अगिया बेताल




 

मैं उस दृश्य को देख रहा था। इससे पहले भी मैंने लोगों के मुँह से सुना था, पर मुझे यह सब देखने का अवसर पहली बार मिला था। मैं स्तब्ध था कि यह सब जो मैं देख रहा हूँ - इसमें कितनी सच्चाई है। कल तक जो बात कानो सुनी थी, वह प्रत्यक्ष नजर आ रही थी।


हवा बर्फ की तरह सर्द थी। ऊपर से पानी बेहिसाब बरस रहा था। बादल आसमान का सीना फाड़े दे रहे थे और कुछ-कुछ समय का आराम दे कर इस प्रकार गड़गड़ा उठते जैसे पास की पहाड़ी पर सैकड़ो डायनामाइट फट गए हो। हवा की सायं-सायं उस वक़्त जब बदल शांत होते, महसूस होता कि जैसे बदल कुछ देर के लिए सांस ले रहे हो। एकाएक बिजली कौंधती और सारी धरती तेज़ उजाले में स्नान करती प्रतीत होती।


यह एक बेहद बरसाती तूफानी रात थी। हालाँकि मेरे शरीर पर बरसाती थी पर पानी से सराबोर हो चुकी थी। बरसाती यूँ जान पड़ती जैसे मैंने बर्फ की चादर ओढ़ ली हो।


हवा नश्तर बन कर चुभ रही थी। रह-रह कर मैं सिर से पांव तक दहल जाता। यदि मैं अकेला होता तो मेरे कदमो में ठहराव न रहता और कभी का ज़मीन पर लोट चुका होता। दहशत दिल में राज कर लेती, पर सौभाग्य से मेरे साथ लठैत थे, जिनके पास कहने को एक-एक गज का कलेजा हुआ करता था। सांझ होते ही जब मैं चला था तो मैंने उन्हें साथ ले लिया था। इसलिए नहीं कि मैं डरपोक था, इसलिए भी नहीं की रास्ते में चोर डाकुओं का भय रहा हो। असल बात यह थी की उस इलाके में जहाँ हमे जाना था आदमखोर चीते का आतंक फैला हुआ था और वह इक्के-दुक्के आदमी पर कहीं भी हमलावर हो सकता था। इस कारण मैंने दो लठैतो को साथ ले लिया था।


जब मैं चला तो सांझ घिर आई थी। बादल तो सुबह से ही आसमान पर अपना कब्ज़ा किये हुए थे और दो मील चलते-चलते बूंदा-बांदी भी होने लगी थी। अब तो चलते-चलते चार घंटे बीत गए थे। बारिश का अन्देशा पहले से ही था इसलिए बरसाती लेता आया था, साथ में शिकारी टार्च थी और कंधे पर आवश्यक सामन का एक थैला लटका हुआ था।



मुझे खबर मिली थी की मेरे पिता का देहांत हो गया है इसलिए जाना लाजमी था, क्योंकि मेरे अलावा पिता की कोई संतान नहीं थी। यूँ तो मेरे पिता ने बहुत बार मुझे बुलाने का प्रयास किया था परन्तु मैं कभी वहां गया ही नहीं था। बचपन तो वहां बीता ही था, जिसकी धुंधली सी स्मृतियाँ शेष थी। कभी कभार पिता की चिठ्ठी पत्री भी आ जाया करती थी। मैं शहरी आबोहवा में पला था। मेरे चाचा की कोई संतान नहीं थी। वे शहर में रहते थे और मुझे बहुत ज्यादा प्यार करते थे, और उन्होंने भरसक प्रयास किया था कि मैं अपने पिता की छत्र-छाया में न पलूं।


बचपन में कुछ घटनायें ऐसी भी घटी जिसके कारण मैं अपने पिता से भयभीत हो गया था और उनसे नफरत करने लगा था। जब थोड़ा समझदार हुआ तो मुझे इसका कारण भी समझ में आ गया कि मेरे चाचा ने क्यों मुझे पिता की छाया से दूर रखा और उनका यह सोचना मेरे हित में था। यदि ऐसा ना होता तो मैं विज्ञान का स्नातक न बन पाता और मेरी जिन्दगी में जो खुशहाली आने वाली थी, वह मुझसे दूर हो जाती और मैं भी अपने पिता सामान घृणित गन्दी जिंदगी व्यतीत कर रहा होता।


छः माह पहले मेरा अप्वाइन्मेंट विक्रमगंज में हुआ था। मुझे ख़ुशी हुई कि मैं अपने गाँव के करीब बनने वाले एक सरकारी अस्पताल में डॉक्टर की हैसियत से आया हूँ। पर इस दौरान मैं एक बार भी पिता से मिलने नहीं गया था। हलकी सी खबर मेरे कान में पड़ी कि मेरे पिता पागलों के समान आचरण करने लगे हैं। यह भी खबर सुनी थी की पिता ने तीसरा विवाह कर लिया है बुढ़ापे में किसी युवती को रख लिया है। ये उड़ती-उड़ती खबरें मुझे प्राप्त होती रहती थीं पर इस पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता था। मेरे पिता के आचरण को देखते हुए यह स्वाभाविक बात थी। इससे पहले सौतेली मां की मार तो बचपन में भी खा चुका था और अपनी मां की शक्ल तो जेहन में भी नहीं उभर पाती थी। बस सुना ही सुना था की मेरी मां धार्मिक विचारों की थी और उसकी मेरे पिता से कभी भी नहीं निभ पाई थी।


मेरे पिता एक तांत्रिक थे और पूरे इलाके में मेरे पिता साधुनाथ का भय व्याप्त था। हर बुरे काम जादू-टोने, तंत्र-मंत्र के लिए सधुनाथ प्रसिद्ध था और उसने कईयों के घर बर्बाद कर दिए थे। न जाने कितनी स्त्रियों और कुंवारी लड़कियों से उसने अवैध सम्बन्ध कायम किया था और उनकी कारगुजारियों के खिलाफ कोई आवाज नहीं निकालता था। जो ऐसा करता उसे तांत्रिक का दंड भुगतना पड़ता। बहुत से लोग मेरे पिता के पास इसलिए आते ताकि दूसरों को हानि पंहुचा सकें और बदले में मेरे पिता उनसे मोटी-मोटी रकम ऐंठा करते।


वह अधर्मी क्रूर और साक्षात यमराज लगता था। यहाँ यह कहने में मुझे जरा भी हिचक नहीं कि मैं अपने बाप से अत्यंत घृणा करता था। मेरे मन में उनके प्रति कभी कोई आदर की भावना नहीं ऊपजी। और यदि उसे पहले मालूम हो जाता की मैं उनके चंगुल में नहीं आऊंगा तो वह मेरे टुकड़े-टुकड़े कर देता।


परन्तु उसकी मौत का समाचार पाकर मुझे दुःख हुआ कि हम बाप बेटों में कभी सुलह ही नहीं हुई। एक तनाव भरा वक़्त गुजरकर हाथ से निकल गया और वह तांत्रिक सदा के लिए दुनिया छोड़कर चला गया।


न जाने कितने लोगों ने चैन की सांस ली होगी पर मुझे दुःख तो था ही। कुछ भी हो, वह मेरा बाप था। मुझमे उसी का रक्त संचार हो रहा था।


विक्रमगंज से बारह मील दूर एक पुराना रजवाड़ा था सूरजगढ़। अब वह कस्बे में बदल गया था... पर सूरजगढ़ी अब भी वहां मौजूद थी। सूरजगढ़ी में रजवाड़े के वंशज ही रहते थे। इन दिनों ठाकुर भानुप्रताप उस गढ़ी के मालिक थे, जिनका आज भी पूरे क्षेत्र में दबदबा था। परन्तु लोग कहते है कि ठाकुर की सधुनाथ से ठनी हुई थी और दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे। इस बात में कितनी सच्चाई थी, मैं नहीं जनता था और न उनकी आपसी दुश्मनी का कारण जानता था।


इस वक़्त तो मैं अपने सफ़र पर चलता-चलता रुक गया था। कोई सवारी न मिलने के कारण हम लोग पैदल ही चल निकले थे, क्योंकि सवेरे से पहले अपने पिता का दाह संस्कार करने मुझे वहां पहुँचना था।


बादलों का गर्जन कानों के परदे फाड़े डाल रहा था।


मेरी निगाह उसी तरफ जमी थी।


सारे वातावरण में रात की काली चादर तनी थी। मूसलाधार वर्षा के कारण अन्धकार और भी हो गया था। मुझे अपने साथ चलने वाले लठैत के क़दमों की चाप सुनाई देती, पर उनके शरीर नजर न आते। टार्च के प्रकाश से मैं उन्हें देख लेता। कभी-कभी हम एक दूसरे से बातें कर लिया करते, ताकि भयपूर्ण वातावरण हम पर हावी ना हो जाए।


मेरे ठिठकने का कारण नदी का वह विशाल अलाव था जो प्रचंड वेग से आकाश की ऊँचाइयों तक उठता और क्षण भर में ही सिमटकर गायब हो जाता। देखते-देखते वह विकराल रूप धारण कर लेता, फिर अनेक शोले वायुमण्डल में दूर तक तैरते चले जाते। इतनी भयंकर वर्षा में इस प्रकार का अलाव का जलना मेरे लिए आश्चर्य की बात थी। इसीलिए मैंने लठैतों को भी रुकने का आदेश दिया।


“क्या बात है साहब बहादुर?” उनमे से एक ने पूछा “आप रुक क्यों गये?”


“वह देखो...।” मैंने उस तरफ इशारा किया – “ऐसा विचित्र दृश्य तुमने कभी नहीं देखा होगा। मुसलाधार पानी बरस रहा है और वहां आग लगी है।”


दूसरा लठैत कुछ सहमे स्वर में बोला – “वह शमशान घाट है साहब बहादुर। हमे उस तरफ देखने की बजाय आगे बढ़ना चाहिए।”


“शमशान घाट, तो क्या इस वक़्त वहां कोई चिता जल रही है?”


“नहीं साहब बहादुर... वहां एक पुराना बरगद का पेड़ है, आग उसी के नीचे है। वह कोई चिता नहीं,पानी बरस रहा है, ऐसे में चिता आग कैसे पकड़ सकती है।”


“तुम्हारा मतलब वह आग नहीं है।”


“जी नहीं... और यह कोई नई बात नहीं। अक्सर वहां यह होता रहता है।”


“तुम कहना क्या चाहते हो?”


