जंगल में लाश Chapters 3
__“अरे-अरे, यह क्या कर रहे हो भई। अपने साथ मुझे भी फँसवाओगे क्या? अगर दीवार टूट गयी तो...” फ़रीदी ने उसकी तरफ़ झुकते हुए कहा।
डॉक्टर सतीश ने झुंझलाहट में उसके मुँह पर थूक दिया।
“यह तरीक़ा ठीक है।” फ़रीदी ने रूमाल से अपना मुँह साफ़ करते हुए कहा।
___“ख़ुदा के लिए मेरा पीछा छोड़ दो।” सतीश ने तंग आ कर कहा।
“लेकिन ख़ुदा ही का हुक्म है कि मैं तुम्हारा पीछा न छोडूं।" ___
“ओ यू ब्रूट!” डॉक्टर सतीश इस बुरी तरह चीख़ा कि उसकी आवाज़ भरी गयी और वह बेतहाशा हँसने लगा।
फ़रीदी ने भी क़हक़हा लगाया।
“खूब दिल खोल कर हँस लो, लेकिन इतना याद रखो कि मैं तुम्हें ज़िन्दा न छोडूंगा।” सतीश ने गुस्से से हाँफते हुए कहा।
“क्या करूँ डॉक्टर, जब से उस बोतल वाली गैस का असर दिमाग़ पर हुआ है, कभी-कभी बेवजह भी हँसी आने लगती है।” फ़रीदी ने संजीदगी से कहा।
डॉक्टर सतीश का मुँह फिर उतर गया। वह फ़रीदी को गौर से देख रहा था।
"डॉक्टर, सचमुच बताना वह किसका एक्सपेरिमेंट है। तुमसे तो उसकी उम्मीद नहीं...तुम ठहरे घामड़ आदमी।"
___ “तुम मुझे क्या समझे हो?” डॉक्टर सतीश सँभल कर बोला, “तुम न जाने क्या बक रहे हो। कैसी गैस, कैसा एक्सपेरिमेंट... घामड़ तुम ख़ुद होगे।"
“खैर, यह तो तुम्हारा दिल ही जानता होगा कि मैं कितना घामड़ हूँ।"
डॉक्टर सतीश ख़ामोश हो गया। इतनी देर तक चीखते रहने से वह निढाल-सा हो गया था। एक हारे हुए नाउम्मीद जुआरी की तरह उसने हाथ-पैर डाल दिये।
___ फ़रीदी अब भी उसे छेड़ रहा था, लेकिन वह बिलकुल ख़ामोश था। न जाने वह क्या सोच रहा था। फ़रीदी ने घड़ी देखी। गाड़ी पन्द्रह मिनट के बाद कानपुर पहुँचने वाली थी।
तीसरा शिकार
दूसरे दिन फ़रीदी कानपुर से लौट आया। उसके साथ डॉक्टर सतीश भी था जिसकी निगरानी के लिए कानपुर के दो कॉन्स्टेबल साथ आये थे। हमीद, फ़रीदी को लेने के लिए स्टेशन आया था। वह डॉक्टर सतीश को इस हाल में देख कर हैरान था।
“ये हज़रत कहाँ ?” उसने फ़रीदी से कहा। “मैं यहाँ परेशान हो रहा था कि आख़िर ये कहाँ लापता हो गये।"
___“भई, मैं ऐसे दोस्तों को अपने साथ ही रखता हूँ।” फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा।
डॉक्टर सतीश उसे क़हर-भरी नज़रों से घूरने लगा।
वे लोग स्टेशन से निकल कर बाहर आये। हमीद, फ़रीदी की कार ले कर आया था। फ़रीदी ने डॉक्टर सतीश से कार में बैठने के लिए कहा, लेकिन वह खड़ा रहा। फिर नौबत यहाँ तक पहुँची कि कॉन्स्टेबलों ने उसे ज़बर्दस्ती कार में बिठाना चाहा। तभी एक फ़ायर हुआ और डॉक्टर सतीश चीख़ कर ज़मीन पर गिर पड़ा। गोली सिर की हड्डियाँ तोड़ती हुई माथे से निकल गयी थी। फ़रीदी और हमीद उस तरफ़ झपटे जिधर से फ़ायर हुआ था। लोग इधर-उधर भागने लगे। देखते-ही-देखते ऐसी भगदड़ मची मानो बमबारी होने वाली हो। फ़रीदी बुरी तरह झल्लाया हुआ था।
“बिलकुल बेकार है, हमीद...इन कमबख़्तों की बदहवासी की वजह से शिकार हाथ से निकल गया।" उसने रुक कर माथे से पसीना पोंछते हुए कहा।
“यह आख़िर हुआ क्या?" हमीद ने पूछा।
“बहुत बुरा हुआ।” अब नये सिरे से काम करना पडेगा। सारी मेहनत पर पानी फिर गया।" फ़रीदी ने हाथ मलते हुए कहा। डॉक्टर सतीश की लाश कोतवाली लायी गयी। थोड़ी देर बाद इस हादसे की ख़बर सारे शहर में मशहूर हो गयी। फ़रीदी से बयान लिया गया। उसने सतीश की गिरफ़्तारी से ले कर मौत तक की सारी कहानी बता दी, लेकिन उसने अपने इस शक का ख़ुलासा न किया कि डॉक्टर सतीश का सम्बन्ध रणधीर वाले केस से भी है।
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कोतवाली से फुर्सत पा कर जब दोनों घर आये तो फ़रीदी ने हमीद से पूछा।
“हाँ भई, यह तो बताओ कि वह लाश विमला ही की थी न।"
“जी हाँ, विमला की थी!" हमीद ने कहा। “और सरोज हवालात में है।"
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"क्या मतलब?” फ़रीदी ने चौंक कर कहा।
“आपके जाने के बाद मैं सरोज को कोतवाली लाया। हालाँकि लाश ख़राब हो चुकी थी, उसका चेहरा बिगड़ गया था, लेकिन सरोज ने उसे पहचान लिया। उसका बयान दोबारा लिया गया। दिलबीर सिंह की ज़मानत हो गयी, लेकिन सरोज अभी तक हवालात ही में है।
_ “यह तो बहुत बुरा हुआ। इन गधों को कभी अक़्ल न आयेगी। सारा बना-बनाया खेल बिगाड़ दिया कमबख़्तों ने। तुमने उन्हें ऐसा करने से रोका क्यों नहीं?"
