माँ का दुलारा 5

 


मेरा और मा का संभोग शुरू होकर एक साल होने को आ गया था. एस.एस.सी की

फाइनल परीक्षा चल रही थी इसलिए चुदाई भी मा ने कम कर दी थी कि मेरी

पढ़ाई मे खलल न पड़े. बस रात को एक बार वह मुझे चोदने देती. मेरे

करियर के बारे मे वह बहुत सावधानी बरतती थी और मैं भी उसकी बात

मान कर पढ़ाई करता था. मा अब मेरी सब कुछ थी, मेरी मा, मेरी प्रेमिका,

मेरी देवी, मेरी मालकिन और मैं उसका पुत्र, गुलाम, पुजारी और प्रेमी था.

मेरी फरमाइश पर आज कल मा ने झान्टो को शेव करना बंद कर दिया था.

मुझे उसकी चिकनी बुर भी अच्छी लगती थी. पर मन होता था कि उसकी घनी

झान्टो मे मूह छुपा कर मा की बुर चूसने का मज़ा भी लेलू. मा ने झान्टे

काटना बंद कर दिया और एक महीने मे उसकी इतनी घनी झाँटे हो गयी जैसी

इंटरनेट पर 'हेरी' साइट मे दिखाते है. मैं तो नहाते समय वो गीली झाँटे मूह

मे लेकर उनसे टपकता पानी चुसता था. मूह मे भरकर चबा डालता था.

ऐसा करने मे मा की बुर का एकाध बाल मूह मे आ जाता था, वह भी मुझे

अच्छा लगता था.

कुछ दिनों से मा थोड़ी परेशान लगती थी. रात को भी अक्सर देर से आती थी.

मैने पूछा तो कुछ बोली नही, बस कह दिया कि काम ज़्यादा हो गया है. मा को

कंपनी के मॅनेजिंग डाइरेक्टर के स्टाफ मे ट्रांसफर कर दिया गया था. उसके

कारण काम का बोझ ज़्यादा हो गया था.


एक दिन मा ज़्यादा ही परेशान लग रही थी. रात को जब मैने उसे चोदा तो रोज की

तरह मस्त होकर नही चुदवा रही थी, बस मुझे खुश करने को आह आह कर

रही थी. उसकी आँखे खोई खोई थी जैसे कुछ और सोच रही हो. मैने झड़ने

के बाद उसे चूम कर कहा "मा, कुछ तो बात है, तुम परेशान हो, मुझे

बताओ मेरी कसम"

मा बोली "अब क्या बताउ बेटे और कैसे बताउ, तू समझ ही गया है तो बताना

पड़ेगा, वैसे बात बड़ी अजीब सी है, मुझे भी समझ मे नही आता क्या करू.

सोच रही हू कि नौकरी छोड़ कर और कोई पकड़ लू"


"क्यों मा, इतनी अच्छी नौकरी है तुम्हारी" मैने पूछा.

"हां पर वो मेरे नये बॉस है ना, मिसटर अशोक माथुर, वो ..." मा चुप हो

गयी. मैं समझ गया. मन मे अजीब सा लगा. मैं कब से सोच रहा था कि शायद

मा को अब एक और पुरुष की ज़रूरत लग रही होगी. क्या मा ने भी इस बारे मे

सोचना शुरू कर दिया था! मा खूबसूरत और सेक्सी थी और ऐसा कुछ होगा

इसका अंदेशा मुझे पहले ही हो गया था. पर मेरे अलावा मा को कोई इस तरह

से देखे यह भी मुझे गवारा नही हो रहा था "क्यों उन्होने कोई हरकत की

क्या मा?"

मा हंस पड़ी "अरे वैसी कोई बात नही है. वे तो काफ़ी सीधे सादे इंसान है.

उनकी बेटी शशिकला भी वही है ऑफीस मे. सारा प्राब्लम उसी की वजह से है"

मैने मा से पूछा तो धीरे धीरे उसने सारी बात बताई. बड़ी अजीब सी पर

मजेदार बात थी. कंपनी के मॅनेजिंग डाइरेक्टर अशोक माथुर करीब सैंतीस

साल के थे. उनकी सौतेली बेटी शशिकला करीब पच्चीस साल की थी और वही

ऑफीस मे मनेजर थी. उसकी शादी नही हुई थी. मा की बॉस वही थी.