दोनों लठैत चुप हो गये। शायद वह दिल की बात कहने में सकुचा रहे थे, या किसी प्रकार के भय ने उन्हें जकड़ लिया था।


“क्या बात है शम्भू – तुम चुप क्यों हो गये?”


“साहब बहादुर वह आग नहीं – अगिया बेताल है।” वह कुछ सहमे स्वर में बोला – “और हमारा इस प्रकार की लीला देखना ठीक नहीं।”


“क्या... अगिया बेताल... यह क्या होता है?”


“बेताल बेताल होता है साहब...जिन्न।”


“नॉनसेंस – तुम लोग न जाने किस दुनिया में रहते ही – चलो चलकर देखा जाए।”


“साहब बहादुर...” दूसरा लठैत घबराये स्वर में बोला – “ऐसा सहस दिखाना बेवकूफी है शम्भू ठीक कहता है। अगर हमने उनके खेल में बाधा डाली तो हम जिन्दा नहीं बचेंगे।”


“लेकिन मैं यह बकवास नहीं मानता।”


“तो साहब बहादुर ! आप ही बताओ खुले आसमान के नीचे इतनी तेज़ बारिश में चिता कैसे जल सकती है?”


अब मैं खामोश हो गया। इस प्रश्न का जवाब खोजने के लिए तो मैं वहां रुका था। यह हड्डियों की फास्फोरस का चमत्कार भी नहीं हो सकता था। हालाँकि वह स्थान हमसे अधिक दूर नहीं था। मैंने सुना था की मेरे पिता ने जो नया मकान बनाया था, वह मरघट के नजदीक ही पड़ता था और तंत्र सिद्धि के लिए वे शमशान घाट पर ही अपना अधिक समय बिताया करते थे। कुछ लोगों का कथन था कि सधुनाथ ने वह मकान भूतों के लिए बनाया है और वे असंख्य प्रेत उसी में रहते है।


मेरे पिता का शव उसी मकान में रखा गया था और सूरजगढ़ का कोई इंसान इस क्रियाकर्म में सम्मिलित नहीं होना चाहता था।


मैं शमशान में जाकर उस आग का प्रत्यक्ष दृश्य देखना चाहता था, परन्तु मेरे साथी लठैत किसी भी कीमत पर वहां जाने के लिए तैयार नहीं थे।


“अगर हम अपने नए मकान तक पहुँचने के लिए वही रास्ता अपनाये तो क्या बुराई है। यदि वह अगिया बेताल है तो मुझे उससे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हो जायेगा।” मैंने कहा।


“आप कैसी बातें करते हैं साहब बहादुर... इस वक़्त हम आपके साथ है, हम आपको वहां हरगिज नहीं जाने देंगे। अगर हमारी बात पर विश्वास न हो तो दिन निकलते ही आप वह जगह देख लेना। यह इस जगह के लिए कोई नई बात नहीं है। इस वक़्त हम आपके साथ हैं और हरगिज आपको वहां नहीं जाने देंगे।”


एक सर्द लहर चली और बादलों ने घमासान युद्ध छेड़ दिया फिर चकाचोंध पैदा करती कड़कड़ाती बिजली की लहर जमीन की तरफ दैत्याकार जिव्हा की तरह लपकी और बारूद की गुफा फट जाने जैसा जबरदस्त धमाका हुआ।


“कहीं बिजली गिरी है...।” सहमा सा दूसरा लठैत बोला।


अगर मौसम इतना खतरनाक नहीं होता तो शायद मैं अपने निर्णय से पीछे नहीं हटता। पर ऐसे भयानक मौसम में दिल स्वाभाविक रूप से कमजोर हो जाता है। सांय-सांय की आवाज़ कानों से टकरा रही थी, जो पास बहने वाली नदी की थी।


हम वहां अधिक देर नहीं ठहर सके। बिजली चमकती तो उसका उजाला चारो तरफ फैलने पर कोई हलचल नजर नहीं आती।


मैं उन बातों पर विश्वास नहीं करता था, परन्तु हालत ऐसे थे कि मुझे विश्वास करना पड़ रहा था। इस अनोखे घटना चक्र के बीच जूझता मैं अपनी मंजिल तय कर रहा था पर मैंने मन ही मन यह तय कर लिया था कि इस भेद को अवश्य जानूँगा – भले ही इसके लिए मुझे कोई भी कीमत चुकानी पड़े। यह तो प्रकृति की एक रहस्यमय खोज साबित होगी।


मेरे भीतर का मानव मुझे इस खोज के लिए प्रेरित कर रहा था। झाड़-झुरमुट और काले दैत्यों के सामान झूमते वृक्षों के तले हम आगे बढ़ रहे थे। अब मंजिल अधिक दूर नहीं थी।


हमें सीधे नए मकान में जाना था, क्योंकि मेरे पिता का शव वही रखा गया था। कुछ देर बाद ही मकान का प्रकाश चिन्ह नजर आना शुरू हो गया।


हमारे बीच सारे रास्ते रहस्यमय खामोशी छाई रही।


पगडण्डी मकान के निकट से गुजरती चली गई थी। यह अकेला मकान तूफानी वर्षा से संघर्ष करता प्रतीत हो रहा था।आसपास कोई मकान नहीं था। पूर्व में स्याह जंगल के चिन्ह और मकान के पीछे खंडहरों का ऐसा सिलसिला जो कहीं भी ख़त्म होता प्रतीत नहीं होता था।


बिजली की चमक में रह-रह कर मकान के आस-पास का हिस्सा नजर आ जाता था। मकान में गहरी ख़ामोशी व्याप्त थी। किसी का भी रुदन सुनाई नहीं पड़ता था और न कोई आदमी नजर आ रहा था।


मुख्य दरवाजे के पास लालटेन लटकी हुई थी जिसका मद्धिम प्रकाश बरामदे को भय से मुक्त करने का असफल प्रयास कर रहा था। सामने एक छोटा सा सेहन था, झाड़ियाँ जिसमें उगी नजर आ रही थीं। सेहन के चारो तरफ तारों का घेरा कसा था और बीच में लकड़ी का बेढंगा सा फाटक, जो आधा टूट गया था।


दायें भाग में एक बड़ा वृक्ष खड़ा था उस पर पत्तियों का कोई चिन्ह नजर नहीं आता था, सिवाये सूखे तनो के। उसके पास अपना कहने को कुछ नहीं था।

हमने बरामदे में कदम रखा।


हवा के झोंके ने लालटेन पर जोर अजमाया और वह थोड़ा टसमस होती प्रतीत हुई, पर उसकी रौशनी पर कोई अंतर नहीं पड़ा।


बरामदे की छाया में पहुँच कर तनिक राहत मिली। हवा के झोंके अब भी रहा सहा क्रोध प्रकट कर रहे थे, शायद हमारे यहाँ सफल पहुँच जाने पर हारे हुए जुआरी की तरह झुंझला रहे थे। हमने कपडे झाड़ कर उन्हें रुखसत किया फिर मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा।


दरवाज़ा भीतर से बंद था। मैंने उसे जोर-जोर से थपथपाया। कुछ देर तक भीतर की आहट सुनने के लिए हाथ रोक दिया। थपथपाहट की प्रतिक्रिया तुरंत हुई। किसी की भारी पदचाप सुनाई दी जो निरंतर दरवाजे के निकट आ रही थी। पदचाप दरवाजे के निकट रुकी, फिर दरवाज़ा चरमराता हुआ खुल गया।


लालटेन के प्रकाश में पीला सा रुग्ण चेहरा नजर आया। मेरे लिए यह चेहरा अजनबी था। मैं पुरे अट्ठारह वर्ष बाद इस तरफ आया था, इसलिए जिन लोगों को जानता भी था, उनकी स्मृति भी अब शेष नहीं रही थी।


“पैलागन बाबा!” लठैत संभु ने उस अजनबी को दंडवत किया –”हम साहब बहादुर को ले आये।”


सारे लठैतों ने भी पैलागन किया।


“तुम आ गए बेटा रोहताश।” बूढ़े बाबा ने गंभीर स्वर में कहा – “पहचानने में भी नहीं आते, बहुत बदल गए हो।”


मैंने हाथ जोड़ दिए।


“पहचाना नहीं।” बूढ़ा बोला – “मैं ब्रह्मानंद हूँ...।”


“ओह ताऊ जी...।”


“हाँ बेटा।” बूढ़े ने झुंझलाए स्वर में कहा – “मैंने सोचा ऐसे समय में क्यों साथ छोड़ा जाये। मुझे कल ही खबर मिली थी कि साधू अंतिम घड़ी गिन रहा है... आओ आओ बेटा...।” बूढा बाबा मुड़ गया।


यूँ ब्रह्मानंद मेरे सगे ताऊ नहीं थे। पर उनके मेरे पिता पर बहुत से अहसान थे। मैं क्या सारा सूरजगढ़ उन्हें या तो ताऊ जी कहता था या बाबा। वे सारी उम्र ब्रह्मचारी रहे थे। बाद में वे सन्यासी हो गए और सारी सम्पति मेरे पिता को दे दी थी। मैं उनके बारे में अधिक कुछ नहीं जानता था।


मकान के भीतर की दीवारें मैली कुचैली थी और कोई स्थान ऐसा नहीं था, जिसे साफ़ सुथरा कहा जाए।


भीतर के कमरे में पांच छः आदमी थे, वे भी शायद कर्त्तव्य भावना के वश आ गए थे। इतने बड़े सूरजगढ़ में उनकी मृत्यु का शोक मानाने वाले वे ही आदमी थे। हम लोगों ने परिचय प्राप्त करने की अनोपचारिकता बरती... फिर मुझे पिता के शव के अंतिम दर्शन कराये गए। पिता का चेहरा पहचानने में नहीं आता था।


सब कुछ बड़ी ख़ामोशी से हो रहा था।


बाप बेटे का संघर्ष ख़त्म हो गया था। मुझे दुःख इसी बात का था कि हमारे बीच कभी समझौता नहीं हुआ। फिर मैं वापिस आकर सब लोगों के बीच बैठ गया, जो साधुनाथ के गुणों का बखान करते हुए उनकी आत्मा को शांति पंहुचा रहे थे। मकान के सभी कमरे बंद थे।


मैं अपनी सौतेली मां के बारे में पूछने की सोच रहा था, परन्तु न जाने क्यों खामोश ही रहा। अब मैं यहाँ आ गया था तो सब कुछ धीरे-धीरे मालूम हो ही जायेगा।


“न जाने कैसे उसे पहले ही अपनी मृत्यु का आभास हो गया था... उसने मुझे तार दे दिया था।” ताऊ जी ने कहा – “मैं तो उसे सारी जिंदगी समझाते-समझाते हार गया मगर उसने तंत्र-मंत्र की दुनिया नहीं छोड़ी। भगवन जाने वह क्या सिद्धि प्राप्त करना चाहता था।”


“क्या वे बीमार थे?” मैंने पूछा।


“नहीं बेटा कोई बीमारी नहीं थी।” एक बुजुर्ग ने कहा।


“फिर मृत्यु का कारण ?”


