लॉकडाउन में मेरा परिवार Chapter 4
रात के अंधेरे में चाची:
रात को मेरी निंद टूटी तो मेरा लुंड खड़ा था। ऐसा लगा मेरे लुंड को किसी ने पक्का हुआ है। कामरे में अंधेरा था। मुझे लगा सपना होगा। मैं चुपचप लेटा रहा। फिर मुझे लगा का मेरा तौलिया खुला हुआ है और सच में कोई लुंड को सहला रही है। मैं फिर भी शांत रहा। मैं सोचने लगा की ये चाची होगी या बुवा। मैंने सोचा, जो कोई भी है देखो वो क्या करता है।
वो और यहां में ही मेरे लुंड के सुपड़े को धीरे-धीरे ऊपर-आला करने लगी। और थोड़ी देर बाद तो लुंड चुन भी लागी। लुंड के सुपड़े पर जीभ फिराने लगी। कभी-कभी अंधा लुंड मुंह में ले रही थी।
कुछ डर में उसे चुनना बंद किया। शायद वो अपने कपड़े खोल रही थी। थोड़ी देर बाद लगा की वो बिस्तर पर चढ़ गई है। वो मेरे ऊपर आ गई उसकी कमर मेरी कमर के ऊपर आ गया था। वो अब मेरे लुंड के सुपड़े को अपनी चुत में लगाकर अपना वजान मेरे लुंड पर बढ़ने लगी। लुंड उसकी चुत में सरकता हुआ धन गया। वो वैसे ही बिना ही मेरे लुंड पर बैठी रही।
उसके वजन से मैं समझ गया, की ये रेखा चाची है जो मेरी लुंड की सवारी कर रही है। मैं फिर भी चुपचप आनंद लेता रहा। उसे अपनी चुत ऊपर आला करना शुरू की। उसकी गिली चुत पे लुंड फिसाल-फिसल कर अंदर-बहार हो रहा था। वो मुहे छोडे या मैं मुख्य उपयोग छोडूं, लुंड को तो चुत में ही घुसना है। वो फिर आगे झुकी और मुझसे चिपक गई। और मेरे कानूनों के पास फुसफुसयी, “राहुल! नहीं उठेगा रे!"
मैं उन्घने का नाटक करते हुए बोला, "हम्म, कौन है!"
"बीटा मैं, चाची!"
"ओह चाची, मैं तो आपका ही सपना देख रहा था।"
वो मुझे चुमने लगी। मैं भी तब तक जोश में आ गया था। मेरा लुंड उसकी चुत में कील की तरह धंस हुआ था। मैंने उसे पिट को बहन में भरा और जोर से उसे अपना या खिंचा। मेरी छटी उसकी चुचियों से चिपक गई। मैं उसके होठों को चुना लगा। वो भी मेरी जीब चुस रही थी।
मैंने होश संभलते हुए पुछा, "बच्ची कहां है?"
"उसको यहां और बिस्तर पर सुला दिया है।"
और हम फिर से एक दसरे के शरिर को चुन, सहले लगे। उसकी चुचियों को सहलाने लगा। मैने आला से उसकी चुत में 15-20 धक्का मारा।
फिर लुंड को चुत में धनसा कर ही उसे पलटकर आला लिटाया और मैं उसके ऊपर आ गया और चुदाई करने लगा। हम दोंनों का काम और यहां में ही चल रहा था। चेहरा नहीं दिख रहा था, लेकिन और यहां में छोडने का मजा भी अलग ही है। गोरी हो या काली, जवान हो या बड़ी औरत, और यहां में सब एक जैसी लगती हैं। मुझे एक कहवत याद आ गई, "अगर मोमबत्ती बुझ जाए तो हर औरत एक जैसी खुशी देती है।" मन में काली गोरी, जवान-बुद्धी का भाव नहीं रहता, इसिलिए और यहां में छोडना अलग मजा दे रहा था।
मैंने चुत से लुंड निकला और उसकी जोड़ी को फेलाया और उसकी गिली चुत में जीभ दलकर चटना शुरू कर दिया। रेखा की छुट का रस बुवा के छुट से अलग स्वद वाला था। मैं जी भरकर चाट। छुट के रस से मेरा चेहरा भीग गया था। वो मेरे सर को चुत में दबये जा रही थी।
"कितना चटेगा रे!" उसके फुसफुसाने की आवाज आई।
मैं कुछ नहीं बोला। अपने काम में लगा रहा। स्वद बहुत अच्छा लग रहा था।
कफी डेर चुत चटने के बाद मैंने उसकी गिली चुत में दुबारा निशान लगा और उसमे लुंड घुसने लगा। मेरा 7" से ज्यादा लम्बा लुंड चुत की चिप-चिपहट को चिरता हुआ चुत की गहरई में पूरा समा गया था।
“चाची, बहुत गरम है आपकी चुत तो। और गहरा भी। मेरा पुरा लुंड समा गया है इसमेई।”
“हां, बेटा तुम्हारा लुंड तगड़ा और लंबा है। इसिलिए रहा नहीं गया और तुमसे चुदने चली आई।"
मैं अब धीरे धीरे कमर हिलाने लगा। उसे आपने जोड़ी मेरे कमर में फसा लिया। मेरी छटी उसकी चुचियों से रागद रही थी।
कुछ डर वैसा छोडने के बाद मैंने लुंड निकला और उसकी चुचियों के ऊपर बैठा गया, जिस लुंड उसके चेहरे के पास आ गया। वो और यहां में ही मेरे लुंड को दुबारा चुनने लगी। कुछ डेर लुंड चुस्वा कर वापस लुंड को उसकी चुत में मैं गुसा दिया और फिर छोडने लगा। कामरे के आंद्रे में पच्छ-पच्छ की आवाज आ रही थी। उस दिन पहली चुदाई में मैं जल्दी झड़ गया था। संध्या बुवा को जंगल में डर तक छोटा था। अब मुझे कोई जल्दी नहीं थी।
छोटे-छोड़ते मैंने धीरे रे पुछा का इस्तेमाल किया, "चाची, आंगन में चलें क्या!"
"कोई देख लेगा तो!"
"कौन देखेंगे, बहार हवा भी मस्त चल रही है।"
वो बोली, "ठीक है, चलो।"
मैंने दरवाजे के पास राखी एक दारी उठा और हम दोंनंगे ही घर से बहार आ गए। आसमान में झिलमिल तारे चमक रहे थे। उस रात का आधा चांद अस्त हो चुका था। मैं घर के पिच तारफ गया और सु-सु किया। चाची भी वही बैठाकर पेशब की। आंगन में राखी बाल्टी के पानी से मैंने लुंड को धोया। चाची ने भी अपनी छुट को पानी से धोया।
मैंने दरी आंगन के पास बची हुई घास के ऊपर बिछया। तारों की हल्की रोशनी में थोड़ा थोड़ा ही दिख रहा था। मैंने चाची को पक्का और हम दोंनों फिर से चिपक गए और एक दसरे की मुन को चुनने लगे। उस महौल में अलग मजा आ रहा था।
चाची मेरे सामने बैठी और मेरे लुंड को मैं में फिर से चुनने लगी। मैं ऊपर आसमान की या झिलमिलाते सितारों को देखते हुए लुंड चुसाई का आनंद ले रहा था।
कुछ डर खराब मैंने उसके मुंह से लुंड निकला। अब वो खादी हो गई। अब मैं उसके सामने बैठा और उसकी छुट की झंटों से खेलने लगा। उसकी नाभी को जीब से लपलपाया तो वो बोली, "इस्स्स गुडगुडी हो रही है रे!" मैं एक हाथ से उसे चुतड़ को सहला रहा था। फिर मैं उसकी चुत को चाटने की कोषिश किया। अस पोजीशन मेई चुत चैटी ठीक से नहीं हो रही थी।
इसिलिए मैंने उसे दारी पर बैठाया और लिया दिया। मैं उसे जोड़े के बिच आया तो उसने मेरा लुंड पकड़कर अपनी चुत में लगा दिया और बोला, "अब दाल तो रे!"
मैं अपनी कमर का वजन उसकी छुट पर छोटा तो लुंड गिली गरम चुत में घुस्सा चला गया। लुंड के छुट में भूत ही मेरी कमर अपने आप हिलने लगा।
"आह बेटे, खुली आसमान के आला तो बड़ा अच्छा लग रहा है छुडाई करना।"
मैने स्पीड थोड़ा बड़ा दिया। अंधकोश की थाली उसके चुत के आला गंद से तकरा रही थी। मैं लुंड पूरा निकलता और फिर वापस ज़ोर से गुसेद दे रहा था। पिट-पिट पिच-पिच्छ की आवाज आ रही थी। अब मैं थोड़ा रुका और लंबी बिना अपनी एनर्जी को समने लगा। मैने इस्तेमाल पलट दिया और पेट के बल लिता दिया। अंधेरे में ही उसकी चुतड को सहलाने लगा। फिर मैंने अपनी हाथी को दो छुटों के बिच कतर की तरह चलाया तो हाथी उसकी गंद और चुत से रागद रही थी। चाची बोली, "वैसा ना करो, गुडगुड़ी हो रही है।"
अब मैं उसके गड्ढे और चुतदों पर मेंधक की तरह चिपक गया। और अपने लुंड के सुपरडे को उसकी चुत में गुसाने की कोषिश किया तो लुंड उसे गिली चुत में आधा घुस गया। हमें स्थिति में थोड़ा तंग लग रहा था। उतना आराम नहीं लग रहा था।
मैं लुंड निकला और दारी पर गया। लुंड किली बांके कड़ा था। मुख्य समय पर तरुणों से सुसज्जजीत आसमान को देखने लगा। इधर चाची मेरे ऊपर आई और फिर लुंड पकडकर चुत में लगा तो मेरे से रहा नहीं गया और एक झटका मारा। लुंड गिली चुत में किसी बड़ी सुई की तरह घुस गया। अब मैं जोश में आ गया। मैं आला से ज़ोर-ज़ोर से जाने मरने लगा। वो मुझसे चिपक के मेरे ऊपर चलो गई। वो समझ गई की मैं अब कभी भी झड़ सकता हूं।
मैं ज़ोर ज़ोर से चोदने लगा, चोदने लगा। छोडते छोडते एक ज़ोर डर झटका मारा और उसकी चुत में फव्वारा की तरह और विर्या उड़ेलने लगा। वो मेरे ऊपर वैसा ही लिपि रही। जब मेरा लुंड सिकुदकर पास्ट हो गया तो वो मेरे ऊपर से हटकर बगल दारी पर ले गई।
हम वही आगल-बगल लेते रहे।
"अंधेरे में बहुत अच्छा लगा चाची।"
"मुझे भी यहां आंगन में ज्यादा मजा आया।" ऐसा तुम्हारे चाचा ने कभी नहीं किया।”
"कोई बात नहीं, अब आपका भतीजा आपका ध्यान रखेगा।"
उसके बाद हम दून उथे। और दारी समानकर घर के अंदर गए।
वो बिस्तर किनारे बैठी और बोली, “ज़रा लाइट जलाना तो। मेरी साड़ी किधर है।"
मेन मोबाइल टॉर्च जलया। उसे अपनी साड़ी उठ और बिना पेटीकोट के ही अपने लिए बदन में लापेट लिया।
"अब मैं चलती हूं!" वो बोली और मुझे फिर से चुमी दी और मेरे लुंड पर हलकी चपत दी और बोली, "मेरा बदमाश बच्चा!"