"अशोक माथुर की इतनी बड़ी सौतेली बेटी, बाप बेटी की उमर मे सिर्फ़ बारह साल का

अंतर?" मैने अस्चर्य से पूछा. मा ने बताया कि अशोक माथुर ने शशिकला

की मा ललिता से पंद्रह साल पहले प्रेमविवाह किया था. ललिता कंपनी की

मालकिन थी और अशोक माथुर से दस साल बड़ी थी. अशोक माथुर ललिता की

कंपनी मे मॅनेजर थे. उनका अफेर एक दो साल चला और उसके बाद ललिता ने

बिना किसी की परवाह किए उनसे शादी कर ली. उस समय ललिता की तेरह साल की बेटी

थी, शशिकला.



दो साल पहले ललिता की एक दुर्घटना मे मृत्यु हो गयी थी, मा की नौकरी

लगने के कुछ दिन पहले. सही मायने मे शशिकला कंपनी की मालकिन थी

पर शशिकला ने मॅनेजिंग डाइरेक्टर बनने से इनकार कर दिया था और अपने

सौतेले डॅडी को वह पद दे दिया था. बाप बेटी मे काफ़ी प्यार था, सौतेले होने

के बावजूद. वैसे असली पावर सब शशिकला के ही हाथ मे थी. उससे पूछे बिना

अशोक माथुर कुछ नही करते थे.


मा ने ये सब बताया पर मुझे अब भी समझ मे नही आ रहा था. मैने फिर

पूछा कि शशिकला का क्या प्राब्लम है? मा ने आख़िर असली बात बताई. वह अब

शरमा भी गयी थी.


"अरे वो लड़की शशिकला मेरे पीछे पड़ी है एक महीने से" मा ने कहा "अब

तक मैं दूसरे डिविषन मे थी इसलिए मेरा उससे लेना देना नही था. पर अब तो

वह मेरी बॉस है. वह पिछले एक महीने से अजीब अजीब हरकते करती है मेरे

साथ."


"याने क्या करती है मा" अब मुझे भी उत्सुकता होने लगी थी. मैं कुछ समझ

भी रहा था और मेरा लंड यह सोच कर ही कुलबुलाने लगा था.


"मुझे लगता है कि वह लेस्बियान है. पहले तो बस मुझे घुरति थी, मेरी

नज़र बचा कर. अब सीधे मेरी ओर टक लगाकर देखती है. मुझे बार बार अपने

कमरे मे बुलाती है काम से. मैं पास खड़ी होती हू तो मेरे बदन को अनजाने

मे छू लेने का नाटक करती है. पिछले हफ्ते तो उसने एक बार बात बात मे मेरे

स्तन को छू लिया था. मैं पीछे हट गयी तो लगता है उसे गुस्सा आ गया. एक दो

दिन रूठी सी रही फिर मुझे जान बुझ कर ज़्यादा काम देने लगी कि मुझे रात को

रुकना पड़े"


मैने कहा "मा, लगता है तुम्हारी सुंदरता का जादू सिर्फ़ मर्दों पर ही नही,

औरतों पर भी होने लगा है. हो ही तुम इतनी सेक्सी. पर इसमे नौकरी छोड़ने

की क्या बात है?"


मा बोली "बेटे, मैने कभी उसे एंकरेज नही किया फिर भी वह मेरे पीछे पड़ी

है. मुझसे मीठा मीठा बोलती है, कभी मुझे अकेले मे दीदी कहती है, नज़र

गढ़ाकर मुझे अकेले मे देखती है जब मैं उसके सामने होती हू, मेरी छाती

और पेट को घुरति रहती है. अपना आकर्षण अब मुझसे छुपाने की भी

कोशिश नही करती. आज बोली कि बहुत काम है, इस शनिवार और रविवार को भी

करना पड़ेगा. फिर साजेस्ट करने लगी कि मैं शनिवार को सुबह उसके घर पर

आ जाउ और रविवार तक वही रहू. मैने पूछा कि अशोक माथुर भी होंगे तो

बोली कि वे महीने भर को अमेरिका जा रहे है. फिर उसने अचानक खेल खेल मे

मेरे गाल को छुआ और फिर अपने मूह को, मानो मुझे फ्लाइयिंग किस कर रही हो.

