नौकर से चुदाई पार्ट---1

 


नौकर से चुदाई पार्ट---1



मेरा नाम सीमा गुप्ता है. मैं अभी 35 साल की हूँ. मैं देखने मे

ठीक ठाक सुंदर हू. गोरा रंग. बड़ा बदन. आकर्षक चेहरा. बड़े

बड़े तने हुए उरोज. मांसल जांघे. उभरे हुए कूल्हे. यानी कि मर्द

को प्रिय लगाने वाली हर चीज़ मेरे पास हे. लेकिन मैं विधवा हूँ.

मेरे पास मर्द ही नही है. मेरे पति का देहांत हुए सात साल हुए

हैं. मेरा एक लड़का है.उसके जन्म के समय ही मेरे पति चल बसे

थे.अब मुन्ने की उमर सात साल की है. पिछले सात साल से मैं

विधवा का जीवन गुज़ार रही हू. मेरा घर का बड़ा सा मकान है.

उसमे मेरे अलावा किरायेदार भी रहते हैं. मैं स्कूल मे टीचर

हू..ये मेरे जीवन की सच्ची कहानी है. आप से कुछ नही

छुपाउंगी. दर-असल सेक्स को लेकर मेरी हालत खराब थी. मेने पति

के गुजरने के बाद किसी मर्द से संभोग नही किया. सात साल हो गये.

दिन तो गुजर जाता है पर रात को बड़ी बैचेनी रहती है. मैं ठीक

से सो भी नही पाती हू मन भटकता रहता है. रात को अपनी

जांघों के बीच तकिया लगा कर रगड़ती हूँ. कई बार कल्पना मे

किसी मर्द को बसा कर उससे संभोग करती हूँ...और तकिया रगड़ती

हूँ. मन मे सदा यही होता रहता है कि कोई मर्द मुझे अपनी बाहों

मे ले कर पीस डाले.मुझे चूमे...मुझे सहलाए.मुझे दबाए.मेरे

साथ नाना प्रकार की क्रियाए करे. पर ऐसा कोई मोका नही है.

मेर विधवा होने की वजह से पति का प्यार मेरी किस्मत मे नही

है..यू तो मोहल्ले के बहुत से मर्द मेरे पीछे पड़े रहते है पर

मेरा मन किसी पर नही आता. मैं डरती हू. एक तो समाज से कि

दूसरों को मालूम पड़ेगा तो लोग क्या कहेंगे ? पास पड़ोस

है...रिश्तेदार है..स्कूल है..दूसरे खुद से कि अगर कही बच्चा

ठहर गया तो क्या करूँगी ? इसलिए मैं खुद ही तड़पति रहती हू.

मुझे तो शर्म भी बहुत आती है कि अब किसी से क्या कहूँ कि मेरे पास

मर्द नही है आओ मुझे चोदो...आप से मन की बात कही है. मेरे दिन

इन्ही परिस्थितियों मे निकल रहे थे..इन्ही मनोदशा के बीच एक दिन

मेरे संबंध मेरे नौकर से बन गये..हरिया, मेरा नौकर.उम्र, 30-35

की है. गाव का है. पहाड़ी ताकतवर कसरती देह फॉलदी बदन

                             

थोड़ा काला रंग बड़ी बड़ी मूँछे यूँ रहता साफ सुथरा है. पिछले

दो साल से मेरे पास नौकर है. मैने उसे अपने ही घर मे एक कमरा

दे रखा है. इस प्रकार वो हमारे साथ ही रहता है. उसकी बीबी

गाँव मे रहती है. बच्चे है-पाँच ! साल मे एक दो बार छुट्टी

लेकर गाँव जाता है...बाकी समय हमारे साथ ही रहता है.मैं

स्कूल जाती हू अतः उसके रहने से मुझे बड़ी सहूलियत रहती है.

वह बीड़ी बहुत पीता है. एक तरह से वह हमारे घर का सदस्य ही

है..एक औरत की द्रस्टी से देखूं तो वह पूरा मर्द है और उसमे वो

सब खूबीयाँ है जो एक मर्द मे होना चाहिए...बस ज़रा काला है

और बीड़ी बहुत पीता है..यह कहानी हरिया और मेरे संबंध की

है..उस दिन. शाम का समय था. मुन्ना घर से बाहर खेलने गया

था. मैं और हरिया घर मे अकेले थे. मैं गिर पड़ी...गिरी तो ज़ोर से

चीखी...घबरा गयी. हरिया दौड़ कर आया..और मुझे गोद मे उठा

कर पलंग पर लिटाया..बीबीजी..कहा लगी.डॉक्टर को बुलाओ

?नही..नही.डॉक्टर की क्या ज़रूरत है..वैसे ही ठीक हो

जाओगी.तब.आयोडेक्सा लगा दू.


वह दौड़ कर गया और आयोडेक्स की शीशी ले आया..कहा लगी है

बताओ..बीबीजी. उसका व्यवहार देख मैने कह दिया.यहाँ..पीछे लगी

है..पीठ पर.. वह मुझे उल्टा कर के लिटा दिया. और मेरी पीठ पर

अपने हाथ लगा कर देखने लगा. सच कहूँ तो उसकी हरकतें

मुझे अच्छी लग रही थी. आज दो साल से वो मेरे साथ है कभी उसने

मेरे साथ कोई ग़लत हरकत नही की है. आज इस तरह उसका मुझे

पहले गोद मे उठाना फिर अभी उलट कर पीठ सहलाना..वो तो मेरी

चोट देखने के बहाने मेरी पीठ को सहलाने ही लग गया था. लेकिन

उसका हाथ,उसका स्पर्श मुझे अच्छा ही लग रहा था. इसलिए मैं

चुप पड़ी रही. उसने पहले तो बैठ कर मेरी साड़ी पर से पीठ को

सहलाया-फिर कमर पर मलम लगाया. मलम लगाते लगाते

बोला बीबीजी तनिक साड़ी ढीली कर लो..नीचे तक लगा देता हू.साड़ी

खराब हो जाएगी.मुझे तो दर्द हो रहा था और उसका स्पर्श अच्छा

भी लग रहा था मेने तुनकते हुए हाथ नीचे ले जा कर पेटीकोट

का नाडा खीच दिया..और साड़ी पेटीकोट ढीला कर दिया..मैं तो उल्टी

पड़ी थी हरिया ने जब काँपते हाथों से मेरे कपड़े नीचे करके

मेरे चूतर पहली बार देखे तो जनाब की सीटी निकल गयी...मुँह से

निकला.बीबीजी..आप तो बहुत गोरी हैं.आप के जैसा तो हमारे गाँव

मे एक भी नही है. अपनी तारीफ़ सुन मैं शरमा गयी. वो तो अच्छा

था कि मैं औंधी पड़ी थी..अकेले बंद कमरे मे जवान मालकिन के

साथ उस की भी हालत खराब थी.करीब छः महीने से वह अपनी

बीबी के पास नही गया था. मैरे गोरे गोरे चूतर देख कर उसकी

धड़कने बढ़ गयी,हाथ काँपने लगा. पर मर्द हो कर इतना अच्छा

मौका कैसे छोड़ देता ?.मेरे गोरे गोरे मांसल नितंबपर दवाई लगाने

के बहाने सहलाने लगा. दवा कम लगाई हाथ ज़्यादा फेरा..जब

सहलाते सहलाते थोड़ी देर हो गयी और उसने देखा कि मैं विरोध

नही कर रही हू तो आगे बढ़ गया.खुलेपन से मेरे दोनो कुल्हों पर

हाथ चलाने लगा. पहले एक..फिर दूसरा..जहाँ चॉंट नही लगी

थी वहाँ भी..फिर दोनो कुल्हों के बीच की गहरी घाटी भी..जब उसने

मैरे दोनो कुल्हों को हाथ से चोडा करके बीच की जगह देखी तो मैं

तो साँस लेना ही भूल गयी. उसने चौड़ा कर के मेरे गुदा द्वार और

पीछे की ओर से मेरी चूत तक को देख लिया था. अब आपको क्या बताउ उस

के हाथ के स्पर्श से ही मैं कामुक हो उठी थी. और मेरी चूत की

जगह गीली गीली हो चली थी. मेरी चूत पर काफ़ी बड़े बड़े बाल

थे..मेने अपनी झांतें कई महीनों से नही बनाई थी. मुझ विधवा

का था भी कौन..जिस के लिए मैं अपनी चूत को सज़ा सवार कर

रखती ? कमरे मे शाम का ढूंधालका तो था पर अभी अंधेरा नही

हुआ था. मैं एक अनोखे दौर से गुजर रही थी..मेरा नौकर सहला रहा

था और मैं पड़ी पड़ी सहलवा रही थी. मेरा नौकर मेरे गुप्ताँग को

पीछे से देख रहा था और मैं पड़ी पड़ी दिखा रही थी. यहाँ तक

तो था पर जब उसने जानबूझ कर या अंजाने में मेरे गुदा द्वार को

अपनी उंगली से टच किया तो मैं उचक पड़ी. शरीर मे जैसे करेंट

लगा हो..एक दम से उसका हाथ पकड़ के हटा दिया और कह

उठी हरिया ये..क्या..करते..हो..साथ ही हाथ झटक कर उठ बैठी. मैं

घबरा गयी थी और मुझ से ज़्यादा वो घबराया हुआ था. मैं उसका

इरादा नेक ना समझ कर पलंग से उतर पड़ी. परंतु मेरा वो उठ

कर खड़े होना गजब हो गया. क्यों कि मेरी साड़ी तो खुली हुई थी.

खड़ी हुई तो साड़ी और पेटीकोट दोनो ढलककर पाओं मे जा गिरे...


और मैं कमर के नीचे नंगी हो गयी. इस प्रकार अपने नौकर के आगे

नंगे होने मे मेरी शरम का पारावार ना था. मेरी तो साँस ही अटक

गयी. मैं घबराहट में वही ज़मीन पर बैठ गयी.. तब उसने मुझे

एक बार फिर गोद मे उठा कर पलंग पर डाल दिया. और अगले पल जो

किया उस की तो मैने कल्पना तक नही की थी-कि आज मेरे साथ ऐसा

भी होगा. उसने मुझे पलंग पर पटका और खुद मेरे उपर चढ़ता

चला गया. एक पल को मैं नीचे थी वो उपर..दूसरे पल मेरी टांगे

उठी हुई थी..तीसरे पल वो मेरी टाँगों के बीच था..चोथे पल

उसने अपनी धोती की एक ओर से अपना लंड बाहर कर लिया

था..पाँचवे पल उसने हाथ मे पकड़ कर अपना लंड मेरी चूत से

अड़ा दिया था..और...छठे पल...तो एक मोटी सी..गरम सी..कड़क

सी.चीज़ मेरे अंदर थी. और...बस.फिर क्या था.कमरे में शाम के

समय नौकर मालकिन...औरत और मर्द बन गये थे. मेरी तो साँस बंद

हो गयी थी. शरीर ऐथ गया था. धड़कने रुक गयी थी. आँखे

पथरा गयी थी. जीभ सूख गयी थी. मैं अपने होश मे नही थी कि

मेरे साथ क्या हो रहा है. जो कर रहा था वो वह कर रहा था. मैं

तो बस चुप पड़ी थी. ना मैने कोई सहयोग दिया.ना मैने कोई विरोध

किया. बस...जो उसने किया वो करवा लिया. सात साल बाद..घर के

नौकर से...पता नही क्या हुआ मैं तो कोई विरोध ही ना कर सकी.

बस.उसने घुसेड़ा...और चॉड दिया...मेरे मुँह से उफ़ भी ना निकली. मैं

पड़ी रही टाँगों को उठायेवरवो धक्के पे धक्के मारता गया...पता

नही कितनी देर.पता नही कितनी देर..उसका मोटा सा लंड मेरी चूत को

रौंदता रहा. रगड़ता रहा मैं बेहोश सी पड़ी करवाती

रही.फिर...अंत आया..वो मेरे अंदर ढेर सा पानी छोड़ दिया...मैं

अपने नौकर के वीर्य से तरबतर हो उठी.. जब वह अलग हुआ तो मैं

काँपति हुई उठी और नंगी ही बाथरूम चली गयी.


मेरे मन मे यह

बोध था कि यह मेने क्या कर डाला..एक विधवा हो कर चुदवा लिया..वो

भी एक नौकर से.अपने नौकर से..हाय यह क्या हो गया.यह ग़लत

है...यह नही होना चाहिए था. अब क्या होगा ???????.मैं बाथरूम

गयी. वहाँ बैठा कर मूति. मुझे बड़ी ज़ोर की पिशाब लगी थी.

मेने झुक कर देखा..मेरी झातें उसके वीर्य से चिपचिपा रही थी.

मेने सब पानी से साफ किया. इतने मे और पिशाब आ गयी. और मूति.

फिर टावल लपेट कर बाहर निकली तो सामने हरिया खड़ा था.मुझ

से तो नज़र भी ना मिलाई गई.और मैं बगल से निकल के अपने कमरे

मे चली गयी..