“मैंने चीफ इन्स्पेक्टर से कह कर रुकवाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने भी कोई ध्यान नहीं दिया।"
“खैर, और कोई ख़बर?"
"डॉक्टर सतीश यहाँ से ग़ायब ही हो गया था। दिलबीर सिंह और सरोज की गिरफ़्तारी के बाद मकान की निगरानी का कोई सवाल ही नहीं रह गया।"
"हमीद, तुम इतने बेवकूफ़ क्यों होते जा रहे हो।” फ़रीदी ने अपनी रान पर हाथ मारते हुए कहा। “तुम्हें यह कैसे सूझी कि यही दोनों मुजरिम हैं। इस क़िस्म के काम अकेले नहीं किये जाते हैं। शुरू ही से चीख़ता आ रहा हूँ कि इसमें किसी गिरोह का हाथ है। फिर भी तुमने ऐसी बेवकूफ़ी कर डाली, अफ़सोस!"
“अब क्या बताऊँ! हो गयी, तो हो गयी ग़लती।”
“बस, क़िस्सा ख़त्म, उल्ल कहीं के।"
“कानपुर में क्या रहा?" हमीद थोड़ी देर ख़ामोश रहने के बाद बोला।
“कानपुर में मैंने यह राय क़ायम की थी कि डॉक्टर सतीश ही इस गिरोह का सरगना है। लेकिन यह ख़याल ग़लत साबित हुआ। अगर ऐसा होता तो उसकी मौत इस तरह न होती। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि वह उस गिरोह के एक मामूली मेम्बर की हैसियत से काम कर रहा था। ख़ुद उसने किसी क़िस्म का बयान नहीं दिया, लेकिन मैंने अपने तरीकों से इस बात का पता लगा लिया था कि वह इस गिरोह से जुड़ा ज़रूर है। एक बात साफ़ न हो सकी कि वह उस वक़्त भेस बदल कर कानपुर क्यों जा रहा था। अगर उसका मक़सद रणधीर सिंह के घर की तलाशी लेना था तो उसने मुझे ट्रेन में छेड़ा क्यों था? चुपचाप निकल क्यों न गया?
"हाँ, वाक़ई यह चीज़ अजीबो-ग़रीब है।" हमीद कुछ सोचते हुए बोला।
“मैं एक नतीजे पर और पहुँचा हूँ; वह यह कि जिस वक़्त विमला के गोली लगी, वह रणधीर की मोटर साइकिल के कैरियर पर बैठी थी। रणधीर सिंह ने यह बयान ग़लत दिया था कि वह अकेला जलालपुर से आ रहा था और उसने धर्मपुर के जंगल में एक औरत की लाश देखी थी। गोली लगते ही विमला गिर गयी थी। उसके गिरने के बाद रणधीर यहाँ कुछ देर रुका भी
था।"
“यह आप किस तरह कह सकते हैं?" हमीद ने कहा।
“यह देखो, यह ख़त मुझे कानपुर में रणधीर के कमरे की तलाशी लेते वक़्त मिला था।" फ़रीदी ने जेब से ख़त निकाल कर हमीद की तरफ़ बढ़ा दिया।
हमीद ख़त पढ़ने लगा।
“रणधीर,
मैं एक बहुत बड़ी मुश्किल में फँस गयी हूँ। मुझे आ कर बचाओ। किसी तरह यहाँ आ कर मुझे ख़ामोशी से निकाल ले जाओ। देखो, यह बात किसी पर ज़ाहिर न होने पाये, वरना मेरी जान ख़तरे में पड़ जायेगी। मुझे लिखो कि तुम कब आ रहे हो, लेकिन इस तरह आना कि किसी को कानों-कान ख़बर न होने पाये। यह मेरी ज़िन्दगी का सवाल है। इस ख़त को पढ़ कर जला देना!
