लॉकडाउन में मेरा परिवार Chapter 1
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परिचय:
मेरा गांव मध्य प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों के जंगल के बीच बसा है। गांव छोटा सा है और गांव में यही कोई 20 घर है और आबादी 120 के आस पास होगी।
कृषि और पशुपालन गांव के लोगों का मुख्य पेशा है। जो लोग मेहंदी करते हैं, वैसा परिवार सुखी संपन्न हैं। कुछ लोग अपने बच्चन को निकत के शहरों में पढ़ने आते हैं। वैसा ही बच्चन में एक मैं हूं, जो प्राथमिक शिक्षा के खराब हाई स्कूल की पढाई के लिए गांव से दूर शहर में रहा। मेरा नाम राहुल है और समय 21 साल का है। क्या समय मैं ग्रेजुएशन कर लिया हूं।
आगे बढ़ने से पहले मेरे परिवार का परिचय जान लेते हैं। मेरे घर में 3 लोग ही हैं।
1. राहुल (मुख्य) - 21 साल।
2. बिकास (मेरे पिताजी) - 42 साल।
3. बिमला (मेरी मां) - 46 साल
मेरी माता जी मेरे पिताजी से बड़ी हैं। क्योंकी पिताजी ने अपनी भाभी से शादी किया था। मेरे पिताजी के बड़े भाई की आकस्मिक मृत्यु के बाद उनको अपनी भाभी से शादी करना पड़ा।
मेरे खंडन में 3 परिवार हैं। थिनों परिवार मिल जुलकर कृषि एवम पशुपालन का कार्य करता है, लेकिन घर अलग है और चुल्हा भी अलग जलता है। खानदान के अन्य सदस्य हैं:
4. राकेश - पिताजी के बड़े भाई - 51 साल।
5. अमृता - राकेश ताउजी की बीबी - 50 साल।
6. संध्या - पिताजी की दीदी (मेरी बुवा) - 48 साल
7. मोहन - मेरे चाचा (पिताजी से छोटे) - 40 साल।
8. रेखा - मेरी चाची (मोहन की बीबी) - 36 साल।
9. कंगना - बड़े ताऊ की बेटी - 26 साल।
10. बिक्रम - संध्या बुवा के पति - 60 साल
11. बिजय - कंगना का पति (मेरे जीजा) - 31 साल
हमारा घर गांव की मुख्य भिड़ से करीब 300 मीटर की दूर पर है। 3 घर एक जग पर हैं। घर के पास आम, कटहल, इमली के पेड़ हैं। सारे घरों के दरवाजे बिच के बड़े आंगन की या खुलते हैं।
मेरी माताजी पहले जिन्की पत्नी पतली वे खंडन में सबसे बड़े भाई थे। मेरी मां से शादी के 5 साल बाद वे ब्यूलाड ही स्वर्ग सिद्ध गए। राकेश ताऊजी और मेरे पिताजी किसान हैं। गांव में खेती बारी का काम सम्भलते हैं। लेकिन मेरे चाचाजी एक शिक्षक हैं, और वे गांव से 20 किमी दूर शहर में एक स्कूल में पढ़ते हैं। वे वही रहते हैं। रेखा चाची भी उनके साथ ही रहती हैं। वे महिन में 2-3 बार वीकेंड में और स्कूल के छुटियों के समय गांव जया कटे हैं।
दसरे कहानियों के संरक्षक / अध्यायों की तरह मेरे खंडन के मर्द किसी हीरो की तरह नहीं दिखते हैं, और ना ही उनका लुंड दसरे कहानियां के मर्दों की तरह 9-10” लंबा है। मेरे खंडन की महिलायें भी स्वर्ग की अप्सराओं या फिल्मी हीरोइन की तरह गोरी चिकनी नहीं हैं। सभी साधरण ही देखते हैं। गांव के प्रधान मुक्त वतावरन में रहने, अपने खेत की सब्जियां खाने और खेत खलिहान में मेहंदी करते रहने के करन सब लोग 40-50 की उमर में भी स्वस्थ हैं।