वो और वाले कामरे की तरफ गई और अपनी बेटी को लेकर अपने घर चली गई।
मैंने बोतल से पानी पिया और फिर से तौलिया लापेटकर बिस्तर पर जाने दिया। मोबाइल मेई टाइम देखा, 00:20 बज रहे थे।
ये मेरी तिसरी चुदाई थी। पता नहीं कितना देर से और यहां में चाची के साथ चुदाई किया। छुडाई के थकन से मुझे जल्द ही आ गई।अंधेरी में बुवा की सवारी:
चाची के जाने के बाद मैं घरी नंद सो गया था। पेशाब लगाने से मेरी निंद टूटी। मोबाइल मे समय देखा से 03:40 बजे तक। सुबाह होने में एक-सावा घंटा और था। मैं बहार गया और पेशा करके आया। गांव में अटैच्ड बाथरूम नहीं होता है।
वपस बिस्तर पर लेता तो पता नहीं आ रही थी। मैं लुंड सहलाने लगा। फिर से छोडने का मन कर रहा था। चुदाई में जो मजा आता है, उसे जाने के बाद मुंह मारने की इक्षा नहीं हो रही थी। कोई भी छुट हो, बस लुंड उसमेई घुसना चाहिए। 2 बड़ी औरतों ने मुझसे जवान को चुदाई का स्वाद चका दिया था। मुझसे रहा नहीं गया और मैं कमर में तौलिया लापेटकर ताऊ के घर की या चला गया, जहां संध्या बुवा सोया थी।
मैंने दरवाजा ढकेला तो पाया का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था। दरवाजा खोलकर और गया। मोबाइल टॉर्च जलया से पहली रूम में ही बुवा सो रही थी। उसकी साड़ी उसकी जंगों तक खुली थी। उसे सूटी साड़ी बिना पेटीकोट के लापेट रखा था। ब्लोज खोलके सिरहाने राखी हुई थी। एक चुनी आंचल से धनकी थी तो दशरी चुची दिख रही थी।
मैं भी ऊपर कुछ नहीं कहना। सिर्फ तौलिया लाता हुआ था। मैं उसके पास गया और उसके बगल में बैठा। एक बार तो सोचा की इस्तेमाल जग लूं। लेकिन सोचता मैं भी चाची जैसा करता हूं। उसकी जंग और चुची देख लुंड कड़क हो चुका था।
मैं हाथों से उसे साड़ी को कमर तक सरकार और उसकी चुत को मोबाइल टॉर्च से देखने लगा। थोड़ी देर चुत देखने के बाद मैंने तौलिया खोल दिया। उसकी दो जोड़ी को फेलाया और उसकी चुत पर लुंड का सुपाड़ा रखा। वो कोई हरकत नहीं की।
मैंने टॉर्च ऑफ कर दिया और यहां में ही लुंड को चुत में घुसने की कोशिश करने लगा। चुड़ चुड़ कर ढीली हो चुकी बुवा की चुत में लुंड को घुसने में कोई दीकत नहीं हुई। मैं थोड़ी देर उसके ऊपर ही ले कर शांत रहा और हल्के से छोडने लगा। 20-22 ढककों बाद वो हाथ मेरी पिट पर फिराने लगी।
मैं समझ गया की वो जाग गई है।
“बेटे कब से इंतजार कर रही थी तेरा! बहुत डर से ऐसे ही लेते हैं, निंद नहीं आ रही थी।”
"तो आप क्यों नहीं आई?"
"थोड़ी देर पहले आई थी, लेकिन तुम सो रहे थे।"
मैं उसकी चुत ढाका मारे जा रहा था।
“मैं भी थोड़ी देर पहले उठा तो रहा नहीं गया। और आपके पास आ गया।"
मैं और यहां में ही इस्तेमाल करने लगा दूंगा। बहुत डेर तक धीरे धीरे छोटा रहा। उसकी चुत गिली गिली हो चुकी थी। मैं कुछ डर यूज़ उसी पोज़ में मुझे छोडने के बाद उसकी चुत से लुंड निकला। वो बोली, "रुक जा, साड़ी खोलने दे।" और वो साड़ी खोलकर पूरी तरह नंगी हो गई। अंधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था।
मैं फिर से उसे गिली चुत चटने लगा। रेखा बुवा की चुत से बिलकुल अलग गंध और स्ववाद था बुवा की चुत का। रेखा 36 साल की और बुवा 48 साल की थी।
मैं चुत चैट चट्टे घुम गया और अपनी कमर को बुवा के चेहरे के ऊपर रख दिया। वो मांझी हुई खिलाड़ी थी। वो और यहां में ही मेरा लुंड पकडकर मुथियाने लगी। Andkoshon ko sahlane Lagi. और फिर लुंड अपने मैं में लेकर चुनने लगी। मैं आला उसकी चुत चाट जा रहा था। अंगरेजी में 69 कहते हैं, शायद गांव में चुसा-चाटी कहते होंगे का उपयोग करें। नाम में क्या रखा है, उसमे जो मजा मिल रहा था उसका कोई मुकबाला नहीं। हम डोनों ने हमें समय अपनी निंद पूरी कर ली थी। डॉनन फ्रेश द. इसिलिए नई ऊरजा एवं स्पोर्ति के साथ मजा ले रहे थे। सच में, हम और यहां में काली-गोरी, जवान-बुद्धि का फ़र्क नहीं लग रहा था। एक चुत है और एक लुंड। बास!
मैं अब उसके ऊपर से हटा और बिस्तर के आला आया। संध्या बुवा के टंगों को खिंचा और उसकी चुत को बिस्तर के किनारे लाया। फिर से लुंड को उसकी चुत के दरवाजे पर टिककर जोरदार धक्का मारा, थाप्प! लुंड चुट को चिरता हुआ छुट के अंदर किसी नर्म देवर से तकया। क्या ज़ोरदार टकरा से वो बोली, “वाह रे!
मैं उसकी चुत पर लुंड और बहार करता रहा। फिर उसके हाथों को पक्का अपनी या खिंचा और इस्तेमाल बिस्तर के किनारे बैठा दिया। वो मेरे से चिपक गई। मैं आला खड़े होकर उसकी चुत में लुंड पेले जा रहा था।
मैं उसे बोला, "बुवा बहार चलें क्या?"
“बहार कोई देख लेगा। अब सुबा हो रही है।"
"यहाँ तो हम 5 ही हैं।"
"तुम्हारी अमृता ताई जल्दी उठती है बेटा, वो देख लेगी तो!"
"ओह! तब यही करते हैं।"
मैने उसकी चुत में लुंड दलकर ही उसे अपनी गोदी में उठा। उसे अपने हाथ मेरे बगीचे में फँसा दिया था। और हमें स्थिति में खड़े खड़े छोड रहा था। पोर्न फिल्म्स के पोज इधर आजमा रहा था मैं।
भगवान में उठाकर चोदने के बाद मैंने इस्तेमाल किया आला राखा और बिस्तर के किनारे बैठाया। उसे मुझे तटोला और लुंड को पक्का कर लेने लगी। ये मेरी 4थी चुदाई चल रही थी। मुझे लगा की चुत की चुदाई से ज्यादा मजा लुंड की चुसवेई में है। किसी स्त्री से लुंड चुस्वाना उसकी चुत छोडने से ज्यादा मजा आता है।
वो बहुत डर तक लुंड चुस्ति रही और मैं चुसाई का मजा लेता रहा। मैं उसे बालो को सहला रहा था। उसके सर को लुंड में दबा रहा था। कभी कभी लुंड को उसके मुंह के और झटका मार रहा था।
फिर मैंने उसे बोला, "रुकिये बुवा, अब मेरी बारी है।"
"ठीक है बेटे।"
मैंने उसे पक्का और बिस्तर पर लिया दिया। उसका शरिर बिस्तर पर और जोड़ी पलंग के आला। मैंने फिर उसी की टंगों को फेलाया और उसकी झंटों भरी चुत को फिर चाटना शुरू किया। वो धीरे से सीटकर रही थी, "इस्स्स बेटा, औरर जोर से चाटो। छटे रहो रे!" मैं छप्पर्र्र छप्पर्र चते जा रहा था। बुर से निकलती नमकीन रस को हलक से आगे उतर रहा था। मर्दों को जिस तरह लुंड चुस्वाने में ज्यादा बड़ा आता है, शायद औरतों को चुत चटवाने में ज्यादा मजा आता है।
मैं चुत चटना छोडकर फिर से उसकी गिली चुत को छोडने लगा। कुछ डेर वैसा चोदने के बाद मैंने उसे पलट दिया। उसके जोड़ी जमीन पर और शरिर बेड पर पेट के बल लिता दिया था। मैं उसके पीछे आया और अपनी हाइट एडजस्ट करके उसकी चुत को तटोला। उसकी चुत में एक उन्गली गुसया और 8-10 बार और बहार किया। फिर उनगली को अपने मैं लेकर चुनूंगा।
अब अपने लुंड के सुपड़े को उसकी चुत पर टिकाया और धीरे से चुत में सरकार दिया। धीरे धीरे स्पीड बड़ा, गपगप चुदाई करने लगा। हमें पोज़ में मैं चोदने पर लगा की लुंड थोडा टाइट टाइट जा रहा हूं। मिशनरी पोज़ में आराम से अंदर तक जाता है। डॉगी स्टाइल में टाइट लगता है।
मुझे लगा मैं झड़ने वाला हूं तो मैंने हिलना बंद किया और लुंड को चुत से निकला। मैने उसकी गंद के आला बैठक दुबारा उसकी गिली चुत चाटा।
फिर मैं उसे बगल में बिस्तर पर ले गया और उसकी चुचियों को सहलाने लगा। वो भी मेरी छटी को सहलाने लगी। वो उठाकर मेरे बगल में बैठी और और यहां में ही लुंड को सहलाने लगी।
घर के आस-पास के पेड़ों पर चिड़ियों के चाहने की आवाज़ आने लगी थी। संध्या बुवा ने कहा, "सुबह होने वाली है। जल्दी खतम करें!”