विमला"
“लेकिन इस ख़त से आपने उन सब बातों का अन्दाज़ा कैसे लगा लिया।
“बहुत आसानी से।'' फ़रीदी ने कहा। “अगर मुझे यह ख़त न मिलता तो मुझे न जाने कितना और भटकना पड़ता।"
“मैं आपका मतलब नहीं समझा।"
“यह कोई नयी बात नहीं।' फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा। “तुम कभी मतलब नहीं समझते। खैर, सनो। जब यह ख़त रणधीर को मिला होगा तो उसने उसके जवाब में विमला को लिखा होगा कि वह उसे निकाल ले जाने के लिए आ रहा है और उसने उससे तमाम सवाल भी पूछे होंगे। हो सकता है कि यह ख़त उन लोगों के । हाथ लग गया हो, जिनके चंगुल से वह निकल जाने की कोशिश कर रही थी। उन्होंने यही ठीक समझा हो कि रणधीर को यहाँ आने दिया जाये और इस तरह विमला और रणधीर दोनों को। ख़त्म कर दिया जाये कि किसी को कानों-कान ख़बर तक न हो। रणधीर यहाँ आया, उसने मोटर साइकिल हासिल की और विमला को उस पर सवार करके ले भागा। क़ातिलों ने अपना प्लान पहले ही से तैयार कर रखा था। पहले उन्होंने विमला को ख़त्म किया। जब रणधीर यहाँ से पुलिस ले गया तो उन्होंने गोलियाँ चला कर पुलिस वालों को तो भगा दिया और रणधीर को वहीं ढेर करके दफ़्न कर दिया। इस तरह उन्होंने रणधीर को पुलिस की निगाहों में मुजरिम बना कर विमला के ग़ायब हो जाने का ज़िम्मेदार भी बना दिया।'
“लेकिन जब उन्होंने रणधीर को दफ़्न कर दिया था तो इस बात का कैसे पता चलता कि वह, यानी रणधीर, विमला का मॅगेतर था। आख़िर इसका इज़हार भी तो ज़रूरी था, वरना विमला की फ़रारी की ज़िम्मेदारी उस पर क्यों लग गयी होती।" हमीद ने कहा।
“बहुत आसानी से...विमला ने रणधीर को लिख दिया था कि वह किसी से इस बात का ज़िक्र न करे। इसलिए उसकी रवानगी की ख़बर किसी को न हो सकी। यह ज़रूरी बात है कि रणधीर के अचानक इस तरह गायब हो जाने से लोगों को यही ख़याल होता कि वे दोनों कहीं फ़रार हो गये हैं, जबकि लोग पहले से जानते ही थे कि दोनों एक-दूसरे के मँगेतर हैं।'
“हँ!” हमीद ने सोचते हुए कहा। “फिर मोटर साइकिल का नम्बर मिटाने की क्या ज़रूरत थी?"
___ “यह तो मामूली-सी बात है। अगर मोटर साइकिल का नम्बर न मिटाया जाता तो उसके मालिक का पता बहुत आसानी से चल जाता और रणधीर की लाश दफ़्न कर देने का मतलब ही यह था कि पुलिस इधर-उधर अँधेरे में सिर फोड़ती रहे। वह तो दुआ दो गीदड़ों को कि रणधीर की लाश बरामद हो गयी...वरना अभी पहला दिन होता।"
“अब आपने क्या सोचा है।" हमीद ने कहा।
"अभी कुछ नहीं सोचा। अभी तो फ़िलहाल मुझे सरोज को रिहा कराके जलालपुर पहुँचाना है।"
“है-है...इश्क़े-अव्वल दर्दे-दिल...ले लिया!" हमीद ने क़व्वाली की तर्ज पर झूमते हुए कहा।
“क्या बकते हो!” फ़रीदी बेचैन हो कर बोला।
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“अरे, क्या पूछते हैं हुजूर...बस यह समझ लीजिए कि पुराने लेखकों के शब्दों में वह कहते हैं न हसीना, नाज़नीना, मलायक फ़रेब, परी, महजबीं, ज़ोहरा जबीं, सरापा खाँसी-ओ-बुख़ार की घड़ियाँ कभी गिनती होगी और कभी रख देती होगी...ओ हो.. ओ...हो।"
“बस-बस, बकवास बन्द...वरना!"