मैं भी एथलेटिक बॉडी वाला हूं। फुटबाल खेलता हुं, स्वीमिंग जनता हुं। कद 5'6" हाय है। पिताजी भी 5'4'' के हैं, ताऊजी भी करीब उतने ही अच्छे हैं। शरिर में चार्बी नहीं है। मोहन चाचा शिक्षक हैं, तो उनका होना बेहतर लगता है। उनकी हाइट भी 5'5'' जैसा होगा।
अमृता ताई और बिमला माँ 5'1" जैसी ऊँची होगी। मेरी मां बिमला और अमृता ताई का वजन नियमन में है। अमृता ताई सांवली हैं। बिमला (मां) गेहुंवे रंग की। रेखा चाची इंटर तक पढाई की हैं। गोरी है और अच्छी तरह से तैयार रहती है। वे शहर में रहती हैं, इसिलिए थोड़ा वजन बढ़ा हुआ है। 5'2'' ऊंचाई होगी, लेकिन वजन 70 किलो आस पास होगा।
साड़ी महिलायें साड़ी पहेली हैं। गांव की महिला की तरह ही सीधी-सादी जीवन शैली है उनकी। गांव की लड़कियों और महिलाओं में प्रकृति सुंदर रहती है। बिना मेकअप के भी वे सुंदर लगती हैं।
संध्या बुवा थिग्नी है, 4'10" ऊंची होगी। सांवली भी है। वे भी अपनी ऊंचाई के हसब से मोती लगती हैं। उसकी शादी पास के गांव में हुई है। बड़े ताऊजी की बेटी कंगना मुझसे बड़ी है। उसकी शादी हो चुकी है। मोहन चाचा का 1 बेटा 10 साल का है और वो अपने पिताजी के स्कूल में चौथी कक्षा में पदा है और 1 बेटी 2 साल की है। अमृता ताई और मां खेतो में काम करती हैं। लेकिन चाची खेतों पर ज्यादा नहीं जाति है। घर के काम पे ही उल्टी रहती है।
क्योंकी मैं 12 साल की उमर से दूर शहर में पद था, और गांव सिरफ छुटियों में आता था। इसिलिए मुझे गांव के बारे ज्यादा पता नहीं था। हाई स्कूल कम्पलीट करते करते मुझे कफी बदला आया और मुझे भी सेक्स की तरफ झुक आने लगा था। लड़की अच्छी लगने लगी, उनको निहारने की आदत शुरू हो गई। हमें समय उमरा 15-16 की राही। मुठ मारने की शुरुआत हो चुकी थी और दिन में 2-3 बार मुठ मारने लगा। हलत ऐसे हो गई की बिना मुथ मारे निंद नहीं आती थी और जब सुबह उठा तो लुंड खड़ा मिला था और मुथ मारकर ही उठा था।
गांव जटा से ज्यादातर समय घर पे ही बिटी थी। कभी कभी गांव के लड़कों के साथ बेल बकरी चरण जाता था। ताऊजी, पिताजी और चाचाजी के साथ पहाड़ियां को काटकर बने खेत में काम करने जाता था। सब कुछ ठीक लगता था।
पिचले साल 2020 मार्च में कोरोना के करन लॉक डाउन हुआ। लॉकडाउन से बस पहले मैं गांव चला गया था। क्योंकी क्लास बैंड हो गए थे। गांव में कोरोना का डर नहीं था। गरमी की शुरुआत हो चुकी थी। मैं गांव के लड़कों के साथ गांव से होकर गुजराती एक छोटी नदी में नहीं जाने जाता था। घर में बाथरूम नहीं है तो सभी नदी में ही नहीं जाने जाते हैं।
