अधूरा प्यार-- एक होरर लव स्टोरी 8

 अधूरा प्यार-- एक होरर लव स्टोरी  8






महल में हर तरफ अफ़रा तफ़री और आपा धापी का माहौल था... शहर के नज़दीक ही सूना पड़ा रहने वाला विशाल मैदान रणभूमि में तब्दील हो चुका था.. रह रह कर महल तक आ रही हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की हिनहिनाहट और अपनी जान जोखिम में डाल कर लड़ाई में अपनी जान झोंक रहे सैनिकों की रह रह कर आ रही करूँ चीख और इन्न सबसे मिलकर पैदा हुए अजीब से कोलाहल से महल में मौजूद हर शक्श की रूह तक काँप रही थी....


"मा... क्या हम दुश्मनो से जीत पाएँगे?" शैया पर लेटी भयभीत राजकुमारी ने राजमाता से पूचछा... बे-पनाह खूबसूरती की मिशाल उस राजकुमारी का मुरझाया हुआ चेहरा संकट की उस घड़ी में भी पुर्नमासी के चाँद की तरह दमक रहा था....


"भगवान पर भरोसा रखो प्रिया.. सब ठीक हो जाएगा..." राजमाता के चेहरे पर पसरा अजीब सा सन्नाटा उसके शब्दों से मेल नही खा रहा था.. फिर भी वह बेटी को दिलासा देने में कोई कसर नही छ्चोड़ रही थी......


"पर हम 10,000 हैं और वो 200,000... कैसे जीतेंगे मा?" प्रिया उठकर बैठ गयी.....


"तू लेट जा बेटी... थोड़ी देर सो ले... कल रात से तूने पलक तक नही झपकाई हैं.. सो जा! भगवान पर भरोसा रख.....! सब ठीक हो जाएगा..." राजमाता ने फिर से उसको झूठी दिलासा देने की कोशिश की......


"कैसे सो जाउ मा? ववो.... मेरा देव कल रात से ही युद्ध भूमि में है... उसने वादा किया था वापस आने का.. वो तो आया ही नही है अभी..... मैं उसको देख कर ही सौंगी....!" राजकुमारी के सीने से टीस सी निकली....


"तू फिर उसका नाम ले रही है... कितनी बार समझाया है बेटी; तू एक राजकुमारी है... तेरा विवाह किसी राजकुमार से ही होगा... अब तू उसका इंतजार छ्चोड़ दे और सो जा!.. मान ले मेरी बात!"


राजमाता ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर प्रिया के गालों को छ्छूने की कोशिश की.. पर वह सरक कर दूर हो गयी," नही! मैं किसी और के बारे में सोचूँगी भी नही... मुझे यकीन है.. वो आकर मुझे ले जाएगा यहाँ से... महल में किसी में इतना दम नही जो उसका रास्ता रोक सके... और ना ही आपके किसी राजकुमार में उसका सामना करने की हिम्मत है... आप देख लेना..." प्रिया बिलखाती हुई बोली और उठकर राजमहल के मुख्य द्वार की और भागी.....


"आ पाकड़ो इसे!" राजमाता ने कहा और सेविकाओं ने अक्षरष: उनकी आग्या का पालन किया......


"मान जा बेटी.. वरना हमें तुम्हे फिर से बेड़ियों में जकड़ना पड़ेगा...!" राजमाता ने प्यार से उसका सिर पुच्कार्ते हुए कहा......


"बाँध दो मुझे... बना लो बंदी... पर तुम देखना... जब मेरा देव आएगा तो तुम्हारे सारे पहरे बिखर जाएँगे.. सारी बेड़ियाँ कट जाएँगी तुम्हारी.... कर लो तुम्हे जो करना है..." प्रिया चिल्ला चिल्ला कर कह रही थी...



जैसे तैसे करके राजकुमारी को शांत करके फिर से बैठाया गया.. पर उसकी आँखें शांत ना थी.. उसके अरमान शांत नही थे.. उसके देव ने उसको लौट कर आने का वादा किया था.. और उसको विस्वाश था; निस्तूर और निर्मम भगवान भी उसको उसका वादा पूरा करने से नही रोक सकता.. उसके कान देव की दनदनाते हुए कदमों की आहट सुन'ने को बेताब थे.. उसकी नज़रें देव दर्शन की प्यासी थी....


देव के इंतज़ार में तड़प रही प्रिया की आँखों के सामने वो सुखद लम्हा दौड़ गया जब उसने अपनी सखियों के साथ उपवन में विचरण करते हुए पहली बार देव को देखा था......


"ये सजीला नौजवान कौन है री!" प्रिया ने अपनी सखियों से पूचछा था...


"आप इनको नही जानती राजकुमारी?" लता ने आस्चर्य से प्रिया की ओर देखा...


"नही तो! मैं क्यूँ जानूँगी इसको? ऐसी क्या खास बात है इसमें?" प्रिया ने एक बार फिर उस नौजवान को गौर से देखते हुए पूचछा....


"अरे! आप वहीं तो थी जब इस शूरवीर ने तलवारबाजी में आस पड़ोस के देशों से आए सब राजकुमारों को एक एक करके परास्त कर दिया था...इसी ने तो बचाई थी अपने राज्य की लाज.... आप को स्मरण नही है क्या?" लता ने राजकुमारी को याद दिलाने की कोशिश की....


"ऊऊओ.. पर ये तो बड़ा ही सुन्दर है.. एक दम मन मोहक.. उस दिन हमनें इसको गौर से नही देखा था....!" प्रिया टकटकी बाँधे देव को देख रही थी....


"शूरवीर क्या सुन्दर नही हो सकते राजकुमारी? जाने कितनी ही बालायें इसके पिछे अपना दिल लिए घूमती हैं.. पर ये किसी को घास ही नही डालता...." लता ने अपने सीने पर हाथ रख कर आँखें बंद कर ली....


"अच्च्छा! क्या नाम है इसका?" प्रिया ने मुस्कुराते हुए पूचछा था....


"देव!" लता ने बताया....


"हुम्म.. देव! बुलाना ज़रा इसको...!" राजकुमारी ने आग्या दी....


"जी, राजकुमारी जी!" सखियों में से एक ने कहा और देव की और चल पड़ी.....


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"क्या कर रहे हैं सेनापति देव?" सखी ने जाकर प्यार से पहले दो बात करने की सोची...


देव ने नज़रें तिर्छि करके उसको देखा और वापस अपनी तलवार की धार तेज करने में जुट गया.. कुच्छ बोला नही...


"सुनता नही है क्या आपको?" सखी ने तड़प कर पूचछा....


"दिखता नही है क्या?" देव ने तलवार उठाकर उसको दिखाई और वापस काम में जुट गया....


"आपको राजकुमारी प्रिया बुला रही हैं..." सखी ने आहत सा होकर कहा....


"क्यूँ?" देव उसकी बातों पर कुच्छ खास ध्यान नही दे रहा था....


"तुम पर दिल आ गया है उनका.. हे हे.. मज़ाक कर रही हूँ.. मेरी शिकायत मत कर देना.. पर वो सच में आपको बुला रही हैं..."


"ठीक है.. बोल दो.. मैं थोड़ी देर में आता हूँ..." देव ने कहा और अपनी तलवार को सिलबेट पर घिसता रहा.....


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"वो ये बोला? तुमने कहा नही कि हमने बुलाया है.." राजकुमारी तिलमिला उठी...


"बोला था राजकुमारी! पर महाराज की कृपा से सेनापति बन'ने के बाद ये और ज़्यादा ढीठ हो गया है...." सखी ने चुगली करते हुए कहा....


"तो; ये सेनापति हैं अब!" राजकुमारी ने पूचछा.....


"जी! राजकुमारी जी; महाराज ने प्रतियोगिता के अगले दिन ही इनको सेनापति बना'ने की घोसना कर दी थी....."


"हूंम्म... मैं देखती हूँ इसको!" राजकुमारी ने चिड़कर कहा और अपनी सखियों को साथ लेकर वापस चली गयी.....


"पिता श्री!" प्रिया शाम को महाराज के पास थी...


"हां राजकुमारी!" महाराज ने बात सुन'ने के लिए बड़े प्रेम से उसकी और देखा...


"आपको नही लगता कि आपने अपने सेनापति को कुच्छ ज़्यादा ही सिर पे चढ़ा रखा है..." प्रिया ने शिकायती लहजे में कहा....


"क्यूँ? क्या हुआ बेटी?" महाराज बात को तवज्जो देते हुए उसकी ओर झुक से गये...


"क्या हुआ क्या? कल मैं उपवन में से कुच्छ आम तोड़ कर देने के लिए अपनी सखी के हाथों उसको बुला रही थी.. कहने लगा मैं थोड़ी देर में आउन्गा.. भला ये भी कोई बात हुई?" राजकुमारी के चेहरे पर हल्का सा गुस्सा और ढेर सारी नाराज़गी थी...


"हा हा हा! क्या उसको पता था कि राजकुमारी जी ने बुलाया है?" महाराज ने बात को मज़ाक में लेते हुए पूचछा....


"और नही तो क्या? सखी बता रही थी कि उस'ने उसको सपस्ट रूप से मेरा आदेश सुनाया था... पर आप ऐसे हंस क्यूँ रहे हैं? मैं मज़ाक नही कर रही.."


"हंस नही रहा बेटी.. क्या तुम्हे पता है कि उस'से बढ़कर योद्धा हमारे राज्य में तो क्या; पड़ोस के बड़े बड़े राज्यों में भी नही है.. तुमने उसका कौशल तो देखा ही होगा, शाही तलवारबाजी प्रतियोगिता में!"


"तो क्या हुआ पिता श्री? उसका कौशल उसको राजमहल की आअवग्या करने की इजाज़त तो नही दे सकता ना!"


"सुनो तो राजकुमारी! ये अधिकार खुद मैने ही उसको दिया है.. वास्तव में मैने प्रतियोगिता के बाद उसको मिलने के लिए बुलाया था.. मैने उस'से कहा:


"तुम जैसा वीर सेना में भरती होकर देश की सेवा क्यूँ नही करता?"


"मेरी तलवार मेरी आराधना है महाराज! मैं इसको किसी मजबूर और बेक़ुसूर के लहू से नही रंगना चाहता..!" देव की कही हुई बात महाराज ने प्रिया को बताई.....


"फिर? फिर आपने क्या कहा?" प्रिया ने उत्सुकता से पूचछा....


"मैने कहा..," हमने कभी किसी निर्दोष का लहू नही बहाया.. पर आक्रमणकारी के आगे कभी घुटने भी नही टेके! अगर कल को कोई तुम पर आक्रमण कर दे तो तुम क्या करोगे?"


उसने तन्मयता और शालीनता से जवाब दिया...," आपकी बात का अर्थ मैं समझ सकता हूँ महाराज.. पर राज्यों के बीच युध जनता के हित में नही होते.. वो तो सिर्फ़ राजाओं की कुत्सित मानसिकता और उनकी राझवास का परिणाम होते हैं... महज उनका निजी स्वार्थ होता है.. बेचारे सैनिक तो राजा के आदेश के बोझ तले दबकर उसके स्वार्थ और लालच का झंडा उठाने को मजबूर होते हैं... पर मैं ना तो ऐसा झंडा उठा सकता हूँ.. और ना ही 'ऐसा' झंडा उठाए निर्दोष सैनिकों का कतल कर सकता हूँ...." महाराज ने राजकुमारी प्रियदर्शिनी को बताया....


राजकुमारी उस वीर के विचारों से अत्यंत प्रभावित लग रही थी..," फिर क्या हुआ पिता श्री..?"


"मेरी तो खुद ही यह नियती रही है बेटी की पूरी धरती पर अमन और सुख चैन का वास हो...."


महाराज को प्रिया ने टोक दिया...," नही नही... ये बताइए कि आपने उसको क्या जवाब दिया.. और फिर उसने क्या कहा... ? पूरी बात बताइए ना!"


"हूंम्म..." महाराज ने कहा...," मैने कहा कि मुझे अत्यंत हर्ष है की मेरे राज्य में ऐसे आदर्श फल फूल रहे हैं.. मैने उसको कहा कि मैं देश की रक्षा की बागडोर ऐसे ही नवयुवक के हाथों में सौंपना चाहता हूँ जो युद्ध की मजबूरी और अहिंसा की ज़रूरत को भली भाँति जानता हो.. मैने उसके सामने सेनापति बन'ने का प्रस्ताव रखा... पहले उसने कुच्छ टाल मटोल की पर मेरे अनुग्रह पर अंतत: वा राज़ी हो गया... पर उसकी कुच्छ शर्तें थी... उन्ही में से एक ये थी कि उसको कभी कोई आदेश नही दिया जाएगा.. वह स्वेच्च्छा से अपने विवेक पर फ़ैसला खुद लेगा...."


प्रिया की आँखें सुखद आस्चर्य से फैल गयी," फिर पिताश्री... आपने मान ली उसकी ये शर्त?"


"हाआँ!" महाराज मुस्कुराते हुए बोले," वो थोड़ा विचित्रा है.. पर गुलाब के तने से 'पुष्प्राज' प्राप्त करने के लिए हमें कांटें तो स्वीकार करने ही पड़ेंगे... वो हमारे राज्य का बेशक़ीमती हीरा है.. सिर्फ़ उसकी वीरता और कौशल के कारण मैं ऐसा नही कह रहा हूँ.. वा आदर्शों का भंडार है.. मैं उस'से 2-4 बार ही व्यक्तिगत रूप से मिला हूँ.. पर खुद मैं भी उसका कायल हो गया हूँ...!"


"हमें देव के घर ले चलो लता!" राजकुमारी प्रयडरशिनी ने अलसुबह ही अपनी सबसे खास सहेली से कहा....


"ये क्या कह रही हैं आप राजकुमारी! आपको उनसे मिलना है तो आप उनको राजमहल में बुलवा लीजिए.. आपका यूँ जाना कदापि उचित ना होगा...!" लता ने सपस्ट लहजे में उनको उनके रुतबे का अहसास कराया......


"नही! हमें खुद ही जाना है.. और अभी!" प्रिया ने भी उतने ही सपस्ट शब्दों में अपना फ़ैसला सुना दिया....


"पर....... क्या राजमाता जाने की इजाज़त देंगी? मुझे तो नही लगता कि ऐसा संभव है?" लता ने झिझकते हुए कहा...


"तुम रैना को बुलाओ! हम उसको अपने कपड़े पहना कर अपनी जगह सुला देंगे... फिर कोई डर नही.. राजमाता तो शाम होने से पहले मेरे शयन कक्ष में आने से रहीं..!"


"पर उस पर मुसीबत आ सकती है.. आप सोच लो!" लता ने जवाब दिया...


"हमनें सोच लिया.. हमें जाना ही है.. तुम रैना को बुलाओ! हम उसको समझा देंगे...."


लता के पास भी कोई चारा नही था... उसने बाहर से रैना को बुलाया.. प्रिया ने उस'से अपने वस्त्रों का आदान प्रदान किया और सबसे नज़र बचाते हुए लता के साथ राजमहल से बाहर निकल गयी.....


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"ये है राजकुमारी जी; देव का घर!" लता उसको देव के घर के सामने ले गयी....


"इतना छ्होटा घर है हमारे सेनापति का?" प्रियदर्शिनी ने चौंक कर लता की तरफ देखा....


" हां.. पर बाकी सब दरबरीगन तो महलों जैसे घरों में रहते हैं.. शायद इनके लिए निर्मित हो रहा हो!" लता ने राजकुमारी को जवाब दिया...


"ठीक है.. अब तुम वापस जाओ! हम खुद वापस आ जाएँगी..!" प्रिया ने मुस्कुरकर कहा...


"पर.. राजकुमारी जी.. आपको अकेले छ्चोड़ कर....?" लता डरती हुई बोली....


"हम कोई दुश्मन के घर नही जा रहे.. अपने सेनापति के पास जा रहे हैं.. तुम अपने घर में ही रहना.. जाते हुए हम तुम्हे लेते जाएँगे..." प्रिया ने मुस्कुरकर कहा और अंदर दाखिल हो गयी....


प्रिया को देव घर के छ्होटे से आँगन में ही दिखाई दे गया.. वह बाहर चूल्‍हे पर खाना पका रहा था.. प्रिया को ये देख हैरत हुई.. वह दूर से ही उसको देख रही थी कि देव की नज़र उस पर पड़ गयी. उसने तवे से रोटी उतारी और अदब से उसके पास आकर खड़ा हो गया," जी कहिए?"


देव ने पहनावे के नाम पर सिर्फ़ धोती डाल रखी थी.. चूल्‍हे की आँच से पसीने की बूंदे उसके सूर्ख चेहरे से फिसलती हुई कुच्छ उसकी सखतजान छाती पर और कुच्छ ताप ताप कर नीचे गिर रही थी.. परिश्रम और ताप की अग्नि ने उसके बदन को सोने जैसा बना दिया था.. उसका संपूर्ण जिस्म इतना आकर्षक था कि एक पल को तो प्रिया उसमें ही खोकर सब कुच्छ भूल गयी.. उसके सम्मोहन को तोड़ने के लिए देव को एक बार फिर उसको टोकना पड़ा....


"मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?"


प्रिया हड़बड़ा गयी," हम.. वो मैं.. आप यहाँ अकेले ही रहते हैं क्या?" प्रिया को आख़िर कुच्छ सूझ ही गया...


"नही! मेरा अकेलापन भी साथ रहता है.. आप यहाँ पधारने का औचित्या बताएँगी क्या?" देव ने मुस्कुरकर जवाब दिया....


"आ..आप हम... मुझे जानते हैं क्या?" प्रिया को लगा रैना का पहनावा यहाँ काम नही आया.. देव इतनी इज़्ज़त से बात कर रहा था कि उसको यही लगा कि देव ने उसको पहचान लिया है.....


देव ने कुच्छ देर उसके चेहरे को गौर से देखा," लगता है कि मैने आपको पहले भी देखा है.. पर ये मेरा भ्रम भी हो सकता है.. क्षमा करना.. मैं खाना बना रहा हूँ.. कुच्छ काम है तो जल्दी बताइए..!"


प्रिया कुच्छ नही बोली.. अपलक उसको देखती रही.. कुच्छ पल और वहाँ खड़ा रहने के बाद देव वापस लौट गया.. अपने 'चूल्‍हे' पर...


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कुच्छ देर बाद देव ने वापस मुड़कर देखा.. प्रिया वहीं खड़ी थी.. देव के माथे पर सिलवटें पड़ गयी,"बताएँगी भी आप कि बात क्या है?"


प्रिया धीरे धीरे चलती हुई देव के पास जा पहुँची,"सुना है; आप इस राज्य के सेनापति हैं! फिर खुद ये कष्ट क्यूँ उठा रहे हैं? आप नौकर चाकर भी तो रख सकते हैं! ये घर बड़ा बनवा सकते हैं.. आराम से रह सकते हैं...आप!"


देव ने चूल्‍हे की रख बूझकर अपनी बनाई हुई रोटियाँ उठाई और अंदर चल पड़ा.. कुच्छ बोला नही.. प्रिया भी उसके पिछे पिछे आकर दरवाजे पर खड़ी हो गयी... दरवाजा सिर्फ़ नाम का ही था.. छत के नीचे जाने का रास्ता था बस!


देव ने ज़मीन पर चटाई बिच्छाई और खड़ा होकर फिर प्रिया की और देखा.. और औपचारिकतावश पूच्छ लिया,"भोजन करेंगी आप?"


"हां!" प्रिया ने झट से कहा और अंदर चटाई के पास जाकर खड़ी हो गयी..


देव उसके जवाब देने के तरीके पर मुस्कुराए बिना ना रह सका.. प्रिया की 'हां' में कोई लाग-लपेट नही थी.. कोई झिझक नही थी.. उसने तो इस तरह 'हां' कह दिया जैसे किसी ने उसके अपने ही घर में पूचछा हो.. कम से कम धन्यवाद ही कह देती...," आओ बैठो!" देव ने एक बार फिर मुस्कुरकर कहा और बीच में खाना रख कर एक तरफ बैठ गया...


प्रिया खाना खाते हुए बीच बीच में रुक कर देव के चेहरे को देखती रही.. ना जाने कैसे! ना जाने क्यूँ! पर देव उसके दिल में उतर गया था....


खाने में भी उसको एक अजीब तरह की मिठास लगी... एक अजीब से 'अपनेपन' की मिठास!


"आप भूखे रह गये होगे?" प्रिया खाने के बाद देव को टुकूर टुकूर देखने लगी...