जब मैं चुपचाप खड़ी रही तो बदमाश ने मेरे गाल को चूम लिया और

हँसते हुए मीटिंग मे चली गयी"


कुछ देर चुप रह कर मा बोली "मुझे उसकी नियत ठीक नही लगती. मुझे

मालूम है कि वह वीकेंड मे क्या काम करना चाहती है, अब नौकरी

छोड़ने के अलावा मैं क्या कर सकती हू, आख़िर कंपनी उसी की है और वो बड़ी

जिद्दी किस्म की लड़की है, एक बार सोच ले तो ठान लेती है. और उसे भी न जाने क्या

पड़ी है कि ऑफीस की बाकी सब सुंदर जवान लड़कियों को छोड़कर मेरे पीछे

पड़ी है, सब एक से एक चालू लड़कियाँ है, उनमे से कई तैयार हो जाएँगी उसके

साथ मज़ा करने को"


मा की परेशानी को मैं समझ सकता था. पर मुझे एक अजीब सी गुदगुदी भी

होने लगी थी. मा और एक जवान युवती आपस मे लिपटे है, उन किताबों के

चित्रों जैसे, यह कल्पना ही इतनी मादक थी कि अभी अभी चोदने के बावजूद

मेरा खड़ा हो गया. मा को लिपट कर मैने कहा "मा, नौकरी छोड़ना है तो

छोड़ दो पर एक बात सच बताओ, मेरी कसम, शशिकला दिखने मे कैसी है?"

मा बोली "अच्छी स्मार्ट है, मिस वर्ल्ड भले ना हो पर एकदम अट्रॅक्टिव है. पर

उससे क्या फरक पड़ता है, क्यों पूछ रहा है?" मा का चेहरा अब लाल हो

गया था.



"मा, सच बताओ, तुझे वो अच्छी लगती है क्या, अगर उसने सच मे तेरे साथ

ऐसा किया तो तुझे बुरा लगेगा क्या?" मैने मा के स्तन दबाते हुए पूछा. मा

चुप रही, हा उसकी आँखों मे एक खुमारी सी भर आई थी.



मैं समझ गया. मा को भी वह भा गयी थी. पिछले दो तीन हफ्ते मे मैने

देखा था कि जब हम कभी वे सेक्सी किताबे देखते तो उसका ध्यान लेस्बियन

चित्रों पर ज़्यादा होता था. वैसे आज कल चुदवाने के बजाय अब वह चूत

चुसवाना ज़्यादा पसंद करती थी, आँखे बंद करके सिसकिया भरती रहती,

शायद एक स्त्री से बुर चुसवाने की कल्पना करती हो. शायद मैं क्या कहुगा इस

डर से वह मन की बात नही कह पा रही थी. मैं मा की हालत समझ गया था.

मेरे साथ, अपने सगे जवान बेटे के साथ चुदाई शुरू होने के बाद मा की

वासनाए जो अब तक दबी थी, भड़क उठी थी. मैं चाहता था कि मा मन भर

कर अपनी इच्छाए पूरी कर ले. अगर कोई गैर पुरुष होता तो मैं ज़रूर फिर से

सोचता. वैसे मुझे अब तक यही लग रहा था कि मा का ध्यान अगर बाहर कही

जाएगा तो वो किसी हॅंडसम नौजवान पर. पर यहाँ तो एक जवान सेक्सी और

खानदानी औरत की बात थी. और शायद मा का भी झुकाव था उस तरफ.





मैने मा की बुर मे उंगली डाली और अंदर बाहर करने लगा "मा, तू सोच कि

शशिकला ऐसे तेरे सामने बैठी है और तेरी चूत चूस रही है, अपनी जीभ

तुम्हारी इस रसीली बुर मे डाल डाल कर तुम्हारे अमृत का पान कर रही है और तू

झाड़ झाड़ कर सेक्स की भूखी उस युवती को अपनी बुर का शहद चटा रही है,

मज़ा आता है की नही इस ख़याल से? और रही बात जवान लड़कियों को छोड़कर

तुम्हारे पीछे पड़ने की, मैं समझ सकता हू, मा तुझे मालूम नही है कि

तुझमे कितनी सेक्स अपील है और उस अपील मे तुम्हारी इस गदराई उम्र और मासल

शरीर का भी एक बड़ा हिसा है! कई लेस्बियन लड़कियों को अपनी उम्र से बहुत

बड़ी औरतों से सेक्स मे बहुत मज़ा आता है. अब सच बोलो मम्मी, शशिकला

के साथ सेक्स के ख़याल से मज़ा आता है कि नही?"