वहां गांव के लड़के तारः की बातें करते हैं। उनके साथ 2-4 दिन रहने के बाद पता चला की मेरे गांव का महल कितना उन्मुक्त है। वे अक्सर लड़कों की बातें करते हैं। किस लड़के का पड़ौसी गांव की किस लड़की से चक्कर चल रहा है, किस किसको छोड़ा, यही बात होती थी। मैं चुपचप उनकी बातें सुनता था।
हमारे कुछ खेत गांव से 2-3 किमी दूर पहाड़ियों के बीच की घाटी में भी हैं। उन खेतों में गरमी में भी पानी रहता है। बरसात से पहले उन खेतों को जोतकर रखा जाता है। खेतों की मरम्मत की जाति है। उधार बहुत कम लोग जाते हैं। अप्रैल में एक दिन सुबाह को राकेश ताउजी और पिताजी हाल खेतो में काम करने उन खेतो की या चले गए। 1 घंटे बाद मेरी माँ विमला और बड़ी ताई अमृता भी खाना लेकर खेतो की या चले गए।
तब तक मैं भी नदी से नाहकार घर आया था। उसके बाद मैं क्या करता! मैंने सोचा, की बहुत दिन से जंगल के बीच के खेत को देखा नहीं। इसिलिए मैं घर से निकला और उन खेतों की या चला गया, जहां मेरे ताऊ, पिताजी, मां और ताई काम करने गए हुए थे।
जंगल में पिता जी और ताई जी:
गांव से करीब 2 किमी दूर पहुंचा तो रास्ते के पास घनी झडिय़ों से किसी महिला की खिलखिलाने की आवाज आई। मैं चौंका की सुनसान जंगल में कौन महिला है तारह हंस रही है।
मैं रुखा, और जिधर से आवाज आई उधार देखने लगा। थोड़ी देर बाद एक मर्द की आवाज आई, "आह, ऐसे ही चूसो भाभी, बड़ा माजा आ रहा है !!" मैं हेयरन रहा गया, "यार, कौन यहां हो सकता है और ये क्या चक्कर है !!"
मैं रुखकर सुनने लगा, उधार और आवाज आई, "ज़रा धीरे धीरे चुसिये भाभी, नहीं तो आपके मुंह में ही झड़ जाउंगा।"
मैं दबे पंव, झड़ियां को बिना हिलाए आवाज की दिशा में जाने लगा। करीब 15 कदम दूर झड़ियों में जाने पर जो मैंने देखा, मैं हेयरन रहा गया। मैने देखा की झड़ियां के बिच एक बड़े छायादार पेड़ के आला मेरे पिताजी और अमृता ताई। जमीं पर लुंगी बिचाया हुआ था और उसपर मेरे पिताजी एकदम नंगे लेटे हुए थे। अमृता ताई की साड़ी पेड़ के तने के पास राखी हुई थी। वे सिर्फ पेटीकोट में थी। ब्लौज के बटन भी खुले हुए थे। अमृता पिताजी के जोड़ी के बिच बैठककर पिताजी के लुंड को चुस रही थी। पिताजी उनकी चुचियों को सहला रहे थे।
"भाभी, बहुत मजा आ रहा है।"
“हां रे, मुझे भी तुम्हारा लुंड अच्छा लग रहा है। ऐसा लग रहा है, जैसे मैं कोई रसदार फल चुस रही हूं।"
पिताजी का लुंड किसी बेंट की तरह कड़क दिख रहा था। लुंड यही कोई 6 ”लंबा रहा होगा। मैं झडिय़ों के बीच छिपा था, जहां से मैं उन देख तो सकता था, लेकिन वे मुझे नहीं देख सकते।
