Maa ke prati aakarshan

 आकर्षण - अध्याय १: मिट्टी की गंध


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प्रस्तावना


सुबह की पहली किरण जब धरती को चूमती है, तो मिट्टी से एक अजीब सी खुशबू आती है। यह खुशबू बताती है कि आज का दिन नया है, ताज़ा है, और कुछ अनकहा लिए हुए है। मेरा नाम अर्जुन है, और मैं इसी मिट्टी की खुशबू के बीच पला-बढ़ा हूँ। यह कहानी है मेरे गाँव की, मेरी माँ की, और उस रहस्यमयी लड़की की जिसने मेरी दुनिया को पूरी तरह बदल कर रख दिया।


मेरे घर में सिर्फ दो लोग हैं - मैं और मेरी माँ राधा। पिताजी का साया इस घर से बहुत पहले उठ गया था, जब मैं महज़ पाँच साल का था। माँ ने उस दिन से कभी शिकायत नहीं की, कभी अपनी आँखों में आँसू नहीं आने दिए। वह 36 साल की हैं, लेकिन उनके चेहरे पर मुस्कान ऐसी है जैसे उम्र ने उन्हें कभी छुआ ही न हो। लेकिन मैं जानता हूँ - माँ की हँसी के पीछे कितनी रातें बिना सोए बीती हैं, कितने सपने उन्होंने मेरे लिए दफनाए हैं।


मेरा गाँव - नाम तो बहुत छोटा है, नक्शे पर कोई पहचान नहीं, लेकिन जो लोग यहाँ रहते हैं, उनके दिलों में यह गाँव पूरी दुनिया के बराबर है। यहाँ के लोग एक-दूसरे को जानते हैं, एक-दूसरे की मुश्किलें जानते हैं, एक-दूसरे की खुशियाँ जानते हैं। कच्चे घर, पक्के रिश्ते - यही हमारी पहचान है।


और इसी गाँव में मिली थी मुझे वह लड़की... जिसने मेरी साँसों में एक नई लय भर दी। जिसके बारे में सोचते ही मेरा दिल धड़कने लगता है। जिसे देखते ही मुझे लगता है कि शायद इसी का नाम है... आकर्षण।


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भाग १: सुबह की चाय


"अर्जुन! उठ जा बेटा, सुबह हो गई!"


माँ की आवाज़ सुनते ही मेरी आँखें खुल गईं। बाहर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, और खिड़की से आती पीली धूप कमरे में सोने की तरह बिखर रही थी। मैंने करवट बदली और तकिए को गले लगा लिया। आज सोमवार था - ना तो कोई स्कूल था, ना कोई काम। बस एक आम-सा दिन।


"अर्जुन, सुन रहा है या नहीं? चाय ठंडी हो रही है!"


माँ की आवाज़ में वही प्यार भरी झिड़की थी जो मुझे बचपन से सुनाई देती है। मैंने आँखें मलीं और बिस्तर से उठ बैठा। कमरे की दीवारें पुरानी थीं, कुछ जगहों से प्लास्टर उतर चुका था, लेकिन माँ ने हर कोने को इतनी सफाई से सजाया था कि वो खूबसूरत लगते थे। दीवार पर मेरी बचपन की तस्वीरें टंगी थीं - जिनमें मैं अपने पिताजी के कंधों पर बैठा मुस्कुरा रहा हूँ।


मैंने कुर्ता पहना और बाहर निकला। गाँव की ठंडी हवा ने मुझे घेर लिया। हमारा घर गाँव के मुख्य चौराहे से कुछ दूर था, बागों के बीच। सामने आम के पेड़ों की लंबी कतारें थीं जिनमें छोटे-छोटे आम लटक रहे थे। नीचे घास पर ओस की बूंदें चमक रही थीं।


माँ रसोई में थीं। उन्होंने चूल्हे पर चाय बनाई थी, और उसकी सुगंध पूरे घर में फैल रही थी। उनका लाल सा ब्लाउज़, साड़ी का पल्लू सर पर, और चेहरे पर वही प्यारी मुस्कान - जैसे हर सुबह उन्हें पहली बार खुशी मिली हो।


"आ जा, बैठ," माँ ने कहा, "तुझे देखकर लगता है आज तू कहीं दूर सोच रहा है।"


मैं मुस्कुराया और उनके सामने बैठ गया। माँ ने चाय का गरम कप मेरी तरफ बढ़ाया। उनके हाथों की उंगलियाँ मोटी थीं, खेतों और रसोई में काम करते-करते कड़ी हो गई थीं, लेकिन स्पर्श अब भी वही कोमल था।


"कुछ खास नहीं माँ," मैंने चाय की चुस्की ली, "बस आज मन उदास सा है।"