मा सिसक उठी. अपनी टाँगे सटा कर मेरी उंगली को बुर मे क़ैद करके बोली

"बहुत मज़ा आता है बेटे. न जाने मुझे क्या हो गया है, मेरे बदन की आग अब

शांत ही नही होती, तूने तो मेरी बुर की वासना के जिन्न को जैसे अपने लंड की चाबी

से आज़ाद कर दिया है. मालूम है, जब शशिकला ने मुझे किस किया था तो मुझे

बड़ा मीठा लगा था वह किस. सच बेटे, अगर तुझे कोई आपत्ति नही है तो मैं इस

कन्या के साथ अपने मन की मुरादे पूरी करना चाहती हू, बहुत प्यारी लड़की

है, उसे देखकर ममता और प्यार भी आता है और एक अजीब सी भूख भी लग आती

है, उसे भोगने की भूख"



मैने मा को विश्वास दिलाया कि मुझे खुशी होगी अगर मा को चुदाई का हर

तरह का सुख मिले. मेरे मन मे यह भी छुपी इच्छा थी कि शायद इस चक्कर

मे मुझे भी कुछ करने का मौका मिल जाए. मा तो अप्सरा थी पर अब मेरी

वासना भी ऐसी धधकती थी की खूब चुदाई करने का मन होता था, अगर और

कोई भी मिल जाए तो क्या बात थी, हा मा की पसंद से, उसकी अनुमति के बिना

नही.



"मा, मेरे एग्ज़ाम तो कल ख़तम हो जाएँगे. तुम चली जाओ शनिवार रविवार के

लिए. पर मुझे दिखाओ तो कि मेरी मा की वह पुजारन कैसी दिखती है" मैने

मा से प्रार्थना की. 


मा अब बहुत खुश थी. उसके मन का बोझ उतर गया था.

"देखो बेटे, इस ऑफीस की मॅगज़ीन मे है उसका फोटो फ्रंट पेज पर. मेरे लाल,

तूने मेरे मन का बोझ हल्का कर दिया. मुझे सिखा दिया है कि सेक्स से बढ़ कर

कोई सुख नही है, यहा एक ही जीवन मिलता है और उसमे सब को अपनी हर इच्छा

पूरी कर लेना चाहिए. तेरा भी कही मन लगा हो तो मुझे बता, मैं भी यही

चाहती हू कि तू खूब सुख पाए, सिर्फ़ अपनी इस मा के आँचल से न चिपका रहे,

तेरी तो उमर है मज़ा लेने की"



मैने मा को विश्वास दिलाया कि अभी तक तो कोई ऐसा नही था जो उसके सामने

मुझे सेक्सी लगे. मा ने लाई मॅगज़ीन मे मैं देखने लगा. अशोक माथुर और

उसके साथ शशिकला का एक चित्र था. अशोक माथुर एक काफ़ी हॅंडसम आदमी

थे, तीस बत्तीस के आस पास के ही लगते थे. शशिकला को देख कर मेरा भी खड़ा

होने लगा. उसने स्लीवलेस ब्लॉज़ और नभिदर्शना साड़ी पहन रखी थी.

एकदम गोरी चित्ति थी. बाल छोटे बाब कट थे. सामने पारदर्शक पल्लू मे से

उसके उरोजो का उभार दिख रहा था. है हिल की स्टिलेटो सॅंडल पहने थी जिसमे

उसके गोरे पाव खूब फॅब रहे थे. चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास था, आख़िर

करोड़ों की मालकिन थी.