थोड़ी देर बाद पिताजी उठे। उन्होन ताई जी को भी उठा। अमृता पेटीकोट में कमल की सुंदर लग रही पतली। थोड़ी देर में पिताजी ने अमृता का पेटीकोट का नाडा खोल दिया, जिस पेटीकोट जमीन पर गिर गया। पेटीकोट के खुलते ही अमृता ताई बिलकुल नंगी मेरे पिताजी के सामने थी। उनकी छुट झंटों से भारी थी। उनके चुतड़ सांवले लेकिन चिकने द. उनको देखे मेरी हलत खराब हो गई थी। जिंदगी में पहली बार कोई औरत एकदम नंगी देखा था।
थोड़ी देर में मेरे पिताजी ने ताई जी को अपनी या खिंचा और जोर से जकड लिया। ताई जी ने भी उन्हें कास के झकझड़ लिया। वे ऐसे ही 1 मिनट जैसे रहे। शायद वे एक दसरे की शरिर की गरमी महसूस कर रहे थे। फिर थोड़ी देर में अमृता में पिताजी के मस्तक को चुमा। जवाब में पिताजी ने भी ताई जो चुमा, गैलन को चुमा, कानूनों को चुमा, और मैं में जीब दलकर चाची के जीवन को चुनने लगे। उनके हाथ ताई जी चुदाद को सहला रहे थे। इधर चाची भी पिताजी के चुदाद को सहलाने लगी।
थोड़ी देर बाद पिताजी ताई जी की गार्डन को चुम्ते हुए, दों चुचियों को चुनने लगे। फ़िर आला आया। नाभी पे जीभ घुमाकर ताई जी को गुडगुडी करने लगे। चाची खिलखिलाने लगे, "हाय हाय हाय ... बिकास, गुडगुडी हो रही है।" उसके बाद पिताजी ताई जी के सामने बैठककर झांठों को सहलाने लगे। फिर अमृता की बुर में उनगली से दलकर और बाहर करने लगे। फिर उसे ताई को लिखा और उसे बुर में जिभ डालकर चटने लगे। चाची आसमान की या चेहरा कर आंख बंद कर ली, मनो उन्हे स्वर्ग की अनुभूति हो रही हो।
3-4 मिनट ऐसे चुत चटवाने के बाद ताई जी बोली, "देवर जी, अब बरदस्त नहीं होता, अब अपने लुंड से छोडिये।"
पिताजी ताई के टंगों के बिच आकार, अपने लुंड को ताई जी छुट से लगा और धीरे-धीरे उसपर डबव डालने लगे। पिताजी का लुंड देखते देखते ताई जी की झंझट भरी छुट में समा गई। पिताजी धीरे उन चोदने लगे। ताई जी मस्त होकर आंखें बंद कर चुदाई का आनंद लेने लगी। 4-5 मिनट हौले ढोने के बाद पिताजी ने लुंड निकला और ताई जी बुर के सफेद पदार्थ से होने वाले लुंड को ताई जी के मुंह पे दाल दिया। ताई जी बड़े प्यार से अपनी ही चुत के रस से साने लुंड को चुनने लगी। उस समय पिताजी चेहरा ऊपर करके आंख बंद किए थे, जैसे हम अक्सर मुथ मरते समय करते हैं।
उसके बाद पिताजी आला गड्ढे के बाल ले गए। चाची अब पिताजी की तरफ मुंह करके लुंड पर बैठ गई और धीरे-धीरे अपनी चुतद को ऊपर आला करने लगी। 3-4 मिनट इसी तरह चुदाई चलती रही। थोड़ी देर बाद पिताजी पद्माशन की मुद्रा में बैठे और ताई जी उनके लुंड पर दुबारा बैठा कर उनसे लिपट गई। उनके जीवन एक दसरे की जीब को चुस रहे थे। इसी मुद्रा में कुछ डर रहने के बाद दोनो उठे और ताई जी झुक गई। पिताजी उनके पिचे आकार अपना लुंड चाची के चुत में पल दिया। धीरे धीरे उन्हें चोदने लगे। उसके बाद वे तेजी से हिलने लगे। 2-3 मिनट बाद उन्होन अपनी बाद में बड़ी थी। वे पासिन से लठपथ होने लगे। चिड़ियाओं के चाहने की आवाज़ के बिच जंगों और चुतद के तकराने से "थाप थाप" की आवाज़ आ रही थी।