"उदास क्यों?" माँ ने मेरी तरफ देखा, "इतनी सुबह-सुबह उदासी?" उन्होंने मेरे बालों को सहलाया, "पता है, जब तू छोटा था, तब भी अक्सर ऐसा कहता था - 'माँ, मन उदास है'। और मैं तुझसे कहती थी - 'अर्जुन, अगर मन उदास है तो उसे बाग में घुमा आ, पेड़ों से बातें कर, पक्षियों को देख, सब ठीक हो जाएगा'। जा, आज भी जा, कुछ देर बाग में बैठ।"


मैं माँ को देखता रहा। कैसे वह हर मुश्किल को इतनी सरलता से हल कर देती हैं। मैंने फिर से चाय पी और कहा, "माँ, क्या तुम्हें कभी ऐसा लगा है कि कोई बहुत खास है, लेकिन वो तुम्हें पहचानता नहीं?"


माँ ठहर गईं। उन्होंने चूल्हे पर रखी कड़छी को हिलाया और मुस्कुराईं, "तो अब तू बड़ा हो गया है - अब तेरे सपनों में कोई आने लगा है।" उन्होंने मुझ पर नज़र डाली, "बता, कौन है वो?"


"नहीं माँ, ऐसा कुछ नहीं," मैंने शर्माते हुए कहा, "बस यूँ ही..."


माँ ने गहरी साँस ली, "बेटा, जो भी है, समय बताएगा। और याद रखना, जो तुम्हारा है, वो तुमसे दूर नहीं जा सकता।"


उनकी बातों में कुछ ऐसा था जो मुझे शांति देता था। मैंने चाय खत्म की और उठकर बाहर की तरफ बढ़ा। बाहर सूरज थोड़ा और ऊपर चढ़ गया था। गाँव में आज मेला लगने वाला था - पूरे साल का सबसे बड़ा उत्सव। मकर संक्रांति के मौके पर यह मेला हर साल लगता है। हर तरफ रंग-बिरंगे कपड़े, खिलौने, चूड़ियों की दुकानें, झूलों का शोर - यह वही दिन था जिसका मुझे पूरे साल इंतज़ार रहता है।


लेकिन इस साल कुछ अलग था। इस साल मेले से एक खास वजह थी मेरे जाने की - वह लड़की जो पिछले महीने गाँव में आई थी, जो एक अनजानी सी मुस्कान लिए हर दिन मुझे परेशान करती थी। जिसका नाम मैं तक नहीं जानता था, लेकिन उसकी याद में मेरे सपने रचे जाते थे।


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भाग २: मेले की तैयारी


"अर्जुन! ये ले अपनी कमीज़, इस्त्री कर दी है!"


माँ की आवाज़ सुनकर मैं अंदर दौड़ा। कमरे में रखी पुरानी आलमारी के सामने माँ खड़ी थीं, एक साफ़ सफ़ेद कमीज़ लिए हुए। मुझे याद है, यह कमीज़ दो साल पहले माँ ने मुझे दी थी - मेरे जन्मदिन पर। उन्होंने कई दिनों तक बचत की थी कि बाज़ार से अच्छा सा कपड़ा ला सकें और सिलवा सकें।


"माँ, आज मेला है, मैं अकेला जाऊंगा। तुम क्यों नहीं चलतीं?"


माँ हँसी, "मुझे क्या करना है उस मेले में? मुझे तो घर में ही अच्छा लगता है। इसके अलावा, कल मेरे लिए आने वाले हैं, तैयारी भी करनी है।" उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, "तुम जाओ, मज़े करो। और हाँ, कोई ग़लत काम मत करना..."


"माँ," मैंने आँखें बड़ी कीं, "मैं क्या ग़लत कर सकता हूँ?"


"यही तो मुझे डर है," माँ मुस्कुराईं, "जब तुम्हारी उम्र होती है, तो अक्सर सही-ग़लत का फ़र्क धुंधला हो जाता है। बस ध्यान रखना, जिस पर भरोसा करो, ठीक से करो।"


मैंने कमीज़ पहनी और आईने में देखा। माँ ने मेरे बालों में तेल लगा दिया और उन्हें सँवार दिया। "बहुत सुंदर लग रहे हो," माँ ने कहा, "जैसे तुम्हारे पिताजी लगते थे, जब हमारी शादी हुई थी।"


मैं मुस्कुराया। पिताजी के बारे में सुनना हमेशा मुझे खास लगता था। माँ उनकी बातें करते हुए उसी युवा दुल्हन में बदल जाती थीं, जिसे कभी एक बाग के नीचे उनसे प्यार हुआ था।


"माँ, आज मिलते हैं," मैंने कहा और बाहर निकल गया। बाहर बाग में हवा चल रही थी, और मेरे साथ जैसे पूरा गाँव मुस्कुरा रहा था।


रास्ते में कई लोग मिले। चाचा सुखराम - जो पूरे गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति हैं, एक पेड़ के नीचे बैठे अपनी सिगरेट जलाते हुए मिले।


"अरे अर्जुन बेटा! आज तो मेले में जा रहे हो?" चाचा ने मुझे रोका, "कोई संदेशा हो तो बता देना - बाज़ार से कुछ लाना हो तो?"