“वरना आप मेरा हक़ भी मार लेंगे। बहुत-बहुत शुक्रिया।" हमीद ने हँस कर कहा।
“तुम हो अच्छे-खासे गधे।” फ़रीदी ने उकता कर कहा और आँखें बन्द कर के आराम-कुर्सी पर टेक लगा कर बैठ गया।
ख़ानदानी पागल फ़रीदी हवालात में सरोज से मिला। वह उसे देख कर रोने लगी। उसकी रिहाई का इन्तज़ाम उसने पहले ही कर लिया था। वह उसे दिलासा देता हुआ जलालपुर ले आया। ठाकुर दिलबीर सिंह सरोज के आने की ख़बर सुन कर आपे से बाहर हो गया। उसकी आँखों में खून उतर आया। भवें तन गयीं और वह चीख़ कर बोला, “अब यहाँ क्या करने आयी हो? ख़ानदान की इज़्ज़त मिला दी ख़ाक में।"
“भैया जी, आख़िर इसमें मेरी क्या ग़लती है।' सरोज रोती हुई बोली।
“क्यों बुलाया था तुमने विमला को। खुद जान से गयी और हमारी गर्दन नाली में रगड़ गयी।" अन्धे दिलबीर सिंह ने चीख़ कर कहा। “अब यहाँ तम्हारा कोई काम नहीं। ठाकर अमर सिंह के ख़ानदान की बहू और जेल में जाये। तू भी प्रकाश ही के साथ क्यों न मर गयी।"
“ठाकुर साहब, भला इसमें इनकी क्या ग़लती है।' फ़रीदी ने नर्म लहजे में कहा।
“आप चुप रहिए जनाब। ये मेरे घरेलू मामले हैं।'' दिलबीर सिंह चीख़ कर बोला।
“ठाकुर साहब, मुझे शर्मिन्दगी है कि आप लोगों को तकलीफ़ उठानी पड़ी। अगर मैं यहाँ होता तो इसकी नौबत न आने पाती।” फ़रीदी फिर उसी अन्दाज़ में बोला।
__“तकलीफ़ न उठानी पड़ती।" दिलबीर सिंह झल्ला कर बोला। “आप क्या जानिए कि ख़ानदान की इज़्ज़त क्या चीज़ होती है।"
“मैं जानता हूँ, लेकिन अब जो हुआ, सो हुआ। इन्हें माफ़ कर दीजिए।” फ़रीदी ने कहा।
“अच्छा, तो आप सिफ़ारिश करने के लिए आये हैं। क्यों सरोज, इतनी जल्दी इतने जॉनिसार पैदा कर लिये।” उसने तीखे शब्दों में कहा।
सरोज रोने लगी।
“ठाकुर साहब, ऐसे बुजुर्ग पर ऐसी बातें अच्छी नहीं लगतीं।” फ़रीदी ने नाख़ुशगवार लहजे में कहा।
“आप यहाँ से तशरीफ़ ले जाइए, और सरोज, तुम भी...तुम्हारा इस घर में अब कोई काम नहीं।"
सरोज ने दिलबीर के पाँव पकड़ लिये, लेकिन उसने उसे बेदर्दी से हटा दिया।
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“अब इस घर से मेरी लाश ही निकलेगी भैया जी।” सरोज रोती हुई बोली।
“तम यहाँ से चली जाओ, वरना सचमुच तुम्हारी लाश ही निकलेगी।” दिलबीर सिंह चीख़ कर बोला।
“ठाकुर साहब, आप सरोज को धमकी दे रहे हैं। इसलिए अब पुलिस को उन्हें अपनी हिफ़ाज़त में लेना पड़ेगा।"
“पुलिस!” दिलबीर सिंह ज़हरीली हँसी के साथ बोला, “पुलिस की हिफ़ाज़त में तो यह दो रातें रही है। क्या अभी तुम लोगों का जी इससे नहीं भरा!"
“क्या बक रहे हो ठाकुर, होश में आओ। तुम फ़रीदी से बात कर रहे हो।” फ़रीदी ने तेज़ी से कहा।
“ठाकुर, मैं तुम्हारा मुँह नोच लूँगी।'' सरोज अचानक बिफर कर बोली। “मैं राजपूतनी हूँ।"
“अच्छा, राजपूतनी की बच्ची! तुम जल्दी से यहाँ से अपना मुँह काला करो। ख़बरदार, कभी इस घर की तरफ़ आँख उठा कर भी न देखना।" दिलबीर सिंह गुस्से में काँपते हुए बोला।।
___ फ़रीदी सरोज को ले कर मकान के बाहर चला आया। अब वह फिर शहर की तरफ़ जा रहा था।
“मुझे बहुत शर्मिन्दगी है, सरोज बहन।”
"लेकिन आपने क्या किया है।' सरोज सैंधी हुई आवाज़ में बोली।
“मैंने तुम्हें पहले ही क्यों न अच्छी तरह महफूज़ कर दिया।"
“क़िस्मत का लिखा पूरा हो कर रहता है।" सरोज सिसकियाँ लेती हुई बोली। “अब मैं कहाँ जाऊँ। पिताजी से जा कर कहँगी क्या...शायद वे लोग भी मुझे घर में जगह देने से इनकार कर दें।"
“तुम इसकी फ़िक्र न करो। जब तक मैं ज़िन्दा हूँ, तुम्हें किसी तरह परेशान होने की ज़रूरत नहीं है।” फ़रीदी ने कहा।
“मैं किसी के लिए भार बनना नहीं चाहती। मैं मेहनत-मजदूरी करके पेट पाल लूँगी।"
“क्या तुम एक भाई की गुज़ारिश ठुकरा दोगी। इन्सान होने के नाते मैं तुमसे गुज़ारिश करूँगा कि जब तक तुम्हारा कोई ठीक-ठाक इन्तज़ाम न हो जाये तब तक तुम मेरे घर पर रहो। मैं एक भाई की तरह तुम्हारी हिफ़ाज़त करूँगा।"
जंगल में लाश
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rajan
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Re: जंगल में लाश
Post 01 Aug 2021 14:24
सरोज ख़ामोश हो गयी। उसकी पलकें ज़्यादा रोने की वजह से सूज आयी थीं उसने कार की खिड़की पर सिर रख कर अपना मुँह छिपा लिया।
“यह डॉक्टर सतीश के क़त्ल की क्या कहानी है?" थोड़ी देर बाद सरोज ने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा। ___ फ़रीदी ने उसे पूरी कहानी बता दी। वह बड़े गौर से सुनती रही।
__“मेरी समझ में नहीं आता कि आख़िर यह सब क्या हो रहा है।” सरोज कार की सीट पर टेक लगाती हुई बोली।
“तो क्या तुम डॉक्टर सतीश को अच्छी तरह जानती थीं?"