“जैसी आपकी मर्जी बुवा। लेकिन मेरा निकल नहीं रहा अब।”
"कोई बात नहीं, मैं कोशिश करता हूं।" बोलकर मेरे लुंड को मुठियाने लगी। थोड़ी देर में उसे मेरे लुंड को मैं में लिया और तेजी से चटने लगी। सुरप्प सुरुपप्प सुरप्प सुरप्प ! वो लुंड चुसे जा रही थी। कुछ डर ज़ोरदार चुनने से मैं झड़ने को होने लगा, "बुवा, मेरा निकलने वाला है।"
बुवा लुंड चुस्ते राही, चुस्ते राही। और अखिर बुवा के सामने मैं हार गया। मैं बुवा के मुंह में ही झड़ गया। वो लुंड चुना जारी राखी। जब लुंड पूरा खली हुआ तब तक छुट्टी रही।
“बड़ा स्वस्थ है रे तेरा गरम लसलासा गढ़ा पानी। जिसको भी छोडेगा तू इस्तेमाल तृप्त कर देगा मेरे शेर बेटे।” बुवा बोली। उसी तारीख से मैं बहुत खुश हुआ।
मैने मोबाइल टॉर्च जलाकर उसे देखा। उसके बाल बुरी तरह बिखरे हुए थे। उसे मेरा पानी पी लिया था। वीर्य की कुछ बुंद मुंह पर चिपके हुए थे। चादर इधर उधर हो गए थे।
वो उठाकर पेटीकोट और साड़ी पहनने लगी। मैने भी तौलिया लपेटा। दरवाजा खोला और बहार देखा। अंगन में कोई नहीं था। सुबा होने लगी थी। पूरब में लाली छाई हुई थी। मैं घर से निकल कर अपने रूम गया और अपना पंत शर्ट पहनकर आंगन में बैठा गया।
मैं बैठे बैठे और यहां में किए गए दोंन चुदाई के बारे में सोचने लगा। की किस्मत ने क्या पलटी खाया। एक दिन में 2 चुत और रात के और यहां फिर से वही 2 छुट छोड़ चुका था।
20 मिनट बाद अमृता ताई और मां बहार निकली। मुझे आंगन में बैठा देख बड़ी मां बोली, "आज तो बहुत जल्दी उठ गया बेटा!"
"कल जल्दी सो गया था, इसिलिए निंद पूरी हो गई थी, इसिलिए जल्दी उठा।"
"बहुत अच्छा बेटा।" माँ बोली, "ऐसे ही जल्दी उठना चाहिए!"
"माँ, आज मैं भी आपके साथ खेत में काम करूंगा।"
"ठीक है बेटा, आज तुम बड़ी मां के साथ जाना। मैं नदी में घर के कपड़े धोऊंगी। बुवा और चाची घर की साफ सफाई करेंगे।”
"अच्छा माँ।"
बड़ी मां बोली, "हम जल्दी जाएंगे, और जल्दी काम खतम करके जल्दी आएंगे।"
मैं हैंड पंप से 4 बार 2-2 बाल्टी पानी लाया और ड्रम में भर दिया। हम दिन मैं नदी नहीं गया।अमृता ताई ने मुझे एक कुल्हाड़ी (axe) और कुदाली (spade) लेके चलने को कहा ।
उसने एक थैली और 2 रस्सियाँ भी लिया । रात का बचा हुआ चावल और सब्जी लिया और लंच बॉक्स में डाला । 2 bottle पानी लिया । हम दोनों सूरज उगने से पहले घर से खेतों की ओर चल दिये ।
वह मेरे आगे चल रही थी और मैं उसके पीछे कंधे पर कुल्हाड़ी और कुदाल लेके चल रहा था । अमृता 50 साल की औरत है और वह मेरे पिता , माँ और संध्या बुआ से बड़ी हैं । साँवली हैं , ऊंचाई 5’1” जैसा है । खेतों में काम करते रहने से उसके शरीर में चर्बी नहीं आई है। यदि अपने घर की औरतों की सुंदरता को सिर्फ रंग रूप में तौला जाये तो सबसे सुंदर रेखा चाची, फिर मेरी माँ बिमला और फिर अमृता ताई और बाद में संध्या बुआ सबसे कम अच्छी लगती हैं । लेकिन उन चारों को पिता जी और ताऊ से चुदते देखा हूँ । चुदाई की कला में कोई किसी से कम नहीं है । पिता जी और राकेश ताऊ के बुआ के गाँव जाने के बाद जिस तरह मुझसे चाची और संध्या बुआ ने चुदवाया और आज मेरे साथ अमृता ताई आई है, मुझे लगा यह सब इन औरतों के प्लान के हिसाब से हो रहा है ।
करीब 20 मिनट में हम दोनों खेत में पहुंचे । उस जगह जंगलों की पहाड़ियों के बीच हमारे करीब 3 एकड़ जमीन हैं । बरसात आने से पहले उन खेतों को तैयार करना पड़ता है । टूटे मेड़ / आड़ की मरम्मत करनी होती है।
अमृता ने अपनी साड़ी को कमर में ऐसा खोंसा कि साड़ी घुटनों तक उठ गयी । और आँचल को कंधे से हटाकर कमर में बांध लिया । उसने कुदाल उठाया और खेत में कुदाई शुरू करती है । उसने भी मुझे उसी तरह करने को कहा । मैंने भी दूसरा कुदाल उठाया और उसके साथ कोड़ना शुरू किया ।
मुझे उस काम की आदत नहीं थी । आधे घंटे में लगा कि मैं थक गया हूँ । माथे से पसीना आने लगा । टी-शर्ट पसीना से भींग गया । ताई भी पसीना से भींग गयी थी लेकिन वह काम किए जा रही थी । वो बोली, “बेटा, अपना कमीज उतार दो , भींग गया है ।“ मैंने टी शर्ट उतार दिया । फिर हम काम करने लगे । काम करने से मुझे भूख लगने लगी । मैंने बोला, “बड़ी माँ, भूख लग रही है। “
उसने बोला, “ठीक है बेटा, थोड़ा आराम कर लो।“ मैं खेत के किनारे एक पेड़ के नीचे छाया में बैठ गया । ताई भी वहीं झाड़ियों से दातुन तोड़कर लाई और मुझे देते हुये बोली, “दातुन कर लो और हाथ मुंह धो लो।“
हम दोनों ने दातुन किया और पास के गड्डे के पानी से हाथ मुंह धोया । उसके बाद ताई ने नास्ते में खाना और सब्जी दिया । वह मेरे सामने बैठी थी । इतना देरी काम करने से पता चल गया कि खेती किसानी का काम आसान नहीं है । खून पसीना जलाना पड़ता है, तब जाके खाने को अनाज, सब्जी, दाल मिलता है । खाते खाते मैं उसे ध्यान से देख रहा था ।
उसने जब मुझे अपनी ओर इस तरह देखते हुये देखा तो पूछा, “ऐसे क्या देख रहा है बेटे ?”
“क ... कुछ नहीं बड़ी माँ !”
“कुछ तो बात है !”
“मैं देख रहा था कि आप कितनी अच्छी हैं, सुंदर हैं !”
“क्या बेटा, बड़ी माँ से ऐसा मज़ाक करते हैं क्या ?”
“नहीं बड़ी माँ, आप सचमुच की बहुत अच्छी लगती हैं।“
“अरे मैं तो बूढ़ी हो गयी हूँ, तेरी माँ से भी बड़ी हूँ।“
“नहीं, आप कहाँ बूढ़ी हैं! आप तो अभी भी 30 साल की भाभियों जैसी लगती हैं।“
मैं बड़ी माँ की उभरी हुयी छाती देख रहा था । उसकी ब्लाउज पसीने से भींगकर चूचियों से चिपक गयी थी । उसका ब्लाउज कांख के पास गीला हो गया था। खाना खाकर हम दोनों फिर से खेत में काम किए । कुछ देर बाद ताई बोली, “बेटा, आज के लिए इतना ही करते हैं । धूप चढ़ गया है ।“
हम दोनों फिर छाया में आए और अपना पसीना पोंछे । थोड़ी देर छाया में बैठने के बाद हमने पानी पीया । फिर पास के पानी से हाथ पैर, चेहरा धोया । बड़ी माँ ने कुल्हाड़ी पकड़ा और कहा, “चलो थोड़ा जंगल तरफ लकड़ी और पत्ते तोड़ लाते हैं । “
मैं बोला, “चलिये।“ और हम दोनों जंगल की ओर चल दिये। हम जंगल में आधा किमी जैसा अंदर गए । एक जगह उसने सुखी लकड़ियाँ इकट्ठा किया और कुछ पत्ते तोड़ा । मैंने उसे पत्तियाँ तोड़ने में मदद क्या । उसने लकड़ी की गट्ठरी बांधी । उसके बाद वह एक पेड़ की छाया में बैठ गयी ।
“बेटा, थोड़ा बैठ कर आराम कर ले।“
मैं उसके पास गया । प्यास फिर से लगने लगी थी । मेरे मन में उसे भी चोदने की इक्षा आ रही थी । शायद अमृता ताई भी चुदना चाहती हो । मैं सोच रहा था कि इसको मैं उसी झरने में चोदूंगा जहां ये लोग पिता जी और ताऊ के चुदाई करते हैं ।
मैंने बोला, “बड़ी माँ मुझे तो प्यास लगी है और नहाने का मन है । झरना पास चलें क्या ?”