"माल है मा, तू फालतू परेशन होती है. चल कल ही उसे बता दे कि तू

शुक्रवार रात को ही आ जाएगी, आख़िर काम ख़तम करना ज़रूरी है." मैने

कहा. अब तक मा की चूत फिर से इतनी गीली हो गयी थी कि उसे कुछ और नही सूझ

रहा था. मैने तुरंत मा के प्रति बेटे का कर्तव्य निभाया, पहले उसकी बुर

चूस कर उसका सारा पानी निकाल लिया और फिर उसे इतनी देर और इतने ज़ोर से चोदा कि

वह सुख से बेहोश सी हो गयी.



सुबह मा तैयार हो रही थी तो मैने कहा "मा, तू बदल बदल कर सलवार

कमीज़, पॅंट सूट और साड़ी पहनती है. शशिकला को क्या अच्छा लगता है कुछ

अंदाज़ा है"



मा हंस कर बोली "अरे यह तो मुझे कब का मालूम है. जब भी मैं स्लीवलेस

ब्लॉज़ और साड़ी पहनती हू, उसकी आँखे चमक उठती है. मेरा पेट, पीठ,

कमर, बाहे उसमे से साफ दिखते है ना! जब सलवार कमीज़ या पॅंट सूट

पहनती हू तो उसकी नाक चढ़ जाती है"



"बस मा, अब इन बचे दो दिनों मे तुम एक से एक साड़ियाँ पहनो. देखो कैसे

परेशान हो जाएगी शशिकला."



दूसरे दिन मेरा आखरी पेपर था. मैं दोपहर को पेपर देकर आया और सो गया.

आज शाम मेरे लिए मुरदों की शाम थी. बहुत दिनों के बाद मा के साथ रात

भर रति करने वाला था, पिछले एक महीने से एग्ज़ाम के कारण बस रात मे एक

बार का राशन था.



मा आज जल्दी आ गयी. बहुत खुश लग रही थी. मैं चिपट गया. उसे ठीक से

कपड़े भी नही बदलने दिए, वैसे ही धक्के देकर अंदर ले गया और उसकी

साड़ी मे घुस गया. मा की चूत के रस को मन भर पीने को मैं तरस रहा

था.



"अरे रुक तो, सुन ना आज क्या हुआ" वह कहती रह गयी पर मैने उसे पलंग पर

पटका, उसकी साड़ी उपर की और जुट गया. चूत को चूस कर कई घुट बुर का रस

निकालकर ही दम लिया. फिर मा पर चढ़ कर कस के चोद डाला, तब शांति मिली.

मेरी हालत देखकर मा भी पड़ी रही और मुझे मनमानी करने दी.


जब लस्त होकर मा पर गिर पड़ा तब मा ने मेरे बालों मे उंगलिया चलाते हुए कहा

"इतना दीवाना है मा का मेरे लाल? तेरा यह हाल है तो इस शनिवार रविवार क्या

करेगा? मैं तो नही रहूगी"


"तो मा पक्का हो गया क्या? शशिकला ने क्या कहा? आज तेरी यह गुलाबी साड़ी

उसे कैसी लगी?" मैने उत्सुकता से पूछा.


मा ने हँसते हुए कहा "अरे आज तो वह पागल सी हो गयी. आज मैने उसे खूब

सताया. पहले तो मेरी यह साड़ी और लो काट ब्लॉज़ देखकर ही वह मचल उठी

थी पर कुछ कह भी नही सकती थी क्योंकि उसके केबिन मे काम चल रहा है

इसलिए वह भी बाहर बैठी थी. मैं उसके सामने से गुजरती तो अपना पल्लू

ठीक करने के बहाने से उसे मेरे स्तनों की वैली दिखा देती. एक बार तो मैने

झुक कर नीचे से कागज उठाए, तब जान बुझ कर आँचल गिरा दिया, उसे मेरे

स्तनों का पूरा दर्शन हो गया होगा. बेचारी की आँखे पथरा गयी. आख़िर जब

एक मीटिंग के बाद हम कन्फरेन्स रूम मे अकेले थे तब वह बोली "रीमा दीदी, आज

तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो, ज़रा हम भी तो साड़ी देखें" कहकर मेरे

पल्लू पर का डिज़ाइन देखने के बहाने उसने मेरे स्तनों को छू लिया और मेरे

ब्लॉज़ मे भी तान्क झाक कर ली."


