अंजाना रास्ता

 


अंजाना रास्ता 


ये कहानी तब की है जब मे 11 क्लास मे पढ़ता था . मे अपने चाचा जी के घर


पर पढ़ाई कर रहा था क्योंकि मेरा घर गाँव मे था और वाहा कोई अच्छा स्कूल


नही था इसलिए मेरे चाचा मुझे अपने साथ अपने घर ले आए थी. उनका घर काफ़ी


बड़ा था. अब मुझे मिलाकर घर मे चार मेंबर हो गये थी . पहले और घर के बड़े


चाची जी और चाची जी और उनकी एक लोति संतान अंजलि दीदी जिनकी उम्र उस वक्त


23 थी और चोथा था मे ( अनुज ).


अंजलि दीदी बहुत खूबसूरत थी उनकी हाइट 5' 5" , स्लिम , गोरा रंग और जो


मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थी वो थी उनके रेशमी लंबे बाल जो कि उनकी लो बेक


तक आते थे. कुल मुलाकर अंजलि दीदी किसी फिल्म आक्ट्रेस से काम नही लगती


थी. वो मुझे बहुत प्यार्कर्ती थी इसकी वजह शायद ये भी थी कि उनके कोई


अपने छोटे भाई बहन नही थे. सो मेरे घर मे आने से वो अब अकेला महसूस नही


करती थी . अंजलि दीदी एम.कॉम कर रही थी उनकी मैथ बहुत अच्छी थी . सो वो


मुझे अक्सर मैथ मे हिल्प कर दिया करती थी. मेरे स्कूल मे मेरे ज़्यादा


फ्रेंड नही थे सिर्फ़ गिने चुने दोस्त थे. राज भी उनमे से एक था ..वो


पढ़ाई लिखाई मे कम और गुंडा गर्दि मे ज़्यादा लगा रहता था …उसकी मेरी


दोस्ती तब हुई थी जब मे स्कूल मे नया आया था. मे नया नया गाँव से आया था


सो ज़्यादा पता नही था सहर के लोगो के बारे मे इसलिए कुछ सीनियर लड़को ने


मुझे स्कूल मे पकड़ कर मेरे पैसे छीनने चाहे ..मे बहुत डर गया था..पर


मैने उन्हे पैसे देने से इनकार कर दिया ..तब एक लड़के ने मेरा गिरेवान


पकड़ कर मुझे मुक्का मारना चाहा कि तभी कही से राज आ गया वो लंबा चौड़ा


था ..उसको देख कर उन लड़को ने मुझे छोड़ दिया..तब से ही हम दोस्त थे…


मेरा स्कूल बाय्स स्कूल था सो एक दिन क्लास मे जब मे लंच टाइम मे लंच कर


रहा था तो राज मेरे पास आया और बोला .." अबे क्या अकले अकेले खा रहा है …


मैने उसको बोला ले भाई तू भी खा ले …वो हस्ने लगा और बोला जल्दी खाना खा


तुझे एक अच्छी चीज़ दिखाता हू….उसका चेहरा चमक रहा था..मुझे भी उत्सुकता


थी ज़ल्दी खाना खाया और फिर बोला " हा. राज बता क्या बात है' तब राज ने


इधर उधर देखा ..क्लास मे और कोई नही था ..उसने अपने बेग मे हाथ डाला और


के छोटी सी किताब निकाल ली…मैं बड़े ध्यान से उसे देख रहा था….जैसे ही


उसने वो किताब खोली मेरे रोंगटे खड़े हो गये ..उस किताब मे जो फोटो थी


उनमे लड़कियो की नंगी तस्वीरे थी….मेरा चेहरा लाल हो गया था शरम से. मुझे


देख राज हंस पड़ा. और बोला." अबे चुतिये क्या हुआ ..तेरी गांद क्यो फॅट


रही है…" मैने अपनी ज़िंदगी मे पहली बार ऐसे फोटो देखी थी .. मैने कहा


राज कोई देख लेगा यार..अगर पकड़े गये तो बहुत पिटाई होगी..तब राज बोला तू


तो बड़ा फटू है साले इतनी मुस्किल से तो इस किताब का जुगाड़ किया है मैने


..फिर वो उसके पन्ने पलट ने लगा ..दूसरे पन्नो मे एक आदमी खड़ा था और एक


लड़की उसका लंड अपने मूह मे ले रही थी..मुझे बहुत डर लग रहा था पर अब


मेरी इच्छा और बढ़ गई थी मे उस बुक को पूरा देखना चाहता था…तभी स्कूल बेल


बजी जिसका मुतलब था कि लंच टाइम ख़तम हो गया है ..राज ने उस किताब को


वापस अपने बेग मे रख लिया क्योंकि बाकी बच्चे क्लास मे आने लगे थे…मुझे


बड़ा गुस्सा आया क्योंकि मुझे उस किताब की बाकी फोटो भी देखनी थी ..पर


क्या करता क्लास अब बच्चो से भर चुकी थी और साइन्स का टीचर क्लास मे एंटर


हो चुका था.


उस दिन जब मे छुट्टी होने के बाद घर गया तब घर पर चाची ही थी . चाचा जी


तो ऑफीस से शाम को आते थे और अंजलि दीदी 4 बजे कॉलेज से आती थी . खैर


मैने खाना खाया और अपने कमरे मे थोड़ा आराम करने के लिए चला गया ( मे


आपको ये बता दू अंजलि दीदी और मेरा कमरा एक ही था बस बेड अलग थे


).गर्मियो के दिन थे सो मुझे नींद आ गयी..मुझे सपनो मे भी वोही तस्वीरे


..वो नंगी लड़किया..उनकी बूब्स..नज़र आ रही थी..कि तभी मुझे कुछ गिरने की


आवाज़ आई ..मैने अपनी आँखे खोली तो देखा की दीदी के बेड पर कुछ बुक्स


पड़ी है जिसका मुतलब सॉफ था कि दीदी घर आ चुकी है…तभी मेरी नज़र अपने


पाजामे पर गयी..उसका टेंट बना हुआ था ..मेरा लंड उन फोटो को याद करते


करते खड़ा हो चुका था..वो तो अच्छा था कि मे उल्टा सोया था नही तो दीदी


उसको देख सकती थी..मे उठ कर बैठा ही था कि अंजलि दीदी कमरे मे आए उन्होने


पिंक सूट और ब्लॅक सलवार पहने हुए थी . " और मिस्टर जाग गये तुम….कितना


सोते हो.." अंजलि दीदी अपना दुपट्टा उतार कर स्टडी टेबल पर रखते हुए


बोली….मे अभी भी थोड़ा नींद के नशे मे था …दुपपता उतारने से उनके बूब्स


और उभर कर बाहर आ गये थे..और मेरे नज़र सीधी उनपर गयी…वैसे तो मे दीदी को


काई बार विदाउट दुपपता देख चुका था फिर पता नही आज उनके बूब्स देखते ही


मेरा दिमाग़ उन नंगी लड़कियो के बूब्स को दीदी के बूब्स से कंपेर करने


लगा और मेरे लंड ने ज़ोर से झटका लिया..ऐसा मेरे साथ पहले बार हुआ था…"


दीदी बहुत थक गयी थी..पता नही कब नींद लग गयी मुझे." मैने दीदी की तरफ


देखा जो कि अपने बेड पर बैठ गयी थी..तभी दीदी ने कुछ ऐसा किया के मेरे


लंड ने दोसरा झटका मारा दीदी ने अपने जुड़े की पिन खोली और उनकी लंबे


सेक्सी रेस्मी बाल खुल गये फिर दीदी ने उनको आगे किया और मुझे देखते हुए


बोली " क्या हुआ मिस्टर. ऐसे क्या देख रहा है तू.." मेरा तो चहरा एक दम


से लाल हो गया मुझे ऐसा लगा जैसे की मे चोरी करते हुए पकड़ा गया हू… मे


घबरा कर बोला..एमेम…ह्म्म…का .कुकुच ..नही दीदी …वो आपके बाल …" मेरा गला


सुख चुका था. दीदी हस्ते हुए अपने बेड से उठ कर मेरी बगल मे बैठ गयी.


मुझे उनके बदन पर लगे डीयोडरेंट की खुशुबू आ रही थी..और साथ मे डर भी लग


रहा थी कि कही दीदी मेरे पाजामे की तरफ ना देख ले…खैर ऐसा कुछ नही हुआ और


दीदी ने मुझे गाल पर एक किस दिया और बाहर जाने लगी..मे उन्हे जाते हुए


देख रहा था..उनकी लंबे बाल उनकी कमर पर बड़े सेक्सी तरीके से लहरा रहे


थे..और मुझे चिड़ा रहे थे…


" अबे वो किताब कैसे लगी थी तुझे…मज़ा आया था." राज मुझे चिड़ाते हुई


बोला. हम क्लास मे पिछले डेस्क पर बैठे थे.


" कितनी बार मूठ मारा था तूने ..बोल बोल…शर्मा मत.." वो फिर बोला


"मैने ऐसा कुछ नही क्या" मे बोला


"अबे चूतिए वो तो सिर्फ़ फोटो थी …बोल उनकी मूवी देखे गा…ज़ल्दी बोल.."


ये सुन कर मेरे लंड मे हर्कात से होने लगी. और ना चाहते हुए भी मेरे मूह


से निकला " क..कहा..देखेंगे "


वो तू मुझ पर छोड़ दे ..चल स्कूल के बाद मेरे साथ चलना और.मैने हा मे सिर


हिला दिया.


स्कूल की छुट्टी होते ही राज मुझे स्कूल के पास वाले साइबर केफे ले


गया..हमने कोने वाली एक सीट ली ..कंप्यूटर को राज ओपरेट कर रहा था ..जिस


तरह से वो कंप्यूटर चला रहा था उससे पता लगता था कि वो इस काम मे काफ़ी


एक्ष्पर्त है..मैने उसे कई बार इस साइबर केफे से आते जाते देखा था…तभी


उसने कोई साइट खोली और सामने नंगी लड़कियो की तस्वीर आनी शुरू हो गयी..


ये सब देखते ही मेरा गला सूख गया मे ये सब पहली बार देख रहा था..फिर राज


ने किसी लिंक पर क्लिक किया और कुछ सेकेंड बाद एक क्लिप प्ले होने लगी


..उसमे एक आदमी एक लड़की के उप्पर चढ़ा हुआ था..लड़की झुकी हुई थी और वो


आदमी ज़ोर ज़ोर से धक्के लगा रहा था….ये देखते ही मेरा लंड ना जाने क्यू


मेरी पॅंट मे खड़ा हो गया ..


" इसको चुदाई कहते है ..देख कैसे चोद रहा है लड़की की चूत को….."


मे कुछ बोल नही रहा था मेरी आँखे तो कंप्यूटर स्क्रीन से चिपक गयी थी


..मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था. ..और मन मे ये डर भी था कि कही कोई हमे


पकड़ ना ले ये सब देखते हुए..


अचानक मेरी आँखे नीचे गयी और मैने देखा कि राज के पेंट मे भी टेंट बना


हुआ है…सिर्फ़ अंतर इतना था कि उसका टेंट काफ़ी बड़ा लग रहा था.. मैने


फिर से कंप्यूटर की तरफ़ देखा..अब वहा दूसरी क्लिप चल रही थी ..इसमे एक


काला आदमी की गोरी लड़की को बड़ी बेरहमी से चोद रहा था " गोरी लड़की बहुत


खूबसूरत थी और वो काला आदमी उतना ही बदसूरत..पता नही क्यू इसे देख मेरा


लंड और ज़्यादा कड़क हो गया..क्लिप्स छोटी छोटी ही थी..पर उन छोटी छोटी


क्लिप्स ने मेरे अंदर बड़े बड़े अरमान जगा दिए थे.. हम वहा १ घंटे तक रहे


फिर मे घर आ गया.


"आह….फक मी..ह्म्म…." लड़की चिल्ला रही थी. ये वोही लड़की थी जिसको मैने


उस मूवी क्लिप मे देखा था बस अंतर इतना था कि उस काले आदमी के जगह मे


उसको चोद रहा था…एमेम….ह्म..आ.आ….फक..मी..मेरे आँखे बंद थी . तभी मुझे


कुछ गीला गीला लगा..मेरी आँखे खुल चुकी थी ..और मेरा सपना भी टूट चुका


था…मेरे लंड ने सपना देखते देखते ही पानी छोड़ दिया था…मैने घड़ी की तरफ़


देखा तो रात के 2 बजे थे .कमरे मे नाइट बल्ब जल रह था….. यका यक मेरी


नज़र सामने अंजलि दीदी के बेड पर गयी. जिसको देख तेही मेरे रोंगटे खड़े


हो गये…….


दीदी बिस्तर पर सीधी सो रही थी ..उनकी चूचियाँ बिल्कुल सीधी तनी खड़ी थी


..जैसे जैसे दीदी सास लेती थी वो उप्पर नीचे होती थी…मेरे नज़र तो मानो


उन खोबसुर्रत उभारो पर ही जम गयी थी …अब मुझे अपने पाजामे मे फिर से वो


ही हरकत महस्सूस होनी लगी .मेरा लंड खड़ा हो रहा था….मुझे ये समझ नही आ


रहा थी कि मुझे अपनी दीदी को देख कर क्यू ऐसा लग रहा है..वो मुझे कितना


प्यार करती है ..मुझे अपने उप्पर गिल्टी होने लगी..मे फिर सीधा बाथरूम


गया और पेशाब कर कर अपने बेड पर आकर सो गया.


अगली सुबा मेरी आख 8 बजे खुली.मे उठ कर बैठा और चारो तरफ़ देखा तो पाया


की दीदी का बॅग टेबल पर रखा है. आज दीदी कॉलेज नही गयी शायद. खैर मे उठ


कर फ्रेश हुआ और ड्रॉयिंग रूम की तरफ़ चला ..अंजलि दीदी सोफे पर बैठी


टीवी देख रही थी… दीदी को देखते ही मुझे रात की बात याद आई ..और मेरे


अंदर फिर से गिल्टी फीलिंग आ गयी..


"अरे..मेरा राजा भैया जाग गया..आजा..यहा बैठ मेरे पास.." दीदी मुस्कुराते हुए बोली.


" आप कॉलेज नही गयी दीदी" मैने पूछा.


"लो कर लो बात …तुझे हुआ क्या है आज कल…अरे सनडे को कोई कॉलेज जाता है


क्या " दीदी मुझे अपने पास बैठाते हुए बोली.


ओह आज सनडे है मुझे अपने बेवकूफी पर गुस्सा आया. सच मे पछले कुछ दिनो से


राजके साथ रहकर मैं भी उसकी ही तरह हो गया हू.


"चाची और चाचा जी नज़र नही आ रहे." मे बोला


"अरे हा ..मे तुझे बताना भूल गयी मम्मी पापा आज बुआ जी के यहा गये है .


शाम तक आएँगे…" दीदी टीवी देखते हुए बोली.


"तुझे भूक लगी होगी ना..मम्मी खाना बना कर गयी है ..रुक मे तेरे लिए लाती


हू' और दीदी उठ कर किचिन मे चली गयी. मैने टीवी का रिमोट लिया और चैनल


चेंज करना चाहा पर रिमोट के सेल वीक हो गये थे सो कई बार बटन दबाने के


बाद चैनल चेंज हुआ..मैने बड़े मुस्किल से अनिमल प्लॅनेट चैनल लगाया..मुझे


अनिमल प्लॅनेट चैनल देखना बहुत पसंद था..थोड़ी देर के बाद दीदी खाना लेकर


आ गयी..वो मेरे पास बैठ गयी..हम दोनो ने खाना खाया.फिर दोनो टीवी देखने


लगे.. " तू ज़रूर बड़ा होकर जानवरो का डॉक्टर बनेगा ." दीदी मुस्कुराती


हुई बोली


" क्यू..दीदी" मैं उत्सुकता से दीदी की तरफ़ देखता हुआ बोला


सारे दिन अनिमल प्लॅनेट जो देखता रहता है तू.. दीदी अपने रेशमी बाल खोल


कर अपने सीने पर डालते हुए बोली..मेरा तो बुरा हाल होगया ..एक तो दीदी थी


ही इतनी खोब्सूरत उपर से जब अपने लंबे रेशमी बाल खोल लेती थी तो क्या


काहू..कटरीना कैफ़ भी फैल हो जाती थी उनकी सामने.


" ला अपना लेफ्ट हॅंड दे ..मे तुझे तेरा फ्यूचर बताती हू " कहते हुए दीदी


ने मेरा हाथ अपने हाथो मे ले लिया ( मे आपको बता दू कि दीदी नी लॉस


टी-शर्ट ऑफ पाजामा पहना हुआ था ) . " ओफ्फ….म्म..क्या मुलायम हाथ था दीदी


का..उनके गोरे गोरे हाथो मे मेरे हाथ भी काले नज़र आने लगे थे…


" तू..बड़ा होकर बनेगा ..म्म..एक..जोकर….हा .हा हा.." दीदी हस्ने लगी.


दीदी मज़ाक कर रही थी और मुझे हसाने की कोशिस कर रही थी पर मे तो उनकी


खूबसूरती को निहार रहा था.


पर थोड़ा मज़ाक करने के बाद हम दोबारा टीवी देखने लगे..कुछ 5 मिनट ही हुए


थे कि तभी कुछ ऐसा हुआ जिससे मेरी ही नही दीदी की भी साँसे रुक गयी


थी….जैसा कि मैने आपको को बताया कि टीवी पर अनिमल प्लॅनेट चल रहा था..सब


कुछ सही चल रहा था ..कुछ ज़ब्रा घास चर रहे थे कि अचनाक एक बड़ा सा


ज़ीब्रा वाहा आया और एक फीमेल ज़ीब्रा की चूत को पीछे से सूंघने लगा..फिर


उसने अपनी ज़ीब निकाली और वो उसकी चूत को चाटने लगा..कॅमरा मॅन ने इसका


क्लोज़ अप लेना सुरू कर दिया..जैसे जैसे वो उसकी चूत चाट रहा था मैने


देखा कि अब कमरे का फोकस उस ज़ीब्रा की टाँगो की तरफ़ था चूत चाटते चाटते


उसका लंड बढ़ता ही जा रहा था..और ये सब मे अकेला नही बल्कि पास बैठी दीदी


भी देख रही थी..पूरे कमरे मे अब सिर्फ़ टीवी की आवाज़ ही आ रही थी..यका


यक पता नही मेरी नज़र दीदी पर गयी…तो मैने पाया कि दीदी बिना आँखे बंद


किए ये सब देख रही है…फिर मेरी नज़र दीदी की गर्दन से नीचे सीधे उनके


उभारो पर गयी..अब वे और ज़्यादा तन गयी थी .और जल्दी जल्दी उपर नीचे हो


रही थी.शायद दीदी की सासे तेज चल रही थी…तभी दीदी की नज़र मुझसे


मिली..कुछ सेकेंड के लिए.ही मिली थी …शर्म से उनका गोरा चहरा लाल हो रहा


था..वो कुछ ना बोली और आगे बाद कर रिमोट उठा कर चैनल चेंज करने लगी..पर


जैसे कि मैने पहले बताया था कि रिमोट के सेल वीक हो गये थे चैनल चेंज नही


हुआ..पर तभी टीवी स्क्रीन पर वो ज़ीब्रा उस फीमेल ज़ीब्रा पर चढ़


गया…मुझे तभी अहसास हुआ कि मेरा हाथ अब भी दीदी के कोमल हाथो मे था जो कि


अब उनकी राइट थाइ पर रखा हुआ था…उनकी सॉफ्ट थाइट की स्किन को मे उनके


पजामे के उपर से महसूस कर सकता था..मेरा दिल जोरो से धड़कने लगा..उधर


ज़ीब्रा ने एक ही झटके मे अपना विशाल लंड फीमेल ज़ीब्रा की चूत मे घुसा


दिया..और जैसे ही उसने पहला झटका मारा दीदी ने मेरे हाथ को कस कर भीच


लिया..मेरी हालत बहुत बुरी हो गयी…मुझे लग रहा था कि एक तरह से मे दीदी


के साथ बैठा ब्लू फिल्म देख रहा हू..मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया..ज़ीब्रा


लगातार झटके मार रहा था…मुझ पर सेक्स का नशा चढ़ता जा रहा था …कुछ तो उन


जानवरो की चुदाई देख कर ..और कुछ दीदी के नरम हाथो और उनकी गरम जाँघो की


गर्मी..मुझसे रहा नही गया और अचानक मैने अपने हाथो को थोड़ा खोला और


अंजलि दीदी की राइट जाँघ जिस पर मेरा हाथ रखा था को कस्स कर दबा दिया…बस


मेरे लिए ये काफ़ी था और मेरे लंड से पानी छोड़ दिया…वो तो अच्छा था मैने


अन्दर्वेअर और उपर से पॅंट पहनी थी नही तो दीदी को पता चल जाता…तभी


टेलिफोन की घंटी बजी .दीदी तो मानो सपने से जागी उनको शायद ये भी पता नही


था कि मैने उनकी थाइस को दबाया है..वो फॉरन दूसरे कमरे की तरफ़ चली गयी


जहा फोन बज रहा था…..



बाकी दिन और कुछ खांस नही हुआ…बस ये था कि उस दिन दीदी और मेरे बीच कुछ


ज़्यादा बाते नही हुई..धीरे धीरे दिन बिताने लगे और एक हफ़्ता और गुजर


गया.. इस बीच मे राज के साथ एक दो बार साइबर केफे भी गया था..अब मुझे


सेक्स के बारे मे काफ़ी नालेज हो गई थी…अंजलि दीदी भी अब फिर से मेरे साथ


नॉर्मल हो गयी थी..


एक दिन की बात है फ्राइडे का दिन था मैं रूम मे कंप्यूटर गेम खिल रहा था


उन दिनो स्कूल और कॉलेज की छुट्टियाँ चल रही थी. दीदी रूम मे आई और मुझे


बोली के मैं उनके साथ बॅंक चलू क्योंकि उनको एक ड्राफ्ट बनवाना है…अंजलि


दीदी उस दिन हरा सूट और ब्लॅक पाज़ामी पहने हुए थी.. दीदी के रेशमी बाल


एक लंबे हाइ पोनी टेल मे बँधे थे .


“ ज़ल्दी कर अनुज बॅंक बंद होने वाला होगा…और मुझे आज ड्राफ्ट ज़रूर


बनवाना है” दीदी अपने संडले पहनते हुए बोली..वो झुकी हुई थी..और उनके


झुकने से मुझे उनके सूट के अंदर क़ैद वो गोरे गोरे उभार नज़र आ रहे


थे..मेरा दिल फिर से डोल गया था. बॅंक घर से ज़्यादा दूर नही था सो हम चल


दिए. मैने चलते चलते वोही महसूस क्या जो मे हर बार महसूस करता था ज़ॅब


दीदी मेरे साथ होती थी. लगभाग हर उम्र का आदमी दीदी को घूर रहा था….उनकी


आखो मे हवस और वासना की आग सॉफ साफ देखी जा सकती थी. पर दीदी उनलोगो पर


ध्यान दिए बगैर अपन रास्ते जा रही थी. मुझे अपने उप्पर बड़ा फकर महसूस हो


रहा था कि मे इतनी खोबसूरत लड़की के साथ हू हालाकी वो मेरी बड़ी चचेरी


बहन थी. खैर हम 10 मिनट मे बॅंक पहुच गये बॅंक मे बहुत भीड़ थी..हालाकी


ड्राफ्ट बनवाने वाली लाइन मे ज़्यादा लोग नही थे वो लाइन सबसे कोने मे


थी…दीदी ने मेरा हाथ पकड़ा और हम उस लाइन की तरफ़ बढ़ चले.