“जी हाँ! वह तक़रीबन हर हफ़्ते हमारे यहाँ मेहमान रहते थे।"
“क्या दिलबीर सिंह से उसकी दोस्ती थी।"
“नहीं, वह दरअसल मेरे शौहर के दोस्त थे। उनकी मौत के बाद बड़े ठाकुर से उनकी गहरी छनने लगी।"
“विमला से वे बेतकल्लुफ़ थे या नहीं?"
"क़तई नहीं!"
“कभी विमला उनके साथ बाहर भी जाती थी या नहीं?"
"कभी नहीं!"
“क्या तुम यह बता सकती हो कि दिलबीर सिंह से उनकी दोस्ती क्यों थी?"
“यह बात मेरी समझ में नहीं आयी।"
__“अच्छा, तुम्हारे शौहर प्रकाश बाबू से उनकी दोस्ती क्यों थी?"
“मेरे पति एक मशहूर वैज्ञानिक थे। वे आये दिन नये प्रयोग किया करते थे। डॉक्टर सतीश को भी इससे दिलचस्पी थी। मेरा ख़याल है कि दोनों की दोस्ती का कारण यही था।"
“तुम्हारे शौहर किस क़िस्म के प्रयोग किया करते थे। उनका कोई-न-कोई टॉपिक ज़रूर होगा।'
“उन्हें गैसों के प्रयोग का ज़्यादा शौक़ था। इस सिलसिले में वे कई बार बहुत बीमार भी पड़े थे।"
“बीमार कैसे पड़े थे।” फ़रीदी ने दिलचस्पी ज़ाहिर करते हुए कहा।
“एक बार तो बहुत ही अजीबो-गरीब बात हो गयी थी। प्रकाश बाबू अपनी लेबोरेटरी में किसी गैस पर प्रयोग कर रहे थे कि अचानक उन पर हँसी का दौरा पड़ा। मैं उनकी हँसी सुन कर जब उधर जा पहुँची, तो पहले तो मैं समझी कि किसी बात पर हँस रहे होंगे। इसलिए उन्हें हँसते देख कर मैं भी यूँ ही हँसने लगी और मैंने उनसे हँसी का सबब पूछा, लेकिन जवाब नदारद। वे बराबर हँसते ही जा रहे थे। थोड़ी देर के बाद उनकी आँखें लाल होने लगी और मुँह से झाग निकलने लगा। दो-तीन मिनट तक ऐसे ही रहा फिर अचानक वे बेहोश हो कर गिर गये।"
“अच्छा, फिर होश में आने के बाद तुमने इसका सबब उनसे पूछा था।"
“मैंने कई बार मालूम करने की कोशिश की, लेकिन वे हमेशा टालते रहे।"
“उस क़िस्से को तुम्हारे अलावा कोई और भी जानता था।" __“जी हाँ, बड़े ठाकुर साहब भी वहाँ आ गये थे। उस वक़्त उनकी आँखें ठीक थीं और डॉक्टर सतीश को भी मालूम था। जहाँ तक मेरा अन्दाज़ा है इन दोनों और घर के नौकरों के अलावा और किसी को भी इस क़िस्से की ख़बर नहीं हुई थी।"
____ “तुम यह दावे के साथ कैसे कह सकती हो।"
“दावे के साथ तो नहीं कह सकती। अलबत्ता, यह मेरा अन्दाज़ा है, क्योंकि प्रकाश बाबू ने इन सब को मना कर दिया था कि वे इसके बारे में किसी से कुछ न कहें।"
__“हँ!” फ़रीदी कुछ सोचते हुए बोला। "अच्छा, यह बताओ कि तुम्हारे ख़याल में चिड़िया के पंजों वाले उन जूतों को कोई और इस्तेमाल कर सकता है?"
"नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उस कमरे में, जहाँ वह अजायब-घर है, हमेशा ताला लगा रहता है और उसकी कुंजी या तो मेरे पास रहती है या ठाकुर साहब के पास।" __“खैर!” फ़रीदी ने खाँसते हुए कहा। “मगर भई, तुम्हारे ये ठाकुर साहब बड़े ज़ालिम आदमी मालूम होते हैं।"
“नहीं, ऐसी बात नहीं। मैंने पहली बार उन्हें इस कदर गुस्से में देखा है। इनकी नर्म दिली सारे इलाके में मशहूर है। वे भंगियों तक को बेटा कह कर पुकारते हैं। मेरी याददाश्त में उन्होंने कभी किसी से बदतमीज़ी नहीं की। आज उनकी ज़बान से ऐसे अलफ़ाज़ निकले हैं कि मुझे अपने कानों पर यक़ीन नहीं आता।'
फ़रीदी कुछ सोच रहा था। उसकी आँखें अपने अन्दाज़ में घूम रही थीं। अचानक उनमें अजीब क़िस्म की वहशियाना चमक पैदा हो गयी।
चौथा हादसा
चार बजे शाम को फ़रीदी दिन भर का थका-माँदा घर आया था। आज वह दिन भर ठाकुर दिलबीर सिंह के दोस्तों को टटोलता रहा था। डॉक्टर सतीश के घर की तलाशी तो उसने उसी दिन ले ली थी जिस दिन उसका क़त्ल हुआ था। मामूली नाश्ते के बाद वह अपने कुत्तों की देख-भाल में लग गया। उसके पास एक दर्जन कुत्ते थे और हर कुत्ता अपनी मिसाल था। उसके बहुत सारे शौक़ अजीबो-गरीब थे। उसे अजायब-घर में अलग-अलग क़िस्म के जानवर परिन्दे और कीड़े-मकौड़े जमा करने का भी शौक़ था। उसकी कोठी का एक कमरा दनिया की अजीबो-गरीब चीज़ों के लिए था। उनमें सब से ज़्यादा अजीबो-गरीब चीज़ अलग-अलग क़िस्मों के साँप थे। वह इन साँपों के बीच माहिर सपेरा लगता था। उनमें से कई ऐसे भी थे जिनके ज़हर की थैलियाँ वह ख़ुद निकाल चुका था। उसकी इन हरकतों पर उसके सारे साथी उसका मज़ाक़ उड़ाते थे। उनका ख़याल था कि वह अपनी शोहरत के लिए इस क़िस्म की अजीबो-गरीब हरकतें किया करता है।
कुत्तों को खाना खिलाने के बाद फ़रीदी अपने अजायब-घर की तरफ़ गया। जैसे ही वह दूसरे बरामदे की तरफ़ मुड़ा, उसे सरोज दिखायी दी जो अजायब-घर से निकल रही थी।
“तो आपको भी इसका शौक़ है।” वह मुस्कुरा कर बोली।
“क्यों? क्या हुआ? तुम डरीं तो नहीं। वहाँ कई बहुत ही ख़ौफ़नाक चीजें भी हैं।"
“आख़िर आपने इतने सारे साँप क्यों जमा कर रखे हैं।"
“पता नहीं क्यों मुझे साँपों से इश्क़ है।" फ़रीदी ने कहा।
“लेकिन फ़रीदी भैया, यह शौक़ ख़तरनाक भी है।
___ “लेकिन ये मेरे लिए पालतू कुत्तों की तरह बेजरर हैं।"
“तो फिर आपने इनका ज़हर निकाल दिया होगा।"
“नहीं, ऐसा तो नहीं...इनमें से बहुत सारे ऐसे भी हैं जिनका ज़हर आज तक निकाला ही नहीं गया।"
"इन्हें खिलाता-पिलाता कौन है?"
“मैं ख़ुद!” फ़रीदी ने कहा। “आओ तुम्हें तमाशा दिखाऊँ।"
दोनों कमरे में दाखिल हुए, फ़रीदी एक अलमारी के क़रीब पहुँच कर खड़ा हो गया। अलमारी के दरवाजों में नीचे की तरफ़ बहुत सारे छोटे-बड़े छेद थे।
फ़रीदी ने एक अलग तर्ज़ की सीटी बजायी। अचानक फुकारों की आवाजें सुनायी दी और अलमारी के छेदों से साँप निकलने लगे। सरोज चीख कर पीछे हट गयी।
“डरो नहीं, ये केंचुओं से भी बदतर हैं, इनमें ज़हर नहीं।"
फ़रीदी ने मेज पर से दूध का बर्तन उठा कर ज़मीन पर रख दिया। सारे साँप उस पर टूट पड़े। फ़रीदी ने दूसरा बर्तन भी उठा कर उसी के क़रीब रख दिया। लेकिन वे सब पहले बर्तन पर पिले । पड़ रहे थे। वह उन्हें हाथ से हटा-हटा कर दूसरे बर्तन के क़रीब लाने लगा। यह देख कर सरोज फिर चीख़ पड़ी।
फ़रीदी हँसने लगा।
__ "डरो नहीं सरोज बहन, ये सब मेरे दोस्त हैं।'
“मुझे यह तमाशा बिलकुल अच्छा नहीं लगा। मैं ड्रॉइंग-रूम में आपका इन्तज़ार । करूँगी।” सरोज यह कह कर बाहर चली गयी।
दोनों बर्तन साफ़ कर लेने के बाद सारे साँप धीरे-धीरे अलमारी के छेदों में वापस चले गये। फ़रीदी ने थोड़ी देर ठहर कर चारों तरफ़ नज़रें दौड़ायीं और कुछ गुनगुनाता हुआ बाहर निकल आया।
सार्जेंट हमीद तेज़ क़दमों से अजायब-घर के कमरे की तरफ़ आ रहा था। फ़रीदी उसे देख कर रुक गया।
“कहो भई, क्या ख़बर है?"
