदिवासी भाषा थी जो नोर्मली बांसवाड़ा और डूंगरपुर आँचल के लोग बोला करते थे इस भाषा को बागड़ी कहा जाता है जोकि मुझे समझ में नही आती...


दुकानदार मुझे एक बोतल निकाल कर देता है और बोलता है सर इसी बोतल के बारे में बात कर रहे हो क्या आप...



में वो बोतल देखते ही पहचान जाता हूँ ...



में--हाँ भैया यही वाली ....कितने पैसे दूं...



दुकानदार--भैया 310 र्स...



में--कितने...310र्स...बस



इन दिनो जो मैने शराब पी थी उसका एक पेग 2000 से कम का नही था और 310 रुपये की बात ने मुझे सचमुच चौका दिया था...



मैने दुकानदार को वो पैसे दे दिए और उसने खुले पैसे के बदले मुझे एक ग्लास और पानी की बोतल और एक नमकीन का पाउच पकड़ा दिया...



में--भैया ये अच्छी तो है ना



दुकानदार--ये सिर्फ़ मजबूत दिल वालो के लिए है...इसको अधिकतर आर्मी वाले ही यूज़ करते है...


उसके बाद में वहाँ से निकल कर अपनी कार के पास पहुँच गया और बोतल को और सारे सामान को मेरी बगल वाली सीट पर रख दिया...



कार में बैठ के सब से पहले उस पानी की बोतल को खोल कर उसमें से थोड़ा पानी पिया और फिर इस शराब की बोतल को उठा कर देखने लग गया...फिर उसका ढक्कन खोल कर साथ में लाए हुए ग्लास में आधा भर देता हूँ और उपर से थोड़ा सा पानी मिला देता हूँ...




पहला सीप लेते ही मेरे पूरे बदन में झुरजुरी आ जाती है...में उस में थोड़ा पानी और मिला देता हूँ...और फिर पीने लगता हूँ अब उसका टेस्ट मुझे थोड़ा मीठा मीठा लग रहा था. उसके बाद में वो ग्लास ख्तम करके कार आगे बढ़ा देता हूँ....में काफ़ी आगे निकल कर एक गाँव को क्रॉस करता हुआ एक तालाब के किनारे पहुँच जाता हूँ अंधेरा हो चुका था लेकिन चाँद की चाँदनी में वो झील चमक रही होती है.


सामने हरे भरे पहाड़ इस हल्के से उजाले में बिल्कुल सॉफ दिखाई दे रहे थे...में अपनी गाड़ी वही लगा देता हूँ और कार के बोनट पर बैठ कर ग्लास में शराब भरने लग जाता हूँ...तभी एक ग्रामीण वहाँ पहुँच कर मुझे बोलता है....बेटा यहाँ ज़्यादा देर मत रहना यहाँ पानी पीने के लिए पन्थेर आते रहते है...इस लिए जल्दी ही यहाँ से निकल जाना......


में उस ग्रामीण की बातो से घबराया नही क्योकि अगर कोई बाहर का आदमी होता तो तुरंत वहाँ से चला जाता....उसने सच बोला था वहाँ पेंथर्स आते है लेकिन वो इंसानो पर आम तौर पर हमला नही करते...



में कार के बोनट पर बैठा बैठा शराब पीने लग गया .....और सोचता जा रहा था अब कैसे क्या करना है....कैसे इस परिवार को संभालना है...लेकिन मुझे कोई रास्ता दिखाई नही दे रहा था...तभी मेरे मन में पता नही क्यो सुहानी की याद आ गयी...मैने तुरंत उसे फोन लगा दिया...



सुहानी--हेलो सर कैसे है आप अब...



में--सुहानी में ठीक हूँ लेकिन किन्ही बातो से थोड़ा परेशान भी हूँ...




सुहानी--सर आपकी आवाज़ से ऐसा लग रहा है जैसे आपने काफ़ी ड्रिंक कर ली है....




में--तुमने सही पहचाना सुहानी ....मैने आज काफ़ी ड्रिंक कर ली है...



सुहानी--ठीक है सर पी लीजिए लेकिन अपने होश में रहो तब तक ही पीना...क्योकि आपको इस हाल में देख कर आपके घर वाले दुखी हो जाएँगे...