"हा हा हा..." देव खिलखिलाकर हंसा,"ये तो आपको पहले सोचना चाहिए था.. खैर.. मैं भूखा नही रहा.. मेरी गाय भूखी ज़रूर रह गयी.. आपने उसके हिस्से का खाया है" देव ने उंगली से घर के पिच्छवाड़े बँधी 'गौ' की और इशारा किया," कोई बात नही.. मैं और बना लूँगा... देव हंसता हुआ ही बोला और बर्तन उठा कर बाहर चल दिया......


"आपने बताया नही.. आप ये सब खुद क्यूँ करते हैं?" प्रिया भी उसके साथ ही बाहर निकल गयी.....


"मुझे आता है..खुद करना! मुझे अच्च्छा लगता है.. खुद करना!.. इसीलिए " देव ने कहा और बाहर नल के पास बर्तन रख दिए,"पर आपने अभी तक नही बताया की आप कौन हैं और यहाँ क्यूँ आई हैं ....?"


"पता नही.. मैं कल फिर आ सकती हूँ क्या?" प्रिया ने आधे सवाल का जवाब दिया और एक सवाल पूच्छ लिया....


"अगर खाना खाने ही आ रही हैं तो पहले बता दीजिए.. मैं पहले से ज़्यादा तैयार करके रखूँगा..."देव ने हंसते हुए कहा....


"हाँ.. खाना भी खाएँगे!" प्रिया ने मुस्कुरकर कहा और बाहर निकल गयी....


"राजकुमारी कहाँ हैं?" राजमाता ने प्रियदर्शिनी के कक्ष में आते ही द्वार पर खड़ी दासी से सवाल किया....


"व्व...महारानी... वो..." दासी के चेहरे पर भय की लकीरें उत्तपन्न हो गयी.....


"कहाँ हैं राजकुमारी?" दासी के हाव भाव देख कर राजमाता की भृकुटियाँ तन गयी...


"वो .. हमने राजकुमारी को रोकने की कोशिश की थी महारानी.. पर उन्होने हमारे अनुग्रह पर गौर नही किया... ववो.. रसोई घर में हैं..." दासी ने सिर झुकाए अटक अटक कर अपनी बात कही...


"रसोई घर में? वहाँ जाने का उनका क्या प्रायोजन है...?" राजमाता तेज़ी से रसोई घर की और बढ़ी...


"आप खुद ही जान लीजिए महारानी!" दासी उनके पिछे पिछे चल रही थी...


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राजकुमारी प्रिया रसोई घर में अपनी उंगली को दूसरे हाथ की मुट्ठी में दबोचे खड़ी थी.. राजमाता को देखते ही प्रिया मुस्कुराने लगी,"माता श्री!"


"यहाँ क्या कर रही हो तुम? ....और ये... ये क्या कर लिया?" राजमाता ने नाराज़गी भरे लहजे में पूचछा....


"ववो.. हम भोजन तैयार करना सीख रहे थे माता श्री! हुल्की सी छुरि लग गयी...." प्रिया ने उनकी नाराज़गी को भाँप कर अपना सिर झुका लिया...


"भोजन तैयार करना?" राजमाता ने आस्चर्य से कहा," तुम्हे इसमें कब से रूचि हो गयी? और फिर तुम्हे ये सब सीखने की क्या ज़रूरत है प्रिया? तुम्हारे पास हमेशा सैंकड़ों नौकर चाकर रहेंगे... तुम्हारे हर आदेश को पूरा करने के लिए... छ्चोड़ो ये सब!" महारानी ने गुस्सा होकर कहा और उसको बाहर लेकर आते हुए दासी को आवाज़ लगाई," वैद्य जी को बुलाओ; राजकुमारी का हाथ कट गया है! ()


"पर माता श्री! हूमें खुद काम करना अच्च्छा लगता है.. भगवान ने हमें भी दो हाथ दिए हैं.. काम करने को...." कहते हुए प्रिया के सामने देव का चेहरा साक्षात हो उठा....


"ये भूत तुम पर कब और कैसे सवार हो गया..? हम राज्य के राजा हैं... हम शासन करते हैं.. भगवान ने हमें ये हाथ आदेश और निर्देश देने के लिए दिए हैं.. काम करने के लिए नही..." राजमाता ने गर्व से सिर उपर करके कहा...


"पर माता श्री.....?"


"बस! हम कुच्छ नही सुन'ना चाहते...! तुम्हारा कितना खून बह गया होगा.. जब तक वैद्य जी नही आ जाते.. तुम आराम करो यहीं !" राजमाता ने आदेश दिया...


"पर हमें पिता श्री ने बुलाया है; माता श्री?" राजकुमारी ने निवेदन किया...


"बाद में..!" राजमाता ने कहा और राजकुमारी के शयन कक्ष से निकल गयी....


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"पिता श्री! हमारे देश का सेनापति झौपदी जैसे निवास में क्यूँ रहता है?" रात को राजकुमारी महाराज से बतिया रही थी....


महाराज उसकी तरफ देख कर मुस्कुराए," पर आपको कैसे पता; राजकुमारी?"


"ववो.. हमें हमारी सहेली ने बताया... उसका घर उनके पास ही है..." राजकुमारी ने बड़ी सफाई से झूठ बोल दिया....


"हूंम्म्मम..." महाराज ने बोलने से पहले एक लंबी साँस ली...," हुमने आपको बताया ही था.. सेनापति के पद को स्वीकारने से पहले उसने हमारे सामने कुच्छ शर्तें रखी थी.. उसका अपने पुराने निवास पर ही रहना और कोई राजकीय लाभ ना लेना ही वो शर्तें थी बेटी! हमें भी ये सब कुच्छ अजीब लगा था.. पर दिल से कहूँ तो हम उसके इस महान चरित्र को नमन करते हैं.. ऐसे सतपुरुष अब दुर्लभ हैं बेटी... खैर.. हमने तुम्हे किसी खास प्रायोजन से यहाँ बुलाया है..."


"बोलिए, पिता श्री!" राजकुमारी ने विनम्रता पूर्वक कहा....


" पड़ोस के हमारे मित्र राजा की ओर से अपने पुत्र अभिषेक के साथ आपके विवाह का प्रस्ताव आया है.. मैं इस बारे में आपकी राइ जान'ना चाहता हूँ..." महाराज ने बड़े संतुलित मंन से उसके सामने बात रखी....


सुनकर राजकुमारी एकद्ूम विचलित हो गयी, कल की घटना ने उसकी सोच और सपनो को पूरी तरह बदल दिया था," आप.. स्वंबर क्यूँ नही करवा लेते पितश्री?.. जैसे तलवारबाजी!"


महाराज प्रिया की बात सुन'कर हँसने लगे," हमने खुद पहले ऐसा ही सोचा था राजकुमारी.. पर उस दिन जिस तरह राजकुमार के हार जाने के बाद अपमानित महसूस करके, देव ने खुले आम सबको चुनौती दी.. और चुनौती ही क्या दी? एक एक करके उसने जिस तरह सारे दंभी राजकुमारों की नाक काटी.. उस'से हमें शक है कि शायद ही कोई योग्य उम्मीदवार स्वयंवर में आएगा...


दूसरे, परंपरा के अनुसार स्वयंवर को हम सिर्फ़ राजकुमारों तक सीमित नही रख सकते.. हर क्षत्रिय को उसमें भाग लेने का अधिकार होगा.. और देव भी एक क्षत्री ही है.. मुझे नही लगता कि कोई उसके सामने आस्त्र, शस्त्रा या मल्ल में टिक पाएगा.. वो एक सच्चा योगी है बेटी.. उस'से पार पाना मुश्किल है.. पर हां.. हम उस'से बात करके स्वयंवर में भाग ना लेने के लिए मना सकते हैं.. अगर ऐसा संभव हो गया तो मैं इस'पर विचार कर सकता हूँ..." महाराज ने अपने मॅन की बात उसके सामने रख दी....


"हमें अभी विवाह नही करना पिताश्री!" अपने गुस्से और निराशा को राजकुमारी सिर्फ़ यही कहकर निकल पाई...



देव चटाई पर अपने सामने भोजन लगाकर बैठ गया... कुच्छ देर नज़रें झुकाए मंन ही मंन देव मुस्कुराता रहा और फिर बाहर द्वार की और देखने लगा... शायद उसको किसी की प्रतीक्षा थी.. शायद राजकुमारी की!


हालाँकि राजकुमारी का आना निस्चित नही था.. और ना ही वह आज फिर आने का वादा ही करके गयी थी.. पर फिर भी जाने क्यूँ; देव की आँखें उसके आने की राह देख रही थी...


देव के निवास पर राजकुमारी पिच्छले 15 दिन में अब तक पाँच बार आ चुकी थी.... राजकुमारी राजमहल से बाहर निकलने के लिए मिले किसी मौके को गँवाती नही थी... और सीधे अपने दिल में बस चुके देव के पास पहुँच जाती थी.


देव को अब उसका आगमन अप्रत्याशित नही लगता था. नित्य प्रति अब वह सुबह तीन लोगों के लिए भोजन तैयार करता था.. राजकुमारी आए या नही!


देव को अहसास था कि 'वो' अंजान यौवना उसके आकर्षण में ही बँधी उसके निवास तक पहुँच जाती है.. पर उसकी मनमोहक छवि और बेबाक स्वाभाव देव को भी भा गया था. सच तो ये था की देव खुद को भी उसके मोहज़ाल में जकड़ा हुआ सा महसूस करने लगा था....


राजकुमारी के स्वर्ग की अप्सराओं के समान सुंदर गौरांग, उन'की कजरारी म्रिग्नयनि आँखें, सागर में ज्वर के समान उफानता हुआ उनका अल्हड़ यौवन, उनके मस्तक पर विराजमान यशस्वी तेज; और इस अद्वितीया वैभव की स्वामिनी होने के बावजूद उसके चेहरे की मृदुल (कोमल) मुस्कान और सीधा सच्चा स्वाभाव; उनकी हर बात से झलकता उसका भोलापन बरबस ही देव को अपनी और खींचता हुआ ला रहा था...


हालाँकि अभी भी देव उसको राजकुमारी के रूप में नही, एक अल्हड़ नाव यौवाना के रूप में ही जानता था; जो ना जाने कहाँ से उसके जीवन में आ गयी थी. देव ने कभी जान'ने की कोशिश भी नही की.. एक दो बार देव ने पूचछा भी; पर प्रिया ने हंसकर टाल दिया..


जो भी था, पर कहने की ज़रूरत नही कि देव को भी अब अकेलापन अखरने लगा था. उसको भी अब हमसफर की ज़रूरत महसूस होने लगी थी.. और हमसफ़र के रूप में प्रियदर्शिनी की!


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"एक बात कहने का मंन है... कह दूँ?" अपनी अगली मुलाक़ात में प्रिया ने देव से कुच्छ कहने की अनुमति माँगी... वो देव से प्र्याप्त दूरी बनाए बैठी थी...


"बोलिए!"


"इस एकांत में कैसे रह लेते हैं आप?... आप अपने लिए कोई सुन्दर सी कन्या देख कर विवाह क्यूँ नही कर लेते?" झिझकते हुए राजकुमारी ने अपने दिल में रह रह कर उठ रहे उफान को देव के सामने प्रकट कर ही दिया...


देव ने मुस्कुरकर अपनी ही और देख रही उसकी कामिनी आँखों में झाँका और फिर हँसने लगा," कौन करेगी मुझसे विवाह? कौन मुझ जैसे फक्कड़ (ग़रीब) के साथ रहकर अपने जीवन को रसातल में धकेलना चाहेगी? मैं ऐसे ही ठीक हूँ.. "


प्रिया अधीर सी होकर बोली... ,"क्यूँ? क्या नही है आपके पास? शायद ये आपका हथ (ज़िद) ही होगा कि आप ये 'जीवन' बिता रहे हैं.. वरना तो आपकी आँखों के इशारे से ही आपके लिए जीवन-न्योचछवर करने वाली एक से एक सुंदरी आपके कदमों में रहकर जीवन भर आपकी सेवा को तत्पर नज़र आयेंगी.


आप इस राज्य के सेनापति हैं.. आप चाहें तो एक पल में आप अपना जीवन वैभावपूर्ण बना सकते हैं. आपके 'हां' कहते ही इस कुटिया (शेड) को छ्चोड़ कर महलों के अधिकारी हो सकते हैं. सैंकड़ों नौकर चाकर आपके इशारा करते ही आपकी सेवा में उपस्थित हो सकते हैं... सिर्फ़ आपके इशारा करने की देर है..."


"हां.. एक दम सही कह रही हैं आप.. राज्य के सेनापति से विवाह की इच्च्छुक कौन नही होगी..? महलों में जीवन बिताने के लिए कौन तत्पर नही होगी? पर मुझे लगा आपने सेनापति से नही 'देव' से सवाल किया है.. मैं हमेशा सेनापति नही था.. और ना ही हमेशा रह सकता हूँ. मेरे साथ सिर्फ़ मेरा नाम जुड़ा हुआ है.. और वो हमेशा मेरे साथ रहेगा.. शायद मरने के बाद भी..!मेरा हक़ सिर्फ़ मेरी 'देह' (शरीर) पर है" देव ने कोहनी मोड़ कर अंगूठा अपनी ठोस छाती में गाड़ते हुए कहा


देव लगातार बोल रहा था," मैं जिंदगी भर के लिए अपनी होने वाली अर्धांगिनी को महलों में रखने का वादा नही कर सकता. और जो वादा में निभा ना सकूँ, उसका दावा भी कभी मैं करता नही... हां; अपने दिल में रखने का वादा कर सकता हूँ.. अपनी पलकों पर बैठा कर... इसीलिए सिर्फ़ मैं अपने बारे में ही बात करता हूँ.. क्षण भन्गूर ( पल भर में नष्ट हो सकने वेल) वैभव (शनो- शौकत) से अलंकृत (सज्जित) होकर मैं किसी को अपना लूँ; उसका क्या लाभ?"


प्रिया सम्मोहित सी होकर देव की बातें सुन रही थी.. जो अब भी जारी थी," इसीलिए मैने अपने बारे में बात की थी देवी; मेरे औहदों या मेरी क्षमताओं के बारे में नही.. महलों में जीवन यापन करने का सपना लिए इस राज्य के सेनापति से तो विवाह की इच्च्छुक हज़ारों लड़कियाँ हो सकती हैं.. पर इस फक्कड़ 'देव' से शादी करने को कौन अभागिन तैयार होगी?" देव अपनी बात पूरी करके उसकी तरफ देखकर चिरपरिचित अंदाज में मुस्कुराने लगा....


राजकुमारी देव की बात पूरी होने पर व्याकुल सी होकर खड़ी हुई और उसकी तरफ 2 कदम बढ़कर खड़ी हो गयी.. उसकी आँखों में सच्चे प्रेम का अतः सागर हिलौरे ले रहा था.., "मैं....! मैं विवाह करना चाहती हूँ इस देव से! मुझे महलों से प्यार नही.. मैं सिर्फ़ आपके व्यक्तिताव से प्यार करती हूँ.. मेरा सौभाग्य होगा अगर मुझे पुरुषश्रेष्ठ के चरणों में जीवन यापन का सौभाग्या प्राप्त हो..." अपनी बात कहकर प्रिया देव को जनम जनम की सी प्यासी आँखों से निहारने लगी....


देव कुच्छ पल को तो जैसे स्वयं को ही भूल गया.. अपलक प्रिया के शोख चेहरे को देखता हुआ कुच्छ देर बाद बोला," वस्तुत: यह मेरा ही सौभाग्य होगा अगर आप जैसी सर्वगुण संपन्न नारी मुझे पति रूप में स्वीकार करे.... पहले दिन के बाद से ही आप मेरे दिल में निवास करती हैं... मैं प्रयातन करके भी आपके जाने के बाद अपने आपको आपके साथ बिताए पलों के बारे में विचारने से रोक नही पाता हूँ.... "


देव ने आगे कहा," किंतु सत्य कहूँ तो मैं अब तक भी आपके विषय में जान लेने को बेकरार हूँ.. आपने अभी तक भी नही बताया है कि आप कौन हैं? मुझे हमेशा प्रतीत होता है कि मैने आपको पहले भी कहीं देखा है.. पर कहाँ देखा है.. ये स्मरण (याद) नही है..."


राजकुमारी ने मानो देव की बातें ही आगे बढ़ाई हों...


"क्या आपके द्वारा विस्तार से कही गयी बातें मुझ पर लागू नही होती? मैं भी तो वही सब कह सकती हूँ.. मैं जो भी हूँ, आपके सामने हूँ.. मेरे बारे में और ज़्यादा जान'ने को व्याकुल होकर तो आप अपनी ही बातों का खंडन कर रहे हैं.... मेरे पास सिर्फ़ एक दिल है.. आपको देने के लिए.. इसको आप स्वीकार करें या ना करें.. पर ये अब सदेइव आपका ही रहेगा.... मेरी प्रकृति और स्वाभाव के बारे में आप और जान'ना चाहें तो मैं इंतजार कर सकती हूँ.. पर जब भी आप मुझसे सवाल करेंगे.. मेरा जवाब हमेशा यही होगा.. मैं 'देव' से प्यार करती हूँ!.. अब ये आप पर है.. आप अपनी दीवानी हो चुकी इस 'नाचीज़' को स्वीकारते हैं या नही..."


देव प्रेम विभोर में खड़ा होकर छलक सा उठा.. आँखों में आँसू होने पर भी उसके होंटो पर एक अद्भुत सी मुस्कान थी... कुच्छ देर प्रिया को अपलक निहारने के बाद उसने अपनी बाहें फैला दी.. राजकुमारी की ओर...


अपने आगोश में समेट लेने के लिए उठी देव की भुजाओं को अपनी और बढ़ी देख कर प्रिया भी खुशी से पागल सी हो गयी.. एक पल के लिए उसने अचरज और लज्जा के मारे अपने चेहरे को अपने ही हाथों से ढक लिया.. फिर चेहरे को ढके हुए हाथों की अंगुलियों को हल्का सा खोल कर उनके बीच से झरोखा बनाया और अपने 'अनुपम' देव के चेहरे को निहारने लगी...


देव अब भी मुस्कुराता हुआ उसके इंतज़ार में बाहें फैलाए खड़ा था... प्रिया ने अपने हाथ हटाए और लज्जा के बोझ से पलकों को झुका लिया.. कुच्छ देर विचार्मज्ञ होकर जाने क्या क्या सोचती रही फिर अचानक एक ही झटके में 4 कदम की मीलों लंबी लग रही अपने और देव के बीच की दूरी को नाप दिया... प्रिया देव के जिस्म से किसी नाज़ुक बेल की भाँति काफ़ी देर तक चिपकी हुई खड़ी रही....


अपने बहुपाश में प्रिया को समेटे खड़े देव ने पूचछा...," नाम तो पूच्छ ही सकता हूँ ना.....! या वो भी स्वयं मुझे ही देना पड़ेगा!"


देव के आगोश में सिमटी खड़ी प्रिया को अचानक दुनिया बहुत बड़ी और बुरी लगने लगी.. उसको लगा जैसे अगर अब वा देव से अलग हुई तो वापस उसकी बाहों में नही लौट पाएगी," मैं आपको सब कुच्छ बताने को तैयार हूँ देव.. पर वादा करो, चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ उत्पन्न हों.. आप मेरा हाथ कभी नही छ्चोड़ोगे... मुझे अभी स्वीकार कर लो! मुझे अभी अपना बना लो!"


देव ने अपनी भुजाओं की पकड़ प्रिया की कमर पर हल्की सी सख़्त कर दी.. च्छुईमुई की तरह इस अहसास से कसमसा उठी प्रिया अपने देव में ही सिमट गयी," वादा रहा!" देव ने कहा....


"तो मैं भी वादा करती हून देव!.. हमारी अगली मुलाक़ात में आप को मेरे बारे में सब कुच्छ पता चल जाएगा!"


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प्रिया उस दिन देव के घर से निकली तो वो राजकुमारी नही रही थी.. रानी बन चुकी थी.. अपने हो चुके देव के सपनों की रानी! पहले प्यार के स्वर्णिम और स्वप्निल अहसास के बाद वा स्वयं को सातवें आसमान से भी उपर महसूस कर रही थी... उसके खिले खिले चेहरे की रंगत और मुस्कान आज देखते ही बन रही थी...


लता ने जब उसको देखा तो आस्चर्य से पूचछा...," आज क्या मिल गया राजकुमारी जी?"