“अनुज तू यहा बैठ..और ये पेपर पकड़..मैं लाइन मे लगती हू” दीदी बॅग से


कुछ पेपर निकालते हुए बोली.


मैं साइड मे रखी बेंच पर बैठ गया और दीदी कुछ पेपर और पैसे लेकर लाइन मे


लग गयी..भीड़ होने की वजेह से औरत और आदमी एक ही लाइन मे थे. मैं खाली


बैठा बैठा बॅंक का इनफ्राज़्टरूट देखने लगा.और जैसा हर सरकारी बॅंक होता


है वो भी वैसे ही था ...जिस लाइन मे दीदी लगी थी वो लाइन सबसे लास्ट मे


थी और उसके थोड़ा पीछे एक खाली रूम सा था जिसमे कुछ टूटा फर्निचर पड़ा


हुआ था..उस जागह काफ़ी अंधेरा भी था. शायद टूटा फर्निचर छुपाने के लिए


जान भूज कर वाहा से बल्ब और ट्यूब लाइट हटा दिए गये थे..इसलिए वाहा इतना


अंधेरा था..खैर ये तो हर सरकारी बॅंक की कहानी थी.. दीदी जिस तरफ़ लाइन


मे खड़ी थी वाहा थोड़ा अंधेरा था. मुझे लगा कही दीदी डर ना जाय क्योंकि


उन्हे अंधेरे से बहुत डर लगता था…तभी दीदी मुझे अपनी तरफ़ देखते हुए


थोड़ा मुस्कुराइ और ऐसा जताने लगी की..मानो कहना चाहती हो कि ये हम कहा


फँस गये. गर्मी भी काफ़ी थी..तभी एक आदमी और उस लाइन मे लग गया..वो देखने


मे बिहारी टाइप लग रहा था..उमर होगी कोई 35 साल के आस पास. उसने पुरानी


सी शर्ट और पॅंट पहने हुए था और वो शायद मूह मे गुटका भी चबा रहा था..एक


तो उसका रंग काला था उप्पर से वो लाइन के अंधेरे वाले हिस्से मे लगा हुआ


था..उसको देख कर मुझे थोड़ी हँसी भी आरहि थी.


“कितनी भीड़ है बेहन चोद “. वो अंधेरी साइड मे गुटका थुक्ता हुआ बोला.


तभी उसका फोन बजा.फोन उठाते ही उसने फोन पर भी गंदी गंदी गाली देने शुरू


कर दी..जैसे..तेरी बेहन की चूत ,,मा की लोड्‍े,,तेरी बहन चोद


दूँगा..वागरह वागारह..दीदी भी ये सब सुन रही थी शायद पर क्या कर सकती थी


वो..मुझे भी गुस्सा आ रहा था.. कुछ मिनिट्स के बाद मैने कुछ ऐसा देखा


जिससे मेरे दिल की धड़कन तेज होगयी अब वो बिहारी दीदी से चिपक कर खड़ा


था. उसकी और दीदी की हाइट लगभग सेम थी जिससे उसका अगला हिस्सा ठीक दीदी


की पाजामी के उप्पर से उनके उभरे हुए चूतर पर लगा हुआ था. वो लगातार दीदी


को पीछे से घूर भी रहा था..दीदी के सूट का पेछला हिस्सा थोड़ा ज़्यादा


खुला हुआ था जिससे उनकी गोरी पीठ नज़र आ रही थी . तभी वो थोड़ा पीछे हुआ


और मैने देखा कि उसके पेंट मे टॅंट बना हुआ है .फिर उसने अपना राइट हॅंड


नीचे किया और अपने पॅंट को थोड़ा अड़जस्ट क्या..अब उसका वो टेंट काफ़ी


विशाल लग रहा था..मेरा दिल जोरो से धड़क ने लगा. मेरे लंड मे हरकत शुरू


होने लगी ये सोच कर ही कि अब ये गंदा आदमी मेरी खूबसूरत दीदी के साथ क्या


करेगा. हालाकी वो और दीदी अंधेरे वाले हिस्से मे थे फिर भी उस आदमी ने


इधर उधर देखा और.फिर अपने आपको धीरे से दीदी से चिपका लिया उसका वो टेंट


अंजलि दीदी के पाजामे मे उनके उभरे हुए चुतड़ों के बीच कही खोगया था. और


जैसे ही उसने ये किया दीदी थोड़ा आगे की तरफ़ खिसकी..दीदी का चेहरा


अंधेरे मे भी मुझे लाल नज़र आ रहा था. तनाव उनके चेहरे पर सॉफ देखा जा


सकता था..ये सारी बाते बता रही थी कि दीदी जो उनके साथ हो रहा था उससे अब


वाकिफ्फ हो चुकी थी. दीदी की तरफ़ से कोई ओब्जेक्सन ना होने की वजह से


उसके होसले बढ़ने लगे थे वो दीदी से और ज़्यादा चिपक गया . जैसा कि मैने


बताया था कि अंजलि दीदी ने अपने रेशमी बालो की हाइ पोनी टेल बाँधी हुई


थी.उस आदमी का गंदा चेहरा अब दीदी के सिर के पीछले हिस्से के इतना पास था


कि उसकी नाक दीदी की बालो मे लगी हुई थी और शायद वो उनके बालो से आती


खुसबू सुंग रहा था..दीदी की पोनी टेल तो मानो उनके और उस बिहारी के बदन


से रगड़ खा रही थी. मेरी बेहद खूबसूरत जवान बड़ी बहन के बदन से उस लोवर


क्लास आदमी को इस तरह से चिपका देखा मेरा लंड मेरे ना चाहने पर भी खड़ा


होने लगा था.


मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी उस आदमी ने अपना नीचला हिस्सा धीरे धीरे


हिलाना सुरू कर दिया और उसका लंड पेंट के उप्पर से ही अंजलि दीदी के उभरे


हुए चूतरो पर आगे पीछे होने लगा..ये सारी हरकत करते हुए वो आदमी लगातार


दीदी के खूबसूरत चेहरे के बदलते भाव को देख रहा था. अंधेरे कोने मे होने


की वजह से कोई उसकी ये हरकत नही देख पा रहा था और इसका वो आदमी अब पूरा


फ़ायदा उठा रहा था..वैसे भी इतनी सुंदर जवान लड़की उसकी किस्मत मे कहा


होती. दीदी डर के मारे या ना जाने क्यू उस आदमी को रोक नही पा रही थी..पर


तभी अचानक दीदी को शायद याद आया कि मैं भी उधर ही बैठा हू तब उन्होने


थोड़ा सा मूड कर मेरी साइड की तरफ़ देखा कि कही मैं से सब तो नही देख रहा


हू ..मैने फॉरन अपना ध्यान न्यूज़ पेपर पर लगा लिया जो के मेरे हाथो मे


था. दीदी को शायद यकीन हो गया था कि मैं उनकी साथ जो हो रहा है उसको नही


देख रहा हू. वो आदमी अब पिछले 10 मिनट से दीदी को खड़े खड़े ही कपड़ो के


उप्पर से उनकी चूतादो पर अपने खड़ा लंड को अंदर बाहर कर रहा था. तभी मुझे


लगा की उस आदमी ने दीदी की कानो मे कुछ धीरे से कहा पर दीदी ने कोई जवाब


नही दिया…मेरा दिल अपनी बड़ी बहन का सेडक्षन देख इतनी जोरो से धड़क रहा


था कि मानो अभी मेरा सीना फाड़ कर बाहर आ जाएगा..तभी मुझे एक हल्की से


कराह सुनाई दी…और मुझे ये समझने मे देर ना लगी कि वो मादक आवाज़ अंजलि


दीदी के मूह से आई थी..दीदी की आँखे 5 सेक के लिए बिल्कुल बंद हो गई थी


और उनके दाँतअपने रसीले होटो को काट रहे थे..मुझे से समझ नही आया कि ये


क्या हुआ..उस आदमी का हाथ तो अब भी साइड मे था..पर भगवान ने इंसान को दो


हाथ दिए है....तभी मुझे दीवार के साइड से दीदी की चुननी हिलती हुई नज़र


आई…क्या वो आदमी…..नही ये नही हो….सकता…क्यो नही हो सकता….क्या उस आदमी


का लेफ्ट हॅंड दीवार की साइड से दीदी के लेफ्ट बूब्स पर है..अब उस आदमी


की आँखो मे हवस साफ नज़र आ रही थी..वो दीदी की लेफ्ट चूची को उनके हरे


सूट के उप्पर से हवस के नशे मे शायद बड़े जोरो से दबा रहा था ..तभी उसने


दोबारा दीदी की कान मे कुछ कहा ..और दीदी ने झिझाक ते हुए अपनी टाँगो को


थोड़ा खोल लिया …अब वो आदमी थोड़ा ज़ोर से दीदी के उभरे हुए कोमल चुतड़ों


को ठोकने लगा..हवस का ऐसा नज़ारा देख मे खुद पागल सा हो गया था ..अब मैं


ज़्यादा से ज़्यादा देखना चाहता था कि वो आदमी अब और क्या करेगा..दीदी की


बढ़ती सासो से उनके वो पके आम की साइज़ के उभार सूट मे जोरो से उप्पर


नीचे हो रहे थे ..पर शायद मेरी किस्मात खराब थी क्योंकि तभी मेरे पास एक


बूढ़ा आदमी आया और बोला कि बेटा मेरे लिए एक स्टंप पेपर ला दोगे बाहर


से..उस बुढ्ढे आदमी को उधर देख वो बिहारी फटाफट दीदी से अलग हुआ..शायद


उसको भी गुस्सा आया था…और क्यू ना आए ऐसा गोलडेन चान्स कोन छोड़ना चाहता


था..मैने देखा दीदी और वो बिहारी मेरी तरफ़ देख रहे है..मुझे गुस्सा तो


बहुत आया बुढ्ढे आदमी पर क्या करता मैं ये सोच कर मैं उठा और बाहर जाने


लगा.वो बुढ्ढा अब मेरी जगह पर बैठ गया था..बाहर जाते जाते मैने तिरछी


नज़र से देखा कि वो बिहारी फिर दीदी को कुछ बोल रहा है और इस बार दीदी भी


उसकी तरफ़ देख रही थी उनका गोरा चहरा शरम और डर से लाल हो रहा था…मैं


ज़ल्दी से बाहर गया और स्टंप पेपर लेने के लिए दुकान ढूँढने लगा…मेरे मन


मे अब ये चल रहा था कि अब वो आदमी दीदी के साथ क्या क्या कर रहा


होगा..क्या वो रुक गया होगा..क्या दीदी ने उसको मना कर दिया होगा…ये सब


दीदी की मर्ज़ी से नही हुआ है…शायद ..मेरी दीदी के भोले पन का उसने


फ़ायदा उठया है..मेरी दीदी ऐसी नही है.….ये सब बाते मेरे दिमाग़ मे चल


रही थी..करीब 20 मिनट घूमने के बाद मुझे स्टंप पेपर मिला..और मैं बॅंक मे


वापस गया ..वो बूढ़ा मुझे गेट मे एंट्री करते ही मीलगया ..मैने उसको


स्टंप पेपर दिया..अब मैं उम्मीद कर रहा था अब ताक दीदी ने ड्राफ्ट बनवा


लिया होगा ..और वो आदमी भी जा चुका होगा ...और मैं फटाफट ड्राफ्ट की लाइन


के तरफ़ बढ़ा..पर वाहा पहुच कर मेरा सिर चकरा गया …ड्राफ्ट की लाइन अब


ख़तम हो चुकी थी ..काउंटर पर लिखा था क्लोस्ड ..बॅंक मे भी भीड़ कम होने


लगी थी..मैं परेशान हो गया


..मैने सोचा की दीदी शायद बाहर मेरा वेट कर रही होंगी ..सो मैं बाहर जाने


ही लगा था कि..मैने देखा जिस तरफ अंधेरा था और वाहा जो खाली रूम था जिसमे


टूटा फर्निचर पड़ा था..वाहा से वोही बिहारी अपनी पॅंट की ज़िपार बंद करता


हुआ निकला..और बाहर चला गया..मुझे ये बड़ा आजीब लगा पर फिर मैने सोचा


शायद टाय्लेट गया होगा क्योंकि टाय्लेट भी उधर ही था…फिर मे बाहर जाने के


लिए मुड़ा ही था की मैने देखा अंजलि दीदी अपने बालो को सही करते हुए उसी


रूम से बाहर आ रही है जहा से कुछ मिनिट पहले वो आदमी निकला था..मेरा दिल


की धाड़कन एक दम बढ़ गयी …दीदी उस कमरे मे उस गंदे आदमी के साथ अकेले


थी…जो आदमी खुले आम किसी लड़की के साथ इतनी छेड़ खानी कर सकता है ..वही


आदमी अकेले मे एक खोबसुर्रत जवान लड़की के साथ क्या क्या करेगा…इन सब


ख्यालो ने मेरे लंड मे खून का दौर बढ़ा दिया...दीदी ने मेरी तरफ़ नही


देखा था….मैं दीदी की तरफ़ बढ़ा “


“दीदी आप कहा थी..मैं आपको ढूंड रहा था..”मैं बोला


दीदी थोड़ा घबरा गयी पर फिर शायद अपनी घबराहट को छुपाटी हुई वो थोड़ा


मुस्कुराइ और बोली. “ तू कब आया था …और स्टंप पेपर दे दिए तूने उन अंकल


को”


“जी..और आपने ड्राफ्ट बनवा लिया क्या” मैने उनके पसीने से भरे चेहरे को


देखते हुए बोला.उनका सूट भी कई जगह से पसीने से तर बतर था. जिसका सॉफ सॉफ


मतलब ये था कि दीदी उस रूम मे काफ़ी टाइम से थी.


“नही यार…क्लर्क ने कहा है कि ड्राफ्ट बनवाने के लिए इस बॅंक मे अकाउंट


होना ज़रूरी है”दी मेरे सामने खड़ी थी मैने देखा कि उनके सूट पर बहुत झुर्रियाँ पड़ी


हुई है खास कर उनके उभारो के आस पास.मुझे ये अच्छी से याद था कि जब हम


बॅंक आने वाले थे तो दीदी ने प्रेस किया हुआ सूट पहना था. तो फिर क्या ये


काम उस आदमी के हाथो का है…..मुझे अब थोड़ी थोड़ी जलन भी हो रही थी कि


दीदी मुझसे झूठ क्यो बोल रही है.. और अचानक ही मैने उनसे पूछा लिया “ आप


वाहा अंधेरे मे….” “


“अरे वाहा मैं वॉश रूम गयी थी..” दीदी मुस्कुराती हुई मेरी बात को वही


काटती हुई बोली.


ये सब बात सोचते सोचते मे काफ़ी गर्म हो गया था और मेरा लंड अकाड़ने लगा


था अब मुझे वाकयी पेशाब जाना था नही तो मेरा खड़ा होता लंड अंजलि दीदी


देख सकती थी..और अगर मैं उस जगह जाता हू तो मुझे ये भी पता चला जाएगा कि


वाहा टाय्लेट है भी कि नही क्योंकि अंधेरे मे तो कुछ नज़र नही आ रह था उस


जगह. फिर मैने दीदी क वेट करने के ले बोला और फटाफट उस अंधेरे कोने की


तरफ़ चला गया..जैसे कि मैने सोचा था कोने मे टाय्लेट था मुझे ये जान कर


खुशी हुई कि दीदी सही बोल रही है..मैने वाहा पेशाब किया और बाहर आने लगा


पर पता नही मुझे उस अंधेरे कमरे मे जाने की इक्षा हुई..मैने फिर दीदी की


तरफ़ देखा तो वो अभी भी अपना सूट ठीक कर रही थी…मेरे दिमाग़ मे फिर से


शाक पैदा हुआ और मैं उस रूम मे घुस गया ..उंधर अंधेरा तो था पर इतना भी


नही ..क्योंकि उप्पर रोशन दान से रोशनी आ रही थी ..मैं इधर उधर देखने लगा


..रूम मे सीलन होने की वजह से थोड़ी बदबू भी थी..हालाकी रूम के काफ़ी


हिस्से मे टूटा फर्नीचर पड़ा हुआ था फिर मैं एक कोना खाली था मैं उस तरफ


गया. रूम के फर्श पर काफ़ी धूल जमी हुई थी.. तभी मेरी नज़र रूम की ज़मीन


पर पड़े कदमो पर गयी..लगता था मानो कोई थोड़ी देर पहले ही रूम से गया है


और वो अकेला नही था क्योंकि दो जोड़ी पैरो के निशान थे ..पर मुझे एक बात


समझ नही आई कि वो उस कोने की तरफ़ क्यो गये है ..खैर मैं उनके पीछे आगे


बढ़ा ..तो मैने देखा के उसकोने मे पैरो के निशान गायब थे और फर्श पर पड़ी


मिट्टी काफ़ी हिली हुए लग रही थी मानो जैसे किसी के बीच काफ़ी खिछा तानी


हुई हो..तो क्या ये निशान उस आदमी और दीदी के है..मैं ये सोच ही रहा था


की दीदी की आवाज़ आई और मैं जल्दी से बाहर आ गया.




फिर हम घर आने के लिए चल पड़े दीदी मुझसे थोड़ा आगे चल रही थी..मैने पीछी


से दीदी की बॅक देखी उनके रेस्मी बालो जो पोनी टेल मे बाँधती थी उसमे से


काफ़ी बाल बाहर आए हुए थे ..मानो कि वो दो लोगो के बीच हुए रगड़ मे आ गये


हो . तभी मेरी नज़र दीदी की गर्दन के पिछले हिस्से पर गयी वाहा एक पिंक


सा निशान पड़ा हुआ था..मानो किसी ने वाहा काटा हो..एक तो दीदी इतनी गोरी


थी सो वो निशान और ज़्यादा उभर का नज़र आ रहा था.. पूरे रास्ते मे मैं


आसमंजस मे रहा. मैं ये ही सोच रहा था कि शायद दीदी सही बोल रही है..वो


आदमी भी तो पॅंट की ज़िपार बंद करता हुआ ही बाहर आया था.शायद मेरा दिमाग़


खराब हो गया है..राज के साथ रह रह कर और वो सारे गंदी क्लिप्स देख कर ही


मुझे ये गंदे खियाल आ रहे है.. कुछ देर बाद ही हम घर पहुच गये इस दोरान


दीदी और मुझे मे कोई बात न हुई थी. रात को मुझे नींद नही आ रही थी रह रह


कर बॅंक वाली घटना मेरे दिमाग़ मे चल रही थी.और कई अनसुलझे सवाल दिमाग़


मे आ रहे थे..और उनमे सबसे बड़ा सवाल ये था कि दीदी ने उस आदमी को रोका


क्यो नही था…और क्या दीदी वकाई उस अंजान आदमी के साथ उस कमरे मे अकेली


थी…पर एक बात पक्की थी जो भी हुआ था पता नही क्यू उसने मेरे अंदर वासना


और हवस का एक बीज ज़रूर बो दिया था….ये सब सोचते सोचते ही अचानक मेरा हाथ


मेरे अब तक खड़े हो चुके लंड पर चला गया ..ये सारी बाते सोच सोच कर मैं


इतना गरम हो चुका था कि जैसे ही मैने अपने लंड पर हाथ लगाया उसमे से पानी


निकल गया..और फिर मुझे नींद आ गयी.


अगले दिन स्कूल के बाद मे राज के साथ साइबर केफे जा रहा था..के मुझे जोरो


से पेशाब लगा…अछा हुआ कि साथ मे ही सरकारी टाय्लेट था सो मे उसमे गुस्स.


गया.मैने अपना पॅंट की जिपर खोली और पेशाब करने लगा..तभी राज भी उधर आ


गया और मेरे बराबर मे खड़ा होकर वो भी पेशाब करने लगा..


"आजा …आजा….अहह…याल्गार" वो अपना मूह उपर करता हुआ बोला. तभी अचानक मेरी


नज़र उसके लंड पर चली गयी..बाप रे कितना बड़ा था उसका..ना चाहते हुए भी


मैं उसके लंड का साइज़ अपने से कंपेर करने लगा. राज का लंड ढीला पड़ा हुआ


था फिर भी वो इतना बड़ा लग रहा था..और इतना तो मेरा खड़ा होकर भी नही


होता होगा..तभी राज ने मुझे अपने लंड की तरफ़ घूरते हुए देख लिया..


"क्यू कैसा लगा…गन्दू" वो मुझे चिड़ाता हुआ बोला. मैने कोई जवाब नही दिया


और अपने पॅंट की ज़िप बंद करने लगा..".


"अबे बोल ना…बड़ा है ना…साले इस पर तो लड़किया मरती है" वो हस्ते हुए


अपने लंड से पिशाब की बची कुछ बूंदे झाड़ता हुआ बोला.


हम टाय्लेट से बाहर निकले ही थे के मुझे लगा कोई मुझे बुला रहा है. मैने


पीछे मूड कर देखा तो पाया कि अंजलि दीदी मेरी तरफ़ आ रही थी.उन्होने आज


ब्लू जीन्स और ग्रीन टॉप पहना था..हालाकी वो ज़्यादा जीन्स वागरह नही


पहनती थी पर कभी कभार चलता था.


"क्या बात है..साले तू तो छुपा हुआ रुस्तम निकला …कोन है ये.आइटम" राज


दीदी को घूरता हुआ बोला.मुझे बड़ा गुस्सा आया राज पर. पर गुस्से को मैं


मन मे ही दबा गया


"मेरी दीदी है…प्लीज़ उनको आइटम मत बोल..." मैने चिढ़ते हुए जवाब दिया .


दीदी अब हमारे पास आ चुकी थी.उनके पास आते ही उनके बदन पर लगी डेयाड्रांट


की खुसबु मैं महसूस कर सकता था.


"कहा जा रहा है ..और ये श्री मान कोन है" दीदी राज की तरफ़ देखते हुए बोली.


मैं कुछ बोलता इससे पहले ही राज आगे बढ़ा और अपना हाथ आगे कर


बोला.."जी..जी मेरा नाम..राज शर्मा है.मैं इसका दोस्त हू. दीदी ने भी


रिप्लाइ मे अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.


"ओके नाइस टू मैंट यू राज" दीदी राज से हाथ मिलाती हुई बोली.


मैने देखा राज की नज़रे अब सीधी दीदी के बूब्स पर थी.टॉप्स की उपर से


दीदी के बूब्स की गोलाइया काफ़ी आकर्षक लग रही थी.शायद दीदी ने भी राज को


अपने बदन का मुआईना करते हुए देख लिया था. वो थोड़ा सा शर्मा गयी.