“क्या जाने बेटा...साधू के दुश्मन भी तो कम नहीं थे।” ताऊ जी ने कहा – “अब तो हमे सिर्फ उनका दाह संस्कार करना है।”


मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पिता की मृत्यु स्वाभाविक मौत नहीं है, उसके पीछे कोई न कोई भेद अवश्य है। न जाने कौन सी बात मस्तिष्क में खटक रही थी फिर भी मैंने इस जांच पड़ताल में पड़ना मुनासिब नहीं समझा।


इस प्रकार एक बुराई का अंत हो चुका था। सवेरे मेरे पिता की चिता शमशान घाट पर लग गई। उस समय बारिश थम चुकी थी पर बादलों ने आसमान खाली नहीं किया था।


वह भारी भरकम बरगद शमशान से आधा फर्लांग दूर पार्श्व भाग में खड़ा था, और मैं बार-बार उसी की तरफ देखे जा रहा था। पिछली रात शम्भू ने उसी बरगद का जिक्र किया था – उसका कथन था आग वहीं लगी थी और वह अगिया बेताल का घर था।


लेकिन इस वक़्त वहां कुछ भी नहीं था। पूरे शमशान में पिछली रात लगी आग का कोई निशान तक न था न ही वहां पिछले सात रोज से किसी की चिता जली थी।


पिता की मृत्यु पर बाल मुंडवाने की रीति पूर्वजों से चली आ रही थी अतः मुझे भी उस रीति को दोहराना पड़ा और नउए ने बड़ी बेदर्दी से मेरे लच्छेदार घुंगराले बाल उड़ा कर खोपड़ी को सफाचट कर दिया।


दाह संस्कार हो गया।


आखिर चिता जल कर राख हो गई।

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नये मकान पर ताला डालकर मैं क़स्बा सूरजगढ़ की और चल दिया, वहां हमारा पुराना मकान था। मुझे यह देखना था कि मेरे पिता के पास कितनी जमीं-जायदाद शेष रही थी। पूरे अट्ठारह साल बाद मैं उस कस्बे में लौट रहा था।


ताऊ जी ने मुझे बताया था कि मेरे पिता की तीसरी पत्नी इसी मकान में रह रही है। वह उसी जगह रह कर अपने पति का शोक मना रही है।


गंजे सर को ढकने के लिए मैंने उस पर कपड़ा लपेट दिया था। मेरे लठैत साथी विदा हो गए थे। और वे लोग भी, जिन्होंने चिता में मेरा साथ दिया था।


इन अट्ठारह बरसों में सूरजगढ़ काफी विकसित हो गया था, उसका क्षेत्रफल बढ़ गया था और वहां बिजली की राहत भी पहुच गई थी, फिर भी कस्बे के अधिकांश घरों में बिजली नहीं पहुची थी। किन्तु सरकार ने अपने कोटे में सूरजगढ़ का नाम भी लिख लिया था, वह भी ठाकुर भानुप्रताप की दौड़ धूप से हो पाया था, अन्यथा नया डैम बनने तक समस्या उलझी हुई थी।


सूरजगढ़ का सबसे शक्ति संपन्न व्यक्ति ठाकुर भानुप्रताप सिंह ही था, जिसका दूर दराज तक बोलबाला था, गढ़ी में रजवाड़ो की शान अब भी देखने को मिलती थी। भानुप्रताप आज भी सूरजगढ़ी को अपनी मिलकियत समझते थे।


जब मैं कस्बे में पहुंचा तो सूरज ढलने को आ रहा था। वृक्षों के साये लम्बे पड़ने लगे थे और पक्षी अपने रैन बसेरों की ओर उड़ने लगे थे। आसमान पर अब इक्का-दुक्का खरगोशी रंग के बादल तैर रहे थे, जो अब शाम के धुँधलके में खोते जा रहे थे।


मकानों की छतों पर हल्की लालिमा शेष थी परन्तु आँगन सुरमई होने लगे थे। कस्बे में छोटे मोटे झोपड़ो से ले कर आलीशान मकान तक नजर आ रहे थे।


मुझे अपना पुराना मकान तलाश करने में अधिक देर नहीं लगी। यह मकान जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था, और इसमें अजीब से खोखलेपन का बोध होता था। शायद इस बूढ़े मकान की बरसों से मरम्मत नहीं हुई थी और यह ढहने को तैयार था।


यही वह मकान था, जहाँ मेरा जन्म हुआ था। इसी मकान के आँगन में मेरा बचपन खेला, मानस पटल पर इसकी हलकी सी स्मृति शेष थी।


आँगन में घास उग आई थी। नीम का पेड़ बूढा हो चला था, ऐसा जान पड़ता जैसे मकान का मनहूस साया उस पर भी पड़ता रहा हो और वह भी दिन-ब-दिन सूखता चला गया हो।


सूने आँगन को पार करता हुआ मैं मकान की दहलीज़ पर चढ़ गया। दरवाज़ा खुला था। भीतर कुछ स्त्रियों के धीमे-धीमे बात करने का स्वर उत्पन्न हो रहा था।


सीधे अन्दर जाने की बजाय मैंने कुंडा बजा दिया।


कुंडे की खोखली ठन-ठन कुछ सेकंड गूंजी।]


भीतर की बातचीत थम गई।


एक बूढी औरत दृष्टिगोचर हुई।


मैंने दोनों हाथ जोड़ दिए।


“कौन हो बेटा?” बुढ़िया ने क्षीण स्वर में पूछा।


“रोहताश!”


“रोहताश... अरे बबुआ तू है...।” बुढ़िया के स्वर क्षणिक ख़ुशी आई फिर विलीन हो गई।


“हाँ मैं हूँ ... साधुनाथ का बेटा... यह घर हमारा ही है ना ...।” मैंने अपनी शंका का समाधान किया


“हाँ बेटा तेरा ही है। मुझे पहचाना नहीं... अरे मैं दादी हूँ... तुझे गोद में खिलाया है बेटा... कितना बड़ा हो गया है तू... पर बेटा – बहुत देर हो गई।”


“मैं भीतर आऊं...?”


मैं नहीं पहचान पाया कि वह कौन है... मुझे याद न था की मुझे किस-किस ने गोद में खिलाया था।


बुढ़िया ने रास्ता छोड़ दिया।


“तेरा बापू तुझे बहुत याद करता रहता था बेटा... बहुत रोता था—बेचारे को संतान का सुख भी नहीं मिला...।”


वह मुझे एक कमरे में ले गई जिसमे एक टूटी सी चारपाई पड़ी थी और फर्श पर दरियों के कुछ टुकड़े बिछे हुए थे।


“बेटा तू ठीक है ना]...।”


“हां... आप लोग कैसी हैं।”


“अरे हमारा क्या बेटा – अब तो कब्र में पैर लटक रहें है—अच्छा, तू बैठ मैं तेरी मां को खबर देती हूँ।”


“माँ।”


बुढ़िया चली गई।


“कौन सी माँ ?”


“मुझे तो याद भी नहीं था मेरी माँ कैसी थी – कौन थी—पर मेरे पिता ने तो मेरे लिए तीसरी माँ का इन्तजाम किया था। न जाने कौन होगी – कैसी होगी – बहरहाल रिश्ते में तो मेरी माँ ही हुई


मेरा पिता जिस जिस से भी विवाह करता, वह मेरी माँ ही कहलाती। मुझे अपने आप से घृणा होने लगी। काश कि मैं साधुराम का बेटा न होता।


कुछ देर में बहुत सी स्त्रियाँ उस कमरे में एकत्रित हो गई, जिसकी दीवारों का मैं ठीक से जायजा भी नहीं ले पाया था। मेरी निगाहें झुकी हुई थी।


“बेटा...तुम आ गये ...।” धीमा सा स्वर सुनाई पड़ा।


न जाने उनमे से कौन बोला था। मैंने नजरें ऊपर कर देखा कमरे में आधा दर्जन स्त्रियाँ थीं। कोई जवान कोई अधेड़। उनमे से एक युवती ऐसी भी थी जो स्वेत वस्त्रों में थी। उसकी नंगी कलाईयाँ, सूनी मांग इस बात का प्रमाण थी की वह विधवा है। उसके नाक नक्श तीखे थे और रंग गोरा था।


मैंने अनुमान लगाया कि वही युवती चन्द्रावती है। मेरी तीसरी मां, जिसकी आयु मुझसे भी कम है, वह कम से कम मुझसे छः बरस छोटी लगती थी, और अभी वह पूर्णतया स्त्री भी नहीं बन पाई थी। यह अन्याय नहीं तो क्या था। मेर पिता ने मरते मरते भी अन्याय किया था।


वह मेरी तरफ देखे जा रही थी।


मैंने सभी को हाथ जोड़े और स्त्रियाँ बिखरकर मेरे चारो तरफ बैठ गयी। उनके धीमे-धीमे स्वर मेरे कानों में पड़ते रहे, और मैं हूँ... हाँ... या ना... में जवाब देता रहा। मेरे पास कहने को कुछ नहीं था।


अधिक रात बीतने पर वे चली गई, सिर्फ एक बुढ़िया रह गई, जिसके दर्शन मैंने आरम्भ में किए थे।

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सवेरा हुआ।

मैंने अपने आपको काफी हल्का महसूस किया। बुढ़िया मेरे लिए चाय बना कर लाई।


“क्यों रे... तूने अपनी मां से बात भी नहीं की...।” उसने कहा।


“मैं क्या बात करता...।”


“कम से कम उसके दुखी मन को सांत्वना तो दे देता... बेचारी इस छोटी सी उम्र में बेवा हो गई।”


“हाँ सो तो है। यह भी एक जुल्म है।”“


अब वह किसके सहारे जिन्दा रहेगी – तू तो एक-दो रोज में चला जाएगा। उसके लिए कुछ पैसा-वैसा भेजता रहेगा न।”


“क्यों नहीं... मेरा इस दुनियाँ में है भी कौन?”