(दूसरी बार ).उस शाम मैं बाथरूम से निकल कर बिस्तर पर जा

गिरी. लेटते ही मुझे खुमारी की गहरी नींद आई.करीब सात साल

बाद मैने किसी मर्द का लंड लिया था. चुदाई अंजाने में हुई

थी.बेमन से हुई थी,फिर भी चुदाई तो चुदाई थी.मैं तो ऐसी

पड़ी कि मुन्ना ने ही आ कर जगाया..रात खाने की मेज पर मैं हरिया

से आखे नही मिला पा रही थी.बड़ी मुश्किल से मैने खाना

खाया...बार बार दिल में यही ख्याल आता कि मैने यह क्या कर

डाला-अपने नौकर से चुदवा लिया..विधवा होकर..कैसा पाप कर

डाला..रात मे खाने के बाद भी हरिया से कुछ नही बोली.बस

चुपचाप मुन्ना के साथ जा कर अपने कमरे में सो गयी. सो तो

गयी...पर मेरी आखों में नींद ना थी.मैं दो भागों में बँट गयी

थी-दिल और दिमाग़. दिल आज की घटना को अच्छा कह रहा था.और

दिमाग़ बुरा. मेरा दिल कहता था मैं विधवा का जीवन जी रही

थी.अगर भगवान ने मेरी सुनकर एक लंड का इंतज़ाम कर दिया तो

क्या खराबी है.पर मेरा दिमाग़ इसे पाप मान रहा था..क्या

करूँ..क्या ना करूँ...सोचते सोचते मैं मुन्ना के साथ लेटी थी.

मुन्ना अबोध को मेरी मनोदशा का ग्यान नही था. वह आराम से सो गया

था..मैं जाग रही थी. की दरवाजे की कुण्डी बजी. कोन हो सकता

है.? घर में हरिया के अलावा कोई नही था. वही होगा. क्यों आया

है अब ? मैं चुप रही तो कुण्डी फिर बजी. तब मैं उठ कर गयी और

दरवाजा खोला. वही था. उसे देख मैं झेंप सी गयी..क्यों आए हो

यहा ?बीबीजी अंदर आ जाउ ?नही तुम जाओ यहाँ से और मेने दरवाजा

बंद कर लिया..मेरी सास तेज हो गयी. हाई राम.यह तो अंदर ही आना

चाह रहा था. क्या करता अंदर आ कर ? ऑफ.क्या फिर

से..चुदाई.?????? मा..मुन्ना है यहा..दुबारा ? ना बाबा ना..तो क्या

हो गया इस में.सब तो करते है..एक बार तो करवा लिया अब और क्या है ?

अगर दुबारा भी करवा लेगी तो क्या बिगड़ जाएगा ? भगवान ने एक

मोका दिया है तो उसका मज़ा ले.बार बार ऐसे मोके कहा मिलते है.

सात साल से तरस रही हू..मैं पड़ी रही..सोचती रही. मोका मिला

है तो रुकमत उस का फ़ायदा उठा.जवानी यूँ ही तो निकल गयी

है.बाकी भी निकल जाएगी.अच्छा भला आया था बेचारा..भगा

दिया. उसे तो कोई दूसरी मिल जाएगी.उस की तो औरत भी है.तेरा कोन

है.तुझे कॉन मिलेगा ? पाप है..पाप है..मे ही सारी जिंदगी निकल

गयी.. थोड़ी देर हो गयी तो मुझे पछतावा होने लगा कि बेकार मेएक

मज़ा लेने का चास खो दिया. तब मैं उठी और जा कर कुण्डी

खोली.दरवाजे के बाहर निकल कर देखा..हाई राम..हरिया तो वही

दीवार से सटा बैठा था.और बीड़ी पी रहा था.मुझे आया देखकर

वह बीड़ी फेककर उठ खड़ा हुआ. मेरे पास आया.मैं झिझकती सी

हाथ में साड़ी का पल्लू लपेटती हुई बोली...गये नही अब तक.. उसने

मेरा हाथ पकड़ कर अपने हाथ मे ले लिया.अपना नरम नरम नाज़ुक

सा हाथ उसके मर्दाना हाथ में जाते ही मुझपर नशा सा छा

गया..मुझे विशवास था कि आप ज़रूर आओगी. कह कर उसने मुझे

अपनी तरफ खीचा तो मैं निर्विरोध उसकी तरफ खीची चली

गयी. उसने मुझे अपनी बाहों में बाँध लिया.उसके चौड़े सीने से लग

कर मैं जवानी का अनोखा सुख पा गयी. मैं उस के सीने में अपना

चेहरा छुपा बोल पड़ी..हरिया मुझे डर लगता है...-डर कैसा

बीबीजी. उसने मेरी पीठ पर बाहों का बंधन सख़्त कर दिया..मैं

कसमसाई..एक मर्दाने बदन में बंधना बड़ा ही सुखद लग रहा

था..कोई देख लेगा ना.. तो दोस्तो आगे की कहानी अगले भाग मे

पढ़ते रहिए आपका दोस्त राज शर्मा

क्रमशः.........



नौकर से चुदाई पार्ट---2


गतान्क से आगे.......


यहा घर के घर में कॉन देखने आएगा बीबीजी. उसने अपनी बाहों का


बंधन सख़्त किया..मैने शरमाते हुए उसकी छोड़ी छाती में मुँह


छुपा लिया..मुन्ना तो है ना..-अरे वो तो अभी छोटा है..वो क्या जानता


है अभी..मैं उसकी बाहों के घेरे में कसमसाई..और जो कुछ रह


गया तो.मैं विधवा क्या करूँगी ?क्या ? वह कुछ समझा नही.यही.मैं


झिझकी..कह ना पाई.रुकी.सास ली. फिर कहा..आररे राम.कही मैं पेट


से रह गयी तो... हरिया के द्वारा गर्भवती होने की बात से ही मुझे


झुरझुरी आ गयी.जिसे उसने साफ महसूस किया..मेरे जवान जिस्म को


बाहों मे जकड़ा और पीठ पर हाथ फिराता हुआ बोला..बीबीजी यदि


ऐसा हो जाए कि बच्चा ना हो तो. मैं उस की बाहों की गरमी महसूस


करती हुई बुदबूदाई.क्या ऐसा हो सकता है ?समझो कि ऐसा हो चुका


है..मैने नज़र उठाई..उसे देखा. वह मूँछो में मुस्करा दिया..अभी


पिछली बार छः महीने पहले जब मैं गाव गया था ना तो मेने


आपरेशन करवा लिया था..मैने उस की छाती में नाक रगड़ी..कैसा


आपरेशन ? यही..बच्चे बंद होने का.-हाय मुझे तो बताया ही


नही.अब आप को क्या बताता बीबीजी...पाँच बच्चे तो हो गये.जब भी


गाव जाता हम एक बच्चा हो जाता है...उस के कहने का ढंग ऐसा था


कि.मुझे हँसी आ गयी. मुझे हँसता पा उसने मुझे ऐसी ज़ोर से


भीचा कि मेरे उरोज उसके सीने से दब उठे..और फिर उसनेबड़ी आतूरता से


मेरे पिछवाड़े पर हाथ लगाया तो मैं चिहुंक कर कह


उठी..हरिया..यहा नही.. मेरा इशारा समझ हरिया मेरा हाथ पकड़


खीचता हुआ मुझे अपने कमरे में ले गया. और मैं उसके साथ


बिना ना नुकुर किए चली गयी. हरिया का कमरा...मेरे ही घर का एक


कमरा था. उस में एक खटिया बिछी थी. एक कोने मे मोरी बनी थी.


और दूसरे कोने में एक आलिया था जिसमें भगवान बिराजे थे.


कमरे में पहुँचकर तो मेरे पाव जैसे जम से गये. मैं एक ही जगह


खड़ी रह गयी. तब उसने वही मुझे अपनी बालिश्ट भुजाओ में बाँध


लिया.मैं चुपचाप उस के सीने से लग गयी..आप बहुत खूबसूरत हो


बीबीजी.वह बड़बड़ा उठा.उसके हाथ स्वतंत्रता से मेरी पीठ पर


घूमने लगे. मैं खड़ी कुछ देर तो उसकी सहलावट का आनंद लेती


रही.मुझे बहुत अच्छा लग रहा था.सात साल बाद किसी मर्द का


स्पर्श मिला था. फिर मैं कुनमूना के बोली..हरिया दरवाजा लगा


दो..-अरे बीबीजी यहा कॉन आएगा...-उहू.तुम तो लगा दो.. वह जा कर


दरवाजा लगा आया. आके मेरे को पकड़ा.मैं


बिचकी..हरिया..लाइट..-बीबीजी रहने दो ना.अंधेरे में क्या मज़ा


आएगा उसने मुझे बाहों में बाँध लिया.मुझे शरम आती है ना.. उसने मेरी बात नही


सुना. बस पीछे हाथ चलाता रहा.


मैं थोड़ी देर बाद फिर


कुनमुनाई..लाइट बंद करो ना. तब उसने बेमन से लाइट बंद की.


कमरे मे अंधेरा हो गया. अंधेरे बंद कमरे मे मैने अभी थोड़ी सी


चेन की सास भी नही ली थी कि उसने मुझे पकड़ कर खटिया पर पटक


दिया.और खुद मेरे साथ आ गया..मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था.


अब फिर से चुदवाने की घड़ी आ गयी थी. वह मेरे साथ गुथम गुथा


हो गया.


उस के हाथ मेरी पीठ और कुल्हों पर घूमने लगे. मैं उस से और वो

मुझसे चिपकेने लगा. मेरे स्तन बार बार उस के सीने से दबाए.

उस की भी सास तेज थी और मेरी भी. मुझे शरम भी बहुत आ रही

थी. मेरा उसके साथ यह दूसरा मोका था. आज मैने ज़्यादा एक्टिव पार्ट

नही लिया. बस चुपचाप पड़ी रही जो किया उसी ने किया और क्या किया ?

अरे भाई वही किया जो आप मर्द लोग हम औरतों के साथ करते हो.

पहले साड़ी उतारी फिर पेटीकोट का नाडा ढूँढा..खीचा..दोनो

चीज़े टागो से बाहर...मैं तो कहती ही रह गयी..अरे क्या करते

हो..-अरे क्या करते हो.. उसने तो सब खीच खांच के निकाल दिया. फिर

बारी आई ब्लाओज की.वो खुला..मैने तो उस का हाथ पकड़

लिया..नही...यह नही.. पर वो क्या सुने ?.उल्टे पकड़ा पकड़ी में उसका

हाथ कई बार मेरे मम्मों से टकराया. अभी तक उसने मेरे मम्मों को

नही पकड़ा था. ब्लाओज उतारने के चक्कर मे उसका हाथ बार बार

मेरे मम्मों से छुआ तो बड़ा ही अच्छा लगा. और फिर जब उसने मेरी

बाड़ी खोली तो मेरी दशा बहुत खराब थी. सास बहुत ज़ोर से चल

रही थी. गाल गुलाबी हो रहे थे. दिल धड़ धड़ करके बज रहा

था. शरीर का सारा रक्ता बह कर नीचे गुप्ताँग की तरफ ही बह

रहा था. उसने मेरे सारे कपड़े खोल डाले. मैं रात के अंधेरे में

नौकर की खटिया पर नंगी पड़ी थी..और फिर अंधेरे मे मुझे

सरसराहट से लगा कि वह भी कपड़े उतार रहा है. फिर दो

मर्दाने हाथों ने मेरी टांगे उठा दी.घुटनो से मोड़ दी. चौड़ा दी.

कुछ गरम सा-कड़क सामर्दाना अंग मेरे गुप्ताँग से आ टीका. और ज़ोर

लगा कर अपना रास्ता मेरे अंदर बनाने लगा. दर्द की एक तीखी

लहर सी मेरे अंदर दौड़ गयी. मैने अपने होठों को ज़ोर से भीच कर

अपनी चीख को बाहर ना निकलने दिया. शरीर ऐथ गया..मैने बिस्तर

की चादर को मुट्ठी में जाकड़ लिया. वह घुसाता गया और मैं उसे अपने

अंदर समाती गयी. शीघ्र ही वह मेरे अंदर पूरा लंड घुसा कर

धक्के लगाने लगा. मर्द था. ताकतवर था. पहाड़ी था. गाव का

था..और सबसे बड़ी बात.पिछले छः महीने से अपनी बीबी से नही

मिला था. उसे शहर की पढ़ी लिखी खूबसूरत मालकिन मिल गयी तो

मस्त हो उठा. जो इकसठ बासठ करी तो मेरे लिए तो संभालना

कठिन हो गया. बहुत ज़ोर ज़ोर से पेला कम्बख़्त ने..मेरे पास और कोई

चारा भी ना था. पड़ी रही पिलावाती रही. हरिया का लंड दूसरी

बार मेरी चूत में गया था. बहुत मोटा सा.कड़ा कड़ा..गरम

गरम..रोज मैं कल्पना करती थी कि मेरा मर्द मुझे ऐसे चोदेगा

वैसे चोदेगा. आज मैं सचमुच चुदवा रही थी.