वह बोली, “प्यास तो मुझे भी लगी है, और नहाने का तो मुझे भी मन है। लेकिन मैं तो दूसरी साड़ी नहीं लाई । साबुन भी तो नहीं लाया तुम ?”
मैंने कहा, “साबुन तो लाया हूँ । ये देखिये।“ मैंने उसे निक्कर के पॉकेट से साबुन निकालकर दिखाया।“
“चलो एक और छोटा झरना दिखाती हूँ इस जंगल में । वहीं हम पानी पी लेंगे और तुम वहीं नहा लेना।“
लकड़ी की गठरी को वहीं छोड़कर वह उठी और उस जगह से नीचे पहाड़ियों के बीच की घाटी में कुछ घनी हरी झाड़ियों की तरफ चल दी । मैं भी उसके पीछे चल दिया ।
अमृता ताई ने मुझे एक कुल्हाड़ी (axe) और कुदाली (spade) लेके चलने को कहा ।
उसने एक थैली और 2 रस्सियाँ भी लिया । रात का बचा हुआ चावल और सब्जी लिया और लंच बॉक्स में डाला । 2 bottle पानी लिया । हम दोनों सूरज उगने से पहले घर से खेतों की ओर चल दिये ।
वह मेरे आगे चल रही थी और मैं उसके पीछे कंधे पर कुल्हाड़ी और कुदाल लेके चल रहा था । अमृता 50 साल की औरत है और वह मेरे पिता , माँ और संध्या बुआ से बड़ी हैं । साँवली हैं , ऊंचाई 5’1” जैसा है । खेतों में काम करते रहने से उसके शरीर में चर्बी नहीं आई है। यदि अपने घर की औरतों की सुंदरता को सिर्फ रंग रूप में तौला जाये तो सबसे सुंदर रेखा चाची, फिर मेरी माँ बिमला और फिर अमृता ताई और बाद में संध्या बुआ सबसे कम अच्छी लगती हैं । लेकिन उन चारों को पिता जी और ताऊ से चुदते देखा हूँ । चुदाई की कला में कोई किसी से कम नहीं है । पिता जी और राकेश ताऊ के बुआ के गाँव जाने के बाद जिस तरह मुझसे चाची और संध्या बुआ ने चुदवाया और आज मेरे साथ अमृता ताई आई है, मुझे लगा यह सब इन औरतों के प्लान के हिसाब से हो रहा है ।
करीब 20 मिनट में हम दोनों खेत में पहुंचे । उस जगह जंगलों की पहाड़ियों के बीच हमारे करीब 3 एकड़ जमीन हैं । बरसात आने से पहले उन खेतों को तैयार करना पड़ता है । टूटे मेड़ / आड़ की मरम्मत करनी होती है।
अमृता ने अपनी साड़ी को कमर में ऐसा खोंसा कि साड़ी घुटनों तक उठ गयी । और आँचल को कंधे से हटाकर कमर में बांध लिया । उसने कुदाल उठाया और खेत में कुदाई शुरू करती है । उसने भी मुझे उसी तरह करने को कहा । मैंने भी दूसरा कुदाल उठाया और उसके साथ कोड़ना शुरू किया ।
मुझे उस काम की आदत नहीं थी । आधे घंटे में लगा कि मैं थक गया हूँ । माथे से पसीना आने लगा । टी-शर्ट पसीना से भींग गया । ताई भी पसीना से भींग गयी थी लेकिन वह काम किए जा रही थी । वो बोली, “बेटा, अपना कमीज उतार दो , भींग गया है ।“ मैंने टी शर्ट उतार दिया । फिर हम काम करने लगे । काम करने से मुझे भूख लगने लगी । मैंने बोला, “बड़ी माँ, भूख लग रही है। “
उसने बोला, “ठीक है बेटा, थोड़ा आराम कर लो।“ मैं खेत के किनारे एक पेड़ के नीचे छाया में बैठ गया । ताई भी वहीं झाड़ियों से दातुन तोड़कर लाई और मुझे देते हुये बोली, “दातुन कर लो और हाथ मुंह धो लो।“
हम दोनों ने दातुन किया और पास के गड्डे के पानी से हाथ मुंह धोया । उसके बाद ताई ने नास्ते में खाना और सब्जी दिया । वह मेरे सामने बैठी थी । इतना देरी काम करने से पता चल गया कि खेती किसानी का काम आसान नहीं है । खून पसीना जलाना पड़ता है, तब जाके खाने को अनाज, सब्जी, दाल मिलता है । खाते खाते मैं उसे ध्यान से देख रहा था ।
उसने जब मुझे अपनी ओर इस तरह देखते हुये देखा तो पूछा, “ऐसे क्या देख रहा है बेटे ?”
“क ... कुछ नहीं बड़ी माँ !”
“कुछ तो बात है !”
“मैं देख रहा था कि आप कितनी अच्छी हैं, सुंदर हैं !”
“क्या बेटा, बड़ी माँ से ऐसा मज़ाक करते हैं क्या ?”
“नहीं बड़ी माँ, आप सचमुच की बहुत अच्छी लगती हैं।“
“अरे मैं तो बूढ़ी हो गयी हूँ, तेरी माँ से भी बड़ी हूँ।“
“नहीं, आप कहाँ बूढ़ी हैं! आप तो अभी भी 30 साल की भाभियों जैसी लगती हैं।“
मैं बड़ी माँ की उभरी हुयी छाती देख रहा था । उसकी ब्लाउज पसीने से भींगकर चूचियों से चिपक गयी थी । उसका ब्लाउज कांख के पास गीला हो गया था। खाना खाकर हम दोनों फिर से खेत में काम किए । कुछ देर बाद ताई बोली, “बेटा, आज के लिए इतना ही करते हैं । धूप चढ़ गया है ।“
हम दोनों फिर छाया में आए और अपना पसीना पोंछे । थोड़ी देर छाया में बैठने के बाद हमने पानी पीया । फिर पास के पानी से हाथ पैर, चेहरा धोया । बड़ी माँ ने कुल्हाड़ी पकड़ा और कहा, “चलो थोड़ा जंगल तरफ लकड़ी और पत्ते तोड़ लाते हैं । “
मैं बोला, “चलिये।“ और हम दोनों जंगल की ओर चल दिये। हम जंगल में आधा किमी जैसा अंदर गए । एक जगह उसने सुखी लकड़ियाँ इकट्ठा किया और कुछ पत्ते तोड़ा । मैंने उसे पत्तियाँ तोड़ने में मदद क्या । उसने लकड़ी की गट्ठरी बांधी । उसके बाद वह एक पेड़ की छाया में बैठ गयी ।
“बेटा, थोड़ा बैठ कर आराम कर ले।“
मैं उसके पास गया । प्यास फिर से लगने लगी थी । मेरे मन में उसे भी चोदने की इक्षा आ रही थी । शायद अमृता ताई भी चुदना चाहती हो । मैं सोच रहा था कि इसको मैं उसी झरने में चोदूंगा जहां ये लोग पिता जी और ताऊ के चुदाई करते हैं ।
मैंने बोला, “बड़ी माँ मुझे तो प्यास लगी है और नहाने का मन है । झरना पास चलें क्या ?”
वह बोली, “प्यास तो मुझे भी लगी है, और नहाने का तो मुझे भी मन है। लेकिन मैं तो दूसरी साड़ी नहीं लाई । साबुन भी तो नहीं लाया तुम ?”
मैंने कहा, “साबुन तो लाया हूँ । ये देखिये।“ मैंने उसे निक्कर के पॉकेट से साबुन निकालकर दिखाया।“
“चलो एक और छोटा झरना दिखाती हूँ इस जंगल में । वहीं हम पानी पी लेंगे और तुम वहीं नहा लेना।“
लकड़ी की गठरी को वहीं छोड़कर वह उठी और उस जगह से नीचे पहाड़ियों के बीच की घाटी में कुछ घनी हरी झाड़ियों की तरफ चल दी । मैं भी उसके पीछे चल दिया ।
अमृता ताई की पहली चुदाई:
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कुछ दूर जाकर घनी झड़ियां के बिच एक जग पर 10-12 फीट चौडा गद्दा में पानी मिला। मैने कहा, “ये जग तो पहले नहीं देखा। कितना घर होगा?”
“तुम्हारी छत्ती तक घर होगा। यहां भी हमें पानी रहता है।" बड़ी माँ बोली।
हमें गद्दे का पानी बहुत साफ था। मैंने एक पौधे का बड़ा पत्ता लिया और उसकी मदद से पानी पिया। अमृता ताई ने भी पानी पिया।
फिर हम डोनों उसके किनारे के पत्थर पर बैठे गए।
मैं बोला, "बहुत अच्छी जगा है तो। गरमी में भी थंडी-ठंडी लग रही है। मन कर रहा है यही पानी में घुस जहां!"
"नाहा लो, आराम लगेगा।"
"आप नहीं कुछ नहीं?"
"नह लेटी लेकिन मैं कपड़ा नहीं लाई।" वो बोली।
"लेकिन आपके सामने कैसे नहीं?"
"क्यों? मुझसे क्या शरमाना?"
मैंने कमर में तौलिया लापेटा और अपना निकर खोल दिया। उसे धोया और पास के झड़ी पर सुखने के लिए फेलाया दिया। मैं पानी में घुसा और दुबकी लगाके बहार निकला और अपने बदन पर सबुन लगा। अपने हाथ जोड़ी रागदने लगा। मैंने अमृता ताई की या देखा, तो वह मुझे निहार रही थी। मैने पुछा, "ऐसी क्या देख रही है?"
“कुछ नहीं रे! बहुत दिनों बाद तुम ऐसे देख रही हूं। देखते-देखते कितना सुंदर-सा जवान हो गया है तू!”