अपनी स्पीड बढ़ाने के साथ साथ पिताजी ने कहा, "भाभी ….. भाभी … आहा … भाभी … आप बहुत मस्त हैं … बहुत मजा आ रहा है … आह्ह्ह्ह … मेरा निकलने वाला है। आआह भाभीइइइइइ।''
उसके बाद अचानक उनकी पिताजी शांत पद गए और ताई जी के ऊपर शांत पढ़ गए। मैं समझ गया की पिताजी ताई जी की छुट में झड़ गए।
उसके बाद पिताजी ने ताई के ऊपर से हट कर आला बैठे गए। उसका लुंड बर के रस से सना हुआ था। ताई ने अपने बुर को अपने हाथ से चीयर के देखा और कहा, "देवर जी, तुमने मेरी छुट को पूरी तरह भर दिया।" और वे पिताजी के मुरझाए लुंड को चुनने लगी।
ये दृश्य देख मेरी हलत बहुत खराब हो गई थी। लुंड पूरी तरह टनक गया था। मैं चुपचप झड़ियां से बहार आया और खेतो की या चल दिया। ताई और पिताजी की वाह चुदाई करीब 30 मिनट तो चली होगी।
लेकिन उस चुदाई ने मेरे दिमाग में ऊथल पुथल मचा दिया। जो देखा वो बड़ा अजीब था। लेकिन एक सुखद दृश्य भी था। देवर भाभी की चुदाई के किस सुना था। लेकिन ये मेरे घर में भी होता है, मैंने देखा भी लिया।
झरने में मां और ताऊ:
याही सोचते सोचते मैं जंगलों के बिच के अपने खेत तक पांच गया। तब तक करीब 10 बज रहे थे। हाल खिनचने वाले अपने जमानत खेत के पास पेड़ के आला लंबी रसियों से बंधे मिले। लेकिन वहां मेरी मां और राकेश ताऊजी भी नहीं दिख रहे थे। मैंने सोचा शायद वे घर चले गए। या जंगलो की या जलावन की लकड़ी लेन गए होंगे। उन खेतों से थोड़ी दूर एक झरना था, जहां साल भर पानी रहता है। मैं हमसे तारफ चला गया। झरने के पास का चायदार पेड। वहन पहंचने पर मेरे लिए दसरा आचार्य मेरा इंतजार कर रहा था।
वहन देखता, की मेरे ताउजी झरने में नहीं है। झरना करीब 3-4 फीट गहरा था। वे कमर तक पानी में। मेरी माँ झरने के कितने कपड़े धो रही थी। मैं बालों था की ताउजी मेरी मां के सामने नहीं हैं। जबकी गांव के सामाजिक नियम के अनुसर जेठ और बहू एक दसरे के सामने नहीं आते हैं।
मैं दूर से ही झडिय़ों पर चुपकर उन्हें देखने लगा। समाज गया, की मेरे पिताजी अगर अपनी भाभी को छोटे होंगे तो मेरे ताऊजी मेरी मां को भी छोड सकते हैं।
मैं जितनी दूर पर था, उतने से उनकी बातें सुन नहीं सकता था। मेरी मां ने कपड़े धोना खतम किया। इतने में ताऊजी बहार निकले। वे एक छोटा गमछा लपेटे हुए थे। वे मेरी मां के पास आए और उन्हें उठाकर झरने के बिच ले गए। मैं देखता के बाल, क्यों गांव में एक जेठ अपने छोटे भाई की बीबी को छू नहीं सकते हैं।