“कोई ख़ास ख़बर नहीं। कोतवाली से आ रहा हूँ। अभी-अभी दिलबीर सिंह का नौकर आपके नाम एक ख़त दे गया है।"
फ़रीदी ख़त पढ़ने लगा।
"फ़रीदी साहब,
आदाब!
मुझे अपने कल के रवैये पर सख़्त अफ़सोस है। कल शायद ज़िन्दगी में पहली बार मुझे गुस्सा आया था। सरोज को समझाने की कोशिश कीजिएगा। ख़ुदा करे कि वह मुझे माफ़ कर दे। मैंने उसकी शान में बहुत ही बुरे अलफ़ाज़ इस्तेमाल किये हैं जिसके लिए मेरा ज़मीर मुझे दुत्कार रहा है। जब तक वह यहाँ न आ जायेगी, मुझे सुकून नहीं मिल सकता। ख़ुदा मेरे हाल पर रहम करे।
आपका,
ठाकुर दिलबीर सिंह"
"तो होश आ गया ठाकुर साहब को।" फ़रीदी ने कहा।
“और यह बहुत बुरा हुआ।" हमीद मुस्कुरा कर बोला।
“क्यों ?"
“मैं यह क्या जानें। लेकिन सरोज से इस ख़त के बारे में न बताइएगा।"
“आख़िर क्यों?" फ़रीदी ने ताज्जुब से पूछा।
“अरे, तो क्या वाक़ई आप...!” हमीद अधूरी बात करके चुप हो गया।
“अजीब आदमी हो। साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहते। आख़िर बात क्या है?"
"क्या आप सचमुच सरोज को वापस भेज देंगे।"
__“तो इसमें ताज्जुब की क्या बात है।” फ़रीदी ने ड्रॉइंग-रूम की तरफ़ बढ़ते हुए कहा। ___“सुनिए तो सही!” हमीद उसे रोकते हुए बोला। “क्या वाक़ई आप सीरियसली कह रहे हैं।”
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“कहीं मैं तुम्हारी पिटाई न कर दूँ।” फ़रीदी ने हँस कर कहा। “बेकार ही भेजा चाटे जा रहे हो।'
“सिर्फ एक बात और पूछंगा।"
"फ़रमाइए!” फ़रीदी रुकते हुए हँस कर बोला।
“तो वाक़ई क्या आप सरोज..."
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“बकवास बन्द!" फ़रीदी झल्ला कर बोला।
सरोज ड्रॉइंग-रूम से निकल आयी और फ़रीदी कुछ कहते-कहते ख़ामोश हो गया। हमीद खिसियानी हँसी हँसने लगा।
“क्या बात है?” सरोज ने दोनों को ग़ौर से देखते हुए कहा। __
“कोई बात नहीं।” फ़रीदी कहता हुआ अन्दर चला गया। सरोज ने हमीद पर एक उचटती-सी नज़र डाली और वह भी चली गयी। हमीद थोड़ी देर तक खड़ा सिर खुजाता रहा। अचानक उसके होंटों पर शरारती मुस्कुराहट खेलने लगी। उसने इधर-उधर देखा और ज़ोर से चीख़ा। चीख़ की आवाज़ सुन कर फ़रीदी और सरोज बरामदे में निकल आये।
“अरे-अरे, क्या हुआ।” फ़रीदी, हमीद की तरफ़ झपटते हुए बोला।
"हमीद-हमीद...!'' वह उसे झंझोड़ कर पुकारने लगा।
“अभी तो अच्छे-भले थे।” सरोज ने कहा।
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___“न जाने क्या हो गया।” फ़रीदी ने हमीद के चेहरे पर झुकते हुए कहा।
"तो क्या आप वाक़ई सरोज...!" हमीद धीरे से बोला।
फ़रीदी ने झुंझला कर उसका मुँह दबा दिया।
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“चुप रहो।” फ़रीदी उसका मुंह दबाये हुए चीख़ा।
“अरे-अरे...!” सरोज कहती हुई आगे बढ़ी। “यह आप क्या कह रहे हैं।'
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"तुम इसे नहीं जानतीं। मालूम नहीं कौन-सा शैतान इसके अन्दर घुस गया है।"
“आपकी तो कोई बात ही मेरी समझ में नहीं आती।” सरोज ने कहा।
“और मेरी बात!” हमीद उठते हुए जल्दी से बोला।
“अरे!” सरोज घबरा कर पीछे हट गयी।
"हमीद, अगर तुम अपनी शरारतों से बाज़ न आये तो अच्छा न होगा।" फ़रीदी ने नाराज़ होते हुए कहा।
“आप बहरहाल मेरे अफ़सर हैं।"
“आख़िर बात क्या है?” सरोज ने कहा।
"कुछ सरकारी मामले हैं।" हमीद मुस्कुरा कर बोला।
फ़रीदी उसे अब तक घूर रहा था।
“आओ चलें, इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है।'' फ़रीदी ने सरोज से कहा। हमीद बाहर खड़ा रहा और वे दोनों चले गये।
“आख़िर बात क्या है?' सरोज ने फिर पूछा। "कुछ नहीं, यूँ ही मुझे तंग कर रहा है।"
“इसीलिए कहा जाता है कि मातहतों को ज़्यादा सिर न चढ़ाना चाहिए।” सरोज ने कहा।
___ “मुश्किल तो यही है कि उसे मैं मातहत समझता ही नहीं और उसकी वजह यह है कि अपने साथियों में सबसे ज़्यादा अक़्लमन्द है। खैर छोड़ो...लो, यह ख़त दिलबीर सिंह ने मुझे भिजवाया है।
सरोज ख़त ले कर पढ़ने लगी।
“तो फिर आप क्या कहते हैं?' सरोज ख़त पढ़ कर बोली।
“इस सिलसिले में भला मैं क्या कह सकता
“मैंने तो फैसला कर लिया है कि अब उस घर में क़दम न रखूगी।"
“और मैं आपके फ़ैसले की क़द्र करता हूँ।" हमीद ने कमरे में दाख़िल होते हुए कहा।
____ फ़रीदी ने झल्ला कर मेज़ पर रखा हुआ रूमाल उठा लिया और हमीद सहम जाने की ऐक्टिंग करता हुआ ख़ामोशी से एक तरफ़ बैठ गया।
थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें होती रहीं। उसके बाद फ़रीदी और हमीद में केस के सिलसिले में बहसें छिड़ गयीं और सरोज उकता कर बाहर चली गयी।
“यह क्या बेवकूफ़ी थी?” सरोज के चले जाने के बाद फ़रीदी बोला।
“कैसी बेवकूफ़ी?"