वो मेरे पास आई और बोली, "लाओ तुमेन पीठ पर सबुन लगा देती हूं।"
वो मेरे पीछे बैठ गई और मेरी पीठ पर सबुन लगाने लगी। नारी के स्पर्श से मेरी हलत खराब होने लगी। ना चाहते हुए भी मेरा लुंड अपने खड़ा होने लगा। वो मेरे पीठ और हाथ पर सबुन लगाती रही और बाद में पानी से धो दिया।
मुझसे रहा नहीं जा रहा था। मैने कहा, "बहुत अच्छा लग रहा है। आप भी नहीं लिजिये।” कहकर मैंने उसके शरिर पर पानी छिदक दिया।
"बदमाश!" कहकर उसने मेरे शरिर पर पानी छिदक दिया। जवाब में मैंने उसे 3-4 बार और पानी छिपाक दिया। वो खिलखिलाकर हांसी, "हाय हाय हाय, भिंग जाहुंगी रे!" मैं उसे और छुपाने लगा। उसे उसकी साड़ी भिंग गई थी।
मैं, “नाहा लिजिये, ठंडा पानी है। गरमी में राहत मिलेगी।”
अमृता - "ठीक बोले हो। ऐसे भी तुमने मुझे पूरा भींगा दिया। अब नहा ही लेते हैं।"
उसे अपनी साड़ी उतरा और पानी से धोकर वही झाड़ियों में सुखा दिया। वो पानी में घुस गई। जब वो बहार निकली तो उसका पेटीकोट उसकी जांघों से चिपक गया था। मस्त लग रही थी। उसे अपना ब्लौज भी खोला और पेटीकोट को अपनी चुचियों के ऊपर बंद लिया और पानी किनरे अपने बजाओं और जोड़ी पर सबुन लगा लगी। मैं भी उनके पास गया और कहा, "लए मैं भी आपकी पीठ पर सबुन लगा दूं।" उसे सबन देते हुए कहा, "ये लो सबुन।"
मैं उसके पीछे बैठा और उसे पीठ पर सबुन लगाऊंगा। लेकिन पेटीकोट के करन पूरी पीठ पर सबुन नहीं लगा पा रहा था। उसकी सांवली भिंगी शरिर देखके मेरा लुंड और कठौर होने लगा। मैंने जानबुझकर उसकी पीठ पर लुंड को सात दिया। वाह मुसकुरयी। बोली, “बहुत बदमाश हो गया रे तू! तुम्हारा चुहा तो बहार अच्छाने को मचा रहा है।”
"क्या?"
वो तौलिया की तरफ इशारा करते बोली, "इसकी बात कर रही रे।"
मुझे पता था की अमृता ताई भी छुडाई में एक नंबर औरत है। मैंने कहा, "आपको देखना ही तो मचा रहा है। पर क्या करूँ, आप बड़ी माँ हैं!”
“बड़ी माँ है तो क्या हुआ? मैं अच्छी नहीं लगती क्या?”
"बहुत अच्छी लगती है।"
"मुझे भी तुम बहुत प्यारे लगते हो।"
"तो क्या मैं आपको यहां प्यार कर सकता हूं?"
"कर लो, जो तुम्हारी मर्जी। मैं भी तुम्हें प्यार करना चाहता हूं। एक औरत की तरह!"
उसके बाद वो पानी में गई। उसे अपनी बहन फेलते हुए कहा, "आ जा, मेरे पास!"
मैं भी पानी में उतरा और उसके पास गया। वो मुझसे लिपट गई और मेरे माथे पर चुम्बन दी और बोली, "मेरा राजा बेटा।" उसे मुझे आंखें, गैलन पर चुमा। फिर मुंह में भी चुमा। मैंने भी इस्तेमाल पर चुमा, "आप तो जवान लग रही हैं।"
मैंने भी उसे जकाद लिया। मेरी छटी पेटीकोट के ऊपर ही उसकी चुचियों से छू रही थी। मैं उसके होठों को चुस रहा था।
उसे मेरा तौलिया खिंचकर निकला और किनरे की या फेंक दिया। मैंने भी इसी छत्ती पर बंध सया खोल दिया। उसने ऊपर तार से निकला और किनारे की तरफ फेंक दिया का इस्तेमाल किया। वो अब पूरी तरह नंगी थी। चुचियों के आला का हिसा पानी में दुबा हुआ था। मैंने भी अपनी चड्डी निकलकर किनारे की या फेंक दिया।
हम डोनों पानी में नांगे एक दसरे के सामने खड़े थे। पानी में भींगा अमृता का शरिर बहुत ही अच्छा लग रहा था। मैं उसकी चुचियों को सहलाने लगा। उसे मेरा लुंड पानी के अंदर ही पकड लिया और मुथियाने लगी।
पानी में थोड़ी देर रहने के बाद हम दों बहार निकले। हमें गद्दे के किनारे ही एक पत्थर पर उपयोग बैठाया और उसकी टंगेन फेल दिया दिया। उसकी चुत मेरे सामने थी। अमृता की चुत को पहले दूर से देखा था, अब मैं नजर से ध्यान से देख रहा था। अमृता की चुत के पास भी झटका लगे। संध्या बुवा की छुट से ज्यादा सुंदर लग रही थी। झंठों के बीच में एक लाल-गुलाबी सुरंग दिख रही थी। मैंने उनगली से छुके देखा का इस्तेमाल किया। फिर अपना जीभ उसे लगा दिया। और हल्के-हल्के चैटने लगा। उसकी छुट से रेखा चाची और संध्या बुवा जैसी गंध नहीं आ रही थी। क्यों हम दोंनों ने अभी अभी नाहया था।
मैने चुत को छट्टा रहा। 3-4 मिनट में लगा की उसकी चुत से रस निकलने लगा है जो थोड़ा नमकीन लग रहा है। उस्का स्वाद बिलकुल अलग लगा। मुख्य चट्टा रहा। वो पिचे चलो गई और अपने जोड़े को जीता फेल शक्ति थी, फेल दिया दिया। बोली, “वाह बेटा, इतना अच्छा छट्टा है रे! कहन सिखा?"
“आज कल ऐसी फिल्म बहुत बनती है। उनको देख के सिख।”
बहुत डेर चटवाने का आनंद लेने का बाद उसे मुझसे हटा। मैं भी वहीं बगल में पत्थर पर बैठा गया। वो उठी और मेरे बगल में बैठी। वो लुंड को हाथ में लेकर सहलाने लगी। वो फिर लुंड पर झुकी, सुपड़े को चुमी और फिर धीरे से लुंड को मैं में ले ली और चुनने लगी। सचमुच लुंड चुस्वाने का मजा ही अलग था। चुस्ते चुस्ते वो बोली, "कितना प्यारा लुंड है रे तेरा!"
वो फिर लुंड चुन में लग गई। चाची और बुवा की तरह अमृता ताई भी आराम से चुस रही थी।
हमें गद्दे के पास ही एक जग एक पेड़ की छाया में थोड़ी हरि घास थी। मैंने ताई का पेटीकोट और अपना तौलिया पानी में दुबया और निचोड़ा। हमें भींगे पेटीकोट और तौलिया को हम हरि घास के ऊपर बिछा दिया। हम डोनों हम तौलिये पर बैठे गए। मैंने उसे धीरे से आगे बढ़ा दिया। मैं उसके ऊपर उससे लिपट गया और उसकी चुचियों को सहलाने लगा। उसके निपल्स को बारी-बारी से चुनने लगा। वो भी मेरी छटी को सहलाने लगी। चुनचियों को चुसना छोड मैं आला जीभ फिरते हुए लाया और उसकी नाभी में गुडगुदाने लगा। अमृता हांसी, "हाय हाय हाय हाय हाय हाय!"
उसे अपने जोड़े को घुटनो पर मोड दिया और फेला दिया। उसे उसकी चुत और खुल गई। मैंने फिर से उसकी चुत को ध्यान से देखा और कहा, "कितना खोबसूरत लग रहा है आपकी चुत तो बड़ी मां!" मैं फिर से उसकी चुत में जीभ दलाल चुसई का आना लेने लगा। अब उसकी चुत से पानी निकलने लगी थी। कुछ डर में मैं ज़ोर से चटने लगा। वो मेरे सर को छुट की या दबने लगी। कुछ डर बाद बोली, “बहुत अच्छा लग रहा है। अब दाल दो रे अपना लुंड!"