"दीदी मे साइबर केफे जा रहा था..स्कूल के कुछ असाइनमेंट्स बनाने है" मे बोला.


"अच्छा चल ठीक ..है जल्दी घर आ जाना..मुझे तेरी थोड़ी हेल्प चाहिए आज" दीदी बोली


मैने हा मे सिर हिलाया.



"आप फिकर ना करे दीदी मैं इसको खुद ही घर छोड़ दूँगा" राज दीदी की आँखो


मे देखता हुआ बोला और अपना हाथ फिर से हॅंडशेक के लिए बढ़ा दिया.


"थॅंक्स यू राज" दीदी ने भी अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.


"और हा दीदी ..अगर मुझसे कोई हेल्प चाहये तो ज़रूर बताना" ये बोलते हुए


राज ने दीदी के हाथ को हल्का सा दबा दिया.ये सब इतना जल्दी हुआ कि शायद


दीदी भी ना समझ पाई थी.


फिर दीदी मूडी और घर जाने लगी .राज जींस के उप्पर से अंजलि दीदी के सुडौल


और उभरे हुए चोतड़ो को देख रहा था.और अपने एक हाथ से अपने लंड को खुज़ला


रहा था.ये देख मेरे दिल मे एक कसक सी उठी..ना जाने क्यू ?


साइबर केफे मे उसने मुझसे दीदी के बारे मे कई क्वेस्चन्स पूछे..मुझे ये


सब अच्छा नही लग रहा था..राज एक बिगड़ा हुआ और आवारा लड़का था…बाद मे वो


मुझे घर भी छोड़ने आया..हालाँकि मैं उसे अपना घर नही दिखाना चाहता था पर


मेरे ना चाहने के बाद भी वो मेरे घर तक आ गया था.वो तो घर के अंदर भी आना


चाहता था पर मैने उसको कोई बहाना मार कर बाहर से ही चलता कर दिया.


मैं घर के अंदर घुसा.तो देखा..चाचा जी घर आ चुके है और टीवी पर न्यूज़


देख रहे थे. चाची किचिन मे खाना बना रही थी.


"आज बड़ी देर लगा दी..स्कूल से आने मे" चाचा जी चाइ की चुस्की लेते हुए


बोले. मैने उनके पैर छुए और बोला " स्कूल के काम से साइबर केफे गया था


चाचा जी".


"अरे भाई तुझे अंजलि पूछ रही थी..पता नही क्या काम है ".वे बोले.


"दीदी कहा है .." मैने पूछा


"उपर रूम मे जा पूछ ले क्या काम है" चाचा जी बोले.


मैं उप्पर रूम की तरफ़ बाढ़ चला. अंदर घुसते ही मैने देखा कि दीदी अपने


बेड पर पेट के बाल लेटी हुई है..उनके बाल खुले हुए एक साइड मे लहरा रहे


है .उस वक्त उन्होने पाजामा और टी शर्ट पहना हुआ था.और वो कुछ लिख रही


थी.


पता नही क्यू अब जब भी मैं दीदी को अकेले मे देखता था तो मेरे दिल मे कुछ


कुछ होने लगता था.मैने अपना स्कूल बॅग मेज पर रखा ..


"आ गये सर..कितनी देर लगा दी" दीदी लिखती हुई बोली.


"सॉरी दीदी..टाइम थोड़ा ज़्यादा लग गया" मैने जवाब दिया.


"चल कोई बात नही..." दीदी उठकर बैठ गयी


"यार ..सर मे बहुत दर्द हो रहा है..तू एक काम करेगा" दीदी अपने माथा


सहलाते हुए बोली


"जी .दीदी …"मैं उत्सुकता से बोला


"मेरे सर की मालिश कर देगा क्या"


मेरी तो मानो लौटरी ही लग गयी ..कब से मे दीदी के उन लंबे खूबसूरत सिल्की


बालो को छूना चाहता था. मैं फॉरन तैयार हो गया.


"ओह्ह मेरे राजा भाई" दीदी मुस्कुराती हुई अपने बेड से उठी. और मेरे बॅड


के पास नीचे बैठ गयी.मैं बेड पर बैठा था फिर मैने अपने टाँगे थोड़ी खोली


और उनके बीच दीदी बैठ गाएे . मेरी टाँगे दीदी के साइड मे दोनो तरफ़


थी.दीदी को इतना पास देख मेरा दिल धड़कने लगा..


"दीदी…तेल..कहा है" मैं थोड़ा हकलाता हुआ बोला. मैं नर्वस हो गया था


इसलिए हकला रहा था शायद.


"अरे बिना तेल के कर दे यार" दीदी बोली


फिर आंटिसिपेशन मे अपने काँपते हुए हाथो को मैने दीदी के बालो मे डाल


दिया ..वाह क्या रेशमी बाल थे..उसमे से आती शॅमपू की खुसबु को सूंघते ही


मेरे लंड मे हरकत शुरू हो गयी थी.. मुझे अब मानो थोडा थोड़ा नशा होने लगा


था .मैने मालिश शुरू कर दी..ग्रिप अच्छी नही बनी तो मैं थोड़ा आगे सरक


गया अब दीदी का सर मेरी पॅंट के अंदर खड़े होते लंड के बहुत पास था..तभी


मेरी नज़र दीदी के अगले हिस्से पर गयी..और मैने देखा कि टी- शर्ट थोड़ी


लूज होने की वजह से दीदी की चूचिया थोड़ी थोड़ी नज़र आ रही थी..ये पहली


बार था जब मैने उनको इतना पास से देखा था..दीदी ने शायद ब्रा नही पहनी


थी..और जैसे जैसे मैं दीदी के सर की मालिश करता मेरे हाथो के प्रेशर से


दीदी के साथ साथ उनकी चूचियाँ भी बड़े मादक तरीके से हिल जाती..इस सब से


मुझे इतना जोश चाढ़ गया था कि मैने दीदी के सिर को थोड़ा ज़ोर से रगड़


दिया..


"आआआ..ह…आराम से कर ..अनुज.र" दीदी बोली


मुझे तो मानो नशा हो गया था.. मुझे फिर याद आया कि कैसे राज दीदी को देख


रहा था….आख़िर वो दीदी को ऐसे क्यो देख रहा था..फिर मुझे हर उस आदमी की


याद आई जो दीदी को घूरते रहते थे..वो खूबसुर्रत लड़की जिससे सब बात करने


के लिए भी तरसते थे अभी मेरे इतनी पास बैठी है..इन्सब बातो मे मैं ये भी


भूल गया था कि वो मेरी बड़ी बहन है..वासना मुझ पर हावी हो चुकी थी..तभी


मुझे एक आइडिया आया मैने फिर दीदी के बालो को इकट्ठा कर अपने राइट हॅंड


मे भर कर अपने पॅंट मे खड़े होते लंड की उप्पर डॉल दिया..फिर मैं दीदी के


रेस्मी बालो को उसपर रगड़ने लगा.


" अरे दोनो हाथो से कर ना…" दीदी अपनी बंद आखो को थोड़ा खोलते हुए बोली.


फिर.एक दो बार मैने दीदी के सिर को मालिश के बहाने पीछे कर अपने खड़े लंड


पर भी लगाया..मैं बस झड़ने ही वाला था कि ..चाची रूम मे आ गयी..


"क्या बात है बड़ी बहन की सेवा हो रही है" चाची हमारे पास आते हुए बोली.


मेरा सारा मज़ा किरकिरा हो गया था..


"मम्मी ..सच मे अनुज बहुत अच्छी मालिश करता है…आपसे भी अछी..हा हा


हा"दीदी हस्ते हुए बोली


"अच्छा चलो जल्दी करो खाना लग गया है..दोनो हाथ मूह धोकर नीचे आ जाओ.." चाची बोली


'ओके जी "दीदी अपने बालो का जुड़ा बनाते हुए बोली. फिर वो उठ गयी और नीचे


जाने लगी.मैने अपने आप को कंट्रोल मे किया और नीचे चला गया.


पीछले कुछ महीनो मे मेरा अंजलि दीदी के प्रति नज़रिया बदलने लगा था..अब


अंजलि दीदी मुझे अपनी बड़ी बहन लगने के बजाय एक जवान लड़की ज़्यादा लगने


लगी थी…पर थी तो फिर भी वो मेरी बहन ही..वो मुझे कितना प्यार करती


थी..हमेशा मेरा साथ देती थी..उन्होने मुझे सग़ी बहन से भी ज़्यादा प्यार


दिया.. .मेरा उनके बारे मे गंदा सोचना पाप था….नही नही से सब ग़लत है


..मेरा दिल आत्म ग्लानि से भर गया…..पर अगर कोई और ये सब दीदी के साथ करे


तो..कोई अंजान..जिसका दीदी से रिश्ता सिर्फ़ लंड और छूट का हो तो..ये


सोचते ही मेरे अंदर का शैतान जागने लगा…मुझे फिर वो बॅंक वाली घटना याद


आई …और राज का उस तारह से दीदी को देखना ...


जून का महीना था मेरे एग्ज़ॅम्स ख़तम हो चुके थी पर दीदी के फाइनल एअर के


एग्ज़ॅम चल रहे थे.दीदी ज़्यादा तर अपने रूम मे पढ़ती रहती थी..एक दिन


मैं घर के बाहर खड़ा कुछ समान ले रहा था..दुक्कान घर के सामने रोड के


दूसरी तरफ़ थी ..हमारे घर की एक साइड कुछ खाली जगह पड़ी हुई थी..मैने


देखा उस खाली जगह पर एक अधेड़ उम्र का आदमी पिशाब कर रहा था….जैसा कि


इंडिया मे अक्सर होता है ..कि जहा खाली जगह देखो बस उस को टाय्लेट बना


लो..वैसे तो सब कुछ नॉर्मल था..पर तभी मैने देखा को वो आदमी पिशाब करता


करता बार बार उप्पर देख रहा है…पर वो उप्पर क्यो देख रहा था…खैर कुछ देर


बाद वो आदमी वाहा से चला गया..मैं भी घर आ गया ..समान चाची को देकर मैं


सीधे उप्पर रूम मे गया जहा दीदी पढ़ रही थी…दीदी तो रूम मे नही थी..पर


मैने देखा के रूम की खिड़की खुली हुई है..वो खिड़की उस खाली पड़े हिस्से


की तरफ मे खुलती थी…मुझे कुछ शक हुआ ..और मैं खिड़के को बंद करने के लिए


आगे बढ़ा. ..मैने खिड़की से नीचे झाँका तो मुझे वो जगह सॉफ सॉफ नज़र आई


जहा उस आदमी ने पिशाब किया था..पर मुझे ये समझ नही आया कि वो बार बार


उप्पर क्यो देख रहा था..तभी मेरे दिमाग़ की घंटी बजी..क्या इस खिड़की पर


अंजलि दीदी खड़ी थी…ये सोचते ही मेरे लंड मे एक कसक सी उठी…पर बिना किसी


सबूत के मैं कैसे दीदी पर शक कर सकता हू..अब मैने प्लान बनाया कि मैं ये


जान कर ही रहूँगा..अगले दिन मैं फिर उस दुकान पर खड़ा था पर इस बार मेरा


माक़साद समान लेना नही था..ठीक शाम को 6 बजे वो बुढ्ढा अंकल पेशाब करने


के लिए उस कोने की तरफ़ बढ़ा.उसकी चाल से लगता था कि वो एक शराबी है ..वो


थोड़ा एडा तेरछा चल रहा था..फिर वो पेशाब करने लगा..

यही मोका था मैं


तुरंत जल्दी से घर के अंदर गया और उप्पर रूम की तरफ़ जाने लगा..रूम का


दरवाजा बंद था हालाकी कुण्डी नही लगी थी शायद अंदर से..अंदर क्या हो रहा


होगा इस आशा मे मेरा हाथो मे पसीना आ गया था …काँपते हाथो से मैने रूम का


दरवाजा हल्का सा खोला और अंदर चुपके से झाका..अंजली दीदी खिड़की के पास


खड़ी थी..और उनका एक हाथ टी-शर्ट के उप्पर से अपनी बाई चूची को हल्के


हल्के सहला रहा था..और उनका दूसरा हाथ जिसमे दीदी ने पेन पकड़ा हुआ था


उसको पजामि के उप्पर से शायद अपनी चूत पर गोल गोल घुमा रही थी.. दीदी


लगातार खिड़की से नीची झाँक रही थी ..चेहरा..शरम से लाल था..उनके चेहरे


पर वासना छाई हुई थी…फिर दीदी थोड़ा और आगे की तरफ़ झुक गयी जिससे अब


उनके बॅक प्युरे तरह से मेरे सामने थी ..तभी मैने देखा की उन्होने अपना


नीचला हिस्सा हिलाना शुरू कर दिया है..वो अपने नीचले हिस्से को नीचे


देखते देखते दीवार पर रगड़ने लगी थी….पता नही क्यो ये सब देखते देखते


मेरा हाथ पॅंट के उप्पर से मेरे लंड पर चला गया ये सब देख मेरा लंड इतना


टाइट हो चुका था कि जितना पहले कभी नही हुआ था ..और मैं मूठ मारने


लगा…अच्छा था उस वक्त घर मे और कोई ना था..नही तो मैं पकड़ा जा सकता


था…अब ये पक्का हो गया था कि दीदी भी सेक्स की इच्छुक हो गयी है.. तभी


दीदी ज़ल्दी ज़ल्दी अपना नचला हिस्सा दीवार पर रगड़ने लगी और उनके हाथ अब


ज़ोर ज़ोर से अपनी कड़क हो चुकी चूची को दबाने लगे.


"एयाया..हह..इसस्सस्स…" हल्की से आवाज़ मेरे कानो मे पड़ी और मेरे लंड ने


पानी छोड़ दिया..वो आवाज़ दीदी के खुले होंठो से निकली थी ..शायद उनको भी


ऑर्गॅज़म हुआ था..मैने अपने आप को संभाला और घर के बाहर आ गया..बाहर आकर


मैने देखा कि वो बुढ्ढा अंकल भी जा चुका था..


अगले दिन मेरी स्कूल बस मिस हो गयी थी.क्योंकि मैं सही से सो नही पाया था


सारी रात दीदी के बारे मे सोचता रहा था .करीब 10 मिनट मे बस आई मैं फटा


फट बस मे चढ़ गया.बस मे काफ़ी भीड़ थी .मैं साइड मे खड़ा था कि तभी कोई


मुझ से टकराया..मैने मूड कर देखा तो पाया कि ये वही अंकल थे जो उस दिन घर


के साइड मे पेशाब कर रहे थे.वो अंकल देखने मे बड़ा झगड़ालु टाइप लग रहा


था..रह रह कर वो लोगो को गंदी गंदी गालिया दे रहा था..बस मे लड़कियाँ और


औराते भी थी ..पर वो किसी की शर्म नही कर रहा था.उसकी बॉडी लॅंग्वेज देख


कर वो मुझे अभी भी थोड़ा नशे मे लग रहा था उसके मूह से शराब की बदबू भी आ


रही थी.. खैर वो थोड़ा आगे निकल गया .और मैं खिड़की से बाहर देखने


लगा..तकरीबन 5 मिनट के बाद मेरी नज़र उस अंकल पर दोबारा गयी..और जो सीन


मैने देखा वो मेरे लंड को खड़ा करने के लिए काफ़ी था..अंकल एक 30-32 साल


की शादी शुदा और्रत की पीछे चिपका खड़ा था.उसका अगला हिस्सा साड़ी के


उप्पर से उस और्रत के कूल्हे से बिकुल चिपका था और वो धीरे धीरे धक्के


लगा रहा था..मैने औरत के चेहरे की तरफ़ देखा तो पाया कि उसके चेहरे पर जो


एक्सप्रेशन था वो उसकी माजबूरी बयान कर रहा था..अंकल उस औरत की मजबूरी और


बस की भीड़ का पूरा फ़ायदा उठा रहा था..अब मैं समझ गया था कि अंकल तो


पक्का हारामी इंसान है. शायद ये उसका रोज का काम था . वो उस औरत के साथ


लगभग 15 मिंट्स तक ऐसे ही साडी की उप्पर से मज़े लेता रहा ..फिर मेरा


स्टॅंड आ गया और मैं बस से उतर गया.


आज कल स्कूल मे मेरा मन नही लग रहा था और लगता भी कैसे हर वक्त तो दिमाग़


मे सेक्स की बाते ही चलती रहती थी. मैं चाहे कितना भी कोशिस कर लू अपना


दिमाग़ इस चीज़ से हटाने मे पर फिर भी कुछ ना कुछ ऐसा हो जाता था जिसकी


वजह से मेरे अंदर का छुपा हुआ हवस का शैतान जागने लगता था. उप्पर से


अंजलि दीदी के बारे मे भी मेरा नज़रिया बदलने लगा था..अब वो मुझे अपने


बड़ी बहन ना लग कर एक जवानी से भरपूर लड़की नज़र आने लगी थी जो अपनी


मदमस्त जवानी लुटवाने को तैयार बैठी थी. अब हालत ये होगये थे कि अब जब भी


दीदी घर पर होती तो ना जाने दिन मे कितनी बार उनको चुपके चुपके देख कर


मूठ मारने लगा था….जैसे जैसे दिन बीतने लगे वैसे वैसे मेरी हवस भी बढ़ने


लगी..और इसी दौरान एक दिन अंजलि दीदी ने मुझसे बोला कि उनको कॉलेज से एक


सर्वे करने का असाइनमेंट मिला है .


सर्वे मे उनको झुग्गी झोपड़ी मे रहने वाले ग़रीब तबके के लोगो को सॉफ


सफाई के बारे मे जागरूक करना है. दीदी बोली के उनके साथ सर्वे पर जाने


वाली पार्ट्नर ( रीमा ) बीमार हो गयी है और वो मुझे अपने साथ ले जाना


चाहती है. मेरे भी एग्ज़ॅम्स ख़तम हो गये थे सो मैने हा कर दी. अगली सुबा


करीब 9 बजे मैं दीदी के साथ सर्वे पर निकल गया. दीदी ने उस दिन ब्लॅक सूट


और वाइट कलर की चूड़ीदार पजामि पहनी थी और अपने सेक्सी लंबे बालो का


उन्होने जुड़ा बनाया हुआ था .ब्लॅक ड्रेस मे दीदी का गोरा बदन एक अलग ही


रंगत बिखेर रहा था. हम कुछ देर बाद एक स्लम एरिया मे पहोच गये ….और जैसे


सोचा था वैसी ही गंदगी वाहा फेली हुई थी..हर जगह कूड़ा …गंदी नालिया


…वाहा से आ आ रही बदबू की वजह से दीदी ने अपना मूह अपनी चुन्नी से कवर कर


लिया था. ज़्यादा तर मर्द अपने घर से जा चुके थे रॉटी पानी का जुगाड़


करने के लिए और जो कुछ बचे थे वो अपनी भूकी आँखो से दीदी की जवानी को


निहार रहे थे. उनको शायद ये यकीन नही हो रहा था कि इतनी खूबसूरत जवान


लड़की उनकी इस गंदी सी बस्ती मे क्या कर रही है….


" अरे कहा जा रही है..आजा…मेरे पास..मेरी जान" एक आदमी कुछ पीता हुआ


बोला..वो शायद चरस पी रहा था..


"बेह्न्चोद रंडी की. गंद देख…क्या उभरी हुए गांद है…आजा रानी तुझे मस्त


कर दूँगा अपने लंड से..".दोसरा आदमी अपना लंड दीदी को देख खुजलाता हुआ


बोला.


दीदी और मैं ये सब सुन रहे थे..पर क्या करते ..उन ..बेकार लोगो से और


क्या उम्मीद की ज़ा सकती है..सो दीदी ने उनकी बातो को इग्नोर कर दिया और


हम बस्ती के अंदर घुस गये. बस्ती तो मानो एक भूल भुलैया थी ..छोटी छोटी


तंग गलिया..


"अनुज चल इस घर मे चलते है." दीदी एक झोपड़ पट्टी की तरफ़ इशारा करते हुए बोली.


हम अंदर दाखिल हो गये . अंदर एक बुढ्ढि औरत रोटी बना रही थी..हमे अंदर


आता देख बोली " कोन हो और क्या चाहिए"


"कुछ नही माता जी हम एक सर्वे कर रहे है और हमे आपको सफाई के बारे मे कुछ


बाते बतानी है" दीदी मुस्कुराती हुई बोली.


"ये सर्वे क्या होता है..देखो मेरे पास टाइम नही है..मुझे काम करने जाना


है..तुम लोग जाओ" वो औरत झेन्प्ते हुए बोली. दीदी ने उसको बहुत समझाया पर


वो ना मानी सो हम वाहा से बाहर आ गये. इसी तरह हम हर झुगी मे जाकर लोगो


को साफाई की इंपॉर्टेन्स बताने लगे कुछ लोगो ने हमारी बात सुनी और कुछ नी


नही. खैर ये सब करते करते हमे दोपहर के 2 बज गये.


"दीदी और कितना घूमना पड़ेगा..मैं थॅंक गया हू" मैं दीदी की तरफ़ देखता हुआ बोला.


"ओह्ह..मेरा प्यारा भाई थक्क गया…आइएम सो सॉरी तुम मेरी वजह से कितना


परेशान हो गये ना.." दीदी बड़े प्यार से मेरी तरफ़ देखते हुए बोली. तभी


मैने देखा कि सामने से कोई लड़खदाता हुआ हमारी तरफ़ आ रहा है..जैसे ही वो


साया हमारे करीब आया . उसको देखते ही मेरे पैरो के नीचे से ज़मीन निकल


गयी…



…और ये हाल सिर्फ़ मेरा ही नही बल्कि अपने चेहरे पर डर से आया पसीना


पोछती हुई अंजलि दीदी का भी था दीदी ने भी उसको पहचान लिया था..वो इंसान


कोई और नही बल्कि वोही अंकल था जिसको दीदी अपने रूम से नीचे झाक कर पेशाब


करते हुए देखती थी..शायद अंकल भी दीदी को पहचान गये थे क्योंकि वो रुक


गया था और दीदी को देख कर उसके गंदे चेहरे पर शैतानी हसी आ गयी थी..


" अरे वाह किसी ने सही कहा है जब भगवान देता है तो झप्पड़ फाड़ कर देता


है..आज जुए मे भी मे 10'000 रुपेये जीता और अब…" अंकल मुस्कुराता हुआ


बोला


"बेटे पहचाना मुझे ..कुछ याद आया .." वो बड़ी बेशर्मी से अपना लंड अपनी


पॅंट के उप्पर से खुजलाता हुआ बोला.


अंजलि दीदी तो मानो सुन्न पड़ गयी थी..उनका खूबसूरत चेहरा शर्म से लाल हो


गया था..वो दोनो कुछ सेकेंड तक लगातार एक दूसरे की आखो मे देखते रहे ..वो


शायद ये भी भूल गये थी कि मैं भी वही साथ मे खड़ा हू. अंकल तो मानो आखो


ही आखो मे दीदी से कुछ कह रहा था…तभी दीदी ने अपनी नज़रे नीची कर ली..