"सब कुच्छ मिल गया! हे हे हे.. चलो जल्दी....!" प्रिया के कदम ज़मीन पर नही पड़ रहे थे.........


" महाराज!..... मैं, महिपाल, महाराज वेदवरत के द्वारा आपके लिए भेजे हुए इस अतिविशिष्ट संदेश को आप सबके सम्मुख उचचरित करने के लिए आपके द्वारा आग्या दिए जाने का पात्र हूँ....!"


पड़ोसी राज्य से आए दूत ने महाराज से संदेश पढ़ने की अनुमति माँगी... राजकुमारी प्रियदर्शिनी के अलावा महारानी भी उनके साथ ही उपस्थित थी!


संदेश पढ़ने की आगया देने से पहले ही महाराज के माथे पर चिंता की हल्की हल्की लकीरें दिखाई देने लगी," कहो दूत! क्या संदेश भेजा है हमारे मित्र वेदवरत ने!"


"महाराज, उन्होने संदेश भेजा है कि..," बोलते हुए दूत ने संदेश पत्रिका को खोल लिया और उसमें से पढ़ कर बोलने लगा


" आपने हमारे सुपुत्रा राजकुमार अभिषेक के ; आपकी सुपुत्री ; सुकुमारी प्रियदर्शिनी के साथ ; विवाह-संबंध जोड़ने के हमारे मित्रवट प्रस्ताव को ठुकराकर; और ; राजकुमारी प्रियदर्शिनी के विवाह हेतु स्वयंवर की शर्त पर आड़े रखकर; दोनो राज्यों के बीच वर्षों से चली आ रही मैत्री का ; एक पल में ही ; बड़ी क्रूरता से गला घोंटने जैसा काम किया है.


हम चाहते हैं कि आप इस संबंध में तुरंत विचार करके हमारे दूत के हाथों ही आपका अंतिम फ़ैसला ; शीघ्र अतिशीघ्र हम तक पहुँचा दें. अन्यथा, आज के बाद से आपके राज्य पर हमला करके ; आपके राज्य और सुकुमारी राजकुमारी को बलपूर्वक हथिया लेने के हमारे सभी विकल्प सुरक्षित रहेंगे!"


संदेश पढ़ने के बाद दूत ने संदेशपत्रिका को बंद किया और आदर सहित झुक कर खड़ा हो गया...


महाराज के साथ ही राजकुमारी प्रियदर्शिनी और साथ बैठी महारानी भी तिलमिला उठी.. महारानी के चेहरे पर गुस्से के साथ साथ भय भी अलग ही पढ़ा जा सकता था.. दोनो महाराज के जवाब का इंतजार करती हुई उनकी और देखने लगी.....


कुच्छ देर चुप रहने के बाद महाराज ने बोलना शुरू किया," दूत! जाकर उनसे कह देना कि मित्रता का खून हमने नही, ऐसा नापाक संदेश भेज कर उन्होने किया है.. हिंदू धर्म में स्वयंवर कोई नयी परंपरा नही रही है.. फिर भी हमने दोस्ती की खातिर राजकुमारी से उनकी राइ ली. राजकुमारी के सपस्ट मना करने के पासचात हमारे पास सिवाय इस प्रस्ताव को ठुकराने के कोई और रास्ता नही बचा है..


हम राजकुमारी की इच्च्छा के अनुसार स्वयंवर आयोजित करवाने को बद्ध्य हैं.. और अब तो सिर्फ़ स्वयंवर ही होगा. अगर उनकी भुजाओं में सच्चे क्षत्रिय का खून है तो कुमार अभिषेक स्वयंवर में आयें, और अपना दम दिखायें!


उनको कहना कि हमारे देश के सैनिकों में ही नही; बच्चे बच्चे में 'देव' बन'ने का जुनून सिर चढ़ कर बोल रहा है; जो अब हमारी सेना का नेतृतव करता है.. उनके द्वारा की गयी हम'ले जैसी कोई भी जुर्रत ना-काबिल-ए-बर्दस्त होगी. "


महाराज की बात सुनकर दूत ने अदब से सिर झुकाया और निकल गया....


"महाराज! आप मान क्यूँ नही लेते.. हमारा उनके साथ क्या मुक़ाबला हो सकता है.. !सेना और संसाधनों में वो हमसे मीलों आगे हैं.. अगर उन्होने हम'ला कर दिया तो हम क्या करेंगे?" महारानी सहमी हुई थी...


"महारानी! क्षत्रिय कभी दुश्मन को कमजोर या ताकतवर आँकने के बाद मुक़ाबले का मंन नही बनाते! यहाँ जुंग आन, बान और शान के लिए लड़ी जाती है.. उसमें अगर अपना सिर भी कलाम हो जाए.. तो भी परवाह नही!" महाराज एक एक शब्द को गुस्से में चबा चबा कर बोल रहे थे...," उनके संदेश की भाषा से सॉफ है कि उन्होने राजकुमारी का हाथ नही, हमारी इज़्ज़त माँगी है... अब चाहे कुच्छ हो जाए.. राजकुमारी का स्वयंवर होकर रहेगा.....!"


महाराज मारे गुस्से के काँप से रहे थे.... महारानी उठकर चली गयी..


पर प्रियदर्शिनी अब भी वहीं बैठी थी... उसको अब एक और चिंता सता रही थी.. ...कहीं महाराज ने देव को उस'से वादा करने से पहले ही स्वयंवर में भाग ना लेने का वादा तो नही ले लिया!...राजकुमारी को तो पता भी नही था कि कब महाराज ने स्वयंवर का फ़ैसला ले लिया......," पिता श्री! आपने हमारे स्वयंवर का फ़ैसला कब ले लिया?"


"अभी हमने फ़ैसला नही लिया था राजकुमारी.. सिर्फ़ उस कम्बख़्त का प्रस्ताव ठुकराते हुए तुम्हारी राइ से सहमत होने की सूचना ही दी थी.. पर अब तो हर हाल में स्वयंवर होगा... वो भी जल्द से जल्द! हम कल ही सब राज्यों में सूचना प्रेषित करवा देते हैं.." महाराज बेटी का चेहरा देख कर कुच्छ शांत हुए....


"पर... क्या आपने.... देव से बात कर ली है.. इस बारे में..?" प्रिया ने संकुचित सी होते हुए बात कही......


महाराज निसचिंत से होकर बोले..,"देव की चिंता करने की ज़रूरत नही है राजकुमारी... उसको तो बस कहने भर की देर है.. हमें विश्वास है कि वो हमारे आग्रह को कभी नही टालेगा!"


"पर तब भी...." प्रिया को सुनकर गहरा संतोष हुआ," पिता श्री! हम चाहते हैं की आप एक बार उनसे बात कर लें.. जल्द से जल्द! और हम चाहेंगे कि उस वक़्त हम भी वहीं उपस्थित रहें...."


"जैसी तुम्हारी इच्च्छा राजकुमारी! हम कल ही उसको अपने पास बुलवा लेते हैं.. आप भी हमारे साथ रहना! हमें यकीन है की कल आप देव के एक और रूप के बारे में जान जाएँगी!" महाराज के चेहरे पर देव को याद करने मात्र से ही रौनक़ आ गयी....


देव ने दनदनाते हुए सेनापति की वेशभूषा में राजमहल में प्रवेश किया.. मुख्य द्वार पर खड़े दोनो द्वारपालों ने अदब से अपना सिर झुका लिया...


"महाराज कहाँ हैं?" देव ने अंदर पहुँच कर वहाँ खड़े एक और संतरी से पूचछा...


"महाराज अपने विश्राम गृह में आपकी की राह देख रहे हैं सेनापति जी!" संतरी ने अदब से उत्तर दिया," मुझसे कहा गया है कि मैं आपको वहाँ तक छ्चोड़ दूँ! ... आइए!"


संतरी ने कहा और विश्राम गृह की और बढ़ने लगा.. देव ने उसका अनुसरण किया...


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"महाराज! आपकी आग्या के अनुसार मैं सेनापति जी को यहाँ तक ले आया हूँ.. अब आपसे उनको अंदर भेजने की आग्या चाहता हूँ..." संतरी ने देव से पहले विश्राम गृह के अंदर जाकर महाराज से अनुमति माँगी...


राजकुमारी प्रियदर्शिनी उनके साथ ही बैठी थी.. वो अपने देव को सेनापति के वस्त्रों में देखने को लालायित थी.. पर आने वाले पलों के बारे में विचार कर उनका दिल जोरों से धड़कने लगा था...


"हूंम्म.." महाराज ने प्रसन्नचित भाव से कहा," उन्हे आदर सहित अंदर भेज दो!"


"जो आग्या महाराज!" संतरी ने कहा और अपना सिर झुका कर पलटा और बाहर निकल गया....


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सेनापति देव ने विश्राम गृह में प्रवेश करते ही पहले महाराज को तथा फिर राजकुमारी को प्रणाम किया.. किंतु हैरत की बात थी कि उनके चेहरे पर आस्चर्य का कोई भाव उत्तपन्न नही हुआ था.. माथे पर एक शिकन तक नही आई.. शायद उन्होने राजकुमारी के चेहरे पर गौर नही किया था...


उधर राजकुमारी प्रिया देव को इस रूप में देख कर मन्त्र मुग्ध सी हो गयी.. देव के सुन्दर, सुडौल और गतीले बदन पर स्वर्ण वस्त्रों की आभा देखते ही बन रही थी.. रूप, गुण और अलौकिक तेज के प्रभाव से उसकी छवि किसी देश के राजा से किसी भी सूरत में कमतर नही थी. उसके चेहरे की चमक प्रखर सुर्य के तेज के समान ही प्रतीत हो रही थी... उसकी छवि को चार चाँद लगाने वाली उसकी भावभीनी मंद मुस्कान अब भी उसके साथ थी....


"अपना स्थान गृहन करें सेनापति जी!" महाराज ने देव को आदर सहित उनके सामने बैठने का आग्रह किया....


"जो अग्या महाराज!!" देव ने समुचित आदर से अपना सिर झुकाया और महाराज के सामने सिंहासन पर विराजमान हो गया," महाराज, अचानक मुझे यहाँ आमंत्रित करने का कोई विशेष कारण?" देव ने महाराज से नज़रें मिलाते हुए पूचछा....


"जी, सेनापति जी! कारण अतिविशिष्ट है.. इसीलिए हमने आपको अचानक याद किया!" महाराज ने उत्तर दिया...


"कहिए महाराज!" देव ने राजकुमारी की ओर अब तक भी गौर नही किया था...


"दरअसल हम राजकुमारी प्रियदर्शिनी के विवाह हेतु शीघ्रता से एक स्वयंवर आयोजित करने का मंन बना रहे हैं....!" महाराज ने बात की भूमिका बाँधी..


"तो इसमें अड़चन क्या है महाराज? आप जब चाहें, स्वयंवर की तैयारी शुरू करवा सकते हैं.. इस पवित्र कार्य में अगर मैं किसी प्रकार की सहायता कर सकूँ; यह मेरा सौभग्य होगा!" देव ने सहजता से कहा...


"जी, सेनापति जी! कारण अतिविशिष्ट है.. इसीलिए हमने आपको अचानक याद किया!" महाराज ने उत्तर दिया...


"कहिए महाराज!" देव ने राजकुमारी की और अब तक भी गौर नही किया था...


..


"हूंम्म.. हम आपके उच्च आदर्शों एवं प्रखर व्यक्तिताव के कायल हैं सेनापति जी! आप निसचीत रूप से हमारे राज्य का एक अनमोल रत्न हैं.. आपको सेनापति के रूप में पाकर राज्य गौरवान्वित ही नही; अपितु क्रितग्य भी है. "


"परंतु...." महाराज ने अपने वचन को किंचित विराम देते हुए आगे कहा," तलवारबाज़ी प्रतियोगिता में आपने जिस प्रकार से एक एक करके सभी राजकुमारों का मान मर्दन किया; वो आज तक भी आपके बल कौशल को याद करके सिहर उठते होंगे.. हमें आशंका है कि स्वयंवर में वो राजकुमार भाग लेने से पहले ही आपकी उपस्थिति को भाँप कर मैदान ना छ्चोड़ दें.." महाराज ने बात पूरी करके एक लंबी साँस ली....


"मैं.. समझा नही महाराज! स्वयंवर में मेरी उपस्थिति किस प्रकार से उनके भाग लेने में बाधक हो सकती है?" देव ने कहा और फिर स्वयं ही अपने प्रशन का उत्तर देने की कोशिश की," ओह्ह.. कहीं आप ये सोचकर तो परेशान नही हैं कि मैं स्वयंवर....."


महाराज ने देव की बात पूरी होने से पहले ही बोलना शुरू कर दिया," हाआ! आप सही समझ रहे हैं सेनापति जी! हमारी दुविधा का मूल कारण यही है.. हम चाहते हैं की आप स्वयंवर से पहले ही सार्वजनिक उद्-घोसना कर दें कि आप स्वयंवर में भाग नही ले रहे हैं...!"


देव के होंटो पर मुस्कान को और लंबी होते देख राजकुमारी प्रियदर्शिनी की हृदय गति बढ़ गयी.. अब तक उनको भी विश्वास हो चुका था कि देव ने अभी उन्हे राजकुमारी के रूप में पहचाना नही है... उनको आशंका थी कि कहीं देव बिना उनको पहचाने ही महाराज को स्वयंवर से अलग होने का वादा ना कर दें.. चिंतित राजकुमारी महाराज की अनुमति लिए बगैर वार्ता में हस्तक्षेप ना करने का नियम भूल कर सीधी वार्ता में कूद पड़ी," हमने सुना है कि आप अपना वादा हर प्रिस्थिति में निभाते हैं.....देव!"


जानी पहचानी सी आवाज़ और राजकुमारी के मुख से इस तरह अपना नाम सुनकर देव की नज़रें क्षण भर के लिए राजकुमारी से जा टकराई.. राजकुमारी को अपनी साँसों पर काबू पाना मुश्किल हो रहा था.. देव पर तो मानो अचानक व्ज्रापात सा हो गया.. उसकी हालत तो देखते ही बनती थी.. अपने चेहरे पर घोर आस्चर्य के भाव लिए देव उसी क्षण सिंहासन से उठ खड़ा हुआ. सब कुच्छ भूल कर वो एकटक आँखें चौड़ी किए राजकुमारी को देखता ही रह गया....


"ये अचानक आपको क्या हुआ सेनापति? सब कुशल तो है? आप यूँ अचानक खड़े क्यूँ हो गये? अपना स्थान गृहन करें!" देव की हालत देख महाराज के मंन में उथल पुथल सी मच गयी....


" क्षमा करना महाराज! पर मुझे अपना वादा निभाने के लिए स्वयंवर में भाग लेना ही होगा!" देव ने सिर झुका कर कहा..


राजकुमारी को क्षणिक शांति का रसास्वादन करने का मौका मिल गया... पर ये शांति की अनुभूति क्षणिक ही थी.....


"ये आप क्या कह रहे हैं सेनापति!" महाराज का कंठ अगले ही पल तनिक अवरुद्ध सा हो गया.. विचलित होकर उन्होने अपनी बात आगे बढ़ाई....," मैं आपका तत्प्राया समझा नही... कौनसा वादा?"


"क्षमा करें महाराज! पर मैने कदापि स्वपन में भी नही सोचा था कि जिनको मैं अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर चुका हूँ; और इस जनम में हर परिस्थिति में उनको उनका हाथ थामे रहने का वादा कर रहा हूँ.... वो... इस राज्य की राजकुमारी देवी प्रियदर्शिनी हैं!" देव के शब्दों में हल्की सी आत्मग्लानि स्पस्ट झलक रही थी.. फिर भी उसका कहा गया एक एक शब्द पत्थर की लकीर लग रहा था....


अब बारी महाराज के सिंहासन छ्चोड़ कर खड़े होने की थी.. देव की बात सुनकर जितना और जो उनकी समझ में आया, वो ही उन्हे उनकी रूह तक हिला गया," ये क्या मज़ाक है सेनापति! हम ऐसा कोई नीच प्रायोजन बर्दास्त नही करेंगे! "


देव के चेहरे के भाव अडिग थे," ये सब अंजाने में हुआ है महाराज! पर हो चुका है... मैं राजकुमारी से और राजकुमारी मुझसे प्रेम करती हैं!"


"हां.. पिता श्री! हम देव के बिना नही रह सकते! देव ही हमारे सपनों के राजकुमार हैं.. अब वो ही हमारे आरद्ध्य हैं पिता श्री!" प्रिया ने तड़प कर महाराज को अपनी सहमति और देव के प्रति अगाध प्रेम से अवगत करवाया!


"बकवास बंद करो राजकुमारी! हमारी नाक के नीचे ये सब होता रहा; और हमें भनक तक ना लगी!" महाराज प्रिया को दुतकार कर देव से मुखर हुए," तुमने हमारी कृपा और अनुशंसा का अनुचित लाभ उठाया है देव! तुमने हमारे विश्वास का कत्ल किया है.. हम अभी तुम्हे सेनापति पद से विमुक्त करने का आदेश देते हैं...!" महाराज गुस्से में आगबबूला होकर काँप रहे थे...


"जो आग्या महाराज!" देव के चेहरे पर उनके आदेश से तनिक भी प्रभाव ना पड़ा... वो अपना मुकुट उतार कर आगे बढ़ा और उसको महाराज के चर्नो में रख दिया," मैं सपस्ट करना चाहता हूँ महाराज! आज यहाँ आने से पहले मुझे प्रिया के राजकुमारी होने के बारे में किंचित भी ज्ञान नही था...."


"अगर ऐसा है तो इसे अंजाने में हुई ग़लती मान कर सब कुच्छ भूल जाओ! हम तुम्हारे पर्शन्सक हैं.. तुम्हे माफ़ करके सेनापति पद से विमुक्त करने का अपना निर्णय वापस ले लेंगे!!" महाराज का लहज़ा कुच्छ नरम पड़ा.. पर राजकुमारी की साँसें रुकने को थी..


देव के चेहरा चट्टान की तरह सख़्त था," प्रेम अंजाने मैं नही होता, महाराज! हां; अंजाने में मैने सिर्फ़ राजकुमारी से प्रेम संबंध बनाने की भूल की है... पर प्रेम हर स्थिति में शाश्वत है.. जैसे नभ में सूर्य से पृथ्वी का प्रकाशित रहना! मैने इनको अर्धांगिनी के रूप में स्वेच्च्छा से स्वीकार किया है.. और.. इनको जीवन भर साथ रखने का वादा किया है.. मैं अपने वादे पर अडिग हूँ.. जब तक ये चाहेंगी.. मेरी ही रहेंगी.. पर हां! अगर स्वयंवर इनकी इच्च्छा से हो रहा है तो होने दीजिए! मैं स्वयंवर के मध्यम से इनका दिल पन: जीतने की यथासंभव कोशिश करूँगा..!"


"देववववववववव!" महाराज की गर्जना सुन बाहर खड़े द्वारपाल अचानक अंदर की और लपके.. चौकन्ने देव का हाथ तुरंत अपनी तलवार की मूठ पर कस गया... प्रिया पागल सी होकर देव से आलिंगंबद्ध होने को उसकी और लपकी.. पर महाराज ने सख्ती से उसका हाथ पकड़ लिया.. और द्वारपालों को हाथ से इशारा करके बाहर जाने का आदेश दिया....


"पिता श्री! देव हमारी जान हैं.. राजकुमारी होने का गौरव और ये राजमहल, ये वैभव; सब देव के चर्नो की धूल के सामने तुच्छ हैं... हम उनके बिना जिंदा नही रह सकते.. हमें अपनी जान के पास जाने दीजिए, पिता श्री!" बोलते हुए राजकुमारी का पूरा बदन बेचैनी और विवशता से काँप रहा था.. वो भरपूर कोशिश कर रही थी, अपने आपको च्छुदाने की.. पर सफल ना हुई....


महाराज इस'से पहले कुच्छ बोलते, एक दूत ने द्रुत गति से विश्राम गृह में प्रवेश किया," महाराज! अनहोनी हो गयी..." दूत अंदर आते ही बिना सलाम किए हड़बड़ाहट में बोला....


महाराज के तेवर कुच्छ और गड़बड़ा गये..," आज का दिन अपने आप में ही एक उन्होनी है.. कहो! क्या बात है..?" महाराज अभी तक प्रिया का हाथ पकड़े खड़े थे....