मैंने चुत चटना बंद किया और उसके ऊपर चलो गया। ताई ने मेरा लुंड पकाड़ा और अपनी गिली चुत के दरवाजे पर लगा। मैंने धीरे से कमर का वजन लुंड पर दिया तो लुंड अमृता की ढीली और गिली चुत में बड़े आराम से सरकता हुआ जड़ तक समा गया। मैंने उसे जोर से भीनचलिया और चुपचाप उसके शरिर से चिपका रहा। उसकी चुत की गरमी का अहसास लुंड के सुपड़े पर लेने लगा। अदभुत लग रहा था। जंगल में चिड़ियाओं की चाहत के बिच मैं अपनी ताई के चुत में लुंड घुसा हुआ था। 2 दिन में मेरा लुंड 3श्री चुत में घुस चुका था।
कुछ डर में ताई आला से अपनी छुट उचलना शुरू कर दी। उसके जवाब में मैं भी लुंड को चुत में ढाका मरना शूरु कर दिया। लुंड बड़े आराम से उसकी चुत में और बहार हो रहा था। उसकी चुत में मेरे लुंड के अंदर बाहर होने से पिचत्त - पिचत्त - पिच की आवाज आ रही थी। मैने कुछ डेर उसी तरह छोटा रहा।
फिर थोड़ा थाकावत सा लगा तो मैंने लुंड निकला। और फिर चुदाई से गिली चिप-चिपी हुई चुत को फिर से चाटने लगा। उसके बाद मैं उसके बगल में गया। मेरा लुंड ऊपर किसी लकड़ी की तरह कड़क होके तना हुआ था। अमृता ताई उठी और मेरे ऊपर आ गई और लुंड को छुट की छेद में लगाकर बैठ गई। मेरे हाथ उसके चुचियों की या अपने आप बढ़ गए और मैं उसकी चुचियों से खेलने लगा। नहने के बाद चुदाई करने का आनंद कुछ अलग ही होता है। दूनों के शरिर साफ सुत्रे। इसिलिए चुत चैटने में भी ज्यादा अच्छा लगा। जंगल में छुडाई का मज़ा कुछ अलग ही होता है। शायद इसिलिए पिता जी, ताऊ, मां, बुवा, ताई सब झरने के पास चुदाई करते हैं।
वो मुझे वैसे ही धीरे धीरे छोटी रही। फिर वो उठी और उसे अपनी चुत के सफेद रस से सना हुआ लुंड को मैं लेकर मस्त और में चुन लगी। लुंड को चुस-चुस कर साफ करने के बाद वो उठी और मुझे भी खिनचकर उठाई। हम डोनों उसी बगल के पेड़ के तने के पास गए। अमृता तने के सहे खादी हो गई। मैं फिर उससे लिपट गया और हम एक दसरे को किस करने लगे। उसी बिच मैंने उसे एक जोड़ी को अपनी कमर में उथया और अपना लुंड उसकी चुत की छेद में लगाकर फिर से चुत में थेला तो लुंड उसे चुत में सरक गया। उसी स्टैंडिंग पोज में मैं मेन यूज थोड़ी देर चोड़ा। अस पोज़ में मैं उतना आरामदायक नहीं लगा।
फिर मैं वही एक पत्थर पर बैठा गया। अमृता फिर से लुंड को चुत के छेद में लगाकर मेरी गोदी में बैठा और कमर ऊपर करने लगी। इज़ पोज़ में भी बड़ा माजा आ रहा था। लुंड जद तक चुत में घुस जाता है और चुचियों और छटी एकदम सत जाते हैं। हम उसी पोज में मैं चुदाई करने लगे। चुदाई में इतने मशगुल हो गए की गरमी का पता ही नहीं चल रहा था।
फिर वाह मेरी भगवान से उठा। और हाथ पकडकर वापस घास के ऊपर बेचे पेटीकोट पर लेकर आई। अब वो आला पेट के बाल देर से गई और अपनी सांवली चिकनी गंद ऊपर उठा दी। मैं उसके पीछे आया और उसकी चुत में कुत्ते की शैली में लुंड दलकर छोडने लगा। डॉगी स्टाइल में लुंड थोडा टाइट लग रहा था। ऐसा लगा की तराह तो जल्दी झड़ जाउंगा है। इसिलिए मैंने लुंड निकलकर लौटा उसे पीठ के बाल लिथा दिया।
उसे बोला, “बहुत डर से छोड रहे हो बेटा। अब थोड़ा ज़ोर से रागद डालो।”
मैं बोला, "ठीक है ताई!"
मैने बार एक ढकके के साथ लुंड को उसकी चुत में पेला है। वो बोली, "आह रे! ऐसे ही झटके मारो अब!" मैं ज़ोर ज़ोर से लुंड को चुत में और-बहार करने लगा। अंधकोश की तेली अमृता की जंग पर तकरा रही थी और थप्प-थप्पप की आवाज आ रही थी। मैं लगतार ढकके मारे जा रहा था। उस थंडी-ठंडी जगह पर भी पास आने लगा। कुछ डर ढाके मारने के बाद अचानक ऐसा लगा जैसा लुंड में किसी ज्वालामुखी की तरह उबल आने लगा है। कमर हिलने की गति अपने आप तेज होती गई। और अंत: एक ज़ोरदार ढकके के साथ लुंड को चुत में जद तक घुसया और चुत के अंदर फौवारा उड़ने लगा। और ताई ऊपर ही अतीत हुआ चिपक गया।
कुछ डर खराब उसे मुझे चुमा और कहा, "वाह रे बेटा, बहुत सुख दिया रे!"
मैं, "ताऊ नहीं देते क्या ऐसा माजा?"
"उनसे भी छुडाई होती है रे। लेकिन तुम तो जवान हो। तुम्हारी बात अलग है।"
"तो और मिलेगा या नहीं!"
"मिलेगा, जरूर मिलेगा!"
मैने उसे उठा और उसका हाथ पकाकर उसे वापस पानी में लेकर गया। हम दोंनों ने दुबारा नाहया। उसे अपना पेटीकोट और मेरा तौलिया और चड्डी धोया और वहीं सुखाने के लिए फेला दिया।
हमारे कपड़े नहीं सुखे थे। पेटीकोट से मोटा कपड़ा होता है। सुखने में टाइम लगता है। चुदाई के चक्कर में पता ही नहीं चला की कितना समय लगा। हम दोंन वैसे ही नंगे बैठे रहे। बातें करते रहे। मन तो कर रहा था की और छोड लूं। लेकिन बबलू ने आज 2 बजे बुलाया था। उसके लिए तकत बचना था।
आधा घंटा में पेटीकोट भी पहनने लायक सुख गया था। हम डोनों ने अपने कपड़े पहनने और हमें जगा से बहार निकले। लीजिए कर छोड गए लकड़ी और पट्टों को उठा और घर की या चल दिए।
मैं ये नहीं कह सकता की चाची, बुवा और बड़ी मां में से किसको छोडने में ज्यादा मजा आया। लुंड जब चुत में भूत है, और सामने से पूरी तरह सहयोग मिला है तो सब के साथ एक ही जैसा मजा आता है। अंत एक ही है - लुंड से वीर्य निकालना। थोड़ा महल का फ़र्क होता है। जैसे जंगल में चोदने या खुले आसमान के आला चोदने में ज्यादा मजा आता है।
हम डोनों खेत के पास से टिफिन बॉक्स और बार्टन लिया और घर की या चल दिए। वो आगे चल रही थी। मैंने पुछा, "बड़ी मां, क्या हमने किया वो ठीक हुआ?"
"क्या?"
"वाही जो जंगल में किया।"
“मुझे तो बहुत मजा आया। तुम्हें मजा नहीं आया क्या?”
"मुझे भी बहुत मजा आया।"
"बेटा, मुझे मजा आया। तुमन माजा आया। क्यों सोचते हो? मुझसे तो तुमसे और चुदाई करना है। आज रात को हम दों चुदाई करेंगे।"
"लेकिन ताऊ और पिता जी को पता चला तो?"
“कुछ नहीं होगा रे। और मुझे अकेले में ताई नहीं बोलो। नाम से बोलो। दसरों के सामने ही ताई या बड़ी मां बोलोगे।"
"ठीक है अमृता।" कहकर मैंने उसके चुतड़ पर हाथ से हलका थप्पड़ मार दिया।
हम चलते रहे। मैंने पुछा, "ताऊ एक दिन बता रहे थे, कि उसे आप के साथ शादी से पहले बहुत मजा किया था।"
"हां रे, शादी से पहले 2 साल तक हर सप्ताह वो मेरे गांव 1-2 बार आते थे रात को।"
"अचा। ताऊ तो भी बोल रहे थे की वो जवानी में बहुत मजे लिए।”
“हां रे, तुम्हारे बड़े बाबा बहुत बड़े रसिया जवानी के दिन। वो तो गांव और आस पास की बहुत सी औरतों को छोडे द।"
"मुझे भी सिखा दिजिये उनके जैसा रसिया बने।"
"सिखा डूंगी, लेकिन मुझे भूल तो नहीं जाएगा।"
"आपको नहीं बुलुगा।"
ऐसे ही बात करते करते हम घर पांच गए। दोपहर हो चुकी थी।
घर आंगन आज साफ लग रहे थे। हम सब ने दोपहर का खाना खाया। और मैं घर के पिचे के पेड़ के आला खटिया लेके पदाई करने लगा।
बबलू और भाभी
****
मुझे याद था की गांव के एक भाई बबलू ने आज 2 बजे गांव से थोड़ा दूर नदी तारफ एक पीपल पेड़ के आला मिलने को बोला था। करीब 2:15 बजे को मैं एक बोतल पानी लिया और हमें पीपल पेड़ की तरफ चला गया। वो जग हमारे घर से 1.5 किमी दूर है। उधार भी कम लोग जाते हैं।
जब मैं पीपल पेड़ के पास पांच तो वहां कोई नहीं था। मैं वही पेड की छांव में बैठक करता हूं। 10-15 मिनट में बबलू आया।
“क्या तुम सचमुच आ गया। मुझे लगा तुम नहीं आओगे।"
“भाई तुमने बोला था इसिलिए आ गया। लेकिन चक्कर क्या है भाई?”
"क्यों तुम्हें चुदाई नहीं करना है क्या?"
"कर्ण तो है, किसको?"
“इंतेज़ार करो। आ जाएगी।"
"मुझे तो चुदाई करने नहीं आता है।"
“मैं हूं ना। मेरी भाभी आएगी, तुम डरना मत!”
थोड़ी देर में उसकी भाभी भी वहां आई।
वो बोली, “क्या राहुल, कब आया रे! तुम तो सहर जेक हीरो बन गया!”
मैं बोला, "6-7 दिन हो रहा भाभी। और मैं कहां हीरो बन गया? हीरो जैसा तो बबलू भैया लगता है।”
"हां रे, बबलू तो बड़ा मस्त लौंडा है।"
"आप भी तो बड़ी सुंदर हैं।"
वो मुसकुराई।
बबलू शायद मेरे से 1-2 साल बड़ा होगा। उसके भैया उससे 2 साल बड़े हैं। बबलू की भाभी 20-21 साल की होगी। 2 साल पहले ही शादी हुई। बच्चे नहीं हैं भाभी के पास।
बबलू एक हत्था कथा छोकरा है। भाभी भी एकदम तंच माल लगती हैं। कोई मेकअप नहीं। ब्लू रंग की प्रिंटेड साड़ी पहानी हुई थी। बिना मेकअप के भी बहुत खूबसूरत लग रही थी। मुस्कानाती हैं तो किसी सफेद फूल की तरह दांत चमकते द।
हम लोग वहां थोड़ी देर बात की। गरमी लग रही थी। बबलू बोला, "भाभी चलें?"
"चलो, राहुल तुम भी चलो हमारे साथ।"
"कहान?"