में--सुहानी मुझे कुछ समझ नही आ रहा में अब क्या करूँ....कैसे अपने परिवार को खुश रखू...कैसे उन लोगो के चेहरो पर मुस्कुराहट फिर से ले आउ...



सुहानी--जवाब बड़ा सिंपल है सर....सब से पहले आपको खुश रहना सीखना होगा उसके बाद ही आप किसी को खुश रख सकते है...



में सुहानी की इस बात से प्रभावित हुए बिना नही रह सका ...



में--सुहानी तुमने बिल्कुल ठीक कहा अब से में खुद को पूरी तरह से बदल लूँगा....



सुहानी--सर आपको बदलने की कोई ज़रूरत नही है...आपको आपके परिवार वाले इसी रूप में पसंद करते है...खुद को बदल लेने से आप उनको और दुख पहुचाओगे...



में--सुहानी तुम्हारी इन्ही बातो के कारण मैने तुम्हे फोन लगा दिया...तुम मेरे सारे सवालो का जवाब बड़ी आसानी से दे देती हो....



सुहानी--ठीक है सर आप अपना ख्याल रखिए मेरा भाई और बहन आने ही वाले है में उनके लिए कुछ बना रही थी....



में--लेकिन तुमने तो बताया था कि तुम्हारा बस छोटा भाई है...



सुहानी--मेरे पापा ने दो शादिया करी थी उनकी दूसरी शादी से उनको एक बेटी भी थी...लेकिन उस दुर्घटना में पापा और उनकी दूसरी वाइफ की डॅत हो गयी थी और रीना बच गयी थी...




में--क्या नाम लिया तुनने रीना???



सुहानी--हाँ सर क्या आप उसे जानते है....




में--कल ही एक रीना से मिला था जो एर होस्टेस्स थी...वो बिल्कुल तुम्हारी तरह बाते किया करती है....




सुहानी--सर आप उसी रीना से मिले थे जो मेरी बहन है में आपको बताना भूल गयी थी जिस फ्लाइट से आप जा रहे थे उसकी जानकारी मैने रीना से ही ली थी...



में--देखो ना सुहानी ये दुनिया भी कितनी अजीब है जब भी मुझे किसी की ज़रूरत पड़ी तुम किसी ना किसी रूप में मुझे सम्भालने के लिए मिल ही गयी....पहले रिजोर्ट में...फिर फ्लाइट में...और अब फोन पर...पता नही तुम्हारा ये क़र्ज़ में कैसे चुका पाउन्गा....रीना आए तो उसको मेरी तरफ़ से शुक्रिया कहना क्योकि में उसको कुछ बोल भी नही पाया...



सुहानी--सर आप अपना ध्यान रखिए और आप जहाँ भी है वहाँ से घर जाइए आप का वेट कर रहे होंगे सभी...

और उसके बाद सुहानी ने दुबारा कॉल करने का बोलकर फोन काट दिया.



मैने अपने हाथ में रखा हुआ ग्लास एक साँस में ख्तम किया.


वो बोतल अब ख्तम हो गयी थी में उस बोतल को हाथ में लेकर देख ही रहा था के मेरी नज़र मुझ से कुछ ही दूर खड़े एक पेंथर से टकरा गयी.


उसकी आँखे किसी छोटे बल्ब की तरह चमक रही थी मैने हाथ में पकड़ी हुई बोतल उसके उपर फेकि और फुर्ती से कार का दरवाजा खोल कर कार के अंदर घुस गया.,.,,,


में वहाँ से अपनी कार लेकर तुरंत निकल गया ....पेंथर को देखते ही मेरा नशा काफूर हो गया था...में अब सीधा घर आ चुका था वहाँ सब लोग मेरा ही वेट कर रहे थे....मम्मी और भाभी बस वहाँ नही थी वो लोग शायद अपने रूम में थे ....नीरा आते ही मुझ से लिपट गयी....



नीरा--भैया आप कहाँ चले गये थे....हम लोग कब से आपका वेट कर रहे थे.

भैया आपने........


शायद नीरा को मुझ में से शराब की स्मेल आ गयी थी...



नीरा--भैया आप अपने रूम में चलिए में आपके लिए कुछ खाने के लिए वही ले आती हूँ....



में--मैने धीरे से कहा--नीरा मुझे भूक नही है...



नीरा--पहले आप रूम में चलिए उसके बाद बात करते है...