"नहीं चाचा, बस ऐसे ही जा रहा हूँ," मैंने हाथ जोड़े, "आपका आशीर्वाद दें।"


चाचा ने हाथ उठाया और मेरे सिर पर रखा, "बेटा, जीवन में जो भी करना, दिल से करना। और अगर किसी से प्यार हो जाए, तो उसे बताना मत भूलना, क्योंकि ज़िंदगी में कुछ बातें कहने का समय ही सही नहीं आता।" उन्होंने मुझे आँख मारी, "समझ गया?"


मैं हैरान रह गया। क्या पता नहीं चाचा को सब मालूम है? मैंने हाथ जोड़ा और चल दिया।


मेला गाँव के उस पार खाली मैदान में लगता था। दूर से ही झूले, खिलौने, और मिठाई की दुकानों का शोर सुनाई दे रहा था। मुझे हमेशा से मेला पसंद था - ना इसलिए कि वहाँ बहुत कुछ खरीदने को होता, बल्कि वहाँ की वो रौनक, वो खुशियाँ, लोगों के चेहरों पर मुस्कान, यह सब मुझे अपनी दुनिया से दूर ले जाता था।


जैसे ही मैं मैदान में पहुंचा, मेरी नज़र सबसे पहले उसी रंगबिरंगे झूले पर पड़ी, जहाँ बच्चे चीख़ रहे थे। फिर दुकानें - मिट्टी के खिलौने, चमकदार चूड़ियाँ, रंगीन कपड़े, हर तरफ भीड़। बीच में एक छोटा सा मंच था, जहाँ नाच-गाना होता था।


मेरी आँखें हर तरफ उस लड़की को ढूंढ रही थीं। वह जो पिछले महीने गाँव में किसी रिश्तेदार के यहाँ आई थी। जिसे मैंने पहली बार नदी के किनारे देखा था, जब वह पानी में पैर डालकर बैठी थी, और गा रही थी। उसकी आवाज़ ऐसी थी - जैसे कोई देवी स्वर्ग से उतरी हो।


उस दिन मैंने उसे बस कुछ देर देखा, और फिर वह उठी, मुझे एक बार मुस्कुराई - वो मुस्कान जिसने मेरा दिल चुरा लिया। फिर वह चली गई। मुझे उसका नाम तक नहीं मालूम था, लेकिन वह मेरे दिमाग में बस गई थी। हर रात, सोने से पहले, मैं उस मुस्कान के बारे में सोचता था। माँ ने कहा था कि समय बताएगा, लेकिन मुझे इंतज़ार नहीं हो रहा था। मैं उसे आज मेले में देखना चाहता था। मुझे पता था कि वह आएगी। शायद यह मेरी उम्मीद थी, या शायद वाकई कोई अजब सा आकर्षण था जो मुझे उस तरफ खींच रहा था।


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भाग ३: मुलाकात


शाम हो चली थी। आसमान में नारंगी और गुलाबी रंगों की एक चित्रकारी हो गई थी। मेले की रोशनी जगमगा रही थी। मैं एक चाट की दुकान पर खड़ा था, जब मेरी नज़र अचानक उस पर पड़ी।


वही लड़की।


वह एक दुकान के सामने खड़ी थी, रंगीन चूड़ियाँ देख रही थी। सफेद कुर्ती, नीली जींस, बाल खुले हुए, और उसी मुस्कान के साथ। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। मैंने उसे घूरा, और जैसे ही उसने अपना सिर उठाया, हमारी नज़रें मिलीं।


वह मुझे देख कर मुस्कुराई। मैंने हिम्मत जुटाई, अपनी धड़कनों को काबू किया, और उसकी तरफ बढ़ा।


"नमस्ते," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ थोड़ी काँप रही थी, "मैं... मैं अर्जुन हूँ। आपको शायद मुझे याद न हो..."