“अरे बेटा चिंता क्यों करता है, अभी तो मैं भी जिन्दा हूँ... मैंने तय कर लिया है कि इस घर की देख-रेख करुँगी... सब लोगो ने साथ छोड़ दिया तो क्या हुआ अभी मैं जो हूँ। और देखना यहाँ जितने दिन है, चुप ही रहना...।”


“मतलब...।”


“अरे बेटा जमाना बड़ा ख़राब है। जब तक तेरा बाप जिन्दा था, सब डरते थे, मगर अब तो न जाने जरा-जरा से लोग भी क्या कहते फिर रहे हैं। किसी से लड़ना-झगडना नहीं। सब सहन करने में ही भलाई है।”


“मैं क्यूँ लडूंगा भला।”


“ज़रा सुनना...।” बुढ़िया पास आकर धीमे स्वर में बोली – “गढ़ी वालों से बचकर रहना।”


“गढ़ी वाले ?”


“अरे यही ठाकुर प्रताप... उसकी नियत अच्छी नहीं। और आजकल तो उसके यहाँ भैरवप्रसाद का आना-जाना है। लोग कहते है, भैरव काले पहाड़ पर रहता है और किसी के लाख बुलाने पर भी नहीं आता।”


“वह कौन है ?”


“बहुत बड़ा तांत्रिक है बेटा... उसका काटा पानी भी नहीं मांगता... चीते पर सवारी करता है, जो उसे काले पहाड़ तक पहुंचाता है।”


मैंने सांस छोड़ी।


इस कस्बे के लोग आज भी कितने अन्धविश्वासी है। काला पहाड़ आज भी सबके लिए दहशत का प्रतीक बना है। इस कस्बे से लगभग साथ सत्तर मील दूर एक पहाड़ था, जिसकी गगन चुम्बी चोटी दूर-दूर तक नजर आती थी। इस पहाड़ को लगभग आठ मील का घेराव लिए घना जंगल फैला था और उसमे जंगली जानवर स्वतंत्र घूमते रहते थे।


उस पर्वत को काला पहाड़ इसलिए कहा जाता था क्योंकि उसका उपरी हिस्सा दूर से काला दिखाई पड़ता था। मुझे याद था की यहाँ बच्चों को काले पहाड़ के दैत्य का हवाला दिला कर डराया जाता था। काले पहाड़ के बारे में क्या-क्या किवदंतियां मशहूर थी, यह मैं भूल गया था।


अपनी बात कहकर बुढ़िया चली गई। मैं चाय पीने लगा।


कहीं जाने को मन न था, अतः मैं घर की चारदीवारी में ही पड़ा रहा। दिन में सिर्फ एक बार अपनी उस अभागी माँ से मुलाकात हुई, जिसके मासूम चेहरे पर दुखों की छाप थी। उसने सिर्फ दो तीन बाते कही और इस बीच उसकी निगाहें झुकी रही।


इसमें कोई संदेह नहीं था की वह अति सुन्दर थी, और मुझे उसके आगे शर्म महसूस होती थी। शायद यही हाल उसका था। उसने मुझसे तेरहवीं के लिए कहा था, जिसके जवाब में मैंने सहमति प्रकट की। उसका कद औसत दर्जे से कुछ ऊंचा था। मुझे बेटा कहते हुए वह हिचकिचा रही थी।


दिन सूना-सूना सा बीता।


न मैं किसी से मिला और न कोई मुझसे मिलने आया। धीरे-धीरे रात घिर आई। बुढ़िया मेरे पास आकर बैठ गई और काफी रात गए तक आपबीती सुनाती रही। यह रात भी शंकाओं में बीत गई। बुढ़िया की बातों से इस बात का हल्का इशारा मिला कि साधुनाथ की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी, उसे मारा गया था, पर डर के कारण बुढ़िया स्पष्ट बोलने से कतरा रही थी। वह बार-बार गढ़ी का जिक्र करती थी, और ठाकुर घराने से दूर रहने की शिक्षा देती थी।


तो क्या मेरे पिता की मौत का जिम्मेदार ठाकुर भानुप्रताप था, जिसने भैरव प्रसाद नामक तांत्रिक को मेरे पिता से निपटने के लिए बुलाया था।


अगले दिन एक विचित्र घटना घटी।


किसी गाँव के चार-पांच आदमी एक स्त्री को पकड़कर लाये थे।वह नव-व्याहता लगती थी। उसके वस्त्र जगह-जगह से फाटे हुए थे, और बाल चंडी की तरह बिखरे हुए थे। माथे पर लंबा-सा तिलक लगा था, और सर पर सिन्दूर के लाल-लाल धब्बे से फैले नजर आ रहे थे।


वह हमारे मकान पर आ कर रुके।


न जाने बुढ़िया ने क्यों उन्हें बाहरी कमरे में बैठा दिया था। उसके बाद वह भागी-भागी मेरे पास आई।


“अरे... बेटा निपटो उन गवारों से... मेरे तो सर में दर्द हो गया है। कमबख्तों को बता भी दिया तो भी मानने को तैयार नहीं।”


“क्या बात है... बाहर के कमरे में कैसा शोर है ?” मैंने पूछा।


“वही तो कह रही हूँ – वो धरना देकर बैठ गए हैं।”


“उनके साथ कोई पागल औरत भी है।” मैंने उन्हें खिड़की से देख लिया था।


“अब बेटा जाकर उसका भूत उतारो... मैंने लाख कहा की साधू अब इस दुनिया में नहीं रहा, कमबख्त मानते ही नहीं। जब मैंने कहा साधू नहीं उसका बेटा है, तो बोले उसी से दिखवा दो।”


“मगर बात क्या है ?”


“वह जो लौंडी है न उनके साथ, जिसे कमबख्तों ने बेरहमी से पकड़ रखा है, बताते है उस पर ब्रह्म राक्षस चढ़ गया है, साधुनाथ का नाम तो दूर-दूर तक मशहूर है न... हाय राम ब्रह्म राक्षस तो जान ले के छोड़े है।”


मैं मुस्कुरा उठा।


यहाँ आने के बाद पहली बार मेरे होठों पर मुस्कान आई थी। कैसे-कैसे ढोंग है यहाँ... हूं... ब्रह्म राक्षस।


अगर मैं डॉक्टर न होता तो उसे देखने का फैसला कभी ना करता, पर मैं उन देहातियो के दिमाग से भुत-प्रेत का भ्रम उतार देना चाहता था।


मैं उठ खड़ा हुआ।


“बेटा जरा संभल कर... ब्रह्म राक्षस किसी के वश का रोग नहीं होता – उसे तो अगिया बेताल ही भगा सकता है... उन्हें टाल देना।”


“अरे दादी - मैं सब जानता हूँ।” मैंने मजाक में कहा।


“क्या... तू सब जानता है...।”


वह आश्चर्य से मुझे देखती रही और मैं सीधा बाहर के कमरे में जा पहुंचा। वह युवती बैठी-बैठी झूम रही थी। जैसे ही मैं वहाँ पहुंचा उसने जोरों के साथ किलकारी मारी और मुझे घूर-घूर कर देखने लगी। उसने अपने आपको छुड़ाने का प्रयास किया मगर देहातियों ने उसे कस कर थामा हुआ था।


एक बूढा मेरे पावों में गिर पड़ा।


“चाहे जो ले लो... मगर मेरी बेटी की जान बचा दो... वरना मैं मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहूँगा। हम बड़ी उम्मीद लेकर आपके यहाँ आये है।”


“उठो...।” मैंने डांटकर कहा।


वह एकदम सकपका कर उठ बैठा।


“क्या बात है?” मैंने पूछा


“क्या बताऊँ साहब... मेरी बेटी पर ब्रह्म राक्षस सवार हो गया है... देखो तो क्या हालात बना दी है उसने...।”


“तुमने उसे क्यों पकड़ रखा है? उसे छोड़ दो...।”


“अरे नहीं साहब... यह तो काट खाने को दौड़ती है।”


“मैं कहता हूँ – उसे छोड़ दो।”


युवती को छोड़ दिया गया। कमान से छूटे तीर की तरह वह मुझ पर झपटी... मुझे इसकी जरा भी उम्मीद नहीं थी। उसने किलकारी मारी और मुझे इतना जबरदस्त धक्का दिया कि मैं फर्श पर गिर पड़ा। मैं एकदम घबरा गया।


वह मेरे सीने पर चढ़ गई।



“तू मुझे ठीक करेगा... मैं तेरा खून पी जाउंगी... मैं ब्रह्म राक्षस की बीवी हूँ... ही... ही... ही...।


“अरे इसे पकड़ो... यह तो पागल है।” मैं चिल्लाया।


बड़ी कठिनाई से उसे पुनः पकड़ा गया। वह अब बैठे-बैठे झूम रही थी।


मैं कपडे झाड़ कर खड़ा हुआ। अब मुझे उससे डर लग रहा था।


“यह कब से पागल है ?” मैंने अपनी झेंप मिटाने के लिए पूछा।


“पागल... चार रोज पहले तो ठीक थी... पागल नहीं साहब... ब्रह्म राक्षस है... यह रात को पीपल के पेड़ तक गई थी... शौच करने... बस वहीं राक्षस ने इसे पकड़ लिया। अब बताओ... इस हालत में मैं इसे ससुराल कैसे भेजूंगा... मेरी तो नाक कट जायेगी।”


“ससुराल जाना चाहती है ये।”


“अरे साहब ठीक हो जाये तो इसका बाप भी जाएगा।”


अचानक मेरे दिमाग में एक युक्ति आई। वह बीमार तो बिलकुल नहीं लगती थी, फिर भी मैंने एक बार देख लेना उचित समझा।

“अच्छा मैं अभी आता हूँ।” मैं भीतर चला गया। डाक्टरी का छोटा-मोटा सामान मैं हर वक़्त अपने साथ रखता था।


जब मैं अन्दर पहुंचा तो बुढ़िया ने पूछा – “भगा दिया राक्षस को।”


“अभी भाग जायेगा”


“मैं कहती हूँ उससे टक्कर न लेना।”


मैं बिना कुछ जवाब दिये अपना सामान लेकर बाहर पहुंचा, फिर मैंने उसे चेक करना शुरू कर दिया। वह सचमुच सामान्य थी। उसे कुछ नहीं हुआ था। वे लोग आश्चर्य से भूत-प्रेत उतारने की इस नई प्रणाली को देख रहे थे।


“हूँ तो ये बात है।” मैंने कहा।


“क्या बात है...?” बूढा चौंका।


“फिक्र न करो... इसका पति कहाँ है?”