वहाँ बैठे सभी लोग बस हम दोनो को ही देखे जा रहे थे और समझने की कोशिश कर रहे थे कि क्या हो रहा है...



में अपने रूम में चला गया और अपने कपड़े खोल कर एक बारमोडा डाल कर बिस्तर पर लेट गया.



थोड़ी देर बाद नीरा आ गयी वो अपने साथ खाना लेकर आई थी...



मुझे उठाते हुए...



नीरा--भैया पहले कुछ खा लो फिर सो जाना..



में--नीरा मुझे भूक नही है...तू मुझे यहाँ सोने दे..


नीरा--भैया प्ल्ज़ कुछ खा लो आपको मेरी कसम है...देखो आपका इंतजार करते करते मैने भी कुछ नही खाया....



नीरा की ये बात सुनकर में तुरंत बेड पर बैठ गया...



में--तूने अभी तक क्यो कुछ नही खाया... मेरा इंतजार क्यो कर रही थी तू...



नीरा--मुझे बड़ी घबराहट हो रही थी भैया आप जब काफ़ी देर तक नही आए...



में--चल अब खाना लगा हम दोनो साथ में खाएँगे...



नीरा--भैया आप कभी भी मुझे ऐसे छोड़कर मत जाया करो...



में --नही जाउन्गा अब कभी भी तुझ से दूर....चल अब खाना लगा ....



फिर हम दोनो खाना खाने लगते है ....में नीरा को अपने हाथो से खाना खिला रहा थे..... और नीरा मुझे अपने हाथो से....



थोड़ी देर में हम लोग खाना खा चुके थे...और नीरा खाली प्लॅट्स उठा कर ले गयी...


उधर किचन में रूही नीरा से बोलती है...



रूही--नीरा तू कोमल के साथ तेरे रूम में सो जाना ....दीक्षा और चाची मेरे रूम में सो रहे है...और चाचा जी बाहर वाले हॉल में...



नीरा--दीदी आप कहाँ सोने वाली हो...



रूही--में जय के रूम में सो जाउन्गि...चल अब जल्दी जल्दी सारा काम निपटा लेते है...



नीरा को रूही की ये बात बड़ी अटपटी लगती है...क्योकि उसने जो रिजोर्ट में देखा था उस से उसका विश्वास पूरी तरह से रूही से टूट गया था....



नीरा--दीदी आप भी हम लोगो के साथ ही सो जाना ....भैया को क्यो परेशान करती हो .....



रूही--नीरा मुझ से बहस मत कर....जो मैने कह दिया उसको मान...



और उसके बाद रूही वहाँ से बाहर चली जाती है...



नीरा को अब ये डर सता रहा था कि कहीं रूही .भैया के नशे में होने का फ़ायदा ना उठा ले...लेकिन नीरा इस हालत में कुछ कर भी नही सकती थी. वो अपना मन मसोस कर किचन सॉफ करने लग जाती है.......


कोमल और नीरा कमरे में आ चुके थे कुछ देर उन्होने इधर उधर की बाते करी और फिर कोमल को नींद आ गयी...शायद सारे दिन की थकान वो बच्ची ज़्यादा देर बर्दाश्त नही कर सकी...



लेकिन नीरा की आँखो में नींद नही थी...


उसे बस एक ही डर सता रहा था कहीं रूही भैया के साथ कुछ ग़लत ना कर दे...



और फिर वो इन सवालो के झन्झावटो से खुद को ज़्यादा देर रोक नही पाई और भैया के रूम...की तरफ बढ़ गयी....



इस घर में अभी एक शक्श और जाग रहा था जो अपनी पुरानी यादों में खोया हुआ था...वो शक्श थी रजनी....



रजनी पुरानी बातो के बारे में सोचे जा रही थी जब वो शादी करके अपने घर आई थी तब वो किशोर के बारे में जानती तक नही थी...एक दिन जब वो किसी काम से उदयपुर आए हुए थे तब जाकर किशोर से मुलाकात हुई थी...रजनी को उस समय 4 साल होगये थे शादी करे हुए...लेकिन अभी तक उसकी गोद हरी नही हुई थी....


जब रजनी ने पहली बार किशोर को देखा था वो उसी वक़्त उस पर आसक्त हो गयी थी....उसे बस हर समय किशोर ही नज़र आता था...रजत वैसे तो सेक्स में ठीक था लेकिन रजनी को बच्चा चाहिए था हर कीमत पर....