"भाई क्या हुआ..यहा कैसे.." अंकल बोला


दीदी ने कुछ ना बोला ..दीदी को कोई जवाब ना देते देख मे बोल उठा." हम यहा


सर्वे करने आए है…"


"वाह वाह..अच्छा है...किस चीज़ का सर्वे" वो अब मेरी तरफ़ देखता हुआ


बोला. अंकल की आखो मे अब चमक आ चुकी थी..


"हम यहा लोगो को सफाई की इंपॉर्टेन्स बताने आए है" मैने तुरंत जवाब दिया.


"बहुत अछा .कितना नेक काम कर रहे हो आप लोग …मेरी खोली यही पास मे है


मुझे भी कुछ बता दो…"


"नाअ..नही हमे अब घर जाना है.." दीदी काँपती आवाज़ मे बोली.


अंकल एक बड़ा हारामी इंसान था इतना अच्छा मौका भला वो कैसे छोड़ता. उसने


फॉरन अंजलि दीदी का गोरा हाथ अपने गंदे से हाथ ले लिया और बोला " अरे ऐसे


कैसे..आप लोग मेरे मेहमान है मुझे भी मेहमान नवाज़ी का मोका दो.." दीदी


तो मानो उसके हाथ की गुड़िया सी बन गयी थी. अंकल तो मुझे ऐसे इग्नोर कर


रहा था जैसे कि मैं वाहा हू ही नही उसका सारा ध्यान दीदी पर ही केंद्रित


था. मुझे अंकल की ये हरकत बुरी लग रही थी..और मैं चाहत्ता तो उनको रोक भी


सकता था ..पर ना जाने क्यू मेरे अंदर छुपा वो हवस का भूका शैतान मुझे से


सब करने से रोक रहा था..और कुछ ही देर मे हम दोनो अंकल के झोपडे के अंदर


थे. झोपड़ी कुछ ज़्यादा बड़ी ना थी फिर भी उसमे दो हिस्से थे..यहा वाहा


कुछ खाली शराब की बोटले पड़ी थी..समान के नाम पर एक पुरानी चारपाई .एक


लकड़ी की मेज , एक बड़ा सा बक्सा और कुछ छोटा मोटा घरेलू समान था…दीदी और


मैं चारपाई पर बैठे थे…


"देख लो ये है मेरा हवा महल..हा हा हा .." वो अपनी जेब से एक शराब की


बॉटल निकाल कर मैंज पर रखता हुआ बोला.


दीदी अब भी उस आदमी से नज़रे नही मिला पा रही थी..अंकल कुछ देर के लिए


झोपड़ी के दूसरे हिस्से मे गया और थोड़ी देर बाद वापस आया तो उसके बदन पर


सिर्फ़ लूँगी बँधी थी…अंकल बिल्कुल दुब्ब्ला पतला था ..उसके सीने पर उगे


सफेद होते बॉल काफ़ी घने थे .


" अरे भाई मुझे भी तो बताओ..सफाई के फ़ायदे ..देखो मेरा घर कितना गंदा है


..और मेरे यहा सफाई करने वाला भी कोई नही.." वो पास पड़े इस्तूल को दीदी


के बिल्कुल पास रख उसपर बैठता हुआ बोला. अब मेरी नज़र दीदी पर थी दीदी की


साँसे तेज चल रही थी जिसकी गवाही सूट मे क़ैद उनकी छातियाँ ज़ल्दी ज़ल्दी


उप्पर नीचे होकर दे रही थी. दीदी की घबराहट सिर्फ़ मैने ही नही बल्कि


उनके पास बैठे अंकल की पारखी नज़र ने भी देख ले थी." अरे बिटिया क्या हुआ


तुमने तो कोई जवाब ही नही दिया.." और अंकल ने अपना उल्टा हाथ खाट पे बैठी


दीदी की राइट जाँघ पर रख दिया. दीदी को तो मानो 11'000 वॉल्ट का करेंट


लगा गया और उनके बदन ने एक झटका खाया..


" उन्न..अंकल हम लेट हो रहे है..हम आपको किसी और दिन समझा देंगी" दीदी ने


पहली बार अंकल की आँखो मे देखते हुए बोला.


"अरे अभी तो सिर्फ़ दोपहर के 2 बजे है. और बाहर बहुत गर्मी है थोड़ी देर


बाद चले जाना बिटिया.." अंकल अपना हाथ जो कि अभी भी दीदी की जाँघो पर रखा


था उसको धीरे धीरे से सहलाते हुए बोले. दीदी ने अपने हाथो मे पकड़े हुए


रेजिस्टर ( जो कि उन्होने सर्वे की इंपॉर्टेंट जानकारी लेने के लिए लिया


हुआ था ) उसको जोरो से जाकड़ लिया.


"तुम्हारा नाम क्या है." अंकल सीधा दीदी की ऊपर नीचे होती हुई छातियो को


देखते हुए बोला.


"जीई..मेरा..ना..नामाम है …अंजलि "


दीदी को अपने इतना पास देख वो अंकल बहुत ही उतावला लग रहा था.अगर मैं


वाहा मोजूद ना होता तो शायद अब तक वो दीदी के कपड़े फाड़ उनकी जवानी


लूटना शुरू भी कर चुका होता.


"तुम इतना क्यो डर रही हो बिटिया..इसमे डरने वाली क्या बात है…." बोलकर


अब अंकल स्टूल से उठकर चारपाई पर दीदी की लेफ्ट साइड मे खाली पड़ी जगह पर


बैठ गया.वो जब उठ रहा था तो मेरी नज़र यका यक उसकी लूँगी पर बनते हुए


टेंट पर गयी..वो टेंट अभी ज़्यादा बड़ा नही बना था फिर भी अंकल के खड़े


होने पर वो सॉफ नज़र आ रहा था…और ये सिर्फ़ मैने नही दीदी ने भी देखा था.


"पानी पीओगी.." अंकल बोला.


दीदी ने सोचा कि अगर वो हा करती है तो अंकल उठ कर पानी लेने चला गाएगा


जिससे कि उनको थोड़ा सकून मिलेगा.


"हंजी" दीदी धीरे से बोली


पर अंकल तो मंझा हुआ शिकारी था उसने तुरंत मेरी तरफ देखा और बोला " अरे


बेटा छोटू जा अंदर जा एक ग्लास पानी ले आ..ग्लास अलमारी से निकाल लेना और


पानी का मटका वही नीचे रखा है ". मैं भी क्या करता उठ कर झोपड़ी के दूसरे


हिस्से मे चला गया.अब मेरी बड़ी बहन उस अंजान अंकल के साथ अकेली थी मेरा


दिल जोरो से धड़कने लगा..फिर मैने सामने अलमारी मे रखे एक पीतल के ग्लास


को हाथ मे उठाया ही था कि मुझे..अचानक दीदी की हाथो मे पहने कड़ो की खनक


ने की आवाज़ आई..मानो दीदी अपने हाथो को जोरो से हिला रही है…मेरे दिमाग़


मे ख़तरे की घंटी बजने लगी …और फिर '"आआ..इसस्स्शह….." दीदी के मूह से


निकली ये सीत्कार बहुत धीरे होने के बावजूद मेरे अब तक सतर्क हो चुके


कानो मे आई. दूसरी तरफ़ क्या हो रहा होगा..ये सोचते ही मेरे लंड मे करेंट


फैलने लगा. जो दीवार झोपडे को बाटती थी मैं चुप चाप उसके पास जाकर खड़ा


हो गया अब मैं देख तो कुछ नही पा रहा था पर हल्की हल्की आवाज़े मुझे


ज़रूर सुनाई दे रही थी..


और मैने सुना


दीदी : आह..अंकल….प्लीज़ अब घर जाने दो..'


अंकल: " इस.हह..ऐसे कैसे जाने दू मेरी जान…..मुझे तो अपने किस्मत पर यकीन


ही नही हो रहा है..जिस लड़की को सोच सोच कर मैने इतना मूठ मारा ..वो आज


मेरे घर मे..आहह.."


दीदी : "उन..ह…अंदर ..मेरा छोटा भाई है प्लीज़…..अहह..मे बदनाम हो जाउन्गी…"


अंकल : "क्यो क्या हुआ जब तू मुझे पेशाब करते हुए देखती थी…तब तुझे शर्म


नही आती थी..साली तेरे बारे मे सोच सोच कर मैने कितनी रंडिया चोदी है


.क्या तुझे इस बात का ज़रा भी इल्म है"


तभी दीदी के काँपते होटो से फिर एक सिसकारी निकली."आहह.इसस्स्स्स्शह….वो


मेरा भाई उन..अंदर…….आईशह…".


अंकल : "अच्छा..अब समझ आया ..तू अपने भाई के पास होने से डर रही है..तू


रुक मे कुछ करता हू अभी.."


दीदी कुछ ना बोली..


मैं सोच मे पड़ गया क्या वाकई दीदी मेरी वजह से हिचाक रही है..??


मैं तुरंत पानी का ग्लास लेकर उस तरफ़ निकला ही था कि मेरे पैर से एक


शराब की खाली पड़ी बॉटल टकरा गयी..इस आवाज़ से कुछ पल के लिए सब शांत हो


गया और मैं उस तरफ़ जहा वो दोनो थे..चल पड़ा ..उधर आते ही मैने देखा कि


दीदी के बालो का जुड़ा खुला हुआ है.और उनके बाल फेले हुए है और दीदी अपना


दुपट्टा सही कर रही है. अंकल अभी भी दीदी की बगल मे बैठे थे और वो अपने


लूँगी मे खड़े लंड को शायद मुझसे छुपाने की कोशिश कर रहे थे.



"ला इधर ला पानी.." अंकल मेरे हाथ से पानी का ग्लास लेते हुए बोले.


मेरे नज़र अभी भी दीदी पर ही थी जो कि मुझसे नज़र नही मिला पा रही थी.


" ले बिटिया.पानी पी ले.." अंकल पानी का ग्लास दीदी की तरफ़ बढ़ाते हुए बोले.


पर दीदी ने पानी नही पिया. इस पर अंकल ने थोड़ी देर तक कुछ सोचा और


बोला.." चल तेरे लेए ठंडा मँगाता हू"


फिर उसने मुझे पेप्सी की बॉटल लाने के लिए कुछ पैसे दिए और बोला कि


नुक्कड़ पर एक पान की दुकान है वाहा से एक ठंडी पेप्सी ले आओ. वो तो मुझे


एक नोकर के तरह ट्रीट कर रहा था..पर मुझे उसका मकसद समझ आ गया था..सो मैं


तुरंत बाहर जाने की लिए बढ़ा ही था कि ..अचानक दीदी मुझे कुछ बोलने को


हुई..शायद बोलना चाह रही थी कि " अनुज मुझे इस आदमी के साथ अकेला मत छोड़


कर जा " पर अंकल ये भाप गये वो तुरंत बोल पड़ा जल्दी जा बेटा नही तो


दुकान बंद हो जाएगी..फिर मैं बाहर आ गया..पर मेरे दिमाग़ मे भी कुछ चल


रहा था..और इस बार मैं किसी भी हालत मे ऐसा सुनहरा मौका छोड़ना नही चाहता


था.. मैं घूम कर उस झुगी की दोसरि तरफ़ चला गया..और अंदर झाँकने के लिए


कोई जगह ढूँढने लगा…मैं अंदर क्या हो रहा होगा सोच सोच कर बहुत ज़्यादा


एग्ज़ाइटेड होने लगा था..ज़ल्दी ही मुझे एक जगह मिल गयी ..दीवार मे एक


छेद हुआ पड़ा था .वो छेद कोई ज़्यादा बड़ा तो नही था पर फिर भी मुझे अंदर


का नज़ारा सॉफ नज़र आ रहा था…अंकल की खोली (रूम ) बिल्कुल कोने मे थी सो


कोई मुझे वाहा उधर झाँकते हुए देख भी नही सकता था..फिर मैने अंदर देखना


शुरू किया..और जैसा मैने सोचा था वैसा ही हो रहा था..अंकल ने अंजलि दीदी


को अपनी बाहो मे जकड़ा हुआ था..उसका एक हाथ दीदी की कमर को उपर से नीचे


तक सहला रहा था..


"अब तो शाराम छोड़ दे मेरी जान…अब तो तेरे भाई को भी मैने बाहर भेज दिया


है" अंकल दीदी की जांझो(थाइस) को सहलाते हुए बोले.


"अंकल..प्लस्सस्स…आह..प्ल्ज़्ज़ मुझे घर जाने दो" दीदी अंकल का हाथ अपने


जाँघो से हटाने की कोशिस करते हुए बोल रही थी.


" इन सेक्सी बालो को क्यू बाँध रखा है तूने..बह्न्चोद..खोल इन्हे.."वो


दीदी की जुड़ी को खोलते हुई बोला.


शायद उसको भी लड़कियो के लंबे बाल बहुत पसंद थी..और दीदी के बाल लंबे


होने के साथ साथ एकदम सिल्की भी थे. बालो की चमंक ओर शाइन ये बता रही थी


कि दीदी उनकी कितनी देख रेख करती है.अंकल के लिए ये सब मानो सपना सा ही


था जिसका वो पूरा फ़ायदा उठना चाह रहे थे. जोश मे आकर अंकल ने दीदी के अब


तक बिखर चुके बालो को अपने हाथो मे भर कर उनमे अपना मूह डाल दिया और बालो


की खुशुबू सुघने लगे..जैसे जैसे दीदी के बालो से आती खुशुबू उस गंदे आदमी


के दिमाग़ मे जाने लगी वैसे वैसे उसका लंड लूँगी मे खड़ा होने लगा..ये


देख सिर्फ़ अंकल ही नही दीदी भी हैरान थी..अब तो दीदी को भी अपने बालो की


इंपॉर्टेन्स का पता चल गया था..और शायद वो अपने आप पर थोड़ा घमंड भी करने


लगी थी..हालाँकि वो घमंड थोड़ी देर के लिए ही था..क्योंकि अंकल अब दीदी


के बालो को अपने बालो से भरी छाती पर रगड़ने लगा ..और इससे दीदी के बॉल


खिचने लगे तो दीदी कराह उठी."आआऐसशह…धीरे कारू....दर्द होता है.."


अंकल का जोश अब बढ़ता ही जा रहा था..और जिस तरह से वो दीदी के जाँघो को


सहला रहा था दीदी भी थोड़ा थोड़ा बहकने लगी थी ..अब दीदी के हाथो ने अंकल


के हाथो को पकड़ा तो हुआ था पर वो उनको रोक नही रही थी


"तेरी उम्र क्या है.."


"जी..तीइश्ह्ह्ह्ह्ह…23" अंजलि दीदी काँपती आवाज़ मे बोली.


"किसी ने तुझे पहले चोदा है…" अंकल दीदी की गर्दन पर आए पसीने को अपने


खुरदूरी जीब से चाट ते हुए बोला. अंकल की खुरदरी जीब अपनी गर्देन पर लगते


ही दीदी के बदन ने एक झटका खाया..और दीदी की आँखे इस अनोखे मज़े के आनंद


मे बंद होने लगी.


"बोला साली…चुदी है किसी से पहले….वैसे तुझे देख कर लगता नही की तू अभी


ताक चुदाई से बची होगी..."


"आआअहह…नही मैं कवारी हू…"दीदी ने अपनी बंद आखो को और ज़्यादा बंद करते


हुए जवाब दिया.


अंकल को तो मानो कुबेर का ख़ज़ाना मिल गया जब दीदी ने बताया कि वो अभी


कवारी है.वो जल्दी खड़ा हुआ और फटाफट अपनी लूँगी खोल एक तरफ़ फैंक दी वो


अब पूरा नंगा दीदी के सामने खड़ा था दीदी अभी भी चारपाई पर बैठी थी. उसका


लंड रुक रुक कर झटके खा रहा था ..ये देख मेरा हलक सुख गया था तो आप समझ


सकते है कि दीदी की क्या हालत हुई होगी. लंड काफ़ी बड़ा लग रहा था ..


"हाथ मे ले इसे.." अंकल को दोबारा नही बोलना पड़ा और ना चाहते हुए भी


दीदी का हाथ अपने आप उस विशाल लंड पर चला गया. और क्यू ना जाता इसी को तो


वो अपने रूम से चुपके चुपके देख कर अपने बदन को सहलाती थी..


दीदी के ठंडे नरम नरम हाथो को स्पर्श पाकर लंड ने एक ज़ोर का झटका मारा.


और अंकल के मूह से निकला "एयेए.हह…साली…क्या नरम हाथ है तेरे..रंडी…अहह."


अपनी बड़ी बहन को उस अंजान बुढ्ढे आदमी का लंड इस तरह से हिलाते देख


मुझसे कंट्रोल नही हुआ और मैने भी आना लंड पॅंट का जिपपर खोल बाहर निकाल


लिया और मूठ मारने लगा..


तभी मेरी किस्मत ने मुझे फिर से धोका दिया..और अंकल ने दीदी को चारपाई से


उठा कर एक तरफ़ खड़ा किया..वो पता नही क्या करना चाह रहा था.फिर वो झुका


और चारपाई को वाहा से उठाने लगा..मैने देखा की दीदी की आँखो मे मानो नशा


फेला हुआ था..वो लगातार अंकल की टाँगो मे लटकते लंड को बिना पलके बंद किए


देखती ही जा रही थी..शायद दीदी ने पहली बार लंड इतना पास देखा था..कुछ इस


मिनिट बाद अंकल ने खाट झुग्गी ( रूम ) के दूसरी तरफ़ वाले हिस्से मे बिछा


डी और फिर वो दीदी का हाथ पकड़ उन्हे उसे हिस्से मे ले गया…अब मुझे कुछ


भी नज़र नही आ रहा था..मुझे अपनी किस्मत पर गुस्सा आने लगा…इतना अच्छा


मोका मेरे हाथ लगा था..मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मुझे ..चारपाई के


ज़ोर ज़ोर से हिलने के आवाज़ आने लगी…चर…चार..चार" और बीच बीच मे दीदी की


सिसकिया भी आने लगी…"अहह…इस्शह…."


क्या अंकल दीदी की चुदाई करने लगा है..ये सोचते ही बेचैन होने लगा..मैने


फटा फॅट अपना लंड वापस अपने पॅंट मे डाला..और कोई जगह अंदर देखने के लिए


ढूढ़ने लगा…


फिर तभी मेरी किस्मत दोबारा खुली और मैने देखा कि दीदी भागती हुई दोबारा


झुगी के उसी हिस्से मे आ गयी जहा वो पहले थी…उन्होने अपने दोनो हाथो से


अपनी सफेद चूड़ीदार पाजामी पकड़ी हुई थी.नीचे लटकता हुआ नाडा से बता रहा


था कि दीदी की पाज़ामी खुली हुई है….


"नही मैं ये सब नही करवाउंगी..प्लज़्ज़्ज़….छोड़ दो मुझे..अंकल..आपको


पैसे चाहये तो वो ले लो….प्ल्ज़ मेरी जिंदगी मत बर्बाद करो" दीदी की आँखो


मे अब आसू आ चुके थे..तभी दूसरी तरफ़ से अंकल बाहर आया …अंकल की आँखे हवस


के नसे से लाल हो रही थी..


"साली…थोड़ी देर पहले तो बड़े मज़े से करवा रही थी..अब क्या हुआ तुझे


..तुझे लगता है कि मैं तेरे जैसा कोरा और जवान माल बिना चोदे जाने


दूँगा…" अंकल दीदी के तरफ बढ़ते हुए बोला..दीदी धीरे धीरे पीछे होने लगी


और वो शैतान आगे बढ़ने लगा…दीदी की ऐसी हालत देख मैं सोच मे पड़ गया कि


आज की तारीख मे लड़की होना कितना बड़ा गुनाह है और उपर से अगर लड़की दीदी


जैसी खूबसूरत हो तो क्या कहना…..


फिर मैने दोबारा अंदर चलते हवस के नंगे नाच पर अपना ध्यान केन्दरित किया


.और जो मैने देखा उससे मेरा हाथ दोबारा मेरे लंड पर चला गया …दीदी दीवार


से सटी खड़ी थी और अंकल का एक हाथ सूट के उप्परसे उनकी लेफ्ट चूची को दबा


रहा था और दूसरे हाथ से वो दीदी की पाजामी के अंदर हाथ डालने की कोशिश कर


रहा था….


"बह्न्चोद …क्या..मुलायाम चुची है तेरी रानी.आज तक मैने इतनी चूचिया दबाई


पर तेरे जैसी कड़क और मुलायम चुचि किसी की ना थी .आइ…." वो दीदी की


चूचिया दबाता हुआ बोला..


उधर दीदी अपनी पूरी ताक़त के साथ अपनी पाजामी मे घुसने की कोशिस करते


अंकल के हाथो को रोक रही थी..जब उनको लगा के वो अंकल के हाथ को नही रोक


पाएगी तब वो अचानक दीवार की तरफ मूड गयी….अब दीदी की पीठ अंकल और मेरी


तरफ़ थी…


"मुझे छटपटती लड़किया बहुत पसंद है..साली ..कुतिया आज तो मैं तेरी चूत को


चोद चोद कर भोसड़ा बना दूँगा…" वो बुढ्ढा अंकल फिर पीछे से ही दीदी से


लिपट गया और अपने दोनो हाथो से दीदी को अपने गिरफ़्त मे ले लिया…दीदी की


अब ऐसी हालत देख मुझे उन पर दया भी आ रही थी…पर मेरे अंदर पैदा हो चुकी


हवस मुझे ये सब देखने के लिए उकसा रही थी..तभी एक ही झटके मे अंकल ने


दीदी की पाजामी को अपने अनुभवी हाथो से सरका कर नीचे कर दिया और फिर नीचे


बैठ कर दीदी के गोरे गोरे चूतड़ पर चढ़ि हरी (ग्रीन ) कछि (पॅंटी ) देख


ने लगा…उसने फिर कछि पर हल्का सा किस किया और अपने दोनो हाथो से कछि के


उप्पर से दीदी के चूतड़ो को मसलने लगा..फिर एक झटके मे दीदी की हरी कछि


को उसने नीचे सरका दिया..अब चूतड़ पूरे नंगे हो चुके थे…दीदी के चूतड़ तो


ब्लू फिल्म वाली लाकियो से भी अच्छे थे एक दम गोल और सुडोल..उभरे हुए


बाहर की तरफ़ निकले हुए दीदी के चूतड़ देख मेरा लंड पागल हो गया था तो आप


सोच भी सकते है कि अंकल का क्या हाल हुआ होगा क्योंकि दीदी तो उनकी पास


ही खड़ी थी.फिर बिना कोई वक्त गवाए अंकल ने अपने गंदा सा मूह दीदी के


गोरे गोरे चुतदो मे घुसा दिया और वो उन्हे चाटने लगा..अंकल की खुरदूरी


जीब, मूह पर आई दाढ़ी (बियर्ड) और उनके मूह से आती गरम गर्म सासो को


महसूस कर दीदी के मूह से ना चाह कर भी एक सिसकारी निकल गई


…"आआ..इसस्स्स्स्स्स्स्सश….मा….इसस्शह…" दीदी के लिए ये एक नया अनुभव था


और उनके चूतड़ अपने अप अंकल के जीभ का सपर्श पाने के लिए..अंकल के मूह मे


घुसने की जदोजहद करने लगे..अंकल की जीभ दीदी के चुतड़ों की दरारो मे


उप्पर से नीचे उनकी चूत तक घूम घूम कर अपना कमाल दिखाने लगी…अब दीदी की


आखे मस्ती मे फिर से बंद होने लगी थी और उन्होने प्रतिरोध बंद कर दिया


था..दीदी की कवारी चूत चाट चाट कर उसका रस पीते ही अंकल जोश से भर गया


…लड़की अब उसके काबू मे दोबारा आ गयी थी…इस बार उसने समय गवाने की कोशिश


ना की और खड़ा होकर उसने अपना तना हुआ लोड्‍ा अब तक झूक चुकी अंजलि दीदी


की चूत (पुसी) पर रख दिया..ये सोच कर कि अब तो दीदी कोई कोई चुदने से नही


बचा पाएगा…तभी मुझे लगा कोई मेरे अलावा भी शायद कोई और ये सब देख रहा


है..वो जो कोई भी था वो बंद दरवाजे से अंदर झाक रहा था..क्योंकि दरवाजा


थोड़ा थोड़ा हिल रहा था.( मानो की कोई बड़ा उत्सुक था अंदर देखने के लिए


) .पर .मेरे लंड ताव मे आ गया और ..''''फाकच्छ..फ़ाच्छ..मेरे लंड ने पानी


छोड़ दिया..इतना तेज ऑर्गॅज़म मुझे पहले कभी नही हुआ था….मेरी टाँगे काप


रही थी. तभी फॅट की ज़ोर से आवाज़ हुई और मैने देखा कि अंकल ज़मीन पर


बेहोश पड़ा है..उसका सर खून से लत्पथ है…और दीदी के हाथ मे एक टूटी काच


की बॉटल है….