दूत ने तुरंत कहना शुरू कर दिया," महाराज; वेदवरत ने आमेर के राजा के साथ मिलकर हम पर हमला करने को सेनायें भेज दी हैं.. हमारे पूर्व सेनापति भी उनसे जा मिले हैं.. उन्होने संदेश भेजा है कि अब भी अगर आप प्रलय से बचना चाहते हैं तो राजकुमारी प्रियदर्शिनी को उनके सुपुर्द कर दें......राज्य पर गंभीर संकट आ गया है महाराज!"


"क्या?" महाराज का शरीर खबर सुनकर ही शिथिल हो गया.. उनके हाथ की पकड़ प्रिया के हाथ से तुरंत ढीली हो गयी.. उनके मुख से एक शब्द भी ना निकला...


प्रिया ने तो जैसे कुच्छ सुना ही नही.. जैसे ही वो महाराज की पकड़ से मुक्त हुई.. देव से आलिंगंबद्ध होने को दौड़ पड़ी, और जाकर 'अपने' देव से लिपट गयी," मुझे यहाँ से ले चलो देव! मुझे यहाँ से ले चलो! मैं यहाँ अब और नही रह सकती.. मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नही रह सकती हूँ.. हम किसी दूसरे राज्य में रह लेंगे... अपना वादा अभी पूरा करो देव.. मुझे ले चलो!" प्रिया की आँखों से आँसू रुकने का नाम नही ले रहे थे...


"मुझे कायर बन'ने पर मजबूर मत करो प्रिया! हमारे राज्य पर संकट है.. मुझे महाराज के अंतिम आदेश की प्रतीक्षा करने दो! निसचिंत रहो! मेरे जीते जी कोई तुम्हे मुझसे दूर नही कर सकता!"


प्रिया देव से पहले की भाँति ही लिपटी रही; अपना सिर उपर उठा उसने महाराज के सामने ही देव के गालों को चूम लिया... पर देव स्थिर खड़ा महाराज की और देखता रहा...


महाराज की आँखें लज्जा से झुक गयी.. अब कोई सेना को संगठित करके युद्ध में उतरने को बचा था तो वो था सिर्फ़ देव! पूर्व सेनापति तो गद्दार निकला!


"क्या आदेश है महाराज?" देव ने सपस्ट शब्दों में महाराज की मंशा पूछि....


महाराज की आँखों में नमी सी दिखने लगी," जीतना असंभव है सेनापति! पर हम कयरों की तरह भाग कर नही.. लड़ कर मरना चाहते हैं....!"


"आप आग्या दीजिए महाराज! मेरे जीते जी कोई राजमहल की तरफ आँख उठा कर नही देख सकता.. जो देखेगा.. आपकी क्षत्रिय सेना उसकी आँखें निकाल लेगी...!" देव की गर्जना राजमहल में गूँज उठी....


" तो जाओ सेनापति! जाकर सेना की कमान सांभलो.. हम कुच्छ ही क्षण में तैयार होकर आते हैं... राज्य को तुम जैसे वीर पर हमेशा नाज़ रहेगा!" महाराज ने भाव विह्ल्ल होते हुए कहा....


"जो आग्या महाराज!" देव ने कहकर अब तक उस'से लिपटी खड़ी प्रिया की आँखों में झाँका," मुझे जाने दो प्रिया.. देश की आन मुझे पुकार रही है.. मैं लौट कर आउन्गा.. वादा करता हूँ...!"


रो रो कर पागल सी हो चुकी प्रिया, देव के वादे पर विश्वास करके पिछे हट गयी.. देव ने एक और आख़िरी बार उसके चेहरे को प्यार से निहारा और आग्या लेकर निकल गया......



द्वारपाल भागता हुआ बदहवास सा राजमहल में आया और महारानी के समक्ष सिर झुका कर खड़ा हो गया,"महारानी! सेनापति देव महाराज के साथ राजमहल पधारे हैं.. महाराज होश में नही हैं.. सेनापति भी उनके साथ अंदर आने की अनुमति चाहते हैं.. आपने आदेश दिया था कि उन्हे महल में प्रवेश ना करने दिया जाए.. हम दुविधा में हैं.. महाराज की वस्तुस्थिति वही आपको बता सकते हैं.. हमें आदेश दीजिए...."


"जल्दी लेकर आओ उन्हे अंदर...!" महारानी महाराज के बेहोश होने की खबर सुनकर इतनी बौखला गयीं कि उन्हे देव के अंदर आने से पहले प्रिया को वहाँ से दूर भेज देने की बात सूझी ही नही...


कुच्छ ही क्षण पासचात देव महाराज को साथ लिए महारानी के सामने उपस्थित हुआ ... देव के शरीर पर कयि जगह ज़ख़्मों के निशान थे और शरीर पसीने से तर बतर था.. उसकी पीठ का घाव तो बहुत ही गहरा था और जान-लेवा प्रतीत हो रहा था... उनकी कमर से खून रिस रहा था.. पर महारानी ने उसके घावों को तवज्जो नही दी...


"क्क्या हुआ इन्हे?" महारानी ने हड़बड़ा कर पूचछा... और शैया पर लेते हुए महाराज की छाती पर आँसू बहाने लगी...


देव की आवाज़ में जल्दबाज़ी झलक रही थी, पर तनिक भी घबराहट और हड़बड़ाहट का समावेश उसमें नही था....


"महारानी जी! घबरईए मत.. ये घायल हो गये हैं और खून बह जाने के कारण शायद बेहोश हो गये प्रतीत हो रहे हैं.. पर चिंता करने जैसी कोई बात नही है... मुझे वापस जाना पड़ेगा.. आप जल्द से जल्द वैद्या जी को बुलवाइए..."


देव की आवाज़ सुन'ते ही उत्साहित होकर राजकुमारी दौड़ी दौड़ी उनके सामने आई.. पर देव का ज़ख़्मों से भरा शरीर और उसकी हालत देख कर उसकी चीख निकल गयी," क्या हो गया देव! ये क्या हो गया आपको?"


रोते बिलखते हुए राजकुमारी देव से लिपट गयी.... उनकी और देख रही महारानी खून का घूँट पीकर रह गयी.. उन्होने तुरंत वैद्या जी को बुलाने का आदेश दे दिया...


"अपने आपको सांभलो प्रिया! कुच्छ नही हुआ है मुझे.. ये तो बहुत ही मामूली जखम हैं.. रणक्षेत्रा तक वापस जाते जाते भर जाएँगे.. आप फिकर ना करें..." देव ने प्रिया को दिलासा देते हुए कहा...


"क्या? अब आप वापस जा रहे हैं.. नही.. हम आपको इस हालत में जाने नही दूँगी.. अपनी हालत तो देखिए ज़रा..." राजकुमारी कहने के बाद देव के सीने पर दिल के पास बने जख्म को देख कर फुट फुट कर रोने लगी....


"मेरा विस्वश कीजिए देवी! मुझे कुच्छ नही हुआ है.. आप पर बुरी नज़र डालने वाले अभिषेक का सिर मैने उसके धड़ से अलग कर दिया है... अब बस एक आख़िरी लड़ाई बची है.. मुझे जाने दीजिए...." देव ने बड़े प्यार से नाज़ुक सी राजकुमारी को अपने शरीर से अलग करते हुए कहा....


"आपको कुच्छ हो गया तो हम जिंदा नही रह पाएँगे.. वादा कीजिए आप जल्द से जल्द वापस आएँगे.." प्रियदर्शिनी देव को कारून निगाहों से देख रही थी....


राजमहल से प्रस्थान के लिए मूड चुका देव पलट कर राजकुमारी के पास आया.. कुच्छ देर तक इस तरह राजकुमारी को देखता रहा मानो अंतिम बार उस चाँद से चेहरे को अपनी आँखों में बसा लेना चाहता हो.. फिर उसकी और देखते हुए मुस्कुराया और अपने गले में पहना हुआ अस्ताधातु यन्त्र (लॉकेट) निकाल कर राजकुमारी को पहना दिया.. राजकुमारी देव के चेहरे की और देखते हुए अवीराल आँसू बहाती रही...


" आपको मुझसे अब कोई अलग नही कर सकता प्रिया.. इस यन्त्र में मेरे जीवन भर के सत्कर्मों का योग निहित है .. मैने आज अपना सब कुच्छ दाँव पर लगा कर भगवान से तुम्हे माँग लिया है.. जनम जनम के लिए..." देव ने राजकुमारी का मस्तक चूमा और पलट गया..


राजकुमारी पुकरती रह गयी," वादा तो करके जाओ देव!"


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अगले दिन लता राजकुमारी के पास आई.. उसका चेहरा इस प्रकार पीला पड़ा हुआ था मानो उस चेहरे से मुस्कुराहट हमेशा हमेशा के लिए गायब हो गयी हो.....


"तुम ऐसे क्या देख रही हो लता.. बता ना क्या खबर लेकर आई है हमारे देव की..!" राजकुमारी विचलित होकर बोली...


लता कुच्छ नही बोली.. बस उसकी आँखों से दो आँसू लुढ़क कर प्रिया की हथेली पर जा गिरे...


"हमें डराना चाहती है ना.. देव आने ही वाला है ना.. देख... देख.. तू जल्दी से बोल दे.. वरना मैं... हम महाराज से तेरी शिकायत करेंगे... हम... देव को भी बता देंगे......"


"लाताआ! तू बोलती क्यूँ नही.. क्या हो गया है तुझे....?" प्रियदर्शिनी अचानक चिल्ला उठी....


"अब... अब बोलने को रह ही क्या गया है राजकुमारी... महाराज... नही रहे.. राजकुमार नही रहे... कुमार दीक्षित का पता नही चल रहा....महारानी ने ..... आत्मदाह कर लिया... " लता के आँसू थमने का नाम नही ले रहे थे.... वह बीच बीच में सिसकियाँ सी लेकर बोल रही थी,"देव...."


"नही.. नही... देव के बारे में हम तेरी कोई बकवास नही सुनेंगे... देव को कोई नही हरा सकता... देव को हमसे कोई नही छ्चीन सकता.. देव सिर्फ़ हमारा है... पिता श्री नही रहे तो क्या हुआ? अब देव ही इस राज्य के राजा हैं... आने दो देव को.. हम तेरी शिकायत उनसे करेंगे... " बोलते बोलते राजकुमारी तक गयी और कुच्छ रुक कर फिर बोलने लगी..,


" बता दे ना सखी.. तू हमें तडपा क्यूँ रही है.. कल ही तो तू हमारे देव के कारनामों के बारे में सुना रही थी.. तू बता रही थी ना.. देव युद्ध भूमि में इस तरह छाया हुआ था, मानो.. मानो सारी दुश्मन सेना को अकेले ही स्वाहा कर देगा.. तू ही बता रही थी ना कि कैसे दुश्मन देश का राजा उनके सामने आने से कतरा रहा था... और देव के सामने आते ही भाग खड़ा हुआ था.... तूने ही तो बताया था की दुष्ट अभिषेक का सिर किस तरह हमारे देव के एक ही वार में काई गाज दूर जाकर गिरा था.... देव तो अपराजय है ना सखी... तू ही तो कल बता रही थी... उनका कोई कैसे सामना कर सकता है.. उनको कोई कैसे मार..... नहियीईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई"


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"नहियीईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई"


बेडरूम से आई इस तेज चीख से रोहन और रवि अचानक उच्छल कर खड़े हो गये... रोहन घबराकर सीधा बेडरूम की और भागा.. रवि भी उसके पिछे पिछे था....


बेडरूम में नीरू की चीख सुनकर उठ बैठी ऋतु उसको बैठने की कोशिश कर रही थी.. पर नीरू अब तक नींद में ही लग रही थी...और अब भी वह कुच्छ बड़बड़ा रही थी... नीरू का चेहरा पसीने और आँसुओं से तर था..


जैसे ही नीरू ने आँखें खोल कर सामने खड़े रोहन को देखा.. वह तेज़ी से उठी और भाग कर रोहन से लिपट गयी," देव!"


सब हैरान परेशान.. आख़िर अचानक नीरू को ये हुआ क्या?


नीरू काफ़ी देर तक रोहन से लिपटी खड़ी रही.. रोहन भोंचक्का सा सीधा खड़ा रहकर कभी ऋतु और कभी रवि को देखने लगा.. किसी की समझ में कुच्छ नही आ रहा था..


अचानक जैसे अभी अभी हक़ीकत की दुनिया में वापस आई नीरू खुद को रोहन से इस तरह सख्ती से लिपटा हुआ पाकर हैरान रह गयी....वह कुच्छ देर शरमाई हुई यूँही खड़ी रही.. फिर धीरे धीरे रोहन के गले से अपनी बाँहें निकाली और सिर झुकाए भाग कर कंबल में घुस गयी...


रोहन और रवि की नज़रें एक दूसरे से मिली और दोनो मुस्कुरा दिए...


ऋतु ने उसके चेहरे से कंबल उठाकर अंदर झाँका," क्या हो गया था तुम्हे शीनू?"


"सॉरी, सपना था!" नीरू ने कहा और ऋतु कि और मुस्कुरकर देखते हुए शर्माकर कंबल वापस छ्चीन लिया.....



"चल आजा.. वो दोनो चाइ पर हमारा इंतजार कर रहे हैं.." सुबह ऋतु नीरू को बेडरूम से बाहर निकालने की कोशिश कर रही थी...


"नही... मुझे नही चलना बाहर.. यहीं मंगवा ले चाय..!" नीरू का चेहरा रोहन के सामने जाने के नाम से ही गुलाबी पड़ गया....


"चल नाआ! अब ऐसे नखरे मत दिखा... चल खड़ी हो...!" ऋतु ने उसको बाँह से पकड़ कर खींच लिया...


"नखरे दिखा रही हूँ मैं?.." नीरू ने गुस्से से कहा और फिर शर्मा सी गयी," मुझे शर्म आ रही है.. जाने क्या सोच रहा होगा वो.. मेरे बारे में.."


ऋतु नीरू को खींचते हुए बाहर ले ही आई.. नज़रें झुकाए नीरू रोहन के सामने जाकर बैठ गयी.. और चाइ का कप उठा लिया....


"शीनू.. बता ना.. ऐसा क्या सपना आया था रात को?" ऋतु ने चाइ की चुस्की लेते हुए पूचछा.. रोहन और रवि चुप चाप बैठे थे... रोहन रह रह कर तिर्छि निगाहों से नीरू को देख लेता था...


नीरू ने रात की बात का जिकर करने पर घूर कर ऋतु को देखा.. और फिर नज़रें झुका ली...


ऋतु ने अगली बार और भी ज़ोर देकर पूछा,"अरे.. बता ना यार.. हम सब जान'ने को बेकरार हैं.. कहीं तुझे रोहन की तरह ही तो कोई सपना नही आया था... तेरे सपने में देव आया था क्या?"


"पता नही.. अब तो मुझे कुच्छ याद भी नही है... पर हां.. कोई सपना ज़रूर आया था मुझे..." नीरू ने आख़िरकार रोहन के सामने ज़ुबान खोल ही दी...


"पर आपने हम सब के सामने रोहन को देव कहा था.. हम सबको अच्छि तरह याद है.." रवि ने संजीदगी से कहा....


"कब?" नीरू ने याद करते हुए पूचछा...


"तब, जब आप भाग कर इस'से लिपट गयी थी... मुझे तो 'देवदास' याद आ गयी थी उसी वक़्त.. मैं तो बस रोने ही वाला था..." रवि ने अपने चेहरे पर हाथ रख कर अपनी हँसी छिपाने की कोशिश की पर छिपा ना सका.. कुच्छ देर बाद ही उसके मुँह से ज़ोर का ठहाका गूँज उठा....,"हा हा हा हा हा"


अचानक नीरू के चेहरे पर शर्म की लाली झलकने लगी.. रवि की बात पर नाराज़ होने का दिखावा करते हुए उसने उठकर भागने की कोशिश की.. पर ऋतु ने उसका हाथ पकड़ कर वापस बैठा लिया.. रोहन ने प्यार से रवि के सर पर हल्का सा झापड़ मारा," सुबह सुबह उठते ही शुरू हो जाता है... वक़्त तो देख लिया कर..."


"ऐसे क्यूँ कर रही है शीनू..? कुच्छ तो बता.. कुच्छ तो याद होगा तुझे सपने के बारे में...!" ऋतु ने प्यार से पूचछा....


"मुझे तो बस इतना ही याद है कि सपने में कोई राजकुमारी पागल सी होकर रो रही थी.." नीरू को जो याद आया.. उसने बता दिया....


"और.. देव नही था प्रिया के साथ?" रोहन ने उत्सुक होकर पूचछा...


"नही.. हां.. याद आया.. राजकुमारी का नाम शायद प्रिया ही था.. वो एक दूसरी लड़की से बार बार देव के बारे में ही पूच्छ रही थी... और बुरी तरह रो रही थी..." नीरू ने आगे याद करते हुए बताया....


"क्या अब भी आपको रोहन की कहानी पर विश्वास नही है... ? क्या अब भी आप वापस जाने की ज़िद पर आडी रहेंगी...? आपको ऐसा सपना आना.. फिर रोहन को देखते ही नींद में उठकर इसकी ओर भागना... इसको देव कहना... मैं भी तो इसके साथ ही खड़ा था.. आपने मुझे देव क्यूँ नही कहा...? मुझे तो उस वक़्त को याद करके लगता है कि उस वक़्त खुद आप 'प्रिया' की तरह व्यवहार कर रही थी.. आप रो भी रही थी और रोहन को देव समझ कर इसकी ओर भागी भी थी... अब विश्वास ना करने को बचा ही क्या है?" रवि अब एक दम संजीदगी से अपनी बात कह रहा था....


"एक मिनिट फोन देना...!" नीरू ने रोहन से फोन लिया और अपने पापा के पास मिला लिया...


"पापा, मैं शीनू!" नीरू ने कहा...


पापा शायद ऑफीस के लिए निकल चुके थे.. ," हां.. बोल बेटी!"


"आप.. अब तक मुझसे नाराज़ हैं क्या?" नीरू ने रूखी आवाज़ सुनकर कहा....


"अरी बेटी.. छ्चोड़ अब उन्न बातों को.. वापस कब आ रही हो... 2 हफ्ते बाद ऋतु की शादी भी है.. तैयारियाँ भी तो करनी होंगी उसको...." पापा ने कहा....


"हां, पापा! हम आ जाएँगे.. आपसे एक बात पूच्छनी है..." नीरू ने कहा..


"हां.. पूच्छ!"


"वो.. आपने मेरा नाम बदलने के पिछे कारण बताया था ना...?" नीरू की बात को पापा ने बीच में ही काट दिया...


"अब ये क्या उठा लिया सुबह सुबह...?"


"नही पापा.. बस एक बात पूच्छनी है... वो आप कह रह थे मैं स्कूल में कोई नाम चिल्ला कर बेहोश हो गयी थी.. नाम याद है आपको?" नीरू ने डरते हुए पूचछा....


"अब... नाम कहाँ से याद होगा... 15 साल हो गये उन्न बातों को...!" पापा ने कहा...


"वो.. मैं यही पूच्छ रही थी.. कहीं मैने.... 'देव' तो नही कहा था..?" नीरू ने रुक रुक कर कहा...


"देव... अरे हां.. यही तो बताया था मुझे तुम्हारे प्रिन्सिपल ने... हां.. तुम 'देव' कहकर ही बेहोश हुई थी... पर तुम्हे कैसे याद है?" पापा ने चौंक कर गाड़ी को ब्रेक लगा दिए....


"याद नही है पापा.. आज फिर मुझे अजीब सा सपना आया था रात को.. और आज फिर मैं यही नाम चिल्ला रही थी...." नीरू आस्चर्य से रोहन की आँखों में देखने लगी....


"ओह माइ गॉड!" उस तांत्रिक ने सही कहा था.. पुराने नाम को हमेशा के लिए भूल जाने को.. तुमने फिर 'वो' नाम उखाड़ लिया बेटी.. क्यूँ किया तुमने ऐसा..? बार बार उस नाम के बारे में सोचने पर ही तुम्हे ऐसा सपना आया होगा.. मुझे चिंता हो रही है बेटी.. तुम घर आ जाओ जल्दी से!" पापा की आवाज़ से निराशा झलक रही थी...


"नही पापा.. ऐसी कोई बात नही.. मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. मैं शाम को फोन करती हूँ...." नीरू ने कहा और पापा ने 'ओ.के' कहने पर फोने काट दिया.....


"कोई परेशानी तो नही हुई ना बेटी?" रोहन के पिता जी सुबह आते ही सीधे नीरू और ऋतु से मुखातिब हुए...