वास्तविक..सच्ची कि चुदाई.मर्द के लंड की चुदाई..ना तो उसने

मेरे मम्मों को हाथ लगाया. ना हमारे बीच कोई चूमा चॅटी हुई.


बस एक मोटे लंड ने एक विधवा चूत को चोद डाला..और फिर जब

खुशी के पल ख़तम हुए तो वह अलग हुआ. अपना ढेर सा वीर्य उसने

मेरे अंदर छोड़ा था. पता नही क्या होगा मेरा.सोचती मैं उठ

बैठी.और नंगी ही दौड़ कर कमरे से बाहर निकल गयी. बाथरूम

तो मैने जा कर अपने कमरे मे किया. बहुत सा वीर्य मेरे जघो और

झटों पर लग गया था.सब मेने पानी से धो कर साफ किया...


(अगले दिन).सुबह जब मैं उठी तो बदन बुरी तरह टूट रहा था. बीते

कल मेने अपने नौकर हरिया के साथ सुहागरात जो मनाई थी. मैं

रोज की तरह स्कूल गयी. खाना खाया..शाम को पड़ोस की मिसेज़ वर्मा

आ गयी तो उनके साथ बैठी. सारा रूटीन चला बस जो नही चला वो

यह था कि मेने सारा दिन हरिया से नज़रें नही मिलाई. रात को

खाने के बाद जब मैं रसोई मे गयी तो वह वहीं था. मेरा हाथ

पकड़ कर बोला.बीबीजी रात को आओगी ना.. मेरे तो गाल शरम से लाल

हो उठे. हाथ छुड़ा कर चली आई. रात मुन्ना के सो जाने के बाद

भी मेरी आँखों मे नींद नही थी. बस हरिया के बारे मे ही सोचती

रही. करीब एक घंटा बीत गया.उसने इंतज़ार किया होगा. मैं नही

गयी तो वही आया. दरवाजे की कुण्डी क्या बजी मेरा दिल बज उठा.

मैने धड़कते दिल को साड़ी से कस कर दरवाजा खोला.वही

था..बीबीजी..मैं अंदर आउ ?.मैं ना मे गरदन हिलाई तो वह मेरा

हाथ पकड़ कल की तरह खीचता हुआ अपने कमरे की ओर ले चला.

मैं विधवा अपने नौकर के लंड का मज़ा लेने के लिए उसके पीछे

पीछे चल दी. उस रात हरिया के कमरे मे मेरी दो बार चुदाई हुई.

पूरी तरह सारे कपड़े खोल कर...मैं तो ना ना ही करती रह

गयी..उसने मेरी एक ना सुनी. वो भी नंगा भी नंगी. अंधेरा कर के.

नौकर की खटिया पर. वही टांगे उठा कर्कल वाले आसन से..एक बार

से तो जैसे उस का पेट ही नही भरा. एक बार निपटने के थोड़ी देर

बाद ही खड़ा करके दुबारा घुसेड दिया. बहुत सारा वीर्य मेरी चूत

मे छोड़ा. पर ना मेरे मम्मों को हाथ लगाया ना कोई चुम्मा चॅटी

किया. बस एक पहाड़ी लंड शहर की प्यासी चूत को चोदता रहा. जब

चुद ली तो कल की तरह ही उठकर चुपचाप अपने कमरे मे आ गयी

उस रात जब मैं सोई तो मैने मंथन किया..सुख कहा है. तकिया दबा

के काल्पनिक चुदाई मे या हरिया के पहाड़ी मोटे लंड से वास्तविक

चुदाई मे. विधवा हू तो क्या मुझे लंड से चुदवाने का अधिकार

नही है ? जिंदगी भर यूँ ही तड़पति रहू ? नही..मैं हरिया का

हाथ पकड़ लेती हू. नौकर है तो क्या हुआ. क्या उसके मन नही है ?

क्या वह मर्द नही है? उसमे तो ऐसा सब कुछ है जो औरत को चाहिए

क्या फ़र्क पड़ता है. फिर ? नौकर है तो क्या हुआ ? मर्द तो है. स्वाभाव

कितना अच्छा है. पिछले दो साल से मेरे साथ है कभी शिकायत

का मौका नही दिया. अरे यह तो और भी अच्छा है. घर के घर

मे.किसी को मालूम भी ना पड़ेगा. समाज ने शादी की संस्था क्यों

बनाई है? ताकि लंड चूत का मिलन घर के घर मे होता रहे. जब

लंड का मन हो वो चूत को चोद ले और जब चूत का मन आए वो लंड से

चुदवा ले. हर वक्त दोनो एक दूसरे के लिए अवेलेबल रहें. अब मान लो

मैं कोई मर्द बाहर का करती हू तो क्या होगा वो आएगा तो पूरे

मोहल्ले को खबर लग जाएगी कि सीमा के घर कोई आया है. रात भर

तो वो हरगिज़ नही रह सकेगा. उस की खुद की भी फेमिली होगी. हमेशा

एक डर सा बना रहेगा.


इस से तो यह कितना अच्छा है. घर के घर मे

पूरा मर्द चाहो तो रात भर मज़ा लो..किसी को क्या पता पड़ता कि तुम

अपने घर मे क्या कर रहे हो. फिर इस की फेमिली भी गाँव मे है. यह

तो गाँव वैसे भी साल छः महीने मे जाता है. उन लोगों को भी क्या

फ़र्क पड़ता है कि हरिया यहाँ किसके साथ मज़े लूट रहा है..तो

मैं क्या करूँ ?.ठीक है- हो गया जो हो गया..भगवान की मरजी

समझ कबूल करती हू..लेकिन हरिया भी क्या इसे कबूल करेगा?.उसे

क्या चाहिए ?.मुझे मालूम है मर्द को क्या चाहिए होता है जो उसे

चाहिए वो मैं उसे दूँगी तो वह क्यों मना करेगा भला?.वह भी तो

बिना औरत के यहाँ रहता है.उस का भी तो मन करता होगा. मन तो

करता ही है तभी तो कल भी चोदा और आज फिर आ गया..यदि मेरे

जैसी सुंदर औरत इस से राज़ी राज़ी से चुदायेगि तो क्यों नही

चोदेगा भला ?.देखते है आगे क्या होता है मेरे भाग्य मे मर्द का

सुख है या नही..


अगला दिन मेरी जिंदगी का खूबसूरत दिन था. मैं फेसला ले चुकी

थी. मैं हरिया से संबंध कायम रखुगी. जवानी के मज़े लूँगी.

सुबह से मेने अपने रोज के काम मे मन लगाया..नहाते मे मेने अपनी

चूत को साबुन लगा लगा कर खूब साफ किया. बाद मे अपनी झांतदार

चूत को खूब पावडर लगाया. चूत पर हाथ लगाते हुए मुझे हरिया

का ही ध्यान आया. अब तक यह चूत हरिया के लंड से दो दिनों मे चार

बार चुद चुकी थी. अब यह चूत हरिया की चूत है..दोपहर मैं स्कूल

गयी. शाम को घर का दूसरा काम किया. खाने के बाद मैं मुन्ना को

लेकर अपने कमरे मे आ गयी. मुझे इंतज़ार था कि मुन्ना सो जाए तो

कुछ हो. मुन्ना सो गया तो सोचा मैं खुद हरिया के पास चली

जाउ.फिर मन मे आया देखु तो सही आज हरिया की क्या रिएक्शन रहती

है.वह इंटरेसटेड होगा तो अपने आप आएगा. मेरे काम सुख का आगे का

भविष्य उसके आने, ना आने पर ही निर्भर रहेगा. मैं इंतज़ार

करती रही... मेरा इंतज़ार व्यर्थ नही गया. भगवान मुझ पर

प्रसन्न था. थोड़ी देर बाद कुंडी खड़की..मेरा मन नाच उठा. मेरी

खुशी का ठिकाना नही था.मैं तो उठ कर सीधी देवी मा के

सिंहासन के पास गयी और उनको हाथ जोड़ कर नमस्कार किया कि हे मा

मेरा सब काम अच्छे से करना.मुझे किसी चीज़ की कमी नही है.घर

है,नौकरी है,बच्चा है...बस मर्द नही हैमर्द का लंड नही

है.सो अब आपने संयोग बनाया है..इसे ठीक से निभाने देना. इतनी

देर मे तो कुण्डी दुबारा खड़क गयी. मेने जा कर दरवाजा

खोला.हरिया सामने था. उसे सामने पा कर मैं ना जाने क्यों शरमा

उठी..सो गयी थी बीबी जी..उसने बड़े प्यार से पूछा..मुझसे तो मुँह

से बोल ही नही फूटा. बस ना मे गर्दन हिला दी. तब...हरिया..मेरा

नौकर..मुझे हाथ पकड़ कल की तरह ही अपने कमरे मे ले गया.

दोस्तो हरिया और सीमा की चुदाई की दास्तान अगले पार्ट मे पढ़े


उसके साथ जाते जाते मेरा दिल कल से भी ज़्यादा ज़ोर ज़ोर से धड़क


रहा था. इस घड़ी का तो मैं शाम से इंतज़ार कर रही थी. वहाँ.उस


के कमरे मे..जब वह मुझे पकड़ खीचाने लगा तो मैं छिटक कर बोल


उठी.दरवाजा..वह चुपचाप जा कर दरवाजा लगा आया..तो मैने


साड़ी का पल्लू उंगली पर लपेटते हुए कहा.हर.र.रिया..ला..ई..ट. उसने


चुपचाप जा कर लाईट बुझा कमरे मे अंधकार कर दिया.और पास आ


कर मुझे पकड़ा तो मैं खुद उसके सीने से लग गयी. वह वही खड़े


खड़े मुझे सहलाने लगा..वा मेरी पीठ पर हाथ फेरा..पीठ से


कमर पर आया.और फिर नीचे चूतरो तक पहुँच गया. आपसे सच


कहती हू उसके द्वारा अपने चूतरो सहलाए जाने से मेरी साँस


धोकनि की तरह चलने लगी थी. वह खड़े खड़े बहुत देर तक मेरे


पिछवाड़े पर अपना हाथ फेरता रहा. उसके इस तरह हाथ फेरने


से ही मैं तो गीली हो उठी. और बुरी तरह उस के सीने मे घुसने


लगी..मेरा गला सुख गया था.खड़े रहना मुश्किल हो रहा था. ऐसा


लग रहा था मैं बेहोश हो कर ही गिर पड़ूँगी. उसी हालत मे वह मेरे


कपड़े उतारने लगा तो मेरी हालत और खराब होगयि. उस ने खड़े


खड़े ही अंधेरे बंद कमरे मे मेरे सारे कपड़े खोल


डाले..साड़ी.1.पेटीकोट...2.ब्लाउस..3.और अंत मे ब्रा.4.आपकी


जानकारी के लिए बता दू कि वैसे स्कूल जाते समय तो मैं पेंटी


पहनती हू पर घर मे रहती हू तो उतार देती हू.


और रात मे भी मैं तो साड़ी ब्लाओज मे ही सोती हू.मेक्सी नही पहनती

हू..तो.मैं एक दम नंगी हो कर बहुत शरमाई.वो तो अच्छा था कि

अंधेरा था. फिर पल भर वो अलग हुआ और अपने कपड़े खोल दिए. अब

जो मुझे खड़े खड़े अपनी बाहों मे लिया तो वो पल मेरे लिए बहुत

आनंद दायक था. बहुत अनोखा. एक दम अलग..नंगा वो नंगी मैं.दोनो

एक दूसरे से खड़े खड़े चिपक गये. वही मुझे बाहों मे भीचा मैं

तो बस चुपचाप उसके सीने से लग गयी.मेरे तो शरम के मारे

हाथ ही ना उठे कि उसे अपनी बाहों मे भर लूँ. बहुत अच्छा लग

रहा था. उसने इसी हालत मे जब मेरे पिछवाड़े पर हाथ फिराया तो

बस मुझे लगा मैं खड़े खड़े ही मूत दूँगी. चूत मे अजीब तरह की

सुरसुरी हो रही थी. तभी उसने मुझे अंधेरे मे खटिया पर लिटा

दिया..और मेरे उपर चढ़ कर मेरी टाँगों को उठा दिया. अगले ही पल

उसका मोटा लंड मेरी चूत से आ कर अड़ा..और दबाव के साथ अंदर होने

लगा. मुझे जाँघो के बीच तेज दर्द हुआ. मेरी चूत मोटे लंड के

द्वारा चौड़ी की जा रही थी. मैं बिस्तर मे पड़े पड़े तड़प उठी. पूरी

प्रवेश क्रिया के दौरान मेने एक बार कराह के

कहा.हा..री..य्ाआआः...धीरे..पर यह नही कहा कि हरिया मत करो.


आज मेरी मनहस्थिति दूसरी थी. आज तो मैं खुद चुदवाना चाहती

थी. मैने खुद अपनी टाँगों को फेला कर उसका लंड अंदर करवाया.