हुआ ये था कि जैसे ही अंकल अपना लंड दीदी की चूत मे डालने वाला था तभी


दीदी का हाथ साइड मे रखी शराब की बॉटल पर आ गया और उन्होने वो बॉटल अंकल


के सर पर दे मारी थी…दीदी फटाफट अपनी पाजामी पहनने लगी…मैं भी अब वकाई मे


घबरा गया था..सो मैं भी अपने छुपी हुई जगह से बाहर आगेया और दीदी की तरफ़


बढ़ा. मैं जैसे ही झुगी के गेट पर पहुचा..दीदी बाहर आ रही थी फिर वो मेरे


पास आई और बोली अनुज ज़ल्दी चल यहा से…मैने कुछ और नही पूछा और फिर फटाफट


हम वाहा से निकल कर अपने घर आ गये..पर घर आते आते भी मेरे दिमाग़ मे एक


सवाल चल रहा था..कि..आख़िर वो कोन था जो दरवाजे से अंदर झाक कर ये सब देख


रहा था….


"अरे अंजलि तुम्हारा सरवे कैसा रहा आज" चाचा जी रोटी का टुकड़ा तोड़ते


हुए बोले. हम सब रात का खाने खा रहे थे.


"जीई…जी अच्छा था" दीदी हकलाती ज़बान से बोली.


"अरे बेटा तुम इतनी परेशान क्यू लग रही हो..तबीयत तो ठीक है ना तुम्हरी'


चाचा जी दीदी की तरफ़ देखते हुए बोले.


"हाँ..हॅंजी..पापा..जी.. बस मुझे थोड़ा सा सर मे दर्द है" दीदी नज़रे


नीची करती हुई बोली.


" और तुम्हारी गर्दन पर ये निशान कैसा है" चाचा जी दीदी की गर्दन के


निचले हिस्से पर पड़े निशान की तरफ़ इशारा करते हुए बोले. आप लोग तो अब


समझ ही गये होंगे के वो निशान किसने दीदी को दिया था. दीदी तो मानो सुन्न


ही पड़ गयी थी.


"जी वो एयेए…वाहा काफ़ी गंदगी थी इसी वजह से कोई कीड़ा काट गया था" दीदी


निशान को अपने हाथो से छुपाते हुए बोली.


मैं ये सब चुप चाप देख रहा था और खाना खा रहा था.


" भाई. मैने ये भी सुना है तुम्हरे छोटे भाई ने तुम्हारी बहुत मदद की आज


सरवे मे ' चाचा जी मुस्कुराते हुए मेरी तरफ़ देखते हुए बोल रहे थे.


"हा.. बहुत मुदद की मैने ..उस शराबी गंदे बुढ्ढे को अपने जवान बहन थाली


मे परोस कर दे दी थी आज…बलात्कार होता होता बचा था आज दीदी का.."…मैने मन


मन मे अपने आप से कहा.और फिर मैं हल्का सा मुस्कुरा दिया. दीदी सूप पीते


पीते मुझे देख रही थी. मानो कि जान ना चाहती हो कि मैं क्या जवाब दूँगा..


"पापा मेरे सर मे बहुत दर्द हो रहा है मैं दवाई ले कर सोने जा रही हू"


दीदी नॅपकिन से अपना हाथ पोछ्ते हुए बोली और उठी कर उपर रूम मे चली गयी


कुछ देर बाद मैं भी सोने के लिए रूम मे आ गया.


"अनुज तुझसे एक बात पूछूँ..प्ल्स सच सच बताना" दीदी की आवाज़ मेरे कानो मे आई.


रूम की लाइट्स बंद थी और रात के शायद 11 बज रहे थे. मैं डर गया और सोचने


लगा कही दीदी जानती तो नही है कि मैने उनका वो नंगा नाच देखा है.


"आ..हा हाजी दीदी पूछो" मैं झिझकते हुए बोला.


"तूने इतनी देर क्यो लगाई थी वाहा आने मे..और तू कब वापस आया था" दीदी भी


थोड़ा हिचकिचाते हुए बोली


"मैं तभी तभी ही आया था दीदी"मैने फटाक से जवाब दिया.


"पर तेरे पास कोल्ड ड्रिंक तो नही थी" दीदी बोली


अब मैं फस गया ….मैने अपने आप से कहा . पर फिर मैने समय की गंभीरता को


समझते हुए जवाब दिया " दीदी सभी दुकाने बंद थी ..मैं बहुत घुमा पर कही भी


कोल्ड ड्रिंक नही मिली थी. सो खाली हाथ वापस आ गया ."


दीदी को अब शायद यकीन हो गया था कि मैने वो सब नही देखा था क्योंकि फिर


दोबारा उन्होने कोई सवाल नही किया. और दिन की बात याद करते करते मुझे ना


जाने कब नींद आ गयी पता ही ना चला.


अंजलि दीदी तो मस्ती भी खो कर किसी और ही दुनिया मे चली गयी थी..रेखा


भाभी दीदी के बदन को अब बिना हिचाक यूज़ करने लगी.


"सच मे अंजलि तू एक बार उसका लंड ले ले अपने चूत मे ….तेरी ज़िंदगी बन


जाएगी…" कहते हुए रेखा भाभी दीदी के बदन पर झुक गयी ( जैसे की कुत्ता


कुतेया को अपने अगले पेरो से पक्कड़ ता है ..कुतिया की चुदाई के वक्त ).


"आहह..इससस्स….भाभिइ…..ऊहह..मा….भाभी…मे मर जाउन्गी…ऐशह….श्ह्ह्ह्ह" दीदी


मस्ती मे बोली


"फिर वो मेरी चुचियो को ऐस्से कस कस्स कर दबाता है कि मानो की उनका रस


निकालना चाहता हो" भाभी अब झुकी हुई दीदी की लाटकी चुचिओ को टी=शर्ट के


अंदर हाथ डाल कर उतनी ही तेज दबाने लगी..और अब उन्होने घोड़ी बनी दीदी के


चुतदो पर धक्के मारना भी शुरू कर दिया था…..


" क्या तुझे चुदाई के वक्त गंदी गंदी गालिया सुनना अच्छा लगता है…बोल


रांड़..अससह…" भाभी की भी अब आँखे बंद थी पर उनके धक्के अब बहुत तेज होने


लगे थे..


दीदी ने कोई जवाब नही दिया..बस अपना मूह बूँद कर .मस्ती मे आती अपनी आहो


को रोकने की नाकामयाब कोशिस करने लगी. दीदी को जवाब ना देता देख रेखा


भाभी को थोड़ा गुस्सा आया और उन्होने दीदी की चूचियो पर तन चुके निपल्स


को कस्स कर अपनी उंगली से दबा दिया..और बोली…" बेहन की लोदी बोल


नाअ……मज़ा आता है तुझे मर्द से गंदी गंदी गालिया सुनकर "


इस हरकत ने दीदी की चुप्पी तोड़ दी और दर्द और मज़े मे वो बोल उठी."


आहह..भाभी….इतनी ज़ोर से मत दबाओ…हा. हा ..मुझे गंदी गंदी गलिया सुनना


अच्छा लगता है……जब कोई मर्द मुझे गंदी गंदी गालिया देता है तो मेरी चूत


मे एक आजीब सी कसाक उठ जाती है और चूत से पानी आने लगता है "


"चार..चररर .".बेड की आवाज़ के साथ साथ रेखा और अंजलि दीदी की मस्ती मे


आती आवाजो ने रूम को भर दिया था..ये सब देखता एख़्ता मे पागलो की तरह


अपना लंड मसल रहा था…जिस तेज़ी से भाभी अब दीदी को घोड़ी बना कर चोद रही


थी उन झटको से अंजलि दीदी के रेशमी बालो से बना जुड़ा भी खुल गया था और


बॉल एक साइड से होते हुए नीचे बेड पर गिरे गिरे लहरा रहे थे..तभी दीदी के


मूह से एक तीव्र आवाज़ निकली और उनकी टाँगे कापने लगी. दीदी को ऑर्गॅज़म


हो गया था और वो निढाल हो कर बेड पर पीठ के बाल गिर पड़ी थी ..पर भाभी अब


भी नही मान रही थी वो लगातार पीठ के बाल पड़ी दीदी के उपर चढ़ि अब भी


दीदी के चूतादो पर अपनी चूत रगड़ रही थी…दीदी का बदन निर्जीव सा हो गया


था..रुक रुक कर उनके मुहह से बुसस्स 'उः..उः.." की आवाज़ ही आ रही


थी..तभी इतनी भारी रगड़ान से भाभी की फूल चुकी चूत ने भी पानी छोड़ दिया


और रेखा भाभी ने अंजलि दीदी के बदन को कस कर दबोच लिया….दोस्तो अब इसको


आप मेरी बाद किस्मती कहे या खुशकिस्मती की इस दौरान ये सब देखते देखते


मैं मज़े मे इतना खो गया था कि मुझे ये भी ध्यान नही रहा कि कब मैं


दरवाजा खोल रूम के थोड़ा अंदर घुस गया हू…मुझे अपनी इस नादानी का पता तब


चला जब मेरी नज़र रेखा भाभी की हैरत मे फैली नज़रों से मिली. हालाकी


अंजलि दीदी का चेहरा अब भी नीचे तकिये मे कही छिपा था. मुझे तो मानो ऐसा


लगा कि मेरा शरीर एक पत्थर की मूर्ति बन गया है मैं चाहकर भी हिल नही पा


रहा था ..मेरे पैर वही फर्श पर जाम हो गये थे..अब इसका कारण डर और शाराम


थी या कुछ और….. तभी भाभी की नज़र मेरे चहरे से होती हुई सीधा नीचे मेरे


फूले हुए लंड पर गयी..ना जाने क्यो पर मेरे लंड ने रेखा भाभी को अपनी


तरफ़ इस तारह देखते हुए पाकर एक ज़ोर से झटका मारा . मेरे मूह से तो


मस्ती मे आवाज़ ही निकली पर तभी रेखा भाभी ने अपने होटो पर एक उंगली रख


ली मानो मुझे बोल रही हो कि अभी चूप रहो कोई शोर मत करो


स्थिति की गंभीरता समझते हुए मैने अपनी भावनाओ पर काबोए रखने मे ही


समझदारी समझी. ये सबकुछ इतना ज़ल्दी हो गया था कि मुझे कुछ सुझाई नही आ


रहा था उपर से ये जान कर कि भाभी मेरे नंगे खड़े लंड को देख रही है..एक


आजीब से कसाक मेरे बदन मे फैल्ल रही थी…तभी दीदी का बदन थोड़ा हिला मानो


कि वो होश मे आ रही है…ये सब देख भाभी जो कि अभी भी दीदी के उप्पर लेटी


थी मुझे इशारे से वाहा से जाने के लिए बोलने लगी..डर तो मे भी गया था सो


मैं फटाफट अपनी पॅंट उठा कर उस रूम से बाहर आ गया . मेरा दिल तो मानो


फटने ही वाला था पछले 10 मिनट के दोरान जो कुछ भी हुआ था वो सोच सोच कर.


मैं अभी तक नही ज़्यादा (डिचांज) था सो लंड मे हलचल मोजूद थी. मुझे अब लग


रहा था कि अगर मैने मूठ नही मारा तो मेरे अंदर इकट्ठी हो चुकी


एग्ज़ाइट्मेंट से मे पागल हो जाउन्गा सो मे फटाफट नीचे बाथरूम की तरफ़


भागा मेरा लंड अब भी नंगा लटक रहा था. मेरे ज़ोर ज़ोर से चलने की वजा से


वो काफ़ी जोरो से हिल हिल कर मेरी जाँघो पर लग रहा था. अगले कुछ मिनिट ही


मे मैं बाथरूम मे नगा खड़ा अपने लंड की खाल (स्किन ) को जोरो से आगे पीछे


कर रहा था..ये सोच सोच कर मे रेखा भाभी ने मेरा नंगा लंड देख लिया है मे


पता नही मस्ती मे मैं पागल सा हो रहा था. तभी मैने पायल की छान छान सुनी


..वो पायलो की आवाज़ धीरे धीरे बाथरूम की तरफ़ आ रही थी..और इससे पहले के


मैं कुछ समझ पाता बाथरूम का दरवाजा खुल गया . अब सीन कुछ ऐसा था की मैं


नंगा खड़ा था मेर हाथ मे मेरा मस्ती मे फूला लंड था और गेट पर रेखा भाभी


आ खड़ी हुई थी..


अगले 2 मिंट्स ताक कोई कुछ नही बोला . हम दोनो एक दूसरे की आँखो मे देख


रहे थे. दोस्तो मुझमे तो पता नही कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी थी. तभी भाभी


ने अपना दुपट्टा उतार कर बाथरूम पर लगी खुट्टी (नेल ) पर टाँग दिया और


बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया.. अब रेखा भाभी और मैं अकेले थे


बाथरूम के अंदर रेखा भाभी भी मस्ती मे लग रही थी उनकी मोटी मोटी चुचिया


उपर नीचे होने लगी थी..तभी भाभी आगे बढ़ी और अपने एक हाथ को सीधा मेरे


मस्ती मे पागल हो चुके लंड पर रख दिया..


"थोड़ी देर भी सबर नही हुआ तुझे..है रे कितना गर्म है तेरा..पर छोटा है..


" रेखा भाभी अपनी पतली उंगलियो से मेरा लंड शहलाति हुई बोली.


दोस्तो भाभी के नरम नरम हाथो को स्पर्श अपने गरम लंड पर पाकर तो मैं क्या


बताऊ…बिकुल मस्त हो गया था. और इस मस्ती मे मेरे मॅन से एक आआह भी निकल


गयी'आह..इशह…"


भाभी अब झुक कर नीचे बैठ गयी थी और उनके लो कट सूट से मुझे उनकी गोरी


गोरी मोटी चुचिया नज़र आने लगी.


"मज़ा आया था तुझे वो सब देख कर..बोल ना.." भाभी मेरे लंड पर उपर से नीचे


मालिश करती बोली.


इस मस्ती मे मैं पागल सा हो गया और मेरे मूह से निकला " हा..भाभी" .


मस्ती मे मेरी आँखे बंद हो चुकी थी . मैं तो बस भाभी के नरम नरम हाथो का


जादू अपने लंड पर महसूस कर कर मज़े लेना चाहता था.


"किसी को अपनी बड़ी बहन के बदन से खेलता देखना तुझे अच्छा लगता है


ना….बोल मेरे राजा" भाभी अब एक हाथ को मेरे लंड पर उपर से नीचे घुमाती और


दूसरे हाथ की उंगलियो से मेरे लटके हुए आंडो को मसलती बोली.


" कभी किसी लड़की ने तेरे लंड को पकड़ा है…तूने चोदा है किसी को अभी


तक.." भाभी अपना मूह उपर मेरी तरफ कर मुझे देखते हुए बोली .


मुझसे अब कंट्रोल नही हो रहा था और रेखा भाभी मुझे चिड़ा चिड़ा कर मस्त


कर रही थी.मेरा शैतानी मन मुझे बार बार बोलने लगा कि ऐसा मौका तुझे अब


कभी नही मिलेगा एक मस्त जवान औरत तेरे पास है फ़ायदा उठा ले इसका.. अब


मैं पूरा मस्ती मे आ गया और मुझ मे नज़ाने कहा से ताक़त आई और मैने भाभी


के फटाफट बाल पकड़ कर खड़ा किया और उनको धक्का देकर बाथरूम की दीवार से


लगाया और पागलो की तरह उनसे लिपट कर उनकी मोटी मोटी चूचियो को दबा दबा


भाभी के मूह मे अपनी ज़बान डाल कर उनको स्मूच करने लगा.


मेरी इस हरकत से भाभी पूरी तरह से घबरा गयी थी..वो तो मुझे एक नादान


…शर्मिला सा लड़का समझती थी ..पर मेरे अंदर छुपे हवस के शैतान से वो


अंजान थी. शिकारी अब खुद शिकार बनने वाला था.रेखा भाभी अपने हाथो से मुझे


अपने बदन से हटाने की कोशिस करने लगी पर मेरे अंदर के हवस के शैतान की


ताक़त का सामने उस बेचारी औरत की कहा चलने वाली थी.. ये पहला वक्त था जब


मैने किसी औरत के मदमस्त जिस्म को अपने कवारे बदन पर महसूस किया था…इस कश


म कश मे कभी मेरा लंड रेखा भाभी के पेट पर लगता तो कभी उनकी जाँघो पर


..एक बार तो वो भाभी की जाँघो के बीच घुस कर उनकी सलवार के अंदर छुपी


उनकी चूत पर भी लगा. हवस के चलते मैं भाभी को यहा वाहा काटने भी लगा


था..तभी भाभी मूड गयी और अब उनका मूह बाथरूम के दरवाजे की तरफ था..मुझे


गुस्सा तो आया था क्योंकि मैं भाभी की चूची चूसना चाहता था पर तभी मेरी


नज़र नीचे झुकी और मुझे भाभी की उभरी हुई गांद दिखाई दी ..मेरे मूह मे


पानी आ गया और मैने भाभी के बदन को पीछे से अपनी गिरफ़्त मे ले लिया और


अपने दोनो हाथो को आगे बढ़ा कर भाभी की उछलती चूचिओ पर रख कर उन्हे मसलने


लगा और नीचे से मैं अपना खड़ा लंड सलवार के उपर से ही भाभी की गांद की


दरार मे घुसा कर ज़ोर ज़ोर से रगड़ने लगा..दोस्तो क्या मज़ा आ रहा था


मुझे ऐसा मज़ा तो मुझे मूठ मारने पर भी नही आया था…मैं मस्ती मे भाभी की


कमर पर पीछे से काटने लगा…




"एयेए.हह …मा…काटो मत " भाभी दर्द से कराहती बोली.


मैं कुछ नही बोल रहा था बस मन मे सिर्फ़ एक ही बात चल रही थी कि आज पहली


बार एक औरत का जिस्म मिला है जितना फ़ायदा हो सके उठा लू. तभी मेरे कानो


मे किसी के सीढ़ियो से उतरने की आवाज़ पड़ी.


"भाभी.?"


ये आवाज़ अंजलि दीदी की थी वो नीचे आ गयी थी . आवाज़ सुनते ही भाभी बहुत


परेशान हो गयी और बोली .."


एयेए..अनुज..छोड़ दे अब तो…देख ले दोनो पकड़े गये तो बहुत बदनामी होगी"


पर मे तो जोश मैं पागल था भाभी की नरम नरम चूतादो की गर्माहट से मेरे लंड


मे मस्ती फैली हुई थी और मेरा पानी बस निकलने ही वाला था..


"देख अंजलि बाथरूम की तरफ़ ही आ रही है..आहह..इशह…..मान जा..अनुज" भाभी


डरते हुए बाथरूम के दरवाजे मे बनी एक छोटी सी दरार से बाहर झाँकते हुए


बोली.


डर तो मुझे भी लग रहा था पर रेखा भाभी की उभरी हुई नरम गांद पर लंड


रगड़ने मे जो मज़ा मिल रहा था उसने मेरा डर ख़तम कर दिया था..और मैं और


ज़ोर से धक्के मारने लगा.मैं अब जल्दी से जल्दी लंड का पानी निकालना


चाहता था.


"भाभी क्या आप बाथरूम मे है" अंजलि दीदी अब बाथरूम के दरवाजे के ठीक बाहर आ चुकी थी


" छोड़ दे ..मुझे ..कुत्ते..आ…इश्ह्ह..अंजलि बाहर खड़ी है..आहह…."भाभी


बोली और उन्होने अपने चूतड़ थोड़े और पीछे किए .मेरे फूले हुए लंड के लिए


इतना काफ़ी था और लंड ने पानी की बोछर शुरू कर दी..मैं रेखा भाभी से कस


कर चिपक गया …लंड रुक रुक कर पानी छोड़ रहा था ..ऐसा शानदार ऑर्गॅज़म


मुझे आज तक नही हुआ था.. तकरीबन 5 मिनट तक मे पीछे से भाभी के बदन से


चिपका रहा भाभी भी समझ चुकी थी कि मैने क्या किया है सो वो भी चुप


रही..अंजलि दीदी बाहर खड़ी है..क्या उनको पता है कि मैं भाभी के साथ अंदर


बाथरूम मे हू ?ये सोच सोच कर मेरा लंड लगातार पानी छोड़ रहा था..मुझे कुछ


होश नही था मेरे लंड से आज तक इतना पानी कभी नही निकला था और अब तो मेरी


टाँगे भी थक चुकी थी ..मैं अपनी पूरी बॉडी मे थकान महसूस कर सकता था.


"भाभी जल्दी बाहर आ जाओ मुझे भी वॉशरूम जाना है..और ये अनुज पता नही कहा


चला गया है" दीदी ड्रॉयिंग रूम की तरफ जाती हुई बोली.


कुछ देर बाद मैं भाभी की बदन से अलग हुआ .मैने देखा की मेरे वीर्य से


उनकी सारी सलवार पीछे से भीग चुकी है..उनकी सलवार देख कर लगता था कि मानो


किसी ने उन पर बाल्टी भर के पानी डाल दिया हो…अपनी सलवार की ये हालत देख


भाभी भी हैरान थी…पर अब वो क्या कर सकती थी ….उनके चेहरे पर जहा पहले


मुझे देख कर शरारत वाली मुस्कान आती थी वाहा अब एक डर फैला हुआ था..एक पल


के लिए उन्होने मुझे देखा और फिर फटाफट अपने दुपट्टे को उठा बाहर चली


गयी.