“पति... पति क्या करेगा... अरे साहब – वह तो बड़ा खतरनाक आदमी है... मेरे तो गले आ रही है...।”


“कोई बात नहीं... अब मैं देखता हूँ इस राक्षस को।”


बस एक युक्ति दिमाग में आ गई और मुझे उसी की संभावना लग रही थी।


“इसे जरा अन्दर के कमरे में ले चलो।”


मेरी आज्ञा का तुरंत पालन हुआ। वह जाना नहीं चाहती थी पर अब मैं उसका भूत उतारने के लिए पूरी तरह तैयार हो गया था।


उस कमरे में एक लंबा चिमटा रखा था। मैंने वह उतार लिया और सब लोगों को बाहर निकल जाने के लिए कहा। सब उसे छोड कर बाहर निकल गए।


वह मुझ पर दुबारा झपटी, पर जैसे ही उस पर एक चिमटा पड़ा, वह वहीं बैठ गई। मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया।


फिर उसके पास पहुँचकर जोरों से चिमटा जमीन पर मारा।


“मैं तुझे मारना नहीं चाहता। मैंने कहा – मैं जानता हूँ तूने यह ढोंग क्यों रचा है... लेकिन तूने अगर सच-सच बात नहीं बताई तो कस कर मारूंगा... बोल तू ससुराल नहीं जाना चाहती न... मुझे सब मालुम है।”


वह कुछ सकुचाई फिर चिमटा देखते ही फूट-फूट कर रोने लगी। तत्काल ही उसने मेरे पाँव पकड़ लिये।


“मुझे माफ़ कर दो बाबू... मुझे मत मारो... आप तो अन्तर्यामी हैं। आप सब जानते है, मुझ पर ससुराल वाले क्या-क्या जुल्म करते है।”


मेरे होंठो पर मुस्कान आ गई।


“तो तू वहां नहीं जाना चाहती।”


“हाँ... वे मुझे मारते है। मेरा खसम बहुत जालिम है। मैं उसको सीधे रास्ते पर लाना चाहती हूँ... अगर वह मान गया तो ससुराल वाले तंग नहीं करेंगे।”


“वह सीधे रास्ते पर कैसे आएगा... ?”


“बस अगर मैं दो तीन महीने वहां नहीं गई तो वह मुझे मनाने आएगा, फिर मैं उसे सीधा कर दूंगी। बस दो तीन महीने तक मेरा नाटक चलने दो बाबू।”


“नाटक की जरूरत नहीं।


तू दो तीन महीने अपने घर रहना चाहती है न ?”


“हाँ बाबू।”


“मैं तेर बापू को समझा दूंगा...”।”


“ना...ना बाबू – उसे यह सब मत बताना।”


“तू फिक्र न कर... मैं दूसरे ढंग से समझा दूंगा... और वह मान जायेगा... अब जैसा मैं कहूँ – वैसा ही करना...।”


“ठीक है – आप जैसा कहें, मैं करुँगी।”


थोड़ी देर बाद मैं उसे ले कर बाहर निकला। अब वह सामान्य थी।


उसे सही हालत में देख कर सभी अचंभित हो गये।


“क्या उतर गया साहब?” उसके बापू ने पूछा।


“उतर गया। अगिया बेताल ने उसे भगा दिया।”


“हे भगवान – तेरा लाख-लाख शुक्र... साहब आप तो सचमुच देवता आदमी है।”


“सुनो... अभी ख़ुशी मनाने की जरूरत नहीं... अभी मामला पूरी तरह सुलझा नहीं।”


“क्या मतलब... यह तो अब बिलकुल ठीक है।”


“ठीक है मगर इसकी आवाज चली गई... अब इसके भीतर अगिया बेताल छा गया है।”


“हे भगवान... क्या यह गूंगी हो गई।”


“हाँ... लेकिन घबराने की जरुरत नहीं। और वह तब तक इसे आवाज नहीं देगा जब तक इसका पति इसके सामने गिड़गिड़ा कर माफ़ी नहीं मांगेगा। और अगर दो महीने के भीतर उसने ऐसा नहीं किया तो इसके पति का सारा खानदान नष्ट हो जायेगा। अगिया बेताल किसी को नहीं छोड़ेगा। उन्हें बता देना और जब तक यह काम नहीं होता इसे घर से निकलने न देना वरना सारे गाँव पर आफत आ जाएगी। और तुम लोग तब तक बेताल की पूजा करते रहना...।”


“ज...जी...लेकिन इसका पति... क्या वह मानेगा।”


नहीं मानेगा तो उसके घर का विनाश होगा। बेताल उससे बहुत कुपित है। इसका पति इसे प्यार नहीं करता इसलिए ब्रह्मराक्षस ने धावा बोल दिया... अब बेताल कभी ब्रह्मराक्षस को आने नहीं देगा परन्तु यह तभी हो पायेगा जब इसका पति अपने किये की माफी मांगे---।”


उनके चेहरे लटक गये।


एक चौधरी ने कहा – “घबराता क्यों है धीरू... हम इसके पति को तो क्या उसके बाप को भी खींच लायेंगे... इस काम में सारा गाँव साथ होगा।”


बाकी लोग बूढ़े को समझाने लगे।


फिर बूढ़े ने अपनी पोटली खोली।

“आपकी क्या सेवा करूँ ?”


“कुछ नहीं। दो महीने बाद जब समस्या सुलझ जाय तो बेताल के नाम पर गरीबों को खाना खिला देना।”


“जी – वो तो करूँगा ही – मगर आप -।”


“मुझे कुछ नहीं चाहिए – अब तुम लोग जाओ।”


कुछ देर बाद वे लोग चले गये। मुझे उन अहमकों पर बड़ा तरस आया। अगर मैं उन्हें दूसरे ढंग से समझाता तो शायद उनकी समझ में नहीं आता। लेकिन मैं इस बात से अनभिज्ञ था कि शाम तक यह बात चारों तरफ प्रसिद्ध हो गई थी कि साधुनाथ का बेटा रोहताश तो अपने बाप से एक गज आगे है, उसने “अगिया बेताल” सिद्ध किया है। यह खबर जंगल की आग की तरह फ़ैल गई थी, जबकि मुझे इसकी कोई खबर नहीं थी।


न जाने क्यों बुढ़िया ने भी अपना ताम-झाम समेटा और रात होते-होते घर से खिसक गई।


रात का खाना स्वयं चन्द्रावती परोसने आई।


“क्या आप सचमुच अगिया बेताल के स्वामी है।” उसने घरघराते स्वर में पूछा।


मैं एकदम ठहाका मार कर हँस पड़ा।


उसके चेहरे पर तैरने वाली भय की छाया और भी गहरी हो गई।


“आपको किसने बताया ?”


“दादी कह रही थी – मारे डर के वह यहाँ से चली गई।”


“अरे - कब - ?”


“अभी कुछ देर पहले।”


“सुबह दादी को ले आना... भला मैं शहर में पढने वाला क्या जानूं “अगिया बेताल” क्या है... कमबख्तों ने कैसे-कैसे ढोंग रच रखे है। बड़ी हंसी आती है इन लोगों पर... जाने कौन-सी दुनिया में रहते है।”


“तो क्या यह झूठ है ?”


“हद हो गई – आप भी ऐसी बातों पर विश्वास करती हैं।”


“विश्वास...।” उसकी निगाहें शून्य में ठहर गई – जिसने अपनी आँखों के सामने ऐसी बातें घटती देखी हों, वह भला क्यों विश्वास नहीं करेंगी ?”


मैं भी तनिक मूड में आ गया – “अच्छा, भला बताइए यह ‘अगिया बेताल’ क्या बला है ?”


“उसका मजाक न उड़ाओ रोहताश ! तुम्हारे पिता उसे सिद्ध करते-करते पागल हो गए थे और अगर वे पागल ना होते तो शायद उनकी जगह ठाकुर प्रताप ने ले ली होती... ठाकुर चिरकाल के लिये इस दुनिया से बिदा हो चुके होते, किन्तु भैरव ने ऐसा नहीं होने दिया और तुम्हारे पिता की मृत्यु हो गई।”


“क्या मतलब- क्या मेरे पिता को ठाकुर ने मारा है।”


“हाँ.. जादू-टोने में बहुत शक्ति है। यह बात हर कोई मुँह पर लाने से डरता है, पर मैं क्यों डरूं... मेरा जीवन तो उसने नष्ट कर दिया है। मैं तो अब मरी सामान हूँ। अगर मेरा वश चलता तो उस ठाकुर के बच्चे का खून पी जाती। लेकिन मैं स्त्री हूँ जिसे बोलने का भी अधिकार नहीं।”


“लेकिन किसी की हत्या करना कानूनन जुर्म है।”


“कानून सिर्फ शहरों में बसता है... यहाँ इतनी हिम्मत किसमें है जो गढ़ी वालों से दुश्मनी मोल ले।”


“क्या गढ़ी वाले आज भी इतने शक्तिशाली हैं।”


“ओह ! रोहताश – मैं भी कैसी बहकी-बहकी बातें करने लगी जब मुझे मालूम हुआ कि तुमने “अगिया बेताल” सिद्ध कर रखा है तो वे बातें याद आ गई। मैंने सोचा कहीं गढ़ी वाले तुम्हारे भी शत्रु न हो जायें, इसलिए मैं डर गयी थी – अभी तुमको काफी लम्बा जीवन जीना है। सिर्फ मुझे यह बातें नहीं छेड़नी चाहिए थी। रोहताश ! तुम भी उन बातों को भूल जाओ।”