"मा, उसकी बुर बहने लगी होगी तेरा रूप देखकर, तुम्हारी ये मासल

छातियाँ देखकर कोई भी पागल हो जाएगा, उस लड़की की तो हालत खराब हो

गयी होगी" मैने मा के स्तनों मे मूह घुसकर कहा.



"और क्या, है ही तेरी मा इतनी मादक की उसका सगा बेटा उसपर मर मिटा है"

मा ने गर्व से कहा. "आगे तो सुन, मैने आज मुस्काराकर उससे कहा कि मैंडम,

इस वीकेंड को काम का आप बोल रही थी तो मैं ऐसा सोच रही हू कि शुक्रवार

रात को ही आपके घर आ जाती हू. उसे विश्वास ही नही हुआ, एकदम चुप हो गयी.

फिर किसी तरह बोली कि हां यही ठीक रहेगा, सोमवार को सुबह घर चली जाना, उस

दिन ऑफ भी ले लेना. फिर बड़ी सीरियस होकर बोली कि रीमा दीदी, तुम मुझ से इतनी

बड़ी हो, मुझे मैंडम न कहो, कम से कम अकेले मे तो शशिकला कहो. मैं

बस मुस्कराती हुई उसकी ओर देखती रही तो उसने मुझे किस कर लिया. आज जम के

मेरे होंठों पर मूह लगा कर किस किया उसने."



"मीठा लगा मम्मी?"



"हाँ बेटे, बहुत मीठा था, वह वो इंपोर्टेड स्ट्राबेरी के स्वाद का लिपस्टिक लगाती

है, बहुत मज़ा आया. उसकी हालत खराब थी, मुझे तो लगा कि वह शायद वही

मुझसे लिपट जाएगी पर किसी तरह उसने अपनी वासना को लगाम दी, उसे एक

मीटिंग मे भी जाना था. मैने कहा कि मैं घर जा रही हू जल्दी तो उसने तपाक

से हाँ कह दी. बोली आराम करो, वीकेंड मे बहुत काम करना है. मुझपर

बहुत मेहरबान है"



"मा, अब तुझे बस काम वाला काम करना पड़ेगा, ऑफीस का काम नही" मैने

मा की चुटकी ली. मा बहुत खुश थी, आज उसकी बुर ऐसी रिस रही थी कि जैसे

बहुत दिनों की भूखी हो. उस रात मैने और मा ने इतनी चुदाई की कि जैसे

महने भर की कसर पूरी हो गयी.



दूसरे ही दिन शुक्रवार था. मा को सुबह ही शशिकला का फ़ोन आया. वह अभी

अभी नहा कर आई थी और नंगी मेरे सामने खड़ी होकर कपड़े पहन रही

थी. फ़ोन पर बाते करते करते मा का चेहरा खिल उठा. एक दो बार वह बोली

"यस मैंडम-- मैं ओवरनाट बैग ले आउन्गि -- अच्छा ठीक है" फिर हँसकर बोली

"सॉरी शशिकला, अब मैंडम नही कहुगी" मैं मा से चिपट कर उसके नंगे

नितंबों पर अपना लंड घिस रहा था. सुबह सुबह नहाने के पहले मैने

मा को बाथरूम मे चोदा था पर अब फिर से लंड खड़ा हो गया था.

फ़ोन रखकर मा बोली "वह कह रही थी कि ऑफीस से ही सीधे घर चलते है,

घर पर ही डिनर करेंगे. मैं बोली कि मैं कपड़े ले आती हू तो शैतानी से बोली

कि वैसे ज़रूरत नही पड़ेगी-बोली वही दे देगी चेंज करने को कपड़े. और फिर

डाँट रही थी कि मैं उसे मैंडम क्यों कहती हू"



मैं मा को लिपटाकर बोला "मा, तुझे वह कपड़े पहनने ही नही देगी

देखना दो दिन"


मा ने अचानक पूछा "अनिल बेटे, इन बालों का क्या करूँ? काट लू क्या? तुझे

बहुत अच्छे लगते है मुझे मालूम है, पर उस लड़की को .... मालूम नही क्या

सोचेगी!" मा का हाथ अपनी घनी झान्टो मे उलझा था, वह उन बालों के

बारे मे कह रही थी.