आज पूरा एक हफ़्ता हो गया था रेखा भाभी और मेरे बीच हुई उस घटना को. उस


दिन के बाद एक दो बार ही भाभी हमारे घर आई थी. शरम का जो परदा मेरे और


भाभी के बीच था वो अब ख़तम सा ही हो गया था उस घटना के बाद . शर्म तो


ख़तम हो गयी थी पर हिम्मत नही आ पाई थी मुझ मे कि मैं कुछ कर सकू.अब मैं


क्या करू मेरा स्वाभाव ही कुछ ऐसा था . हर रात या जब भी मैं घर पर अकेला


होता तो मुझे भाभी के साथ बिताए वो हवस भरे पल याद आ जाते थे. दीदी कुछ


दिनो के लिए बुआ जी के यहा गयी हुई थी क्योंकि बुआ जी की तबीयत खराब थी .


अब घर पर मैं चाचा और चाची ही थे. रूम मे अकेला होने की वजह से मैं काफ़ी


बोल्ड भी हो गया था और कंप्यूटर पर ब्लू फिल्म लगा उसमे चुदवाती लड़की को


देख देख कर खूब मूठ मारता था. पर दोस्तो जैसा अक्सर होता है अगर कोई चीज़


लगातार देखी गयी और करी गयी तो उससे मन हट जाता है और ऐसा मेरे साथ भी


हुआ . मुझे अब भी भाभी का वो गरम और नरम बदन याद आता था…काश एक बार वो


मुझे मिल जाय तो इस बार तो बस उनको चोदे बिना नही छोड़ूँगा.. मैं रात को


बॅड पर लेटा हुआ अपना खड़ा लंड सहलाता सहलाता सोच रहा था. दोस्तो अगर कोई


काम दिल से किया जाए तो वो ज़रूर होता है और अगले दिन भगवान ने मेरी सुन


ली . हुआ ये था कि दोपहर को जब मैं स्कूल से आया तो चाची ने मुझे एक साडी


दी और बोली कि वो साडी मैं रेखा भाभी को दे आऊ. " मुझे एक मौका और मिला


है …हे भगवान इस बार काम बनवा देना " मैं मन मन मे बोला और भाभी के घर की


तरफ चल पड़ा. " घर पर अगर रेखा भाभी अकेली हुई तो मैं उनके साथ क्या क्या


करूँगा ये सब सोच सोच कर मेरा लंड पागल होता जा रहा था..जैसे जैसे मे


रेखा भाभी के घर के पास आता जा रहा था वैसे वैसे मेरे लोड्‍े मे हरकत


बढ़ती जा रही थी. तकरीबन 10 मिनट मे मैं रेखा भाभी के घर की दरवाजे पर


पहोच गया था. दोस्तो इससे पहले कि आगे क्या हुआ आ मैं आपको रेखा भाभी के


घर के मेंबर्स के बारे मे बता दू…रेखा भाभी और उनके पति के अलावा उस घर


पर भाभी की सास और उनकी ननंद (सिस्टर इन लॉ) सोनाली रहती थी. सोनाली


मुझसे 2 साल बड़ी थी और वो बी.कॉम 2न्ड एअर मे पढ़ती थी. रंग तो उसका


ज़्यादा सॉफ नही था ( पर सावला भी ना था ) पर बंदन गजब का था . सोनाली की


हिगत लगभग 5'3" के आस पास थी पर जो चीज़ सबसे ज़्यादा आकर्षक थी वो थी


उसके 36 इंच के बूब्स . मैने भी कई बार उसकी बूब्स को सोच सोच कर मूठ


मारा था. खैर मे अब स्टोरी पर वापिस आता हू. मैने उनके घर का दरवाजा खाट


खटाया. मुझे इस बात का पूरा यकीन था कि रेखा भाभी ही दरवाजा खोलेगी मेरे


दिल ये सोच सोच कर धड़ाक रहा था .कुछ देर बाद दरवाजा खुला . " अरे अनुज


बेटा कैसे आना हुआ..आओ अंदर आओ" दरवाजा भाभी की सास ने खोला था. मेरा तो


दिल पर च्छुरी चल गयी थी .


मैं बहुत ही बेसबरा हो रहा था और मैने उनकी


सास से पूछा " रेखा भाभी कहाँ है मुझे उनको साडी देनी है" मैं रूम के हर


कोने के तरफ़ नेहारता हुआ बोला. मानो की जैसे भाभी वही कही छुपी है. "


अरे रेखा तो मार्केट गयी हुई है 1 घंटे मे वापिस आएगी बेटा तू अंदर तो


आ.." बुधिया बोली. मेरा सारा प्लान चोपट हो गया था..पता नही किस्मत मेरे


पीछे उंगली लेकर क्यो पड़ी है..मैने मन मन मे सोचा.


"आप ये साडी भाभी को दे देना मैं अब जाता हू" मैं उदास होता हुआ बोला.


"अरे बेटा थोड़ा वेट तो कर ले..रेखा आ जायगी….और हा अब तू आया है तो एक


काम भी कर दे..." बुढ़िया बोली


"आहह..ठीक है बोलिए क्या करना है" मैं बोला और अब मैं बोल भी क्या सकता


था..मेरा तो लंड भी ठंडा पड़ गया था ये जानकर की भाभी घर पर नही है.


बुढ़िया फिर मुझे द्रवाईंग रूम के साथ वाले रूम मे ले गयी . रूम के अंदर


पहुच कर मुझे पता चला कि वो रूम सोनाली का है. सोनाली करवट लेकर लेटी हुई


थी..मेरी नज़र जैसे ही सोनाली पर पड़ी मेरी उदासी फ़ॉर्रन रफूचक्कर हो


गयी . मैं सोनाली के बदन को अपनी आखो से नाप रहा था तभी अम्मा जी बोल उठी


" अरे आज इसकी तबीयत थोड़ी खराब है…सो नींद की गोली खाकर सोई है" अम्मा


जी बोली


पता नही क्यू पर ये बात सुनकर मेरे लंड मे एक कसक उठी और मेरे आँखो मे चमक आने लगी


"अरे बेटा वो जो बेग रखा है उपर टांड पर उसको ज़रा उतार देना" बुढ़िया


टांड की तरफ इशारा करते हुए बोली.


"अच्छा अम्मा जी आप थोड़ा पीछे हो जाओ…" मे बॅड पर चढ़ता हुआ बोला


मैं बॅड पर चढ़ उस काले से बॅग को उतारने लगा . दोस्तो मैं सोनाली के बदन


के पास ही खड़ा था तभी मेरे दिमाग़ मे एक आइडिया आया और मैने नीचे से


अपने उल्टे पाव के तलवे को सोनाली के उभरे हुए कुल्हो के पास सरका


दिया..मेरे पैरो की उंगलियो पर जैसे ही मुझे सोनाली की गांद की गर्मी


महसूस हुई मेरे अंदर का शैतान जागने लगा..और मुझसे बोलने लगा कि " एक दम


कोरा माल है ये सोनाली तो…आज भाभी को छोड़ और इसकी चूत का मज़ा उठा ले…"


मैं ये सब सोच ही रहा था कि नीचे खड़े अम्मा जी बोल उठी..


" क्या ज़्यादा भारी है बॅग…इतना समय क्यो लगा रहा है बेटा"


अब मैं बुढ़िया को क्या बोलू कि मैं उसकी लड़की के बदन की गर्मी ले रहा


हू.मुझे फिर लगा कि कही बुढ़िया को शक ना हो जाय सो मैने बॅग उतार दिया


और फिर पलंग से उतर कर नीचे खड़ा हो गया.


"बेटा अब अगर तुझे जाना है तो चला जा.." अम्मा जी उस बॅग की चैन खोलते हुए बोली


."नही…मैंम्…म..मे… थोड़ा रुक कर ही जाउन्गा अब..वैसे भी बाहर बारिश का


मोसाम हो रहा है" मैने अम्मा जी की बात काटते हुए उनको ज़ल्दी से जवाब दे


दिया.


" चल ठीक है ..एक काम कर बेटा तू बाहर टीवी देख ले तब तक मुझे तो नींद आ


रही है मैं थोड़ा सो लेती हू"


फिर हम दोनो सोनालीके कमरे से बाहर आ गये. मुझे अब ऐसा सुनहिरा मौका नही


छोड़ना है..बस थोड़ी सी हिम्मत दिखा अनुज…." मैं अपने आप को हिम्मत


दिलाता हुआ बोला.


मैं टीवी ज़रूर देख रहा था पर मेरा दिमाग़ आगे की प्लानिंग मे मशगूल था.


मैने घड़ी देखी तो पाया कि 10 मिनट गुजर चुके है बुढ़िया को अपने रूम मे


गये..


"क्या बुढ़िया सो चुकी होगी..क्या यही सही मॉका है" मैने अपने आप से सवाल किया.


और फिर आख़िर वो पल आया और मैं हिम्मत जुटा सोनाली के रूम की तरफ बढ़ा


मेरा दिल अब बहुत ज़ोर से धड़कने लगा था दोस्तो ये सब करते हुए मुझे


जितना रॉंमांच हो रहा था उसको मैं शब्दो मे बया नही कर सकता. सोनाली के


रूम तक पहोच्ते पहोच्ते ही मेरा लोड्‍ा आधा (हाफ) खड़ा हो चुका था


मेरे हाथ ना जाने क्यू काप से रहे थे और इन्ही कपते हाथो से मैने सोनाली


के रूम का दरवाजा खोला. सोनाली सोती हुई किसी अप्सरा से कम नही लग रही


थी..अब वो पेट के बल सोई हुई थी..ना जाने लड़कियो को पेट के बल सोना क्यो


अच्छा लगता है..सोनाली ने बादामी रंग का सूट और उसी रंग की पाज़ामी पहनी


हुई थी..उल्टे लेटने से सोनाली की गांद काफ़ी उभर गयी थी..ये सब देखते


देखते मैं पागल सा होने लगा था.फिर मैं ज़्यादा समय गवाए बिना कमरे मे


घुस गया और फटाफट से अपने कपड़े उतार पूरा नंगा हो गया..किसी अंजाने घर


मे किसी जवान लड़की के साथ उसी के रूम मे नंगा होने पर मस्ती की लहर जो


मेरे बंदन मे उठी मैं उसको आपसे कैसे बयान करू दोस्तो..


मैं धीरे धीरे सोनाली के बॅड की तरफ़ बढ़ा . जैसे जैसे मैं आगे बढ़ रहा


था वैसे वैसे ही मेरे दिल की धड़ कन तेज हो ती जा रही थी. मेरे लिए तो


मानो वक्त जैसे थम सा गया था मुझे ना तो कोई शोर ना कोई और चीज़ सुनाई दे


रही थी बस सिर्फ़ सोनाली की वो उभरी हुई गांद नज़र आ रही थी. और फिर वो


वक्त आया जब मैने अपने काँपते हाथो को सोनाली की गांद पर रखा . अपनी कोरी


गांद पर मेरा हाथ लगते ही सोनाली का बदन हल्का सा कपा पर फिर दोबारा शांत


हो गया. एक लड़के का हाथ अपने गुप्तांगो पर लगने पर सोनाली का बदन अपने


आप ही हरकत कर रहा था. पर दोस्तो सोनाली के चूतादो का वो नर्म अहसास पाते


ही मानो मेरी पूरी बॉडी का खून मेरे लंड मे आ कर बहने लगा था और वो फूल


कर इतना मोटा हो गया था कि अगर मैं उसे बाहर ना निकालता तो मानो वो फाट


ही जाता .. मैने फटाफट अपनी पॅंट और अंडरवेार उतारे और एक हाथ से अपना


लंड मसल्ने लगा और दूसरे से सोनाली के चूतद्ड . कपड़ो के उप्पर से सोनाली


की पॅंटी को महसूस कर रहा था..मैं धीरे धीरे अपने आप पर काबू खोने लगा


..पर मन मे कही ये चल रहा था कि कही सोनाली जाग ना जाए ….पर वो जागे जी


कैसे उसने तो नींद की गोली ली हुई है…मेरे अंदर का शैतान बोला..ये जानने


के लिए कि सोनाली गहरी नींद मे है मैने उसका राइट चूतड़ को ज़ोर से दबाया


पर सोनाली ने कोई प्रतिक्रिया नही दी अब मुझे यकीन हो चला था कि वो गोली


के नसे मे है और उठेगी नही ..फिर क्या था मैने फाटाक से उसकी गांद को


नंगा किया और उसके नंगे चुतदो कस कस कर दबाने लगा..मेरा जोश इतना बढ़ गया


था कि कई बार तो मैने उसके गोरे चूतादो पर काट भी खाया ..अब सीन ये था कि


सोनाली की सलवार और पॅंटी उसके घुटनो मे थी और मैं ..उस हसीना को फूली


हुई चूत को चाट रहा था…वा क्या स्वाद था ..दोस्तो एक कवारी चूत का रस जो


नशा करता है वैसा नशा दुनिया की किसी शराब मे नही होता..जिन लोगो ने


कुँवारी चूत का रस पिया है वो ये बात अच्छे से जानते होंगे..मैं हवस मे


इतना पागल हो गया था कि मुझे ये समझ नही आ रहा था कि आगे मे क्या करू…समय


बीतता जा रहा था बुढ़िया कभी भी सो कर उठ सकती थी और ये भी हो सकता था कि


कोई और भी उनके घर पर आ जाय..इसी कशमकस मे पेट के बल लेती सोनाली के बदन


पर चढ़ गया और अपना लंड उसके चूतादो के दरार मे फसा उनको अपने लंड से


रगड़ने लगा..नशे मे मेरी आँखे आधी खुली थी और आधी बंद ..आज मैं पहली बार


एक लड़की के बदन पर लेटा था..और लड़की भी जवान और खूबसूरत . अब मैने


सोनाली की गर्देन को पीछे से चाटना शुरू कर दिया था और दोनो हाथो को नीचे


कर उसकी चुचियो को सूट के उप्पर से ही मसलने लगा था. हालाकी ज़्यादा जगह


नही मिली थी क्योंकि सोनाली पेट के बल लेटी हुई थी पर फिर भी मैं उसकी


चुचियो की नर्मी महसूस कर रहा था और जितना हो सके उनको दबा रहा था. मेरा


लंड तो सोनाली की चूत मे नही गया था पर उप्पर से धक्के लगाने से उसकी चूत


ज़रूर फूलने लगी थी.. जोश मे सोनाली के बदन को अपने बदन से इतना रगड़ रहा


था कि कमरे मे सोनाली के पलंग की आवाज़े गूंजने लगी थी..पर मुझे इस बात


की कोई परवाह नही थी अगर उस वक्त कोई भी वाहा आ जाता तो भी मैं रुकने


वाला नही था..तभी अचानक मेरा बंदन आकड़ा और लंड ने पानी छोड़ दिया ..मुझे


ओरगाम हो रहा था और मैने सोनाली के बदन को इतना जोरो से जाकड़ लिया था कि


नींद मे भी सोनाली के मूह से एक कराह निकल गयी थी.. अब मैं उसके बदन पर


मुर्दो के तारह पड़ा था और मेरे लंड से निकला पानी सोनाली के चूतादो से


होता हुआ उसकी कुँवारी चूत को गीला करता हुआ नीचे चादर पर गिर रहा


था..मुझे कुछ होश नही था ..पर तभी दीवार पर लगी घड़ी से आवाज़ हुई और


मुझे पता चला कि शाम के 4 बज चुके है .कही इस आवाज़ से बुधिया ना जाग जाय


मैं फटाफट सोनाली के बदन पर से उठा और अपनी पॅंट और अंडरवेार पहन


लिया..तभी मेरी नज़र सोनाली की नंगी गांद पर पड़ी .मेरे ज़ोर दार रगड़ने


और मेरे धक्को से उसके गोरे गोरे चूतड़ कई जगह से लाल हो गये थे ..उसका


सूट पर भी कई झुरिया पड़ गये थी ..थोड़ा और करीब जाने पर मैने देखा कि


सोनाली की गर्देन पर दांतो के निशान है जो के शायद मैने ही जोश मे आकर


दिए थे..खैर मैने फटा फट उसके कपड़े ठीक किए और उसकी सलवार उसको दोबारा


पहना दी ..और फिर मैं जल्दी से नीचे आ कर बैठ गया….



ऐसे ही दिन बीतने लगे और मेरे अंदर का शैतान हर बीतते दिन और ज़्यादा प्रबल होता गया. एक दिन मैं साइबर केफे मे बैठा सेक्सी क्लिप्स देखने मे मग्न था. तभी अचानक किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा . 


“अच्छा बेटा अकेले अकेले…” एक आवाज़ मेरे कानो मे पड़ी. डर से तो मेरे होश ही उड़ गये थे .मेने झाट से उपर देखा तो पाया कि वो राज था. मैं हिचकिचा गया पर शर्म से मेने उसको कुछ नही बोला. राज दोसरा स्टोल ले कर मेरे साइड मे बैठ गया और कंप्यूटर स्क्रीन को घूर्ने लगा. 


“अरे अपने गुरु से क्यो शर्मा रहा है ,……भूल गया मेने ही तो तुझे इन चीज़ो के बारे मे बताया था….पर मुझे तुझसे एक शिकायत है” राज बोला 


“क..क्या शिकायत है बोल” मैं हकलाते हुए बोला. 


राज की हर्कतो से मुझे अब उससे नफ़रत सी हो गयी थी. उसके इन गंदे रवैये से स्कूल मे उसका सेक्षन भी चेंज हो गया था. इसलिए मेरी और उसकी मुलाकात कम हीहोती थी. 


“आबे साले फ्री मे गुरु की दीक्षा ले ली तूने….गुरु दाक्षिणा भी तो दे” राज अपना लंड को पॅंट के उपर से खुजलाता हुआ बोला. 


मेने कोई जवाब नही दिया.तभी उसने मेरे हाथो से माउस लिया और कोई सेक्स वेबसाइट खोल कर वाहा एक क्लिप पर क्लिक कर दिया. थोड़ी ही देर मे क्लिप चालू हो गयी..ये ठीक वैसी ही क्लिप थी जैसी मुझे पसंद थी ..यानी इसमे एक जवान लड़की एक उसी की उमर की जवान लड़की से घोड़ी बनी चुद रही थी.. 


मेरा लंड खड़ा होने लगा. राज ये सब देख कर खुश हुआ और बोला” देख क्या मस्त लड़की है..” 


“ देख बेहन चोद कैसे रंडी बन कर चुद रही है…” ये कहते हुए अचानक उसने अपना सीधा हाथ मेरी लेफ्ट थाइ पर रख दिया . मेने उसका हाथ हटाने की कोशिस की पर उसने हाथ नही हटाया . “ साली की हिलती हुई चूचिया देख …कितनी गोल गोल है ..पता है किसकी तरह लग रही है….” 


पता नही पर राज के हाथो को धीरे धीरे मेरी जाँघो को सहलाने से मुझे मानो नशा सा हो गया था. औ उसी नशे मे मेरे मूह से यकायक निकल गया; “ ..कि..किसकी ..तारह….लगती है..” 


“ तेरी बड़ी बहन अंजली के तारह…..उसकी भी ऐसी ही होंगी नाअ…वो भी तो ऐसी ही दिखती होगी नंगी हो कर..है ना…..बोल बेहन चोद” राज मेरे चेहरे के भाव को पढ़ता हुआ बोला. 


अपवी दीदी का नाम सुनते ही मुझे ना जाने क्यो एक करेंट सा लगा.पर राज ने तो ना जाने क्या मुझ पर जादू ही कर दिया था… 


“ उस लड़के का लंड देख ..मेरे लंड जैसा लग रहा है ना….” अब राज का दोसरा हाथ अपनी पॅंट मे खड़े हो चुके लंड को मसल रहा था. 


“सोच वो लड़का मैं हू और वो लड़की तेरी बहन …आह…देख कैसे चोद रहा हू मैं तेरी बहन को…तेरे सामने..” उसी के साथ राज ने मेरे अब तक खड़े हो चुके लंड को अपने मूठ मे भर कर दबाया और बोला.” बोल देखना चाहता है अपनी बहन को मुझसे चुदते हुए..आहह..बोल….बहन चोद…आहह” दोस्तो उस वक्त मे इतना एग्ज़ाइटेड हो चुका था के मेरे मूह से जोश मे निकल गया. “हा…हा..मैं दे..देखना चाहता हू..” मैं मस्ती मे बहकता हुआ बोला. 


“ देगा ना अपनी बेहन की कुँवारी चूत मुझे गुरु दक्षिणा मे..” 


“हा…दूँगा..आह…अहीश्ह…”मैने जैसे हे ऐसे बोला राज ने मेरे लंड को इतनी ज़ोर से दबाया के उसमे से पानी निकल गया ..जिस तारह से राज ने ये बाते बोली थी उस एक्सिटमेंट मे मैं साइबर केफे मे ही बैठे बैठे झाड़ गया था. 


करीब 5 मिनट तक मे पीछे दीवार से सर लगाए बैठा रहा और इस दोरान राज ने कुछ और क्लिप्स देखी और मुझे भी देखाई. 


“ तेरे घर पर कंप्यूटर है ना..” राज ख़तम हो चुकी क्लिप को बंद करता हुआ बोला. 


“हा है..पर उसमे नेट नही है” मेरी नज़र अब भी स्क्रीन पर आती नगी लड़कियो की पिक्स पर थी. 


“तो बता कहा चोदू उसे..एक काम कर क्या तू उसको हमारे दूसरे घर पर ला सकता है” 


“नही…नही…..मैं तुम्हे बता दूँगा बाद मे फोन कर के.” 


हमारी बाते चल ही रही थी कि साइबर केफे मे लाइट चली गयी और कंप्यूटर्स बंद हो गये . फिर हम दोनो वाहा से बाहर आ गये और ये तय हुआ कि मैं फोन कर के राज को बताउन्गा कि कब उसको घर आना है. फिर मैं अपने घर आ गया. 


उसी दिन रात के करीब 8 बज रहे थे.मैं और अंजली दीदी दोनो रूम मे थे ..मैं स्कूल का होमे वर्क कर रहा था और दीदी अपने कॉलेज के असाइनमेंट पर काम कर रही थी. वो ठीक मेरे सामने अपने बिस्तर पर बैठी थी. मैं चुपके चुपके उन्हे देख भी रहा था. मेरे मन मे कई ख्याल दौड़ रहे थे उस वक्त. मेरे दिल का सॉफ और पवित्र हिस्सा मुझे बता रहा था कि ..कितनी सुंदर है मेरी अंजली दीदी ..एक दम मासूम ..एक गुड़िया की तरह..कितना प्यार करती है वो मुझसे ..और वगेरह वगेरह..पर दूसरी तरफ मेरे दिल का काला हिस्सा मुझे दिखा रहा था कि…देख कितना हसीन बदन है तेरी बड़ी बेहन का…बिल्कुल भरा भरा बदन..चूचिया देख कैसी कसी और खड़ी हुई है…ये लंबे रेशमी बॉल कैसे सेक्सी लग रहे है..होंठ देख कैसे रस से भरे है…..और ये उभरे हुए चूतड़ तो मानो जान ले लें किसी भी मर्द की…बदन का कटाव देख…और भी ने जाने कितनी सेक्सी बाते बोल रहा था मेरे दिल का काला हिस्सा… 


मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी ना जाने कहाँ से एक कोक्करॉच आया और अंजली दीदी के बॅड पर चढ़ गया उसको देखते ही दीदी चिल्लाई और भाग कर मेरे बॅड पर आ गयी . 