"चलो तो, अच्छी जग दिखाएंगे।"
बबलू आगे चला, उसके पीछे भाभी और मैं भी उनके पीछे हो लिया। हम लोग वहां से कुछ दूर नदी किनारे घनी झाडिय़ों में घुस गए। उन झड़ियों के बिच एक गद्दा था और उसके चारोन या छैदार पेड। उसमे पानी नहीं था। हरि घर उगी हुई थी।
बबलू ने वहा अपना गमचा बिचा दिया। वो जग सब तार से सुरक्षित था। कोई नहीं देख सकता है।बबलू उस गमछा पर बैठा गया। उसकी भाभी भी जकार वही बैठ गई। मैं दूर खड़ा था। भाभी बोली, "आ जाओ तुम भी। कितना शर्मता है!”
मैं बोला, "भाभी, मुझे कुछ नहीं आता। पहले मैं से देखूंगा।” कहकर वही आराम से बैठा गया।
बबलू बोला, “ठीक है भाई। तुम पहले देखो, चुदाई कैसे की जाती है।"
बबलू ने भाभी को अपने पास खिंचा। और भाभी को आला लिता दिया। बबलू लुंगी के अंदर निकर कहने था। बबलू ने भाभी का साड़ी कमर से ऊपर तक सरकार। फिर अपना लुंगी खोला और निकर उतर दिया।
उसका कड़क लुंड मेरे लुंड उतना ही बड़ा लगा। उसे नंगा देख भाभी बोली, "आज, छोड दाल अपनी भाभी को!" भाभी ने अपना जोड़ी घुटनो में मोडकर फेला दिया।
बबलू भाभी की टंगों के बीच बैठा गया। मैं भी उठाकर उनके पास चला गया, तकी छुडाई सही तारिके से देख सकता हूं।
भाभी के चुत में भी बा लुगे हुए थे। गांव की औरतेन झंकार साफ नहीं करता है। उसकी टंगेन चिकनी लग रही। भाभी की चुत देखने मेरा लुंड भी अपने आप खड़ा हो गया।
बबलू ने अपना लुंड भाभी की छुट के दरवाजे पर लगा और एक हलका सा धक्का मारा। लुंड ढलान के अंदर आधा घुस चुका था। बबलू ने और ढाका मारा। लुंड पुरा घुस चुका था। उसे बोला, "देखो, कैसे चुत में घुस गया लुंड मेरा।"
उसे कमर हिलाना शुरू किया और कहा, "अब ऐसे कमर उम्र पिचे करना होता है।"
वो कमर हिलाता रहा और भाभी से पुछा, "भाभी, माजा आ रहा है ना!"
भाभी बोली, "हां रे! बस ऐसे ही छोड़!”
वो हिलता रहा। उसे भाभी का ब्लाउज नहीं खोला था। कोई चुम्मा चती नहीं। डायरेक्ट चुट पर अक्रमण कर छोड रहा था। मैं उसके लुंड को भाभी की चुत में और बहार होते देख रहा था। 3-4 मिनट में उसे छोडने की बाद बढ़ा दिया। गचगच चोदने लगा। और फिर बबलू भैया बोले, "भाभी मैं आया!" और फिर एक ज़ोरदार झटका मार्कर भाभी की चुत में झड़ गए।
और वो भाभी के तांग के बिच से निकल गए।
बबलू बोला, "क्यों राहुल, देखा कैसा छोटे हैं!"
मैं बोला, "हा भैया, बहुत मजा आया देखने में।"
बबलू, “तू भी छोले भाभी को। बड़ी मस्त माल है। छोडने में बहुत मजा आता है।"
भाभी बोली, "तू तो तुम्हारे भैया से भी ज्यादा माजा देता है रे।"
भाभी जी वहन से उठी अपना साड़ी ठीक की और वही थोड़ा दूर जेक मूट के आई। और चादर में बैठ गई।
जवान भाभी की चुडाई:
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बबलू बोला, “राहुल, देख लिया ना? चल छोड ले भाभी को तू भी! बड़ा माजा आता है चोदने में।”
मुख्य, “मुझे तो नहीं आता है। मैं कोषिश कर्ता हुं। भाभी आप सिख दिजिये।”
भाभी अब भी साड़ी में थी। बबलू ने साड़ी को ऊपर सरकार छोड़ा था। बबलू अपने सिकुड़े लुंड के साथ वही एक पत्थर में बैठा गया।
"आपकी सहमति है ना भाभी?" मैने पुछा।
“हां रे, मैं तो तुमसे चुदने के लिए ही हूं। चल आ जा।" वो बोली।
"लेकिन आपके पति को पता चला तो?"
“कुछ नहीं होगा। तू चिंता मत कर। भाभी को तो मैं और भैया साथ मिल्कर छोटे हैं।” बबलू बोला।
मैने बोतल से 2 घंट पानी पिया और भाभी के पास गया। मैंने उसका हाथ पक्का और कहा, "भाभी आप बहुत सुंदर लगती हैं।" मैं उसके चेहरे को देखने लगा। बीना मेक अप के ही वो बहुत सुंदर लग रही थी। उसकी उमरा भी मेरे बराबर ही होगी शायद। अब तक सिरफ अपने से बड़ी-बड़ी 3 औरतों को छोड़ चुका था। इस समय अपने ही उमरा की एक जवान औरत मेरे सामने थी। मैं एक हाथ से उसके बालों को सहलाने लगा और उसे बड़े प्यार से गाल में चुमा दे दिया। पहले एक गाल पर फिर दसरे गाल पर। फिर गर्दन में चुमा दिया। नेक मेई किस करने पर वो सिहार सी गई थी।
मैने उसका आंचल आला सरकार दिया। और ब्लोज के ऊपर से उसकी चुचियों को सहलाने लगा। मैने पुछा, "भाभी, इसे खोल दूं?"
"खोल दे रे, जैसा करना है कर।"
मैंने भाभी के पिचे आया और ब्लोज के हुक खोल दिया और बलूज हटा दिया। उसे अंदर सुरक्षित ब्रा पहन रखा था। मैंने ब्रा का भी हुक खोल दिया और ब्रा भी हटा दिया। मैं भाभी की गड्ढे को सहलाने लगा और किस करने लगा। फिर उसके सामने आकार उसे चुचियों को थोड़ी देर देखा। एकदम मस्त मस्त गोल-गोल चुचियां थी। मैं उन चुचियों पर हाथ रखकर सहलाने लगा। और फिर उन निपल्स को बारी-बारी से बच्चों की तरह चुन लेगा।
मैंने इसी बिच अपना हाथ उसकी नाभी पर ले गया और कभी को सहलाने लगा। मैंने साड़ी को ऊपर से ही खोल दिया, जिससे साड़ी आला गिर गई। अब वो सिर्फ पेटकोट में थी। मैं उसके स्तन को सहलाते चुस्ते, आला पेट पर जीब फेरते हुए आला नभी में जीभ गुसाकर लपलपने लगा। मैंने उसके चेहरे की या देखा। शायद बहुत अच्छा लगा रहा था का प्रयोग करें। उसकी आंख बंद थी। मैंने कहा, "भाभी, आप सच में बहुत खूबसूरत हैं।"
नई जवान औरत के कमर पर थोड़ी भी चार्बी नहीं थी। मैंने भी अपना टी-शर्ट उतर दीया। मैं अब सिर्फ निकर में था। मैंने भाभी को अपनी तरफ खिचकर इस्तेमाल किया जकाद लिया। उसकी चुची मेरी छटी से चिपक गई थी। लुंड अब निकर के अंदर टनक चुका था। जो भाभी की कभी पर चुभ रहा था। मैंने अपने होते हुए भाभी की रसीली होने पर चिपका दिया और हौले-हौले उसके सॉफ्ट लिप्स को किस करने लगा, चुना लगा। उसके मुं के अंदर जीवन डालकर उसकी जीवन से जीवन लडाया। शायद अभी तक उसके साथ किसी ने वैसा नहीं किया, इसिलिए उसे जवाब नहीं दिया।
इसी बिच मैंने उसे पेटीकोट के नादे को खोल दिया और पेटीकोट को आला गिरा दिया। वो अब मेरे सामने पूरी तरह नंगी थी। इसी बिच उसे भी मेरा निकर आला सरकार दिया और चड्डी में आला सरकार दिया। अब हम दोंन नंगे एक दसरे से लिपे द। वो अब साथ देने लगी थी।
मैने उसे आराम से आला चादर पे लिता दिया। और मैं उसके बगल में बैठा कर फिर से उसके आंखें, गाल को किस किया। फिर उसके मुंह से मैं लगाकर किस करना लगा। क्या बार भाभी ने भी मेरे होंठों को चुन लिया है। उसे जीवन से मेरे जीवन को चुन लेने लगी, छेड़ने लगी। एक हाथ से उसे स्तन सहलाने लगा।
फिर मैं उसके जोड़े को फेलकर जोड़ी के बिच बैठा गे। उसकी टंगेन बहुत चिकनी थी। उसकी टंगों को सहलाने लगा। धीरे-धीरे जंगों की या हाथ बढ़ते आया और बड़े आराम से उपयोग सहलय। मैं अब उसकी चुत को बड़े ध्यान से देखने लगा। रेखा चाची, संध्या बुआ, अमृता ताई से बिलकुल अलग चुत लग रही थी भाभी की जवान चुत। चुदने का ज्यादा अनुभव नहीं रहा होगा। झटके कम थी। भाभी की चुत बिच में गुलाबी गुलाबी लग रही थी।
मुझे पता था की थोड़ी देर पहले ही बबलू ने भाभी की छुट को छोटा था और उसे छू के अंदर ही अपना माल छोटा था। इसिलिए बोतल के पानी को भाभी की छुट में डाला और साफ किया। छुट को धोने के बाद मैं उसकी चुत के दाने को अनग्लियों से हलका हलका सहलाने लगा। फिर उसके जोड़े को और थोड़ा फेलया।