मेरी मां की तरफ से कोई विरोध नहीं हुआ। बाल्की वे हंस रही थी। झरने के अंदर दोंनों छत्ती तक दुबे हुए थे। माँ भी कम नहीं पतली। मेरी मां ने ताउजी को अपने पास खिन्च कर उनसे लिपट गई। मां के हाथ पानी के अंदर गए, और थोड़ी देर में उनके हाथों में ताउजी का गमछा था। माँ ने हमें गमचे को किनारे की या फेंक दिया। मां के हाथ पानी के अंदर थे, शायद वे ताउजी के लुंड सहला रही थी।
ताऊजी मेरी मां के चुचियों को सहला रहे थे। थोड़ी देर में ताउजी ने मेरी मां का ब्लाउज हटा दिया। और किनारे की तरफ फेंक दिया। मेरी मां ने ब्रा नहीं कहना था। बड़ा होने के बाद आज पहली बार मां की चुचियां देखा था।
थोड़ी देर बाद ताऊजी ने मां की साड़ी और पेटीकोट भी किनारे की या फेंक दिया। उसके बाद वे पानी में खेलेंगे। पानी से एक दसरे को छेड़ने लगे। पानी मुं में लेकर एक दसरे पे फूंकने लगे। एक दसरे को जाने लगे। ऐसे ही 12-15 मिनट खेलते रहे।
उसके बाद वे बहार निकले। गेहुंवे रंग की मेरी मां उर्फ हिस्सेदार पानी में भींगा बहुत सेक्सी लग रहा था। तौजी का लुंड भी तगड़ा ही लग रहा था। 6" जैसा ही लगा। मेरी मां की बुर भी झंटों भारी पतली। जब वे बहार निकली तो झंटों से पानी तपने लगा। उस उम्र में भी सेक्सी लग रही थी।
बहार आकार ताऊ जी किनारे राखी पत्थर पे बैठे गए। मां उनके शरिर पर साबुन लगाकर उन्हें नहलाने लगी। पीठ को रागद कर नहला रही थी। उसके बाद ताउजी ने भी मां को सबुन लगाकर नहलाया। वे दुबारा साथ में ही पानी में घुस गए। फिर वे पानी में खूब लिपटा चिपी की। थोड़ी देर में बाद वे बहार निकले।
ताउजी ने मेरी मां को झरना किनारे एक पत्थर पे लिटाया। और चुने लगे। तौजी का लुंड भी झंटों से भरा था। फिर ताउजी मेरी मां के छुट पे मुंह लगाकर चाटने लगे। छुट की चुसाई से मेरी मां चटपटा रही थी। ताऊजी यूं हाय 5-6 मिनट बुर छत्ते रहे। उसके बाद वे मां के चेहरे के पास अपना लुंड लेकर आए। माँ बड़े प्यार से उनके लुंड को चुस रही थी। थोड़ी देर लुंड चुस्वाने के बाद ताउजी उठे। मां भी उठ गई। वे दून दुबारा लिपट गए और एक दसरे को चुने लगे। मैं बालों था की गांव में हूं, तारा भी लुंड चुसाई और बुर चाटई होता होगा। मैं सोचा था, की गांव के लोग सिरफ बर में लुंड दलकर छोटे हैं।
उसके बाद ताउजी एक पत्थर पे बैठे गए और मां उसके खड़े लुंड पे बैठा गई। उसी पोज में ताउजी मां को छोडते रहे। कभी मां खुद को ऊपर निचे करके चूड़वा रही थी तो कभी ताऊजी आला से उन ढकका मार रहे थे। कुछ मिनट बाद मां उनके लुंड के ऊपर से हटी और बुर रस से भारी लुंड को दुबारा चुनने लगी। उसके बाद वे आला चट्टान पे चलो गई और अपने जोड़े को घुटनो से मोडकर रख ली। तौजी उनकी टंगों के बिच बैठा और अपना लुंड मां की छुट में धीरे धीरे डालने लगे। और फिर उन्हें हौले चोदने लगे।