"जी नही पा..पा जी!" नीरू ने सकुचाते हुए कहा....


"तू मुझे कुच्छ परेशान सी लग रही है.. क्यूँ चिंता करती है? मैं हूँ ना.. सब सेट कर दूँगा.." पापा ने प्यार से नीरू के सिर पर हाथ फेरा," ला.. मुझे अपने पापा का नंबर. दे.."


नीरू पापा की बात सुनते ही हड़बड़ा गयी," ज्जई.. पर.. क्यूँ?"


"अरे.. ऐसे क्यूँ घबरा रही है.. मैने कहा ना.. प्यार करने वाले कभी डरते नही.. तू रोहन से प्यार करती है ना?"


बेचारी नीरू उनके असीमित स्नेह के आगे अपने आपको बँधी हुई सी महसूस कर रही थी.. वो कुच्छ बोल ही नही पाई.. इस पर रोहन ने हस्तक्षेप कर दिया... ," पापा.. वो..."


"ओये.. तू कुच्छ मत बोल ओये.. ये बाप बेटी की आपस की बात है.. बता ना बेटी.. प्यार करती है ना मेरे रोहन से..." पापा ने रोहन को बीच में बोलने पर डाँट सा दिया...


नीरू से कोई जवाब देते नही बन रहा था.. उसने अपना सिर झुका लिया...


"मैं समझ गया.. ला अब जल्दी से पापा का नंबर. दे..." पापा जी ने प्यार से नीरू को कहा..


मरती क्या ना करती.. नीरू की कुच्छ समझ में ही नही आ रहा था कि करे तो क्या करे... उसने इसी उहापोह में नंबर. बता दिया...


"ये हुई ना बात.. नाम क्या है उनका?"


"जी.. श्री रंजीत सिंग..." अब नाम च्चिपाने से क्या होता.. नीरू ने वो भी बता दिया....


" गुड.. अब देखना मैं क्या जादू करता हूँ.. सब चुप रहना.." पापा ने खास तौर पर रोहन की ओर घूर कर चुप रहने का इशारा किया.. और नीरू के नंबर. बताते हुए उन्होने जो नंबर. अपने मोबाइल स्क्रीन पर नोट किया था.. उसको डाइयल कर दिया...


"हेलो.." उधर से नीरू के पापा की आवाज़ आई...


"हां.. रंजीते.. की हाल चाल हैं बादशाहो!" रोहन के पापा ने इस तरह से कहा.. मानो वो उन्हे बरसों से जानते हों..


"कौन बोल रहा है? सॉरी... मैने पहचाना नही यार...!" उधर से आई आवाज़ में हैरानी थी....


"अजी.. दुनिया इतनी छ्होटी भी नही है कि हर कोई एक दूसरे को पहचान जाए.. ये क्या कम बड़ी बात है कि मैं आपको जानता हूँ..!" रोहन के पिताजी ने हंसते हुए कहा...


"ठीक है भाई साहब.. बट सीरियस; मैने आपको पहचाना नही.. बताओ तो सही आप हैं कौन...?" उधर से उसी लहजे में पूचछा गया....


"भाई साहब, आइ'एम मिस्टर. सिंग फ्रॉम रोहन एस्टेट.. दरअसल मैने भी आपको अभी अभी जाना है..." रोहन के पिता जी संजीदा होते हुए बोले...


"भाई साहब.. इस वक़्त थोड़ा सा परेशान हूँ.. मैं आपसे बाद में बात करूँ?" नीरू के पिता जी की आवाज़ में हल्की सी झुंझलाहट थी...


"कोई गल नयी जी... अब तो बातें होती ही रहेंगी..." रोहन के पिता जी ने रोहन की और आँख दबाई और एक पल मुस्कुरकर फिर सीरीयस हो गये," मैने तो बस इसीलिए फोन किया था कि आप बिल्कुल भी चिंता ना करें... आपकी बेटी मेरे लिए रोहन से बढ़कर है...!"


"व्हाट? हू आर यू?.. मेरी बेटी कहाँ हैं?" नीरू के पापा चौंकते हुए कुर्सी से खड़े हो गये," कौन रोहन?"


"ओह्ह.. तो आप को कुच्छ नही पता क्या? मुझे लगा मेरा बेटा पहले वहीं मोहब्बत के बागी झंडे गाड़ कर आया होगा... खैर.. कोई बात नही.. मैं उनसे पूरी डीटेल लेकर फिर फोन करता हूँ...." कह कर रोहन के पिता जी ने तपाक से फोन काट दिया...." ये क्या है यार..? पूरी बात तो बता देते पहले.."


आप सुनेंगे तभी तो.. हमें बोलने ही कब दिया आपने.. यहाँ आने के बाद!" रोहन बुरा सा मुँह बनाकर बोला.. नीरू तो जैसे रोने ही वाली थी....


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उधर हैरान परेशान नीरू के पिता जी ने तुरंत मानव के पास फोन मिलाया...


"प्रणाम अंकल जी!"


"प्रणाम बेटा.." कहाँ..? .. थाने में ही हो क्या?" पापा ने हिचकते हुए पूचछा...


"नही अंकल जी.. मैं तो लंबी छुट्टी पर आ गया हूँ.. कोई काम है क्या?"


"नही.. कुच्छ खास नही.. थाने का नंबर. देना एक बार..." पिता जी ने कहा....


"कुच्छ परेशानी है क्या अंकल जी...?" मानव ने पूचछा...


"नही बेटा.. बस यूँही छ्होटा सा काम है... तुम मुझे थाने का नंबर. दे दो..." पापा को उसको फिर से नीरू के बारे में ऐसी बात करना अच्च्छा नही लगा...


"लिख लो अंकल जी.. थाने में नये इनस्पेक्टर आए हैं.. मिस्टर. गिल.. थोड़े से मूडी टाइप के हैं.. मैं उनको फोन कर दूँगा.. आप भी मेरा जिकर कर देना...." मानव ने नंबर. नोट करवाया और बाइ करके फोन काट दिया.....


"हूंम्म्म... तो ये बात है... तुम लोग इन बेचारियों को बहला फुसला कर ले आए हो!" पापा ने घूर कर रोहन और रवि की ओर देखा....


"नही पापा.. बहला फुसला कर कहाँ...आप तो ऐसे ही... आप पूच्छ लो इनसे..!" रोहन ने मरा सा मुँह बनाकर कहा...


"तू चुप कर अब.. मुझे मेरी बच्चियों से पूच्छ लेने दे.. हां बेटी.. तुम बोलो.. सच क्या है?" पापा ने नीरू की और देखते हुए प्यार से पूचछा....


रोहन की शकल देख कर नीरू की इस सिचुयेशन में भी हँसी छ्छूट गयी.. बेचारे पर कितना गंभीर आरोप लगा दिया पापा ने..," नही पापा वो... मैं ही इनको... मतलब हम दोनो अपनी मर्ज़ी से इनके साथ आए थे...!" कहकर नीरू ने नज़रें झुका ली....


"मतलब तुम चाहती हो.. इस लल्लू से शादी करना?" पापा ने प्यार से ही पूचछा..


नीरू ने सिर झुकाए हुए ही अपने हाथों की अंगुलियों को बाँध लिया.. वो कुच्छ बोल नही पाई...


"बोलो बेटा.. तुम चिंता मत करो.. अगर तुम नही चाहती तो मैं तुम्हारे पापा से अपने बेटे की करतूत के लिए माफी माँग कर अभी तुम्हे वापस छ्चोड़ने चल पाड़ूँगा...


"हां.. मतलब.. नही.. इसमें इनकी कोई ग़लती नही है.. पापा.. पर मैं कुच्छ फ़ैसला नही कर पा रही हूँ.. पर मुझे 'ये' पिच्छले जनम की बातें सच लग रही हैं.." नीरू समझ नही पा रही थी कि क्या कहे और क्या नही.. वह अपने आपको बड़ी ही असमन्झस में महसूस कर रही थी.....


"छ्चोड़ो ना बेटी, पिच्छले जनम की बातों को.. सबसे पहले तो वर्तमान के बारे में सोचो.. आख़िर तुम्हे तो ये जीवन गुजारना है ना.. सबसे पहले तो ये सोचो की इस जनम में ये तुम्हारे लायक है या नही..." पापा अचानक गंभीर हो गये....


"ज्जई.. वही मैं सोच रही हूँ.. पर फ़ैसला नही कर पा रही हूँ.. मैं खुद को थोड़ा वक़्त देना चाहती हूँ.. !" नीरू ने हड़बड़कर कहा...


"कोई और पसंद है तुम्हे?" पापा ने पूचछा...


नीरू ने तुरंत उनकी आँखों में आँखें डाल ली.. कम से कम इस बात का जवाब तो उसने पूरे आत्मविश्वास से दिया," नही पापा.. मैने तो आज तक कभी इस बारे में सोचा तक नही.. शायद ये मेरे पास ना आते तो मैं कभी शादी करती ही नही...!"


"हूंम्म.. मतलब ये तुम्हे थोड़ा बहुत तो पसंद है ही.." पापा ने मुस्कुराते हुए उसको देखा....


नीरू के मंन में उसी पल अपनी एक अलग सी छवि कौंध गयी.. उसने तुरंत रोहन की आँखों में झाँका.. जाने अंजाने में ही उसको रोहन की आँखों में प्रिया का देव दिखाई दिया... वो ज़्यादा देर तक रोहन से नज़रें ना मिला पाई.. पर इन्न दो पलों के लिए ही आँखें चार होने ने पापा को उनकी बात का जवाब मिल गया...


"देखो बेटी.. तुम दिल और दिमाग़ दोनो खोल कर फ़ैसला करो.. इसकी बातों में मत आना.. ये तो बचपन से ऐसा ही है.. खोया खोया सा.. हमेशा मुझे इसकी आँखों में देख कर महसूस होता था.. जैसे इसका कुच्छ खो गया है.. और उसको ही हर वक़्त, हर जगह.. ढूंढता रहता था... "


पर ये क्या ढूँढ रहा है.. इसने कभी किसी को बताया ही नही... शायद इसको खुद ही मालूम नही था... पर कल... पहली बार.. इसको देख कर मुझे लगा कि.. इसको अपनी मंज़िल मिल गयी है.. अगर सपनों की बात पर भरोसा करें तो अब तो यही लगता है कि तुम ही इसकी जिंदगी से कभी अचानक गायब हो गयी होगी.. तुम्हे ही ढूंड रहा होगा ये..."


बोलते हुए पापा की आँखों से आँसू छलक उठे..," पर तुम इसकी परवाह मत करना बेटी.. पहले अपने बारे में सोचना.. तभी शायद ये भी पूरी तरह से खुश रह पाएगा.. दूसरों को दुखी देखना भी इसके बस की बात नही है.. और तुम्हे तो ये कभी देख ही नही पाएगा.. ऐसा लगता है..."


पापा बोलते ही जा रहे थे कि अचानक उनके फोन पर आई कॉल से उनका ध्यान बँट गया... उन्होने नंबर. पहचान लिया.. कॉल नीरू के पापा की थी....


"हांजी रंजीत सिंग जी!"


"देखिए.. मुझे आप एक समझदार आदमी लग रहे हैं.. इसीलिए मैने पहले आपको फोन करने की सोची.. वरना मैं तो पोलीस रिपोर्ट करवाने जा रहा था.. आप बताइए ये क्या तमाशा हो रहा है...?" नीरू के पापा की गुस्से से भारी आवाज़ आई...


रोहन के पापा उठ कर अपने कॅबिन में आ गये," देखिए सिंग साहब! यहाँ कोई तमाशा नही हो रहा.. बच्चे अपनी जिंदगी का सबसे महत्तव्पूर्न फ़ैसला लेना चाह रहे हैं.. और उन्हे पूरा अधिकार भी है इस बात का... हम और आप बीच में पड़ने वाले कौन होते हैं भला?"


"वॉट रब्बिश? मैं शीनू का पापा हूँ.. और आप पूच्छ रहे हैं की मैं कौन होता हूँ बीच में पड़ने वाला....!" नीरू के पापा का लहज़ा और गरम हो गया..


रोहन के पापा ने हुलके से मज़ाक के साथ माहौल को ठंडा रखने की कोशिश की.. वो हंसते हुए बोले," देखिए साहब.. मैं भी रोहन का पापा हूँ.. और.. मेरे पास सर्टिफिकेट भी है इस बात का.. हा हा हा!"


पर इस मज़ाक से नीरू की पिताजी के कलेजे को कोई ठंडक नही पहूंची,"आप बातों को मज़ाक में ना उड़ायें..! मेरी बेटी को आप इस तरह कैसे अपने साथ रख सकते हैं?.. इट'स.. इट'स जस्ट लाइक किडनॅपिंग.. यू नो?"


"किडनॅपिंग? शांत हो जाइए सर.. आपको दरअसल पूरी बात का पता नही है.. मेरा रोहन और आपकी नीरू एक दूसरे से प्यार करते हैं.. एक दूसरे से शादी करने की सोच रहे हैं वो.. दोनों बालिग हैं.. इसमें किडनॅपिंग कहाँ से बीच में आ गयी?" रोहन के पापा ने संयमित भाव से कहा....


"मेरी बेटी और प्यार? आर यू जोकिंग और वॉट मिस्टर. सिंग? वो कभी इस तरह की बातें सोचती तक नही.. मुझे अपनी बेटी के बारे में पूरा पता है...!" नीरू के पिता जी बोले....


"सिंग साहब! यही वो लम्हे होते हैं जब हम अपने बच्चों के उपर अपनी सोच थोप कर उन्हें अपने आप से दूर कर लेते हैं... ये हम तय नही कर सकते कि उन्हे कब और किस तरह जीना चाहिए.. खास तौर से तब.. जब वो अपनी जिंदगी का सबसे अहम फ़ैसला ले रहे हों.. ये प्यार है सिंग साहब! कोई मज़ाक नही... अगर हमने यहाँ उनके दिल की बात नही सुनी तो ना सिर्फ़ हम ही उन्हे खो देंगे... बुल्की वो भी.. वो खुद भी सारी उमर कुच्छ ढ़हूँढते से रहेंगे.. जो कभी उन्हे दोबारा नही मिल सकता... आप समझ रहे हैं ना?" रोहन के पापा बात करते हुए जाने किस अतीत में खोते चले गये...


"मैं समझ रहा हूँ यार... पर!" जाने कौन सी बात नीरू के पापा के दिल में चुभि कि उनका लहज़ा एक दम नरम पड़ गया....


"पर क्या यार?.. ठंडे दिमाग़ से सोच कर देखो.. यहाँ नीरू भी मेरी बेटी की तरह ही है.. बुल्की उस'से भी बढ़ कर... आप बस मिलने का टाइम बताइए.. मैं आता हूँ आपके पास!" रोहन के पापा ने बात को निष्कर्ष तक ले जाने की कोशिश की....


"यार मैं अपनी बेटी को अच्छे से जानता हूँ.. उसके लिए प्यार मोहब्बत का कोई मतलब ही नही है.... वो तो.. निहायत ही शरीफ और भोली है...!" नीरू के पापा के तर्क आख़िरी साँस ले रहे थे....


" हां शरीफ है.. तभी तो मैं उसको अपने घर में लक्ष्मी के रूप में लाला चाहता हूँ.. पर शरीफ लोग क्या प्यार नही करते? एक बात बताउ सिंग साहब.. मेरी माता जी आख़िरी दम तक यही सोचती रही थी कि मैं एक दम भोला हूँ.. मुझे इन्न बातों के बारे में कुच्छ नही पता.. जबकि मेरे तीनों बच्चे पैदा हो चुके थे.. हा हा हा!" रोहन के पापा की इस बात पर नीरू के पापा भी खिलखिलाए बिना नही रह सके.. शायद उनकी माता जी भी यही सोचती होंगी


"इट'स ओ.के. सिंग साहब! मैं आपसे मिलने की सोचता हूँ... पर क्या आप.. शीनू से बात करा देंगे एक बार...?" नीरू के पापा ने मुस्कुराते हुए कहा.....


"क्यूँ नही यार? एक मिनिट.. नीरू बेटी.. ये लो.. पापा से बात करो!" बाहर आकर पापा ने नीरू को फोन दे दिया...


नीरू ने काँपते हाथों से फोन कान से लगाया...," हां.. पा.. वो...!"


"तू खुश है ना बेटी..?" पापा ने प्यार से सिर्फ़ इतना ही पूचछा....


"हाँ.. वो.. सॉरी पापा.. मैं...!" नीरू अब भी घबराई हुई थी....


"सॉरी को मार गोली यार.. तू आराम से वहीं रह.. तेरे ससुर जी एकदम मस्त आदमी हैं.. चिंता मत कर.. मैं आ रहा हूँ.. एक दो दिन में.. और कुच्छ बात हो तो बोल..?"


"थॅंक यू पापा!" नीरू के इन्न तीन शब्दों ने ही उसके पापा की आँखों को आँसुओं से तर कर दिया....


"आइ लव यू बेटा! चिंता मत कर.. मैं तेरे साथ हूँ!"



"तू सोच क्या रही है शीनू? कम से कम मुझे तो खुल कर बता दे..." परेशान सी ऋतु ने अकेले होते ही नीरू से पूचछा...


".....आए ऋतु! मुझे शीनू मत बोल!" नीरू ने थोड़ी देर रुक कर कहा....


"हे भगवान! और तुझे मैं क्या बोलूं? अब ये नाम भी चेंज करेगी क्या?" ऋतु ने अपने माथे पर हाथ मार कर कहा....


"हां.. वापस वही रखूँगी... नीरू!" नीरू ने सहजता से कहा....


"तू मेरा दिमाग़ खराब मत कर यार.. पहले सही सही बता तूने सोचा क्या है.. रोहन के बारे में..." ऋतु ने ज़ोर देकर पूचछा...


"पता नही..." कहकर नीरू बेडरूम की छत की तरफ देखने लगी...


"पता नही मतलब? तुझे नही पता तो और किसको पता होगा... ये नाम फिर से क्यूँ बदल रही है तू?" ऋतु की कुच्छ समझ नही आ रहा था कि नीरू आख़िर सोच क्या रही है.....


"यार..." नीरू ने बीच में एक लंबी साँस ली..," आज सुबह से ही पता नही कैसे कैसे अहसास हो रहे हैं.. रात को मैने जो सपना देखा था.. वो टुकड़ों में रह रह कर इस तरह याद आ रहा है जैसे.. जैसे मेरे साथ कुच्छ आज कल में ही हुआ हो.. बहुत बुरा.. कभी मेरे मंन में आता है कि जैसे मुझे पता नही क्या मिल गया... अचानक ही लगता है जैसे मेरा कुच्छ खो गया है.. बहुत प्यारा...."


"रह रह कर मन में जाने कैसी लहरें सी उठ रही हैं.. मैने सपने में.. राजकुमारी का रोना देखा था.. सुबह से लेकर अब तक मुझे कयि बार ऐसा सा लगा है जैसे... वो राजकुमारी अब भी मेरे भीतर रो रही है.. किसी को पुकार रही है..."


"कभी लगता है कि देव राजकुमारी को वादा करके गया है.. लौट कर आने का... ख़याल आता है जैसे उसने वादा राजकुमारी से नही.. मुझसे किया हो.. बड़ा अजीब सा फील हो रहा है यार..."


"ऐसा लगता है जैसे वो राजकुमारी मैं ही हूँ.. पता नही क्यूँ? पर मन ही मन जैसे मैं अब भी देव को पुकार रही हूँ... कुच्छ तो बात है ऋतु.. कुच्छ तो बात है..."


"वो तो मैं भी कह रही हूँ कि कुच्छ तो है.. पर तूने सोचा क्या है.. ये तो बता दे मेरी अम्मा!" ऋतु ने उसको बोलते हुए टोक दिया...


"मैने सोचा है कि जो होता है होने दूँ... ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा.. सोच सोच कर पागल ही हो जाउन्गि ना.. पर वो भी यूँ बीच भंवर में फँसे रहने से तो बेहतर ही होगा.. मैं जान'ना चाहती हूँ.. देव को किसने मार दिया? मैं जान'ना चाहती हूँ.. कि राजकुमारी के साथ फिर हुआ क्या? ... एक बात और.. जिस लॉकेट के बारे में रोहन ने जिकर किया था कि मेरा 'दिल' उसमें अटका हुआ है.. मुझे ये भी याद आ रहा है कि आख़िरी बार जाते हुए देव ने राजकुमारी को एक लॉकेट दिया था.. अगर पूरी बात का पता नही चला तो मैं तो सोच सोच कर ही पागल हो जाउन्गि... पता नही क्या हो रहा है मुझे....?" नीरू बोल कर रुक गयी...