वह अंदर घुसा चुका तो बोला..बस बीबी जी...हो गया..लेकिन घुसा कर

रुका नही.बस धक्के लगाने शुरू कर दिए. अब लंड अंदर जाएबाहर

निकले.मैं पड़ी पड़ी ठुसक़ती जाउ. उँहुक..उँहुक..उँहुक.अंदर-

बाहर.अंडर्बाहर.उँहुक..उँहुक..उँहुक.हरिया ने थोड़ी ही देर मे वो

मज़ा ला दिया जो मेरे नसीब मे था ही नही.जिसके लिए मैं हमेशा

तरसती रहती थी. वो मज़ा मुझे तकिया लगा कर कभी नही आता

था. उँहुक..उहुंक.उँहुक. खटिया को हिलता हुआ मैं साफ साफ महसूस

कर रही थी. उँहुक..उहुंक.उँहुक. जब उसका मोटा सा लंड अंदर जाता

था तो मेरे मुँह से अपने आप ठुसकने की आवाज़ निकलती थी. इस

तरह कमरे मे रात के अंधेरे मे दो आवाज़ें बड़ी देर तक गूँजती

रही.खटिया की चर्र्र्ररर चर्र्ररर और मेरी उँहुक उम. और.फिर...अच्छे काम का

अंत तो होता ही है. मेरी चुदाई का भी अंत हुआ. वह झाड़ा..एक

दम..अचानक से.फॉरसाफूल..वीर्य का फव्वारा मेरी चूत मे छूट

पड़ा. उस समय के लगने वाले झटके बड़े ही अदभुद थे.पहले मेरा

इस ओर ध्यान ही नही गया था. लंड जो कि लोहे की राड की तरह सख़्त

था-मेरे अंदर ऐसी ज़ोर ज़ोर से तुनका कि बस पूछो मत. उसका

फूलनझटका लेना और फ़िरवीर्या छोड़ना महसूस कर मैं खुशी से

पागल हो उठी. और उसी पागलपन मे जानते है क्या हुआ ?.मेरा खुद

का स्खलन हो गया. गौरतलब है कि पिछली चुदायियो मे मेरा

अपना डिस्चार्ज नही हुआ था.यह मेरी आज की मानसिक अवस्था का

परिणाम था कि मैं आज डिस्चार्ज हुई. एक दम बदन हिला..कंपकपि

आई..और.मेरी चूत पानी छोड़ बैठी. मैं तो बहाल...उसी अवस्था मे

मुझे ना जाने क्या सूझा कि मैने हरिया को पकड़ कर अपने उपर गिरा

लिया.उसके गले मे बाहे डाल दी.बुरी तरह लिपट गयी. बेखुदी मे मेरे

होठ कह उठे..हा..रि..या.मेरे..रा..जा. वह झाड़ चुका था. उसी

अवस्था मे अपना लंड मेरे अंदर डाले हैरत से बोल पड़ा.राजा ??


आपने मुझे राजा कहा बीबीजी... मैं उस से और ज़ोर से लिपट गयी और

ज़ोर ज़ोर से साँसे लेते हुए बोली..अब तो तुम ही मेरे सब कुछ हो

हरियाआआआअ..इस भावना के आते ही मेरा और स्खलन हो उठा. चूत

मे से पानी छूटा तो मैं अपने उपर सवार नौकर से और कस कर लिपट

गयी. बस यही जवानी का सुख था. उसने भी मुझे अंधेरे मे ज़ोर से

बाहों मे जाकड़ लिया. दोनो के मन मे बस यही भावना थी कि हमे कोई

एक दूसरे से जुदा ना करे. जल्दी तो कोई थी नही. दोनो घर के

घर मे थे. दोनो इसी अवस्था मे बहुत देर तक पड़े रहे. लंड राम

मेरी चूत मे ही डाले रहे तब तक जब तक कि ढीले हो कर खुद ही बाहर

ना निकल आए. तब जब बहुत देर हो गयी और उसके मुझ पर से

उतरने के कोई आसार ना दिखे तब मैं नीचे से कुनमूनाई.उसे उठने

का इशारा दिया. तब जा के वह मुझ पर से उठा.


मैं भी उठ बैठी.



खटिया से उतर कर जाने लगी तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया..जाने दो

ना...अब क्या है.मैं धीरे से बोली.अभी मत जाओ ना बीबीजी..अभी मन

नही भरा. वा सरलता से बोला..सच कहे तो मन तो हमारा भी नही

भरा था. पर मुझे बाथरूम आ रही थी. उसका हाथ छुड़ा धीरे

से बोली.छोड़ो ना..मुझे पिशाब आ रही है.तो यही मोरी पर कर लो

ना..वही पानी भी रखा है..मैं समझ गयी कि अभी ये मुझे छोडने

को तैयार नही है. मैं अंधेरे मे टटोल टटोल कर कमरे मे ही एक

कोने पर बनी मोरी पे गयी. बैठते ही मेरा तो ऐसी ज़ोर से पेशाब

छूटा कि मैं खुद हैरान रह गयी. एक दम तेज सुर्राटी की आवाज़

निकली तो मैं खुद पर ही झेंप गयी.हरिया भी कमरे मे था.सुन रहा

होगा.वो क्या सोचेगा.पर क्या करतीमजबूरी थी.मेरे तो पेशाब ऐसे

ही जोरदार आवाज़ के साथ निकलता है. पेशाब करने के बाद मेने

बाल्टी से पानी ले कर अपनी चूत को धोया. और अंधेरे मे ही

लड़खड़ाती हुई वापस खटिया के पास आई तो हरिया ने पकड़ कर

फॉरन अपनी बगल मे लेटा लिया.. मुझे नंगे बदन उससे लिपट कर मज़ा

ही आ गया. उस के चौड़े सीने मे घुस कर मैं सारे जहा का सुख पा

गयी.उपर से वो पीठ और कमर पर हाथ फेरने लगा तो सोने मे

सुहागा हो गया. मेने खूब चिपक चिपक कर उसके स्पर्श का आनंद

लिया. जब मैं हरिया के साथ थोड़ी कंफर्टेबल हो गयी तो मेने ही

बात छेड़ी..हरिया..मुझे डर लगता है..-कैसा डर बीबीजी.- मैं

कुछ नही बोली,बस उस के चौड़े सीने मे नाक रगड़ दी..वह मेरे कूल्हे

पर हाथ ले गया.तपथपाया..डरने की क्या बात है बीबी जी,

औरत मरद का तो जोड़ा होता है.या मैं नौकर हू,इस लिए.. मैं एक दम

ज़ोर से उस से लिपट गयी..ऐसा ना कहो,हरियाआ..उसने मेरे कूल्हों पर

हाथ चलाया..फिर.क्या आपकी जिंदगी मे और कोई मर्द है ?.मैं

अंधेरे मे और ज़ोर से उस से लिपट गयी.. नही.धात...तुम भी तो हो

मेरे साथ दो साल से...होता तो क्या तुमको नही दिखता ? मैने उल्टा

सवाल किया.मुझे तो नही दिखा..मैं उस की बाहों मे कसमसाई..नही

है...मुझ विधवा को कौन पसंद करेगा रे..- आपको क्या पता

बीबीजी आप कितनी खूबसूरत हो.-मुझे तो बहुत डर लगता

है..हरियाआअ.मैं उस से चिपक गयी.क्यों डरती हो..बीबीजी.सब कोई

तो करते है यह काम.Raj Sharma Stories


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नौकर से चुदाई compleet

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rajsharma

Super member

Re: नौकर से चुदाई

Post  29 Oct 2014 08:11


उसने मेरा दांया कुल्हा पकड़ के दबाया..मेरा नरम मांसल कुल्हा..उस

का खुरदुरा कड़ा हाथ..काम्बीनेशन अच्छा था. पहले तो सिर्फ़

सहला रहा था,जब उस ने देखा कि मैं कोई विरोध नही कर रही हू तो

दबाने भी लगा. मेरे कुल्हों के माँस को दबा कर लाल कर दिया

कम्बख़्त ने.पर मुझे लग बहुत अच्छा रहा था. मैं अपनी बाँह उसके

गले मे डाल कर लिपट गयी. और अपने मम्मों को उस के सीने मे दब

जाने दिया..कही कुछ हो गया तो बड़ी बदनामी हो जाएगी रे...-कुछ

नही होगा बीबीजी.कहा तो था..आपरेशन करवा लिया हू.सुनते है

आपरेशन फेल भी तो हो जाता है...मेने अपने मन की शंका

बताई.तो...उसने मेरे जवान कूल्हे का मज़ा लिया.तो क्या..अरे बाबा

आपरेशन फेल हो गया तो मुझ विधवा का क्या होगा भला ?.उसने ज़ोर से

मुझे जाकड़ के मेरे कूल्हे का हलवा बना

डाला..बीबीजीईईईई...मेरे होते हुए आप काहे की विधवा.कहो तो

सुबह मंदिर मे शादी कर लेते है.. अब चौकने की बारी मेरी थी.

ये तो मेरे लिए सीरीयस है. इतना सीरीयस..शादी करना चाहता

है मुझ से.ऐसा अनोखा प्रापोज़ल मुझे अपनी सारी जिंदगी मे नही

मिला था. मेरे तो सुनकर ही रोए खड़े हो गये.पूरे बदन मे

अजीब सी खुशी का अहसास हो रहा था..तुम.तुम..तो शादी शुदा हो

ना.-तो क्या हुआ बीबीजी.एक मरद की दो औरते नही होती है क्या ?.ओ

मा..ये तो बड़े बुलुंद ख्याल का दिखाई पड़ता है. मैं मन मे

सोची.शायद देवी माता मेरी सहायता कर रही थी. मैं उस की बाहों

मे इठला कर बोल पड़ी..मुझ से शादी करोगे ? इतनी पसंद हू मैं

?बहुत...बहुत..आप बहुत ज़्यादा खूबसूरत हो बीबीजी. पता है यहा

पूरे मोहल्ले मे आप से ज़्यादा सुंदर कोई नही है..और उसने मेरे कूल्हे

को मसल डाला..हमारे गाँव मे तो आपके जैसी गोरी एक भी औरत

नही है.और वो तुम्हारी औरत ?..देवकी...? मुझे उस की गाँव वाली

औरत का नाम पता था.अरे..वो क्या खा कर आपका मुकाबला करेगी.वो

तो आपके पाँव की धूल भी नही है बीबीजी..अपनी तारीफ़ सुन कर

मुझे बहुत अच्छा लगा. उसी चक्कर मे मैं फिर से गरम हो गयी. और

उस से लिपटने लगी ज़ोर ज़ोर से साँस छोड़ने लगी. मेरी उत्तेजना की

ये हालत देख हरिया फॉरन मेरे उपर चढ़ आया. उस का लंड तो पता

नही कब का खड़ा हो चुका था. बस मेरे उपर सवार हो मेरी टांगे

उठा दी. अबकी बार तो मेने खुद भी सहयोग करते हुए अपनी टाँगों

को मोड़ा. तब उसने अंधेरे मे ही अपना खड़ा लंड मेरी बालों भरी

चूत से लगाते हुए कहा...बोलो फिर.क्या कहती हो.करनी है कल

शादी ?.एक तो चूत पर खड़े लंड की रगदन और उपर से शादी का

प्रापोज़ल..मेरे तो छक्के छूट गये. बस कह कुछ नही पाई.उसके दोनो

हाथों को अपने दोनो हाथों से पकड़ कर दबा लिया. वह कुछ ना बोला.

शायद मेरी हालत समझ रहा था. बस...धक्का लगा कर लंड मेरे

अंदर घुसा दिया.

भाई लोगो कहानी अभी बाकी है आगे की कहानी अगले भाग मे आपका

दोस्त राज शर्मा


अंदर पहले का पानी भरा था. और मैं दुबारा गीली भी हो रही


थी.लंडराज ऐसे घुसे जैसे मक्खन मे छुरी. लेकिन छुरी तो छुरी


होती है. रोकते रोकते भी मेरे मुँह से सीत्कार निकल पड़ी. अंधेरा


बंद कमरा मेरी ज़ोर की सीत्कार से गूँज उठा..सीईईई.बदन कड़ा


पड़ गया. बिस्तर की चादर हाथों से पकड़ नोच ली. उसने तो एक ही


धक्के मे पूरा लंड जड़ तक अंदर घुसा दिया. जब घुस गया तो मेने


यह सोच कर कि यह कही अभी का अभी शुरू ना हो जाए-उसे अपने उपर


गिरा लिया.और उस के गले मे बाहे डाल दी. और और अचानक मुझे ना


जाने क्या हुआ कि मैं रो पड़ी. सूबक सूबक कर रो पड़ी. रात के


अंधेरे मे...हरिया की खटिया पर..एकदम मादरजात नंगी.हरिया का


मोटा लंड अपनी चूत मे फुल घुसवाए हुए.मैं ज़ोर ज़ोर से रो रही


थी बेचारा हरिया तो हक्का बक्का रह गया..उसने अपना लंड तो नही


निकाला-पर लंड को चूत मे स्थिर कर बार बार पूछने लगा.क्या हुआ


बीबीजी. मैं बहुत देर तक रोती रही.वह चुपचाप लंड घुसेडे मेरे


बालों मे उंगलीया फिराता रहा. जब मैं थोड़ा नारमल हुई तो


सुबकि भर उस से बोली..मुझे छोड़ के मत जाना हरिया...-मेरा


तुम्हारे सिवा कोई नही है...आप बिल्कुल मत डरो बीबीजी..मैं आपको


क्यों छोड़ूँगा.मुझे आपके जैसी सुंदर औरत कहा मिलेगी.मुझ पर


भरोसा करो बीबीजी..और जानते है क्या हुआ..?.हरिया ने खचाक से


अपना लंड मेरी चूत से खीच लिया. उठा. खाट से उतरा. मुझे हाथ


पकड़ कर उठाया. खीच के मुझे दीवार की तरफ ले गया.