एक तीव्र कम्पन के साथ मेरी आँख खुल गई, मैं एकदम उठ कर बैठ गया और आँखे मलने लगा।


वह कैसा कम्पन था। मेरे कान अब भी झनझना रहे थे। ऐसे जैसे शीशे का फानूस फर्श पर आ गिरा हो और टुकड़े-टुकड़े हो गया हो। कुछ इसी प्रकार की आवाज़ थी। शरीर का रोम-रोम झनझना उठा था।


मैंने अन्धकार में डूबे कमरे को देखा और उस आवाज के बारे में सोचने लगा, जिसने मुझे झकझोर कर जगा दिया था। अभी मैं इस बारे में निर्णय भी नहीं कर पाया था कि कोई घुटी-घुटी चीख मेरे कानों में पड़ी। यह चीख निश्चय ही बाहर से उत्पन्न हुई थी। मैं अपने आपको बिस्तरे में अधिक देर तक न रोक सका, तुरंत दरवाजे की तरफ बढ़ा।


जैसे ही मैंने द्वार खोलना चाहा मुझे यह जानकार आश्चर्य हुआ कि दरवाज़ा बाहर से बंद है। मेरे दिल की धड़कने तेज़ हो गई।


मैं हड़बड़ाया सा पलटा और खिड़की के पास आ पहुंचा। मैंने तुरन्त खिड़की खोल दी। हवा का एक तेज़ झोंका मेरे चेहरे पर पड़ा और मैंने एक मशाल जलती देखी। एक लम्बे कद का इंसान मकान के पिछले हिस्से की तरफ खड़ा था और सर पर पग्गड़ था... चेहरा कपडे में छिपा हुआ।


फिर मुझे दो तीन साए और दिखाई पड़े।


“क्या हो रहा है ?” मैंने मन ही मन कहा – “ये लोग कौन है ?”


अचानक मुझे विचित्र सी गंध का आभास हुआ। यह गंध निश्चित रूप से पेट्रोल की थी। मेरा मस्तिष्क एकदम जाग उठा।


ख़तरा... मेरे दिमाग में एक ही शब्द गूजा... जो कुछ होने का अंदेशा था, उससे मन काँप उठा। ह्रदय बैठने लगा।


अचानक मुझे ध्यान आया कि भीतर के कमरे में वह अभागी स्त्री सो रही है... और कुछ क्षणों के फासले पर मौत नाच रही है। न जाने कितने सेकंड शेष थे... पर मिनट की दूरी कदापि नहीं थी। मुझे बंद दरवाजे का ख्याल आया और समझते देर नहीं लगी कि दरवाज़ा क्यों बंद किया गया, ताकि मैं कमरे से बाहर निकल ही न सकूँ...।


आखिर क्यों...?

यह सब क्यों हो रहा है?


एकाएक मुझे अपनी और चन्द्रा की जिंदगी का ख्याल आया। मेरे भीतर छिपे पुरुष ने मुझे ललकारा, क्या तबाही बच सकती है।


एक ही उपाय और एक ही रास्ता था।


खिड़की से नीचे जमीन की दूरी लगभग पंद्रह गज थी... यह मेरा अंदाजा था... उस वक़्त यह दूरी अगर पचास गज भी होती तो भी मेरा निर्णय नहीं बदल सकता था।


मैंने एकदम अँधेरे में ही खिड़की पर लटकने का प्रयास किया और जरा भी विलम्ब किये बिना नीचे कूद गया।


संयोगवश नीचे घास थी... सूखी घास... ओर मैं न सिर्फ चोट खाने से बचा अपितु मेरे कूदने की आवाज भी उत्पन्न नहीं हुई।


मैं घास से बाहर निकला और अपने आपको अन्धकार में छिपाता हुआ उस तरफ भागा जहाँ मशालची खड़ा था।


मैंने यह भी देख लिया था कि तीन आदमी मकान के चारो तरफ दीवारों पर पेट्रोल छिड़क रहें हैं। यह अनुमान तो मुझे पहले ही हो गया था की वे मकान पर आग लगाने आये हैं।


मशालची शायद इस बात का इंतज़ार कर रहा था, जब पेट्रोल छिड़कने वाले अपना काम समाप्त करके अलग हट जाए और वह अपना काम कर दे। मेरी समझ में नहीं आया कि वे लोग कौन है... और ऐसा भयंकर कृत्य क्यों कर रहें है... क्या वे हमें ज़िंदा जला देने का इरादा रखते हैं।


यह मकान भी तो ऐसी जगह था,जिसके पीछे कोई आबादी नहीं थी और छोटी-बड़ी झाड़ियों का सिलसिला प्रारंभ हो जाता था


एक घुटी-घुटी आवाज फिर सुनाई दी... जो हवा के साथ घुल मिल गई। यह आवाज काफी पीछे कड़ी झाडी के पीछे से आई थी। किन्तु आवाज इतनी अस्पष्ट थी की उसके बारे में कोई अनुमान लगा पाना कठिन था, बस इतना आभास होता था, जैसे किसी का मुँह बंधा हो और वह पुरजोर शक्ति से चीखने का प्रयास कर रहा हो।


मेरा ध्यान मशालची की ओर एकाग्र हो गया। अचानक मैं उसके पीछे पहुँचकर ठिठक गया और उसके साथी आ गये थे।


“हो गया।” किसी ने पूछा।


“हाँ...।” जवाब मिला।


“अब तुम लोग पीछे हट जाओ... मैं आता हूँ।”


वे लोग एक दिशा में बढ़ गये। मशालची ने दायें- बाएं देखा फिर जैसे आगे बढ़ा मैंने अपना दिल मजबूत करके पीछे से उसकी गर्दन दबोच ली। फिर सारी शक्ति लगाकर उसे झाड़ी की तरफ धकेल दिया।


वह झाड़ी की तरफ लड़खड़ाया अवश्य पर मेरा हमला उसके लिए इतना जबरदस्त सिद्ध न हुआ जितना मैं समझता था मेरा ख्याल था कि जैसे ही वह झाड़ी में गिरेगा मैं उसे दबोच लूँगा।


लेकिन जो कुछ मैंने सोचा था, वह नहीं हुआ, अलबत्ता वह सावधान हो गया। मैं दूसरी बार शोर मचाता हुआ उसकी तरफ झपटा। जैसे ही मैं उसके करीब पहुंचा, उसने मशाल की भरपूर चोट मेरी पीठ पर मारी और मैं बिल-बिला उठा। अवसर पाते ही उसने मशाल मकान की तरफ उछाल दी। आग का एक भभका उठा और चंद क्षणों में ही मकान पर आग की लपटें चढ़ने लगी।


मैं उसे रोक पाने में असफल रहा और न अब आग पर काबू पाया जा सकता था। अपना काम ख़त्म करके वह व्यक्ति भागा। आग की लपटों को देखता हुआ मैं कराह कर खड़ा हो गया।


मैंने उस शैतान का पीछा पकड़ लिया। अब तक मैं यह समझ चुका था कि मैंने जो घुटी -घुटी चीख सुनी थी वह निश्चित रूप से चन्द्रावती की थी। इसका अर्थ यह था कि वे लोग चन्द्रावती का अपहरण करके ले गए हैं। इसका एक प्रमाण यह भी था कि इतना शोर मचने के बाद भी मकान के भीतर वैसा ही सन्नाटा छाया था, जबकि आस-पड़ोस के लोग जाग चुके थे और सारे कस्बे में आग-आग का शोर गूंज रहा था।


अब मैं उस व्यक्ति का पीछा उसे पकड़ने के इरादे से नहीं कर रहा था, बल्कि यह जानना चाहता था कि इन लोगो का ठिकाना कहाँ है और इस भयंकर कृत्य के पीछे किसका हाथ है। अगर मैं यह सब जान जाता तो पुलिस कार्यवाही करने में आसानी होती साथ ही चन्द्रावती को उन जालिमों के पंजे से मुक्त किया जा सकता था।


वह व्यक्ति झाड़ियाँ फलांगता हुआ आगे बढ़ता रहा। पहले उसकी गति तेज रही फिर जैसे-जैसे वह घटना स्थल से दूर होता गया उसकी गति में धीमापन आता गया।


वह एक बीहड़ मार्ग से चलता हुआ सूरजगढ़ी के पार्श्व भाग में पहुँच गया। जैसे ही वह सूरज गढ़ी की विशालकाय दीवार के साए में रूका – मैं चौंक पड़ा।


तो क्या इन घटनाओं के पीछे गढ़ी वालों का हाथ है ?


ठाकुर घराने का ध्यान आते ही मेरा रोम-रोम काँप उठा। वह व्यक्ति दीवार के साए में धीरे-धीरे चलने लगा। फिर वह एक खंडहर जैसे स्थान में जा कर गायब हो गया।


गढ़ी की ऊँची दीवार को पार कर पाना आसान काम नहीं था और मेरे लिए यह जानना आवश्यक था कि चन्द्रावती कहाँ है... उस पर क्या बीत रही है। मैं बिना हथियार आगे बढ़ने की मूर्खता कर बैठा और उसी खँडहर में उतर गया। खंडहर में एक पतला सा रास्ता था जो अन्धकार में डूबा था। मैं उसी पर बढ़ गया। हाथों से मार्ग टटोलता हुआ बढ़ता चला गया।


मुझे इसका आभास भी नहीं था की मैं जिस रास्ते पर बढ़ रहा हूँ यह रास्ता मुझे कहाँ ले जायेगा। अभी मैं कुछ ही दूर बढ़ पाया था की सहसा मेरी आँखों पर तेज़ चुंधिया देने वाला प्रकाश पड़ा और मैंने तेजी के साथ दोनों हथेलियों से आँखे ढांप ली पर उसी क्षण बिजली सी टूट पड़ी। सर पर प्रहार हुआ, जाने किधर से....... कंठ से चीख निकली...... हाथ फैलते चले गए, जैसे हवा में तैरने का प्रयास... फिर गहरा खड्ड... जहाँ चेतन संसार विदा हो गया था और लाल पीले सितारों के बीच मेरा अस्तित्व डूबता चला गया।


अस्तित्व एक बार डूबा तो चिरकाल के लिए डूब गया। वे दिन मेरी नादानी के दिन थे किसी का वजूद न देखा... किसी की शक्ति न परखी और खतरे में कूद गया।