ऋतु पूरी कहानी जान'ने को बेचैन सी हो गयी," सपने में तूने जो कुच्छ देखा है.. वो कितना याद आ गया है..?"


"हूंम्म... राजकुमारी ने देव को पहली बार कहाँ देखा.. ये याद आ रहा है.. देव की शकल याद आ रही है... राजकुमारी भेष बदल कर देव के घर गयी थी.. वहाँ खाना खाया था... फिर... एक मिनिट.. सोचने दे मुझे..." नीरू ने आँखें बंद कर ली....


"कैसा था देव.. दिखने में.." ऋतु से रहा ना गया...


"तू अपने मानव के बारे में सोच.. मेरे देव के बारे में क्यूँ पूच्छ रही है..." कहकर नीरू हँसने लगी....


"ओहू.. बड़ी आई राजकुमारी...!" ऋतु नीरू पर व्यंग्य करके खिलखिला कर हंस पड़ी... फिर अचानक सीरीयस होकर बोली..," तू ढंग से सारा सपना याद कर ले.. फिर डीटेल में सुनाना... मैं उनको बुला लाउ ना?"


"हूंम्म... ठीक है.. 10-15 मिनिट के बाद बुला लेना... तब तक चुप बैठ जा.. मुझे याद करने दे..." कहकर नीरू आँखें बंद करके लेट गयी....


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"बुला लाउ अब? 20 मिनिट हो गये....." ऋतु 20 मिनिट तक चुप चाप बैठी रही थी...


"ष्ह्ह्ह्ह्ह्ह....." नीरू ने अपने होंटो पर उंगली रख कर ऋतु को चुप रहने का इशारा किया... उसके हाव भाव से ऐसा लग रहा था जैसे.. उसको सपना याद आ रहा है... या फिर सपने से भी आगे का कुच्छ....


ऋतु स्तब्ध सी उसके पास बैठी उसको देखती रही... नीरू के चेहरे के भाव पल पल बदलने लगे.. ऋतु चुप चाप उठी और रोहन और रवि को बेडरूम में बुला लाई....


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"सुनो.. सुनो.. सुनो.. राज्य के सभी निवासियों को सूचित किया जाता है कि महाराज वेदवरत के मैत्री प्रस्ताव को ठुकराने वाले... दोनो राज्यों की जनता को युद्ध की आग में झौंकने वाले... और.. राजकुमार अभिषेक सहित हज़ारों सेनिकों के कतल के दोषी होने के कारण; मौत की सज़ा को निसचीत जान कर राजा वीर प्रताप आत्महत्या कर चुके हैं. महारानी ने भी आत्मदाह कर लिया है... राजकुमार यूधभूमि में मारे गये हैं..; आज से इस राज्य की बागडोर यससवी महाराज वेदवरत के आशीर्वाद से सेनापति कुँवरपाल के हाथों में है....कल महाराज वेदराट उनके राज्याभिषेक के लिए राज्य में पधार रहे हैं.. सुनो सुनो सूनो...."


बदहवास सी भागी भागी राजमहल में आई लता को द्वार पालों ने बाहर ही रोक लिया," रूको!!! अंदर जाने की आग्या किसी को नही है!"


"परंतु.. परंतु मेरा राजकुमारी से मिलना आती अनिवर्य है... अभी और इसी समय....!" लता के चेहरे पर भय सपस्ट द्रिस्तिगोचर हो रहा था...


"राजकुमारी प्रियदर्शिनी अब राजा कुँवरपाल के आदेशानुसार राजमहल में बंदिनी के तौर पर हैं.. और उनके आदेशानुसार उनसे मिलने की इजाज़त किसी को नही दी जा सकती...." द्वारपाल ने दोहराया....


अचानक अंदर टहल रहे पूर्व सेनापति और अब यहाँ के राजा, कुँवरपाल का ठहाका गूँज उठा...," हा हा हा हा हा! राजकुमारी की सखी! आने दो इसको अंदर.. शायद इसी की बात पर विश्वास करके राजकुमारी हक़ीक़त के धरातल पर वापस आ जायें.. वो अब भी देव का इंतजार कर रही है.. हा हा हा.. जाओ.. और जाकर उसको सच्चाई से अवगत करा दो.. बता दो उसको कि देव को हमने इस दुनिया से मिटा दिया है.. अब वो अपना पागलपन छ्चोड़ें और महाराज वेदवरत की पत्नी बन'ने के लिए अपने आपको मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार कर लें... महाराज उसको पलकों पर बिठा कर रखेंगे.. आख़िर वो भिक्षुक योगी उसको दे ही क्या सकता था, जो वो नही दे पाएँगे!"


द्वारपालों ने उसको अंदर जाने दिया... भागती हुई जाकर लता कुनरपाल से कुच्छ आगे जाकर रुक गयी," कहाँ हैं राजकुमारी जी?"


"वो अपने शयन कक्ष में ही हैं.. ध्यान रहे.. महल में चप्पे चप्पे पर हमारे गुप्चर निगाह रखे हुए हैं.. किंचित भी चालाकी करने की कोशिश की तो इनाम सज़ा-ए-मौत होगा!.. जाओ.. जाकर समझा दो उसको.. पागलपन एक हद तक ही सहन किया जा सकता है.. जो जा चुका है.. रह रह कर उसका ढोल पीटने से वो वापस नही आ जाएगा....!" कुँवरपाल उत्साह में मगन होकर बोल रहा था....


लता ने नज़रें झुकाई और फिर शयन कक्ष की और दौड़ पड़ी.. शयन कक्ष के बाहर खड़े पहरेदारों ने एक बार फिर उसका रास्ता रोक लिया....," अंदर जाने की इजाज़त किसी को नही है...!"


"म्म.. मुझे.. सीसी.. राजा कुँवरपाल ने राजकुमारी के पास जाने की आग्या दी है..." लता ने जवाब दिया... पहरेदारों ने एक दूसरे की नज़रों में देखा और उसको अंदर जाने दिया.....


"लताअ!" बेचैन सी बैठी राजकुमारी ने जैसे ही लता को देखा.. उसकी आँखों से अश्रु धारा उमड़ पड़ी," तू कहाँ थी अब तक..? हम कब से तेरा इंतजार कर रहे हैं.. देख ना! हमें हमारे देव से दूर रखने के लिए पिता श्री कैसी कैसी चाल चल रहे हैं.. .. मैं जानती हूँ कि देव के शौर्या से हम अब तक विजय श्री का दामन चूम चुके होंगे... पर हूमें जाने क्या क्या बताया जा रहा है.. पिता श्री और माता श्री हमारे सामने नही आ रहे.. वो कुंवर कहता है.. कि देव.. मेरा देव... तू बता ना.. पूरी बात.. हमें बाहर भी निकलने नही दिया जा रहा... बता ना सखी.. मेरा देव.. और कितना इंतजार करवाएगा...? और कितना तडपाएगा हमें.. अपने दर्शन देने से पहले...!"


लता की नज़रें झुक गयी.. एक लंबी सी आ टीस बनकर उसके सीने से निकली.. राजकुमारी की हालत देख कर वह रो भी नही पाई...," आप यहाँ से निकलो राजकुमारी.. अपने कपड़े मुझे दो!"


"नही.. हमे तेरे मुँह से पूरी बात सुने बगैर चैन नही आएगा.. और देव के आए बगैर हम यहाँ से जाने वाले नही हैं... उन्होने हमें इंतजार करने को कहा था... तू पूरी बात बता ना... जितनी खूबसूरती से तू उनकी बहादुरी की व्याख्या करती है.. और कोई नही कर सकता... तू जल्दी से हमें सब सच सच सुना दे.. अगर पितश्री को पता चल गया कि तू आई है.. तो वो तुझे यहाँ नही रहने देंगे..."


लता के चेहरे पर मौत से भी भयावह सन्नाटा पसरा हुआ था," राजकुमारी जी.. युद्ध में देव को परास्त करना शायद खुद देवो के वश में भी नही होता.. देव युद्धभू..."


लता को राजकुमारी ने बीच में ही टोक दिया.. उत्साहपूर्ण निगाहों से उसको देखती हुई उसके पास सरक कर वह बोली..," आ सखी.. 'मेरा देव' बोल के बता ना! हमें बड़ा प्यारा लगता है जब तू ऐसे बोलती है..."


लता की आँखों से आँसू थम ही नही रहे थे.. पर प्रेम पीपसी प्रिया इस आँसुओं का अर्थ नही समझ पा रही थी..," हां राजकुमारी जी.. आपका देव पूरी रणभूमि में..... ऐसे छाया हुआ था .....जैसे...... सारी दुश्मन सेना को वो 'वीर' अकेला ही स्वाहा कर देगा.. गगन में एक सुर्य के समान अकेला ही 'देव' दुश्मन सेना का कलेजा चीरता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था.. किसी में उसका सामना करने की हिम्मत नही थी...


मूर्ख अभिषेक अपनी सेना में मची भगदड़ को देख बिलबिलता हुआ देव के सामने आ गया," क्यूँ रे? एक 'खेल' में विजयी क्या हो गया.. तूने तो बड़े बड़े खवाब देखने आरंभ कर दिए... युद्ध में आकर 'अभिषेक' को ललकार्ने की जुर्रत तुझ जैसा कोई 'मूर्ख' ही कर सकता है... हमारी सेना को छिन्न भिन्न करके तू ये मत समझना कि तू 'योद्धा' हो गया है.. युद्ध में तो हमारे सामने तू नादान ही है.. 'मूर्ख' समझ कर मैं तुझे यह बता देना चाहता हूँ की मेरी लड़ाई तेरे राज्य के खिलाफ नही है... हमारा लक्ष्या सिर्फ़ राजकुमारी को हासिल करना है... और अगर तू हमारे रास्ते से हटकर अपनी जान बचाना चाहे तो हम तुम्हे अभयदान दे सकते हैं... जा 'चला' जा!"


"आपके देव के चेहरे पर आत्मविश्वास से भरी मुस्कान तेर उठी..,"मेरी तरफ से दी गयी ये आख़िरी चेतावनी समझना राजकुमार... मैं भी आपका राज्य जीतने नही.. अपने राज्य की 'आन' जीतने के लिए यहाँ आया हूँ... मेरी तुमसे या युद्ध में हमारे खिलाफ लड़ रहे किसी सैनिक से कोई दुश्मनी नही है.... तुम्हारी सेना भाग रही है.. और तुम देख रहे हो कि हमारी सेना किसी की पीठ पर वार नही कर रही....तुम्हारे पास भी मौका है... तुम अभी भी वापस जा सकते हो.. !"


"अपनी हार सामने जान कर बौखलाया हुआ अभिषेक देव की ओर लपका.. और पलक झपकते ही देव की सनसनाती हुई तलवार हवा में द्रुत गति से लहराई .. अभिषेक दिग्भ्रमित सा हो गया.. पगलाया हुआ सा वह अपने आपको बेबस सा जान कर हवा में यूँही वार पर वार करने लगा.. जैसे ही वा देव के नज़दीक आया.. उनकी तलवार लहराई और अभिषेक का सिर उनके धड़ से दूर जा गिरा...."


"उसके बाद तो बचे हुए सैनिक भी मैदान छ्चोड़ कर भागने लगे.. और मैदान खाली होने से स्वत ही महाराज वेदवरत का सामना आपके देव से हो गया.. महाराज ने एक बार देव की 'खून' से सनी तलवार की ओर देखा और फिर देव के 'रौद्रा' रूप धारण किए हुए चेहरे को.. अचानक उनकी नज़र नज़दीक ही अभिषेक के 'सिर' कटे धड़ पर पड़ी और भय से वह काँपने सा लगा... अगले ही पल उसने 'सारथि' को उल्टी दिशा में भागने को बोल दिया... तभी किसी ने देव को सूचना दी कि महाराज वियर प्रताप' घायल हो गये हैं...


देव सब कुच्छ छ्चोड़ कर तुरंत महाराज के पास पहुँचे ही थे कि पूर्वा सेनापति 'कुँवरपाल' उनके सामने आकर क्षमा याचना करते हुए अपने प्राणो की भीख माँगने लगा....


"सेनापति देव! हमें अच्छि तरह मालूम है कि हमारा गुनाह-ए-गद्दारी किसी सूरत में 'सज़ा-ए-मौत' से कम के लायक नही है.. फिर भी.. मैं आपके चरनो में गिरकर प्राण-रक्षा की भिक्षा माँगता हूँ.. मुझे अभयदान दें.." उसने अपने घोड़े से उतर कर देव के चरण पकड़ लिए....


"माफी तुम्हे राज्य से माँगनी चाहिए कुँवरपाल.. मैं तो महाराज की ओजस्वी सेना का एक अड़ना सा सैनिक हूँ.. और अपने राज्य का एक देशभक्त नागरिक.. तुम देश द्रोही हो.. राज्य ही तुम्हारे बारे में फ़ैसला करेगा..." देव ने बेहोश पड़े महाराज को उठाने की कोशिश करते हुए कहा...


"तब भी.. मैं यहीं पासचताप करना चाहता हूँ सेनापति! मुझे आदेश दीजिए..." कुंवर देव के चरणों में नतमस्तक सा हो चला था...


"हुम्म.. आप खुद सेना के सेनापति रहे हैं कुँवरपाल जी.. आपको आग्या लेने की आवश्यकता क्या है? दुश्मन सेना भाग रही है.. मुश्किल से 'वो' अपनी सेना के आधे ही अब बचे हैं.. आप जाकर सेना को संभालिए... मैं महाराज को राजमहल छ्चोड़ कर आता हूँ..." कहकर देव जैसे ही महाराज को संभालने के लिए मुड़ा.. कायर और कपटी 'कुँवरपाल' ने देव की पीठ में खंजर भोंक दिया...


"अया...." राजकुमारी ने ऐसी प्रतिक्रिया दी जैसे खंजर देव की नही.. उनकी पीठ में भोंका गया हो..," हां.. हमने देखा था उनका घाव... फिर क्या हुआ लता?" राजकुमारी असहाया सी होकर तड़प उठी....


"वो मामूली घाव नही था राजकुमारी.. उनके शरीर के आर पार हो गया था.. शायद उनको उसी वक़्त अहसास हो गया था की...." लता आगे ना बोल सकी...


"क्क्या.. बकवास कर रही है तू.. क्या अहसास हो गया था उनको.. ? मुझे तुझसे ये उम्मीद नही थी.. तू भी पिता श्री के दिए लालच में आख़िर आ ही गयी.... मैने कभी ना सोचा था कि चंद स्वर्ण मुद्राओं के लालच में तू भी मुझे दिग्भ्रमित करेगी.. मेरे देव से मुझे दूर करने के लिए...." राजकुमारी विचलित और क्रोधित होते हुए बोली....


लता कुच्छ नही बोली.. बस उसकी आँखों से दो आँसू लुढ़क कर प्रिया की हथेली पर जा गिरे...


"हमें डराना चाहती है ना.. देव आने ही वाला है ना.. देख... देख.. तू जल्दी से बोल दे.. वरना हम... हम महाराज से तेरी शिकायत करेंगे... हम... देव को भी बता देंगे......"


"लाताआ! तू बोलती क्यूँ नही.. क्या हो गया है तुझे....?" प्रियदर्शिनी अचानक चिल्ला उठी....


"अब... अब बोलने को रह ही क्या गया है राजकुमारी... महाराज... नही रहे.. राजकुमार नही रहे... कुमार दीक्षित का पता नही चल रहा....महारानी ने ..... आत्मदाह कर लिया... " लता के आँसू थमने का नाम नही ले रहे थे.... वह बीच बीच में सिसकियाँ सी लेकर बोल रही थी,"देव...."


"नही.. नही... देव के बारे में हम तेरी कोई बकवास नही सुनेंगे... देव को कोई नही हरा सकता... देव को हमसे कोई नही छ्चीन सकता.. देव सिर्फ़ हमारा है... पिता श्री नही रहे तो क्या हुआ? अब देव ही इस राज्य के राजा हैं... आने दो देव को.. हम तेरी शिकायत उनसे करेंगे... " बोलते बोलते राजकुमारी थक गयी और कुच्छ रुक कर फिर बोलने लगी..,


" बता दे ना सखी.. तू हमें तडपा क्यूँ रही है.. अभी तो तू हमारे देव के अद्वितीया शौर्या के बारे में सुना रही थी.. तू बता रही थी ना.. देव युद्ध भूमि में इस तरह छाया हुआ था, मानो.. मानो सारी दुश्मन सेना को अकेले ही स्वाहा कर देगा.. तू ही बता रही थी ना कि कैसे दुश्मन देश का राजा उनके सामने आने से कतरा रहा था... और देव के सामने आते ही भाग खड़ा हुआ था.... तूने ही तो बताया था कि दुष्ट अभिषेक का सिर किस तरह हमारे देव के एक ही वार में कयि गज दूर जाकर गिरा था.... देव तो अपराजय है ना सखी... तू ही तो कल बता रही थी... उनका कोई कैसे सामना कर सकता है.. उनको कोई कैसे मार..... नहियीईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई"


"संभलो.. अपने आपको.. राजकुमारी! सबसे पहले यहाँ से निकलो आप.. वो दुष्ट वेदवरत अब आपको अपनी रानी बनाने की लालसा लिए हुए है... आप यहाँ से निकलो जल्दी.." लता भी उसके साथ ही रो रही थी....


"हमारा विवाह तो हो चुका है लता... जनम जनम के लिए.. हमारे देव के साथ! सुना है कि इस जीवन के उस पार भी जीवन होता है.. अगर ऐसा सच है तो देव वहाँ हमारा इंतज़ार कर रहा होगा... मेरा तो कब से सब कुच्छ उनका हो चुका है लता! अगर वो अब इस दुनिया में नही हैं, तो मेरे प्राण अभी तक मेरे शरीर में कैसे हैं.. नही नही... तू झूठ बोल रही है.. वो अभी यहीं हैं.. ये देख.. उन्होने खुद को 'हमारे' हवाले कर दिया था..." प्रिया अपने गले से 'देव' का दिया हुआ ताबीज़ निकलते हुए बोली...," ये देख.. ये रहा मेरा देव.. देव ने भगवान को अपना सब कुच्छ देकर हमें माँग लिया था... भगवान ऐसा निस्तूर कैसे हो सकता है लता... भगवान हमें अलग अलग कैसे रख सकता है... कह दे की सब कुच्छ झूठ है.. कह दे ना सखी..." प्रिया के आलाप से राजमहल की दीवारें भी मानो भरभरा सी गयी हों.. उसका क्रंदान दूर दूर तक सुनाई पड़ रहा था....


तभी शयन कक्ष में कुँवरपाल ने तालियाँ बजाते हुए प्रवेश किया," वाह! क्या प्रेम है..? मृत्यु जैसे शाश्वत सत्य को भी स्वीकारने से इनकार कर रहा है प्यार! वाह..! तो 'ये है तुम्हारा देव!"


कुँवरपाल ने पास आकर प्रिया के हाथों से ताबीज़ लगभग छ्चीन ही लिया.....


"इसको अपने पापी हाथों से छ्छू मत दरिंदे.. वरना इसके तेज की अग्नि से भश्म होते तुझे देर ना लगेगी... 'मेरा' देव मुझे वापस कर.. मेरा देव मुझे लौटा दे..." राजकुमारी उस'से ताबीज़ छ्चीन'ने के प्रयास में जैसे ही शैया से उठी.. ज़मीन पर गिर गयी.. जान जैसे बची ही ना थी.. उसके शरीर में.. सिर्फ़ चंद आहें बची थी.. जो रह रह कर अपने 'देव' को पुकार रही थी....


"अच्च्छा? ज़रा देखें 'तुम्हारे' देव के 'तेज' की अग्नि को... देखें कितनी उष्मा सहन कर पता है ये....?" अट्टहास सा करता हुआ कुँवरपाल रसोई गृह की तरफ चल दिया जहाँ कल के सार्वजनिक शाही भोज के लिए एक विशालकाय भत्ती तैयार की गयी थी... प्रिया गिरते पड़ते उसके पिछे पिछे जा रही थी....


"ये ले! उष्मा को उष्मा में स्वाहा कर दिया... अब तो ये मुझे भश्म नही करेगा ना.. हा हा हा....." कुँवरपाल ने ताबीज़ को भत्ति में फैंक दिया...