वह मुस्कुराई, और उसकी आँखों में चमक थी, "नहीं, मैं तुम्हें याद हूँ। नदी के किनारे उस दिन... तुमने मुझे देखा था।"


मैं हैरान रह गया। उसे याद था! मैंने सोचा नहीं था कि उसे मेरी याद होगी।


"हाँ, वो दिन..." मैंने कहा, "मैं... मैं अक्सर नदी के किनारे बैठता हूँ। तुम्हारी आवाज़ सुनकर मन शांत हो गया था।"


उसने अपने बालों को हटाया और मुस्कुराई, "मेरा नाम सिया है। सिया।"


"सिया," मैंने धीरे से दोहराया, "बहुत सुंदर नाम है।"


"तुम्हारा भी," उसने कहा, "अर्जुन - जैसे महाभारत का वो बाणधारी।"


मैंने हँसते हुए कहा, "लेकिन बिना धनुष के।"


हम दोनों हँसे। थोड़ी देर के लिए मौन रहा, और फिर उसने पूछा, "तुम अकेले आए हो?"


"हाँ," मैंने कहा, "माँ ने कहा, घर में ही रहेंगी।"


"तुम्हारी माँ कहाँ हैं?" उसने पूछा।


"घर पर। बस हम दो ही हैं। पिताजी... नहीं रहे।"


उसकी आँखों में सहानुभूति झलकी, "मुझे खेद है।"


"कोई बात नहीं," मैंने मुस्कुराने की कोशिश की, "माँ ने सब कुछ सम्भाला।"


हम दोनों मेले में साथ-साथ घूमने लगे। उसने मुझे अपनी कहानी सुनाई - वह अपने दादा-दादी के साथ रहती थी, जो पास के शहर में थे, लेकिन गाँव में उसकी चाची भी रहती थीं, यहाँ वह कुछ महीनों के लिए आई थी।


"तुम्हें गाँव कैसा लगा?" मैंने पूछा।


"बहुत सुंदर," उसने कहा, "शहर में इतनी शांति नहीं है, इतनी खुली हवा नहीं है। यहाँ के लोग भी बहुत दोस्ताना हैं।"


हम झूले के पास पहुँचे। बच्चे मस्ती से झूल रहे थे, और उनकी खुशी की चीख़ें सुनाई दे रही थीं। सिया ने कहा, "मुझे बचपन में झूला बहुत पसंद था। अब तो यादें बन गई हैं।"


"क्यों न आज एक बार झूल लें?" मैंने पूछा, "मौजूदा दौर में नई यादें बना लें?"


सिया ने मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखा, और हम दोनों झूले की तरफ बढ़े। झूला गाँव के कुछ युवकों ने लगाया था - बड़ी लकड़ियों से बना हुआ, रंगीन रस्सियों से। जैसे हम दोनों झूले पर चढ़े, सिया चीखी, "अरे ये तो बहुत ऊँचा है!"


"डरो नहीं," मैंने कहा, और धीरे से झूला झुलाना शुरू किया, "मैं संभाल रहा हूँ।"


सिया की हँसी उस शाम की हवा में बिखर गई। वह आँखें बंद करके झूल रही थी, बाल हवा में उड़ रहे थे, और मुझे लगा - जैसे यह पल रुक जाना चाहिए, हमेशा के लिए।


कुछ देर बाद हम नीचे उतरे। सिया ने साँसें भरीं, "बहुत मज़ा आया। शुक्रिया।"


"इतनी छोटी सी बात पर शुक्रिया?" मैंने हँसते हुए कहा।


"हर छोटी बात बड़ी हो सकती है," उसने मुस्कुरा कर कहा।


हम फिर चल पड़े। दुकानों को देखते हुए, हमने एक मिठाई की दुकान पर रुक कर जलेबी खाई। सिया ने पहली बार गाँव की मिठाई का मज़ा लिया, और उसके चेहरे पर संतुष्टि की मुस्कान देखने लायक थी।


"तुम यहाँ कितने दिन और रहोगी?" मैंने पूछा, और मेरा दिल एक बार फिर ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा, क्योंकि उसके जवाब से मेरे सारे दिन बदल सकते थे।


"और दो महीने," उसने कहा, "फिर वापस शहर।"


दो महीने। मुझे पता था कि यह समय बहुत कम है। मैंने अपने मन में संकल्प किया कि इन दो महीनों को ऐसे बिताऊँगा कि सिया को यहाँ की यादें हमेशा के लिए दिल में रहें।


"सिया," मैंने धीरे से कहा, "क्या तुम... अगले हफ़्ते हमारे गाँव के बाग में चलोगी? वहाँ बहुत सुंदर जगह है। नदी के पास, पेड़ों के नीचे।"


सिया ने मेरी ओर देखा, और उसकी आँखों में कुछ चमक थी, "हाँ, क्यों नहीं। मुझे अच्छा लगेगा।"