यह खुदकुशी वाली बात नहीं तो और क्या थी। मैं इस प्रकार के खेल खेलने का आदी नहीं था। मेरे पुरूष में ऐसी कोई बात नहीं थी, जो असाधारण रही हो। वे लोग तो और ही होते हैं जो जान लेना जानते है, तो देना भी जानते है। मैं तो सिर्फ जान देना जानता था। मेरे पास ऐसा था ही क्या जो आग से खेलूं।


और इस नादानी का अंजाम क्या कम भयानक था.. इसलिए कहता हूँ कि वह खुदकशी थी।


किन्ही भयानक क्षणों में मेरी निंद्रा टूटी... मैं अचेतन से लौट रहा था... धीरे....धीरे.... सारा बदन फोड़े के सामान दुख रहा था। कराहट गले से बाहर नहीं निकल पा रही थी।


फिर चेहरे पर ठंढी बौछार हुई... तो मैंने झट आँखें खोल दी... श्याह वातावरण... कहीं कुछ नजर नहीं आ रहा था... लगा तन्द्रा अभी टूटी नहीं... अंग निष्प्राण पड़े हैं। कुछ देर और राहत मिलेगी... तब कहीं कुछ देख पाने योग्य होऊँगा।


ठंडी फुहार फिर पड़ी।


मैं समझ गया कोई चेहरे पर पानी का छपाका मार रहा है।


साथ ही साथ धीमा स्वर कानों में पड़ा – यूँ लगा जैसे बहुत दूर से आ रहा हो। फिर स्वर स्पष्ट होता चल गया।


कोई बार-बार कह रहा था – “क्या तुम होश में हो....क्या तुम?”


“हाँ...।” मैं कराहा– मैं सुन रहा हूँ।”


मैंने नेत्र बंद कर लिए थे।


“थैंक्स गॉड... अब आँखे खोलो...।


मैंने आँखे खोली।


अब भी वैसा ही अन्धकार... घुप्प...निराकार...।


“मैं कहाँ हूँ...।” मैं कराहा।


“सुरक्षित... अगर मैं ठीक समय पर न देखता तो आदमखोर बाघ तुम्हे ख़त्म कर देता... मैं पूरे पच्चीस रोज से उसके पीछे पड़ा हूँ... आज भी बच निकला... क्या तुम डर से बेहोश हो गए थे ?”


नहीं दोस्त... पर...पर क्या इस समय रात हो रही है।”


“रात... नहीं तो... इस वक़्त तो धूप चढ़ आई है।”


“धूप... तो मुझे कुछ नजर क्यों नहीं आ रहा है।”


“कभी-कभी बेहोशी टूटने के बाद ऐसा ही होता है।” वह बोला – “थोड़ी देर में सब कुछ नजर आने लगेगा।”


“तुम्हारा नाम क्या है दोस्त?”


“अर्जुन सिंह... मैं शिकारी हूँ... एक रिटायर फौजी। रात दिन जंगलों की ख़ाक छानना ही मेरा कार्य है।”


थोड़ी देर बाद उसने गर्म कहवा मुझे पीने को दिया। लेकिन तब तक भी मेरे आँखों के आगे अँधेरा पर्दा ही छाया रहा।


मुझे पूर्णतया होश आ गया था। हालांकि पीड़ा उसी प्रकार हो रही थी पर मेरे सभी अंग कार्य कर रहे थे, सिर्फ नेत्रों को छोड़ कर।


थोड़ी देर बाद मेरा दिल बैठने लगा।


“मिस्टर अर्जुन।” मैंने कांपते स्वर में कहा - “मैं तो अब भी नहीं देख पा रहा हूँ।”


“क्या...?” वह दूर से बोला।


“मैं कुछ भी नहीं देख पा रहा हूँ।”


“इम्पॉसिबल...।”


उसके क़दमों की चाप समीप आई।


“क्या मेरा हाथ नजर नहीं आ रहा है ?”


“नहीं बिलकुल नहीं... यह मुझे क्या हो गया है ?”


“त... तुम मजाक तो नहीं कर रहे हो... तुम्हारी आँखें तो बिलकुल ठीक है।”


“नहीं...नहीं... मैं सच कह रहा हूँ।” मैंने कांपते हांथों से उसे टटोला।


“ओह्ह माय गॉड... क्या तुम पहले अच्छी प्रकार देख लेते थे।”


“हाँ... यह क्या हो गया मुझे...।” मैं चीख पड़ा – “मिस्टर अर्जुन मैं... मैं... अँधा हो गया हूँ... मुझे कुछ नजर नहीं आता... मेरी आँखे... हे भगवान्... मैं क्या करूँ।”


मैंने उठाना चाहा परन्तु उसने मुझे उत्तेजित न होने दिया और उसी जगह बिठा दिया।


“सब्र से काम लो।” वह बोला – “और मुझे पूरी बात बताओ... तुम कौन हो और इस जंगल में क्यूँ आये ?”


म... मैं एक डॉक्टर हूँ... और...।” उसके बाद मैंने सारी बात कह सुनाई।


“सूरजगढ़... सूरजगढ़ तो यहाँ से तीस मील दूर है... यह तो काली घाट इलाका है... इस क्षेत्र का सबसे बीहड़ इलाका... यहाँ तो सिर्फ शिकारी आते है या डाकू बसते हैं। और तुम्हारी कहानी बहुत विचित्र है।”


मैंने उसे यह नहीं बताया था की मेरा बाप तांत्रिक था। बहुत सी बातें मैं छिपा गया था, परन्तु आग लगने से लेकर बेहोश होने तक की सारी घटनाएँ उसे बता दी थी।


“और यह कौन सी तारीख की बात है।”

मैंने तारीख बता दी।

“इसका मतलब तीन रोज पहले का वाक्या है। अजीब बात है... तुम इतने लम्बे समय तक बेहोश रहे और बेहोशी में इतनी दूर पहुँच गए। खैर फिक्र करने की बात नहीं... पहले इस मामले की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करवाते है... घबराओ नहीं मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

“और आँखें... मेरी आँखें...।”


“तुम तो डॉक्टर हो, इतना अधिक निराश होने से बात नहीं बनेगी... आजकल तो आँखें कोई बड़ी समस्या नहीं। इंसान यदि जन्मजात अँधा न हो तो उसे नेत्र ज्योति दी जा सकती है। कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि लम्बी बेहोशी या बीमारी में कोई अंग काम करना बंद कर देता है पर वह अस्थाई होता है, परन्तु इलाज़ करने से हल निकल आता है। इस बारे में तुम तो मुझसे अधिक जानते होगे। मैं तो इतना जानता हूँ इसी प्रकार एक बार मेरा दायाँ हाथ बेकार हो गया था पर दो महीने बाद ठीक हो गया। हौसला छोड़ने से काम नहीं बनता।”


वह मुझे सान्त्वना देता रहा।


कुछ समय बाद उत्तेजना कम हुई और बुद्धि काबू में आई।


“हम आज ही सूरज गढ़ के लिए रवाना हो जाते है।”


“तुम मेरे साथ क्यों कष्ट कर रहे हो ?”


“यह कष्ट नहीं कर्त्तव्य है। आज की दुनिया में तो इश्वर भी इतना व्यस्त हो गया है कि वह अपने बन्दों को कर्त्तव्य निभाने का अवसर ही नहीं देता और जब देता है तो इंसान कर्त्तव्य भूल कर अपने स्वार्थ में डूबा रहता है या उसे अपने ही कामों से फुर्सत नहीं मिलती और वह नरक का भोगी बन जाता है। क्या जाने यह मेरी परीक्षा ही हो... क्या जाने तुम्हारे स्वर्गीय पिता की आत्मा ने मुझे तुम्हारी सहायता के लिए प्रेरित किया हो।”


“तुम बहुत अच्छे विचारों के आदमी मालूम पड़ते हो, काश कि मैं तुम्हें देख सकता।”


“देखने में मेरे पास कोई ख़ास बात नहीं। न मैं बांका छबीला नौजवान हूँ और न बड़ी दाढ़ी और लम्बी बाल वाला धर्मात्मा... मैं तो चेहरे से खूसट नजर आने वाला व्यक्ति हूँ... जिसके चेहरे पर दाढ़ी की जगह झाड़ी के सूखे तिनके है... और भद्दी मूंछे.... गाल पर बारूद से जल जाने के कारण धब्बा है और आँखे किसी क्रूर फौजी जनरल जैसी... शरीर पर खाकी पोशाक है... हाथ में बन्दूक... मेरा हुलिया एक डकैत से भी बदतर है... हाँ शारीर मजबूत अवश्य है, इसलिए जंगली जानवरों से नहीं डरता।”


“काफी दिलचस्प आदमी लगते हो।”


“हद से अधिक जानवर भी यही सोचते है, इसलिए पास भी नहीं फटकते... अच्छा तुम थोड़ी देर आराम करो, इतने मे मैं तैयारी करता हूँ।


मेरी पीठ के नीचे रबर के तकिये रख कर वह कहीं चला गया।


शाम को हमने यात्रा शुरू की और अगले दिन सूरजगढ़ पहुँच गए। मेरे बताये पते के अनुसार वह कस्बे में गया। इस बीच उसने मुझे कस्बे से बाहर ही छोड़े रखा।


जब वह लौटा तो बोला – “तुमने सच कहा। वह मकान जल कर राख हो गया है। कोई आदमी कुछ बताता ही नहीं। क्या सूरज गढ़ी के ठाकुर का इतना दबदबा है ?”