वो अपने मायके जाने के बहाने से किशोर से मिलने लगी....और पहली बार मिलने के बाद हे कुछ दिनो बाद उसकी गोद हरी हो गयी थी...


पहली लड़की हुई जिसका नाम दीक्षा रखा गया....लेकिन रजनी को एक बेटा भी चाहिए था वो कुछ साल सबर रख कर .....फिर से किशोर से मिलने लगी उसको किसी बात से मतलब नही था ....बस उसको एक लड़का चाहिए था...



जब दूसरी भी लड़की ही पैदा हुई जिसका नाम कोमल रखा गया तो एक दिन रजनी ने किशोर को फोन किया. और जैसलमेर मिलने के लिए बुला लिया...




किशौर--क्या हुआ रजनी...तुमने मुझे इतनी जल्दी में क्यो बुलाया है...



रजनी--गुस्से से किशोर का गिरेबान पकड़ लेती है....मैने तुमसे बेटा माँगा था. और तुमने मेरी गोद बेटियों से भर दी...



किशौर--ये क्या गँवारों की तरह बेटा बेटा लगा रखा है...जमाना बदल गया है रजनी आज बेटियाँ भी बेटो के बराबर हक़ रखती है...



रजनी--में वो सब नही जानती मुझे एक बेटा चाहिए...



किशौर --रजनी ज़िद्द मत कर ....मेरे कह देने और तेरे माँग लेने से बेटा कोई आसमान से नही टपक पड़ेगा जो मिला है...उस से संतोष कर...



रजनी--गुस्से से चिल्ला कर.... तो फिर ठीक है मिस्टर. किशोर गुप्ता...तूने मुझे बेटा नही दिया...

ठीक है अब से में मेरी बेटियों को बेटा बना कर ही पालूंगी....

तूने मेरी लाचारी का फ़ायदा उठाया...तू मेरे जिस्मा को नोचता रहा...

और मेने बेटा पाने के चक्कर में तुझे अपना सब कुछ दे दिया...


तेरी कसम...किशोर गुप्ता तेरे खानदान में ऐसी आग लगाउन्गी जो बुझाने से भी नही बुझेगी...


ये ख्याल आते ही...रजनी उठ के बैठ जाती है...



रजनी--है भगवान ये कैसी कसम खा ली थी मैने उस वक़्त... में कैसे भूल गयी जिस आदमी के परिवार को बर्बाद करने की मैने कसम खाई थी... उसी की वजह से मेरा परिवार आज आबाद है...

उसी के कारण मेरी गोद भरी...और मेने उसी को तबाह करने की कसम कैसे खा ली...मेरा दिल जानता है मैने कभी किशोर और उसके परिवार का कभी बुरा नही चाहा.... बस उस दिन पता नही बेटे की चाह में क्या क्या बोल गयी...है भगवान मुझे माफ़ करना....



और उसके बाद रजनी अपनी आँखे बंद कर के सो जाती है....



उधर नीरा जय के रूम के बाहर खड़ी थी...



उसके मन में आने वाला पल एक भयानक सपने की तरह लग रहा था .


वो खुद को दौराहे पर खड़ा महसूस कर रही थी....तभी अचानक वो कुछ निश्चय करके दरवाजा खोल देती है....



और जो वो देखती है उसकी आँखो में से झार झार आँसू बहने लगते है...



सामने बेड पर रूही और जय बिल्कुल आराम से सो रहे थे...


नीरा के मन का बोझ अब हल्का होने लगा था...वो जय की तरफ़ बढ़ जाती है जय का मासूम चेहरा देख कर उसका मन उस चेहरे को चूमने का करता है लेकिन शायद ये सही वक़्त नही था...फिर वो रूही की तरफ़ देखती है...रूही इस समय किसी मासूम बच्ची की तरह...एक टेडी बियर अपनी बाहो में भर कर सो रही थी...नीरा कुछ पल जय और रूही को निहारती है...और अपने रूम में वापस आकर सो जाती है.....


अब उसके मन में कोई ग़लत फ़हमी नही थी अपनी प्यारी बहन रूही के लिए....और मेरे रीडर्स से भी निवेदन है रजनी के लिए भी आप वही प्यार अपने मन में ले आए जो नीरा के मन में जय के प्रति है.....