उसके ये शब्द मेरे कानों में रस घोलकर गिरे। मेरे दिल ने एक उछाल भरी, और मुझे लगा जैसे सारी दुनिया खुशी से भर गई हो। मैंने उसे अगले हफ्ते शाम को मिलने का वादा किया।


जैसे ही रात ढली, मेला धीरे-धीरे खाली होने लगा। सिया ने कहा कि उसे अब जाना है। उसने मुझसे हाथ मिलाया, और उसका स्पर्श मेरी रगों में बिजली की तरह दौड़ा।


"शुक्रिया आज के लिए, अर्जुन," सिया ने कहा, "बहुत अच्छा दिन था।"


"फिर मिलेंगे," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में पूरी उम्मीद थी।


वह मुड़ी, चली गई, और मैं उसके जाते हुए को निहारता रहा। लाल कुर्ती, बिखरे बाल, और वह चाल जैसे कोई स्वप्न चल रहा हो।


जब वह पूरी तरह गायब हो गई, तो मैंने गहरी साँस ली। आज रात ने मुझे कुछ दिया था, जो मुझे कभी नहीं मिला था - एक उम्मीद, एक एहसास, और एक नाम: सिया।


मैं घर की तरफ चल दिया। रास्ते में चाँद अपनी पूरी चाँदनी बिखेर रहा था, और हवा में बागों की खुशबू घुल रही थी। मुझे लगा जैसे मैं सपनों की दुनिया में हूँ। आज की मुलाकात ने मेरी ज़िंदगी में एक नया रंग भर दिया था।


जब मैं घर पहुँचा, माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।


"इतनी देर?" माँ ने पूछा, मुस्कुराते हुए।


"माँ, आज कुछ खास हुआ," मैंने कहा, "मुझे कोई मिली।"


माँ की आँखें चमक उठीं, "कौन?"


"उसका नाम सिया है," मैंने कहा, "और मुझे लगता है... मुझे लगता है मैं उससे प्यार करने लगा हूँ।"


माँ चुप हो गईं। उन्होंने मुझे करीब से देखा, फिर धीरे से मेरे सिर पर हाथ रखा, "प्यार कोई बुरी चीज़ नहीं है, अर्जुन। लेकिन याद रखना, हर प्यार को एक रास्ता नहीं मिलता। देखना, जो होगा, अच्छे के लिए होगा।"


"माँ, तुम्हें डर नहीं लगता?"


"डर तो लगता है," माँ ने मुझे गले लगाया, "लेकिन जितना प्यार है, उससे ज़्यादा नहीं। अब अंदर चल, खाना ठंडा हो रहा है।"


मैं अंदर गया। खाना खाते हुए मैं आज की शाम के हर पल को दोहराता रहा। सिया की हँसी, उसकी आँखें, उसका स्पर्श - सब कुछ मेरे दिमाग में बस गया था।


रात को जब मैं बिस्तर पर लेटा, तो आसमान में चाँद को देखा। उसकी चाँदनी में मुझे सिया का चेहरा दिखा। मैं मुस्कुराया और आँखें बंद कर लीं।


"मिलेंगे, सिया," मैंने फुसफुसाया, "हफ़्ते में।"


और धीरे-धीरे नींद ने मुझे अपनी गोद में ले लिया, और मैंने एक सपना देखा - जहाँ हम दोनों नदी के किनारे बैठे थे, और सिया अपनी मधुर आवाज़ में गा रही थी। और मैं वहाँ बैठा, उसकी आवाज़ सुनता, और उसके चेहरे को देखता, जानता नहीं कि यह सपना है या हकीकत।


लेकिन हकीकत थी कि आज एक नया अध्याय शुरू हुआ था - आकर्षण का अध्याय।


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भाग ४: अगली सुबह


अगली सुबह जब मेरी आँखें खुलीं, तो पहली चीज़ जो मैंने सोची - 'सिया'। मैं मुस्कुराते हुए उठा। बाहर बारिश हो रही थी - बूँदें खिड़की पर धड़क रही थीं, और हवा ठंडी थी। माँ रसोई में थीं, चाय बना रही थीं।


मैं बाहर बरामदे में आया और बारिश को निहारने लगा। कच्ची मिट्टी की खुशबू, बागों की हरियाली, बारिश की बूँदों की संगीत - यह वह पल था जब दुनिया अपनी सबसे सुंदर रूप में होती है।


माँ ने चाय लाकर दी, "सोच में क्या डूबा है?"


"बारिश को देख रहा हूँ, माँ," मैंने कहा, "बहुत सुंदर है न?"


"हाँ, बहुत," माँ ने कहा, "लेकिन तू कुछ और सोच रहा है, मुझे पता है। वह लड़की?"


मैं शरमा गया, "हाँ माँ।"


"तो फिर बता, उसके बारे में क्या खास है?"