“एयेए….अनुज….कोक्करॉच….” दीदी अपने बिष्तर पर चलते कॉकरोच की तरफ़ इशारा करते हुए बोली.दीदी का गोरा चेहरा डर से लाल हो गया था. मे फटाफट उठा कोक्करॉच को मारने के लिए तो वो उड़ कर दीदी की टी-शर्ट पर चिपक गया. बस फिर क्या था दीदी ज़ोर से चीखी और मुझसे आगे से लिपट गयी.


“आहह….आन..अनुज..मार इसे…है मा….ओकचझहह” 


दोस्तो मैं क्या बताऊ जब दीदी की तनी हुई चुचिया मेरे सीने पर लगी तो जो फिलिंग मुझे आई..उसको मैं बया नही कर सकता.. 


“आ….मम्मी…अनुज..वो मेरी टी-शर्ट मे घुस रहा है…” दीदी चिल्लाति हुई बोली. 


ऐसा मौका मुझे बार बार नही मिलने वाला था ..ना जाने क्यो ये सोच ते हुए मेने दीदी को कस्स कर अपने बदन से चिपका लिया . मेरा लंड दीदी के बदन की चुअन से तन चुका था और वो ठीक दीदी के पाजामे के अंदर से उनकी चूत पर लग रहा था..मे तो ये सब महसूस करने मे लगा था पर दीदी का पूरा ध्यान कॉकरोच पर ही केंद्रित था. इस लिपटा लिपटी मे कॉकरोच नीचे गिर कर भागने लगा पर ये बात सिर्फ़ मुझे पता थी अंजली दीदी को नही…. वो अब भी मुझसे लिपटी हुई थी और इसी हड़बड़ाहट का फयडा उठाते हुए मेने अचानक अपने एक हाथ को उईपर लाकर दीदी की एक चूची पर रख दिया..जब मेरा हाथ अंजलि दीदी की लेफ्ट चूची के उपर था तब मेरे हाथो की उंगलियो को ये पता चला कि दीदी ने अंदर ब्रा नही पहनी है.वाह..क्या गोलाई लिए हुई थी वो चूची .इतनी नर्म नर्म चीज़ पर हाथ रखते ही मुझसे कंट्रोल ना हुआ और मेने उनको कस कर दबा दिया.. 


“अहिस्स्स्शह..…..” दीदी के मूह से एक सीत्कार निकल गयी.. 


मैं डर गया कही दीदी को मेरी चालाकी का पता तो नही चल गया..पर दीदी अब भी मेरे बदन से उसी तरह चिपकी खड़ी थी…उन्होने शायद सोचा था कि कॉकरोच को भागाते हुए मेरा हाथ ग़लती से उनके उभारो पर लग गया होगा. तभी अचानक मुझे लगा कि कोई उपर रूम मे आ रहा है..मैं स्थिति की गंभीरता समझते हुए दीदी से बोला कि दीदी कॉकरोच भाग गया है. और फिर दीदी मुझसे अलॅग हुई . 


तकरीबन ½ घंटे बाद मे बाथरूम मे खड़ा था मेरा अंडरावर और पाजामा मेरे गुटनो मे था ..और मेरी आँखे बंद..मेरा हाथ तेज़ी से मेरे तने हुए लंड पर चल रहा था…और आज जो भी हुआ था वो सारी बाते मुझे याद आ रही थी…राज की वो दीदी के साथ सेक्स करने वाली बात…क्या वो सच बोल रहा था? क्या वो वाकई मेरी बड़ी बेहन के साथ सेक्स करना चाहता है ?..दीदी की चूचियो की नर्माहट मेने आज महसूस कर ली थी….तब कैसा लगेगा जब राज अपने कड़े हाथो से अंजली दीदी की इन नरम नरम और सुडोल चुचियो को कस कस कर दबाएगा..क्या अंजली दीदी उसका साथ देंगी ? इन्न सब सवालो ने मुझे इतना एक्सिट कर दिया था कि मेरे लंड से एक ज़ोर दार धार निकल सामने पड़े दीदी के सूट पर जा गिरी.. 


उस रात मैं इसी कसमा-कस मे था कि मुझे राज की बात माननी चाहिए या नही. पर जो भी हो एक बात तो पक्की थी कि जब जब भी मैं राज को दीदी के साथ सोचता था ना जाने क्यो मेरे अंडर एक अजीब तरह की तरंगे उमड़ने लग जाती थी और दिल मे एक कसक सी उठी थी कि क्या अंजली दीदी भी राज का साथ देंगी.? मुझे भगवान ना जाने क्यो दीदी को किसी और मर्द के साथ छुप छुप कर देखने मे एक अल्लग ही मज़ा आने लगा था…पता नही वो फीलिंग क्या थी पर जब भी ऐसा हुआ था उस वक्त पेदा हुई एक्सिटमेंट को मैं शब्दो मे बया नही कर सकता. मेने राज का लंड देखा था कितना बड़ा और सख़्त था वो ऐसा मोटा और मांसल लंड जब अंजली दीदी की गोरी और कुँवारी चूत का मांथान करेगा तो कैसा लगेगा.. इन सब बातो को सोचते सोचते ही मेरा लंड आधा खड़ा हो चला था और फिर मेने डिसाइड कर लिया कि मैं राज की बात मानूँगा. 


मैं अब बस मोके की तलाश मे था और मोका मुझे दो दिन के बाद मिल भी गया. हुआ ये था कि चाचा जी की तबेयात थोड़ी खराब हो गयी थी और उनको दोसरे शहर एक बड़े हॉस्पिटल मे अड्मिट करना पड़ गया था. दीदी और मेरी तो पढ़ाई चल रही थी सो चाचा जी के साथ चाची का हॉस्पिटल मे रहना तय हुआ. और इतेफ्फाक से उस्दिन सनडे था. मॉर्निंग मे ही चाची जी हॉस्पिटल की तरफ़ रवाना हो गयी. अब घर पर रह गये मे और अंजली दीदी. यही मोका है मेरे दिल ने मुझे कहा मैं फटाफट फोन के पास गया और राज का नंबर डायल करने ही वाला था कि तभी मेरे हाथ एक बार फिर रूके और मेने सोचा के क्या मैं सही कर रहा हू..पर अगले ही पाल मेरे अंदर छुपे शैतान ने मेरे दिमाग़ पर काबू कर लिया और मेने राज को फोन मिला दिया. दो बार बॅल बाजी और तभी दोसरे तरफ़ से राज के आवाज़ आई. 


“हेलो” 


“राज..मे..मे अनुज बोल रहा हू” मैं कपकपाति आवाज़ मे बोला मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था. 


मेरी आवाज़ सुनते ही राज खुश हो गया और सीधा बोला..” मैं 10 बजे तेरे घर आ रहा हू..” 


“नही 10 बजे तो ज़्यादा जल्दी हो जाएगा” मे बोला 


“अबे कोई जल्दी नही होगा....मैं अब रुक नही सकता…” 


वो शायद सब कुछ समझ चुका था.उसकी खुशी का तो ठिकाना ही नही था क्योकि उसके मन के मुराद पूरी होने जा रही थी.. 


मेने धड़कते दिल के साथ फोन नीचे रखा ही था कि तभी पीछे से आवाज़ आई.” किसको जल्दी हो जाएगी..अनुज तू कही जा रहा है क्या” दीदी रूम मे आते हुए बोली. 


अब मे उन्हे क्या बताता कि उनका प्यारा छोटा भाई उनका शरीर लुटवाने की तैयारी कर रहा है. 


“दीदी वो राज आने के लिए बोल रहा था..उसको आक्च्युयली मेद्स के कुछ नोट्स लेने है” मैं बात संभाल ता हुआ बोला. 


“अनुज मुझे वो लड़का कुछ सही नही लगता ..तूने उसे घर पर क्यो बुलाया..” दीदी बोली 


“नही नही दीदी ऐसी कुछ बात नही ..हा वो थोड़ा आवारा है पर दिल का बहोत अच्छा है.” मे बोला 


“चल कुछ भी हो उसको ज़ल्दी से चलता कर ना “ बोल कर दीदी नीचे किचन की तरफ़ चली गयी. 


दीदी को तो राज मे ज़रा भी इंटेरिस्ट नही है..तो बात आगे कैसे बढ़ेगी….ये सारी बाते मेरे दिमाग़ मे चल रही थी. कुछ देर मे दीदी और मेने नीचे डाइनिंग टेबल पर नाश्ता किया ..फिर दीदी टीवी देखने लगी और मे उपर रूम मे आ गया..मेने घड़ी पर नज़र डाली तो पाया कि 10 बजने मे 10 मिनिट्स बाकी थी..जैसे जैसे टाइम बीत रहा था वैसे वैसे ही मेरी नेरवीऔस नेस्स बढ़ती जा रही थी..तभी अचानक डोर बेल बजी ..मे फटा फॅट डोर खोलने के लिए रूम से बाहर आया ही था कि मेने देखा कि दीदी ने डोर खोल दिया है और जैसे मेने सोचा था सामने राज खड़ा था..दीदी अभी भी अपने नाइट ड्रेस याने लूज टी-शर्ट ओर पयज़ामे मे ही थी.रात को दीदी ब्रा नही पहनती थी सो उनके बूब्स टी-शर्ट के उपर से बेहद ही ज़्यादा सेक्सी लग रहे थे.. 


“ नमस्ते दीदी…” राज सीधा टी-शर्ट मे तनी खड़ी दीदी की चूचियो को देखता हुआ बोला. 


“नमस्ते…” दीदी ने भी राज को अपनी खड़ी चूचियो की तरफ़ ऐसे देखता हुआ पाकर थोड़ा सकपका सी गये थी..फिर वो जल्दी से बोली.” वो अनुज उप्पर रूम मे है”. 


“आप तो नाराज़ सी लग रही हो..शायद आपको मेरा यह आना अच्छा नही लगा..”राज दीदी के मासूम चेहरे की तरफ़ देखता हुआ बोला. 


“नही..नही..ऐसी कोई बात नही.” दीदी थोड़ा शरमाती हुई बोली. 


“ तो बताइए ना आप कैसी हो..” राज बोला 


“मे ठीक हू…अंदर आ जाओ”दीदी बोली. 


राज ने आते ही अपना काम शुरू कर दिया था. तभी दीदी की नज़र मुझ पर गयी..और वो बोली “ अनुज तुम्हारा दोस्त आ गया है” उनकी बॉडी लानुगएज से मुझे ऐसा लग रहा था कि मानो वो बोलना चाहती हो कि “ फटा फॅट इसको नोट्स देकेर चलता करो” 


कुछ मिनिट्स बाद राज और मे उपर रूम मे थे ..दीदी नीचे टीवी देख रही थी. 


“ राज कुछ ब्लू फिल्म्स की सीडी भी लाया था. वो सीडी कंप्यूटर मे लगाने लगा तो मैने उसको मना किया 


“ नही यार नीचे दीदी है..कही वो आ गयी तो मारे जाएँगे” मे बोला 


“अबे बेहन्चोद तू डरता बहोत है ..आज तो तुझको मैं लाइव ब्लू फिल्म दिखाउन्गा..” 


उसकी ये बात सुनकेर मेरे बदन मे करेंट दौड़ गया. 


हम कुछ 5 मिनट तक मूवी देखते रहे फिर राज बोला तू यही बैठ मेरा मन टीवी देखने का कर रहा है. मुझे उसकी बातो से पता चल रहा था कि उसका क्या मतलब है. 


“नही अभी नही यार..प्ल्स रुक तो सही” मे बोलता ही रह गया और राज नीचे चला गया . 


राज को नीचे गये हुए10 मिनट से ज़्यादा हो चुके थे मेरा ध्यान अब उस ब्लू फिल्म मे नही था जिसको मे देख रहा था. राज को ऐसे अंजली दीदी के साथ अकेला सोच सोच कर मेरे अंदर एक अज्जीब सी हालचाल मची हुई थी.. जब मुझसे सबर ना हुआ तो मे चुप चाप रूम से बाहर आया और नीचे जहा वो दोनो बैठे थे .छुप कर उधर देखने लगा .. राज सोफे पर बैठा था और दीदी उसके एक साइड मे रखे बड़े सोफे पर 


वो दीदी से कुछ बाते कर रहा था और दीदी कभी कभी उसके बातो पर हंस भी देती थी..दीदी की नज़र तो टीवी पर थी मगर राज रह रह कर दीदी के बदन को घूर रहा था और कयी कयी बार तो वो ओपन्ली अपने लंड को पॅंट के उप्पर से ही खुजा देता था…दीदी भी शायद उसकी इस हरकत से वाकिफ्फ थी उनकी भी नज़र कयी बार राज के पॅंट मे बने तंबू पर चली जाती थी..दीदी का जवान बदन भी शायद अब राज के लंबे लंड से निकलती गर्मी को महसूस करने लगा था…किसी ने सही कहा है मोटा और लंबा लंड हर औरत और लड़की को दीवाना बना देता है..अंजली दीदी को अपनी पॅंट मे बने तंबू की तरफ़ देखती हुई पाकर …राज का जोश भी बढ़ने लगा था..अब वो दीदी केतरफ़ देखता हुआ ओपन्ली अपने पॅंट मे बने उस उभरे हुए हिस्स्से को धीरे धीरे सहलाने लगा..और फिर उसने अंजली दीदी को कुछ बोला और उठ कर दीदी के पास उनके सोफे पर बैठ गया..दीदी का चेहरा शर्म से लाल होने लगा था और उनकी साँसे तेज़ी से चल रही थी जिसका बयान उनकी अब तक तन चुकी चुचिया टी-शर्ट्स के अंदर से ऊपर नीचे होकेर दे रही थी… 




दीदी तो टीवी स्क्रीन की तरफ़ देख रही थी और राज उनके चेहरे की तरफ़ पर


दोनो रुक रुक कर बाते ज़रूर कर रहे थे..पता नही क्या बाते थी..पर दीदी की


बॉडी लॅंग्वेज बता रही थी कि वो बाते ज़रा कुछ हट कर थी. अब तक तो राज की


चाल काम कर रही थी..मैं वाकई राज की दाद दूँगा कि उसको लड़कियो को पटाना


अच्छी से आता था…मेरी दीदी जो उसको बिल्कुल भी पसंद नही करती थी उनको 15


मिनिट्स मे ही उसने अपने जाल मे फ़सा लिया था.(लग भग). मुझे अब उन्दोनो


के बीच क्या बाते हो रही है उनको सुनने के तलब हुई तो मैं कोई दूसरी जगह


तलाश करने लगा . मैं धीरे से उत्तर कर दूसरे रूम मे चला गया वाहा से मैं


उनको देख तो नही पा रहा था पर आवाज़ सॉफ सुनाई दे रही थी.


.राज अंजलि दीदी से बोल रहा था " आपके बाल बहुत खूबसूरत है बिकुल आप की तरह "


दीदी मुस्कुराते हुए " अच्छा जी..लगता है तुम्हे मेरे बाल बहुत पसंद है"


राज " अरे मेरी पसंद ना पूछो मुझे तो और भी बहुत कुछ पसंद है ….."


दीदी: " अच्छा तो बताओ क्या क्या पसंद है"


राज: " आपके बाल..आपकी आँखे…आपके सेक्सी होठ….."


राज की आवाज़ से लग रहा था कि मानो उस पर नशा हो गया है. दोनो की आवाजो


का अगर अप कंपेरिषन करो तो सॉफ साफ पता चल रहा था कि राज की आवाज़


बिल्कुल आवारो जैसे और दीदी की एक पढ़ी लिखी लड़की जैसी .


तभी दीदी की धीरे से एक आवाज़ आई " ..आ..इषस्स्सस्स…इस्शह..आअह..राज मेरे


बालो को क्यो खोल रहे हो…"


"क्यू मेरे हाथो मे आकर क्या इनकी खोबसूरती कम हो गाएगी " तभी राजकी साँस


खिचने की आवाज़ आई शायद वो अंजलि के बालो से आती खुशुबू को सूंघ रहा था"


वाह क्या खुश्बू है"


मैं ये जान कर और ज़्यादा बेचैन हो गया कि वू दीदी के रेस्मी बालो को


ओपन्ली सूंघ रहा है. जबकि मैने इतने दिनो मे एक दो बार ही दीदी के रेशमी


बालो को छुआ था और वो सिर्फ़ 15 मिनट मे ही यहा तक पहोच गया.


" अच्छा एक बात पूछूँ अगर तुम बुरा ना मानो तो" राज की आवाज़ मेरे कानो मे आई.


"ऐसा क्या पून्छोगे ..प्ल्स आहह..तुम मेरे बालो को इतना मत खिचो


दर्द..होता है..आह...."दीदी बोली


"साइज़ क्या है तेरे कबूतरो का" राज बोला


"क्या…कबूतर क्या" दीदी परेशान होते हुए बोली


यहा पर मैने ये गोर किया कि वो अब दीदी को " तू " ओर " तेरे " कह कर बुला


रहा था…कहा पहले वो आप आप कर कर बात कर रहा था और कहाँ अब "तू " …या तो


दीदी ने राज की इस बात पर ध्यान नही दिया..या फिर……


" तेरी चुचियो का साइज़ " राज बोला


"पागल हो गये हो क्या..मैं तुम्हारी बड़ी बहन की तारह हू..प्लीज़ बी इन


लिमिट..तुमने फ्रेंडशिप करने के लिए बोला है तो सिर्फ़ फ्रेंड ही बनो…. "


दीदी थोड़ा गुस्से से बोली.


"अरे ज़्यादा नाटक मट कर …मुझे पता है तेरा बदन चुदाई माँग रहा है" राज


भी थोड़ा कड़क होता हुआ बोला.


तभी कुछ कुछ गुथा गुथि सी हुई और दीदी की हल्की सिसकारी मेरे कानो मे


पड़ी. " आहह..इशह…छोड़ो मुझे"


मैं ये देखने के लिए पागल सा हो गया कि आख़िर हो क्या रहा है सो मैं वापस


पहले वाली जगह पर आ गया.


मैने देखा कि अंजलि दीदी सोफे की साइड मे खड़ी है और राज के हाथ से अपनी


टी-शर्ट का एक कोना छुड़ाने की कोशिस कर रही है . उनके लंबे बाल प्युरे


तारह से खुले हुए है..राज थोड़ा गुस्से मे लग रहा था और दीदी के चेहरे पर


डर साफ झलक रहा था.


तभी राज उठा और उसने दीदी को अपनी बाँहो मे भर लिया और ज़ोर से उनके होटो


को चूसने लगा..दीदी अपने आप को छुड़ाने की पूरी कोशिस कर रही थी..राज तो


अंजलि दीदी के होटो को ऐसे चूस रहा था कि मानो उनको खा ही जाएगा..रह रह


कर वो दीदी की चूचियो को भी कस्स कस्स कर दबा रहा था…दीदी के मूह से आती


दर्द भरी आवाज़ ये बता रही थी कि राजके सख़्त पत्थर जैसे हाथ दीदी की तनी


हुई मुलायम चूचियो का बुरा हाल कर रहे है..तभी दीदी ने राज को एक तरफ़


धक्का दिया और वो भाग कर किचिन मे चली गयी पर राज कोई कच्चा खिलाड़ी तो


नही था वो लपक कर किचिन मे जा घुसा..एक्षसितेंन्ट तो मुझे भी बहुत हो गयी


थी ..पर राज का ये रवैया देख मुझे डर भिलगने लगा था. अंदर किचिन से


बर्तनो के गिरने की आवाजो के साथ साथ दीदी की सिसकारिया भी आ रही


थी.."आहह…राज….प्ल्स छोड़ो मुझे..आहही…इश्ह्ह…मा…इतनी ज़ोर से मत


दबाओ…..प्लस्सस्स्मुझे…इस्शह…आ.


ममीईई….."दीदी के रोने की आवाज़े मुझे


परेशान कर रही थी..आख़िर वो मेरी बड़ी बेहन ही तो थी कोई अजानी नही और आज


राजमेरे होते हुए भी उनका बलात्कार करने की कोशिस कर रहा था..अब मेरा मन


मुझे धिक्कार रहा था…मन से सिर्फ़ ये ही आवाज़ आ रही थी कि अपनी बड़ी


बेहन को बचा उस दरिंदे से ..अनुज …कही ऐसा ना हो की तू अपनी नज़रो मे ही


गिर जाय " ये आवाज़े मेरे दिल के अंदर से आ रही थी..समय बीतता जा रहा था


.फिर वो वक्त आया जब मैं सीधा भागता हुआ नीचे किचिन की तरफ़ गया ..अंदर


जाते ही मैने देखा कि राज ने दीदी को पीछे से पकड़ा हुआ है और दीदी का


पाजामा और उनकी पॅंटी उनके पेरो मे फसी है और दीदी की टी-शर्ट दूर किचिन


के फर्श पर फटी हुई पड़ी है..दीदी का रो रो कर बुरा हाल था और राज अपना


लंड पीछे से दीदी की छूट पर लगा रहा था.तभी उन्दोनो की नज़र किचिन के गेट


पर खड़े मुझ पर पड़ी . मुझे देखते ही राज ज़ोर से बोला


" देख आज अपनी जवान बहन का बलात्कार ..आज इसको मैं अपनी रंडी बना कर रहूँगा…."


दीदी लाचार नज़रो से मुझे देख रही थी. और उनकी खोबसुर्रत आँखो से निकलते


आँसू मानो मुझे बोल रहे हो कि अनुज अब क्या सोच रहा है..बचा अपने बड़ी


बहन को ..मार डाल इस हरामी को.


"राज …छोड़ मेरी दीदी को.." मैं ज़ोर से गरजा ना जाने मुझ मे इतनी जान


कहा से आ गयी थी.



एक बार तो राज भी डर गया था.पर अंजलि दीदी जैसी जवान खूबसूरत लड़की को वो


इतना करीब लाकर कैसे छोड़ सकता था.


"तू चुप चाप जा कर उप्पर बैठा जा..नही तो तेरी गंद भी मार लूँगा आज


मैं…"राज दीदी की चूत पर लंड लगाता हुआ बोला. अपनी चूत पर लंड को महसूस


करते ही दीदी की आँखे डर से फैल गयी और रोते हुए मेरी तरफ़ देख कर


बोली.." अनुज मुझे बचा ले .इस दरिंदे से….." मेरे लिए इतना काफ़ी था और


पास एक लोहे की रोड को मैने अपने हाथ मे लिया और…


"आआआहह……………"


एक आवाज़ हमारे घर मे गूँज गयी ये आवाज़ राज की थी उसके सर से खून निकलने


लगा था..क्योंकि मैने वो रोड उसके सर पर मार दी थी. मेरा ये रूप देख राज


के तो तोते ही उड़ गये वो अपने सर को पकड़ हमारे घर से भाग गया..और दीदी


रोते हुए मेरे गले लग गयी मुझे भी रोना आ गया मुझे अपने ग़लती का अब


आहसास हो गया था..