एक बार फिर सूरज अपने प्रकाश से रात के घने अंधेरे को भगा देता है...

यही तो प्रकृति का नियम है...जहा प्रकृति अंधेरा फैलाती है...वही उसे दूर भी करती है...

इसी तरह जीवन में सुख और दुख निरंतर चलते रहते है....

उसी तरह जैसे सर्दी के बाद बसंत..बसंत के बाद पतझढ़..पतझड़ के बाद सावन ....जो . अपने चक्र में गतिमान रहते है...

इनको देखने वालो के लिए ये बस मौसम है...लेकिन महसूस करने वाले के लिए ज़िंदगी.....


सवेरे सवेरे....



भैया उठो सवेरा हो गया है आज काफ़ी काम करने है ....जल्दी उठो भैया.,.



ये आवाज़ में पहचानता था लेकिन ये आवाज़ वो नही थी जो मुझे रोज़ सवेरे नींद में से जगा देती थी ...ये आवाज़ नीरा की थी...



में--क्या हुआ नीरा आज तू मुझ से पहले उठ गयी...



नीरा--हाँ उठ गयी और आपको उठाने भी आ गई...जैसे आपके उपर पूरे परिवार को संभालने की ज़िम्मेदारी है...वैसे ही मैने भी आपको संभालने की ज़िम्मेदारी ले ली है...



में--क्या बात है...तू अपने छोटे छोटे कंधो पर मुझे उठा लेगी...



नीरा--हाँ में आपको उठा भी लूँगी और ज़्यादा मुँह खोला तो नीचे पटक भी दूँगी चलो अब जल्दी से फ्रेश हो जाओ पंडित जी आने वाले है...



उसके बाद नीरा वहाँ से चली जाती है..


मुझे ऐसा लग रहा था जैसे इस घर पे जो दुख के बादल छा गये थे...वो अब दूर हो गये है ...सब कुछ बिल्कुल नौरमल सा लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही ना हो...


में उठ कर नहा धो कर बाहर हॉल में आजाता हूँ वहाँ चाचा जी अख़बार पढ़ रहे थे...



मैने जाते ही उनके पेर छुए...और उन्होने भी स्नेह से मेरे सिर पर हाथ रख कर कहा ...



चाचा...बेटा आज हम लोगो को तीसरे की बैठक करनी है और दिन में जाकर अस्थिया भी लेकर आनी है...उसके बाद में और तेरी चाची और रूही हम तीनो अस्थिया लेकर हरिद्वार के लिए निकल जाएँगे...



में--जैसा आप ठीक समझो चाचा जी.,,पता नही अगर आप यहाँ ना होते तो में कैसे ये सब ज़िम्मेदारियाँ उठा पता ...



चाचा--बेटा मेरे होने या ना होने से कोई फ़र्क नही पड़ता...ये सब काम अपने आप आजाते है इनको सीखना नही पड़ता ...ये बिल्कुल उसी तरह है जैसे एक बछड़े को उसकी माँ का दूध पीना सीखना नही पड़ता... वो अपने आप ही उस जगह को ढूँढ लेता है जहा से उसकी भूक मिट सकती हो...



में--आप बिल्कुल पापा की तरह बात करते है चाचा जी...



चाचा--अब ये सारी बाते छोड़ और लग जा काम पर...बाज़ार से में एक लिस्ट दे रहा हूँ वो सामान जाकर ले आ और बाजार जाने से पहले तेरी मम्मी और भाभी से मिलकर जाना..



मम्मी और भाभी का नाम सुनते ही मेरे माथे पर चिंता की लकीरे उभर आई...जिसे चाचा जी ने तुरंत पहचान लिया.



चाचा--बेटा तू उन दोनो से छुप नही सकता उनसे छुप कर तू उन्हे और अकेला कर रहा है

अपनी सारी चिन्ताओ को छोड़ और उन्हे वापस इस संसार में लाने की कोशिश कर...



उसके बाद में मम्मी के रूम में चला गया वहाँ चाची भी बैठी हुई थी...



मम्मी मुझे बड़ी आस भरी नज़रो से देख रही थी....शायद वो कुछ कहना चाहती थी मुझ से ....शायद कुछ ऐसा कहना चाहती थी जो में सह ना सकूँ....शायद एक और तूफान मेरे दिल के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था.....,




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