मैंने चाय पी, सोचा, और फिर कहा, "माँ, उसे देखकर लगता है जैसे मुझे एक अजब सी शांति मिलती है। जैसे मेरी ज़िंदगी में एक नया अर्थ पैदा हो गया हो। उसकी मुस्कान से पूरी दुनिया रंगीन हो जाती है।"


माँ ने मेरे बालों में हाथ फेरा, "बेटा, यही तो प्यार है। लेकिन प्यार में धोखा भी होता है, दर्द भी होता है। बस अपना दिल संभाल कर रखना, और सच्चा रहना।"


"माँ, क्या तुम्हें भी कभी ऐसा लगा था - पिताजी के लिए?"


माँ थोड़ी देर मौन रहीं। उनकी आँखों में कुछ दूर की कहानी थी। फिर मुस्कुराईं, "हाँ बेटा। बहुत ज़्यादा। जब हमारी मुलाकात हुई थी, तो मुझे भी ऐसा ही लगा था। वह इतने प्यार से बात करते थे, इतने समझदार थे। मैं सोचती थी - यही वो इंसान है जिसके साथ मैं बूढ़ी होना चाहती हूँ।"


"और फिर?"


"फिर जो होना था, वो हुआ," माँ ने आँखें नीची कर लीं, "लेकिन उनकी यादें... वो यादें ही मेरी सबसे बड़ी दौलत हैं।"


मैंने माँ को गले लगाया। मुझे पता था कि वह शायद रो पड़ेंगी, लेकिन उन्होंने खुद को संभाल लिया।


"अब जा," माँ ने मुझे धीरे से धकेला, "बारिश में भीगने जा। तुझे अच्छा लगता है न?"


मैं मुस्कुराया और बारिश में कूद पड़ा। ठंडी बूँदें मेरे चेहरे पर बरसीं, मैंने आँखें बंद कर लीं। मुझे सिया की याद आई। सोचा, अगर वह अब यहाँ होती, तो कितना अच्छा होता। हम दोनों बारिश में भीगते, हँसते, एक-दूसरे के साथ चलते...


मेरे दिल ने कहा - 'इंतज़ार कर, हफ्ता बाकी है।'


शाम को मैं चाचा सुखराम के पास गया। वह अपने बाग में बैठे थे, पानी पी रहे थे। मैंने उन्हें मेले वाली रात की कहानी सुनाई।


"तो," चाचा मुस्कुराए, "सिया? अच्छा लड़की है। मैंने उसकी चाची से बात की है। समझदार और अच्छी परिवार की है।"


"आपको कैसे पता चाचा?"


"बेटा, इस गाँव में क्या छिपा है? सब जानते हैं। और," उन्होंने मुझे पास बिठाया, "मैं तुम्हें एक बात बताऊँ - ये मेला तुम्हारी ज़िंदगी के सबसे अहम मोड़ों में से एक है। याद रखना, जो पल अब है, वही सब कुछ है। आने वाला कल कभी पक्का नहीं।"


मैंने चाचा का आशीर्वाद लिया और घर लौटा। रात के खाने के बाद, माँ के साथ बैठा। माँ ने कहा, "अर्जुन, एक बात याद रखना - चाहे जो हो, तू अकेला नहीं है। माँ तेरे साथ है।"


"माँ, मुझे डर लगता है," मैंने कहा, "अगर कुछ ग़लत हुआ तो?"


"ग़लत होगा तो सही करेंगे," माँ ने मेरा हाथ पकड़ा, "जीवन में गिरना, उठना सब चलता है। लेकिन कोशिश करना कभी मत छोड़ना।"


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भाग ५: वह दिन


हफ़्ता कैसे बीत गया, मुझे पता नहीं चला। हर दिन सुबह मैं उठता, स्कूल जाता (हाँ, मैं अब भी पढ़ाई करता हूँ), काम करता, और शाम को बाग में बैठता, सिया के बारे में सोचता। गाँव में चर्चा थी कि अर्जुन किसी लड़की के प्यार में पड़ गया है। कुछ लोग मुझ पर हँसते, कुछ मुझे सलाह देते।


लेकिन मुझे किसी की परवाह नहीं थी। मुझे बस वह दिन चाहिए था - जब मैं सिया से फिर मिलूँगा।


और अंततः वह शनिवार आ गया। सुबह से ही मैं बेचैन था। मैंने अपनी सबसे अच्छी कमीज़ पहनी, माँ ने मेरे बालों में तेल लगाया, और मुझे आशीर्वाद दिया, "जा, अच्छा कर, और याद रखना - सच्चा रहना।"


"माँ, क्या तुम डरी नहीं हो?"