“देखो, सरोज मेरी मेहमान है। तुम्हें इस क़िस्म की बातें न करनी चाहिएँ कि उसे दुख पहुँचे।” __
“तो यह कहिए कि आप ग़लत-फ़हमी में हैं। अरे, यह सब कुछ मैं आप ही के लिए कर रहा हूँ
“मैं समझा नहीं।"
"मुहब्बत करने वालों के पास समझ होती कहाँ है।"
“फिर वही बकवास!" फ़रीदी ने झुंझला कर कहा। "मैं तुम्हें आखरी बार समझाता हूँ कि अब तुम इसके बारे में कभी कुछ न कहना। क्या तुम अपनी तरह सबको गधा समझते हो।"
___“जी नहीं, मैं अपने अलावा सबको समझता हूँ
___ “देखो मियाँ हमीद! तुम्हारी बौखलाहटें बहुत ज़्यादा बढ़ गयी हैं। मैं अब तुम्हारे अब्बा हुजूर को लिखने वाला हूँ कि जल्द-से-जल्द तुम्हारा कोई अच्छा रिश्ता कर दें।
“आपको ग़लत-सिलसिले हुई है। मैं पिछले दो माह से बिलकुल आशिक़ नहीं हुआ।"
“अच्छा भई, अब ख़त्म करो यह क़िस्सा।" फ़रीदी ने कहा। "कोई क़ायदे की बात करो।"
“मेरे ख़याल से सिविल मैरिज़ ही ज़्यादा कायदे की बात रहेगी।"
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“तुम ज़िन्दगी भर संजीदा नहीं हो सकते।" फ़रीदी ने बुरा-सा मुँह बनाते हुए कहा।
“सचमुच बताइएगा आपका इश्क़ किन मंज़िलों पर है?” हमीद ने मुस्कुरा कर कहा।
“किसी परेशान-हाल औरत को सहारा देना भी सितम हो जाता है। हत्तेरी क़िस्मत की ऐसी की तैसी।"
“आप बेकार में परेशान हैं। मैं आपके लिए जान की बाज़ी लगा दूँगा।” हमीद ने अपने सीने पर हाथ मारते हुए कहा।
“अच्छा मेरे भाई, अब चुप हो जाओ, वरना मैं तुम्हारा गला घोंट दूँगा।” फ़रीदी ने उकता कर कहा।
"तो इस तरह यह इस शहर में चौथा क़त्ल होगा।” हमीद अपने चेहरे पर उदासी पैदा करते हुए बोला।
उसकी मज़ाक़िया सूरत देख कर फ़रीदी को हँसी आ गयी।
इतने में टेलीफ़ोन की घण्टी बजी। फ़रीदी ने रिसीवर उठा लिया।
"हैलो!"
“ओह फ़रीदी साहब! मैं सुधीर बोल रहा हूँ। धर्मपुर के जंगल में फिर एक हादसा हो गया है।"
“क्या कहा? हादसा?"
“जी हाँ... क़त्ल...हम लोग जा रहे हैं। आप और हमीद साहब सीधे वहीं पहुँच जाइए।"
___ “लो भई...चौथा क़त्ल भी आख़िर हो ही गया।' फ़रीदी ने रिसीवर रखते हुए हमीद की तरफ़ मुड़ कर कहा।
“कहाँ?"
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“वहीं...धर्मपुर के जंगल में...जल्दी से तैयार हो जाओ। अरे लो...बातों में अँधेरा हो गया। अपनी टॉर्च ज़रूर ले लेना। जल्दी करो, वरना कहीं ये लोग कुछ गड़बड़ न करें।"
“अब तो जनाब मेरा दिल चाहता है कि आप सचमुच मुझे क़त्ल कर देते तो अच्छा था। यह नौकरी क्या है, आफ़त है!" हमीद ने उठते हुए कहा।
दोनों कमरे के बाहर निकल गये।
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