दोस्तो उस रात मैने दीदी को अब तक जो भी हुआ था वो सारी बाते बता दी. मैं


दीदी के पास बैठा ये सब बता रहा था और रो रहा था .दीदी ने मुझे प्यारसे


अपने सीने से लगा लिया. और बोली ." कोई बात नही अनुज ..मुझे खुशी है तूने


मुझे वो सारी बाते बताई…और आज जो तूने मेरे लिए किया उससे पता चलता है कि


तू मुझे कितना प्यार करता है…." अंजलि दीदी की आँखो से भी आसू टपक रहे


थे. फिर दीदी ने मेरा सर अपने सीने से उतर कर अपने हाथो मे लिया .दीदी के


मुलायम हाथो की नर्माहट मुझे बहुत सकून दे रही थी..हम दोनो अब एक दूसरे


की आँखो मे देख रही थी..


" पगले अगर तू मुझे इतना प्यार करता था तो तूने मुझे ये सब पहले क्यो नही


कहा…हम दोनो लगतार एक दूसरे के आखो मे देख रहे थे दोनो की आँखो आँसू से


नम थी..


" तुझको मे एक बात कहू" दीदी बोली


"जी..बोलो" मैं दीदी की खूबसुर्रत आँखो को गौर से देखता हुआ बोला


"आइ लव यू….." ये कहते हुए अंजलि दीदी थोड़ा आगे की तरफ़ झुकी और उन्होने


अपने काँपते हुए होठ मेरे होंठ पर रख दिए.


"आइ लव यू टू….." इसी के साथ मेरे होठ खुले और दीदी की गर्म गर्म जीभ


मेरे मूह को शुक्रिया बोलने के लिए मेरे मूह के अंदर आ गयी. मैने उनकी


जीब को चूसना शुरू कर दिया हम दोनो पर सेक्स का नशा चढ़ चुका था हमारी


साँसे एक दूसरे से टकरा रही थी अंजलि दीदी के कबूतर भी अपने पंख


फड़फड़ाने लगे कबूतरो की फड़फड़ाहट देख कर मेरे हाथ भी उनको पकड़ने के


लिए मचलने लगे मैने अंजली दीदी के कबूतरो को बड़े प्यार से सहलाना शुरू


कर दिया


दीदी ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और अपनी छाती से लगाती हुई बोली


"हाय रे मेरा सोना….मेरे प्यारे भाई…. तुझे दीदी सबसे अच्छी लगती


है….तुझे मेरी चुत चाहिए….मिलेगी मेरे प्यारे भाई मिलेगी….मेरे राजा….आज


रात भर अपने हलब्बी लण्ड से अपनी दीदी की बूर का बाजा बजाना……अपने भैया


राजा का लण्ड अपनी चुत में लेकर मैं सोऊगीं……हाय राजा…॥अपने मुसल से अपनी


दीदी की ओखली को रात भर खूब कूटना…..अब मैं तुझे तरसने नहीं दूंगी….तुझे


कही बाहर जाने की जरुरत नहीं है…..चल आ जा…..आज की रात तुझे जन्नत की सैर


करा दू….." फिर दीदी ने मुझे धकेल कर निचे लिटा दिया और मेरे ऊपर चढ़ कर


मेरे होंठो को चूसती हुई अपनी गठीली चुचियों को मेरी छाती पर रगड़ते हुए


मेरे बालों में अपना हाथ फेरते हुए चूमने लगी. मैं भी दीदी के होंठो को


अपने मुंह में भरने का प्रयास करते हुए अपनी जीभ को उनके मुंह में घुसा


कर घुमा रहा था. मेरा लण्ड दीदी की दोनों जांघो के बीच में फस कर उसकी


चुत के साथ रगड़ खा रहा था. दीदी भी अपना गांड नाचते हुए मेरे लण्ड पर


अपनी चुत को रगड़ रही थी और कभी मेरे होंठो को चूम रही थी कभी मेरे गालो


को काट रही थी. कुछ देर तक ऐसे ही करने के बाद मेरे होंठो को छोर का उठ


कर मेरी कमर पर बैठ गई. और फिर आगे की ओर सरकते हुए मेरी छाती पर आकर


अपनी गांड को हवा में उठा लिया और अपनी हलके झांटो वाली गुलाबी खुश्बुदार


चुत को मेरे होंठो से सटाती हुई बोली "जरा चाट के गीला कर… बड़ा तगड़ा लण्ड


है तेरा…सुखा लुंगी तो…..साली फट जायेगी मेरी तो….." एक बार मुझे दीदी की


चुत का स्वाद मिल चूका था, इसके बाद मैं कभी भी उनकी गुदाज कचौरी जैसी


चुत को चाटने से इंकार नहीं कर सकता था, मेरे लिए तो दीदी की बूर रस का


खजाना थी. तुंरत अपने जीभ को निकल दोनों चुत्तरो पर हाथ जमा कर लप लप


करता हुआ चुत चाटने लगा. इस अवस्था में दीदी को चुत्तरों को मसलने का भी


मौका मिल रहा था और मैं दोनों हाथो की मुठ्ठी में चुत्तर के मांस को


पकड़ते हुए मसल रहा था और चुत की लकीर में जीभ चलाते हुए अपनी थूक से बूर


के छेद को गीला कर रहा था. वैसे दीदी की बूर भी ढेर सारा रस छोड़ रही थी.


जीभ डालते ही इस बात का अंदाज हो गया की पूरी चुत पसीज रही है, इसलिए


दीदी की ये बात की वो चटवा का गीला करवा रही थी हजम तो नहीं हुई, मगर


मेरा क्या बिगर रहा था मुझे तो जितनी बार कहती उतनी बार चाट देता. कुछ ही


देर दीदी की चुत और उसकी झांटे भी मेरी थूक से गीली हो गई.दीदी दुबारा


से गरम भी हो गई और पीछे खिसकते हुए वो एक बार फिर से मेरी कमर पर आ कर


बैठ गई और अपने हाथ से मेरे तनतनाये हुए लण्ड को अपनी मुठ्ठी में कस


हिलाते हुए अपने चुत्तरों को हवा में उठा लिया और लण्ड को चुत के होंठो


से सटा कर सुपाड़े को रगड़ने लगी. सुपाड़े को चुत के फांको पर रगड़ते चुत के


रिसते पानी से लण्ड की मुंडी को गीला कर रगड़ती रही. मैं बेताबी से दम


साधे इस बात का इन्तेज़ार कर रहा था की कब दीदी अपनी चुत में मेरा लौड़ा


लेती है. मैं निचे से धीरे-धीरे गांड उछाल रहा था और कोशिश कर रहा था की


मेरा सुपाड़ा उनके बूर में घुस जाये. मुझे गांड उछालते देख दीदी मेरे लण्ड


के ऊपर मेरे पेट पर बैठ गई और चुत की पूरी लम्बाई को लौड़े की औकात पर


चलाते हुए रगड़ने लगी तो मैं सिस्याते हुए बोला "दीदी प्लीज़….ओह….सीईई अब


नहीं रहा जा रहा है….जल्दी से अन्दर कर दो ना…..उफ्फ्फ्फ्फ्फ……ओह


दीदी….बहुत अच्छा लग रहा है….और तुम्हारी चु…चु….चु….चुत मेरे लण्ड पर


बहुत गर्म लग रही है….ओह दीदी…जल्दी करो ना….क्या तुम्हारा मन नहीं कर


रहा है….." अपनी गांड नचाते हुए लण्ड पर चुत रगड़ते हुए दीदी बोली


"हाय…भाई जब इतना इन्तेजार किया है तो थोड़ा और इन्तेजार कर लो….देखते


रहो….मैं कैसे करती हूँ….मैं कैसे तुम्हे जन्नत की सैर कराती हूँ….मजा


नहीं आये तो अपना लौड़ा मेरी गांड में घुसेड़ देना…..….अभी देखो मैं


तुम्हारा लण्ड कैसे अपनी बूर में लेती हूँ…..लण्ड सारा पानी अपनी चुत से


पी लुंगी…घबराओ मत….. अपनी दीदी पर भरोसा रखो….ये तुम्हारी पहली चुदाई


है….इसलिए मैं खुद से चढ़ कर करवा रही हूँ….ताकि तुम्हे सिखने का मौका


मिल जाये….देखो…मैं अभी लेती हूँ……" फिर अपनी गांड को लण्ड की लम्बाई के


बराबर ऊपर उठा कर एक हाथ से लण्ड पकड़ सुपाड़े को बूर की दोनों फांको के


बीच लगा दुसरे हाथ से अपनी चुत के एक फांक को पकड़ कर फैला कर लण्ड के


सुपाड़े को उसके बीच फिट कर ऊपर से निचे की तरफ कमर का जोर लगाया. चुत और


लण्ड दोनों गीले थे. मेरे लण्ड का सुपाड़ा वो पहले ही चुत के पानी से गीला


कर चुकी थी इसलिए सट से मेरा पहाड़ी आलू जैसा लाल सुपाड़ा अन्दर दाखिल हुआ.


तो उसकी चमरी उलट गई. मैं आह करके सिस्याया तो दीदी बोली "बस हो गया


भाई…हो गया….एक तो तेरा लण्ड इंतना मोटा है…..मेरी चुत एक दम टाइट


है….घुसाने में….ये ले बस दो तीन और….उईईईइ माँ…..सीईईईई….बहनचोद


का….इतना मोटा…..हाय…य य य…..उफ्फ्फ्फ्फ़…." करते हुए गप गप दो तीन धक्का


अपनी गांड उचकाते चुत्तर उछालते हुए लगा दिए. पहले धक्के में केवल सुपाड़ा


अन्दर गया था दुसरे में मेरा आधा लण्ड दीदी की चुत में घुस गया था, जिसके


कारण वो उईईई माँ करके चिल्लाई थी मगर जब उन्होंने तीसरा धक्का मारा था


तो सच में उनकी गांड भी फट गई होगी ऐसा मेरा सोचना है. क्योंकि उनकी चुत


एकदम टाइट मेरे लण्ड के चारो तरफ कस गई थी और खुद मुझे थोड़ा दर्द हो रहा


था और लग रहा जैसे लण्ड को किसी गरम भट्टी में घुसा दिया हो. मगर दीदी


अपने होंठो को अपने दांतों तले दबाये हुए कच-कच कर गांड तक जोर लगाते हुए


धक्का मारती जा रही थी. तीन चार और धक्के मार कर उन्होंने मेरा पूरा नौ


इंच का लण्ड अपनी चुत के अन्दर धांस लिया और मेरे छाती के दोनों तरफ हाथ


रख कर धक्का लगाती हुई चिल्लाई "उफ्फ्फ्फ्फ़….….कैसा मुस्टंडा लौड़ा पाल


रखा है….ईई….हाय….गांड फट गई मेरी तो…..हाय पहले जानती की….ऐसा बूर फारु


लण्ड है तो….सीईईईइ…..भाई आज तुने….अपनी दीदी की फार दी….ओह सीईईई….लण्ड


है की लोहे का राँड….उईईइ माँ…..गई मेरी चुत आज के बाद….साला किसी के काम


की नहीं रहेगी….है….हाय बहुत दिन संभाल के रखा था….फट गई….रे मेरी तो हाय


मरी…." इस तरह से बोलते हुए वो ऊपर से धक्का भी मारती जा रही थी और मेरा


लण्ड अपनी चुत में लेती भी जा रही थी. तभी अपने होंठो को मेरे होंठो पर


रखती हुई जोर जोर से चूमती हुई बोली "हाय….….आराम से निचे लेट कर बूर का


मजा ले रहा है….भोसड़ी….के….मेरी चुत में गरम लोहे का राँड घुसा कर गांड


उचका रहा है….उफ्फ्फ्फ्फ्फ…भाई अपनी दीदी कुछ आराम दो….हाय मेरी दोनों


लटकती हुई चूचियां तुम्हे नहीं दिख रही है क्या…उफ्फ्फ्फ्फ़…उनको अपने


हाथो से दबाते हुए मसलो और….मुंह में ले कर चूसो भाई….इस तरह से मेरी चुत


पसीजने लगेगी और उसमे और ज्यादा रस बनेगा…फिर तुम्हारा लौड़ा आसानी से


अन्दर बाहर होगा….हाय रा ऐसा करो मेरे राजा….तभी तो दीदी को मजा आएगा


और….वो तुम्हे जन्नत की सैर कराएगी….सीईई…" दीदी के ऐसा बोलने पर मैंने


दोनों हाथो से दीदी की दोनों लटकती हुई चुचियों को अपनी मुठ्ठी में कैद


करने की कोशिश करते हुए दबाने लगा और अपने गर्दन को थोड़ा निचे की तरफ


झुकाते हुए एक चूची को मुंह में भरने की कोशिश की. हो तो नहीं पाया मगर


फिर भी निप्पल मुंह में आ गया उसी को दांत से पकड़ कर खींचते हुए चूसने


लगा. दीदी अपनी गांड अब नहीं चला रही थी वो पूरा लण्ड घुसा कर वैसे ही


मेरे ऊपर लेटी हुई अपनी चूची दबवा और निप्पल चुसवा रही थी. उनके माथे पर


पसीने की बुँदे छलछला आई थी. मैंने चूची का निप्पल को दीदी के चेहरे को


अपने दोनों हाथो से पकड़ कर उनका माथा चूमने लगा और जीभ निकल का उनके माथे


के पसीने को चाटते हुए उनकी आँखों को चुमते हुए नाक पर जीभ फिरते हुए


चाटा दीदी अपनी गांड अब नहीं चला रही थी वो पूरा लण्ड घुसा कर वैसे ही


मेरे ऊपर लेटी हुई अपनी चूची दबवा और निप्पल चुसवा रही थी. उनके माथे पर


पसीने की बुँदे छलछला आई थी. मैंने चूची का निप्पल को दीदी के चेहरे को


अपने दोनों हाथो से पकड़ कर उनका माथा चूमने लगा और जीभ निकल का उनके माथे


के पसीने को चाटते हुए उनकी आँखों को चुमते हुए नाक और उसके निचे होंठो


के ऊपर जो पसीने की छोटी छोटी बुँदे जमा हो गई थी उसके नमकीन पानी को पर


जीभ फिराते हुए चाटा और फिर होंठो को अपने होंठो से दबोच कर चूसने लगा.


दीदी भी इस काम में मेरा पूरा सहयोग कर रही थी और अपने जीभ को मेरे मुंह


में पेल कर घुमा रही थी. कुछ देर में मुझे लगा की मेरे लण्ड पर दीदी की


चुत का कसाव थोड़ा ढीला पर गया है. लगा जैसे एक बार फिर से दीदी की चुत से


पानी रिसने लगा है. दीदी भी अपनी गांड उचकाने लगी थी और चुत्तर उछालने


लगी थी. ये इस बात का सिग्नल था का दीदी की चुत में अब मेरा लण्ड एडजस्ट


कर चूका है. धीरे-धीरे उनके कमर हिलाने की गति में तेजी आने लगी. थप-थप


आवाज़ करते हुए उनकी जान्घे मेरी जांघो से टकराने लगी और मेरा लण्ड सटासट


अन्दर बाहर होने लगा. मुझे लग रहा था जैसे चुत दीवारें मेरे लण्ड को जकड़े


हुए मेरे लण्ड की चमरी को सुपाड़े से पूरा निचे उतार कर रागड़ती हुई अपने


अन्दर ले रही है. मेरा लण्ड शायद उनकी चुत की अंतिम छोर तक पहुच जाता था.


दीदी पूरा लण्ड सुपाड़े तक बाहर खींच कर निकाल लेती फिर अन्दर ले लेती थी.


दीदी की चुत वाकई में बहुत टाइट लग रही थी. मुझे अनुभव तो नहीं था मगर


फिर भी गजब का आनंद आ रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे किसी बोत्तल में मेरा


लौड़ा एक कॉर्क के जैसे फंसा हुआ अन्दर बाहर हो रहा है. दीदी को अब बहुत


ज्यादा अच्छा लग रहा था ये बात उनके मुंह से फूटने वाली सिस्कारियां बता


रही थी. वो सीसियते हुए बोल रही थी "आआआ…….सीईईईइ…..भाई बहुत अच्छा लौड़ा


है तेरा…..हाय एक दम टाइट जा रहा है…….सीईईइ हाय मेरी….चुत…..ओह


हो….ऊउउऊ….बहुत अच्छा से जा रहा है…हाय….गरम लोहे के रोड जैसा


है….हाय….कितना तगड़ा लौड़ा है….. हाय मेरे प्यारे…तुमको मजा आ रहा


है….हाय अपनी दीदी की टाइट चुत को चोदने में…हाय भाई बता ना….कैसा लग रहा


है मेरे राजा….क्या तुम्हे अपनी दीदी की बूर की फांको के बीच लौड़ा दाल कर


चोदने में मजा आ रहा है…..हाय मेरे चोदु….अपनी बहन को चोदने में कैसा लग


रहा है….बता ना….अपनी बहन को….साले मजा आ रहा…सीईईई….ऊऊऊऊ…." दीदी गांड


को हवा में लहराते हुए जोर जोर से मेरे लण्ड पर पटक रही थी. दीदी की चुत


में ज्यादा से ज्यादा लौड़ा अन्दर डालने के इरादे से मैं भी निचे से गांड


उचका-उचका कर धक्का मार रहा था. कच कच बूर में लण्ड पलते हुए मैं भी


सिसयाते हुए बोला "ओह सीईईइ….दीदी….आज तक तरसता….ओह बहुत मजा…..ओह


आई……ईईईइ….मजा आ रहा है दीदी….उफ्फ्फ्फ्फ़…बहुत गरम है आपकी चुत….ओह बहुत


कसी हुई….है…बाप रे….मेरे लण्ड को छिल….देगी आपकी चुत….उफ्फ्फ्फ्फ़….एक


दम गद्देदार है…." चुत है दीदी आपकी…हाय टाइट है….हाय दीदी आपकी चुत में


मेरा पूरा लण्ड जा रहा है….सीईईइ…..मैंने कभी सोचा नहीं था की मैं आपकी


चुत में अपना लौड़ा पेल पाउँगा….हाय….. उफ्फ्फ्फ्फ़… कितनी गरम है….. मेरी


सुन्दर…प्यारी दीदी….ओह बहुत मजा आ रहा है….ओह आप….ऐसे ही चोदती


रहो…ओह….सीईईई….हाय सच मुझे आपने जन्नत दिखा दिया….सीईईई… चोद दो अपने


भाई को…." मैं सिसिया रहा था और दीदी ऊपर से लगातार धक्के पर धक्का लगाए


जा रही थी. अब चुत से फच फच की आवाज़ भी आने लगी थी और मेरा लण्ड सटा-सट


बूर के अन्दर जा रहा था. पुरे सुपाड़े तक बाहर निकल कर फिर अन्दर घुस जा


रहा था. मैंने गर्दन उठा कर देखा की चुत के पानी में मेरा चमकता हुआ लौड़ा


लप से बाहर निकलता और बूर के दीवारों को कुचलता हुआ अन्दर घुस जाता. दीदी


की गांड हवा लहराती हुई थिरक रही थी और वो अब अपनी चुत्तरों को नचाती हुई


निचे की तरफ लाती थी और लण्ड पर जोर से पटक देती थी फिर पेट अन्दर खींच


कर चुत को कसती हुई लण्ड के सुपाड़े तक बाहर निकाल कर फिर से गांड नचाती


निचे की तरफ धक्का लगाती थी. बीच बीच में मेरे होंठो और गालो को चूमती और


गालो को दांत से काट लेती थी. मैं भी दीदी के दोनों चुत्तरों को दोनों


हाथ की हथेली से मसलते हुए चुदाई का मजा लूट रहा था. दीदी गांड नचाती


धक्का मारती बोली " ….मजा आ रहा है….हाय….बोल ना….दीदी को चोदने में


कैसा लग रहा है भाई….हाय बहनचोद….बहुत मजा दे रहा है तेरा लौड़ा…..मेरी


चुत में एकदम टाइट जा रहा है….सीईईइ….माधरचोद….इतनी दूर तक आज तक…..मेरी


चुत में लौड़ा नहीं गया….हाय…खूब मजा दे रहा है…. बड़ा बूर फारु लौड़ा है


रे…तेरा….हाय मेरे राजा….तू भी निचे से गांड उछाल ना….हाय….अपनी दीदी की


मदद कर….सीईईईइ…..मेरे सैयां…..जोर लगा के धक्का मार…हाय बहनचोद….चोद दे


अपनी दीदी को….चोद दे….साले…चोद, चोद….के मेरी चुत से पसीना निकाल


दे…भोसड़ीवाले…. ओह आई……ईईईइ…" दीदी एकदम पसीने से लथपथ हो रही थी और


धक्का मारे जा रही थी. लौड़ा गचा-गच उसकी चुत के अन्दर बाहर हो रहा था और


अनाप शनाप बकते हुए दाँत पिसते हुए पूरा गांड तक का जोर लगा कर धक्का


लगाये जा रही थी. कमरे में फच-फच…गच-गच…थप-थप की आवाज़ गूँज रही थी. दीदी


के पसीने की मादक गंध का अहसास भी मुझे हो रहा था. तभी हांफते हुए दीदी


मेरे बदन पर पसर गई. "हाय…थका दिया तुने तो…..मेरी तो एक बार निकल भी गई…


रात का 1 बजा था बाहर जोरो से बारिश हो रही थी ..ज़ोर दार बिजलियाँ कड़क


रही थी..और अंदर रूम मे दो जिस्म एक जान हो रहे थे. मेरे और दीदी के


कपड़े नीचे फर्श पर पड़े थे..और मेरा नंगा बदन अंजलि दीदी के नंगे बदन के


उप्पर लिपटा हुआ आगे पीछे हो रहा था. हम दोनो एक दूसरे के अंदर मानो समा


जाना चाह रहे थे. और तभी


'आअहीश्ह……….ससीहह……"


ये आवाज़ हम दोनो के मूह से एक साथ निकली जिसका मतलब था कि मैने अंजलि


दीदी को लड़की से औरत और खुद को लड़के से मर्द बना दिया था. दीदी को इस


बात का सकून था कि उनकी वर्जिनिटी मैने ली और मुझे इस बात का कि मेरी


वर्जिनिटी दुनिया की सबसे खोबसूरत लड़की यानी मेरी अंजलि ने ली.


दोस्तो अब जब भी ये सारी बाते मेरे जेहन मे आती है तो मुझे लगता है कि ये


जिंदगी वाकई मे एक अंजान रास्ता ही तो है. दोस्तो आपको ये कहानी कैसी लगी


ज़रूर बताना दोस्तो फिर मिलेंगे एक और नई कहानी के साथ तब तक के लिए विदा





THE END 






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