वे इसी तरह हले छोटे रहे। बिच बिच में लुंड निकल कर बर को चैट लेटे। इसी तरह 5 मिनट जैसा छोडते रहे। फिर उन्होन ढाका मारने की स्पीड बड़ा दी। मैं समझ गया की ताउजी अब झटके वाले हैं। थोड़ी देर में वे शांत होकर मां के ऊपर ही लेटे रहे।
उसी तरह थोड़ी देर रहने के बाद दोनो उठे और डबरा झरना के पानी में घुस गए। और नाहकार निकले और कपड़े पहनने लगे। उन्हें वही छोड मैं चुपचाप घर की या चल पाड़ा।
दोपहर तक सब घर आ गए थे। उन देख के लगता नहीं की जंगल में एक बहू अपने जेठ से चुदके आई है और एक भाभी अपने देवर से। सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन अब मुझे शक होने लगा की घर में और भी कुछ होता रहा है। पता नहीं, अब मैं भी घर की औरतों को अलग नज़रिये से देखने लगा। अब मैं घर में होने वाले दसरे संबंध के बारे में सोचने लगा की मेरे खंडन में ऐसा किस था तक हो रहा है। मैं सोच रहा था की चाची भी अपने जेठ से चुडवती होगी !! क्या चाचा जी भी मेरी मां और ताई जी को छोटे होंगे।
दोपहर को खाना खाकर मैं थोड़ी देर सो गया। मां, ताई जी और चाची जी घर के काम में व्यास हो गई। मैंने जसुसी करने की देन ली।
उस दिन शाम को मैं ताऊ जी के साथ बेल बकरिया चरण गया। ताऊ जी ने पुछा, "बेटा, क्या कॉलेज में किसी लड़की को पसंद करते हो?"
मैने कहा, "नहीं ताऊजी।"
उसे समझौता, “बेटा, ख़ूब मन लगाकर कर पढाई करो। हम लोग तो नहीं पढ़े पाए। तुम्हारे दादा जी जब मारे तो मैं और तुम्हारे पिताजी बहुत छोटे छोटे थे। मैं तो खेतों में उनकी मदद करता था। तुम्हारे पिताजी थोड़े ही पढ़े पाए। तुम्हारे चाचा जी उससे ज्यादा पढ़ लिए तो वे मास्टर जी बन गए। तुम अपने चाचा से भी ज्यादा पढ़ना और उनसे भी बड़ा आदमी बनाना। और याद ठीक से नहीं पढ़ेगा तो हमारी तरह खेती बड़ी करना पड़ेगा।”
मैने कहा, "ठीक है, ताऊजी।"
उन्होन फिर कहा, “शहर की लड़कियों के चक्कर में नहीं पड़ना। उसे कुछ हसील नहीं होता। समय की बरबादी है। फिर भी ऐसा कुछ है, तो मुझे बताना।”
मैंने कहा, "नहीं ताऊजी, ऐसा कुछ नहीं है।"
फिर उसे कहा, “ऐसे जवानी में मजा तो लेना चाहिए। लेकिन थोड़ा संभलके। मैंने तो अपने समय बहुत मजा किया था।”
उनकी बातें सुनकर मुझे थोड़ी हिम्मत हुई, "तौजी कैसा मजा किया?"
"वाही, लड़कियों के साथ वाले माजे।"
"कैस?"
"मैंने तुम्हारी ताई जी शादी से पहले खूब मजे की।"
"मतलब शादी से पहले दसरी औरतों के साथ?"
"हान।"
फिर उसे बताया की उसे और ताई जी ने भाग कर शादी किया था। ताई जी पडोसी गांव से हैं, जो मेरे गांव से 4 किमी दूर है। ताउजी उनसे मिलने रात को जाते थे और ताईजी उनके साथ चुपके से घर से निकल जाती थी। गांव से बहार खेतो में 1-2 बार माजा करके अपने अपने घर चले जाते हैं।
मैंने अंजान से बैंकर पुछा, "ताऊजी, ये किस तरह का मजा होता है?"