“मैं पहले ही कह चुका था।”


“न जाने तुम्हारी सौतेली मां का क्या हुआ... खैर... विक्रमगंज चलते है।वहीं थाना पड़ता है... वहाँ एक हाकिम से मेरी जान पहचान है। मैं नहीं चाहता की तुम्हें पुनः कोई चोट पहुंचे और रहा मेरा सवाल... तो मैं तब तक शिकार पर हाथ नहीं डालता जब तक उसकी ताकत का पूरा-पूरा हिसाब-किताब न लगा लूँ... मैं तो फौजी उसूलों पर चलता हूँ... वार सही जगह होनी चाहिये... फिर बड़े से बड़ा महारथी धराशाई हो जाता है।”


हम लोग विक्रमगंज की ओर चल पड़े। उसके पास अपनी जीप थी, जिसमे सभी जरूरी सामान हर समय रहता था। मेरे शरीर में हल्की-हल्की पीड़ा उस वक़्त भी थी।


हमने विक्रमगंज के थाने में रिपोर्ट लिखवाई। वे लोग गढ़ी वालों के खिलाफ कोई रिपोर्ट लिखने के लिए तैयार नहीं थे। परन्तु मेरे उस दोस्त ने फौजी रुआब दिखाया तो वे मान गए।


“अब मैं अपने उस हाकिम दोस्त से मिलूँगा –अरे हाँ... तुम यहीं तो रहते हो... मैं चाहता हूँ अब तुम आराम करो... यह दौड़धूप मैं कर लूंगा।


मैंने अपना पता बता दिया।


उस वक़्त मैं दो कमरों के एक सरकारी मकान में अकेला रहता था। अभी मैं यहाँ नया-नया आया था... नौकर नहीं रखा था... वहां मुझे बहुत कम लोग जानते थे। इन दिनों मैं पंद्रह रोज की छुट्टी पर था।

***


एक महीना बीत गया। मेरे कष्टप्रद दिनों का एक माह... यह तीस दिन तीस साल से भी अधिक भयानक थे। इस बीच मैंने अपनी आँखों की रौशनी पाने के लिए हर चंद दौडधूप की थी। पर कोई नतीजा नहीं निकला। जिस नेत्र विशेषज्ञ ने देखा , मेरी आँखों को सामान्य बताया और जब नेत्र सामान्य थे तो अंधेरा कैसा... मेरे केस को देखकर बड़े-बड़े डॉक्टर अचंभित हो गये थे।


इस बारे में मैंने चाचा जी को कोई खबर नहीं दी थी। मेरे साथ अर्जुन ने काफी दौड़धूप की थी, पर वह निराशावादी नहीं था।


एक दिन मैंने उससे कहा –

“अब तुम क्यों मेरे साथ समय नष्ट कर रहे हो... मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो अर्जुन।”


“मैंने आज तक हार नहीं मानी... और अब भी नहीं मानूंगा... मैं जानता हूँ इश्वर इतना बेरहम नहीं है... एक दिन तुम्हारी आँखों में रौशनी लौट आएगी।”


“हां सो तो है... फिर भी मैं अपना पता छोड़े जा रहा हूँ... तुम कहीं न जाना दोस्त और कोई मुसीबत हो तो किसी से पत्र लिखवाकर डाल देना... हालाँकि मैं घुमक्कड़ हूँ फिर भी जो पता छोड़ रहा हूँ , वहां से तुरंत मुझ तक खबर पहुँच जायेगी।”


अर्जुनदेव चला गया। मेरे लिए तो वह अब तक भी अजनबी था। वह मेरे उस वक़्त का मित्र था, जब मेरे नेत्रों की ज्योति छिन गई थी। मुसीबत के दिनों का साथी भुलाए नहीं भूलता। अर्जुनदेव तो एक अच्छा दोस्त था। वह मेरी डायरी में अपना पता अंकित कर गया था।


अर्जुनदेव के जाने के बाद तीन दिन बीते थे, कि एक पुलिस कांस्टेबल मेरे पास आया।


“आपको थाने बुलाया है।” उसने कहा।


“क्यों ?” मैंने पूछा।


“आपने जो रिपोर्ट दर्ज कराई थी,उस सम्बन्ध में दरोगा जी आपसे बात करना चाहते हैं।”


मैंने उसका हाथ पकड़ा और थाने पहुँच गया। मेरे साथ मेरा स्थानीय दोस्त भी था। मैं जसवीर सिंह नामक थानेदार के सामने जा पहुंचा। उसने मुझे बैठने के लिए कहा।


“मैंने उस केस की जांच पूरी कर ली है।” वह बोला “मैंने तो उसी रोज इशारा किया था कि कोई लाभ न होगा। लेकिन आपने हमारे एस० पी० से संपर्क करके जांच के लिए विवश करवाया और अब जांच पूरी हो गई है।”


“मैं जानना चाहता हूँ”


“इसीलिए बुलाया है। आपकी सौतेली मां चन्द्रावती का पता लग गया है। वह अपने नए मकान में रह रही है। उसके बयानों से आपकी रिपोर्ट झूठी साबित होती है।”


“जी...।”


“जी हाँ... चन्द्रावती का बयान है की आग उसकी गलती से लग गयी थी। हवा के कारण लालटेन कपड़ों के ढेर पर गिर गई थी और जब उसकी आँख खुली तो आग बेकाबू हो चुकी थी। किसी तरह वह अपनी जान बचा कर बाहर निकलने में सफल हो सकी। उसका कथन है कि उस रात तुम घर मे मौजूद नहीं थे।”


कुछ पल रुक कर वह बोला –

“और घर जल जाने के कारण वह अपने किसी रिश्तेदार के पास चली गई थी। कस्बे में उसका कहीं ठिकाना नहीं था। कुछ दिन बाद वह लौट आई और नए मकान में रहने लगी।


“तुम्हारी रिपोर्ट में जो बातें दर्ज है वह उस रात की घटना से कोई तालमेल नहीं रखती, ऐसा लगता है तुमने वह रिपोर्ट ठाकुर से व्यक्तिगत रंजिश के कारण लिखवाई है”


“ऐसा नहीं है... हरगिज नहीं।” मैंने मुट्ठियाँ भींचकर कहा।


“उत्तेजित होने की आवश्यकता नहीं।”


“इंस्पेक्टर साहब ! आप मेरी आँखे देख रहें है – इन आँखों ने उस रात के बाद कोई दृश्य नहीं देखा। इन आँखों में आग का वह दृश्य आज भी मौजूद है, ये आँखें उस रात की घटना की साक्षी है।”


“मुझे तुमसे सहानुभूति है। कोई दूसरा होता तो मैं झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने के आरोप में उसे गिरफ्तार कर लेता।”


“मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता, उसने ऐसा बयान क्यों दिया ?”


“मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता। मैंने अपनी छानबीन पूरी कर ली – तुम्हें यही सूचित करना था। अब तुम जा सकते हो।”


मेरे पास चारा भी क्या था, लेकिन मैं थाने से निकलते वक़्त बहुत उत्तेजित था। मेरा सर घूम रहा था और टांगे कांप रही थी। अगर मेरा दोस्त मुझे सहारा न दिया होता तो मैं लड़खड़ा कर गिर पड़ता। धीरे-धीरे लाठी का सहारा ले कर मैं गेट तक पहुंचा तभी जीप रुकने की आवाज सुनाई दी। जीप थाने से निकल रही थी, वह पीछे से आई थी।


“सुनो।” उसी थानेदार का स्वर सुनाई पड़ा।


मैं ठिठक कर रुक गया, शायद मुझे ही पुकारा हो।


उसने मुझे ही पुकारा था।


“तुम्हें एक नेक सलाह देना चाहूँगा।” वह बोला – “गढ़ी वालों से उलझ कर किसी ने सफलता प्राप्त नहीं की बल्कि खुद को मिटा दिया। मुझे पूरा विश्वास है की बात तुम्हारी समझ में आ गई होगी।”


जीप आगे बढ़ गई।


उसकी बातें नश्तर की तरह सीने में उतर गई। सूरजगढ़ी... गढ़ी का ठाकुर... उसने मेरी दुनिया बर्बाद कर दी है... और चन्द्रावती... उसने भी साथ नहीं दिया – क्या उसे मालूम नहीं की मैं अन्धा हो गया हूं। अवश्य मालूम होगा – तो उसने ऐसा बयान क्यों दिया....।”


“क्यों..?”


इस क्यों का जवाब मुझे नहीं मिल पा रहा था।


और ठाकुर प्रताप जिसकी मैंने शक्ल भी नहीं देखी, क्या वह इतनी बड़ी ताकत है कि जिसकी चाहे जिंदगी उजाड़ दे।


मेरे सीने में बगावत थी।


मैं इसका बदला लूंगा।


बदला...।


प्रतिशोध की आग सीने में धधकती जा रही थी।


अगर मुझे अपनी जान भी देनी पड़ी तो भी मैं उसे सबक पढ़ाऊँगा... मेरी जिंदगी की अब तो कोई कीमत रही ही नहीं है।

अनेक आशंकाओं के बादल दिमाग में घुमड़ रहे थे


आज फिर वैसा ही पानी बरस रहा है... वैसी ही तूफानी रात लगती है। मेरे लिए तो सारा संसार अँधेरे की दीवार है... पर आज तो अवश्य रात और भी भयानक काली होगी।


एक सवार आगे बढ़ रहा है।


वह सवार मैं ही तो हूं।


घोड़े की लगाम आज शम्भू ने थामी है... वह अच्छी काठी भी चला लेता है। मैंने उसे चिट्ठी डालकर गाँव से बुलाया है - क्योंकि वह मेरे भरोसे का आदमी है।


मुझे याद आया दो रोज पहले शम्भू मेरी हालत देख कर कितना रोया था, वह मेरे पिता का खैरख्वाह भी रह चुका था और मुझे साहब बहादुर कहता था।

वह मेरे लिए प्राणों की आहुति दे सकता था।


शम्भू मेरे हुक्म का पालन कर रहा था। बरसात तो इस क्षेत्र में अक्सर होती थी और आये दिन घटायें छाई रहती थी।


इस रात भी मूसलाधार पानी बरस रहा था।

और मैं दृढ संकल्प लिए आगे बढ़ रहा था।


बड़ी खामोशी से यात्रा जारी थी। कभी-कभी मैं उससे पूछ लेता की हम कहाँ तक आ पहुंचे हैं, तो वह संक्षिप्त सा जवाब दे देता।


मेरी यह यात्रा अत्यंत गोपनीय थी इसलिए रात का सफ़र तय किया था। जबकि मेरी समझ में अभी तक यह बात नहीं आई थी की मैं वहां जा कर क्या करूँगा।


बस इतनी ही बात तय समझी थी की मैं सर्वप्रथम चन्द्रावती से मिलूंगा जो मेरी नामचारे की मां है। मुझे उससे विश्वासघात का कारण पूछना था।


काफी देर बाद मैंने उससे पूछा।

“अब कितनी दूर है शम्भू ?”