पर प्रिया को तो जैसे उसकी बातों से सरोकार ही नही था.. उसका लक्ष तो सिर्फ़ 'उसका देव था.. बाकी तो उसको कुच्छ दिखाई दे ही नही रहा था.. अब उसको भी देव तक जाने का रास्ता मिल गया था... अब उसके कदम ना लड़खड़ाए.. ना डगमगाए.. और वो सीधी भत्ति में प्रवेश कर गयी..... स्वाहा!!!


अचानक ही रसोई गृह धधक कर चीत्कार उठी अग्नि की लपटों से दाहक उठा...


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नीरू के पल पल रंग बदल रहे चेहरे पर अब अचानक अजीब सी शांति छा गयी थी.. रसोई गृह में लपटें शांत होने पर उसको भत्ति के बाहर भश्म हो चुकी एक लाश दिखाई दी.. कुँवरपाल की...!!!


कुच्छ देर यूँही शांत लेटी रहने के बाद नीरू ने आँखें खोल दी.. सामने बैठा रोहन कब से उसके आँखें खोलने का इंतजार कर रहा था.. उसके आस्चर्य का ठिकाना ना रहा जब नीरू आँखें खोलने के बाद नम आँखों से उसकी और निरंतर देखती रही.. दर्दनाक सपने से लौट कर आई उसकी गीली आँखों में उतनी पीड़ा नही थी.. जितनी राजकुमारी प्रिया के रूप में कुच्छ देर पहले ही उसने महसूस की थी.. आख़िरकार प्रिया का देव लौट आया था.. भगवान को उनके अनोखे प्यार की खातिर झुकना ही पड़ा.. और अब इस जनम में उनके मिलन में कोई बाधा शेष नही थी.... शायद!!!


"ऐसे क्या देख रही हो नीरू? हम एक घंटे से तुम्हारे जागने का इंतजार कर रहे हैं.. कुच्छ याद आया कि नही?" ऋतु ने उसको पकड़ कर हिला दिया...


"मुझे टीले पर जाना है!" नीरू बैठ गयी.. पर अब भी उसकी नज़रें रोहन पर ही जमी हुई थी...


"हां.. हां.. चलो! हमने कब मना किया है?" रवि खुश होकर बोला...


"नही.. हम दोनो अकेले ही जाएँगे.. तुम यहीं रहना प्लीज़!" नीरू ने रवि की ओर देख कर कहा....


"मैं नही जाउन्गि.. तेरे साथ अकेले टीले पर.. मुझे तो रोहन के मुँह से वहाँ की कहानी सुनते हुए ही डर लग रहा था.. हम दोनो लड़कियाँ हैं यार..." ऋतु ने तुनक कर कहा....


"मैं तुझे नही बोल रही ऋतु... मैं और देव.स्स्सोररी... रोहन वहाँ जाएँगे.... सिर्फ़ हम दोनो!" रोहन को देव कहने की भूल करने के बाद नीरू झिझक सी गयी और बाकी की बात उसने नज़रें झुका कर पूरी की....


नीरू के 'देव' कहते ही वहाँ बैठे तीनों की नज़रें आपस में मिलकर चमक उठी.. खुश होकर ऋतु ने नीरू को अपनी बाहों में भर लिया.. नीरू नज़ाकत से मुस्कुराइ और शर्मकार दूसरी तरफ चेहरा कर लिया....


"मुबारक हो देव साहब! आख़िर आपको भाभी जी मिल ही गयी.." रवि ने रोहन कोछेड़ते हुए उसका गाल पकड़ कर खींच लिया..


"क्या है यार?" रोहन उपरी मंन से गुस्सा दिखता हुआ बोला और फिर हँसने लगा.. दिल को मिले इस बेपनाह सुकून को भला कब तक छिपाता...


"क्या है? आबे लल्लू तेरा ब्याह है.. अब तो.. और क्या रह गया अब..? " रवि खुश होकर बोला....


नीरू से ज़्यादा देर रोहन से नज़रें मिलाए बिना रहा ना गया.. वह फिर से सीधी होकर रह रह कर रोहन को देखने लगी...


"लेकिन भाभ.. सॉरी..." रवि अपनी बात अधूरी छ्चोड़ कर नीरू की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगा.. नीरू ने दो पल उसको घूर कर देखा और फिर खिलखिला कर हंस पड़ी... उसके हंसते ही मानो माहौल में मोती से बिखर गये हों.. सभी रवि की और देख कर हँसने लगे...


"मतलब.. अब लाइन क्लियर है.. भाभी जी बोल सकता हूँ ना आपको..?" रवि ने भी कह कर दाँत निकल दिए....


"हूंम्म.." नीरू ने इतना ही कहा और नज़रों को शरारती अंदाज में सिकोड कर रोहन की और देखने लगी," इनसे पूच्छ लो!"


"ये तो कब का इसी फिराक़ में धक्के खा रहा है भाभी जी.. इस'से क्या पूच्छना.. पर अब टीले पर जाकर करना क्या है..? और आप अकेले क्यूँ जाओगे.. मैं भी चलूँगा.. मैं नही मान'ने वाला इस बार!" रवि ने पहले नीरू को और फिर रोहन को देख कर कहा...


"नही.. जाना तो पड़ेगा ही.. रोहन के सपने में प्रिया ने क्या कहा है.. याद नही क्या?" नीरू ने सवाल किया....


"हां यार.. मेरी बेहन का दिल तो वहीं पर है.. यही बात है ना?" ऋतु ने नीरू से पूचछा....


"ओह्ह हां.. पर अकेले क्यूँ? मैं भी साथ चलूँगा...!" रवि ने कहा..


"पर पापा को इस बारे में पता नही चलना चाहिए कि हम टीले पर जा रहे हैं... वो हमें वहाँ नही जाने देंगे.. अकेले तो बिल्कुल भी नही.. मैं अपने आप उनको कुच्छ कह दूँगा.. तुम सब ध्यान रखना.. उनको खबर नही होनी चाहिए..." रोहन ने सबको चेतावनी दी....


"ठीक है यार.. देख लेंगे.. पर नीरू तुम पूरी कहानी सूनाओ ना.. मैं कब से सुन'ने को बेकरार हूँ....!" ऋतु मचल कर बोली...


"हां हां.. भाभी जी.. जो कुच्छ आपको याद आया है.. सब सूनाओ..!" रवि ने कहा...


"सब कुच्छ याआद आ गया है.. बीच में मत बोलना!" नीरू ने कहा और सब शांत हो गये....


नीरू ने उनको देव को पहली बार देखने से लेकर कहानी सुनानी शुरू कर दी....


सपने की कहानी पूरी होने के बाद काफ़ी देर तक चारों सन्न होकर बैठे रहे.. किसी की समझ में नही आ रहा था कि कैसी प्रतिक्रिया दें... रोहन को तो विश्वास ही नही हो रहा था कि वह कभी 'देव' रहा होगा...


"कब चलें टीले पर..?" रवि नीरू के चुप होने के बाद बोलने वालों में सबसे पहला था...


"तुम नही जा रहे हो! सिर्फ़ हम दोनो जाएँगे वहाँ.." नीरू ने ज़ोर देकर कहा...


"पर मैं क्यूँ नही भाभी जी? मुझे भी चलना है.. मैं भी देखूँगा कि आपको सब याद आ जाएगा तो आप क्या करोगे?" रवि ने मचलते हुए कहा तो रोहन ने उसकी और घूर कर देखा.. शायद ग़लत मतलब निकल लिया था उसकी बात का...


"पर किसी ना किसी को तो लेकर जाना ही पड़ेगा... वैसे भी वहाँ रात को जाना है.. हमारा अकेले चलना ठीक नही है..." रोहन ने रवि की बात का समर्थन किया...


"हां.. यही तो मैं कह रहा हूँ.." रवि ने अपनी टाँग फँसाई...


"ओके.. तो फिर चारों चलते हैं... पर तुम दोनो टीले के पास बाहर खड़े हो जाना.. अंदर तो हम अकेले ही जाएँगे...." नीरू ने उनकी बात मान ही ली....


"तो आज ही चलें क्या? " रवि ने खुश होकर कहा...


"और क्या? चलना है तो आज ही चलो.. फिर हमें वापस भी तो जाना है..." ऋतु ने भी रवि की बात का समर्थन करते हुए कहा...


"हुम्म.. ठीक है.. मैं पापा को फोन करके गाड़ी मंगवा लेता हूँ.. उनको मैं यही बोलूँगा कि हम दोस्त के पास जा रहे हैं.. !"


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"क्या हुआ तुम्हे.. दार लग रहा है क्या? अभी तो गाँव में ही है यार.. तू ऐसा करेगा तो हमारा क्या हाल होगा..." रवि ने रोहन की आँखों में आँसू देख कर पूचछा...


रोहन ने कोई जवाब नही दिया.. वो उस वक़्त श्रुति के घर के सामने से गुज़रे थे... घर का बंद दरवाजा देख रोहन की आँखें नम हो गयी थी... श्रुति का मासूम चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम गया था.. बेचारी!!!


"क्या हुआ?" पीछे बैठी नीरू ने रवि की बात सुनकर कहा...


"कुच्छ नही.. वो.." रोहन ने रुक कर एक लंबी साँस ली," पीछे वाला घर श्रुति का था..."


"कौनसा?" तीनो ने एकदम पलट कर पिछे देखने की कोशिश की..," ये.. जो अभी गया है.. अकेला सा घर..!" ऋतु ने पूचछा...


"हां!"


"हमें चलना चाहिए था वहाँ..." नीरू ने कहा...


"दिल तो मेरा भी कर रहा है.. पर हिम्मत नही हो रही..!" रोहन ने जवाब दिया...


"तुम तो पागल हो यार.. जो भी हुआ.. उसमें हमारी क्या ग़लती है...? फिर उसके बापू से मिलकर आना उसको अच्च्छा ही लगता..." रवि ने कहा...


"हां.. हां.. चलो.. एक बार हो आते हैं..!" ऋतु ने कहा....


"अभी तो ग्यारह बजने वाले हैं.. आगे गाड़ी नही जाएगी.. पैदल चलने में घंटा भर लग जाएगा.. 12 बजे तक वहाँ पहुँचना है हमें... आते हुए देख लेंगे...!" रोहन ने कहा और गाड़ी चलाता रहा...


"क्या? इस सुनसान रास्ते पर पैदल चलना पड़ेगा? वो भी इतनी रात में..?" ऋतु सिहर सी गयी," मुझे तो तुम वहीं उतार देते.. श्रुति के घर..!"


"हा हा हा हा.. अब क्या हो गया...?" रवि ने मज़ाक किया...


"तुम्हे कुच्छ कहा है मैने? अपना मुँह सीधा रखो..." ऋतु खिज कर बोली....


"कम से कम यहाँ तो मान जाओ! तुम्हारी तो कुत्ते बिल्ली जैसी दोस्ती है..." नीरू ने बीच बचाव करने की कोशिश की....


"हे हे हे... रवि को कुत्ता बोला..." ऋतु ठहाका लगा कर हँसने लगी....


"नही.. नही.. मैने ये नही बोला.. मेरा ये मतलब नही था..." नीरू हड़बड़ा कर सफाई देने लगी....


"कोई बात नही भाभी जी.. यहाँ सब चलता है.. पर इसको बिल्ली की जगह कोई बढ़िया सा नाम देना चाहिए था.... जैसे छिप्कलि.. हा हा हा!"


"लो.. गाड़ी यहीं खड़ी करनी पड़ेगी.. आगे पैदल ही चलना है... टॉर्च लाया है ना?" रोहन ने गाड़ी को साइड में खड़ा करते हुए रवि से पूचछा....


"हां.. लाया हूँ..." रवि ने कहा और सब गाड़ी से उतर गये....


रास्ता पिच्छली बार की तरह ही डरावना, बेढंगा और सुनसान था.. पर जाने क्यूँ रोहन को आज डर नही लग रहा था.. शायद वह खुद को आज देव के रूप में ही देखना और दिखाना चाह रहा था... या फिर नीरू के साथ होने से उसको मानसिक मजबूती सी मिल रही थी... नीरू भी उसके पीछे पीछे ध्यान से चल रही थी.. नीरू के पीछे ऋतु और सबसे लास्ट में टॉर्च को हाथ में लिए रवि था...


"इतनी तेज मत चल यार.. मैं पिछे रह जाती हूँ..." ऋतु ने नीरू का कमीज़ पकड़ कर खींच लिया....


"मैं क्या करूँ? यही भगा जा रहा है..." नीरू ने उसके साथ होकर कहा...


"आए भाई.. ज़रा आराम से चल ले... मैं पिछे रह गया तो वापस भाग जाउन्गा.. पहले बता रहा हूँ..." रवि ने नीरू की बात सुनकर कहा....


"बोलो मत यार.. चुपचाप चलते रहो... हमें 12 बजे से पहले ही पहुँच लेना चाहिए..." रोहन ने अपनी चल धीमी नही की....


"बोलो मत बोल रहा है.. यहाँ मेरी जान सूख रही है.. किसी ने पिछे खींच लिया तो.. तुम तो समझोगे मैं वापस भाग गया... मैं गुम हो जाउ तो मुझे ढूँढ लेना भाई... मुझे लग रहा है कि मेरे पिछे पिछे कोई चल रहा है...!" रवि ने चलते चलते कहा...


"आईईईईईईईईई..." ऋतु अचानक चीख कर नीरू से लिपट गयी....


सब अचानक चौंक कर खड़े हो गये," क्या हुआ ऋतु?" नीरू ने उसको संभालते हुए पूचछा....


"कुच्छ नही... ये खंख़्वाह डरा क्यूँ रहा है मुझे..." ऋतु रुनवासी सी होकर बोली....


"लो.. आगे पिछे मैं ही मिलता हूँ तुम्हे कोसने को.. मैने क्या किया है..." रवि ने पूचछा...


"ये... ऐसे क्यूँ बोल रहा है कि इसके पिछे कोई है.. मेरी तो जान ही निकल गयी थी.." ऋतु ने रवि के सवाल का जवाब नीरू को दिया... अब की बार उसने नीरू का हाथ नही छ्चोड़ा....


" क्यूँ नही बोलूं? किसी ने कहा था क्या साथ आने को...? मुझे तो लग रहा है... ऐसे भी लग रहा है जैसे कोई मेरा कॉलर पकड़ कर खींच रहा है... और झाड़ियों में से बड़ी बड़ी आँखें भी चमकती हुई दिखाई दे रही हैं... तू तो गयी आज!" रवि ने चटखारा लेकर कहा.... ऋतु ने एक बार फिर डर कर नीरू को कसकर पकड़ लिया...


"नही.. मुझे नही चलना आगे.. वापस चलो.. मुझे छ्चोड़ कर आ जाना.." ऋतु सहम सी गयी थी...


"क्यूँ बकवास कर रहा है यार... अब तो पहुँच ही गये... वो देखो लाइट जल रही है..." रोहन ने हाथ से इशारा किया.. तभी अचानक नीरू चक्कर खा कर गिरने को हो गयी...


"क्क्या हुआ.. शीनू...? ये.. शीनू को क्या हो गया?" उसको अपनी बाहों में संभाल कर ऋतु डर के मारे रोने लगी....


"कुच्छ नही.. यूँही चक्कर सा आ गया था..." नीरू अपने माथे पर हाथ लगाकर बोली.. और फिर से खड़ी होकर रोशनी की और देखने लगी...," तुम यहीं रुक जाओ.. आगे हम अकेले जाएँगे.."


"नही.. मैं यहाँ नही रहूंगी.. इसके साथ तो बिल्कुल भी नही.. ये तो मुझे डरा डरा कर ही मार देगा....!" ऋतु ने रवि की और अंधेरे में घूर कर कहा...


"पर ये क्यूँ नही चल सकते... मुझे तो... चलो ठीक है... रवि भाई.. क्या कर रहा है यार.. ये कोई मज़ाक का टाइम है?" रोहन ने रवि की ओर देख कर कहा....


"चलो ठीक है.. मैं कुच्छ नही कहूँगा.. पर अगर यहाँ पिछे से कोई आ गया तो....." रवि ने कहा....


"देख लो.. देख लो इसको.. मैं इसके पास नही रहूंगी.. इस'से अच्च्छा तो इसको भी ले जाओ अपने साथ.. मैं अकेली ही रह लूँगी....


"प्लीज़ रवि! मान जाओ ना..." नीरू ने प्यार से कहा तो रवि ने तुरंत अपनी दूम सीधी कर ली ( ) ठीक है भाभी जी... आप लोग जाओ.. मैं इसकी अपनी जान से भी ज़्यादा हिफ़ाज़त करूँगा...."


नीरू मुस्कुरा दी... और फिर रोहन की और देख कर बोली...," चलो!"


रवि और ऋतु को वहीं छ्चोड़ कर वो दोनो आगे बढ़ गये......



"क्या हुआ? आप चुप क्यूँ हो?" नीरू ने चलते चलते रोहन को टोका...


"आ.. नही.. कुच्छ नही.. आगे कीचड़ है.. इसीलिए संभाल कर चल रहा हूँ..." रोहन ने नीरू के टोकने पर कहा.. ये पहली बार था जब वो दोनो अकेले थे.. और कोई नही था उनके साथ...


"नही आएगा.. आप आराम से चलते रहो!" नीरू ने चहकते हुए कहा...


"तुम्हे नही पता.. पिच्छली बार हमारी पॅंट घुटनो तक कीचड़ में सन गयी थी... एक बात पूच्छू...?" रोहन ने कहा...


"हुम्म.. कुच्छ भी पूच्छो.." नीरू उसी अंदाज में बोली...


"तुम्हे सच में डर नही लग रहा या तुम डर को च्चिपा रही हो...?" रोहन ने सवाल किया...


"नही.. डर नही लग रहा.. हमें डर क्यूँ लगेगा?" नीरू ने कहा...


" इतनी रात में हम यहाँ सुनसान रास्ते पर चल रहे हैं... तुम वैसे भी लड़की हो.. डर लगना तो लाजिमी है... अरे.. कीचड़ सच में नही मिला.. हम तालाब के पार पहुँच गये.." रोहन ने हैरत से कहा और अचानक उसको कुच्छ ध्यान आया..


वा तुरंत पिछे पलट कर खड़ा हो गया.. उसके रुकते ही नीरू भी एकदम वहीं खड़ी हो गयी...


"क्क्कऔन हो तुम?" रोहन उसको ग़ौर से देखता हुआ एक कदम पिछे हट गया...


नीरू मुस्कुराने लगी..," हम नीरू हैं.. और कौन? चलो भी अब!"


"नही.. क्कौनसी वाली नीरू? सच बताओ प्लीज़..." रोहन उसके मुँह से दो बार अपने लिए 'हम' शब्द सुन चुका था.. पहले तो नीरू ऐसे नही बोलती थी कभी... और उसने ये भी बता दिया कि कीचड़ नही मिलेगा... उसको अहसास हुआ शायद वो नीरू नही बुल्की 'प्रिया' है....


नीरू कुच्छ देर यूँही खड़ी मुस्कुराती रही फिर अचानक वह आगे बढ़ कर रोहन से लिपट गयी," हम आपकी नीरू हैं जान.. देव की प्रिया... और कौन?"


"नही... मतलब.. तुम.. आइ मीन.. तुम इस जनम वाली नीरू हो या.. प्रिया.." रोहन नीरू की इस हरकत से एकदम हड़बड़ा सा गया....


नीरू रोहन से यूँही लिपटी खड़ी रही.. उसने रोहन के सवाल का जवाब कुच्छ यूँ दिया," आप कैसे समझोगे..सदियों बाद मिले हो आप... कितने तडपे हैं आपके लिए.. कैसे बतायें...? क्या क्या नही किया! कहाँ कहाँ नही ढूँढा आपको! इस दुनिया के भी नियम तोड़े और उस दुनिया के भी... पर देख लो जान.. आख़िरकार हम आपके हो कर ही रहे.. हमने कहा था ना..आपके रहेंगे जनम जनम..! आपके ही रहे... हर जनम.. आपके सिवाय किसी के बारे में सोचा तक नही.. प्यार क्या होता है? मेरे शरीर ने जाना तक नही कभी... हमारा दिल यहीं तड़प्ता रहा.. आपके लिए.. यहाँ.. इस तन्हा वीराने में.. " बोलते हुए नीरू फफक फफक कर रोने लगी...