"डर तो हर माँ को होता है," उन्होंने कहा, "लेकिन मुझे तुझ पर भरोसा है। अब जा, देर मत कर।"


मैं बाग की तरफ चल दिया। रास्ते में चिड़ियाँ गा रही थीं, सूरज सुनहरा था, और हवा में प्यार की महक थी। बाग पहुँचा तो सिया पहले से ही वहाँ थी - एक पुराने बरगद के नीचे बैठी हुई, हाथ में एक किताब लिए। उसने नीला सूट पहना हुआ था, बाल बाँधे हुए थे, और वह मुझे देखकर मुस्कुराई।


"नमस्ते अर्जुन," उसने कहा।


"नमस्ते, सिया," मैंने कहा, और उसके पास बैठ गया, "तुम बहुत सुंदर लग रही हो।"


उसने शर्माते हुए किताब नीचे रखी, "शुक्रिया। ये जगह सच में बहुत सुंदर है। शहर में ऐसा बाग नहीं है।"


"हाँ," मैंने कहा, "मुझे यहाँ बैठना पसंद है। शांति मिलती है।"


हम दोनों कुछ देर चुप रहे। दूर नदी का बहाव सुनाई दे रहा था, पक्षी चहचहा रहे थे, और हवा में पत्तों की सरसराहट थी।


"सिया," मैंने धीरे से कहा, "मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ।"


उसने मेरी तरफ देखा, उत्सुकता से, "हाँ, बताओ।"


मेरा दिल धड़क रहा था। मुझे नहीं पता था कि कैसे कहूँ। लेकिन मैंने हिम्मत जुटाई और कहा, "मैं... मैं पिछली बार जब से तुमसे मिला हूँ, मैं किसी और के बारे में नहीं सोच पा रहा हूँ। तुम मेरे सपनों में आती हो, मेरे हर पल में। मुझे नहीं पता कि यह क्या है, लेकिन जो भी है, यह बहुत गहरा है।"


सिया ने अपना सिर झुका लिया। वह कुछ देर चुप रही। फिर उसने मेरी तरफ देखा और कहा, "अर्जुन, मुझे भी कुछ बताना है।"


मेरा दिल डूबा, लेकिन मैंने सुनने का फैसला किया।


"मैं यहाँ कुछ महीनों के लिए आई हूँ," उसने कहा, "अपनी चाची के पास। मुझे पता है कि मुझे वापस जाना है। मेरे दादा-दादी मुझसे बहुत उम्मीदें रखते हैं।"


"पर..."


"लेकिन," उसने मेरा हाथ पकड़ा, "मैं ये भी जानती हूँ कि जब मैं तुम्हें देखती हूँ, तो मुझे लगता है जैसे मुझे कोई बहुत पुराना, बहुत करीबी मिल गया है। मैं इसे प्यार कहूँ या आकर्षण, मुझे नहीं पता। लेकिन ये सच है।"


उसके शब्दों ने मेरी रगों में बिजली भर दी। मैंने उसका हाथ कस कर पकड़ा, "तो क्या करना चाहिए?"


"अभी पल में जीते हैं," उसने कहा, "आने वाले कल की चिंता नहीं करते। क्योंकि अगर आज सुंदर है, तो कल अपने आप सुंदर होगा।"


हम दोनों बाग में घूमने लगे। उसने मुझे अपनी कविताएँ सुनाईं - जो उसने लिखी थीं, मैंने उसे गाँव के बारे में कहानियाँ सुनाईं। हँसते-हँसते समय बीत गया। शाम होने लगी थी, जब उसने कहा कि अब जाना होगा।


"अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे?" मैंने पूछा।


"हाँ," उसने मुस्कुरा कर कहा, "इसी बाग में। यही वादा रहा।"


मैंने उसे चाची के घर तक पहुँचाया। रास्ते में हमने बहुत बातें कीं - ज़िंदगी के बारे में, सपनों के बारे में। उसने मुझे अपने भविष्य के सपने बताए - वह एक शिक्षिका बनना चाहती थी, मैंने बताया कि मैं कलाकार बनना चाहता हूँ।


"कलाकार?" उसने आश्चर्य से पूछा।


"हाँ," मैंने कहा, "चित्रकारी, संगीत, सब कुछ। गाँव की इस शांति में मुझे प्रेरणा मिलती है।"


"तो मुझे भी तुम्हारी कला देखनी होगी," उसने कहा, "अगले हफ़्ते तुम मुझे अपनी एक तस्वीर दिखाना।"


"वादा," मैंने कहा।


जब वह चली गई, तो मैं बाग में अकेला खड़ा था। अब रात हो गई थी, और आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे। मुझे लगा जैसे मैं किसी जादुई दुनिया में हूँ। उसकी बातें, उसका स्पर्श, उसकी हँसी - यह सब एक सपने जैसा था।