और.खत..आवाज़ के साथ कमरे की ट्यूब लाईट जल उठी. अजीब


द्रश्य था. मैं और वो दोनो मादरजात नंगे थे. उस का मोटा सा


काला लंड अभी भी तन कर खड़ा था.मेरे आगे लकड़ी के डंडे जैसा


झूल रहा था..एक दम काला मोटा लंबा.उसमे तीनों ही खूबीया थी.इत्ता


बड़ा लंड मेने तो जिंदगी मे पहली बार देखा था. मेरी तो साँस ही


थम गयी. लज्जा के मारे मेरा बुरा हाल था. वह मुझे खीच कर


भगवान के आलिए के पास ले गया. और मैं कुछ समझ पाती इस के


पहले ही उस ने वाहा से सिंदूर ले कर मेरी माँग भर दी. ओह्ह्ह्ह्ह माँ यह


क्या किया रे मुझ विधवा की माँग मे सिंदूर !!!!!!!!! मैं तो


गणगना कर वही ज़मीन पर बैठ गयी. हरिया ने पकड़ कर मुझे


उठाया और खटिया पर ले गया. वा मेरी बगल मे लेटने लगा तो मैं


कुनमूनाई..ला..ई..ट. वह मूँछों मे मुस्कराया..अब लाईट तो रहने


दो बीबीजी..कम से कम मैं तुम्हे देख तो सकूँ. और वह भी मेरे पास


आ लेटा.


मैं रोशनी मे शरमाती हुई बोली..-यह क्या किया ? मेरी माँग


भर दिए ? और उसके सीने मे मुँह छुपा लिया..उसने मुझे अपनी बाहों


मे भर लिया..आप नाराज़ तो नही हो ना ? उसका हाथ मेरी पीठ पर


था. मुझसे शरम के मारे कुछ बोलते नही बना.बताओ ना


बीबीजी..अपने मन की बात खुल कर कहो. मैं तब भी कुछ ना बोली.बस


अपनी बाहे उसके गले मे पिरो कर अपने मम्मे उसके सीने से दबा


दिए..मेरे मम्मों का मधुर दबाव महसूस कर वह अपना जवाब पा गया.


और बस अगले ही क्षण वह मेरे उपर था. मैं अपनी टाँगों को खुद ही


मोड़ कर उस के लिए जगह बनाते हुए सोच रही थी कि ये आख़िर चीज़


क्या है.कितनी देर हो गयी अभी तक अपना लंड खड़ा ही किए हुए


है.पहले मेरी मे घुसा चुका था-फिर निकाल के, उठा कर ले


गयामांग मे सिंदूर भरा-फिर खटिया पर आ कर घुसाने को तैयार


है.कब से खड़ा है इसका दूसरे का होता तो अभी तक कभी का ढीला


हो जाता. और मेने टांगे मोडी ही थी कि मेरे प्यारे नौकर ने अपना


लंड पकड़ कर मेरी चूत से लगा दिया. वह धक्का दे उसे अंदर करता


उस के पहले ही मैं उसका हाथ पकड़ कह उठी..हा..री..याआअ


धी..रे...-वह मुस्करा दिया..


अब कमरे मे ट्यूब लाईट का उजाला था,इस वजह से मुझे अपने नौकर

के आगे बहुत शरम आ रही थी.मेने उसे मुस्कराता पा शरमा कर

अपना हाथ कुहनी से मोड़ कर आँखों पर,चेहरे पर रख लिया. उसने

धक्का दिया तो लंड प्रवेश की पीड़ा से मैं एक बारगी तड़प उठी. पर

मुँह को कस के बंद किए रही..बीबीजी..दर्द हो रहा है क्या ? मैने

कहा तो कुछ नही,पर दर्द महसूस ज़रूर कर रही थी.बहुत मोटा और

कड़ा लंड था साले का.ज़्यादा दर्द हो रहा हो तो निकाल लू ? उसने मुझे

छेड़ा..मैं काट के रह गयी. 35 साल की मेरी उमर एक बच्चे की माँ

यह ठीक है कि मेने सात साल बाद लिया था पर यह तो संसार का

आठवा आसचर्या होता कि दर्द की वजह से उसे लंड निकालना पड़

जाता. मैने कनखियों से उसे देखा. मालकिन की चूत मे लंड घुसा

बड़ा खुश नज़र आ रहा था..बीबी जी.(उसने थोड़ा सा लंड बाहर की

तरफ खीचा.)उम...(मैं गणगना कर कमर हिलाई)बोला करो...(उसने

झट से पूरा अंदर कर दिया) मुझे शरम आती है ना.(मैं धक्के से

हिल उठी)अरे इसमे कैसी शरम.यह तो सब कोई करते है.(उसने मेरे

घुटने पकड़ चौड़े कर दिए)बताओकरते है कि नही.(और एक मझोला

धक्का मारा) का..का..करते..है..(मैं आनंद से विहल हो

उठी.)औरत मरद का तो जोड़ा होता है बीबीजी..इसमे कैसी शरम.(उसने

लंड अंदर किया).( मैं मोटे लंड की मार से व्याकुल हो तकिये पर

उपर खिसक पड़ी) बीबीजी.देखो..शरम करोगी तो मज़ा नही

आएगा...(उसने अपने लंड राम को इतना बाहर निकाला लिया कि अंदर

बस सुपारा ही बचा)..(मैं चुप्पी मारे चेहरे पर कुहनी मोडेपडी

रही.)बीबीजी. (उसने मेरी टाँगो को भरपूर उँचा उठा कर लंड

घुसाया.)..(मैं सात साल बाद मर्द का मज़ा ले रही थी.जवाब नही

दिया.बस चुप पड़ी रही )बीबीजी...बोलो ना..अपने मन की भावना को

प्रगट करो..ऐसे चुप ना रहो...मुझे चूत खोल कर पड़ी रहने वाली

औरते पसंद नही है..(और गचाक से लंड घुसेड़ा).


हम बोल तो रहे

हैं.(मैने कुनमूना के उसके धक्के का मज़ा लिया.)बोलोज्यादा दर्द तो नही

है अंदर.(उसने मेरे घुटने को सहलाया)ज़्यादा नही है...(मैं

शरमा के कही)निकाल लू ?धात..-फिर.(वह हंसा)मैं क्या

जानूँ.(मेरे गाल लाल हो गये)चोदु...(वह गपाक से अंदर

किया)हामाआ.(मस्ती के मारे मेरे मुँह से हा निकल पड़ी)मज़ा पा रही

हो ना.(वह बाहर खीचा)हामाआ..(मुझे लगा कि मई जन्नत मे

हू.)ज़ोर से चोदु ?... (वह मेरी जाँघ पर हाथ फेरा)नही...(मैं

उत्तेजना के शिखर पर पहुँच रही थी.)फिर..(वह पूरा का पूरा लंड

अंदर कर दिया.) धीरे..हाय..धीरे सीई रीई..(मैं दर्द से कराह

उठी).वह धीरे से निकाला.धीरे से घुसाया..ऐसे ? ( मेरी तरफ

देख मुस्कराया)हाँ...आईसीई ईईईईई..(मैं धक्कों के ज़ोर से

उचक पड़ी)मज़ा आया ?(उसे मालकिन की चूत पर कब्जा करने की अपार

खुशी थी)सीईईई..(मैं ज़ोर से सीत्कार उठी.पर उस का जवाब नही

दिया)बोलो..(वह अपना कड़क लंड मेरी चूत मे जड़ तक पेल दिया.)क्या..

(मैं धक्के के ज़ोर से तकिये पर उपर की तरफ खिसक गयी.)कैसा लग

रहा है...


(वह जल्दी वाला धक्का मारा )सीईईईईई...हरिय्ाआआ..मर

जाउम्गीईईईइ..(मैने चेहरे से हाथ हटा उसका हाथ पकड़ लिया.).वह

तो तेश मे आ गया और तीन चार धक्के दिए. मैं झरने के कगार पर

पहुँच गयी. उत्तेजना की चरम सीमा पर पहुँच मेरी सारी शरम

पता नही कहा घुस गयी. मेने अपने नौकर का हाथ पकड़ उसे अपने

उपर गिरा लिया और दोनो हाथोंदोनो पाओंसे उसे बुरी तरह जकड़ते

हुआ ज़ोर से सिसकारी सी भरी..ओ हर्र्रियाअ रहह..मेरा शरीर

रोमांच से भर उठा. मैं हरिया के नीचे एकदम पत्ते की तरह कंपकपाने

लगी. जैसे कोई जुड़ी ताप बुखार चढ़ा हो. मेरे मुँह से बस

ईईईईईईईईईईईईईईई की आवाज़ निकल रही थी. चतुर

हरिया समझ गया कि मेरा डिस्चार्ज हुआ है. उसने उसीमे कस के तीन

चार धक्के मार दिए. और लो उसका भी हो गया..लंड मेरे अंदर तुनक

तुनक के अपना माल गिराने लगा. मैं अपने नौकर की क्रीड़ा पर

निहाल हो गयी..दोनो एक दूसरे को ऐसे जाकड़ लिए कि अब कभी जुदा ही

नही होना है...----.औरत की जिंदगी मे मर्द के पहले

चुबन की बहुत ज़्यादा अहमियत रहती है. शायद मर्द को भी

रहती हो. आप को यह जानकर ताज्जुब होगा कि मैं पिछले दिनों अपने

नौकर हरिया द्वारा चोदि तो गयी थी..पर ना तो उसने मेरा मम्मा

दबाया था और ना ही मुझे चूमा था. पता नही उसके यहा इन बातों

का रिवाज भी था या नही. पर उसके मेरी माँग भर कर चोदने के

तरीके से मैं बहुत थ्रील्ड थी. हालाकी मैने कई बार मर्द के साथ

कल्पना मे चुदाई की थी. पर हरिया का ख़याल उसके नौकर होने की

वजह से कभी नही आया था. एक ऐसे व्यक्ति से चुदाई करवाने का

मज़ा कुछ और ही होता है जिसके बारे मे आपने पहले कभी सोचा ही

नही हो. मेने तो कभी कल्पना ही नही की थी कि किसी दिन अपने नौकर

हरिया से चुदवाउंगी. हालाकी वह मेरे साथ पिछले दो साल से

है..तो मैं बात कर रही थी पहले चुंबन की. मुझे हरिया से

पहला चुंबन आज शाम को मिला. जब मैं स्कूल से आई तो दरवाजा

खोलनेवाला हरिया था. मैं अंदर आई तो उसने फॉरन दरवाजा बंद

कर मुझे बाहों मे भर लिया. एक दम दिन दहाड़े उसकी इस हरकत से

मैं घबरा सी गयी. उसकी बाहों से निकलने की कोशिश की.

छटपताई..छोड़ो ना..-क्या करते हो..-कोई देख लेगा ना.. मैं

छटपटा कर उसकी बाहों से आज़ाद होने की कोशिश करती रही. पर

मेरा यह प्रयास व्यर्थ था. मर्द के आलिंगन से छूटना हम औरतों

के लिए इतना आसान नही होता है. और फिर अगर मर्द हरिया के जैसा

कड़ियल हो तो बिलकुल भी नही. उल्टे इस चक्कर मे मेरे ब्लाओज मे कसे

उरोज उसके चौड़े सीने से रगड़ रगड़ उठे. और तब उसने मुझे चूमा.

एक चुंबन..मेरा पहला चुंबन.मेरे दाएँ वाले गाल पर..हरिया

सावला रंग हमेशा धोती और बंदी पहनता है. 30-35 की उमर

पहाड़ी मर्द कसरती देह फॉलादी बाँहे तेज बीड़ी की महक मेरे

नथुनो मे घुसती चली गयी. बड़ी बड़ी झाओ मुच्छे मेरे गोरे गोरे

गाल पर गढ़ उठी.


शरम के मारे मेरे तो गाल ही गुलाबी हो उठे. मैं चुंबन खा ज़ोर

लगा कर उस से छूट गयी और वाहा से भाग के अपने कमरे मे घुस

गयी. जब मैं अपनी साड़ी से अपना गाल पोन्छा तो उस पल का अहसास

करते ही मेरे गोरे गाल फिर से गुलाबी हो उठे..थोड़ी देर बाद जब

वह खाना बना रहा था तो मैं किसी काम से किचन मे गयी. उसने मोका

नही छोड़ा. मुझे फॉरन से कमर मे हाथ डाल लिपटा लिया..क्या करते

हो.-छोड़ो..-कोई देख लेगा...उसने ज़ोर से आलिंगन मे बाँध लिया. एक बार

फिर मेरे सुपुष्ट उभार उसके सीने से रगड़ उठे..यहा कोई नही है

बीबीजी.-मुन्ना.मैं किसी तरह शरमाई सी बोली.साथ ही कुछ

जानबूझकर कर ही अपने मम्मे उसके सीने से रगड़ी.वो तो बाहर

खेल रहा है..मैं चुप रही तो उसने मुझे भिच लिया..बीबीजी...उसके

हाथ मेरी पीठ पर सख़्त हो गये.हुमुऊ..मैने चिपक कर जवाब

दिया.