रोहन का गला भर आया.. उसने झिझकते हुए नीरू को अपनी बाहों में भर लिया....," आइ लव यू जान!" उसने नीरू को कसकर अपनी बाहों में भींच लिया...," ये सब तुम्हारे ही प्यार की वजह से हो पाया... मुझे तो कुच्छ याद ही नही था.. हां.. सब कहते थे.. तुम खोए खोए से लगते हो.. पर.. मैं.. मुझे कभी अहसास नही था कि मेरा क्या गुम हो रखा है.... हां.. ऐसा लगता था कि कुच्छ ढूँढ रहा है मंन... आज जाकर मंन शांत हुआ है..."


दोनो ना जाने कितनी देर यूँही खड़े रहे.. खामोश... अब सिर्फ़ उनके दिल धड़क रहे थे.. साँसें बात कर रही थी.... और वक़्त मानो वहीं ठहर सा गया था...


"अब क्या करें? " रोहन ने कुच्छ देर बाद चुप्पी तोड़ी...


"कुच्छ मत बोलो अभी.. हमें शादियों बाद ऐसा सुकून मिला है.. इस लम्हे को अपनी साँसों में समेट लेने दो..." नीरू रोहन से यूँही चिपकी खड़ी रही...


कुच्छ देर बाद वह नज़रें झुकाए उस'से दूर हटकर खड़ी हो गयी.. सिर्फ़ थोड़ी सी दूर...


"वापस चलें क्या?" रोहन ने पूचछा...


"नही.. वो लॉकेट लाना है.. जो आप मुझे पहना कर गये थे.. इसीलिए तो आपको यहाँ बुलाया था...." नीरू ने जवाब दिया....


"पर.. तुम तो.. मतलब नीरू ने सपने में देखा था कि लॉकेट उस.. कुँवरपाल ने भत्ति में फैंक दिया था.. वो जला नही क्या?" रोहन ने पूचछा...


"नही.. वो जल जाता तो हम यहाँ किसके सहारे रहते... वो तो शादियों से यूँही आसमान के सितारे की भाँति दमक रहा है... वो देखो.." नीरू ने रोशनी की ओर इशारा किया...


"क्या? वो.. लॉकेट है? वो तो किसी बल्ब की भाँति चमक रहा है.. और वो जगह तो हमें कभी मिली ही नही.... हमने उस दिन कितना ढूँढा था उसको...!" रोहन आस्चर्य से रोशनी की तरफ देखता हुआ बोला.....


"मिल जाएगा आज.. हम आपके साथ हैं ना.. चलो तो सही..." नीरू ने उसकी बाँह पकड़ी और आगे बढ़ गयी.....


उन्ही अंजानी सी गलियों से आगे बढ़ते हुए वो रोशनी की तरफ कुच्छ कदम आगे बढ़े थे कि रोहन को वही बच्चा खुशी से उच्छलता आता दिखाई दिया...


"दीदी.. मुझे ले चलो ना साथ!" उसने कहा और पास आकर खड़ा हो गया... उसके चेहरे पर वैसी ही मासूमियत थी.. वैसा ही सूनापन....


"ये कुमार दीक्षित था.. हमारा छ्होटा भाई.. आज इसकी मुक्ति का समय आ गया है... इसका हाथ पकड़ लो.. और दूसरे हाथ से मेरा हाथ थामे रहो..." नीरू ने कहा...


रोहन ने अचरज से उसकी और देखते हुए खुश होकर अपना हाथ उसकी और बढ़ा दिया... बच्चा भाग कर आया और रोहन से बोला," चलो.. आप भी हमारे साथ रहोगे क्या?"


रोहन मुस्कुरा दिया.. उसको अब लेशमात्रा का भी डर नही लग रहा था...," हाथ पकड़ लो मेरा....!"


"पकड़ा हुआ है इसने.." नीरू ने कहा और चलती रही...


पीपल के उस पेड़ तक पहुँचने में आज उनको उतना ही टाइम लगा जितना नितिन को दिन में आने पर उसके पास जाने में लगा था... रोहन आस्चर्य से पीपल की एक उँची शाखा पर किसी तारे की तरह चमक रहे लॉकेट को देखने लगा कि अचानक चौंक पड़ा..," वो.. बच्चा कहाँ गया... सॉरी.. तुम्हारा भाई..."


नीरू मुस्कुरकर बोली," चला गया वो.. उसको रास्ता मिल गया.. इस जहाँ से रुखसत होने का.. कितने सालों से भटक रहा था बेचारा... " नीरू आँखों से आँसू पौंचछते हुए बोली...," जाओ.. उस लॉकेट को उतार कर ले आओ अब!"


"हुम्म. अभी चढ़ता हूँ..." रोहन का उत्साह देखते ही बन रहा था... वह बिना डरे पीपल के पेड़ पर चढ़ा और लॉकेट के पास जाकर उसको निहारने लगा... लॉकेट किसी हीरे की तरह लग रहा था... रोहन ने टहनियों में अटकी हुई उसकी डोर सुलझाई और उसको लेकर नीचे आ गया...," ले आया मैं.. अपना लॉकेट... अब इसको पहन लूँ क्या?"


नीरू हँसने लगी," इसको आप हमें भेंट कर चुके हो.. याद नही है क्या..?" नीरू ने कहा और लॉकेट को देखने लगी...


"तो क्या करूँ इसका ?" रोहन ने पूचछा....


"हमें पहना दो.. और क्या करोगे....?" नीरू मुस्कुराती हुई बोली.. और फिर अचानक अपना हाथ उठा दिया....," हमें ले चलना यहाँ से.. कहीं यहाँ छ्चोड़ कर भाग जाओ...!"


रोहन उसकी और देख कर प्यार से मुस्कुराया और किसी वरमाला की तरह उसके गले में लॉकेट पहना दिया.... लॉकेट पहनते ही पहले से ही उसके हाथ पकड़ कर खड़ी नीरू उसकी बाहहों में झूल गयी....


रोहन एक पल के लिए तो घबरा ही गया था... अचानक उसको नीरू की कही बात याद आ गयी.. रोहन ने उसको बाँहों में उठाया और वापस चल पड़ा....


नीरू को अपने कंधे पर उठाए जैसे ही रोहन रवि और ऋतु को दिखाई दिया.. दोनों भय और आशंका के मारे उच्छल पड़े...," क्या हो गया?" दोनों के मुँह से एक साथ निकला....


रोहन के पास आने पर जब उन्होने उसको मुस्कुराता हुआ देखा तो दोनो की जान में जान आई...


"क्या हो गया भाई, भाभी जी को?" रवि ने पूचछा...


"कुच्छ नही.. ठीक है.. पर अब तक तो होश आ जाना चाहिए था..." रोहन ने कहा..," ज़रा बोलना इसको..."


"नीरू.. नीरू.. आए शीनू..." ऋतु ने उसके गालों को थपथपा कर देखा," क्या हो गया इसको?" ऋतु एक बार फिर घबरा गयी....


"कुच्छ नही.. हो जाएगी ठीक.." रोहन ने कहा.. पर अब उसको भी चिंता होने लगी थी," चलो.. जल्दी.. गाड़ी में चल कर देखेंगे..." रोहन उसको यूँही अपने कंधों पर डाले रहा.....


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गाड़ी तक पहुँचते पहुँचते रोहन की साँस फूल गयी थी...," ज़रा अंदर की लाइट ऑन करना.. मैं इसको पिछे लिटाता हूं.." रोहन ने रवि की तरफ चाबियाँ उच्छाल दी...


लॉक खुलते ही रोहन ने दरवाजा खोला और नीरू को अंदर लिटा दिया... चिंता में उसके चेहरे की ओर देखते हुए रोहन ने जैसे ही उसके गाल थपथपाए.. नीरू की हँसी छ्छूट गयी और उसने बैठ कर अपना चेहरा छिपा लिया....


उसके हंसते ही सबके चेहरे खिल गये.. ऋतु भी दूसरी तरफ से दरवाजा खोल अंदर आ चुकी थी," तुम ठीक तो हो ना....!"


नीरू की रेशमी लतें रोहन से उसका चेहरा च्छुपाए हुए थी.. उसने शर्मकार ऋतु की तरफ देखा," हां.. ठीक हूँ.. मुझे क्या हुआ है....?"


"तुझे नही पता? तू बेहोश हो गयी थी... रोहन तुझे कंधे पर उठाकर यहाँ तक लाया है.. 4-5 किलोमीटर तो होगा ही..." ऋतु ने कहा....


"हां.. पता है..!" नीरू ने जवाब दिया...


"क्या पता है...?" ऋतु ने फिर पूचछा....


नीरू उसके कान के पास अपने होन्ट लेकर गयी," यही कि ये मुझे इतनी दूर से उठाकर लाया है.. मुझे वहीं होश आ गया था.. हे हे हे" नीरू ने कहा और खिलखिला कर हंस पड़ी....


"हैं? पता था तो बोली क्यूँ नही? हम कितने डरे हुए थे.. तुझे पता है.. और रोहन बेचारा कितनी दूर से तुम्हे गोद में लेकर आया है... ये परेशान नही हुआ होगा क्या?" ऋतु ने राज बनाकर कान में कही गयी बात का खुल्लम खुल्ला ढिंढोरा पीट दिया... नीरू ने शर्मकार फिर से अपना मुँह छिपा लिया.. रोहन से!


"ले बेटा... अपने बड़े सही कहकर गये हैं.. आदमी शादी के बाद गधा बन जाता है.. हा हा हा.. तू तो पहले ही भाभी जी को ढोने लगा..." रवि भला मिला हुआ मौका कैसे छ्चोड़ता....


पर रोहन तो दूसरी ही दुनिया में खोया हुआ था... गाड़ी चलाते हुए वह सोच रहा था.. 'काश! गाड़ी थोड़ी और आगे खड़ी होती'


"तुम बोली क्यूँ नही पहले..? ऋतु ने बनावटी गुस्से से कहा और हँसने लगी...


"मुझे शर्म आ रही थी.. नीन्चे उतारने की कहते हुए..." नीरू ने ये बात भी उसके कान में कही....


"अब बताओ! क्या हुआ वहाँ?" रवि ने पूचछा...


"नही.. वो सब बाद में पूच्चेंगे.... श्रुति का घर आ गया है.. पहले उनके घर चलो..." ऋतु ने कहा.....


"पर इस वक़्त.. रात के 1:30 बजे...?" रवि ने कहा....


"हां हां.. क्या पता हमें कल ही वापस जाना पड़े.. नीरू के पापा आ रहे हैं ना...!" ऋतु ने कहा....


रोहन ने थोड़ी देर सोच कर गाड़ी श्रुति के घर के बाहर ही खड़ी कर दी... सब नीचे उतरे और दरवाजे पर जाकर खड़े हो गये....


रोहन सबसे आगे था.. उसने दरवाजा खटखटाया.. पर कोई जवाब नही मिला....


2 - 4 बार और दरवाजा खटखटने पर अंदर से श्रुति के पिता जी की आवाज़ आई," आता हूँ भाई.. कौन है?"


रोहन के मुँह से आवाज़ निकल ही नही पाई...


"नमस्ते अंकल जी!" जैसे ही छर्ररर की आवाज़ के साथ दरवाजा खुला.. सबने प्रणाम किया...


"कौन?" श्रुति के पिता जी ने ध्यान से देखा तो वह रोहन को पहचान गया," अरे आओ आओ.. बेटा.. आज फिर इतनी रात को...? आओ.. अंदर आ जाओ..."


रोहन को कुच्छ कहते सुनते ही नही बन रहा था.. अब कहे भी तो क्या कहे.. इतनी पुरानी बात को फिर से ताज़ा करके वह श्रुति के पिता जी के ज़ख़्मों पर नमक च्चिड़कना नही चाहता था....


"ये.. बच्चियाँ कौन हैं..?" उन्होने पूचछा और अंदर जाकर कमरे का दरवाजा खटखटा कर बोला," श्रुति बेटी.. ज़रा उठना एक बार !!!!!!!!!!!!!


"श्रुति!" सबके मुँह से अचानक एकसाथ निकला....


"हां.. मेरी बेटी है.. ये..." अंकल जी ने नाम याद करते हुए कहा," रोहन तो जानता है..." अंकल जी ने शायद ध्यान ने दिया कि सबसे पहले आसचर्या से उसी के मुँह से नाम निकला था.....


तभी दरवाजा खुला और बला की हसीन श्रुति अंगड़ाई सी लेते हुए बाहर निकली.. पर 2 लड़कों को सामने खड़ा देख शर्मा गयी और अचानक अपने हाथ नीचे कर लिए.. उनमें से एक को वा अच्च्ची तरह जानती थी......


रोहन और रवि को तो जैसे अपनी आँखों पर विस्वास ही नही हुआ.... ," ययए.. यहाँ... कैसे आई....?"


श्रुति के साथ ही चौंक कर पिता जी ने भी रवि को देखा..," सपना देख रहे हो क्या बेटा... रात को ये अपने घर पर नही तो कहाँ होगी... !" तुम अंदर बैठो.. मैं आता हूँ.. बेटा.. कुच्छ खाना वाना....?"


"जी बापू... अभी बना देती हूँ... " कहकर वो रसोई घर की ओर चल दी... ऋतु और नीरू भी हैरत से कुच्छ जाने को उत्सुक होकर उसके साथ ही चली गयी....


रवि से अंदर बैठे ना रहा गया...," एक मिनिट अंकल जी... मैं अभी आता हूँ..." कहकर वो बाहर निकला और लड़कियों की आवाज़ सुनकर रसोई में ही घुस गया....


अब तक खिलखिला रही श्रुति रवि को देखते ही एकदम चुप हो गयी... ऋतु और नीरू रवि की ओर देखने लगी...


"एक मिनिट... तुम्हे छ्छू कर देख लूँ क्या?" रवि ने मरा सा मुँह बनाकर कह दिया....


श्रुति ने चौंक कर उसकी ओर देखा... वह उसकी बात का मतलब नही समझ पाई...


पर इतनी देर रवि को शांति कहाँ होती... उसने उंगली से श्रुति के हाथ को च्छुआ और आस्चर्य से बोला..," तुम तो.. बतला....?" कहकर वो चुप हो गया...


"बतला? क्या कह रहा है ये?" श्रुति ने नीरू की ओर देख कर धीरे से पूचछा....


"तुम जाओ.. हम बात कर लेंगे...!" ऋतु ने कहा और रवि की ओर घूर कर देखा...


रवि तो उसस्पर बतला से ही फिदा हो गया था...," तुम्हारी शादी हो चुकी है क्या?" उसने ऋतु की बात पर गौर नही किया....


श्रुति हंस पड़ी..,"क्या बोल रहे हो? मुझे कुच्छ नही पता...!"


"नही... मैं भी कुँवारा हूँ.. इसीलिए..." रवि अपनी बात को पूरी कर भी नही पाया था कि ऋतु ने उसको धक्का देकर रसोई से बाहर निकाल दिया....


"ये मुझे हाथ लगाकर क्यूँ देख रहा था..?" श्रुति ने मुस्कुराते हुए पूचछा....


"वो तो हमने भी लगाकर देखा था.. तुमने ध्यान नही दिया होगा..." ऋतु ने कहा," बहुत अजीब कहानी है .. तुम्हे विश्वास नही होगा....!"


"क्या? क्या हो गया?" श्रुति ने पूचछा....


ऋतु को जितनी कहानी पता थी.. उसने श्रुति को सुना डाली... और फिर बोली," ज़रूर वो तुम्हारी कोई हमशकाल होगी....."


ऋतु की आँखों से नितिन के साथ बिताई वो रात याद करके भर आई...," हां.. वो कमीना मुझे ज़बरदस्ती बतला ले जा रहा था, यही सब करवाने के लिए... और मजबूरी थी.. मुझे जाना भी था.. पर खुसकिस्मती से जाने कैसे वो मुझे नही ले गया.... उसने जहाँ मुझे बुलाया था.. वहाँ मैं 1 घंटा इंतजार करके वापस आ गयी.... वो नही आया... मैं तो 3-4 दिन तक डरी डरी कॉलेज जाती रही.. कि कहीं वो हरमज़दा फिर ना आ जाए....!" श्रुति ने अपने आँसू पौच्छे....


"तो.. तो फिर वो कौन थी...?" नीरू और ऋतु के मुँह आस्चर्य से खुले के खुले रह गये......


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"अंकल जी!" सुबह रोहन ने हिचकते हुए बात शुरू की....


"हां.. बेटा.. बोलो?"


"ववो... आप कह रहे थे मुझे... वो.. कि अगर श्रुति के लिए कोई अच्च्छा.. रिश्ता मिले तो बताउ..." रोहन ने रवि के ज़ोर डालने पर बात कह ही डाली....


"हां.. कोई हो तो ज़रूर बताओ बेटा.. अब तो श्रुति भी शादी करने को मान गयी है....


"मैं हूँ!" रवि रोहन के सोच कर टुकूर टुकूर बोलने का इंतजार कर ही नही पाया...


"हूंम्म..." अंकल जी की समझ में नही आया कि अचानक दागे हुए इस गोले का जवाब कैसे दे..," मैं पूच्छ कर बताता हूँ बेटा......" कहा और बाहर चला गया...


अंकल जी के जाते ही रोहन ने खींच कर रवि के कान के नीचे बजा डाला..," तुझे ये भी नही पता की कौनसी बात कब करते हैं.. मेरी भी इन्सल्ट करवा दी.. मैं बात कर रहा था ना....."


"अच्च्छा.. साले.. मतलब निकलते ही अपने आपको प्यार का पीएच.डी. मानने लग गया.. कल तक तो फट रही थी तेरी.... देख लेना.. वो जवाब हां में ही देगी......!" रवि बत्तीसी निकाल कर बोला....


कुच्छ देर में श्रुति के पिता जी वापस आ गये...," बेटा.. हम ग़रीब लोग हैं.. लेने देने को तो कुच्छ खास होगा नही.. सिर्फ़ मेरी बेटी के अलावा...!"


"कैसी बात कर रहे हो पापा.. ( ) .. मेरा तो इसीमें जीवन धन्य हो जाएगा.... दहेज के तो मैं एकदम... बिल्कुल... पूरा खिलाफ हूँ.." रवि चहक कर बोला.....


"ठीक है बेटा.. श्रुति को कोई ऐतराज नही है.. मैं तुम्हारे घर आ जाता हूँ रिश्ता लेकर.... वो मान तो जाएँगे ना..." अंकल जी ने पूचछा...


"आप चिंता मत करो पापा.. उनको तो मैं आपके आने से पहले ही मना कर रखूँगा... कहो तो मैं ही आ जाउ.. उनको लेकर..." रवि भी रवि था....


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"तुम्हे गाड़ी चलानी आती है क्या?" नीरू ने रवि से पूचछा...


"हां.. आपके शहर में ही सीखी है.. अमन भाई से.... क्यूँ?" रवि ने पूचछा...


"तो तुम क्यूँ नही चलते...." नीरू ने उसको कहा...


"ठीक है.. मैं चला लेता हूँ... नो प्राब्लम..." रवि ने रोहन के हाथ से चाबी छ्चीन ली....


"तुम्हे इसका पता नही है.. चलते हुए भी पिछे देखता रहेगा बात करते हुए.. कहीं भी घुसा देगा..." रोहन ने नीरू की तरफ देख कर कहा....


"तू चुपचाप बैठ जा.. भाभी जी ने क्या कहा है.. सुना नही क्या?" रवि ने कहा और खिड़की खोल कर धम्म से ड्राइविंग सीट पर जा बैठा... बेचारा रोहन साथ वाली सीट पर बैठ गया... ऋतु और नीरू के बैठते ही वो श्रुति और अंकल जी को बाइ करके निकल लिए.....


कुच्छ ही दूर गये होंगे.. अचानक रोहन को अपनी शर्ट खींचती हुई महसूस हुई... उसने पिछे देखा.. नीरू उसकी शर्ट को पिछे खींच रही थी....


"हूंम्म..." रोहन ने प्यार से उसकी और देखते हुए पूचछा....


नीरू ने उसको आँखों ही आँखों में कुच्छ इशारा किया..


"सॉरी मैं समझा नही..." रोहन ने जवाब दिया.....


नीरू के होन्ट धीरे से हीले.. पर वो बात भी रोहन के कानों के उपर से गुजर गयी....


"पता नही क्या कह रही हो.... ज़ोर से बोलो ना....!" रोहन ने थोड़ा तेज बोला.....


नीरू अंदर की बात को लीक होते देख गुस्सा हो गयी....," चुपचाप पिछे आ जाओ.. ऋतु बैठ जाएगी आगे...!"


समाप्त


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