मैने मना कर दिया "मा, ऐसी ही झान्टे लेकर जाओ उसके पास. और 

वो इनपर मर मिटे तो कहना. तुम्हारी झान्टे असल मे इतनी काली, घनी, घूंघराली और

रेशमी है कि इनमे मूह छुपाने मे किसी सुंदरी की ज़ुल्फों मे मूह छुपाने

से ज़्यादा मज़ा आता है!"


"चल शैतान, पर यह बता बेटे तू क्या करेगा, मुझे ज़रा बुरा लग रहा है

तुझे अकेले छोड़ कर जाने को. सच बता तुझे कोई आपत्ति तो नही है मेरे लाल?"



"मा, मेरी चिंता मत करो, तुम मज़ा करो. तुम इतनी सेक्सी हो, इतने साल तुमने

अपनी यह जवानी वेस्ट की है, अब अपने मन की हर मुराद पूरी कर लो, यही मैं

चाहता हू. मैं दोस्तो के साथ दो दिन मथेरन हो आता हू, यहाँ रहुगा तो

मूठ मार मार कर परेशान हो जाउन्गा यह कल्पना कर के कि तुम और

शशिकला क्या कर रहे हो. हाँ फ़ोन करना मा ज़रूर मेरे सेल पर, मैं सोमवार

सुबह आ जाउन्गा घर."



मा को चूम कर मैने बिदा किया. मा बहुत सुंदर लग रही थी उस काली साड़ी

मे. आख़िर वह एक अभिसारिका बन कर निकली थी नये सुख को भोगने.

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मैं दोस्तो के साथ मथेरन गया, खूब घुमा. बार बार मन होता था कि मा

को सेल पर फ़ोन लगाऊ, पर फिर सब्र कर लिया, सोचा उन दोनों नारियों को ऐसे मे

डिस्टर्ब करना ठीक नही है. न जाने क्या कर रही होंगी.



आख़िर मेरा मन नही माना और रविवार दोपहर को मैने मा के सेल पर फ़ोन

किया. मा ने फ़ोन उठाने मे दो मिनिट लग गये. मेरी आवाज़ सुनकर खुश

होकर बोली "कैसा है बेटे?"



मैने कहा "मा मैं मज़ा कर रहा हू यार दोस्तो के साथ. तुम कैसी हो?" असल

मे पूछना चाहता था कि मा, तेरी वह रसीली चूत, मेरा खजाना, कैसी है

पर सोचा कि शायद शशिकला पास ही हो. 


मा बोली "एकदम ठीक हू बेटे, बहुत काम चल रहा है, सोने को नही मिला ज़्यादा."

वह रुक रुक कर बोल रही थी जैसे कोई काम कर रही हो, पर उसके स्वर मे

शैतानी भरी थी. मैं समझ गया. मा की आवाज़ कांप भी रही थी. बाते करते करते

"अया अया ओह्ह्ह" की आवाज़ आई.



मैने पूछा "मा क्या हुआ? ऐसे कर क्यों रही हो?"


मा बोली "कुछ नही बेटे, इतना अच्छा लग रहा है कि रहा नही जा रहा. वह

यहाँ एक बिल्ली है, बार बार मेरे पैरों को चाटती है, बड़ी गुदगुदी होती है,

बहुत अच्छा लगता है"

फ़ोन पर मुझे दबी आवाज़ मे एक मीठी हँसी की आवाज़ आई. शायद शशिकला थी.

"अरे ज़रा रुक ना, क्यों तंग कर रही है. छोड़ती ही नही है, ओह ओह ओह आहह ओइइ

मा" मा फिर सिसक कर बोली.



मुझे कुछ समझ मे नही आया. "क्या हुआ मा, ऐसे क्यों बार बार कर रही

हो?"



मा फिर बोली "तू चिंता ना कर मेरे लाल, मैं ठीक हू, यह बिल्ली मानती ही नही है,

अब मुझपर चढ़ने की कोशिश कर रही है, कैसा जादू है इसकी जीभ मे, इसे

भगाना पड़ेगा नही तो बहुत तंग करेगी. तू ठीक है ना मेरे लाल? अपना

ख़याल रखना - हाँ & य & अरे रुक ना & अब देख तेरा क्या हाल करती हू"

कहकर मा ने फ़ोन बंद कर दिया."


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