नाराज़ तो नही हो ना..उसने पूछा..दर असल वह डर रहा था. वह

नौकर मैं मालकिन दोनो के स्तर मे बड़ा फ़र्क था. उसने मुझे स्कूल से

आते ही चूम लिया था.इस कारण अब डर रहा था कि कही मालकिन

नाराज़ हो जाए और उसकी नौकरी चली जाए. पर क्या आप भी

समझते है कि उसकी नौकरी जाने वाली थी ? नही भाई नही अरे

उसका तो प्रमोशन होने वाला था. वह तो नौकर से मेरा हसबेंड

बनने वाला था. मेरा प्राईवेट हसबेंड. प्राईवेट हसबेंड

यानी समाज की नज़रो मे मेरा नौकर परंतु घर मे मेरा वो..हा हा हा

हा हा हा दोस्तो कहानी अभी बाकी है आगे क्या हुआ जानने के लिए

पढ़ते रहे नौकर से चुदाई . आपका दोस्त राज शर्मा


मैने कोई जवाब ना दिया तो वह डरते डरते फिर से 

बोला..बीबीजी.नाराज़ हो मुझ से. तब उस का डर मिटाने के लिए 

जानते है मेने क्या किया ? खड़े खड़े वही किचन मे हरिया के गले 

मे अपनी बाहों की माला पहना दी. और उस के चौड़े सीने पर अपने 

उरजों का मधुर दबाव दे कहा.उहह..हुम्ह..क.और मैने अपनी नाक उसकी 

गर्दन पर रगड़ दी. मेरी इस प्रतिक्रिया पर तो वह खुश हो उठा और 

मेरा कूल्हा साड़ी पर से ही मसल बोला..बीबीजी..आप बड़ी अच्छी हो.. 

और तदाक से एक बार इधर का गाल चूम लियाएक बार उधर का. मैं तो 

शरम से लाल हो गयी और अपने आप को छुड़ा कर वाहा से भाग खड़ी 

हुई..पर क्या मर्द से भागना इतना आसान होता है ? और भागना 

चाहता भी कौन था ? 


यहा तो मन मे हरदम यही इच्छा रहती थी कि कोई हो...अपना भी 

कोई हो. सात साल के तरसने के बाद तो अब देवी मा ने मौका दिया है. 

मैं इसे छोड़ने वाली नही थी. रात को खाने के बाद उसने मेरा 

हाथ पकड़ कर जब कहा रात को आओगी ना बीबीजी...तो सच मानिए 

मुझे बिल्कुल भी बुरा नही लगा. पर हा शरम से गाल ज़रूर गुलाबी 

हो उठे..और रात.मुन्ना के सो जाने के साथ मेरा सो जाने का कोई 

इरादा नही था. आखों मे नींद ही ना थी. कल रात उसके द्वारा दो 

बार चोदे जाने की मीठी याद अभी बाकी थी. आज कितनी बार होगा ? 

कैसे करेगा ? मन मे बार बार यही ख़याल आ रहा था..मुन्ना जब सो 

गया तो मैं धीरे से उठी. अपने कपड़े ठीक किए. मैं साड़ी ब्लाओज 

पहने थी. अंदर ब्रा थी. पर पेँटी ना थी.वो तो मेने अपनी आदत के 

मुताबिक स्कूल से आते ही उतार दी थी. बालों मे कंघी की. थोड़ा सा 

पाउदर भी चेहरे और मम्मों पर लगा लिया. दिल धड़कना शुरू हो 

गया था. यह तो साला काम ही ऐसा है. और मेने कुंडी खोली. ये लो 

वो तो सामने खड़ा था. ओ मा मेरी तो शरम के मारे पलकें ही झुक 

गयी..तुम यहा ?.मेरे स्वर मे आस्चर्य था.मैं उसके यहा होने की 

कतई उम्मीद नही कर रही थी..मुझे मालूम था बीबीजी..आप ज़रूर 

आओगी.उसने अपना पेटेंट वाक्य दोहराया. मुझे कुछ भी कहने का 

मोका दिए बगेर हाथ पकड़ खीचता हुआ अपने कमरे की और ले 

चला. और मैं विधवा अपने नौकर का मज़ा लेने उसके साथ घिसटाती 

सी चली गयी..हरिया का कमरा मेरा सुहाग कक्ष साफ सुथरा 

कमरा एक ओर खटिया दूसरी ओर आलिए मे भगवान तीसरी ओर कोने मे 

मोरी जहा पानी की भरी बाल्टी भी मोजूद थी. मालूम है कमरे मे 

अगरबत्ती महक रही थी. ट्यूब लाईट का प्रकाश था. और बिस्तर की 

चादर नयी थी. सब मिलकर मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे..


आज मेरे 

बिना कहे ही हरिया ने जा कर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. मेरा 

दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. पास आ कर जब हरिया ने मेरी कमर मे 

हाथ डाला तो मैं धीरे से कुनमूनाई..ला..ला..लाईट..बंद कर दो..

उसने मुझे अपने से चिपका लिया..बीबीजी.अंधेरे मे मज़ा नही आएगा 

जी..उसका हाथ मेरी पीठ पर पहुँच गया था..हमको शरम आती 

है ना... मैं अपना चेहरा उसकी चौड़ी छाती मे छुपाटी हुई बोली. 

तब उसने मुझे खड़े खड़े ही लेक्चर पिला दिया..देखो बीबीजी...मज़ा 

लेना है तो शरमाने से काम नही चलेगा.अरे इसमे क्या है.यह तो 

सब कोई करते है.दुनिया के सब मर्द चोदते है और दुनिया की सब 

औरतें चुदवाति है.दुनिया से शरमाओ पर खाली एक मर्द से नही 

शरमाने का क्या ? अपने मर्द से. समझी ना.मेरे को चुपचाप खोल 

के पड़ जाने वाली औरतें पसंद नही.औरत को भी आगे बढ़ कर 

हिस्सा लेना चाहिए.मज़ा लेने का काम तो दोनो तरफ से होना चाहिए 

ना...अब मैं क्या कहती. मुझे तो साली शरम ही बहुत आ रही थी. 

जीभ तो जैसे सूख ही गयी थी. तब उसने मेरा चेहरा थोडी पकड़ 

उपर उठाया. मर्द की निगाहों से भरपूर देखते हुए बोला..आप 

बहुत खूबसूरत हो बीबीजी..अपनी तारीफ सुनकर मैं और शरमा 

उठी.बीबीजी बिंदी नही लगाई ? मैं उसकी बाहों मे सिमट सी 

गयी.उहूँ.लगाया करो..आप पर बहुत अच्छी लगेगी. वह मेरी पीठ से 

होते हुए कूल्हों तक पहुँच गया.माँग मे सिंदूर लगाया करोबिंदी 

लगाया करो.चूड़ी पहना करो.मैं ला कर दूँगा. 


मैं चुपचाप उसके सीने मे मुँह घुसाए खड़ी रही..पहनोगि ना 

?.उसने बड़े प्यार से पूछा. मैने मुँह से तो कुछ ना कहा पर हा मे 

गर्दन ज़रूर हिला दी. मुझे तो खुद यही सब चीज़े पहनाने वाला 

व्यक्ति चाहिए था. तब वह मुझे पकड़ कर खीचता हुआ भगवान 

के आलिए के पास ले गया और कल की तरह सिंदूर ले कर मेरी माँग भर 

दी. मैं उस के इस तरह के प्यार करने के तरीके पर निहाल हो 

उठी. तब वही भगवान के सामने ही उसने मेरा चियर हरण करना 

शुरू कर दिया. ट्यूब लाईट के प्रकाश मेअकेले बंद कमरे मेजब उसने 

मेरे वस्त्र खीचना चालू किए तो बस मैं ना ना ही कहती रह 

गयी.कभी ना कहती,कभी उसका हाथ पकड़ती तो कभी अपने कपड़े 

पकड़ती.पर उसके आगे मेरी एक ना चली. मेरा एक एक कपड़ा 

सिलसिलेवार उतरता चला 


गया..1..साड़ी.2..ब्लाओज.3..पेटीकोट.4..और सब से आख़िर मे 

ब्रा..अगले ही पल मैं अपने नौकर के आगे मदरजात नंगी खड़ी 

थी..घबरा रही थी शरमा रही थी..कभी हथेली से अपने मम्मे 

छुपा रही थी. तो कभी चूत पर हाथ फेला कर लगा रही थी. और 

सामने खड़ा वो कुदरत की बनाई कारिगिरी को आखे फाड़ फाड़ कर 

देख रहा था. उसे तो वाहा गाँव मे ऐसी सुंदर औरत मिलना मुश्किल 

थी. मेरी शरम का जो हाल था वो तब और दस गुना बढ़ गया जब उसने 

भी अपने कपड़े खोल डाले. 1..बंदी 2..धोती वह बस दो ही तो कपड़े 

पहने था. धोती के अंदर चड्डी तक नही थी कम्बख़्त के. बस धोती 

के उतरते ही जो सामने आया वो अनोखा नज़ारा था. मेने अपनी 

जिंदगी मे बस दो ही लंड देखे थे..1..अपने पति का..(उनका ढीले 

मे करीबा 3 उंगल का और खड़े मे करीब 5 उंगल का था.).2..स्कूल के 

चपरासी का..(जो एक बार पेशाब कर रहा था और मैं वाहा से गुज़री 

तो दिखा था.वह करीब दो उंगल का होगा.).बस लंड के मामले मे मेरा 

एक्सपीरीएन्स इतना ही था.



अब यूँ तो मैने अपने मुन्ना का भी देखा 

है पर वो तो बच्चे का है, बहुत ही छोटा है.मेरी छोटी उंगली से 

भी छोटा. उसकी तुलना मे यह हरिया का लंड वास्तव मे बहुत ही बड़ा 

था. करीब सात इंच तो होगा लंबाई मे. और मोटा भी बहुत था. 

रंग-एक दम काला. बड़े बड़े बाल. एक दम सीधा खड़ा-90 डिग्री के 

एंगल पर. सामने की और तना हुआ नीचे बड़े बड़े अंदू लटक रहे 

थे. ख़ास बात यह कि लंड की सुपादि पर चमड़ी चढ़ि हुई थी.पता 

नही इस की चमड़ी उतरती भी है या नही.मेरे पति की तो उतरती 

थी. फिर मेरा ध्यान पूरे ही हरिया पर गया. सामने नंगा खड़ा 

था. सावला रंग बालिश्ट देह भरी हुई मछलीया कसरती बदन 

चौड़ा चकला सीना 5-8 का कद मे तो उस की गर्दन तक पहुँचती हू. 

कुल मिला कर यह कि वह मुझे काम देव का अवतार लग रहा था..मैं 

उसे नज़र भर देख ही रही थी कि वह मेरे पास आया और मेरी नंगी 

कमर मे हाथ डाल मुझे खीचता हुआ बिस्तर पर ले गया. खटिया 

पर मैं नही लेटी बल्कि उसी ने मुझे धक्का दे कर पटक दिया और खुद 

मेरी बगल मे हो कर मुझे बाहों मे भर लिया. नंगे हरिया से नंगी 

हो कर लिपटने मे जो आनंद मिला रहा था उसे मैं शब्दों मे बयान 

नही कर सकती. यह कहना ग़लत ना होगा कि हम दोनो ही एक दूसरे से 

गूँथ गये. वह मुझ मे और मैं उसमे घुसे जा रहे थे. उसके नंगे 

जिसम से अपना नंगा जिसम रगड़ना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. 


उसने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए जब मेरे गाल को चूमा तो मैं 

लाज से लाल हो उठी. मूँछे तो गढ़ी ही बीड़ी की बास से नाक 

गंधा गयी. गोरे गाल पर थूक लग गया सो अलग. पर यह सब मुझे 

लग बहुत अच्छा रहा था.ज़रा सा भी बुरा नही लगा. जाने क्यों ? 