मैं घर पहुँचा तो माँ सो चुकी थीं। मैंने बिना रोशनी जलाए अपने कमरे में जाकर खिड़की के पास बैठा। चाँद की रोशनी में मैंने एक कागज़ निकाला और उस पर सिया का चेहरा बनाना शुरू किया। चेहरे की रेखाएँ, आँखों की चमक, मुस्कान - मैं हर विवरण उकेरता गया। जब मैंने चित्र पूरा किया, तो देखा - यह बिल्कुल वैसा था जैसे वह सच में हो।


मैंने चित्र को अपने तकिए के नीचे रखा और सो गया।


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भाग ६: बीतते दिन


इसके बाद के दिन और हफ्ते तेज़ी से बीत गए। हर शनिवार मैं सिया से मिलता, हर शाम हम बाग में घंटों बैठते, बातें करते। कभी वह मुझे किताबें पढ़कर सुनाती, कभी मैं उसे अपनी नई तस्वीरें दिखाता। एक दिन उसने मुझे गिटार बजाते हुए सुना, तो वह रो पड़ी - उसे मेरी संगीत इतनी छू गई।


"तुम्हारी कला अद्भुत है, अर्जुन," उसने कहा, "तुम्हें इसे कभी मत छोड़ना।"


"तुम्हारी दुआ से," मैंने कहा।


हमारी दोस्ती गहरी होती गई। मैंने महसूस किया कि मैं सच में उससे प्यार करता हूँ - केवल उसकी खूबसूरती के लिए नहीं, बल्कि उसके अंदर की दुनिया के लिए। उसकी बातें, उसका समझना, उसका साथ - सब कुछ।


लेकिन जैसे-जैसे दो महीने बीतने लगे, वैसे-वैसे एक डर मुझे घेरने लगा। वह वापस जाने वाली थी, और मुझे नहीं पता था कि उसके बिना मेरे दिन कैसे बीतेंगे।


एक शाम, मैंने उससे पूछा, "सिया, क्या तुम वापस लौटोगी?"


उसने गहरी साँस ली, "मुझे नहीं पता। मेरे दादा-दादी चाहते हैं कि मैं वहाँ अपनी पढ़ाई जारी रखूँ। लेकिन... मैं ये गाँव, और तुम, कभी नहीं भूल सकती।"


"मैं भी," मैंने कहा, "शायद एक दिन मैं शहर आऊँ, और फिर मिलेंगे।"


"वादा?" उसने पूछा, अपनी छोटी सी उँगली उठाकर।


"वादा," मैंने मुस्कुराते हुए उसकी उँगली से अपनी उँगली मिलाई।


उस रात, मैंने बहुत देर तक आसमान को निहारा। मुझे लगा - ज़िंदगी में कुछ रिश्ते इतने गहरे होते हैं कि उन्हें समय, दूरी, या हालात नहीं तोड़ सकते। और यही उनकी खूबसूरती है।


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निष्कर्ष


आज जब मैं अपने बाग में अकेला बैठा हूँ, सोचता हूँ कि मेरी ज़िंदगी का पहला अध्याय कैसे बीता। माँ का त्याग, मेरी कला, सिया का आना, और फिर जाना - यह सब एक अनोखी यात्रा रही। कहानी अभी खत्म नहीं हुई - यह तो शुरुआत है।


क्योंकि मैं जानता हूँ - जो सच्चा आकर्षण है, वह कभी नहीं मिटता। वह समय की धूल में भी चमकता रहता है, और किसी न किसी दिन, किसी न किसी रूप में, वह वापस आता है।


अर्जुन, उम्र 18, छोटे से गाँव का लड़का, जो कला के सपने देखता है, और एक लड़की से प्यार करता है - यह मेरी पहचान है। और यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई।


क्योंकि सिया के जाने के बाद, मैंने अपने लिए एक नया लक्ष्य तय किया - एक दिन शहर जाना, अपनी कला को दुनिया के सामने रखना, और उसे फिर से पाना। चाहे कितना भी समय लगे, कितनी भी मुश्किलें आएं।


आकर्षण - यही तो है, जो हमें बार-बार किसी की तरफ खींचता है, और हमें अपनी मंज़िल तक पहुँचाता है।


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अध्याय १ समाप्त


आगे अध्याय २ में: अर्जुन शहर जाने का फैसला करता है, लेकिन रास्ते में बड़ी बाधाएँ आती हैं। माँ की बीमारी, गाँव की ज़िम्मेदारियाँ, और सिया के बारे में एक चौंकाने वाली खबर। क्या अर्जुन अपनी कला और प्यार दोनों को बचा पाएगा?


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