बबलू वही बैठेके हम देख रहा था। वो भी आला नंगा ही था। खैर मैं अपना काम करता रहा। मैने भाभी की छुट को फिर से सहलाया और झुक कर उसकी छुट में एक चुम्मा मारा। शायद भाभी को किसी ने पहली बार ऐसा किया होगा। वो चियुंक कर बैठ गई। मैंने उसके चेहरे की या देखा, वो शायद देखना चाह रही थी की आगे क्या होता है। मैंने एक मुस्कान दीया और दुबारा उसकी चुत पर एक चुंबन मारा और उसकी छुट के दान को जीवन से छेड़ने लगा। उसकी चुट को धीरे-धीरे चैटने लगा। 2-3 मिनट में ऐसा लगा की उसकी छुट से रस बहने लगा। उसके जवान चुत का रस भी बड़ा मस्त लग रहा था। मैं चुत चट्टा रहा, चट्टा रहा। उससे शायद नहीं गया तो मेरा सर पकडकर चुत में दबाने लगी। 6-7 मिनट ऐसे ही चुत चट्टा रहा।
फिर मैं चुत चटना बैंड करके अपना लुंड के सुपरडे को छुट के दरवाजे पर लगा और धीरे से कमर थेने लगा। छुट गिली होकर चिकनी हो चुकी थी। इसिलिए लुंड आराम से चुत के अंदर सरक गया। मैं वैसी हलत में ही पूरा लुंड चुत में धनसाकर उसकी चुत की गरमी का एहसास लेने लगा।
फिर धीरे-धीरे कमर हिलाना शूरु किया। ऊपर मैं उसकी चुचियों को सहला रहा था। छुट बहुत गिली थी। लुंड बड़े आराम से अंदर बहार हो रहा था।
उसी पोज में कुछ डर छोडने के बाद मैंने अपना लुंड बहार निकला। और डबरा छोडछोड़कर गिली चुत को छटा। मैंने दुबारा उसकी चुत में एक जोर दार ढकके के साथ लुंड धुस दिया दिया। और 15-20 ज़ोरके झटके मारा। और उसकी चुत में लुंड घुसकर ही पलटकर मैं आला हो गया और भाभी को अपने ऊपर ले लिया। आला से हमें झटका मारकर छोडने लगा।
फिर मैं उसे चुत में लुंड गुसये हुए ही बैठा गया। भाभी मेरी भगवान में बैठी हुई थी। उसकी चुचियां मेरे छत्ती से सती हुई थी। वो भी खुद लुंड को कील की तरह बनार उसपे ऊपर आला हो रही थी।
उसके बाद मैं बोला, "भाभी थोड़ा उठिए।" वो भगवान से उठ गई। मैं भी खड़ा हो गया। उसको मैंने घुटना और हाथ के बाल झुकाया जिस्से उसे चुट्टाड ऊपर उठ गई। मैं उसके चुतदों को सहलाया और किस किया। उसके पिचे आकार अपना लुंड उसकी चुत में पल दिया। डॉगी स्टाइल मेई चोदने लगा का इस्तेमाल करें। अस पोजीशन मेई लुंड टाइट जा रहा था।
थोडी डेर उस पोजीशन में मैं छोडने के बाद मैंने लुंड निकला। और चादर पे चलो गया।
मैं देखना चाहता था की भाभी क्या करेगा। भाभी मेरे बगल में बैठी और मेरे लुंड को पकडकर झुकी और लुंड के सुपड़े को धीरे से मैं में ले लिया और चुना शुरू कर दी। एक जवान औरत से लुंड चुस्वाने का मजा ही अलग था।
मुझसे भी रहा नहीं गया। मैंने उसकी गंद को पडकर मेरे ऊपर ऐसे ले लिया की उसकी चुत मेरे मुंह के ऊपर आ जाए का उपयोग करें। मैं उसकी चुत दुबारा चटने लगा। हम 69 पोज़ में मैं चुसा चती कर रहे थे। उसके चुनने से मुझे लगा की झड़ जहां तो मैंने भाभी को रोक लिया।
मैने बबलू भैया को बुलाया। हमारी छुडाई देख कर उसका लुंड फिर से खड़ा हो गया था। वाह आया। मैंने बोला, "भैया, आपने भाभी की चुत चाटा?"
"नहीं!" उसे बोला।
"जरा भाभी की चुत चाट के देखो, कैसा लगता है।"
ये सुनकर उसे अपना ऊपर का कपड़ा उतर दिया और पूरा नंगा हो गया। बबलू भाभी के जोड़े के बिच बैठाकर भाभी की चुत को चाटने लगा।”
मैने भाभी की या देखा। उसकी आंखें बंद थी। वो चुत चाटाई का आनंद ले रही थी। बबलू की चुत चुसाई से वो मदमस्त हो गई थी। मैंने मौके की नजाकत को समझ और उसे सर के पास बैठाकर और उसे मुं के पास लाया। वो फिर से मेरा लुंड चुनने लगी। उधार बबलू को छुट का स्वाद बहुत पसंद आया होगा। वो ख़ूब ज़ोर से चैट लगा।
मुझे कंट्रोल करना मुश्किल लग रहा था। प्यास भी लग रही थी। मैं उठा और थोड़ी दूर जेक पेशब करके आया। और वापसी आकार बोतल से पानी पिया।
फिर बबलू और भाभी के पास आकर उन्हें देखने लगा। बबलू अब अपना लुंड भाभी की चुत में दलकर छोड रहा था। मुझे पता था वो ज्यादा डर नहीं छोड़ेगा। मैंने बोला, "मेरा भी खड़ा हो गया फिर से।"
"आज छोड ले।" कहकर उसे लुंड भाभी की चुत से निकला और हट गया। अब उसमें जगा मैंने भाभी की चुत में जोरके झटके के साथ लुंड घुसा दिया और थप्प-थप्प छोडने लगा। छुट एक बांध गिली हो चुकी थी। मैं उसी तरह छोटा रहा। फिर जब मुझे लगा का मेरा निकलने वाला है तो मैंने लुंड चुट से निकला और बबलू को बोला, "भैया एक बार आप!"
बबलू, फिर आया, और फिर भाभी को छोडने लगा। मैं वही बैठाकर बबलू के लुंड को चुत में और बाहर होते देख रहा था। धीरे धीरे बबलू ने फिर गति सुधारा। ज़ोर ज़ोर से झटके मारने लगा। और फिर मुझसे पहले ही वो फिर से भाभी की चुत में झड़ गया।
उसके झड़ते ही वो टोपी गया और मैंने बबलू की विर्या से भरी चुत में लुंड दाल दिया। और गप-गैप चोदने लगा। इतनी देर की चुदाई में भाभी भी अतीत हो चुकी थी। ठक चुकी थी। मैं गिली छुट को छोटा रहा। भाभी की चुत में गिरे बबलू का वीर्य मेरे लुंड के अंदर बाहर होने से भाभी की चुत से बाहर आने लगा। क्या बिच ऐसा लगा की भाभी का बदन अकड़ने लगा। उसके जोड़े कान्पने लगे और चुत से कुछ अलग सा रस-रस रिसाव हुआ। उसके बात वो थोड़ी शांत हो गई। लेकिन मैं छोड़ता ही रहा। ज़ोर ज़ोर से झटके मरता रहा। मुझे भी लगा की अब कंट्रोल करना मुश्किल है। छोटे छोटे मैं भी भाभी की चुत में ही झड़ गया। और उसके ऊपर ही चलो गया।
थोड़ी देर में अपनी सांसों को कबू करके मैं भाभी के ऊपर से हटा।
भाभी को पुचा, "कैसा लगा भाभी, ठीक से छोटा की नहीं?"
“क्या तुम तो बड़ा मस्त चोड़ा रे। ठका दिया रे तुमने तो!"
बबलू की या देखे बोली, "तुम डोनों ने बड़ा मजा दिया रे।"
उसके बुरे मैंने भाभी को पानी दिया।
और उसके कपड़े भी दिया।
हम शायद 1 घंटे से ज्यादा देरी तक वहां हमें गढ़े में छुडाई करते रहे थे।
हम सब ने अपने कपड़े पहनने। उसके बाद भाभी हम दोंनों को छोडकर वहां से निकल गई।
मैं भी बबलू को वही छोडकर दसरे रास्ते से घर की तरफ चला गया।
जाते जाते मैं सोच रहा था, "लाइफ ने क्या पलटा खाया। 2 दिन पहले तक एक चुत के दर्शन नहीं हुए। 2 दिन में मैंने 4 औरतों को छोड़ दिया!"
अपने उमर की लड़की जैसी औरत को छोडना बहुत अलग लगा। मैने इस्तेमाल और छोडना चाहता था।
मैं घर पूँछके घर के काम में चाची और माँ की मदद किया। घर के लिए पानी लाया। शाम को सबने दूधर खाना बनाया। माँ ने आंगन में चट्टई बिचाया और वही हम सबने - मैं, चाची, बुवा, बड़ी माँ और माँ ने दूधर खाना खाया। सब बहुत खुश थी।
बड़ी माँ ने माँ से बोला, "तुम्हारा बेटा तो बहुत जल्दी काम सिख रहा है।"
चाची भी बोली, “हां दीदी। हर काम सिख गया है। और बहुत अच्छे से करता है।"
मैं भी बोला, "कहां बड़ी मां, अभी तो पढाई कर रहा हूं। घर के काम सीखना बाकी है। आप लोगों के साथ रहकर सब सिख जाउंगा।”
बुआ बोली, “बेटा तुम बस मेहंदी करो, कोषिश करो। सब सिख जाओगे।"
माँ बोली, “हमारा बेटा ऐसा ही है। देखो कितना बड़ा हो गया।”
बड़ी माँ, “बेटा कल तुम अपनी माँ के साथ खेत में काम करना जाना। ठीक है?"
मुख्य, "आप नहीं जाएगी?"
बड़ी मां, "नहीं रे, कल घर के काम कर्ता हूं।"
उसके बाद खाना खाके हम सब 9 बजे सोने चले गए।
चाची ने कहा, “मैं अकेली हो जाती हूं। राहुल तुम मेरे घर आ जाओ।"
मैंने मां की या देखा। वो बोली, "जा बेटा चाची के पास।"
मुख्य, "चाची आप मेरे घर के अंदर वाले कामरे सो जाये।"
अमृता ताई बोली, "रेखा तुम राहुल वाले घर में सो जाओ। मैं भी आती हूं। संध्या और बिमला एक साथ सो जाएगी।”
उसके बाद संध्या और मां हमारे घर चली गई। रेखा अपनी अच्छी के साथ मेरे वाले घर के अंदर के कामरे में पलंग पर सो गई। अमृता वहीं आला चट्टई बिचा कर सो गई।
मैं बहार वाले रूम में अपने बेड पर सो गया।
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