शायद उत्तेजना की वजह से मेरे शरीर से जो हारमोन छूट रहे थे 

उन के कारण. मैं तो खुद भी यही सब चाह रही थी. उस समय मेरी 

पूरी कोशिश यही थी कि मैं हरिया मे ही घुस जाउ. लेकिन मैं तो 

औरत थी मैं हरिया मे कैसे घुस सकती थी ? घुसना तो उसे ही था 

मेरे अंदर. यह जल्दी ही हुआ. उसने चिपका चिपकी के बीच अपना एक 

हाथ मेरी जाँघो के मध्य डाल दिया. वाहा मेरी चूत तो अब तक की 

क्रियाओं से इतनी उत्तेजित हो उठी थी कि वाहा से पानी निकलने लगा 

था. पानी निकल कर मेरी जाँघ तक को गीला बना रहा था. हरिया की 

उंगली मे वही पानी लगा तो उसने एक पल की भी देरी नही की. फ़ौरन 

मेरे उपर चढ़ता चला गया. अब मैं नीचे थी और वो उपर वह मेरी 

टागो को चीरता हुआ पुकारा.बीबीजी.मैं चुप्पी साधे 

रही..बीबीजी..कर दम अंदर..मैं दम साधे पड़ी रही.अंदर करवाने 

को ही तो उस के पास आई थी,पर कहते ना बना..वह पास खिसक कर 

अपना खड़ा लंड मेरी झातदार चूत से थेल्ते हुए कहा..बीबीजी.बोला 

करो.शरमाया मत करो..देखो आपको मेरे सर की कसम है..अब ऐसी 

कसम सुन कर तो मैं काप उठी. फ़ौरन खटिया मे उठ बैठी. उस का 

हाथ पकड़ बोली..हाय कसम क्यों देते हो जी.. यह भावना का सवाल 

था. उस वक्त हरिया मेरा सब से प्रिय व्यक्ति था. उस से जो मेरा लंड 

चूत का संबंध बन रहा था उस के लिए मैं पिछले सात साल से 

तरस रही थे. उस के सर की कसम का सुनते ही मेरी सारी शरम 

जाने कहा उड़नचू हो गयी. मेने उसे ठीक वैसे ही जी कह कर 

संबोधित किया जैसे कि एक स्त्री अपने पति को करती है..बीबी 

जी...मेरे सर की कसम है जो शरमाई तो.खूब बाते 

करो..बोलो..अपने मन की बात करो..मेरा मन तो औरत की सोहबत को

बरसो से तरस रहा है.बहुत मन करता है कि किसी के साथ खूब 

गंदी गंदी बातें करूँ..आप के पास भी कोई नही है...मेरा साथ दो 

बीबीजी..मैं तुम्हारे साथ हाँ हरीयाहह. मैं बैठे बैठे उसके 

गले मे हाथ डाल चिपक गयी. और उसके खुरदुरे गाल से अपना नर्म 

मुलायम गाल रगड़ते हुए बोली.क्या तुम मुझे बेशरम बनाना चाहते 

हो ? उसने मेरा गाल चूम लिया..हा..बीबीजी..तभी मज़ा आएगा. उसने और 

गाल चूमा. उस से अपना गाल चूमवाना मुझे बड़ा अच्छा लग रहा 

था. गाल पर लगे जा रहे थूक कि मुझे ज़रा भी परवाह नही थी. 

मैं उस से चिपक कह उठी..मैं कोशिश करूँगी कि जो तुम्हे पसंद हो 

वही करूँ.-यह हुई ना बात... वह खुश हो मेरे गाल की बोटी को अपने 

मुँह मे ले कर चूस ही डाला. मैं नखरे से सीत्कार 

उठी..सीईईई...क्या करते हो. उसने भोले पन से 

पूछा..क्यों..क्यों..क्या हुआ... मैने नज़र उठा के उस कामदेव के 

अवतार को देखा.फिर कही..निश्शान पड़ जाएगा नाह... 


वह मेरे इस तरह बोलने से खुश हो पूछा..तो क्या हुआ ? पड़ जाने दो. 

मैं बदले मे उसके गले मे बाँह डाल चिपक सी गयी..और जो किसी ने 

देख लिया तो...-तो क्या. उसने मेरे दूसरे गाल को भी चूस 

लिया..हाय..बदनामी हो जाएगी ना.. मैं क्रत्रिम रोष से उसे ढका के 

हटाती हुई बोली..बस वो क्या हटा धक्का दे मुझे ही खटिया पर गिरा 

दिया. और दूसरे ही पल वो मेरे उपर था. बाकी काम आटोमेटिक ही हुआ. 

मेरी टांगे अपने आप उँची हुई चौड़ी हुई उस का मोटा लंड ना जाने कहा 

से आ कर मेरी चूत पर टिक गया. वह बहुत गरम था. उस का कडापन 

मैं साफ साफ महसूस कर रही थी. उसने तो अपने आप खुद ही 

अपना ठिकाना ढूँढ लिया. मेरे छिद्र पर टीका दबाव पड़ा और अगले 

ही पल फाटक खोल अंदर घुस चला. घुसा तो घुसता ही चला गया. 

अंदर और अंदर वह मेरे चेहरे को ताबाद तोड़ चूमता हुआ 

बड़बड़ाया.बीबीजी बोलो.बोलती रहो..चुप मत रहना..आप को मेरी 

कसम है... मुझे तो उस वक्त ऐसा लग रहा था जैसे मेरी चूत अंदर 

से चौड़ी हो रही है. दर्द किसी चीज़ के खुलने का दर्द किसी चीज़ के 

फेलने का दर्द चौड़ा होने का दर्द एक ऐसी सुरंग मे घुसवाने का 

दर्द जहाँ पिछले सात साल से कोई गया ही नही था. अब ऐसे समय मे मैं 

क्या बोलती..बस मूह से सीत्कार ही निकल सकी. मैं अपने उपर सवार 

हरिया को पकड़ ज़ोर की आवाज़ मे सीत्कार 

उठी..-सीईईईई...माआआ.. उपर चढ़े हरिया का हाथ पकड़ 

ली..-हरियाआआअ..धीरेरेरेरे... वह अपने दोनो हाथों से मेरा 

चेहरा पकड़ लिया और दाया गाल चूम कर बोला..बस...बस..हो गया 

बीबीजी... और फिर रुका नही. शुरू हो गया. मेरे चेहरे के चुंबन 

लेते हुए धीरे धीरे शाट मारने लगा. मैं पहले सोच रही थी कि 

पता नही इस के यहा चुम्मे लेने का रिवाज है कि नही. पिछली 

चुदाइयो मे ना तो इसने चुम्मे लिए थे, ना ही मम्मे दबाए थे. मैं 

सोची थी कि क्या पता इसे मुझे मेरे हिसाब से सिखाना पड़ेगा. 

दर-असल जब मेने चुदवाना शुरू ही कर दिया था तो मैं ठीक से ही 

चुदाई का मज़ा लेना चाहती थी. एक संपूर्ण मज़ा. पर मेरी सोच 

इसने ग़लत साबित कर दी. उसे आता तो सब था पर वह हमारे बीच 

नौकर मालकिन का रिश्ता होने से डर रहा था.धीरे धीरे कदम उठा 

रहा था. इस बार तो उसने मुझे चुदाई के पूरे समय ही चूमा. अपने 

दोनो हाथों मे मेरा चेहरा भरे रहा. मैने अपनी गरदन दाए 

घुमाई तो दाए गाल पर चूम लिया..पुच्च. उधर उचक कर नीचे से 

धक्का भी मार दिया..सी..धक्का खा मैं सीतकारी. अपनी गरदन 

बाए घुमाई..पुच्च. वा मेरा बया गाल चूम लिया. और नीचे से 

धक्का मारा. मैं करी..सीईई. बस इसी तरह का क्रम चल पड़ा. 

चुंबन धक्का और मेरा सिसकारना. शुरू मे मैं झिझक रही थी. पर 

जब मेने देखा कि इसे मेरा सिसकीया भरना अच्छा लग रहा है तो 

मेने भी उत्साह से सीत्कारना शुरू कर 

दिया..



मेने भी उत्साह से सीत्कारना शुरू कर 

दिया..सीईईपूचसीईईपुच्चसीईयपुच्च्च्चसीए ईईएपुच्च्चसीईए 

ईईईएपुच्च्च्च्च.उसके धक्को का ज़ोर क्रमवार ज़्यादा,और ज़्यादा,और 

ज़्यादा से भी ज़्यादा होता गया. मैं सीत्कारीया भर भर उस का उत्साह 

बढ़ाती रही..कैसा लग रहा है बीबीजी. वह पूछा. पर मैं जवाब 

नही दे सकी..मज़ा पा रही हो ना.-यह तो मज़ा लेने की चीज़ है 

बीबीजी.-खूब मज़ा लिया करो.. वह मेरे गाल ही नहीपुरा चेहरा ही 

चूम डाला. मेरे पूरे चेहरे को चूम चूम चुदाई लगाई. दाया गाल 

चूमधक्का मारा. बाया गाल चूमधक्का मारा. तोड़ी चूमा लंडपेला. 

कान चूमा लंड घुसाया. आख़ें चूमि-धक्का मारा. माथा चूमा लंड 

घुसेड़ा. कनपटी चूमा-धक्का मारा. गर्ज यह की होठ छोड़ मेरे 

चेहरे पर ऐसी कोई जगह नही बची जहा उसने अपना ठप्पा ना 

लगाया हो. होठ नही चूमे..अपने लंबे लंड से धक्के मार मार कर 

मेरी चूत की एक एक इंच जगह चोद डाली. इस पूरे प्रकरण मे दो 

चीज़ों ने मुझे परेशान किया. एक तो उसकी बड़ी बड़ी झाओ मूँछे 

मुझे सब जगह गढ़ती रही. दूसरी उसके मुँह से आती बीड़ी की तीखी 

गंध. तीखी बास से चुदते चुदते मेरी तो नाक ही सड़ गयी. पर 

आप से मान की बात कहती हुंमुझे लगा अच्छा...बहुत ही अच्छा. पूरा 

चेहरा उसके थूक से गीला हो गया. गालों को चूम चूम कर लाल कर 

डाला..फिर चोदते चोदते चूमते चूमते वो झाड़ा. मोटा लंड एक दम 

से फूल उठा. झटका खाया तो उसने गुर्रा के पूरा अंदर घुसेड 

दिया. लंड ने तुनकी खाई और एक पिचकारी सी छोड़ी. ठीक उसी 

समय हरिया के मुँह से गुर्राहट निकली. मेरा दाया गाल अपने मुँह 

मे ले ज़ोर से चूस डाला. तभी लंड ने दूसरी तुनकी ली. और 

पिचकारी छोड़ी. वह ज़ोर से.उउउउउउ किया.. 


मेरे गाल की चुसाइ बढ़ा दिया. बस उस के इस प्रकार की हरकत से मैं 

समझ गयी कि इसे पूरा मज़ा मिला है. और यह अहसास कि मैने इसे 

मज़ा दिया है.मुझे भी झाड़ा गया. मेरी भी ठीक उसी समय चूत हो 

गयी. डिस्चार्ज..मेरा जोरदार स्खलन हुआ. बुरी तरह कंपकापाते हुए 

मैं अपने पर चढ़े हरिया को हाथों से पकड़ ली. हम दोनो को ही होश 

ना था. वह मेरी चूत मे झरता रहा. उसके लंड से बाद मे भी और 

तुनकिया छूटी. और मई उसके लंड पर अपना पानी बहाती रही. दोनो 

दो जिस्म एक जान हो गये.



बड़ी देर तक हाफते हुए वह मेरे उपर ही

पड़ा रहा. मेरी चूत मे लंड घुसा ही रहा. जब तक-तब तक की ससुरा 

ढीला हो कर खुद ही ना खिसका. घर के घर मे थे कोई जल्दी तो थी 

ही नही. बड़ी देर तक दोनो चिपते पड़े रहे..फिर जब मुझे ज़ोर की 

बाथरूम आई तभी मैं नीचे से कुनमूनाई. वह मुझे पर से 

उतरा. तो मैं उठ कर अपने कपड़े ढूँढने लगी. उसने मुझे रोक दिया. 

मैने प्रश्न भरी निगाहों से उसे देखा..छोड़ो ना.जाने दो अब. मेरी 

निगाहों मे उस के लिए असीमित प्यार था..अभी नही..वह मुझे पकड़ 

कर गले से लगा लिया. नंगा वह नंगी मैं सीन मजेदार था..कर तो 

लिए..अब और क्या ?कैसा लगा बीबीजी. मैने जवाब तो नही दिया बस मुस्करा 

के उसे देखी..बताओ ना.वह मेरी नंगी पीठ पर हाथ चलाया. तब 

मैं उसके गाल पर अपनी तरफ से एक किस करी. यह मेरा हरिया को 

पहला किस था. और हाथ छुड़ाने लगी..अभी मत जाओ बीबी जी..अभी 

मन नही भरा .. मन तो साला मेरा भी सात साल से प्यासा था. पर 

यदि मैं बाथरूम ना जाती तो वही निकल पड़ती. क्या करती-जाना 

अर्जेंट था. मैने छूटने की कोशिश की तो वही समझ 

गया..बीबीजी..पेशाब जाना है क्या ?.मैने शरमा कर हा मे गरदन 

हिलाई. वा बोला.यही मोरी पर हो आओ ना.. मैं फिर हा मे गरदन 

हिला दी. तब जा के वो छोड़ा. मैं लगभग दौड़ती हुई सी मोरी पर 

गयी. वाहा बैठते ही जो मेरी सुर्राटी छूटी तो एक बारगी तो मैं 

खुद अपने पर शरमा उठी. अकेले बंद कमरे मे-रात के सन्नाटे 

मेमेरी पेशाब निकलने की आवाज़ हरिया ने भी ज़रूर सुनी होगी.क्या 

सोचा होगा उसने मन मे... 