तौजी हेयर मेरी तारफ देख रहे थे। आगे कुछ नहीं बोला।
पिताजी और रेखा चाची
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लॉकडाउन से बस पहले रेखा चाची भी छोटी बेटी के साथ गांव आ गई थी। चाची से कुछ डर बात किया। उस दिन मां, ताई और चाची ने दूधकर खाना बनाया और हम सब ने एक साथ खाना खाया। चाची ने बताया की चाचा जी तो शहर में ही रह गए। लॉकडाउन खतम होते ही गांव आएंगे। रात को खाना खाने के बाद सब अपने अपने कामरे में सोने चले गए। चाची की बेटी को बड़ी ताई अपने साथ सुलाने ले गई।
मैं अपने कामरे में बिस्तर में लाता था। गरमी लग रही थी। मुझे निंद नहीं आ रही थी। मैंने हवा आने के लिए खिड़की खोल रखा था। करीब 12 बजे चांद की रोशनी में देखा की कोई रेखा चाची के घर की या जा रहा था। हमें शक ने लुंगी पहन रखा था। मैने पचचन लिया का उपयोग करें। वाह मात्र पिताजी। उसे दरवाजा हल्के से दस्तक किया। थोड़ी देर में दरवाजा खुला। और वो चाची के घर घुस गया।
मैं भी थोड़ी देर बाद चुपचाप घूमकर रेखा चाची के घर के पिचे की या चला गया। पिचे तारफ बगीचा था और एक खिड़की थी। गरमी के करन खिडकी खुला ही रखा गया था। मैं अंदर देखने की कोशिश करने लगा।
अंदर से आवाज आ रही थी।
"बहुत डर कर दिया आपने जेठ जी।"
पिताजी बोले, "कोई बात नहीं बहू। मैं ठक गया था। आपकी जेठानी को छोडकर सो गया था। थोड़ी देर में आपकी जेठानी बिमला ने उठाकर भेजा है।"
मैंने अंदर देखने की कोहली की। अंदर एक सोलर लैंप जल रहा था।
कामरे में एक तारफ एक खटिया था और दसरी तराफ एक 7'x5' वाला साधरण पलंग। बिच में चैटी बिचि हुई थी। पिताजी और चाची खटिया पर आगल बगल बैठे हुए थे।
पिताजी बोले, "मेरा मोहन कैसा है? बड़ा लड़का कैसा है? लॉकडाउन में उन दोंनों को यहां आना चाहिए था। क्या महौल में शहर में डर है। लेकिन कोरोना अभी गण से दूर है।"
"आप सही कहते हैं। मैने बाबू के पापा को बोला था। लेकिन उनको नौकरी वाली जग पर रहने को कहा गया। शायद कुछ काम रहेगा। इसिलिए उन्को रुकना पढ़ा।”
थोड़ी देर में चाची उठकर पिताजी की गोदी में बैठ गई। उसे पिताजी के गले में अपने हाथ फँसा दिए। पिताजी अपनी बहू के बालो को सहलाने लगे। सहलाते सहलाते बहू के बंधी हुई बाल को खोल दिए। फिर उसे रेखा चाची के माथे को प्यार से चुमा। बड़े प्यार से बहू के गैलन, कानून, गले को चुनने लगे। जब पिताजी चुमते तो चाची अपनी आंख बंद कर लेते हैं। चाची भी अपने जेठ को चुनने लगी। थोड़ी देर में पिताजी ने चाची के होंठ पर किस किया और जवाब में चाची ने भी पिताजी को किस किया। थोड़ी देर में उसे चाची का आंचल हटा दिया और ब्लोज के ऊपर से उसे चुचियां सहलाने लगे। फिर उसे अपने हाथ बहू की पीठ में ले जकार पिचे से ब्लोज के हुक खोल दिए और ब्लोज हटा दिया।
ब्लौज हटे ही रेखा चाची की बड़ी बड़ी चुचियां बहार आ गए। सोलर लैंप की रोशनी में रेखा की चुचियां बड़ी मस्त लग रहे थे। पिताजी चुचियों को चुन लेने लगे, सहले लगे। पिताजी बोले, "बहू, शरीर को तुम्हीं नहीं कहना आज!"
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