उस रात भी मेरी दो चुदाई हुई. एक बार तृप्त होने के बाद भी उस 

ने मुझे जाने ना दिया.ना कपड़े पहनने दिए.वही अपने साथ सुला 

लिया. अकेले बंद कमरे में-अपने नौकर के साथ नंगी पड़ी मुझे शरम 

तो बहुत आ रही थी.पर क्या करती. जानती थी कि जवानी का मज़ा इसी 

तरह लिया जाता है.-भगवान ने चूत को बनाया ही ऐसी जगह है. 

बिना कपड़े खोले इस का मज़ा लिया ही नही जा सकता है. चुदाई के 

बाद की खुमारी भी अजीब होती है. मेरा तो उस से अलग होने का मन ही 

नही हो रहा था. नंगी होने की वजह से शरम आ रही थी सो मैं तो 

हरिया की छाती में ही घुसी जा रही थी. उस के नंगे बदन से 

चिपकाने मे मज़ा भी आ रहा था. उपर से वह मुझे बाहों मे ले मेरे 

सारे बदन पर यहा वाहा सब जगह हाथ फेर रहा था..बीबीजी..(उसने 

मेरी पीठ पर हाथ फिराया.) उम..(मैं अपनी तरफ से उस से चिपक 

उठी.)कैसा लग रहा है .. (उसने मुझे अपनी तरफ खीचा तो मेरे 

मम्मे उसके छाती से जा लगे.)...(मैं अपने छत्तीस न्म्बर के मम्मों 

को हरिया से दबाता हुआ महसूस की.)बोले ना..चुप मत रहा करो..(उसने 

पीठ पर हाथ फेरा.)क्या...(मैने आँख उठा कर उसकी तरफ 

देखा.)अच्छा लग रहा है ना..(वह मेरे कूल्हों पर पहुँच 

गया.)हूंम्म (करके मैं आगे को सरक अपने मम्मों को उस की छाती से 

चिबद जाने दी.).और अपना पुराना राग आलापी..हरीयाहह.मुझे 

छोड़ के मत जाना कभी..वह मेरे कूल्हों की मालिश किया..नही 

बीबीजी..हमारा विस्वास करो.हम आपको छोड़ कर कही नही 

जाएँगे..उसके कहने के ढंग पर मुझे बहुत प्यार आ गया. मैने उस 

से चिपक कर अपने हेवी कूल्हे पर उस के हाथ का दबाव महसूस 

किया..हमने आपकी माँग में सिंदूर भरा है ना बीबीजी.हम..-अब हम 

आपको नही छोड़ने वाले है..और उसने मुझे अपने से चिपका लिया 

मेरे मम्मे उस के सीने से दब कर पिचक गये. मेरे गाल की पप्पी लिया 

तो मुझे बड़ा अच्छा लगा. धीरे धीरे उसमे फिर से उत्तेजना आ रही 

थी. और जब उत्तेजना बढ़ी तो वह पुँह मेरे उपर चढ़ता चला आया. 

मेरी तरफ से कोई विरोध ना था. मैं पीठ के बल हो गयी. अपनी 

टागो को उस के स्वागत में खुद ही फेला दिया. दर-असल जो वो चाहता 

था वही मैं भी चाहती थी. संगम लंड और चूत क़ा संगम.. उसने 

मेरे घुटनों को हाथ लगा इशारा दिया तो मैने फॉरन अपने घुटने 

मोड़ कर उस के लिए जगह बना दी.



वह बैठ कर अपना कड़ा लंड अपने 

हाथ में पकड़कर मेरी चूत से मिलाया तो मेरा पूरा शरीर उस 

स्पर्श से सिहर उठा. वह अपना लंड अपने हाथ में पकड़ कर मेरी 

बालों भारी चूत से तुलाने लगा तो मुझे बस यह समझिए की 

पेशाब रोकना मुश्किल हो गया. मुझे अपनी भाभी की कही पुरानी 

बात याद आ गयी. मर्द को अपने वश मे करना है तो.1-उसकी हा मे हा 

मिलाओ..2-वो जो कहे वो करो.3-बिस्तर मे चुप मत रहो.ज़्यादातर मर्द 

चुप रहने वाली औरत को पसंद नही करते.दिन मे शरमाओ पर रात 

मे एक दम रंडी जैसा व्यवहार करो..मुझे हरिया को वश मे करना 

था. मुझे हरिया को अपना बनाना था..मैं पिछले तीन दिनों से 

हरिया से चुदवा रही थी. हरिया मुझे पसंद था.उसका लंड बढ़िया 

था.उसका चोदने का तरीका बढ़िया था. साथ ही घर के घर मे 

होने की वजह से उसकी अवेलेबिलिटी बढ़िया थी. यदि हरिया चाहता 

है कि मैं बेशरम बनूँ तो यही सही. मुझे एक अच्छा साथी तो मिल 

रहा है. बस मन मे यह बात आते ही मैं पड़ी पड़ी सोचने लगी कि अब 

क्या करूँ जो हरिया को अच्छा लगे. तभी हरिया के लंड तुलाने से 

मेरे अंदर जो सुरसुरी हुई तो लगा कि मेरा मूत ही छूट जाएगा. मैं फॅट से 

उठ बैठी..सामने हरिया उकड़ूम बैठा था. मोटा सा- काला 

सा-सीधा खड़ा लंड उसके हाथ मे था. देख कर ही मेरे कलेजे मे 

हुक सी उठ पड़ी. यह लंड मेरा है इस लंड ने मुझे अभी थोड़ी देर 

पहले चोदा था. और अभी चूत दे दूं- तो अभी फिर चोदेगा. 

वाओ..क्या लंड है यार. मोटाई तो देखो इसकी.यह तो मेरी फाड़ के 

रख देगा यार. है याद रखने लायक है कुछ चीज़.मेने तो सुना भर था कि 

पहाड़ी लंड बड़े मस्त होते है. पाला तो अब पड़ा था. मैं अपना हाथ 

अपने मुँह पर रख आश्चर्या से कह उठी..ओ मा..ये क्या है जी... 



वह मेरे सामने बड़े गर्व से लंड को मुठियाया..क्या बीबी जी.जान 

बुझ कर अंजान बन मुझसे पूछा..मैं अपनी नशीली आखों को और 

नशीला बनाई.हाथ का इशारा उस के लंड की तरफ दी..य..य..ये.. 

वह लंड पर हाथ फिरा उसे और बड़ा करता हुआ बोला..यही तो वो 

चीज़ है बीबीजी जिसे शरीर का राजा कहा जाता है..मैं अपना 

हाथ अपने मुँह पर रख बोल उठी..हाय मा..इत्ता बड़ा... वह गर्व से 

अपना लंड मुझे दिखाता हुआ बोला..देख लो बीबीजी..पसंद है 

आपको...?.मैं फॉरन उसके गले में हाथ डालती हुई कह उठी.हाय 

रे...यह तो बहुत बड़ा है हरिया..हरिया मुझे पकड़ कर बिस्तर 

मे लिटाता हुआ बोला..आ जाओ..फिररर्ररर.एक बार और इस का मज़ा ले 

लो...बीबीजी.. और मैं बिस्तर पर लेटी. उसने मेरे घुटने मोड. चौड़े 

किए. आगे सरक आसन जमाया अपने लंड को अपने हाथ मे पकड़ 

मेरी बालों भरी चूत से अड़ाया. दबाया तो गप्प से आगे का हिस्सा 

अंदर समा गया. मई पड़ी पड़ी करी.उमुऊऊउ... वा और धक्का दिया. 

लंड एक इंच भीतर सरक गया. मैं उसका हाथ पकड़ बोली.हा हा 

हरिया..धीरे...करो रे..दरद होता है..दरद हो रहा है 

बीबीजी...?.सीईईई.(मैं पहले तो सीत्कारी,फिर उस का हाथ पकड़ 

उसे अपने उपर गिरा लिया.अपनी बाँहे उसके गले में पिरो दी. फिर 

कही.)..ज़रा धीरे धीरे पेला करो.नाआआ..मेरे इस तरह सेक्सी 

बातें करने का क्या असर हुआ? वह बदमाश जानते है क्या किया 

मेरे साथ. हँस कर एक दम से थेल दिया मेरे. कसी हुई चूत मे जो 

मोटा लंड घुसा तो मैं ज़ोर से चीख उठी..ओ मा...मर 

गाईईएई..रीईहह. मेरी चीख सुन कर तो वह डर ही गया और 

फॉरन मेरे मुँह पर हाथ रखते हुए कहा.अरे अरे क्या करती हो 

बीबीजी कोई सुन लेगा.. मैं उस की गर्दन मे डाली बाँह का फँदा सख्त 

करती हुई बोली..मैं क्या करूँ...इत्ति ज़ोर से तो पेल दिया मेरे. वह 

लंड को और अंदर सरकाते हुए बोला..और जो पड़ोसी सुन लेंगे तो... अब 

लंड करीब पूरा ही मेरे अंदर था..हाय क्या करूँ...बड़ा मॉटा है. 

मैने फुसफुसा कर उस से कहा..


कभी इतना मोटा नही ली थी क्या 

?(वह मेरा गाल चूमा.एक धक्का लगाया.).मैं जन्नत का मज़ा लूटती 

हुई उस से लिपट गयी..ना..ना..नहिईईई.साहब तो चोदते होंगे 

आपको.(वह गाल चूमा.दूसरा धक्का लगाया.)ही ही..नही तो यह 

बच्चा कहा से आ गया.(मैने गलबहिया डाल चूमने का मज़ा लिया.)चुदवाने 

से बच्चा आता है ?(वह चूमा.तीसरा धक्का लगाया)ही ही..(मैं 

हँस के उस से कस के चिपक गयी ना.)बताओ ना ..(उसने लंड को बाहर 

निकाल पूरा घुसा दिया.मेरा चौथा धक्का.)क्या...एयेए...(मैं धक्के के 

ज़ोर से उपर सरक गयी.)बातें करो हम से...शरमाओ मत...(वह 

चूमा.धक्का मारा.पाचावा)कर तो रहे है..और कैसे...(मैने अपने 

उपर सवार नौकर का गाल चूम लिया)बताओ फिर.(वह गाल चूमा- 

सातवा धक्का मारा.)क्या..(मैने उसे अपनी बाहों मे कस शादीवाला 

अलबेला मज़ा लिया.)चोदने से बच्चा बनता है..(वह चुम्मा लिया- 

आठवा धक्का मारा).हाआआ.(करती हुई मैं उस से बुरी तरह चिपक 

गयी.)(और उसके कान के पास मुँह ले जा कर फुसफुसाई)..इसी लिए 

तो मुझे बहुत डर लगता है हरिया..कही मेरे कुछ हो गया तो...मैं 

कही कि नही रहूंगी..कुछ नही होगा बीबीजी..(वह धक्का मारा-मैं 

खटिया मे पड़े पड़े हिल उठी.आप तो तनिक भी फिकर ना करो.(उसने 

खच्छ से निकाला और गच्चा से घुसेड़ा)आपरेशन करा लिया 

हम,अब कोनो फिकर नाही.चाहे जितना चोदबे के करो..(वह एक दम 

जड़ तक घुसा दिया तो मैं बिलबिला कर उस से ही लिपट गयी.).बस वह 

धक्के पे धक्के देता गया मैं पड़ी पड़ी एक के बाद दूसरा धक्का 

खाती रही..उस का लंड बड़ा अच्छा था..उस का चोदने का स्टाइल बड़ा 

प्यारा था..उसकी स्तंभन शक्ति बहुत अच्छी थी..उसने मुझे बहुत 

देर चोदा.तब कही जा कर झाड़ा..मैं शरम के मारे ज़्यादा एक्टिव भाग 

तो नही ले पाई. पर फिर भी मैने उसका उत्साह बढ़ाया. उसे कही 

से यह नही लगने दिया कि मुझे मज़ा नही आ रहा है. वह बहुत खुश 

था कि शहर की मालाकिन की मखमली चूत चोदने को मिल रही है. 

और मैं भी खुश थी की मुझे घर घर मे एक मज़ा लेने का साधन 

उपलब्ध हो गया था. आग दोनो तरफ लगी थी. दोनो ने ही एक दूसरे की 

आग बुझाई. लंड बहुत मोटा था. उसने अगले कुछ ही क्षणों मे 

रगड़ के रख दिया. मैं इस बार नही झड़ी. पर मैं पिछली बार के 

झदने से ही बहुत ज़्यादा संतुष्ट थी. उस रात जब मैं निपट कर 

अपने कमरे मे पहुँची तो रात का एक बज चुका था..मुझे ऐसी नींद 

आई की सुबह मुन्ना ने ही जगाया. 

दोस्तो ये कहानी आपको कैसी लगी ज़रूर बताना आपका दोस्त राज शर्मा 

समाप्त 


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